Pathena

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Location of Pathena in Bharatpur District

Pathena (पथेना) is a large village in Wair tahsil of District- Bharatpur in Rajasthan. PIN Code - 321615

Location

Origin

The Founders

Shardul Singh Sinsinwar was the founder of the village.

Jat Gotras

History

Badan Singh’s second imprisonment within a short time and the maltreatment at the hands of Muhkam Singh ultimately strengthened his cause. Fransoo adds that as many as 22 prominent sardars (Said [1] to be Raja Ram’s son, Fateh Singh of Ajan , Anup Singh of Arig, Ati Ram’s son, Shardul Singh of Halena , Gujars of Sihi and Helak , Purohit Kalu Ram and Lalji of Barsana and others), who loved Badan Singh for his “ good behaviour” appealed to Muhkam Singh to release his cousin but he refused . [2],


Vijay Ram Garasia, the chief of Pathena, being a close associate of Churaman and his sons, had in the past and still opposed Badan Singh. In an attempt to bring the Garasia close to him, he married Suraj Mal with his daughter, Kalyan Kaur (Kalayani). [3] But this conciliatory step failed to mend his ways. Thereupon, he granted Pathena as a jagir to Shardul (the son of Ati Ram of Halaina) whom he had earlier won over to his side. Shardul killed Vijay Ram and held Pathena under Badan Singh. [4]


In order to secure uniformity in revenue records and collect statistics useful in various ways, the Maharaja Jaswant Singh in 1886 ordered the appointment of Patwaries in Muafi or rent-free villages. All Muafidars obeyed the order but the Thakurs of Pathena, following the example of their neighbours, the Jaipur and Alwar Thakurs whose defiance of the lawful authority often passes with impunity, assumed a refractory conduct and obstinately refused to pay Dami or Patwaris wages. The object was explained, and they were politely assured that nothing injurious to their interest was intended, yet they did not at all obey the order. When all means failed to bring them to sense of duty, the Maharaja who never tolerated insubordination, obtaining previous sanction of the Supreme Government sent troops to carry out his order. The Thakurs resisted, Pathena was stormed, about a hundred of their men were slain, others fled, the fort was dismantled and the village was confiscated. Many of the fugitives were subsequently arrested and sentenced to various terms of imprisonment.

कवि चतुरानन्द (कवि चतुरा) गढ़ पथैना रासो में पथेना में हुए मुग़ल सआदत खान और जाटों के एक युद्ध का वर्णन किया गया है जो माघ सुदी 11 सन् 1777 को लड़ा गया. मुग़ल सेनापति अमीर उलउमरा मिर्जा नजफखां (अब्दाली का प्रतिनिधि) के साले सआदत खान को टोडाभीम के कुछ भाग की जागीरी दी गयी. इन युद्ध के समय हाथी सिंह की मृत्यु हो चुकी थी सौंख पर उनके पुत्र तोफा सिंह का राज था.

सआदत खान पथैना के जाट जागीरदार से खिराज की मांग कर रहा था जिसको जाट सरदारों ने ख़ारिज कर उसको युद्ध को ललकारा. इस युद्ध में सभी जाट डुगों-पालों ने भाग लिया. इसमें सौंख और अडिंग के पांडव वंशी खुटेला जाटों ने तोफा सिंह शीशराम सिंह के साथ युद्ध में सेना भेजी. खुटेल सेना का संचालन तोफा सिंह ने किया. सआदत खान ने भैसिना गाम में पड़ाव डाला. इस समय भरतपुर नरेश रणजीत सिंह थे, जिन्होंने भी कुम्हेर से एक सैनिक टुकड़ी युद्ध स्थल पर भेजी. इस युद्ध में जाटों की वीरता के कारण सआदत खान ने संधि वार्ता के लिए सेठ सवाई राम को भेजा पर कोई हल नहीं निकला. जब युद्ध ख़त्म हो गया सभी खाप डुंग के सरदार अपने अपने गढ़ में लोट गये और पथैना के ठाकुर किशन सिंह सिनसिनवार पर अचानक मार्च के महीने में दूसरी बार हमला किया.

कवि चतुरानन्द ने रणभूमि में खुटेल सरदारों का मनमोहक वर्णन किया है:

काल खण्ड के खूटेल आये मुच्छ ऊचे को किये| द्व-द्व धरे तरबार तीखी चाव लरिब को हिये|| तोफा सिंह आइयो ल साथ खुटेल सग ही | जो सबै रण समरथ बलि अरि काटी डारे जग ही | दाखिल गढ़ भीतर भये जिन मुख बरसात नूर ||

