Paner

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Location of Paner in Ajmer district

Paner (पनेर) is a village in Kishangarh tahsil in Ajmer district in Rajasthan.

Location

It is hardly a 15 Kms from village Sursura (सुरसुरा) in Kishangarh tehsil in Ajmer district in Rajasthan, situated 8 km south of Rupangarh town on Parbatsar-Ajmer road. One can reach Sursura from Kishangarh town situated on Jaipur-Ajmer road. Sursura is 12 km north from Kishangarh on Kishangarh-Hanumangarh Mega-Highway. As we move north after visiting Sursura on this highway after Rupangarh town we can find Paner village 5 km off from this road in east direction. Paner is 60 km from Ajmer city and 4 km from Parbatsar of Nagaur district. [1]

Origin of name

Paner is probably a variant of Pander which is a Jat Clan. They are descendants of Nagavanshi king Pandara (पाण्डर). (See - List of Naga Rajas).[2]

Jat Gotras

History

Sant Kanha Ram[3] has provided us its history.

The Paner village is associated with the folk-deity Tejaji, as it was his sasural. Tejaji was married to Pemal, daughter of Raimal Mehta or Mutha of Jhanjhar gotra. Pemal's mother was Bodal De of Kala Gotra. Raimal was the chieftain of the small republic of Paner. The historical Paner village is now abandoned and the present Paner village is situated 1 km south of it.

Jhanjhars founded a pond named Jhanjholav in memory of their ancestor named Jhanjha Rao.

Garhbor Inscription of 1444 AD mentions a person named Jhanjha (झांझा), but it is of a later date.

Lachha Gujari was a friend of Pemal, who lived in Rangbari Ka Bas, 2 kms east of Paner. Lachha was of Chauhan Gujar clan and her husband Nandu Gurjar was of Tanwar clan.

The Tejaji temple of Paner bears inscription of samvat 1885 (1828 AD) and name of Pithaji Devanda, father of Bhairuji Devanda. Bhairuji Devanda was a known social worker of Paner and was granted tamrapatra by the rulers.

तेजापथ में स्थित यह गाँव

खरनाल से सुरसुरा का मानचित्र

संत श्री कान्हाराम[4] लिखते हैं कि..... [पृष्ठ-224]: सारे जहां के मना करने के बावजूद - शूर न पूछे टिप्पणो, शुगन न पूछे शूर, मरणा नूं मंगल गिणै, समर चढ़े मुख नूर।।

यह वाणी बोलकर तेजाजी अपनी जन्म भूमि खरनाल से भादवा सुदी सप्तमी बुधवार विक्रम संवत 1160 तदनुसार 25 अगस्त 1103 ई. को अपनी ससुराल शहर पनेर के लिए प्रस्थान किया। वह रूट जिससे तेजा खरनाल से प्रस्थान कर पनेर पहुंचे यहाँ तेजा पथ से संबोधित किया गया है।

तेजा पथ के गाँव : खरनाल - परारा (परासरा)- बीठवाल - सोलियाणा - मूंडवा - भदाणा - जूंजाळा - कुचेरा - लूणसरा (लुणेरा) (रतवासा) - भावला - चरड़वास - कामण - हबचर - नूंद - मिदियान - अलतवा - हरनावां - भादवा - मोकलघाटा - शहर पनेर..इन गांवो का तेजाजी से आज भी अटूट संबंध है।


[पृष्ठ-225]:खरनाल से परारा, बीठवाल, सोलियाणा की सर जमीन को पवित्र करते हुये मूंडवा पहुंचे। वहाँ से भदाणा होते हुये जूंजाला आए। जूंजाला में तेजाजी ने कुलगुरु गुसाईंजी को प्रणाम कर शिव मंदिर में माथा टेका। फिर कुचेरा की उत्तर दिशा की भूमि को पवित्र करते हुये लूणसरा (लूणेरा) की धरती पर तेजाजी के शुभ चरण पड़े।


[पृष्ठ-226]: तब तक संध्या हो चुकी थी। तेजाजी ने धरती माता को प्रणाम किया एक छोटे से तालाब की पाल पर संध्या उपासना की। गाँव वासियों ने तेजाजी की आवभगत की। इसी तेजा पथ के अंतर्गत यह लूणसरा गांव मौजूद है।

जन्मस्थली खरनाल से 60 किमी पूर्व में यह गांव जायल तहसिल में अवस्थित है।ससुराल जाते वक्त तेजाजी महाराज व लीलण के शुभ चरणों ने इस गांव को धन्य किया था। गांव वासियों के निवेदन पर तेजाजी महाराज ने यहां रतवासा किया था। आज भी ग्रामवासी दृढ़ मान्यता से इस बात को स्वीकारते हैं। उस समय यह गांव अभी के स्थान से दक्षिण दिशा में बसा हुआ था।

उस जमाने में यहां डूडीछरंग जाटगौत्रों का रहवास था। मगर किन्हीं कारणों से ये दोनों गौत्रे अब इस गांव में आबाद नहीं है। फिलहाल इस गांव में सभी कृषक जातियों का निवास है। यहाँ जाट, राजपूत, ब्राह्मण, मेघवाल, रेगर, तैली, कुम्हार, लोहार, सुनार, दर्जी, रायका, गुर्जर, नाथ, गुसाईं, हरिजन, सिपाही, आदि जातियाँ निवास करती हैं। गांव में लगभग 1500 घर है।

