Ram Lal Khokhar

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Ram Lal Khokhar was a warrior of Khokhar clan who killed Muhammad Ghori on 15 March 1206.

इतिहास

वीर योद्धा रामलाल खोखर - खोखर गोत्री जाट - जिसने 15 मार्च सन् 1206 को मोहम्मद गौरी उर्फ साहबुद्दीन गौरी को लाहौर के पास लड़ाई में मारा था। [1]

मोहम्मद गौरी का सिर काटा

संदर्भ - मानवेन्द्र सिंह फेसबुक पर

मोहम्मद गौरी का सिर काटा

वीर योद्धा रामलाल खोखर ने 15 मार्च 1206 को मोहम्मद गौरी का सिर काट लिया था। खोखर जाट बड़े वीर थे। वीरता जाट जाति का जन्मजात गुण है। जिस ग़ज़नवी के नाम से बड़े बड़े राजा महाराजा भय खाते थे जाटों ने उस ग़ज़नवी को लूट कर उसके दिल में भय पैदा कर दिया। यह ऐतिहासिक प्रमाण है कि इन खोखर जाटों के दिल्ली के तोमर जाट राजाओ से वैवाहिक सम्बन्ध रहे थे। इन खोखर जाटों ने झेलम के आसपास अपना राज्य कायम किया। जब गौरी ने दिल्ली पर कब्ज़ा कर लिया राजा पृथ्वीराज की हत्या कर दी (बिजोलिया शिलालेख अनुसार) तो जाट खापों ने गौरी के खिलाफ बगावत का बिगुल बजा दिया गौरी ने हिन्द की जनता पर अत्याचारो की बाढ़ ला दी।

1205-06 में खोखर जाटों ने लाहौर पर अधिकार कर लिया तथा पंजाब के शासक बनने की घोषणा कर दी। सन् 1206 ई० में खोखरों को दबाने के लिए गौरी फिर भारत आया। जब वह लाहौर से 15 मार्च 1206 ई० को गजनी वापिस जा रहा था तब धम्यक (Dhamyak) के स्थान पर मुलतान के 25,000 खोखर जाटों ने गौरी की सेना पर धावा बोलकर मुहम्मद गौरी का सिर काट लिया। उसके मरते ही गौरी का विशाल साम्राज्य ऐसा अस्त हो गया कि मानो वह जादू का चमत्कार था

शहाबुद्दीन गौरी और जाट

दलीप सिंह अहलावत[2] लिखते हैं: महमूद गजनवी की 30 अप्रैल सन् 1030 ई० को मृत्यु हो गई। इसके मरते ही गज़नी और हिरात के बीच गौर नामक स्थान से एक नवीन शक्ति का उदय हुआ जिसने गजनी का सम्पूर्ण वैभव नष्ट करके गौर जनपद की वृद्धि के लिए गजनवी के वंश को भी नष्ट कर दिया। अलाउद्दीन गौरी गज़नी का शासक बना। उसकी मृत्यु के बाद सन् 1173 ई० में शहाबुद्दीन गौरी, जिसको मुहम्मद गौरी भी कहा जाता है, गजनी का शासक बना। इसका छोटा भाई गयासुद्दीन गौर जनपद का शासक बना। शहाबुद्दीह गौरी, अलाउद्दीन गौरी का भतीजा था। यह गौरवंश जाटवंश है जो इस्लाम की आंधी में मुसलमान धर्म के अनुयायी बन गये। शहाबुद्दीन गौरी भी गौरवंश का जाट था।

सन् 1175 से 1206 ई० तक मुहम्मद गौरी के उत्तरी भारत पर आक्रमण -

मुहम्मद गौरी ने गजनी पर अपना शासन स्थिर करके सम्पूर्ण अफगानिस्तान पर आतंक जमा लिया। फिर उसने भारतवर्ष की ओर बढ़ने का विचार किया। उस समय भारतवर्ष में पृथ्वीराज चौहान का शक्तिशाली शासन दिल्ली एवं अजमेर पर था। जयचन्द राठौर का कन्नौज पर शासन था। सबसे पहले गौरी ने सन् 1175 ई० में ईस्मायल कबीले के मुसलमानों को हराकर मुलतान पर अधिकार कर लिया।

उच्छ के राजपूतों को छल से जीत लिया। लाहौर न जीत सकने के कारण, उसने खुसरो मलिक के साथ संधि कर ली और गजनी लौट गया। उसके चले जाने के बाद खुसरो मलिक ने खोखर जाटों की सहायता से सियालकोट के दुर्ग पर घेरा डाल दिया। यह सूचना मिलते ही गौरी ने आकर लाहौर पर आक्रमण कर दिया और कूटनीति द्वारा सन् 1186 ई० में खुसरो मलिक को जीत लिया और उसे मार दिया गया और सुबुक्तगीन वंश का अन्त कर दिया। इस प्रकार लाहौर पर अधिकार कर लिया।

