Prof. Sher Singh

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Prof. Sher Singh
Prof Sher Singh with Swami Omanand

Prof. Sher Singh (प्रोफेसर शेर सिंह) (born:11 August 1917-death:5 September 2009) from village Baghpur (बाघपुर), Tehsil Beri, District Jhajjar, Haryana. His father's name was Choudhary Sheesh Ram Kadian.

He was Deputy Chief Minister in Punjab in the fifties when Pratap Singh Kairon was the Chief Minister. He was a visionary leader in shaping of Haryana, contemporary of Sir Chhotu Ram.

Prof. Sher Singh made his valuable contribution in Hyderabad Movement, Hindi Andolan and Prohibition Movement. At a time when the society was in the grab of casteism and low-caste Harijans were not allowed to use the common well for drinking water, on 26 January 1929 his father Ch. Sheesh Ram Arya and his uncle (Tau) Ch. Harnarayan Arya constructed a well on their own land in Baghpur village and offered free water to Harijans. On this issue, they also received social boycott.

Prof. Sher Singh passed his matriculation examination from Govt. School in Beri. He passed his F.A. examination from Pilani. his passed BA (Hons) and M.A. in mathetics from Ramjas College, Delhi. He jumped into freedom movement in his student life and held the posts of secretary of Jat Students Federation and president of All India Students Federation. In 1936, his first article in Pt. Shri Ram Sharma's newspaper "Haryana Tilak" became the bone of contention in the eyes of British Raj. In 1946, he was elected for Lahore Assembly.

After partition, in the year1952 and 1957, he contested Assembly election from Jhajjar and proved his ability of a great leader by winning both elections. In 1957, he resigned from the post of Deputy Chief Minister of Punjab (in the cabinet of Sardar Pratap Singh Kairon) because of anti-Hindi policies of Punjab Government. He led the Hindi Andolan and Haryana Andolan along with Swami Omanand Sarswati and Chaudhary Devi Lal.

From 1967 to 1980, Prof. Sher Singh held the posts of Minister of State for Communication, Defence and Education. From 1984 to 1996, he held the portfolios of chairman of Haryana Arya Pratinidhi Sabha and Vice-Chairman of All India Prohibition Committee.

Prof. Sher Sinngh played a pivotal role in the struggle to create a separate Haryana state. After creation of Haryana, he also remained Minister of State for Education in Indira Gandhi's cabinet. Prof.

Sher Singh was a prominent Arya Samajist and had been a close associate of Swami Omanand Saraswati. He has a big role in the running of Gurukul Jhajjar and has also associated himself with several social institutions.

Death

Prof. Sher Singh breathed his last on Saturday , 5 September 2009 in Delhi हिन्दी आंदोलन व आर्य समाज के पुरोधा व हरियाणा राज्य के जनक रहे स्वतंत्रता सेनानी व पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रोफेसर शेर सिंह के निधन के साथ ही न सिर्फ हरियाणा बल्कि संयुक्त पंजाब के एक समृद्ध शाली राजनैतिक युग का अवसान हो गया। उनके निधन की खबर फैलते ही क्षेत्र सहित पूरे राज्य में शोक की लहर फैल गई और उनके अनेक चाहने वालों का काफिला दिल्ली की ओर कूच कर गया। झज्जार जिले के गांव बाघपुर में 11 अगस्त 1917 में जन्मे प्रोफेसर सिंह ने शनिवार सुबह लगभग साढ़े 3 बजे दिल्ली के मैक्स अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार 7 सितम्बर को सुबह 11 बजे गांव बाघपुर में वैदिक रीति से राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। उनके पार्थिव शरीर को बहादुरगढ़, झज्जार, जहाजगढ़ से होते हुए गांव में ले जाया जाएगा। प्रोफेसर सिंह ने हैदराबाद सत्याग्रह, हिन्दी आंदोलन व शराब बंदी आंदोलन का सफल नेतृत्व करते हुए महती भूमिका निभाई थी। प्रोफेसर सिंह जीवंत पर्यत राज्य को नशा व अपराध मुक्त आर्य समाज में रंगे हुए देखना चाहते रहे जिसके लिए वे लगातार संघर्षरत रहे। 11 अगस्त 1917 को गांव बाघपुर में चौ. शीशराम आर्य के घर जन्मे प्रोफेसर शेर सिंह को अपने पिता व ताऊ हर नारायण से देशभक्ति के संस्कार मिले। उनके पिता व ताऊ न सिर्फ प्रसिद्ध आर्य समाजी थे, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी के आह्वान पर हर आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेते थे। गुलामी के समय जाति-पाति के बंधनों में जकड़े समाज में इस कुप्रथा को खत्म करने के लिए जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हरिजनों को कुओं पर चढ़ाकर पानी पिलाने का आह्वान किया था तो 26 जनवरी 1929 को सभी सामाजिक बंधनों से ऊपर उठते हुए उनके पिता चौ. शीशराम आर्य व ताऊ चौ. हरनारायण आर्य ने गांव बाघपुर में अपनी जमीन में ही एक कुएं का निर्माण कर गांव के हरिजनों को कुएं पर चढ़ाकर पानी पिलाकर बेमिसाल नजीर कायम की थी। लेकिन उस वक्त हरिजनों के कुओं पर चढ़ने पर सामाजिक पाबंदी के चलते उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार भी कर दिया गया था। जिसके चलते प्रोफेसर सिंह का गांव कन्हेटी में होने वाला रिश्ता भी टूट गया था। लेकिन उन संस्कारों को आत्मसात करते हुए प्रोफेसर सिंह स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े और एक बार उन्होंने अंग्रेज अधिकारी के सामने गांधीवाद टोपी को न उतारकर महात्मा गांधी का जयघोष कर दिया था। बेरी के राजकीय विद्यालय से दसवीं कक्षा पास करने के बाद उन्होंने पिलानी से एफ.ए व दिल्ली के रामजस कालेज से बी.ए आनर्स तथा एम.ए गणित में विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान हासिल कर अपनी बौद्धिक दक्षता का भी परिचय दिया था। छात्र जीवन में ही स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे प्रोफेसर सिंह 1935 में जाट स्टूडेट फेडरेशन के सचिव व आल इंडिया स्टूडेट फेडरेशन के अध्यक्ष भी बने। 1936 में ही पंडित श्रीराम शर्मा के हरियाणा तिलक अखबार में उनके लिखे पहले राजनैतिक लेख ने संयुक्त पंजाब की राजनीति में खलबली मचा दी थी। उन्होंने वर्ष 1946 में जमींदार लीग के कप्तान दलपत सिंह को हराकर लाहौर एसेम्बली में प्रवेश किया था। इसी दौरान उन्होंने आर्य समाज व हिन्दी भाषी इलाके के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया था। वर्ष 1952 व 1957 में झज्जार निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीतने वाले प्रोफेसर सिंह ने अपने लोकप्रिय नेता होने का सबूत दिया। लेकिन 1957 में गुरुमुखी भाषा को नौकरियों में महत्व देने जैसे अधिनियम से खफा होकर उन्होंने तात्कालीन संयुक्त पंजाब के उप मुख्यमंत्री पद को ठुकराते हुए हिन्दी आंदोलन का बिगुल फूंक दिया था और हजारों समर्थकों के साथ गिरफ्तारी भी दी थी। इस दौरान स्वर्गीय ओमानंद सरस्वती व स्वर्गीय चौ. देवीलाल के साथ उन्होंने कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन का सफल नेतृत्व किया। प्रोफेसर सिंह 1967 से 1980 तक अलग-अलग समय केन्द्र में संचार, रक्षा व शिक्षा राज्य मंत्री के पद पर रहे। 1984 से 1996 तक आर्य प्रतिनिधि सभा हरियाणा के प्रधान व अखिल भारतीय नशाबंदी समिति के उप प्रधान भी रहे। प्रोफेसर शेर सिंह अपने 4 भाईयों में सबसे बड़े थे। उनके छोटे भाई स्व. विजय कुमार आईएएस अधिकारी थे और ओमप्रकाश बेरी बेरी क्षेत्र से दो बार विधायक रह चुके है तथा सबसे छोटे राजेन्द्र कुमार बैंक अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हो चुके है। प्रो. सिंह अपने पीछे पुत्र डॉ. तरूण व 3 बेटियों का भरा-पूरा संसार अपने पीछे छोड़ गए है।

