Chandragupta

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Genealogy of Early Guptas

Chandragupta (320 - 335 AD) (चन्द्रगुप्त) was ruler of Gupta Empire and successor of Ghatotkacha.

Mention by Panini

Chandragupta-Sabha (चन्द्रगुप्त-सभा) is mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [1]

History

Ghatotkacha (c. 280–319) CE, had a son named Chandragupta. In a breakthrough deal, Chandragupta was married to Kumaradevi, a Lichchhavi—the main power in Magadha. With a dowry of the kingdom of Magadha (capital Pataliputra) and an alliance with the Lichchhavis, Chandragupta set about expanding his power, conquering much of Magadha, Prayaga and Saketa. He established a realm stretching from the Ganga River (Ganges River) to Prayaga (modern-day Allahabad) by 320. Chandragupta was the first of the Guptas to be referred to as 'Maharajadhiraja' or 'King of Kings'.

इतिहास

दिलीपसिंह अहलावत लिखते हैं - पहला महान् गुप्त सम्राट् - घटोत्कच के पश्चात् उसका पुत्र चन्द्रगुप्त प्रथम राजगद्दी पर बैठा। इसको श्री महाराजाधिराज विजयादित्य चन्द्रगुप्त प्रथम भी कहते हैं। उसने सन् 320 ई० से 335 ई० तक राज्य किया। यह गुप्तवंश का पहला महान् सम्राट् था। उसने ‘महाराज’ की उपाधि को त्यागकर ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की। चन्द्रगुप्त प्रथम ने लिच्छविवंश (जाटवंश) की राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह किया। लिच्छवि वंश उस काल का एक प्रसिद्ध तथा माननीय


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-495


वंश था, जिसका वैशाली तथा आस-पास के प्रदेशों पर राज्य था। प्रो० एन० एन० घोष के शब्दों में, “यह मिलाप गुप्तवंश को महान् बनाने में एक नये युग का द्योतक था।” (N.N. Ghosh Early History of India, p 245)। लिच्छवि वंश की सहायता से ही चन्द्रगुप्त ने पाटलिपुत्र तथा आस-पास के कई प्रदेश प्राप्त किये। उस समय पाटलिपुत्र का शासक राष्ट्रकूट या राठी जाट वंशज राजा सुन्दरवर्मन था। चन्द्रगुप्त ने लिच्छिवि गण की सहायता से राजा सुन्दरवर्मन का वध करके पाटलिपुत्र पर भी अधिकार कर लिया। परन्तु उस राजा का वध करके राज्य हथियाने से प्रजा बिगड़ उठी तथा मगध भर में भयंकर विद्रोह कर दिया। तब सुन्दरवर्मन के पुत्र कल्याणवर्मन को राजसिंहासन पर बैठाया गया जिससे प्रजा का आन्दोलन शान्त हुआ। अनुकूल अवसर पाकर चन्द्रगुप्त ने चार वर्ष बाद पाटलिपुत्र पर अधिकार कर लिया। चन्द्रगुप्त ने घनघोर युद्ध करके गंगा के समीपवर्ती सब प्रदेशों, प्रयाग, अयोध्या एवं मगध के चारों ओर के प्रदेशों पर शासन स्थापित कर लिया। उस सम्राट् ने सोने के सिक्के प्रचलित किये जिन पर उसने अपना नाम तथा चित्र के साथ-साथ ‘महादेवी कुमारदेवी’ का नाम तथा चित्र भी अंकित कराये। चन्द्रगुप्त प्रथम ने एक नया संवत् चलाया जिसे गुप्त संवत् कहते हैं। इस संवत् का पहला वर्ष 26 फरवरी 320 ई० से आरम्भ होता है। इस संवत् की तिथियों के अनुसार ही हम गुप्तकाल की तिथियों को ईसा की तिथियों में समझ पाते हैं। चन्द्रगुप्त प्रथम की सन् 355 ई० में मृत्यु हो गई। उसके बाद उसका पुत्र समुद्रगुप्त राजसिंहासन पर विराजमान हुआ। [2]

References


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