Chandlai

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Author of this article is Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क
Location of Chandlai in Tonk district

Chandlai (चंदलाई) is a village in Tonk tahsil and district in Rajasthan, India.

Location

It is situated at a distance of 10 km from Tonk city on Tonk – Kota road.

Founder

A Jat chieftain ‘Chandla’ founded it.

History

A Jat chieftain ‘Chandla’ founded it. He got constructed a pucca pond near the village in the name of her daughter ‘Bhala’ and put a pillar inscription on it on baisakh sudi 15 samvat 1027 (970 AD). This was the time when Rajasthan was ruled by a large number of small republics. Chandla was ruler of Tonk at that time. Thakur Deshraj has written that extent of the rule of Chandla must be in a radius of 20 miles from Chandlai village. It is not clear what was his Gotra and how long he ruled here. Kashi nagari pracharini patrika, Rajasthan Sandesh and Chaudhari Richh Pal Singh in Jat Veer have published articles about this Jat State. [1][2], [3]

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज

चंदलाई - यह एक गांव है, जो टोंक से मिला हुआ है। पहले इस स्थान को चांदला नाम के जाट सरदार ने आबाद किया था। गांव के निकट ही अपनी बेटी भाला के नाम पर तालाब खुदवाया था। तालाब के कीर्ति-स्तंभ में एक लेख है।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-603


उस पर वैसाख सुदी 15 संवत् 1027 विं खुदा हुआ है।1 चंदला किस गोत्र के जाट सरदार थे, यह तो कुछ पता लगाया नहीं जा सका है, किन्तु यह सही है कि वे उस गांव के सिर्फ पटेल ही नहीं किन्तु उस इलाके के सरदार अर्थात् राजा थे। संवत् 1027 वि. (ई. 970) में, राजस्थान की विशाल भूमि पर कोई भी एक बड़ा राज्य न था। सारा प्रदेश छोटे-छोटे राज्यों में बटा हुआ था। चौहानों की शक्ति प्रकाश में नहीं आई थी। वे भी उस समय साधारण स्थिति के ही थे। कछवाहे ग्वालियर के नरवर की भूमि पर चार-छः कोस के इलाके पर राज कर रहे थे। परिहार मंडोवर से आगे 25-30 मील भी नहीं बढ़े थे। इसी भांति का चंदेल सरदारों का राज्य था। किन्तु तालाब खुदवाने और शिलालेख लगवाने से पता चलता है कि उसका राज्य चंदलाई से कम से कम 20-20 मील चारों ओर तो अवश्य होगा। क्योंकि केवल बेटी की प्रसन्नता के लिये उसने इतना व्यय कर डाला। उसके कोष में भी अवश्य ही अच्छी रकम होगी। चांदला के पीछे कितने दिनों तक उनका राज चला, यह कुछ भी पता अभी नहीं लगा है। ‘काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ में तथा अजमेर के अर्द्ध साप्ताहिक राष्ट्रीय पत्र ‘राजस्थान संदेश’ में टोंक राज्य के भू-भाग पर एक जाट-राज्य का हाल छपा था। चौधरी रिछपालसिंह जी ने भी ‘जाट-वीर’ में उस राज्य का परिचय दिया है।

टोंक -

इससे 5 कोस उत्तर में पहाड़ के नीचे एक गांव पिराणा है। उसमें जाटों का एक प्रजातंत्री ढंग का राज्य था।2 यह राज्य बड़ा संगठित राज्य था। अपने अधीनस्थ प्रदेश में से गुजरने वाले व्यापारियों तथा मालदार राहगीरों से यह टैक्स वसूल करते थे। माल का चौथाई हिस्सा ये टैक्स में लेते थे। जितनी भूमि इनके अधिकार में थी, उस पर सभी भाइयों और जातियों का इनके यहां समान अधिकार था। किन्तु बदले में ये युद्ध के समय प्रजा में से नौजवान चुन लेते थे। अपने राज्य की रक्षा करने के लिए प्रत्येक बालक, युवा और वृद्ध प्राणों का उत्सर्ग करने को तैयार रहता था। एक बार उधर से होकर मुसलमान बादशाह जहांगीर की बेगमें गुजरीं। पिराणा के जाट-सरदारों ने उनको रोक लिया और तब जाने दिया जबकि उन्होंने टैक्स अदा कर दिया। बेगमों ने जाकर बादशाह से शिकायत की। बादशाह ने मलूकखां नाम के मुसलमान सेनापति को पिराणा के अधीश्वर जाटों को दबाने के लिए भेजा। वह रणथम्भौर के पास के गांव शेरपुर में ठहर गया। उसने जाटों के लड़ने के पराक्रम को सुन रखा था। इसलिए उसने उनके सम्मुख


