Baba Dheeraj

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लेखक:-मानवेन्द्र सिंह तोमर

बाबा धीरज

भरतपुर रियासत के अंदर पथेना एक प्रसिद्ध ग्राम है। पथेना के जाट अपनी बहादुरी के लिए जग प्रसिद्ध है। पथेना ग्राम का संबंध भरतपुर राजपरिवार से है। पथेना ग्राम में लोकदेवता बाबा धीरज की बड़ी मान्यताएं है। बाबा धीरज के मंदिर पर वार्षिक मेले व खेल प्रतियोगिताओ का भी आयोजन किया जाता है।

बाबा धीरज वंश परिचय

बाबा धीरज

बाबा धीरज सिंह का जन्म पथेना के जागीरदार ठाकुर शार्दूल सिंह सिनसिनवार गोत्रीय जाट के घर हुआ था। पथेना के जाट ठाकुर अतिराम सिंह के वंशज है। ठाकुर ब्रज में जाटों की उपाधि है। ठाकुर का अर्थ भगवान के संबंध में है।

ठाकुर अतिराम के 5 पुत्र हुए थे। बजिन में से तीन निःसंतान मर गए बाकी पुत्रो में से सिंहराम को हलैना की जागीरी मिली थी, तो उनके भाई शार्दूल सिंह को पथेना की जागीरी मिली थी।

ठाकुर शार्दूल सिंह के 14 पुत्र ठाकुर किसनसिंह, ठाकुर धीरजसिंह, ठाकुर पोपसिंह, ठाकुर रतनसिंह, ठाकुर अजीतसिंह, ठाकुर जोधसिंह, ठाकुर गजेन्द्रसिंह, ठाकुर किरतसिंह, ठाकुर भीमसिंह, ठाकुर रणसिंह, ठाकुर देवीसिंह, ठाकुर मेघसिंह, ठाकुर सुजानसिंह, ठाकुर सन्तोषसिंह हुए सभी एक से बढ़ कर एक वीर थे इनके 14 ठिकाने है ।

पठानों के आतंक का अंत करना

बाबा धीरज बाल्यावस्था से ही अपने पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे । बाबा धीरज आजीवन ब्रह्मचारी रहे स्त्री की छाया तक वो अपने ऊपर नही पडने देते थे। एक बार बाबा धीरज भरतपुर महाराज की बारात में जाट चौरासी हिंडौन में गए तब औरतो ने गीतों पठानों नाम लेकर जाटों पर तंज कसा यह बात बाबा धीरज को बहुत बुरी लगी उनको लोगो ने समझाया कि यह सिर्फ गीत है। पठान जाटों से डरता है। लेकिन बाबा बोले हम जाट क्षत्रीय वीर है और हमारा धर्म कहता है। यदि मुस्लिम पठान अन्य जाति के हिन्दू व्यक्तियो पर अत्याचार करता है तो जाट क्षत्रिय होने के कारण उनकी रक्षा करना मेरा धर्म है।

बाबा धीरज बाबा हिंडौन से बाड़ी (धौलपुर) आ गए यह क्षेत्र गैर-जाट आबादी वाला क्षेत्र था। यहां के स्थानीय लोग पठानों के आतंक से भयभीत थे। बाबा ने अकेले ही बाड़ी के पठानों को युद्ध मे गाजर-मूली की तरह काट डाला। जब यह समाचार बाड़ी क्षेत्र में फैला तो यहां के लोगो ने उनको भगवान का भेजा रक्षक का दर्जा दिया यहां से बाबा धीरज पुनः शेरपुर(हिंडौन) पहुँचे

बाबा धीरज का आत्मबलिदान

बाबा धीरज छतरी

पहले के समय बारातियों से महिलाएं मज़ाक किया करती थी। बारातियों को हल्दी लगाना यह रस्म आज भी जीवित है। दुल्हन पक्ष की महिलाओं ने कमर कलेउ के समय हल्दी लगाने की रस्म अदा प्रारम्भ कर दी। धीरज बाबा को पराई महिला की परछाई से नफरत थी, महिलाओं को देख धीरज बाबा हवेली की तीसरी मंजिल पर जा पहुंचे और स्वयं का बचाव करने को हवेली से कूद पडे,जिससे धीरज बाबा के दोनो पैर जख्मी हो गए,जिसने नजारा देख वह दंग रह गया। जहां से धीरज बाबा को गांव पथैना लाए और उपचार के दौरान धीरज बाबा ने दम तोड दिया,जिसका सदमा गांव के लोगों को लगा। ऐसी दृढ़ता सिर्फ जाटों में ही देखने को मिलती है। बाबा धीरज ने अपने जीवन से ज्यादा अपनी प्रतिज्ञा को महत्व दिया । आज बाबा धीरज के नाम से पथेना में मेले का आयोजन होता है।