Ganga Das

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लेखक:लक्ष्मण बुरड़क, IFS, D-4/14 चार इमली. भोपाल
Sant Ganga Das
Sant Ganga Das

Ganga Das (1823-1913) was a revered saint of Udasi sect and a Hindi poet from Hapur district in Uttar Pradesh.

He was born in 1823 in village Rasulpur Bahlolpur of hapur district in the family of punjabi jatt of Munder Gotra. His childhood name was Gangabaksh and at the age of 12, he became Gangadas after consecration in Udasi sect under Baba Vishnudas Udasin at Sedepur district Bulandshahr. He died on bhadrapada krishnashtami in year 1913. His contribution to Hindi poetry is considered unequalled.

जीवन परिचय

महात्मा गंगा दास (१८२३- १९१३) अपने समय के प्रकाण्ड पण्डित और प्रसिद्ध संत थे। उनके शिष्यों की संख्या भी काफी थी। भारत के सभी धार्मिक स्थलों की यात्रा करके वे अंत में गढ़मुक्तेश्वर, जिला-गाजियाबाद में रहने लगे थे। महान दार्शनिक, भावुक भक्त, उदासी महात्मा और एक महाकाव्य के रूप में भी इन्हें काफी ख्याति मिली थी। उनके अनेक शिष्यजैसे-चेतराम, बालूराम, दयाराम, मोतीराम, मोहनलाल आदि उनके पद गा-गाकर लोगों को सुनाया करते थे।[1]

प्रारंभिक जीवन

संत जी का जन्म १८८० विक्रम संवत तदनुसार सन १८२३ में मुंडेर गोत्र के जाट परिवार में बसंत पंचमी को दिल्ली मुरादाबाद मार्ग पर स्थित बाबूगढ़ छावनी के निकट रसूलपुर बहलोलपुर ग्राम में हुआ था. यह स्थान दिल्ली मुरादाबाद रेलवे लाइन के 'कुचेसर रोड' नामक स्टेशन से दो किमी दक्षिण पश्चिम में स्थित है. इस ग्राम को आज भी महात्मा का गाँव कहा जाता है. संत गंगा दास का कुटुंब वर्त्तमान समय में यहीं बसा हुआ है. संत जी के पूर्वज बहुत पहले पंजाब के अमृतसर जिले के मांडला नमक स्थान से आकर मेरठ मंडल में रहने लगे थे. मेरठ मंडल में आकर इनके परिवार की १५ पीढियाँ बीत चुकी हैं. [2]

संत गंगा दास के बहपन का नाम गंगाबक्ष था जो सन्यास लेने के बाद गंगा दास हो गया. इनकी पारिवारिक स्थिति अत्यन्त संभ्रांत थी. उस समय इस परिवार के पास ६०० एकड़ जमीन थी. बचपन में बालक गंगा दास बहुत साफ़ सुथरे रहते थे और तनिक सी मिटटी लगने पर रोने लगते थे. इस आदत के कारण लोग व्यंग से इनको भगतजी कहते थे. यह कौन जनता था कि यह बालक एक दिन महान महात्मा बनेगा. [3]

बालक गंगा दास के माता पिता बचपन में ही चल बसे थे. ये १२ वर्ष की आयु में किसी अच्छे गुरु की खोज में निकल पड़े. सेदेपुर जिला बुलंदशहर की कुटी के संत बाबा विष्णुदास उदासीन ने इनकी विरक्त वृति देखकर अपना शिष्य बना लिया.

चमत्कारिक व्यक्तित्व

संत गंगा दास जी ग्राम ललाने में सेठ हरलाल की हवेली में कुछ दिन रुके थे. उन्ही दिनों सेठ के घर कुख्यात दस्यु झंडा गुजर ने डाका डाला था. संत गंगा दास के हस्तक्षेप करने पर झंडा गुजर ने लालाजी के आभूषण लोटा दिए तथा संत जी के पैर छूकर माफ़ी मांगी थी. सेठ काशी राम के कोई संतान न थी संत गंगा दास की सेवा से संतान प्राप्ति की बात भी काफी प्रचलित है. [4]