नगवाडिया, जाखड़, सारण गौत्र के जाट यहां निवासित है।

ऐसी मान्यता है कि पुराना गांव नाथजी के श्राप से उजड़ गया था।


[पृष्ठ-227]: पुराने गांव के पास 140 कुएं थे जो अब जमींदोज हो गये हैं। उस जगह को अब 'सर' बोलते है। एक बार आयी बाढ से इनमें से कुछ कुएं निकले भी थे।...सन् 2003 में इस गांव में एक अनोखी घटना घटी। अकाल राहत के तहत यहां तालाब खौदा जा रहा था। जहां एक पुराना चबूतरा जमीन से निकला। वहीं पास की झाड़ी से एक नागदेवता निकला, जिसके सिर पर विचित्र रचना थी। नागदेवता ने तालाब में जाकर स्नान किया और उस चबूतरे पर आकर बैठ गया। ऐसा 2-4 दिन लगातार होता रहा। उसके बाद गांववालों ने मिलकर यहां भव्य तेजाजी मंदिर बनवाया। प्राण प्रतिष्ठा के समय रात्रि जागरण में भी बिना किसी को नुकसान पहुंचाये नाग देवता घूमते रहे। इस चमत्कारिक घटना के पश्चात तेजा दशमी को यहां भव्य मेला लगने लग गया। वह नाग देवता अभी भी कभी कभार दर्शन देते हैं।उक्त चमत्कारिक घटना तेजाजी महाराज का इस गांव से संबंध प्रगाढ़ करती है। गांव गांव का बच्चा इस ऐतिहासिक जानकारी की समझ रखता है कि ससुराल जाते वक्त तेजाजी महाराज ने गांववालों के आग्रह पर यहां रात्री-विश्राम किया था। पहले यहां छौटा सा थान हुआ करता था। बाद में गांववालों ने मिलकर भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।

लूणसरा से आगे प्रस्थान - प्रातः तेजाजी के दल ने उठकर दैनिक क्रिया से निवृत होकर मुंह अंधेरे लूणसरा से आगे प्रस्थान किया। रास्ते में भावला - चरड़वास - कामण - हबचर - नूंद होते हुये मिदियान पहुंचे। मिदियान में जलपान किया। लीलण को पानी पिलाया। अलतवा होते हुये हरनावां पहुंचे। वहाँ से भादवा आए और आगे शहर पनेर के लिए रवाना हुये।

नदी ने रोका रास्ताभादवा से निकलने के साथ ही घनघोर बारिस आरंभ हो गई। भादवा से पूर्व व परबतसर से पश्चिम मांडण - मालास की अरावली पर्वत श्रेणियों से नाले निकल कर मोकल घाटी में आकर नदी का रूप धारण कर लिया। इस नदी घाटी ने तेजा का रास्ता रोक लिया।

तेजा इस नदी घाटी की दक्षिण छोर पर पानी उतरने का इंतजार करने लगे। उत्तर की तरफ करमा कूड़ी की घाटी पड़ती है। उस घाटी में नदी उफान पर थी। यह नदी परबतसर से खरिया तालाब में आकर मिलती है। लेकिन तेजाजी इस करमा कूड़ी घाटी से दक्षिण की ओर मोकल घाटी के दक्षिण छोर पर थे। उत्तर में करमा कूड़ी घाटी की तरफ मोकल घाटी की नदी उफान पर


[पृष्ठ-228]: थी अतः किसी भी सूरत में करमा कूड़ी की घाटी की ओर नहीं जा सकते थे। दक्षिण की तरफ करीब 10 किमी तक अरावली की श्रेणियों के चक्कर लगाकर जाने पर रोहिण्डीकी घाटी पड़ती है। किन्तु उधर भी उफनते नाले बह रहे थे। अतः पर्वत चिपका हुआ लीलण के साथ तैरता-डूबता हुआ नदी पार करने लगा। वह सही सलामत नदी पर करने में सफल रहे। वर्तमान पनेर के पश्चिम में तथा तत्कालीन पनेर के दक्षिण में बड़कों की छतरी में आकर नदी तैरते हुये अस्त-व्यस्त पाग (साफा) को तेजा ने पुनः संवारा।

Garhbor Inscription of 1444 AD

चारभुजा का लेख 1444 ई. - कांकड़ोली (Rajsamand) से अनुमानतः 10 मील पश्चिम के गड़वोर (tah:Kumbhalgarh) गाँव में चारभुजा का प्रसिद्ध विष्णु-मंदिर है। मेवाड़ तथा मारवाड़ आदि के बहुत से लोग यात्रार्थ यहाँ आते हैं और भाद्रपद सुदि 11 को यहाँ बड़ा मेला होता है। चारभुजा का मंदिर किसने बनवाया यह ज्ञात नहीं हुआ, परन्तु प्राचीन देवालय का जीर्णोद्धार कराकर वर्तमान मंदिर वि. सं. 1501 (ई. सं. 1444) में खरवड़ जाति के रा. (रावत या राव) महीपाल, उसके पुत्र लखमण (लक्ष्मण), उस लखमण (लक्ष्मण) की स्री क्षीमिणी तथा उसके पुत्र झांझा, इन चारों ने मिलकर बनवाया, ऐसा वहाँ के शिलालेख से पाया जाता है। उक्त लेख में इस गाँव का नाम बदरी लिखा है और लोग चारभुजा को बदरीनाथ का रुप मानते हैं।[5] [6]

Tejaji temple

There is a temple of Tejaji at Paner in which three statues are placed. People believe that a statue of Tejaji came out from the ground on its own at site of Raimal's house. The magical powers of Tejaji had spread all around. Maharaja Abhay Singh of Jodhpur wanted to shift this statue to to his state Jodhpur. He got it dug out the statue for many days but could not take out this. It is believed that Maharaja Jodhpur at last saw Tejaji in dream who guided him that statue can not be taken out from here but it can be installed at boarder of Nagaur district.