1. जटवीर, वर्ष 8, अंक 42 (लेखक रिछपालसिंह जी)।
2. राजस्थान सन्देश (अर्द्ध साप्ताहिक) वर्ष 1, संख्या 2।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-603


पहुंचकर लड़ने का इरादा स्थगित रखा और उनके नष्ट करने का साधन सोचने लगा। आखिरकार मलूकखां की इच्छा पूर्ण हुई। पिराणा के जाटों का डोम लोभ में आकर सारा भेद बता गया। वह कह गया कि - ‘‘भादों बदी 12 को उनके यहां वच्छ बारस का मेला होता है। उस दिन वे झूला डालकर और अलगोजे बजाकर झूलते हैं। वृद्ध, बालक, युवा और स्त्री-पुरुष सभी उस दिन निरस्त्र और निर्भय होकर झूलते हैं।’’ डोम ने यह भी कहा कि -‘‘अब की बार जब इनका त्योहार आएगा मैं ढोल बजा दूंगा, तब तुम आकर उनको नष्ट कर दोगे।’’ आखिर ऐसा ही हुआ निरस्त्र जाटवीरों को मलूकखां ने वच्छ बारस को घेर लिया और अनेक को काट डाला। इस तरह जाटों का यह प्रजातंत्री राज्य नष्ट हो गया। मलूकखां ने नमकहरामी करने के अपराध में डोम को भी करारा दण्ड दिया। पिराणा के जाट वीरों के सरदार जीवनसिंह और रायमल थे। ये दोनों वीर लड़ाई में काम आए फिर भी निरस्त्र होते हुए भी इन्होंने पचासों शत्रुओं के सर तोड़ डाले। इनकी स्त्रियां गर्भवतीं थीं। उनसे जो पुत् हुए स्त्रियों की इच्छा के अनुकूल उनसे उत्पन्न होने वाले पुत्रों का नाम पिताओं के स्मरणार्थ जीवनसिंह और रायमल ही रखे गए। रायमल सांगानेर के पास चले गए और वहां अपने निवास के लिए एक नगर बसाया। जीवन ने स्थान को न छोड़ा। उसने अपने बाप-दादों के खेड़ों के पास ही अपनी बस्ती आबाद की। उसने अपने बसाए हुए नगर का नाम भी पुराना रखा जो कि आगे पिराना के नाम से ही मशहूर हुआ। यह याद रखने की बात है कि उस युद्ध में कुछ स्त्रियां भी मारी गई थीं। उनके चबूतरे आज सतियों के चबूतरे के नाम से प्रसिद्ध हैं। सतियों के पत्थर में संवत् 1478 तक के लेख हैं। इससे मालूम होता है कि इनकी लड़ाई मलूकखां से सन् चौहदवीं शताब्दी में हुई थी। उस समय दिल्ली में खिलजी लोगों का राज्य था।

Chandlai Inscription of Chandla Jat Ruler v.s. 1027 (AD 970)

Inscription of Chandla Jat Ruler is provided by at Chandlai Inscription of v.s. 1027 (AD 970).

Notable persons

Population

External links

References

  1. Jat Itihas (Hindi) by Thakur Deshraj , Maharaja Suraj Mal Smarak Shiksha Sansthan, Delhi, 1934, 2nd edition 1992, pp.503-04
  2. Rajasthan Sandesh, Year 1, Vol 2
  3. Richh Pal Singh:Jat Veer, Year 8, Issue 42

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