संत गंगा दास जी ने काशी में २० वर्षों तक रहकर वेदांत, व्याकरण, गीता, महाभारत, रामायण, रामचरित मानस, अद्वैत कौस्तुम तथा मुक्तावली आदि दार्शनिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया. संत जी ने जिला मुरादाबाद उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, और राजस्थान में भी भ्रमण किया था. बक्सर के निकट फतापुर ग्राम में ये १९ वर्षों तक रहे और चौधरी रकम सिंह और पंडित चिरंजीव लाल को क्रमश: हिन्दी और संस्कृत व्याकरण पढ़ाई थी. यहाँ इनके अनेक शिष्य रहते थे जिनमें जियाकौर नामक शिष्या को भी यहीं दीक्षित किया गया था. संध्या के समय संत जी गाँव से बाहर बाग़ के कुंए पर बैठकर बंशी बजाया करते थे. कहते हैं ये बंशी इतनी मधुर बजाते थे कि वहां विशाल जनसमूह और सैंकडों मयूर भी इकट्ठे हो जाते थे. [5]

काशी से लौटने के पश्चात् ये अपने ग्राम में काफी दिन तक रहे. यहाँ ये साधू वेश में अलग कुटिया बनाकर रहते थे. सन १९१७ में ये अपने घोडे पर चढ़कर आसपास के संतों से मिलते थे. दिल्ली दरबार को देखने जब संत जी अपने घोडे पर चढ़कर दिल्ली पहुंचे तो प्रबंधकों ने इस भव्य वक्तित्व से प्रभावित होकर इनको किसी रियासत का राजा समझ कर आगे की कुर्शियों पर बिठाने लगे. परन्तु महात्मा जी ने अवगत कराया कि वे तो एक साधू हैं. अपने जीवन के अन्तिम २५-२६ वर्षों तक ये गढ़मुक्तेश्वर में रहे. ये समाधी लगाते थे. एक बार अपने शिष्य दयाराम से कोटड़ी का ताला लगवाया तथा एक मास बाद बाहर आए. इस घटना से इनकी ख्याति बहत फ़ैल गई. इनका कद लंबा और हष्ट-पुष्ट था. इनका चेहरा लालिमा से दहकता था. भक्त जी आजीवन ब्रह्मचारी रहे.[6]

१८५७ की क्रांति

संत गंगा दास उस समय सक्रीय थे जब देश में १८५७ की क्रांति का दौर चल रहा था. गंगा दास के काव्य की पहले खोज नहीं हुई थी इसलिए प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन में उनका क्या रोल रहा यह स्पस्ट नहीं हो रहा है परन्तु उनके काव्य से यह स्पष्ट होता है की जनजागृति में उनके योगदान का कोई मुकाबला नहीं है. प्रथम सवतंत्रता संग्राम में जाटों का सबसे ज्यादा योगदान रहा है. १८५७ की क्रांति का बिगुल मेरठ क्षेत्र से ही बजा जो संत गंगा दास की कार्य स्थली है और जाट बहुल भी.

गंगादास के सन्दर्भ में भले राम बेनीवाल ने एक घटना का वर्णन किया है. एक ऐसा समय आया था जब रानी झाँसी युद्ध में घायल हो गई थी. उनकी अधिकतर सेना मारी गई थी. रानी की रक्षा के लिए लड़कियों की जो टुकडी थी उसमें ९० प्रतिशत जाट कन्यायें थी. रानी को जब यह अहसास हो गया कि अन्तिम समय आ गया है और वह ज्यादा समय जीवित नहीं रहेगी तो उसने सभी वीरांगनाओं एवं अपने कुछ बचे सिपाहियों से यह वचन लिया था कि मेरी लाश को गौरे अंग्रेजों के गंदे हाथ न छू पाएं. उस समय तक वर्षा ऋतू शुरू हो चुकी थी. जंगलों में सूखी लकडियाँ नहीं मिल रही थी. वीरांगनाएँ रानी की लाश को उठाए फ़िर रही थी. उसी समय उनको जंगल में संत गंगा दास जी मिले जो अपनी झोंपडी में तपस्या कर रहे थे. वीरांगनाओं ने समस्या बताई कि अंग्रेज हमारा पीछा कर रहे हैं और हमें रानी झाँसी के दाह संस्कार के लिए सूखी लकडियाँ नहीं मिल रही हैं. संत गंगादास जी ने तपाक से कहा कि यह मुश्किल काम नहीं है. आप महारानी के शव को इधर लाओ, मेरी झोंपडी की लकडियाँ व काफी घास सूखा है. उसी झोंपडी से रानी की चिता बनाई तथा संत जी ने वैदिक मंत्रों से रानी का अन्तिम संस्कार कर दिया. जिस समय अंग्रेज सैनिक वहां पहुंचे रानी की लाश जलकर राख हो चुकी थी. [7]