Later Jodhpur Maharaja got constructed a temple of Tejaji at Parbatsar and installed a statue of Tejaji here. The Tejaji temple of Paner bears inscription of samvat 1885 and name of Pithaji Devanda, father of Bhairuji Devanda. Bhairuji Devanda was a known social worker of Paner and was granted tamrapatra by the rulers.

The pooja of this temple is done by a kumhar and not by brahman. This temple is situated near famous Sambhar lake. There is a big pond here built by Jhanjhar gotra Jats known as Jinjardab or Jhanjhardab.

Curse of Pemal

It is believed that when Tejaji died in fighting with enemies, Pemal decided to commit sati and cursed the village Paner that

"Paner could not protect my suhag, Paner would be abandoned and Jhanjhar clan would not survive in Paner. Dholi could not beat the drum, Mali did not offer flower to Tejaji and Gurjars did not cooperate with Tejaji, all these clans would not survive in Paner."

All the four clans Jhanjhar, Mali, Dholi and Gurjars are not found in the village even today. It is said that they tried to settle many times but could not prosper here. Jhanjhar gotra Jats presently live in Bhilwara and visit this place occasionally.

तेजाजी का समकालीन इतिहास

पनेर के निकटवर्ती गाँव थल, सिणगारा, रघुनाथपुरा, बाल्यास का टीबा स्थित सांभर के चौहान शासक गोविन्ददेव तृतीय के समय के शिलालेख, जो कि तेजाजी के समकालीन था

संत श्री कान्हाराम[7] ने लिखा है कि....[पृष्ठ-44]:तेजाजी का ससुराल शहर पनेर एवं वीरगति धाम सुरसुरा दोनों गाँव वर्तमान व्यवस्था के अनुसार किशनगढ़ तहसील में स्थित है। किशनगढ़ अजमेर जिले की एक तहसील है, जो अजमेर से 27 किमी दूर पूर्व दिशा में राष्ट्रिय राजमार्ग 8 पर बसा है। प्रशासनिक कार्य किशनगढ़ से होता है और कृषि उत्पादन एवं मार्बल की मंडी मदनगंज के नाम से लगती है। आज ये दोनों कस्बे एकाकार होकर एक बड़े नगर का रूप ले चुके हैं। इसे मदनगंज-किशनगढ़ के नाम से पुकारा जाता है।

तेजाजी की वीरगति स्थल समाधि धाम सुरसुरा किशनगढ़ से 16 किमी दूर उत्तर दिशा में हनुमानगढ़ मेगा हाईवे पर पड़ता है। शहर पनेर भी किशनगढ़ से 32 किमी दूर उत्तर दिशा में पड़ता है। अब यह केवल पनेर के नाम से पुकारा जाता है। पनेर मेगा हाईवे से 5 किमी उत्तर में नावां सिटी जाने वाले सड़क पर है।

रियासत काल में कुछ वर्ष तक किशनगढ़ की राजधानी रूपनगर रहा था, जो पनेर से 7-8 किमी दक्षिण-पूर्व दिशा में पड़ता है।


[पृष्ठ-45]: जहा पहले बबेरा नामक गाँव था तथा महाभारत काल में बहबलपुर के नाम से पुकारा जाता था। अब यह रूपनगढ तहसील बनने जा रहा है।

तेजाजी के जमाने (1074-1103 ई.) में राव महेशजी के पुत्र राव रायमलजी मुहता के अधीन यहाँ एक गणराज्य आबाद था, जो शहर पनेर के नाम से प्रसिद्ध था। उस जमाने के गणराज्यों की केंद्रीय सत्ता नागवंश की अग्निवंशी चौहान शाखा के नरपति गोविन्ददेव तृतीय (1053 ई.) के हाथ थी। तब गोविंददेव की राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर) से शाकंभरी (सांभर) हो चुकी थी तथा बाद में अजयपाल के समय (1108-1132 ई.) चौहनों की राजधानी अजमेर स्थानांतरित हो गई थी। रूपनगढ़ क्षेत्र के गांवों में दर्जनों शिलालेख आज भी मौजूद हैं, जिन पर लिखा है विक्रम संवत 1086 गोविंददेव

पेमल का जन्म

संत श्री कान्हाराम[8] ने लिखा है कि.... तेजा के जन्म के तीन माह बाद विक्रम संवत 1131 (1074 ई.) की बुद्ध पूर्णिमा (पीपल पूनम) के दिन पनेर गणराज्य के गणपति रायमल जी मुहता (मेहता) के घर एक कन्या ने जन्म लिया। पूर्णिमा के प अक्षर को लेकर कन्या का नाम रखा गया पद्मा। परंतु बोलचाल की भाषा में पेमल दे नाम प्रसिद्ध हुआ।

तेजाजी का इतिहास

संत श्री कान्हाराम[9] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-84]: तेजाजी के जन्म के समय (1074 ई.) यहाँ मरुधरा में छोटे-छोटे गणराज्य आबाद थे। तेजाजी के पिता ताहड़ देव (थिरराज) खरनाल गणराज्य के गणपति थे। इसमें 24 गांवों का समूह था। तेजाजी का ससुराल पनेर भी एक गणराज्य था जिस पर झाँझर गोत्र के जाट राव रायमल मुहता का शासन था। मेहता या मुहता उनकी पदवी थी। उस समय पनेर काफी बड़ा नगर था, जो शहर पनेर नाम से विख्यात था। छोटे छोटे गणराज्यों के संघ ही प्रतिहारचौहान के दल थे जो उस समय के पराक्रमी राजा के नेतृत्व में ये दल बने थे।