सन् 1191 ई० में पृथ्वीराज चौहान के साथ युद्ध -

पृथ्वीराज, जयचन्द राठौर की राजकुमारी संयोगिता को जीत लाया था जिसके कारण जयचन्द


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-565


उसका जानी शत्रु बन गया था। सोलंकियों की अनुमति से गौरी को दिल्ली पर आक्रमण करने के लिए सादर आमन्त्रित किया। फलतः अनुकूल अवसर देखकर मुहम्मद गौरी एक लाख बीस हजार सेना लेकर तराइन आ पहुंचा जो थानेश्वर से 14 मील दूर है। सोलंकी और राठौर सेनायें उसकी सहायता के लिए उससे आ मिलीं। उधर पृथ्वीराज संयोगिता के प्रेम में मग्न हुआ पूर्ण असावधान था। उसके सेनापति और सैनिक प्रेम की देवी के निमित्त पहले ही भेंट चढ़ाए जा चुके थे। पृथ्वीराज के बहनोई चित्तौड़ नरेश महाराणा समरसिंह की सेना ने पृथ्वीराज का साथ दिया। चन्द्रबरदाई के पृथ्वीराज रासो के लेखानुसार “पृथ्वीराज चौहान ने अपना प्रधानमन्त्री कैमास दाहिमा गोत्र के जाट को बनाया था। उसके दूसरे भाई पुण्डीर दाहिमा जाट ने चौहान राज्य की ओर से लाहौर की रक्षा की थी। तीसरे भाई चौयन्दराम दाहिमा जाट ने मुख्य सेनापति पद से शहाबुद्दीन गौरी के साथ घोर युद्ध किया था।” मुसलमान लेखकों ने लिखा है कि चौयन्दराम जाट की दुःसह तलवार से शहाबुद्दीन ने कठिनाई से ही अपने प्राण की रक्षा की थी। (जाटों का उत्कर्ष, पृ० 357, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री)

पृथ्वीराज चौहान ने इस युद्ध के लिए हरयाणा सर्वखाप पंचायत और जाट खापों से सहायता मांगी। जाट खापों ने 22000 शूरवीरों की सेना भेजी। उन्होंने बड़ी वीरता के साथ युद्ध किया और मुहम्मद गौरी की सेना को हराकर भगा दिया। (सर्वखाप पंचायत रिकार्ड और जाट इतिहास पृ० 106, लेखक लेफ्टिनेन्ट रामसरूप जून)

पृथ्वीराज अपनी तथा उपर्युक्त सहायक सेना एवं जाट शूरवीरों को साथ लेकर सन् 1191 ई० में तराइन के युद्ध क्षेत्र में गौरी सुलतान की सेना से जा टकराया। दोनों ओर से भयंकर युद्ध होने लगा। राजपूतों ने उसकी सेना के दोनों पक्षों पर बड़ी भीषणता से आक्रमण किया और उसे तितर-बितर कर दिया।

राजा के भाई गोविन्दराय ने सुलतान को भी घायल किया। परन्तु एक खिलजी योद्धा उसको रणक्षेत्र से बाहिर ले गया। इस दुर्घटना से मुसलमानों में भगदड़ मच गई। वे मैदान छोड़कर भागने लगे। इससे पहले उनको हिन्दुओं के कभी इतनी बुरी तरह से नहीं हराया था। सुलतान हारकर गजनी पहुंच गया।

सन् 1192 में मुहम्मद गौरी का पृथ्वीराज से दूसरा युद्ध -

मुहम्मद गौरी ने गजनी जाकर एक शक्तिशाली सेना तैयार की जिसमें अफ़गान, तुर्क और ईरानी आदि जातियों के सैनिक सम्मिलित थे। वह एक लाख बीस हजार सैनिकों के साथ सन् 1192 ई० में तराइन क्षेत्र में पहुंच गया। जयचन्द राठौर तथा सोलंकियों की शक्तिशाली सेनायें भी आकर उसके साथ मिल गईं। पृथ्वीराज भी चौहानों तथा अन्य राजपूतों की बड़ी सेना तथा सर्वखाप पंचायत के 18000 मल्ल योद्धाओं को साथ लेकर तराइन के रणक्षेत्र में जा पहुंचा। दोनों ओर की सेनाओं में घमासान युद्ध होने लगा। सर्वखाप के 18000 सैनिक योद्धा, मुसलमान सेना के जिस बाजू पर नियुक्त किए गए थे, वहां पर बड़ी वीरता से धावा करके उन्होंने मुसलमान सैनिकों को मार-मारकर 15 मील पीछे को धकेल दिया। (सर्वखाप पंचायत रिकार्ड)


