Mahipal Tomar

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Author:Laxman Burdak, IFS (R), Jaipur

Mahipal Tomar

Mahipal Tomar (975, 985 AD)[1] (महीपाल तोमर) or Mahipal Tanwar (महीपाल तंवर) was Tomar King of Delhi. He was elder son of Salakpal Tomar.

महीपाल तंवर का इतिहास

976 ई. में सलअक्शपाल तोमर इंद्रप्रस्थ के सिंहासन पर सत्तारूढ़ थे। उन्हेंने 25 साल, 10 महीने के लिए शासन किया। 1005 ई. में जयपाल ने समचना (आधुनिक रोहतक) को और फिर कुछ समय के बाद में यमुना नदी को पार किया था और इस तोमर क्षेत्र का हिस्सा बन गया मेरठ गजट हमें बताता है कि जिला "मेरठमहिपाल राजा के राज का हिस्सा था। राजा सलअक्शपाल तोमर जब इस क्षेत्र में आया था उसे के साथ 500 योद्धा थे जिनमें से 405 जाट थे, और बाकी दूसरे समुदायों से थे।

सलअक्शपाल ने चौधरत का समाज शुरू किया था उन्होंने इस क्षेत्र में 14 गांवों के प्रत्येक छह में चौधरत शुरू कर दिया था और इस को चौरासी (84) के कुल और चौरासी की चौधरत (या 84 के रूप) में जाना गया था। पहले एक गांव पर चौधरी का चयन किया गया था, और फिर 14 गांवों और अंत में प्रत्येक समुदाय के चौधरी (बिरादरी) 84 ग्राम स्तर पर उनके चौधरी को चुना है।

महिपाल का बांध

महिपाल का बांध: महिपालपुर को जाट राजा महिपाल सिंह तोमर ने बसाया था उसके वंशज आज भी यहाँ निवास करते है उनको वर्तमान में सहराव कहा जाता है महिपालपुर ने राजा ने एक बांध का निर्माण करवाया था अनगढ़े हुए पत्थर से इसका निर्माण किया गया फ़िरोज़ शाह के समय में इस बाँध से सिचाई की व्यवस्था की गयी यहाँ शिकारगाह का भी निर्माण करवाया गया .

महिपाल पुर का महल:राजा महिपाल ने यहाँ एक महल का निर्माण करवाया जिसके अवशेष आज भो मोजूद है फिरोजशाह तुगलक ने इसका पुन निर्माण करवाया इसके तीन मेहरावी दरवाजे है.

किशनपुर बराल की बारादरी: इसका निर्माण सम्राट सलकपाल देव ने करवाया यहाँ भी एक न्याय पीठ की स्थापना राजा के दुवारा करवाया गया जिसके अवशेष आज भी देखे जा सकते है.

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बुरड़क गोत्र का इतिहास तथा महीपाल तंवर

दिल्ली पति महीपाल तंवर के अधीन राव राजा की राजधानी सरनाउ को संवत 1032 (975 ई.) में बनाया. बुरड़कों की राजधानी सरनाऊ संवत 1032 से संवत 1315 (975 - 1258 ई.) तक रही.

संवत 1032 (975 ई.) में दिल्ली के राजा महीपाल तंवर से 84 गांव ईजारे पर लिये और हुकुम तासीर प्राप्त की. 6 महिने का दीवानी और फौजदारी अधिकार प्राप्त किया. काठ, कोरडा, घोडी, नगर, निशान एवं जागीरदारी के पूरे अधिकार प्राप्त हुए. गाँव में हालूराम जी के नाम पर हालानी बावड़ी बनाई. जीणमाता के नाम पर 104 पेडी की बावडी बनाई और बाग लगाया. गढ की गोलाई 1515 गज करायी. शिवबद्री केदारनाथ, आशापुरी माता तथा हनुमान के तीन मन्दिर बनाये. पूजा ब्राह्मण रूघराज ने की. मंदिर खर्च के लिए 152 बीघा जमीन डोली छोड़ी. अमावास, ग्यारस और पूनम का पक्का पेटिया बांधा. यह काम पौष बदी 7 संवत 1033 (977 ई.) में किया.

सरणाऊ कोट गढ़ में एक पक्का कुवा चिनाया. दूसरा कुवा सरनाउ गांव के बीच गुवाड़ में चिनाया. ये दोनों कुये फ़ागण बदी फ़ुलरिया दूज संवत 1035 (979 ई.) में कराये.

चौधरी मालूरामजी, धरणीजी जाखड,चौधरी आलणसिंहजी तथा वीरभाणजी हरिद्वार, केदरनाथ, द्वारकाजी, गंगासागर, कुंभ आदि का स्नान कर तीन साल की यात्रा से सरनाउ आये. वापस आकर पंच-कुण्डीय यज्ञ करवाया. 51 मण घी की आहुति कराई. 51 गायें और 700 मण अनाज ब्राह्मणों को दान किया. गांव कारी के पंडित गिरधर गोपाल द्वारा यज्ञ सम्पन्न किया गया. पंडित गिरधर गोपाल की बेटी राधा को धर्मं परणाई और पीपल परणाई. चौधरी हालूराम के समय दिल्ली के रावराजा महिपाल के समय ये काम संवत 1042 (985 ई.) में कराये.

चौधरी मालूरामजी, धरणीजी जाखड,चौधरी आलणसिंहजी तथा वीरभाणजी ने संवत 1042 (985 ई.) में सरनाउ-कोट तथा गढ, बावडी आदि बडवा जगरूप को लिखवाया और दान किया.

राव बुरडकदेव (b. - d.1000 ई.) महमूद ग़ज़नवी के आक्रमणों के विरुद्ध राजा जयपाल की मदद के लिए लाहोर गए. वहां लड़ाई में संवत 1057 (1000 ई.) को वे जुझार हुए. इनकी पत्नी तेजल शेकवाल ददरेवा में तालाब के पाल पर संवत 1058 (1001 ई.) में सती हुई. राव बुरडकदेव से बुरडक गोत्र को प्रसिद्धि मिली।

संवत 1315 (1258 ई.) में यह दिल्ली के बादशाह शमसुद्दीन इल्तुतमिश (1211–1236) के पुत्र नसिरुदीन महमूद (1246–1266) के अधीन हुई. बादशाह ने गानोड़ा गाँव के ढाका मोमराज को 52000 फ़ौज का मनसबदार बनाया. उस समय सरनाऊ कोट राजधानी चौधरी कालूरामजी बुरडक के पुत्र पदमसिंहजी बुरडक तथा जगसिंहजी बुरडक के अधिकार में थी. इस जागीर में 84 गाँव थे.

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References

  1. ये दोनों वर्ष बुरड़क गोत्र का इतिहास में दर्ज हैं।

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