[पृष्ठ-85]: पनैर, जाजोतारूपनगर गांवों के बीच की भूमि में दबे शहर पनेर के अवशेष आज भी खुदाई में मिलते हैं। आस पास ही कहीं महाभारत कालीन बहबलपुर भी था। पनेर से डेढ़ किमी दूर दक्षिण पूर्व दिशा में रंगबाड़ी में लाछा गुजरी अपने पति परिवार के साथ रहती थी। लाछा के पास बड़ी संख्या में गौ धन था। समाज में लाछा की बड़ी मान्यता थी। लाछा का पति नंदू गुजर एक सीधा साधा इंसान था।

तेजापथ: खरनाल से पनेर

संत श्री कान्हाराम[10] लिखते हैं कि..... [पृष्ठ-224]: सारे जहां के मना करने के बावजूद - शूर न पूछे टिप्पणो, शुगन न पूछे शूर, मरणा नूं मंगल गिणै, समर चढ़े मुख नूर।।

तेजापथ: खरनाल - पनेर

यह वाणी बोलकर तेजाजी अपनी जन्म भूमि खरनाल से भादवा सुदी सप्तमी बुधवार विक्रम संवत 1160 तदनुसार 25 अगस्त 1103 ई. को अपनी ससुराल शहर पनेर के लिए प्रस्थान किया। वह रूट जिससे तेजा खरनाल से प्रस्थान कर पनेर पहुंचे यहाँ तेजा पथ से संबोधित किया गया है।

तेजा पथ के गाँव : खरनाल - परारा (परासरा)- बीठवाल - सोलियाणा - मूंडवा - भदाणा - जूंजाळा - कुचेरा - लूणसरा (लुणेरा) (रतवासा) - भावला - चरड़वास - कामण - हबचर - नूंद - मिदियान - अलतवा - हरनावां - भादवा - मोकलघाटा - शहर पनेर..इन गांवो का तेजाजी से आज भी अटूट संबंध है।


[पृष्ठ-225]:खरनाल से परारा, बीठवाल, सोलियाणा की सर जमीन को पवित्र करते हुये मूंडवा पहुंचे। वहाँ से भदाणा होते हुये जूंजाला आए। जूंजाला में तेजाजी ने कुलगुरु गुसाईंजी को प्रणाम कर शिव मंदिर में माथा टेका। फिर कुचेरा की उत्तर दिशा की भूमि को पवित्र करते हुये लूणसरा (लूणेरा) की धरती पर तेजाजी के शुभ चरण पड़े।


[पृष्ठ-226]: तब तक संध्या हो चुकी थी। तेजाजी ने धरती माता को प्रणाम किया एक छोटे से तालाब की पाल पर संध्या उपासना की। गाँव वासियों ने तेजाजी की आवभगत की।

खरनाल से पनेर के रास्ते में तेजाजी का विश्रामस्थल लूणसरा

इसी तेजा पथ के अंतर्गत यह लूणसरा गांव मौजूद है।

जन्मस्थली खरनाल से 60 किमी पूर्व में यह गांव जायल तहसिल में अवस्थित है।ससुराल जाते वक्त तेजाजी महाराज व लीलण के शुभ चरणों ने इस गांव को धन्य किया था। गांव वासियों के निवेदन पर तेजाजी महाराज ने यहां रतवासा किया था। आज भी ग्रामवासी दृढ़ मान्यता से इस बात को स्वीकारते हैं। उस समय यह गांव अभी के स्थान से दक्षिण दिशा में बसा हुआ था।

उस जमाने में यहां डूडीछरंग जाटगौत्रों का रहवास था। मगर किन्हीं कारणों से ये दोनों गौत्रे अब इस गांव में आबाद नहीं है। फिलहाल इस गांव में सभी कृषक जातियों का निवास है। यहाँ जाट, राजपूत, ब्राह्मण, मेघवाल, रेगर, तैली, कुम्हार, लोहार, सुनार, दर्जी, रायका, गुर्जर, नाथ, गुसाईं, हरिजन, सिपाही, आदि जातियाँ निवास करती हैं। गांव में लगभग 1500 घर है।

नगवाडिया, जाखड़, सारण गौत्र के जाट यहां निवासित है।

ऐसी मान्यता है कि पुराना गांव नाथजी के श्राप से उजड़ गया था।


तेजाजी मंदिर लूणसरा

[पृष्ठ-227]: पुराने गांव के पास 140 कुएं थे जो अब जमींदोज हो गये हैं। उस जगह को अब 'सर' बोलते है। एक बार आयी बाढ से इनमें से कुछ कुएं निकले भी थे।...सन् 2003 में इस गांव में एक अनोखी घटना घटी। अकाल राहत के तहत यहां तालाब खौदा जा रहा था। जहां एक पुराना चबूतरा जमीन से निकला। वहीं पास की झाड़ी से एक नागदेवता निकला, जिसके सिर पर विचित्र रचना थी। नागदेवता ने तालाब में जाकर स्नान किया और उस चबूतरे पर आकर बैठ गया। ऐसा 2-4 दिन लगातार होता रहा। उसके बाद गांववालों ने मिलकर यहां भव्य तेजाजी मंदिर बनवाया। प्राण प्रतिष्ठा के समय रात्रि जागरण में भी बिना किसी को नुकसान पहुंचाये नाग देवता घूमते रहे। इस चमत्कारिक घटना के पश्चात तेजा दशमी को यहां भव्य मेला लगने लग गया। वह नाग देवता अभी भी कभी कभार दर्शन देते हैं।उक्त चमत्कारिक घटना तेजाजी महाराज का इस गांव से संबंध प्रगाढ़ करती है। गांव गांव का बच्चा इस ऐतिहासिक जानकारी की समझ रखता है कि ससुराल जाते वक्त तेजाजी महाराज ने गांववालों के आग्रह पर यहां रात्री-विश्राम किया था। पहले यहां छौटा सा थान हुआ करता था। बाद में गांववालों ने मिलकर भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।

