Hanuman

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Hanuman

Hanuman (हनुमान), known also as 'Anjaneya', is one of the most important personalities in the epic, the Ramayana. He is a vanara who aided Lord Rama in rescuing His Consort, Sita, from the Rakshasa king Ravana. He symbolises the pinnacle of bhakti, and is considered to be the eleventh Rudra avatar of Lord Shiva. He is more well-known as the (spiritual) Son of Vayu deva, the Hindu deity of the wind. He is believed by some scholars to be a source for the Chinese mythological character Sun Wukong.

Animal depiction of warriors

When Rama besieged Lanka, all his supporters like Kishkindha king Sugriva and his commander Hanuman, Jatayu, Jamvanta etc were Jat warriors. Bhaleram Beniwal has pointed out that these characters have been depicted as monkeys or animals is out of jealousy of the manuvadis and agents of dharma who never wanted to bring the true history of Jats. [1]

The Jat hostorian Thakur Deshraj has explained about the reasons of animal depiction of people prevalent in India during Ramayana period. During thas period all four varnas had come into existence in Aryan society. The duties of each varna were defined but they could change varna. Brahmans had come into a dominant position and had full control over kings and the society. Some kshatriyas like Kartaviryarjuna had become rebellious against the increased influence of Brahmans. In Sarswati ashrama a big organization under the leadership of Parsurama was constituted by Brahmans to penalize such Kshatriyas. Brahmans suppressed Kshatriyas like Kartaviryarjuna and deprived these Kshatriyas from their status. The Aryans by this time had crossed Vindhyas and were moving towards South. Vanars were inhabitants in South-west Vindhyas. Pampa Sarovar was their main center. Vanars were not monkeys but either aboriginal inhabitants of that area or people of Aryan groups who had come from Iran via Bombay and reached South of Vindhyas. [2]

Other Jat historians have also treated Hanuman as a Jat warrior of Maan gotra. [3] Some other historians treat Vanar as a gotra of jats found in Haryana in India. Lord Hanuman of Ramayana was a Kshatriya of Vanar clan. He was not a monkey as is shown in Ramayana. [4]

The Vanaras

Vanara (वानर) literally refers to be an abbreviation of the from Vana-nara meaning the humans (nara) settled in forests (vana) that is the forest dwellers. The epic Mahabharata describe them as a tribe dwelling in the midst of forest. They were encountered by Sahadeva, a Pandava general who led a military campaign to South India.

According to the Ramayana, the Vanaras lived primarily in the region of Kishkindha in the midst of Dandaka Forest, where Lord Rama met them during his search for lost Sita. The Vanaras helped Rama in his search, and also in his battle against Ravana, Sita's abductor.

The greatest and most famous Vanara was Lord Hanuman, a loyal devotee of Lord Rama. Some of the other notable Vanaras were Hanuman's mother Anjana, his foster father Kesari, Sugriva, Bali and Angada.

An Interesting Article on Hanuman

पुस्तक का नाम - हरयाणे के वीर यौधेय - पृष्ठ ६४ - ७१

लेखक - स्वामी ओमानन्द सरस्वती


यदि पति पत्‍नी की यह इच्छा हो कि हम श्रोत्रिय को उत्पन्न करें तो तीन दिन तक पति पत्‍नी क्षार लवण रहित भोजन करें, नीचे सोयें और ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करें और अहतानां च वाससां परिधानं सायं प्रातश्चालंकरणमिषुप्रतोदयोश्च धारणमग्निपरिचर्या च ॥१०॥ चतुर्थ्यामुपसंवेशनं च । अर्थात् शुद्ध, निर्दोष, वस्‍त्रों का परिधान, सायं प्रातः अलंकार धारण और इषु तथा भाले आदि धारण करें । अग्निहोत्र करें । चौथी रात्रि में पके पदार्थों का होम करें और गर्भाधान करें । और यदि अनूचान की इच्छा हो तो अनूचानं जनयेयमिति द्वादशरात्रमेतद् व्रतं चरेत् । अनूचान विद्वान् उत्पन्न करने वाले गृहस्थ पति पत्‍नी बारह दिन क्षार-लवण रहित भोजन, भूमिशयन और ब्रह्मचर्य का पालन करें, फिर गर्भाधान करें । यदि कामयेत भ्रूणं जनयेयमिति चतुरो मासानेतद् व्रतं चरेत् यदि यह इच्छा हो कि भ्रूण संज्ञक मेरी सन्तति हो तो पति पत्‍नी चार मास तक उपर्युक्त क्षार-लवण रहित भोजन, भूमिशयन की तपश्चर्या करते हुये ब्रह्मचर्य का पालन करें, फिर वीर्य दान देवें । यदि कामयेत देवं जनयेयमिति संवत्सरमेतद् व्रतं चरेत् । यदि देव उत्पन्न करने की कामना हो तो उपर्युक्त ब्रह्मचर्य का एक वर्ष पालन करें । तब होम आदि करके गर्भाधान संस्कार करें । तब देवतुल्य सन्तान की प्राप्‍ति होगी ।