लक्ष्मीबाई का अग्नि संस्कार: दस मई 1857 को मेरठ में सैनिक विद्रोह और दूसरे दिन 11 मई 1857 को दिल्ली की घेराबंदी से हुआ था देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का शंख नाद जिसकी प्रतिध्वनि देशकाल की सीमा लांघती हुई देश की आजादी के लिये समय-समय पर चलाये गये छोटे बड़े हर आन्दोलन में गूंजती रही । आज भी उसका स्मरण हर भारतीय को आन्दोलित कर जाता है ।1857 के डेढ़ सौवें साल पर कुछ हासिल करने का प्रयास करते हुये मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने 10 मई 2008 को 18.57 अर्थात 6 बजकर 57 मिनिट पर ग्वालियर में वीरांगना लक्ष्मीबाई की समाधि पर शहीदों की स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये न केवल अखण्ड ज्योति प्रज्वलित की अपितु क्षेत्रीय पंच-सरपंचों को कमल रोटी देकर सम्प्रेषण के इस प्राचीन प्रयोग को दोहराया जो 1857 में क्रांति घोष का गुप्त संदेश सूचक थे । स्थान चयन की दृष्टि से शायद यह प्रदेश का सबसे अधिक उपयुक्त स्थल था जो इतिहासक्रम का साक्षी रहा है । जहां गंगादास आश्रम के 376 साधुओं ने वीरांगना लक्ष्मीबाई को बचाने के लिये फिरंगी सेना से लड़ते-लड़ते जीवन बलिदान कर दिया था और सैकड़ों घायल हुये व अंग्रेजी सेना के दमन का शिकार भी बावजूद इसके वीर साधुओं ने महारानी लक्ष्मीबाई का शव भी अंग्रेजों के हाथ नहीं आने दिया और बड़ी शाला की घास की गंजी में आग लगा कर लक्ष्मीबाई को अग्नि संस्कार कर दिया था । [8] ग्वालियर किला और दक्षिण-पश्चिम की पहाड़ियां ग्वालियर की बस्ती और लश्कर नगर की रक्षा करती हैं. उत्तर-पूर्व में मुरार की खुली दिशा की रक्षा सोन-रेखा नामक नाला करता है जो लश्कर को ओर से घेरता हुआ मुरार की और जाता है. सोनरेखा नाले से उत्तर की ओर किले से दक्षिण छोर की तरफ कुछ हटकर गंगादास आश्रम की कुटी थी. [9]

अन्तिम समय

संत गंगा दास ने संवत १९७० तदनुसार सन १९१३ भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को प्रात ६ बजे अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया था. जन्माष्टमी के दिन प्राण त्यागने से पहले इन्होने कुटुम्बियों को आदेश दिया कि मेरा शव गंगा में प्रवाहित कर देना, मेरे इस स्थान की कोई भी वस्तु घर मत ले जाना क्योंकि यह सब दान माल की है. लेटे हुए ही उन्होंने यह आदेश दिया था. फ़िर वहां से सबको बाहर जाने के लिए कहा. सबके बाहर जाने के बाद वे शीघ्रता से उठकर बैठ गए. पदमासन लगाया और ब्रह्मलीन हो गए. अब वह स्थान जहाँ महात्मा जी का आश्रम था उदासी साधू बुद्धा सिंह द्वारा डॉ राम मनोहर लोहिया कालिज को दान में दे दिया गया है.[10]

संत गंगादास का स्वर्गवास ९० वर्ष की आयु में सन १९१३ को हो गया. उनकी समाधी रसूलपुर गाँव के निकट गढ़मुक्तेश्वर मार्ग पर चोपला में बनी है. [11]