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-566


प्रातःकाल से सायंकाल तक घनघोर युद्ध हुआ। सुलतान 12000 अश्वारोही धनुर्धारियों को लेकर राजपूत सैनिकों पर टूट पड़ा जिन्होंने बहुत राजपूत सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। राजपूत घबरा गए और मुसलमानों के सामने लड़ने का साहस छोड़ बैठे। वे रणक्षेत्र छोड़कर भागने लगे। जाट सैनिक युद्ध करते-करते वीरगति को प्राप्त हुए। मुसलमान इतिहासकार लिखते हैं कि पृथ्वीराज युद्धभूमि छोड़कर भागा, परन्तु सिरसुती (सरस्वती) के पास पकड़ा गया और मार दिया गया। सुलतान विजयी रहा। पृथ्वीराज की हार के बाद राजपूत संभल नहीं सके और इनकी शक्ति कम होती गई। अब मुहम्मद गौरी का दिल्ली तथा अजमेर पर अधिकार हो गया।

सन् 1194 ई० में मुहम्मद गौरी का कन्नौज के राजा जयचन्द पर आक्रमण -

जयचन्द ने सोचा था कि मेरा शत्रु पृथ्वीराज मारा गया और अब मैं दिल्ली एवं भारत का शासक बन जाऊंगा। किन्तु देशद्रोह का फल चखाने के लिए सन् 1194 ई० में सुलतान गौरी ने कन्नौज पर भी प्रबल आक्रमण कर दिया जिसकी जयचन्द को तनिक भी आशा न थी। दोनों ओर की सेनाओं में यू० पी० के इटावा जिले में चन्द्रावर नामक स्थान पर जमकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में मुसलमानों ने राजपूतों की सेना को बुरी तरह हरा दिया। राजा जयचन्द मारा गया। इसके बाद विजयी सुलतान बनारस पहुंचा। उसने मन्दिरों को तुड़वा दिया और उनके स्थान पर मस्जिदें बनवाने की आज्ञा दी। कन्नौज, बनारस आदि के 200 मन्दिरों को तुड़वाकर अपार धनराशि 4000 ऊंटों पर लादकर तथा लाखों हिन्दू गुलाम साथ लेकर मुहम्मद गौरी गजनी पहुंच गया।

गजनी जाने से पहले सुलतान गौरी ने अपने गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक को भारत में अपने राज्य का उपशासक नियुक्त कर दिया था। इसने भारतवर्ष के अनेक प्रदेशों को जीत लिया। मुहम्मद गौरी का गुलाम मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी नामक था। उसने सन् 1197 ई० में बिहार को जीत लिया और वहां के बौद्ध विहार तथा स्तूपों को नष्ट कर दिया और अनेक बौद्ध पुस्तकों को नष्ट कर दिया। इससे बौद्ध धर्म की शक्ति को बड़ा धक्का लगा। फिर उसने बंगाल को जीत लिया। वह बिहार और बंगाल का गौरी गौरी का उप-शासक बनकर राज्य करने लगा।

खोखर जाटों का विद्रोह और मुहम्मद गौरी की मृत्यु -

मिश्र बन्धु के अनुसार मुहम्मद गौरी का राज्य पश्चिम में खुरासान, सीस्तान, पूर्व में बंगाल, उत्तर में तुर्किस्तान, हिन्दूकुश और दक्षिण में बिलोचिस्तान पर था। इसमें काबुल, कन्धार, हिरात, गजनी आदि सम्मिलित थे। मुहम्मद गौरी ने मध्यएशिया पर आक्रमण कर दिया। सन् 1205 ई० में वहां पर इसकी करारी हार हुई। इस हार के बाद सभी प्रदेशों के राज्यपालों ने इसके विरुद्ध विद्रोह आरम्भ कर दिये। मुलतान पर एक नया शासक बन गया। खोखर जाटों ने लाहौर पर अधिकार कर लिया तथा पंजाब के शासक बनने की घोषणा कर दी।

सन् 1205 ई० में खोखरों के विद्रोह को दबाने के लिए मुहम्मद गौरी फिर भारत में आ गया। उसने विद्रोह को दबा दिया। परन्तु जब वह लाहौर से 15 मार्च 1205 ई० को गजनी वापिस जा रहा था, तब धम्यक (Dhamyak) के स्थान पर मुलतान के 25000 खोखर जाटों ने इस सेना पर धावा


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-567


बोलकर मुहम्मद गौरी का सिर काट लिया।

इसके मरते ही गौरी का विशाल राज्य ऐसा अस्त हो गया कि मानो वह जादू का चमत्कार था। (भारत का इतिहास, पृ० 369).

मुहम्मद गौरी के कोई पुत्र न था। उसके मरने के पश्चात् उसकी इच्छा के अनुसार सन् 1206 ई० में उसका गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक देहली साम्राज्य का बादशाह बना।


मुहम्मद गौरी: आधार पुस्तकें - मध्यकालीन भारत का संक्षिप्त इतिहास, पृ 70-73, लेखक ईश्वरीप्रसाद, जाट इतिहास पृ० 106, लेखक ले० रामसरूप जून; हिन्दुस्तान की तारीख उर्दू, पृ० 49-52; जाटों का उत्कर्ष, पृ० 111-112, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-568


External links

References


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