Parbatsar

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Location of Parbatsar in Nagaur District

Parbatsar (परबतसर) is a city and a tehsil in Nagaur district in the Indian state of Rajasthan. Its coordinates are dm|26|53|N|74|46|E|

Jat Gotras

  • Dahiya
  • Asit (असित) gotra Jats derived from sanskrit word Asit which means not white. These are Nagavanshi Kala Jats, who inhabited Parbatsar area. [1]
  • Siyag

History

Tejaji Temple Parbatsar

Parbatsar is associated with the history of Tejaji


There is a temple of Tejaji at Paner in which three statues are placed. People believe that a statue of Tejaji came out from the ground on its own at site of Raimal's house. The magical powers of Tejaji had spread all around. Maharaja Abhay Singh of Jodhpur wanted to shift this statue to to his state Jodhpur. He got it dug out the statue for many days but could not take out this. It is believed that Maharaja Jodhpur at last saw Tejaji in dream who guided him that statue can not be taken out from here but it can be installed at boarder of Nagaur district. Later Jodhpur Maharaja got constructed a temple of Tejaji at Parbatsar and installed a statue of Tejaji here.

Tejaji fair

A large fair, Mela Tejaji, Takes place on the eleventh lunar day of Bhadrapad Shukla Paksh (Aug.-Sept.) every year in village Parbatsar, District Nagaur in Rajasthan.

सबसे बड़ा पशु मेला

परबतसर (नागौर) - वीर तेजाजी महाराज की स्मृति में भरने वाला प्रदेश का सबसे बड़ा पशु मेला लगता है तथा मंदिर परिसर में पूरे भादौ मेले सा माहौल रहता है।

परबतसर में एशिया का सबसे बड़ा तेजाजी पशु मेला भरता है। यहाँ बिकने आने वाले पशुओं की अधिकतम संख्या 130000 है तथा उसमें से बिक्री का रिकार्ड 100000 का है। हर वर्ष परबतसर मेले में सारे पशु रात को अचानक खड़े हो जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि रात्रि को तेजाजी अपनी घोड़ी लीलण पर चढ़कर आते हैं और हर साल एक बार मेले में सभी प्राणियों को दर्शाव देते हैं। इस चमत्कारिक घटना के गवाह मेले में जाने वाले बड़े बुजुर्ग व पशु पालक हैं।

जोधपुर राज्य के राजा अभय सिंह को सोते समय तेजाजी का दर्शाव हुआ। दर्शाव में तेजाजी ने राजा से कहा कि दक्षिण में मध्य प्रदेश तक के लोग मेरी पूजा करते हैं लेकिन मारवाड़ में मुझे भूल से चुके हैं. तेजाजी ने वचन दिया कि जहाँ लीलन , खारिया तालाब, में रुकी थी वहां मैं जाऊंगा। राजा ने पूछा, हम चाहते हैं कि आप हमारी धरती पर पधारो। पर आप कोई सबूत दो कि पधार गए हैं। तेजाजी ने दर्शाव में कहा कि परबतसर तालाब के पास जहाँ लीलण खड़ी हुई थी वहां जो खारिया तालाब है उसका पानी मीठा हो जायेगा एवं टीले पर जो हल का जूडा पेड़ के पास लटका है वो हरा हो जायेगा तथा यह खेजडा बनकर हमेशा खांडा खेजड़ा रहेगा। जोधपुर महाराज ने पनेर से तेजाजी की असली जमीन से निकली देवली लानी चाही लेकिन असफल रहे। अंत में तेजाजी ने दर्शाव में कहा कि मैं बिना मूर्ती के ही आ जाऊंगा, तब राजा ने देवली दूसरी लाकर लगाई। राजा जब वहां पधारे हल का जूडा हरा हो गया तथा खारिया तालाब का पानी चमत्कारी ढंग से मीठा हो गया। जोधपुर राज्य के राजा अभय सिंह को अपार ख़ुशी हुई और लोक देवता वीर तेजाजी का मंदिर खारिया तालाब की तीर पर बनाया। [2]