यूं तो प्रोफेसर सिंह जीवन पर्यत सामाजिक भाईचारे को कायम रखने के लिए संघर्षरत रहे लेकिन भाईचारे की अनूठी मिसाल के लिए उनका एक किस्सा आज भी हर किसी की जुबान पर तैर रहा है। जब हरियाणा राज्य के गठन की मांग को लेकर आंदोलन चल रहा था तथा प्रोफेसर सिंह हरियाणा लोक समिति का गठन कर उसके बैनर तले आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे तो राज्य के गठन की उम्मीद बन गई थी। इसी दौरान वर्ष 1962 में हुए चुनाव में वे झज्जार क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे थे और उनके मुकाबले कांग्रेस पार्टी ने बेरी के ही पंडित भगवत दयाल शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा था। दरअसल यह चुनाव राज्य के गठन के बाद बनने वाले मुख्यमंत्री की कुर्सी का चुनाव बन गया था। इस चुनाव में दोनों ही नेताओं के समर्थकों में इस हद तक कटुता बढ़ गई थी कि चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद दोनों के समर्थकों में घमासान होने की पूरी संभावना बन गई थी। चूंकि प्रोफेसर सिंह का समर्थन क्षेत्र की दबंग जाट बिरादरी द्वारा किया जा रहा था और उनके समर्थक किसी भी कीमत पर उनकी हार स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उनके समर्थकों में उन्हे जालसाजी करके हराने की अफवाह फैल गई थी। गिनती के दौरान जब प्रोफेसर सिंह स्वर्गीय पंडित भगवत दयाल शर्मा से चुनाव हार गए थे तो उन्होंने समर्थकों के टकराव को रोकने के लिए मतगणना केन्द्र से बाहर आकर न सिर्फ अपनी विजयी होने की घोषणा की, बल्कि खुद को कोई जरूरी काम बताते हुए समर्थकों से विजयी जलूस के साथ अपने-अपने घरों को लौटने की अपील की। जिसके बाद उनके समर्थक ढोल-नगाड़ों के साथ अपने घरों को लौट गए लेकिन अगले ही दिन जब उन्हे प्रोफेसर सिंह की हार का पता चला तो वे मायूस हो उठे। जिसके बाद प्रोफेसर सिंह ने उनके कम हो चले गुस्से को पूरी तरह शांत करते हुए उन्हें मनाया था। दरअसल वह चुनाव कयासों के अनुसार मुख्यमंत्री की कुर्सी का ही चुनाव निकला और एक नवम्बर 1966 को हरियाणा राज्य के गठन के बाद पंडित भगवत दयाल शर्मा ही राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने।


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