हिन्दी साहित्य में योगदान

खड़ी बोली हिन्दी के गढ़ मेरठ जनपद की साहित्यिक चेतना का हिन्दी साहित्य के इतिहास में वही स्थान है जो भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में मेरठ से उद्भूत सन १८५७ की क्रांति का है. राष्ट्र भाषा हिन्दी के उन्नयन एवं विकास में मेरठ के साहित्यकारों की देन कम महत्त्व नहीं रखती. भारत में जब राष्ट्रीयता का नव जागरण हो रहा था तब खड़ी बोली हिन्दी के माध्यम से मेरठ जनपद के रचनाकारों ने अपनी भावनाओं का प्रकटीकरण करके देश को एक सर्वथा नई दिशा दी थी.

संत गंगा दास भी एक ऐसी ही विभूति थे. जो शैशव काल में ही अपने माता पिता का देहावसान हो जाने के कारण महात्मा विष्णुदास उदासीन से दीक्षा लेकर गंगाबक्ष से गंगादास बनगए थे. इस महाकवि ने लगभग ५० काव्य ग्रंथों और अनेक स्फुट निर्गुण पदों की रचना करके भारतेंदु के काव्य क्षेत्र में पदार्पण करने के पूर्व ही खड़ी बोली को जो स्वरुप प्रदान किया, वही बाद में विकसित होकर हिन्दी काव्य का श्रृंगार बना. यह अत्यन्त खेद और आश्चर्य का विषय है कि हिन्दी के स्वनाम धन्य इतिहासकारों की दृष्टि से इस संत कवि का कृतित्व कैसे ओझल रहा. संत गंगा दास खड़ी बोली के आदि कवि, आधुनिक काव्य के प्रेरणा-स्त्रोत और कुरु प्रदेश के गौरव हैं. कबीर का फक्कड़पन, सूर की भक्ति, तुलसी का समन्वय, केशव की छंद योजना और बिहारी की कला एक ही स्थान पर देखनी हो तो संत गंगा दास का काव्य इसका सटीक उदहारण है.


महाकवि संत गंगा दास ने २५ कथा काव्यों और कई सहस्र निर्गुण पदों की रचना की थी, जो हिंदी साहित्य के लिए अमूल्य निधि हैं. उनके प्रमुख कथा काव्य निम्न लिखित है - पार्वती मंगल (दो भाग), नल दमयंती, नरसी भक्त, ध्रुव भक्त, कृष्णजन्म, नल पुराण, राम कथा, नाग लीला, सुदामा चरित, महा भारत पदावली, बलि, बलि के पद रुक्मणी मंगल, प्रह्लाद भक्त, चन्द्रावती-नासिकेत, भ्रमर गीत मंजरी, हरिचंद होली, हरिचंद के पद, गिरिराज पूजा, होली पूरनमल, पूरनमल के पद, द्रोपदी-चीर आदि प्रमुख हैं. [12]

हिंदी साहित्य के क्षेत्र में हुए नवीन अनुसंधानों ने भारतेंदु हरिश्चंद्र को खड़ी बोली का प्रथम कवी माने जाने पर प्रश्न चिन्ह अंकित कर दिया है. संत गंगादास जी के साहित्य की जानकारी होने के बाद अब हिंदी साहित्य जगत को पूर्व धारणाएं बदलनी होंगी. संभवतः शीघ्र ही हिंदी साहित्य के इतिहास में खड़ी बोली के प्रथम कवि के रूप में संत गंगादास जी को मान्यता दी जानी चाहिए. महाकवि संत गंगादास जी का जन्म १८२३ में भारतेंदु हरिश्चंद्र से बहुत पहले हुआ था. खड़ी बोली के प्रथम कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र (१८५०-१८८५) और ग्रियर्सन जैसे विद्वान भी जब खड़ी बोली को हिंदी काव्य रचना के लिए कठिन मान रहे थे, तब उससे पहले से संत गंगादास बहुत सहजता से खड़ी बोली में काव्य रचना कर रहे थे. [13]

