Panini

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Postal Stamp on Panini

Panini the great Sanskrit grammarian and logician was born in Salatura in Gandhara (present day Kandahar) in modern Afghanistan, on the banks of the river Indus. He is also known as Salottariya and is said to be the descendant Panin and grandson of Devala. As his mother’s name was Daksha, he also bears the metronymic Daksheya.

Early life

His date of birth is shrouded in mystery, but many scholars believe that he may have born in the 4th century BC. The differences amongst scholars become obvious when we note that while Goldstucker reckons he might have been born in 6th century BC Weber places his date of birth considerably later.

His works

As a child he was supposed to have been mediocre or even dull, but legend has it that by the blessings of Lord Siva he excelled as a scholar.

His magnum opus PANINIYAM is a testimony of his genius, a work which none has been able to surpass. This work placed him in the forefront of Sanskrit grammarians and something which others had imitated but never improved upon. In fact it has been compared to machine language for its perfect elegance and economy Panini’s works were however preceded by other works like UNADISUTRA, DHATUPATA and GANAPATHA. Panini was in fact a pioneer in Linguistics, because he works were path breaking in both descriptive and generative linguistics. Panini was a forerunner of modern formal language widely used in modern computer languages. Though the Backus Normal Form was discovered by Joseph Backus in 1959, Panini’s notation not only has equivalent power but also many similar properties. Paninian grammars have also been devised for non-Sanskrit languages too. The Backus-Naur form (Panini-Backus form) or BNF grammars is used to describe modern programming languages which have significant similarities to Pāṇini's grammar rules.

His work PANINIYAM is written in the form of sutras or aphorisms. There are 3996 aphorisms arranged in 8 (ASHTA) chapters (ADHYAHYA) and that is why PANINIYAM is popularly known as Ashtadhyayi. His work is very technical and systematic, and using inputs from Dhatupata and Ganapatha he developed algorithms for the development of well formed words. He analytically codified just about every aspect of spoken communication, tone, gestures, rhetorical devices, everything, so that people of future ages could reconstruct the correct recitation of the Vedic scriptures even if the living tradition of master to student might have lapsed. The book contains all the grammatical information needed for the study of Sanskrit and It begins with a comprehensive pronunciation guide and an introduction to the Devanagari alphabet with subsequent sections covering such topics as syntax, verb classes, and declension patterns.

The aphorisms are exceedingly terse and abstruse and that explains the various commentaries that have been written about it. KASIKAVRITTI by Vamana Jayaditya and SIDDHANTA KAUMUDI by Bhattojidikshita are some of the important ones. There were however scholars like Katyayana who had disapproved of Panini’s grammatical rules.

Though he is generally known as a famous grammarian yet he was also a geographer. In his work Ashtadhyayi, Panini provides the names of almost all major places and people from the Oxus in the North West to the Godavari in the south. He was the first to mention Suramas a region identified on the map with Surma valley in Bangla Desh.

Pāṇini on Jat History

The famed Sanskrit grammarian, Panini (पाणिनि) mentioned about the Jats in his classic, Aṣṭādhyāyī(अष्टाध्यायी), in the form of shloka as " जट झट सङ्घाते " (Jat Jhat Sanghate). And, this shloka highlights that the terms 'Jat' and 'democratic federation' are synonymous. He has also mentioned many Jat clans as settled in Punjab and North-West areas.

महर्षि पाणिनि

महर्षि पाणिनि (५०० ई पू) संस्कृत भाषा के सबसे बड़े वैयाकरण हुए हैं। इनका जन्म तत्कालीन उत्तर पश्चिम भारत के गांधार में हुआ था। इनके व्याकरण का नाम अष्टाध्यायी है जिसमें आठ अध्याय और लगभग चार सहस्र सूत्र हैं। संस्कृत भाषा को व्याकरण सम्मत रूप देने में पाणिनि का योगदान अतुलनीय माना जाता है। अष्टाध्यायी मात्र व्याकरण ग्रंथ नहीं है। इसमें प्रकारांतर से तत्कालीन भारतीय समाज का पूरा चित्र मिलता है। इनका जीवनकाल 520 – 460 ईसा पूर्व माना जाता है ।