मंदिर से सटाकर पिछवाड़े में में खाड़या खेजडा अब भी खड़ा है। यह आधा सूखा और आधा हारा भरा है। इस मंदिर में तेजाजी की दो प्रतिमाएँ स्थापित हैं। जिन पर संस्कृत भाषा में खुदा है - विक्रमी संवत 1791 (1734-1735 ई) भादों बड़ी 6 शुक्रवार महाराज अभय सिंहके राज में प्रधान भण्डारी विजयराज ने यह तेजाजी की मूर्ति बनाकर प्रतिष्ठा की। तब से परबतसर भी तेजाजी का प्रमुख स्थल बन गया है। भादवा की शुक्ल पक्ष में 5 से 15 तक विशाल मेला भर्ता है। [3]

परबतसर शहर

संत श्री कान्हाराम[4] ने लेख किया है कि.... [पृष्ठ-312]: परबतसर के लोग बताते हैं कि जोधपुर राज्य के राजा अभय सिंह को सोते समय तेजाजी का दर्शाव हुआ। दर्शाव में तेजाजी ने राजा से कहा कि दक्षिण में मध्य प्रदेश तक के लोग मेरी पूजा करते हैं लेकिन मारवाड़ में मुझे भूल से चुके हैं, मुझे मारवाड़ ले चलो। हाकिम ने पनेर अथवा सुरसुरा से तेजाजी की मूर्ति उखाड़कर परबतसर लेजाने की कोशिश की, किन्तु सफलता नहीं मिली। इस पर जोधपुर महाराजा अभयसिंह ने सारी स्थिति बताकर परबतसर शहर से पश्चिम में खरिया तालाब की पाल पर एक चबूतरा (थान) बनाकर तेजाजी की मूर्ति स्थापित कर प्राण-प्रतिष्ठा करा दी गई। तब से पनेर में लगने वाला पशु मेला परबतसर में लगने लग गया।


[पृष्ठ-313]: मंदिर से सटाकर पिछवाड़े में में खाड़या खेजडा अब भी खड़ा है। यह आधा सूखा और आधा हरा है। इस मंदिर में तेजाजी की दो प्रतिमाएँ स्थापित हैं। जिन पर संस्कृत भाषा में खुदा है -

"विक्रमी संवत 1791 (1734 ई.) भादों बदी 6 शुक्रवार महाराज अभयसिंह के राज में प्रधान भण्डारी विजयराज ने यह तेजाजी की मूर्ति बनाकर प्रतिष्ठा की।"

तब से परबतसर भी तेजाजी का प्रमुख स्थल बन गया है। भादवा की शुक्ल पक्ष में 5 से 15 तक विशाल मेला भरता है।

मंदिर के वर्तमान पुजारी रामस्वरूप पारीक हैं। पुजारी के अनुसार जोधपुर महाराजा द्वारा मंदिर बनाने के बाद पूजा के लिए जोधपुर से उनके परदादा प्रह्लाद पारिक को भेजा गया था । तेजाजी ने वचन दिया कि जहाँ लीलण, खारिया तालाब, में रुकी थी वहां मैं जाऊंगा। राजा ने पूछा, हम चाहते हैं कि आप हमारी धरती पर पधारो। पर आप कोई सबूत दो कि पधार गए हैं। तेजाजी ने दर्शाव में राजा को विश्वास दिलाया कि -

(1) परबतसर तालाब के पास जहाँ लीलण खड़ी हुई थी वहां जो खारिया तालाब है उसका पानी मीठा हो जायेगा
(2) टीले पर जो हल का जूडा पेड़ के पास लटका है वो हरा हो जायेगा तथा यह खेजडा बनकर हमेशा खांडा खेजड़ा रहेगा
(3) मेले में मच्छर मक्खी व बीमारियाँ नहीं फैलेंगी।