लूणसरा से आगे प्रस्थान - प्रातः तेजाजी के दल ने उठकर दैनिक क्रिया से निवृत होकर मुंह अंधेरे लूणसरा से आगे प्रस्थान किया। रास्ते में भावला - चरड़वास - कामण - हबचर - नूंद होते हुये मिदियान पहुंचे। मिदियान में जलपान किया। लीलण को पानी पिलाया। अलतवा होते हुये हरनावां पहुंचे। वहाँ से भादवा आए और आगे शहर पनेर के लिए रवाना हुये।

परबतसर के पश्चिम की पहाड़ियों का
पनेर नदी पार करते हुये तेजाजी
मोकल घाट

नदी ने रोका रास्ताभादवा से निकलने के साथ ही घनघोर बारिस आरंभ हो गई। भादवा से पूर्व व परबतसर से पश्चिम मांडण - मालास की अरावली पर्वत श्रेणियों से नाले निकल कर मोकल घाटी में आकर नदी का रूप धारण कर लिया। इस नदी घाटी ने तेजा का रास्ता रोक लिया।

तेजा इस नदी घाटी की दक्षिण छोर पर पानी उतरने का इंतजार करने लगे। उत्तर की तरफ करमा कूड़ी की घाटी पड़ती है। उस घाटी में नदी उफान पर थी। यह नदी परबतसर से खरिया तालाब में आकर मिलती है। लेकिन तेजाजी इस करमा कूड़ी घाटी से दक्षिण की ओर मोकल घाटी के दक्षिण छोर पर थे। उत्तर में करमा कूड़ी घाटी की तरफ मोकल घाटी की नदी उफान पर


[पृष्ठ-228]: थी अतः किसी भी सूरत में करमा कूड़ी की घाटी की ओर नहीं जा सकते थे। दक्षिण की तरफ करीब 10 किमी तक अरावली की श्रेणियों के चक्कर लगाकर जाने पर रोहिण्डीकी घाटी पड़ती है। किन्तु उधर भी उफनते नाले बह रहे थे। अतः पर्वत चिपका हुआ लीलण के साथ तैरता-डूबता हुआ नदी पार करने लगा। वह सही सलामत नदी पर करने में सफल रहे। वर्तमान पनेर के पश्चिम में तथा तत्कालीन पनेर के दक्षिण में बड़कों की छतरी में आकर नदी तैरते हुये अस्त-व्यस्त पाग (साफा) को तेजा ने पुनः संवारा।

तेजाजी का पनेर आगमन

संत श्री कान्हाराम[11] ने लिखा है कि....

बड़कों की छतरी पनेर

[पृष्ठ-229]: शाम का वक्त था। गढ़ पनेर के दरवाजे बंद हो चुके थे। कुंवर तेजाजी जब पनेर के कांकड़ पहुंचे तो एक सुन्दर सा बाग़ दिखाई दिया। बड़कों की छतरी और शहर पनेर के बीच यह रायमल जी मेहता का बाग था। तेजाजी भीगे हुए थे, रास्ते चलने के कारण थक भी गए थे। तेजाजी ने रात्री विश्राम यहीं करने का निश्चय किया, क्योंकि गढ़ पनेर के दरवाजे बंद हो चुके थे और चारों तरफ परकोटा बना था। बाग़ के दरवाजे पर माली से दरवाजा खोलने का निवेदन किया। माली ने कहा बाग़ की चाबी पेमल के पास है, मैं उनकी अनुमति बिना दरवाजा नहीं खोल सकता। कुंवर तेजा ने माली को अपना परिचय दिया, मेरा नाम तेजा, कुल जाट, गोत्र धौल्या और रायमल जी का पावणा। परिचय प्राप्ति के बाद माली ने ताला खोल दिया। रातभर तेजा ने बाग़ में विश्राम किया और लीलण ने बाग़ में घूम-घूम कर पेड़-पौधों को तोड़ डाला।


[पृष्ठ-230]: बाग़ के माली ने पेमल को परदेशी के बारे में और घोडी द्वारा किये नुकशान के बारे में बताया। पेमल की भाभी बाग़ में आकर पूछती है कि परदेशी कौन है, कहाँ से आया है और कहाँ जायेगा। तेजा ने परिचय दिया कि वह खरनाल का जाट है और रायमल जी के घर जाना है। पेमल की भाभी माफ़ी मांगती है और बताती है कि वह उनकी छोटी सालेली है। सालेली (साले की पत्नि) ने पनेर पहुँच कर पेमल को खबर दी। पेमल अपनी भाभियों के साथ स्वयं पनघट पर पानी भरने गई क्योंकि तेजाजी पनघट के रास्ते ही पनेर में प्रवेश करेंगे।


[पृष्ठ-231]: तेजाजी पनघट पर - कुंवर तेजाजी बाग से पनेर के लिए रवाना हुये। रास्ते में पनघट पड़ता है। पनिहारियाँ सुन्दर घोडी पर सुन्दर जवाई को देखकर हर्षित हुई। तेजा ने रायमलजी का घर का रास्ता पूछा। पनिहारिन पहले से ही तैयार थी। उन्होने तेजाजी को पानी पीने की मनुहार कर संकेत में आभाष करा दिया कि पेमल हमारे बीच में है। इन्हें आप पहचानिए। उसके बाद उन्हें रायमलजी का घर का रास्ता बता दिया।