महा कवि गंगादास जैसी अमूल्य मणि पर पड़ी समय की धूल को साफ़ करने का पुण्य कार्य दिल्ली के डॉ जगन्नाथ शर्मा 'हंस' ने किया. सर्वप्रथम उन्होंने १९७० में 'महाकवि गंगादास व्यक्तित्व और क्र्तित्व' विषय पर शोध ग्रन्थ लिखा. वे पिछले कई वर्षों से 'अखिल भारतीय गंगादास हिंदी संसथान' के माध्यम से गंगादास जी पर शोध, साहित्य प्रकाशन एवं जन जाग्रति का कार्य करवा रहे हैं. [14]

संत गंगादास जी के साहित्य की हिंदी के विद्वानों ने भरपूर प्रशंसा की है. इनके साहित्य में लोकोक्ति, मुहावरे, जन-जीवन के सांस्कृतिक तत्व आदि सभी सम्यक रूप से समाहित हैं. उनकी रचनाओं में भाषा के सभी गुण अन्तर्निहित हैं. संत गंगादास की रचनाओं का स्तर प्राथमिक शिक्षा से लेकर स्नातक तक के पाठ्यक्रम में सम्मीलित किया जाने योग्य है. संत जी की कुण्डलियाँ जहाँ ५ वीं से १० वीं कक्षा के बालकों के लिए सामाजिक मूल्यों का बीजारोपण के लिए सक्षम हैं, वहीँ ११ वीं से परास्नातक के विद्यार्थियों के स्तर के निर्गुण पदों को उनके पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जा सकता है. इसमें पिंगल, विराग, गुरुकृपा, माया, आशा, अंहकार, वियोग, उलटवासी, प्रकृति और पुरुष, आत्मा और परमात्मा, योग और साधना अदि जैसे गहन और दार्शनिक विषयों को स्थानीय सहज भाषा में वर्णित किया है. [15]

संत गंगादास द्वारा रचित काव्य पर विद्वानों के मत

संत गंगा दास द्वारा रचित काव्य पर कु्छ विद्वानों के मत इस प्रकार है.

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका के अतिरिक्त संत काव्य की सौन्दर्य दृष्टि और कला पर संत गंगा दास का काव्य सुंदर प्रकाश डालता है.
  • डॉ रामकुमार वर्मा - ज्ञान भक्ति और काव्य की दृष्टि से संत कवि गंगा दास विशेष प्रतिभावान रहे हैं परन्तु इनका काव्य अनुपलब्ध होने के कारण हिन्दी साहित्य के इतिहास में इनका उल्लेख नहीं हो सका था.
  • डॉ गोपीनाथ तिवारी - जब भारतेंदु और ग्रियर्सन प्रभृति विद्वान खड़ी बोली को हिन्दी काव्य रचना के लिए अनुपयुक्त मान रहे थे उससे पहले केवल संत गंगादास अनेक सुंदर छंदों और वृत्रों द्वारा खड़ी बोली के कलापूर्ण और सुंदर काव्य की अनेक रचनाएं प्रस्तुत कर चुके थे.
  • डॉ विजयेन्द्र स्नातक - संत कवि गंगादास का काव्य भारतेंदु पूर्व खड़ी बोली हिन्दी काव्य का उच्चतम निर्देशन है और हिन्दी साहित्य के इतिहास की अनेक पुराणी मान्यताओं के परिवर्तन का स्पष्ट उद्घोष भी करता है.
  • डॉ जगन्नाथ शर्मा 'हंस' - संत गंगादास के काव्य को पढ़ कर हिंदी साहित्य के इतिहास में निर्गुणमार्गी और सगुणमार्गी (संतों और भक्तों) के बीच की दीवार गिरानी होगी. क्योंकि इस कवि ने ज्ञान और भक्ति, निराकार और साकार साधना का सुन्दर समन्वय किया है.समन्वय में संत गंगादास तुलसी से भी आगे हैं.
  • डॉ जगन्नाथ शर्मा 'हंस' - रिश्वतखोर अदालतों, भ्रष्ट अधिकारियों और बेईमान कर्मचारियों का सांगोपांग चित्रण करने वाले गंगादास भारतीय स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर थे. यही कारण है कि गंगादास-काव्य के अनेक अनुसंधानकर्ताओं और पाठकों की प्रबल मान्यता है कि हिंदी साहित्य का 'आधुनिक काल' गंगादास से ही प्रारंभ हो गया था. उन्होंने न केवल स्वतंत्रता का ही बिगुल बजाया, बल्कि नैतिक मूल्यों की स्थापना द्वारा भी राष्ट्र को दृढ बनाया. हिंदी काव्य में भारतेंदु से पूर्व खड़ी बोली के वे प्रथम समर्थ कवी और भीष्म पितामह हैं.
  • डॉ जगन्नाथ शर्मा 'हंस' - आधुनिक हिंदी काव्य को पढ़कर जो यह दोष लगाया जाता है कि १८५७ के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के पक्ष और अंग्रेजी शासन के विरोध में बहुत कम लिखा गया, वह दोष गंगादास-काव्य को दृष्टिगत कर नहीं लगाया जा सकेगा, क्योंकि उनके काव्य में अंग्रेजी शासन की खुली आलोचना उपलब्ध होती है.
  • डॉ लक्षमण स्वरुप शर्मा - डॉ लक्षमण स्वरुप शर्मा प्रवक्ता शिक्षा विभाग हिंदी, दिल्ली लिखते हैं कि भारतेन्द्र पूर्व खड़ी बोली हिंदी काव्य का उच्चतम निदर्शन ही गंगादास-काव्य है. जब ग्रियर्सन , भारतेंदु आदि अनेक साहित्यकार खड़ी बोली में हिंदी काव्य सृजन की असम्भावना का उद्घोष कर रहे थे, उससे भी पहले गंगादास खड़ी बोली के ललित और काव्योपयोगी स्वरुप का निर्माण करके उसमें मनोहर काव्य की रचना कर चुके थे.