इसी सिद्धान्त के अनुसार पूर्ण युवावस्था में देवी अञ्जना और पवन महात्मा का विवाह हुवा था । विवाह के पश्चात् भी उन दोनों ने २० वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्यव्रत का पालन किया, उसी के फलस्वरूप देवरत्‍न हनुमान् जैसे योद्धा का उनके गृह में जन्म हुवा ।


रामायण किष्किन्धाकाण्ड तृतीय सर्ग में हनुमान् के विषय में निम्न प्रकार से चर्चा की है –

ततः स हनुमान् वाचा श्लक्ष्णया सुमनोज्ञया ।

विनीतवदुपागम्य राघवौ प्रणिपत्य च ॥३॥

आबभाषे च तौ वीरौ यथावत् प्रशशंस च ।

सम्पूज्य विधिवद् वीरौ हनुमान् मारुतात्मजः ॥४॥

उवाच कामतो वाक्यं मृदु सत्यपराक्रमौ ।

राजर्षिदेवप्रतिमौ तापसौ संशितव्रतौ ॥५॥

हनुमान् ने तत्पश्चात् नम्रभाव से उन दोनों रघुवंशी वीरों के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके मन को अत्यन्त प्रिय लगने वाली मधुर वाणी से उनके साथ वार्तालाप आरम्भ किया । पवनपुत्र हनुमान् ने पहले तो उन दोनों वीरों की यथोचित प्रशंसा की । फिर विधिवत् उनका पूजन (आदर) करके स्वच्छन्द रूप से मधुर वाणी से कहा - वीरो ! आप दोनों सत्यपराक्रमी राजर्षियों और देवताओं के समान प्रभावशाली, तपस्वी तथा कठोर व्रत का पालन करने वाले जान पड़ते हैं ।

धैर्यवन्तौ सुवर्णाभौ कौ युवां चीरवाससौ ॥८॥


आप धैर्यशाली, सुवर्णसमान कान्ति वाले चीरवस्‍त्रधारी हैं, आप दोनों का क्या परिचय है ? इस प्रकार बहुत प्रशंसा करने पर बार बार पूछने पर भी राम लक्ष्मण ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो उसने अपना परिचय इस प्रकार दिया –

प्राप्‍तोऽहं प्रेषिस्तेन सुग्रीवेण महात्मना ।

राज्ञा वानरमुख्यानां हनूमान् नाम वानरः ॥२१॥

उन्हीं वानरशिरोमणियों के राजा महात्मा सुग्रीव के भेजने से मैं यहाँ आया हूँ । मेरा नाम हनुमान् है । मैं भी वानर जाति का ही हूँ ।

युवाभ्यां सह धर्मात्मा सुग्रीवः सख्यमिच्छति ।

तस्य मां सचिवं वित्तं वानरं पवनात्मजम् ॥२२॥

धर्मात्मा सुग्रीव आप दोनों से मित्रता करना चाहते हैं । मुझे आप लोग उन्हीं का मन्त्री समझें । मैं पवन का पुत्र वानर जाति का ही हूँ । तब राम ने लक्षमण को हनुमान् से बातचीत करने के लिए कहा -

अभिभाषस्व सौमित्रे सुग्रीवसचिवं कपिम् ।

वाक्यज्ञं मधुरैर्वाक्यैः स्नेहयुक्तमरिंदम ॥२७॥

शत्रु का दमन करने वाले लक्ष्मण ! सुग्रीव सचिव कपिवर हनुमान् से जो बात के मर्म को समझने वाले हैं, तुम स्नेह पूर्वक मधुर वाणी से बातचीत करो ॥२७॥