सूरज सामी पोलि है नणदोई म्हारो जी।
कैल झबूके रायमलजी रै बारणै॥

सूर्यास्त होने वाला था। तेजाजी ने पोलि में प्रवेश कर रायमल जी और साले से रामजुहार किया। उनकी सास गाएँ दूह रही थी। तेजाजी का घोड़ा उनको लेकर धड़धड़ाते हुए पिरोल में आ घुसा था । सास ने उन्हें पहचाना नहीं। वह अपनी गायों के डर जाने से उन पर इतनी क्रोधित हुई कि सीधा शाप ही दे डाला, ‘जा, तुझे काला साँप खाए!’ तेजाजी उसके शाप से इतने क्षुब्ध हुए कि बिना पेमल को साथ लिए ही लौट पड़े। तेजाजी ने कहा यह नुगरों की धरती है, यहाँ एक पल भी रहना पाप है।

तेजाजी का पेमल से मिलन

संत श्री कान्हाराम[12] ने लिखा हैं कि तेजाजी का ससुराल पनेर में सास द्वारा अपमान किए जाने पर ....

[पृष्ठ-232]:अपने पति को वापस मुड़ते देख पेमल को झटका लगा। पेमल ने पिता और भाइयों से इशारा किया कि वे तेजाजी को रोकें। श्वसुर और साला तेजाजी को रोकते हैं पर वे मानते नहीं हैं। वे घर से बाहर निकल आते हैं।


[पृष्ठ-233]: पेमल की सहेली थी लाछां गूजरी। वह शहर पनेर के दक्षिण पूर्व की ओर रंगबाड़ी के बास (मोहल्ला) में रहती थी। उसने पेमल को तेजाजी से मिलवाने का यत्न किया। वह ऊँटनी पर सवार हुई और रास्ते में मीणा सरदारों से लड़ती-जूझती तेजाजी तक जा पहुँची। लाछा ने लीलण की लगाम पकड़ली। उन्हें पेमल का सन्देश दिया। अगर उसे छोड़ कर गए, तो वह जहर खा कर मर जाएगी। उसके मां-बाप उसकी शादी किसी और के साथ तय कर चुके हैं। लाछां बताती है, पेमल तो मरने ही वाली थी, वही उसे तेजाजी से मिलाने का वचन दे कर रोक आई है। लाछां के समझाने पर भी तेजा पर कोई असर नहीं हुआ। पेमल अपनी माँ को खरी खोटी सुनाती है। पेमल कलपती हुई आई और लीलण के सामने खड़ी हो गई। पेमल ने कहा - आपके इंतजार में मैंने इतने वर्ष निकाले। मेरे साथ घर वालों ने कैसा वर्ताव किया यह मैं ही जानती हूँ। आज आप चले गए तो मेरा क्या होगा। मुझे भी अपने साथ ले चलो। मैं आपके चरणों में अपना जीवन न्यौछावर कर दूँगी।

पेमल की व्यथा देखकर तेजाजी वापस मुड़ गए। आगे आगे लाछा तथा पीछे पीछे तेजाजी चलने लगे। पेमल ने राहत की सांस ली। वे लाछा की रंगबाड़ी के लिए चल पड़े।


[पृष्ठ-234]: लाछा ने तेजाजी और साथियों को भोजन के लिए आमंत्रित किया। विश्राम के लिए तेजाजी मैड़ी में पधारे। लाछा ने तेजा के साथियों के रुकने की व्यवस्था की। नंदू गुर्जर साथियों से बातें करने लगे। सभी ने पेमल के पति को सराहा। देर रात तक औरतों ने जंवाई गीत गाए। पेमल की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था। तेजाजी पेमल से मिले। अत्यन्त रूपवती थी पेमल। दोनों बतरस में डूबे थे कि लाछां की आहट सुनाई दी।

शहर पनेर

संत श्री कान्हाराम[13] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-235]: शहर पनेर तेजाजी का ससुराल है। यह गाँव वर्तमान में राजस्थान के अजमेर जिले की किशनगढ़ तहसील में स्थित है। यह किशनगढ़ से 30-32 किमी उत्तर दिशा में है। तेजाजी के वीरगति स्थल सुरसुरा से 15-16 किमी उत्तर-पश्चिम दिशा में है। जिला मुख्यालय अजमेर से उत्तर पूर्व दिशा में 60 किमी दूर है। नागौर जिले के परबतसर से सिर्फ 4 किमी दक्षिण पूर्व में है।

आज राजस्व रिकॉर्ड में सिर्फ पनेर है परंतु तेजाजी के इतिहास में यह शहर पनेर नाम से सुप्रसिद्ध था। यह गाँव तेजाजी के जन्म से बहुत पहले ही बसा हुआ था। प्राचीन समय में वर्तमान पनेर से पश्चिम दिशा में बसा हुआ था। तेजाजी के समय में यह वर्तमान पनेर से 1 किमी उत्तर में पहाड़ियों की तलहटी में बसा हुआ था। यहाँ के राख़-ठीकरे आदि इसके प्रमाण हैं।