चतुरानन्द कवि ने लिखा है तोफा सिंह ,शीशराम सिंह और सैकड़ो खुटेल रणभूमि के वीरो को लाया जिन्होंने युद्ध में दुश्मनों को ज काट डाला तोमरवंशी खुटेलों की वीरता के कारन कवि चतुरानन्द ने पथेना के युद्ध में सौंख , अडिंग के इन तोमर वंशी खुटेलो को मुगलों के काल लिखा है जिन्होंने अपनी तलवार की धार में सैकड़ो मुगलों का रक्त बहा दिया इस युद्ध में सआदत खान के पठानों मुगलों के खिलाफ खुटेल वीरो ने दोनों हाथो से तलवार चलाकर जोहर दिखाए जब यह तोमरवंशी खुटेल पथेना गढ़ में दाखिल हुए तो इनका स्वागत किया गया उनके मुख पर रण में विजय होने की चमक थी यह जीत प्रथम हमले पथेना युद्ध में हुई

इसने हठी सिंह के पुत्र तोफा सिंह का वर्णन भी किया है की उसने दुश्मनों को सभी जगह कठिन से कठिन मोर्चे पर दुश्मन के रक्त से अपनी तलवार की भूख शांत की


खुटेल एक तोफा वह चतुर सामिल भयो वाने मारे मोरचा बढ़ो

Jat Monuments

जाट जन सेवक

ठाकुर देशराज[5] ने लिखा है ....ठाकुर जीवनसिंह – [पृ.22]: भरतपुर राज्य में अलवर और जयपुर से मिलने वाली सीमाओं पर एक पथेना गांव है। यह गांव इतिहास में एक बहादुराना पृष्ठभूमि, अपने अक्खड़पन और जवांमर्दी के लिए प्रसिद्ध है। मैं यह कह सकता हूं कि तालीम के लिहाज से भी यह गांव भरतपुर के तमाम जाट गांवों में अग्रणीय है। कप्तान सुग्रीवसिंह, कप्तान रामजीलाल, ठाकुर मेवाराम और सूबेदार कोकीसिंह बगैर अफसरान इसी गांव के हैं। इसी मरदाने गांव में विक्रम की 20वीं सदी के पहले चरण में ठाकुर जीवनसिंह जी का जन्म हुआ था।

मैंने उन्हें यूं तो कई बार देखा किंतु उनके अंतर के जाट के दर्शन सन 1941 के जाड़ों में सूर्यमल जयंती पथैना में मनाने के अवसर पर हुए थे। जब महाराजा सूरजमल जी का चित्र एक सुसज्जित चौकी पर रखकर नगर कीर्तन के लिए उठाया गया तो उन्होंने गदगद होकर वह प्रतिमा सिंहासन अपने सिर पर रख लिया और तमाम गांव की परिक्रमा में सिर पर ही रखे रहे। यह उनके अंदर की श्रद्धा थी जो अपनी कौम के महान उदाहरण सूरजमल


[पृ. 23]: के चित्र का सम्मान करने के लिए साकार हो पड़ी थी।

उनके चेहरे से रोब और तेज बरबस टपकते थे और लोग उनसे अनायास डरते थे। वह पथेना के इस युग के शेर थे। नाबालिग की भारतपुरी हुकूमत उनसे सदैव डरती थी।

यही कारण था कि जब सन 1938 में शासन सुधारों के अनुसार एडवाइजरी कमेटियां बनी तो भरतपुर सरकार ने उन्हें सेंट्रल एडवाइजरी कमेटी का सदस्य नामजद किया। डर उन्हें छू नहीं गया था। कौन से सच्चा प्यार था।

सन 1942 में ठाकुर जीवनसिंह इस आसार संसार से उठ गए। अपने पीछे उन्होने 4 पुत्र छोड़े हैं। बड़े कुंवर परशुरामसिंह जी हैं जिन्हें स्वर्गीय अलवर महाराज ने जागीर बख्शी थी। अब भरतपुर सेना में मेजर हैं। दूसरे ध्रुवसिंह जी हैं। पहले अलवर में रिसालदार थे और अब भरतपुर किसानों के एक प्रमुख लीडर है और किसान जमीदार सभा के अंग हैं। ध्रुवसिंह जी का बनाया जवाहर साखा एक ओजस्वी पुस्तक है। आप अच्छे और खरे लेक्चरार हैं।

तीसरे कुंवर गंगासिंह जी तहसीलदार है। अल्पभाषी मीठापन उनका ईश्वरदत्त स्वभाव है। चौथे जगतसिंह जी हैं।

Population

According to Census-2011 information:

With total 1077 families residing, Pathena village has the population of 5994 (of which 3215 are males while 2779 are females).[6]

Notable Persons

Gallery

External Links

References

  1. U.N.Sharma, Itihas, 304, 310
  2. G.C.Dwivedi, The Jats, Their role in the Mughal Empire, Ed. Dr Vir Singh, Delhi, 2003, p.89
  3. Tawarikh-i-Hunud, 22b
  4. Pathena Raso, Quoted by Ganga Singh, op. cit., 100-101,91
  5. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, p.22-23
  6. http://www.census2011.co.in/data/village/74858-pathena-rajasthan.html
  7. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, p.22-23
  8. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, p.22-23
  9. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, p.61-63
  10. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, p.24
  11. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, p.70

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