एक शताब्दी से भी पहले प्रसिद्ध जर्मन भारतिवद मैक्स मूलर (१८२३-१९००) ने अपने साइंस आफ थाट में कहा -

  • मैं निर्भीकतापूर्वक कह सकता हूँ कि अंग्रेज़ी या लैटिन या ग्रीक में ऐसी संकल्पनाएँ नगण्य हैं जिन्हें संस्कृत धातुओं से व्युत्पन्न शब्दों से अभिव्यक्त न किया जा सके । इसके विपरीत मेरा विश्वास है कि 2,50,000 शब्द सम्मिलित माने जाने वाले अंग्रेज़ी शब्दकोश की सम्पूर्ण सम्पदा के स्पष्टीकरण हेतु वांछित धातुओं की संख्या, उचित सीमाओं में न्यूनीकृत पाणिनीय धातुओं से भी कम है । .... अंग्रेज़ी में ऐसा कोई वाक्य नहीं जिसके प्रत्येक शब्द का 800 धातुओं से एवं प्रत्येक विचार का पाणिनि द्वारा प्रदत्त सामग्री के सावधानीपूर्वक विश्लेषण के बाद अवशिष्ट 121 मौलिक संकल्पनाओं से सम्बन्ध निकाला न जा सके ।

The M L B D News letter ( A monthly of indologicalbibliography) in April 1993, में महर्षि पाणिनि को first softwear man without hardware घोषित किया है। जिसका मुख्य शीर्षक था Sanskrit software for future hardware जिसमें बताया गया - प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाने के तीन दशक की कोशिश करने के बाद वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में भी हम 2600 साल पहले ही पराजित हो चुके है। हालाँकि उस समय इस तथ्य किस प्रकार और कहाँ उपयोग करते थे यह तो नहीं कह सकते, पर आज भी दुनिया भर में कंप्यूटर वैज्ञानिक मानते है कि आधुनिक समय में संस्कृत व्याकरण सभी कंप्यूटर की समस्याओं को हल करने में सक्षम है।

व्याकरण के इस महनीय ग्रन्थ में पाणिनि ने विभक्ति-प्रधान संस्कृत भाषा के 4000 सूत्र बहुत ही वैज्ञानिक और तर्कसिद्ध ढंग से संगृहीत हैं।

NASA के वैज्ञानिक Mr.Rick Briggs. ने अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पाणिनी व्याकरण के बीच की श्रृंखला खोज की। प्राकृतिक भाषाओं को कंप्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए अनुकूल बनाना बहुत मुश्किल कार्य था जब तक कि Mr.Rick Briggs. द्वारा संस्कृत के उपयोग की खोज न गयी। उसके बाद एक प्रोजेक्ट पर कई देशों के साथ करोड़ों डॉलर खर्च किये गये।

महर्षि पाणिनि शिव जी बड़े भक्त थे और उनकी कृपा से उन्हें महेश्वर सूत्र से ज्ञात हुआ जब शिव जी संध्या तांडव के समय उनके डमरू से निकली हुई ध्वनि से उन्होंने संस्कृत में वर्तिका नियम की रचना की थी।

पाणिनीय व्याकरण की महत्ता पर विद्वानों के विचार -

  • पाणिनीय व्याकरण मानवीय मष्तिष्क की सबसे बड़ी रचनाओं में से एक है (लेनिन ग्राड के प्रोफेसर टी. शेरवात्सकी)।
  • पाणिनीय व्याकरण की शैली अतिशय-प्रतिभापूर्ण है और इसके नियम अत्यन्त सतर्कता से बनाये गये हैं (कोल ब्रुक)।
  • संसार के व्याकरणों में पाणिनीय व्याकरण सर्वशिरोमणि है... यह मानवीय मष्तिष्क का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अविष्कार है (सर डब्ल्यू. डब्ल्यू. हण्डर)।
  • पाणिनीय व्याकरण उस मानव-मष्तिष्क की प्रतिभा का आश्चर्यतम नमूना है जिसे किसी दूसरे देश ने आज तक सामने नहीं रखा। (प्रो. मोनियर विलियम्स)

External Links

References


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