तीनों बातें अक्षरशः सिद्ध हो गई। हल का जूडा हरा हो गया, खड्या खेजड़ा हारा-भरा है। खारिया तालाब का पानी चमत्कारी ढंग से मीठा हो गया, जो आज तक मीठा है। वर्षा में कीचड़ होने के बावजूद मेले में मच्छर मक्खी व बीमारियाँ नहीं फैलती।


[पृष्ठ-314]: लीलण के खरनाल वापस जाने की घटना बड़ी रोचक है। पशु लगभग आए खोजों पर ही वापस लौटता है। लीलण ने खरनाल वापस जाते समय नदी पार नहीं की, बल्कि पनेर नदी के उत्तर साइड के किनारे-किनारे खरनाल की राह पकड़ी। क्योंकि लीलण जिस मोकल घाट से होकर आई थी, वह नदी के किनारे चलते हुये साफ नजर आ रहा था। अतः लीलण ने बहती नदी को पार करने का जोखिम नहीं उठाया। लीलण बहुत थकी हुई थी और वह जोश भी नहीं था। लड़ाई की थकान और मालिक के बलिदान से लीलण टूट चुकी थी। वह नदी के तीर-तीर चलकर परबतसर के प्रसिद्ध खारिया नामक तालाब की पाल पहुंची। वहाँ कुछ विश्राम किया और सरपट दौड़ कर मोकल घाट को पार किया और आगे बढ़ी।


[पृष्ठ-315]: तेजाजी के मेले को पनेर से परबतसर विस्थापित करने के पीछे अभय सिंह का तेजाजी प्रेम के बजाय आर्थिक कारण अधिक परिलक्षित होते हैं। तेजाजी द्वारा राजा अभय सिंह को सपने की कहानी तेजाजी के नाम से परबतसर में पशु मेला अपने राजस्व प्राप्ति के लिए गढ़ी गई लगती है। क्योंकि पनेर में जब मेला भरता था तो राजस्व किशनगढ़ रियासत में चला जाता था। जबकि पशुधन अधिक जोधपुर राज्य का बिकने आता था। अभय सिंह (1707-1749 ई.) ने ही हाल ऑफ हीरोज (Hall of Heroes) का निर्माण मंडोर में करवाया था जिसके लिए 1730 ई. में चूना पकाने के लिए खेजड़ली गाँव की खेजड़ी वृक्षों को काटा गया था और 363 विश्नोइयों ने जान दी थी। हाल ऑफ हीरोज मंडोर में अजय सिंह ने जिन 16 वीरों की मूर्तियाँ और लोक-देवताओं की मूर्तियाँ लगाई गई उनमें न तो तेजाजी को स्थान दिया और न ही विश्नोइयों के ईष्ट देव जंभाजी को।

Demographics

As of 2001 India census, Parbatsar had a population of 13,790. Males constitute 54% of the population and females 46%. Parbatsar has an average literacy rate of 61%, higher than the national average of 59.5%: male literacy is 72%, and female literacy is 47%. In Parbatsar, 16% of the population is under 6 years of age.is known for cattle fair.name of cattle fair is veer Tejaji cattle fair. Parbatsar is also famous for "Shanti Sadan" which is owned by Shri Ghanshyam Bhangria.

Spread of education

Realizing that it was beyond the means of the Kisans to have their own schools and which was obviously the Government's responsibility, Baldev Ram Mirdha established chain of the boarding houses instead in the state where sons of the Kisans could live with their frugal means and get educated. With the help of Bhinya Ram Siyag he got constructed boarding house at Parbatsar town of Marwar region. Thousands of students used these boarding houses and became Doctors, Engineers, Officers, Politicians, and Teachers etc. By organizing meetings for eradication of evil customs he infused consciousness in them and also tried to bring about unity. He was instrumental in strengthening the Panchayats.