इस कवि की जीवनी से यह स्पस्ट हो जाता है कि जाट कौम जीवन के किसी क्षेत्र में पीछे नहीं रहे हैं. युद्ध, खेती, शिक्षा, त्याग, बलिदान सब में अग्रणी रहे हैं.

गंगा दास जी के दोहे

दोहा:- ६४ ॥ श्री गंगा दास जी ॥

बाराह रूप के दरश हो निशि बासर मोहिं जान।
गंगा दास है नाम मम तुम से कहूँ बखान॥ 

४९९ ॥ श्री गंगा दास जी ॥ कवित

   झूलत कदम तरे मदन गोपाल लाल,
   बाल हैं बिशाल झुकि झोंकनि झुलावती।१।
   कोई सखी गावती बजावती रिझावती,
   घुमड़ि घुमड़ि घटा घेरि घेरि आवती।२।
   परत फुहार सुकुमार के बदन पर,
   बसन सुरंग रंग अंग छबि छावती।३।
   कहैं गंगादास रितु सावन स्वहावन है,
   पावन पुनित लखि रीझि कै मनावती।४।[16]

संत गंगा दास की कुण्डलियाँ

Main article: संत गंगा दास की कुण्डलियाँ

(१)
बोए पेड़ बबूल के, खाना चाहे दाख ।
ये गुन मत परकट करे, मनके मन में राख ।।
मनके मन में राख, मनोरथ झूठे तेरे ।
ये आगम के कथन, कदी फिरते ना फेरे ।।
गंगादास कह मूढ़ समय बीती जब रोए ।
दाख कहाँ से खाए पेड़ कीकर के बोए ।।
(२)
माया मेरे हरी की, हरें हरी भगवान ।
भगत जगत में जो फंसे, करें बरी भगवान ।।
करें बरी भगवान, भाग से भगवत अपने ।
इसे दीनदयाल हरी-हर चाहियें अपने ।।
गंगादास परकास भया मोह-तिमिर मिटाया ।
संत भए आनंद ज्ञान से तर गए माया ।।
(३)
अन्तर नहीं भगवान में, राम कहो चाहे संत ।
एक अंग तन संग में, रहे अनादि अनंत ।।
रहे अनादि अनंत, सिद्ध गुरु साधक चेले ।
तब हो गया अभेद भेद सतगुरु से लेले ।।
गंगादास ऐ आप ओई मंत्री अर मंतर ।
राम-संत के बीच कड़ी रहता ना अन्तर ।।
(४)
जो पर के अवगुण लखै, अपने राखै गूढ़ ।
सो भगवत के चोर हैं, मंदमति जड़ मूढ़ ।।
मंदमति जड़ मूढ़ करें, निंदा जो पर की ।
बाहर भरमते फिरें डगर भूले निज घर की ।।
गंगादास बेगुरु पते पाये ना घर के ।
ओ पगले हैं आप पाप देखें जो पर के ।।
(५ )
गाओ जो कुछ वेद ने गाया, गाना सार ।
जिसे ब्रह्म आगम कहें, सो सागर आधार ।।
सो सागर आधार लहर परपंच पिछानो ।
फेन बुदबुद नाम जुडे होने से मानो ।।
गंगादास कहें नाम-रूप सब ब्रह्म लखाओ ।
अस्ति, भाति, प्रिय, एक सदा उनके गुन गाओ ।।