[पृष्ठ-236]: शहर पनेर गणतन्त्र के शासक रायमल जी मुहता, झाँझर गोत्र के जाट थे, जिनके पिता का नाम राव महेशजी था। रायमल जी मुहता तेजाजी के श्वसुर थे। तेजाजी की सास का नाम बोदल दे था, जो काला गोत्र के जाट की पुत्री थी। तेजाजी की पत्नी का नाम पेमल था। पेमल बड़ी सती सतवंती थी। बचपन में शादी हो जाने के बावजूद 29 वर्ष तक तेजाजी का इंतजार करती रही। पेमल के भाई और भाभी के नाम मालूम नहीं हैं।

शहर पनेर से करीब 2 किमी पूर्व की ओर रंगबाड़ी के बास में पेमल की सहेली प्रसिद्ध लाछा गुजरी रहती थी।


[पृष्ठ-237]:लाछा के पति का नाम नंदू गुर्जर था। लाछा चौहान गोत्र की गुर्जर थी। लाछा के पति नंदू तंवर गोत्र के गुर्जर थे। लाछा के पास बहुत सी गायें थी।

तेजाजी के ससुराल पक्ष वाले झाँझर गोत्र के जाट अब इस गाँव में नहीं रहते हैं। सती पेमल के श्राप के कारण झाँझर कुनबा इस गाँव से उजड़ गया। अब रायमल जी मुहता के वंशज झांजर गोत्र के जाट भीलवाडा के आस-पास कहीं रहते हैं। झाँझर के भाट से भी मुलाकात नहीं हो सकी। झाँझर यहाँ से चले गए परंतु उनके द्वारा खुदाया गया तालाब उन्हीं की गोत्र पर झांझोलाव नाम से प्रसिद्ध है। यह तालाब आज भी मौजूद है। झांझरों के किसी पूर्वज शासक का नाम झांझो राव जी था। उन्हीं के नाम पर इस तालाब का नाम झांझोलाव प्रसिद्ध हुआ। लाव शब्द का राव अपभ्रंश है।

वर्तमान गाँव के पश्चिम में रायमलजी की पुत्री पेमल का बाग व बावड़ी बताया जाता है। यह अब काल के गाल में समा गया है। तेजाजी का मंदिर पुराने गाँव के स्थान पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि तेजाजी की ये मूर्तियाँ उनके श्वसुर के परिण्डे में स्थापित थी। तेजाजी के इस मंदिर के पुजारी पहले रामकरण और रामदेव कुम्हार थे, परंतु अब मेहराम जाजड़ा गोत्र के जाट इसके पुजारी हैं।


[पृष्ठ-238]: उस जमाने में तेजाजी के श्वसुर रायमल जी मुहता यहाँ के गणपति थे। शहर पनेर उनके गणराज्य की राजधानी थी। यहाँ के निकटवृति गाँव थल, सीणगारा, रघुनाथपुरा, बाल्यास का टीबा रूपनगढ, जूणदा गांवों के शिलालेख के आधार पर स्पषट है कि यहाँ की केंद्रीय सत्ता चौहान शासक गोविन्दराज या गोविंद देव तृतीय के हाथों में थी। उस समय चौहनों की राजधानी अहिछत्रपुर (नागौर) से शाकंभरी (सांभर) स्थानांतरित हो गई थी। ग्राम थल के उत्तर-पश्चिम में स्थित शिलालेख पर विक्रम संवत 1086 (1029 ई.) व गोविन्दराज स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। पनेर के दक्षिण पूर्व में स्थित रूपनगढ कस्बा उस समय बाबेरा नाम से प्रसिद्ध था। बाद में यह पनेर गाँव लंगाओं के अधिकार में आ गया था।

वर्तमान पनेर शहर के पश्चिम में गुसाईंजी का बागड़ा है एवं गांवाई नाड़ी पर एक प्राचीन छतरी विद्यमान है। जिसके पत्थरों पर लिखे अक्षरों सहित पत्थर घिस गए हैं। यह वही छतरी है जिसके विषय में तेजाजी के लोकगीत में आता है कि बड़कों की छतरी में बांधी पगड़ी अर्थात जब तेजाजी ने नदी पार किया तो उनका श्रंगार पगड़ी आदि अस्त-व्यस्त हो गए थे। तेजाजी ने पुनः अपना बनाव किया था तथा इसी छत्री में अपना पैचा (पगड़ी) संवारा था।

पनेर की दक्षिण पश्चिमी पहाड़ियाँ व उत्तर पश्चिम की पहाड़ियाँ की पश्चिमी ढलान से तथा परबतसर के पश्चिम में स्थित मांडणमालास गाँव के पहाड़ों से निकलकर नदी खेतों में फैलकर बहती है जो परबतसर के खारिया तालाब के व बंधा के पास दक्षिण से होकर चादर से निकल कर पनेर के दक्षिण से होकर पूर्व की ओर निकल जाती है। ये वही नदी घाटियां हैं जिसने तेजाजी का रास्ता रोका था। लीलण ने तिरछी दिशा में आड़ की तरह तैरते हुये नदी पार किया था तथा तेजा ने जलकुंड मांछला की तरह। यह नदी आज भी अपनी पूर्व स्थिति में मौजूद है।

इस गाँव के इतिहास पुरुष भैरूजी देवन्दा एक प्रसिद्ध नाम है जिसे बादके शासकों द्वारा ताम्रपत्र प्रदान कर गायों को चराने के लिए गौचर भूमि प्रदान की थी।


[पृष्ठ-239]:उस जमाने में भैरू जी देवन्दा ऐसी शख्सियत थी कि परबतसर के मेलों में जाने वाले यात्रियों को भोजन पानी की व्यवस्था तथा बैल-बछड़ों के लिए चारे की व्यवस्था स्वयं के खर्च से करते थे। भैरूजी देवन्दा के पिताजी पिथाजी देवन्दा ने तेजाजी के मंदिर में देवली स्थापित की थी। इसी गाँव के छीतरमल ढेल संस्कृत शिक्षा के विशेषज्ञ हैं तथा इनका शिक्षा जगत में बड़ा नाम है।