Villages in Parbatsar tahsil

Adani (अडाणी), Ajwa (आजवा), Antroli Sanga (आंतरोली सांगा), Arath (अरठ), Badoo (बडू), Bagot (बगोट), Baiwal (बाइवाल), Bajwas (बाजवास), Banda Hera (बन्दाहेडा), Banser (बांसेड़), Banwal, Barev (बरेव), Barnel (बरनेल), Baroon (बरूण), Basra (बांसड़ा), Bassi (बस्सी), Beenthwaliya (बींठवालिया), Beesas (बीसास), Bhadsiyan (भड़सीया), Bhadwa (भादवा), Bhakri Maulas (भकरी मौलास), Bhawani Gaon (भवानी गांव), Bhawasiya (भवासिया), Bherwas (भेरवास), Bhootas (भूतास), Bidiyad (बिदियाद), Charnawas (चारणवास), Charnawas (चारणवास), Cheewli (चीवली), Chitai (चिताई), Chitawa (चितावा), Darpura (दरपुरा), Deoli Khurd (देवली खुर्द), Dhadhi Khera (ढाढीखेड़ा), Dhadhota (ढाढोता), Dholiya (धोलिया), Dhonkaliya (धोकलिया), Dhundhiya (ढूंढिया), Dhunthiyan, Gangwa (गांगवा), Garhi (गढी), Gingoli (गिंगोली), Gujron Ki Dhani (गुजरों की ढाणी), Gular (गुलर), Haripura (हरिपुरा), Harnawa Patti (हरनावा पट्टी), Hatheli (हथेली), Hukmpura (हुक्मपुरा), Huldhani (हूलढाणी), Jagdishpura (जगदीशपुरा), Jalampura (जालमपुर), Janjeela (झंझीला), Jawla (जावला), Jhalra (झालरा), Kaletara (कालेटड़ा), Kalkala Ki Dhani (कलकलां की ढाणी), Kankediyas (कंकेड़ियास), Kanwalad (कंवलाद), Khanpur (खानपुर), Khedarpura (खिदरपुरा), Kheri Khinwasi (खेड़ी खिंवशी) Khokhar (खोखर), Khokhariya (खोखरिया), Khundiyas (खुन्दियास), Kinsariya (किनसरिया), Kishorpura (किशोरपुरा), Kitiya (किटिया), Kuliyana (कुलियाना), Kundri (कूण्डरी), Kurada (कुराड़ा), Lakhiyas (लाखियास), Lalana Kalan (ललाण कलां), Lalana Khurd (ललाणा खुर्द), Lochhba Ki Dhani (लोछबा की ढाणी), Madhwa (माधवा), Malas Charnan (मालास चारणा), Malas Gusaiyan (मालास गुसाइयाँ), Mandan (माण्डण), Mandowari (मण्डोवरी), Manglana (मंगलाना), Manpura (मानपुरा), Mayapur (मायापुर), Mehgaon (मेहगांव), Merasi (मेरासी), Mindakiya (मिण्डकिया), Modi Khurd (मोडीखुर्द), Moondota (मूंडोता) , Nakan (नाका), Narma (नरमा), Narwa (नारवां), Neniya (नेणीयां), Netiyas (नेतियास), Nimbola (निम्बोला), Palri Kadwan (पालड़ी कडवां), Panwalia (पनवालिया), Parbatsar (परबतसर) (M), Peeh (पीह), Peelwa (पीलवा), Peeplad (पीपलाद), Punwalia, Rabdiyad (राबड़ियाद), Rid (रीड), Rohindi (रोहिण्डी), Rojas (रोजास), Roonija, Rughnathpura (रघूनाथपुरा), Sanchor (सांचोर), Seetawat (सीटावट), Sheel Bhakri (शील भकरी), Shyampura (श्यामपुरा), Sidiyas (सिड़ियास), Taparwara (टापरवाड़ा), Teewli (टीवली),

Notable persons from this place

External links

Gallery

References

  1. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modern history of Jats), Agra 1998
  2. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p. 312
  3. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p. 313
  4. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.312-315

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