शेष कुण्डलियाँ यहाँ पढ़ें - संत गंगा दास की कुण्डलियाँ

सन्दर्भ

  1. गंगाबख्श से बने संत-कवि गंगा दास
  2. भलेराम बेनीवाल:जाट योद्धाओं का इतिहास (Jāt Yodhāon kā Itihāsa) (2008), प्रकाशक - बेनीवाल पुब्लिकेशन , ग्राम - दुपेडी, फफडाना, जिला- करनाल , हरयाणा, p.656
  3. भलेराम बेनीवाल:जाट योद्धाओं का इतिहास (Jāt Yodhāon kā Itihāsa) (2008), प्रकाशक - बेनीवाल पुब्लिकेशन , ग्राम - दुपेडी, फफडाना, जिला- करनाल , हरयाणा, p.656
  4. भलेराम बेनीवाल (२००८):जाट योद्धाओं का इतिहास, बेनीवाल पब्लिकेशन, दुपेडी, करनाल, हरयाणा, पृष्ठ ६५६
  5. भलेराम बेनीवाल (२००८):जाट योद्धाओं का इतिहास, बेनीवाल पब्लिकेशन, दुपेडी, करनाल, हरयाणा, पृष्ठ ६५६
  6. भलेराम बेनीवाल (२००८):जाट योद्धाओं का इतिहास, बेनीवाल पब्लिकेशन, दुपेडी, करनाल, हरयाणा, पृष्ठ ६५७
  7. भलेराम बेनीवाल:जाट योद्धाओं का इतिहास (Jāt Yodhāon kā Itihāsa) (2008), प्रकाशक - बेनीवाल पुब्लिकेशन , ग्राम - दुपेडी, फफडाना, जिला- करनाल , हरयाणा, p.657-658
  8. GWALIOR TIMES आलेख एवं फीचर्स June 27, 2008
  9. रानी लक्ष्मीबाई: तुलसी साहित्य पब्लिकेशन्स, पृ. १७८
  10. भलेराम बेनीवाल (२००८):जाट योद्धाओं का इतिहास, बेनीवाल पब्लिकेशन, दुपेडी, करनाल, हरयाणा, पृष्ठ ६५७
  11. लखीराम:'संत शिरोमणि महा कवी गंगादास': जाट समाज पत्रिका, आगरा, जनवरी-फरवरी २००१ , पृष्ट ७
  12. लखीराम:'संत शिरोमणि महा कवी गंगादास': जाट समाज पत्रिका, आगरा, जनवरी-फरवरी २००१ , पृष्ट ७
  13. सम्पादकीय : जाट समाज पत्रिका, आगरा, जनवरी-फरवरी २००१ , पृष्ट ५
  14. सम्पादकीय : जाट समाज पत्रिका, आगरा, जनवरी-फरवरी २००१ , पृष्ट ५
  15. सम्पादकीय : जाट समाज पत्रिका, आगरा, जनवरी-फरवरी २००१ , पृष्ट ५
  16. http://rammangaldasji.iitk.ac.in/granth/granth1b/FILE559.html

अधिक जानकारी के लिए पढें

  • लेखक - भलेराम बेनीवाल:जाट योद्धाओं का इतिहास (Jāt Yodhāon kā Itihāsa) (2008), प्रकाशक - बेनीवाल पुब्लिकेशन , ग्राम - दुपेडी, फफडाना, जिला- करनाल , हरयाणा

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