वर्तमान पनेर गाँव में लगभग 650 घर आबाद हैं जिनमे जाट, देशवाली (पडियार, सोलंकी) कायमखनी (चौहान) लंगा, साईं , फकीर, लुहार, राजपूत, रेगर, बलाई, बावरी, कुम्हार, ब्राह्मण, वैष्णव, गाड़ोलिया लुहार, बनिया, नाई, खाती, दर्जी, हरिजन, आदि जातियाँ निवास करती हैं।

सती पेमल के शाप के कारण ढोली, माली, गुर्जर व झाँझर गोत्र के जाट इस गाँव में नहीं फलते-फूलते हैं।

तत्समय पनेर के निवासियों ने तेजाजी का साथ नहीं दिया था परंतु आज के सभी पनेर निवासी तेजाजी में बड़ी आस्था रखते हैं।

लाछा व लाछा की रंगबाड़ी

लाछा बावड़ी
लाछा की छतरी
लाछा का भैरूजी

संत श्री कान्हाराम[14] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-260]: लाछा पनेर के रंगबाड़ी बास में रहती थी। अब उस जगह का नाम रंगबाड़ी बांसड़ा है जो वर्तमान पनेर से 3 किमी पूर्व में पड़ता है। वहाँ रंगबाड़ी का कुवा पर लाछा द्वारा स्थापित रंगबाड़ी भैरूजी आज भी विद्यमान है। वहाँ खुदाई में पुराने गाँव के अवशेष मिलते हैं। लाछा चौहान गोत्र की गुर्जर थी। लाछा के पति नंदू गुर्जर क गोत्र तंवर था। नंदू गुर्जर सीधा सादा इंसान था। वहाँ की कर्ता-धर्ता लाछा ही थी। लाछा के नाम से ही सारा कार्य व्यवहार चलता था। लाछा के पास बड़ी संख्या में गायें थे और वह उस जमाने की प्रभावशाली महिला थी।


[पृष्ठ-261]: रंगबाड़ीतेजाजी के जमाने में रंगबाड़ी शहर पनेर का एक बास था। यह स्थान वर्तमान पनेर से 2 किमी पूर्व में है। रूपनगढ़ कस्बे से 2-3 किमी उत्तर में स्थित है। इस रंगबाड़ी के स्थान से उत्तर में 3 किमी दूर जाजोता गाँव बसा है। उस समय रंगबाड़ी में लाछा अपने पति नंदू गुर्जर के साथ रहती थी। रंगबाड़ी के दक्षिण दिशा में 3 किमी दूरी पर उस समय सुरसुरा का जंगल पड़ता था। यहाँ पर एक सुंदर काबरिया पहाड़ी है। इस पहाड़ी के पूर्व में, जहां वर्तमान हनुमानगढ़ मेगा-हाईवे गुजरता है, के पास ही प्राचीन लाछा बावड़ी है। इस वन में लाछा की गायें चरने जाती थी। लाछा बावड़ी का निर्माण गायों के पानी के लिए करवाया था।


[पृष्ठ-262]: उस समय यहाँ निर्जन वन था और यह बावड़ी पशु धन और राहगीरों के लिए पानी का एक मात्र साधन था। यह उस समय से ही लाछा बावड़ी के नाम से प्रसिद्ध हो गई थी। लाछा बावड़ी के पास भव्य छतरियाँ बनी हुई हैं। वहाँ एक शिलालेख पर खर्च का विवरण दिया है जिस पर लाछा का नाम भी लिखा है। शिलालेख लाछा कालीन नहीं लगता, वह बाद में किसी के द्वारा लगाया लगता है।

तत्कालीन रंगबाड़ी के स्थान पर आज एक छोटा सा गाँव रंगबाड़ी बासड़ा आबाद है। यहाँ 50-60 घर हैं। यहाँ एक प्राचीन मंदिर है। इस गाँव के पास से नदी निकलती है। नदी के पूर्व दिशा में रंगबाड़ी का कुआ है तथा इस कुवे पर लाछा द्वारा प्रतिष्ठित रंगबाड़ी के भैरूजी का चबूतरा एक पेड़ों के झुरमुट में मौजूद है। लाछा की यह रंगबाड़ी (कुवा) आज तानाण के बेटे घीसा मेघवाल के अधिकार में है।

Notable persons

  • Bharu Ram Devanda - He was a social worker who provided free food to the people who took part in the Parbatsar cattle. [15]
  • Chhitar Mal Dhel - Educationist.[16]
  • Brahmdev Bhaskar (Dhel): Teacher, ब्रह्मदेव भास्कर, प्रचारक, तेजा दर्शन पेमल जन्मभूमि शहर पनेर, तहसील रुपनगढ़ जिला अजमेर, mob: 9785755539, Email: tejadarshan01@gmail.com

See also

References

  1. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.
  2. Journal of the Royal Asiatic Society of Great Britain & Ireland, 1894 By L.A. Waddell, M.B., B.R.A.S.,pp.91-92
  3. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.236-239
  4. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p. 224-228
  5. Spectacular site of Mewar
  6. डॉ गोपीनाथ शर्मा: 'राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत', 1983, पृ.141
  7. Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp. 44-45
  8. Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p. 173
  9. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.84-85
  10. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p. 224-228
  11. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.229-231
  12. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.232-234
  13. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.235-239
  14. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.260-262
  15. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.238-239
  16. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p.239

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