यह कहकर हनुमान् की पुरुषोत्तम राम ने इस प्रकार प्रशंसा की -

नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः ।

नासामवेदविदुषः शक्यमेवं प्रभाषितुम् ॥२८॥

जिसे ऋग्वेद की शिक्षा नहीं मिली, जिसने यजुर्वेद का अभ्यास नहीं किया तथा जो सामवेद का विद्वान् नहीं है, वह इस प्रकार सुन्दर भाषा में वार्तालाप नहीं कर सकता ।

नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम् ।

बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम् ॥२९॥

निश्चय ही इसने समूचे व्याकरण का कई बार स्वाध्याय किया है, क्योंकि बहुत भाषण करने पर भी इसके मुख से कोई अपशब्द नहीं निकला ।

न मुखे नेत्रयोर्वापि ललाटे च भ्रुवोस्तथा ।

अन्येष्वपि च गात्रेषु दोषः संविदितः क्वचित् ॥३०॥

सम्भाषण के समय इसके मुख, नेत्र, ललाट, भौंह तथा अन्य सब अंगों से भी कोई दोष प्रकट हुवा हो, ऐसा कहीं ज्ञात नहीं हुआ ।

अविस्तमसन्दिग्धम् अविलम्बितसमद्रुतम् ।

उरःस्थं कण्ठगं वाक्यं वर्तते मध्यमे स्वरे ॥३१॥

इतने थोड़े ही शब्दों में बड़ी स्पष्टता के साथ अपना अभिप्राय निवेदन किया है, उसे समझने में कहीं कोई सन्देह नहीं हुवा है । रुक रुक कर, शब्दों अथवा अक्षरों को तोड़ मरोड़ कर किसी ऐसे वाक्य का उच्चारण नहीं किया है जो सुनने में कर्ण-कटु हो । इसकी वाणी हृदय में मध्यमा रूप से स्थित है और कण्ठ से बैखरी रूप में प्रकट होती है, अतः बोलते समय इसकी आवाज न बहुत धीमी रही है न बहुत ऊंची । मध्यम स्वर में ही इसने सब बातें कहीं हैं ।

संस्कारक्रमसम्पन्नां अद्‍भुतामविलम्बिताम् ।

उच्चारयति कल्याणीं वाचं हृदयहारिणीम् ॥३२॥

यह संस्कार और क्रम से सम्पन्न अद्‍भुत, अविलम्बित तथा हृदय को आनन्द प्रदान करने वाली कल्याणमयी वाणी का उच्चारण करता है ।

अनया चित्रया वाचा त्रिस्थानव्यञ्जनस्थया ।

कस्य नाराध्यते चित्तमुद्यतासेररेरपि ॥३३॥

हृदय, कण्ठ और मूर्धा इन तीनों स्थानों द्वारा स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होने वाली इसकी इस विचित्र वाणी को सुनकर किस का चित्त प्रसन्न न होगा । वध करने के लिये तलवार उठाये हुए शत्रु का हृदय भी इस अद्‍भुत वाणी से बदल सकता है ।

एवंविधो यस्य दूतो न भवेत् पार्थिवस्य तु ।

सिध्यन्ति हि कथं तस्य कार्याणां गतयोऽनघ ॥३४॥

निष्पाप लक्षमण ! जिस राजा के पास इसके समान दूत न हों, उसके कार्यों की सिद्धि कैसे हो सकती है ।

एवं गुणगणैर्युक्ता यस्य स्युः कार्यसाधकाः ।

तस्य सिध्यन्ति सर्वेऽर्था दूतवाक्यप्रचोदिताः ॥३५॥


जिसके कार्यसाधक दूत ऐसे उत्तम गुणों से युक्त हों, उस राजा के सभी मनोरथ दूतों की बातचीत से ही सिद्ध हो जाते हैं ।

इससे सिद्ध होता है कि हनुमान् के पिता और माता ने उत्तम प्रकार के ब्रह्मचर्य का पालन करके वीर हनुमान् को उत्पन्न किया था । इसी कारण सांगोपांग चारों वेद पढ़कर विद्वान् बना तथा बलवान् और शक्तिशाली भी इतना बना कि सारी लंका को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला । वह सारे संसार में वज्रांगबली (बजरंगबली) के नाम से प्रसिद्ध है । हिन्दू उस देव सम विद्वान् को शक्ति का देवता मानकर आज तक पूजते हैं । उसे बन्दर कहना बहुत बड़ी मूर्खता है । वह मनुष्यों में उच्च कोटि का आदर्श विद्वान् था । मुनिवर वाल्मीकि ने उपर्युक्त श्लोकों में जिसकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है, उसको पूंछ लगा कर बन्दर (पशु) सिद्ध करना सबसे बड़ी मूर्खता है । वे वानर जाति में, जो मनुष्यों की ही जाति थी, उत्पन्न हुये थे, किन्तु पशुओं में नहीं । बन्दर कहीं चारों वेदों का विद्वान् हो सकता है ?


सामान्य बुद्धि रखने वाला मानव भी इसे स्वीकार नहीं कर सकता । “क्या हनुमानदि बन्दर थे” नाम की अपनी पुस्तक में महाविद्वान् ठाकुर अमरसिंह जी ने इस विषय पर अच्छा प्रकाश डाला है । देवतुल्य विद्वान् हनुमान् को पूंछ लगा कर बन्दर बना डालना पाखण्ड वा मूर्खता ही कही जा सकती है । वे भारतीय इतिहास के एक उज्जवल रत्‍न थे । इतिहास प्रसिद्ध वैराट नगर में (जो जयपुर राज्य के अन्तर्गत है) एक पर्वत के शिखर पर हनुमान् जी की एक प्रतिमा को देखने का अवसर मिला, जो बिना पूंछ की और मानवाकृति जैसी बनाई गई है । इसे गोभक्त महात्मा वीर रामचन्द्र जी ने बनवाकर लगवाया है । यह उनकी उत्तम और सत्य भावनाओं को प्रकट करने वाला चित्र है ।


मुझे प्रथम बार जब सनातनधर्मियों के मन्दिर में मनुष्य के रूप में हनुमान् जी की मूर्ति देखने का अवसर मिला तो अत्यन्त हर्ष हुवा कि भारत में सनातनधर्मियों में भी श्री पंडित रामचन्द्र वीर के समान विचारशील व्यक्ति उत्पन्न हो गये हैं जो इतिहास की इस सत्यता को भली भांति समझ गये हैं कि हनुमान् जी बन्दर (पशु) नहीं बल्कि वे महामानव थे । इस प्रकार दुराग्रह छोड़कर ऐतिहासिक सत्यता को स्वीकार करने वाले पंडित रामचन्द्र जी वीर के सामने कौन अपना शिर नहीं झुकायेगा ।


अस्तु ! हनुमान् जी भारतीय इतिहास को चार चांद लगाने वाले क्षत्रिय वीर थे जो किष्किन्धा के राजा सुग्रीव के महामन्त्री थे, यह रामायण से स्पष्ट सिद्ध होता है । वे इतने उच्चकोटि के देवता (विद्वान्) और बलवान् थे कि पौराणिक काल में शक्ति के देवता मानकर सारे भारत में पूजे जाने लगे और जय बजरंगबली का जयघोष सारे भारतवर्ष में आज भी हिन्दुओं में प्रचलित है । इसका निष्कर्ष यही है कि ब्रह्मचर्यव्रत पालन के फलस्वरूप माता अञ्जना और पवन पिता को हनुमान् समान सौभाग्यशाली सन्तान प्राप्‍त हुई जिसने अपने माता-पिता को भी अमर कर दिया ।

References

  1. Bhaleram Beniwal: Jāt Yodhaon ke Balidān, Jaypal Agencies, Agra 2005 (Page 40-41)
  2. Thakur Deshraj: Jat Itihasa (Hindi), Maharaja Suraj Mal Smarak Shiksha Sansthan, Delhi, 1934, 2nd edition 1992 (Page 15-19)
  3. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudi, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihas (The modern history of Jats), Agra 1998 (Page 289)
  4. Jat Samaj: Agra November 1999

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