Kashi

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Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Kashi (काशि) was an ancient Indian kingdom located in the region around its capital Varanasi. It was one of the sixteen Mahajanapadas, great states that emerged in northern India at the start of the 6th century BCE.

Variants

Origin

History

Mention by Panini

V. S. Agrawala[1] writes that Ashtadhyayi of Panini mentions janapada Kāśi (काशि) (IV.2.116) - Panini does not mention Kashi as independent monarchy like Magadha or Kosala. Panini mentions Vārāṇasī and its citizens as Vārāṇaseya.


V. S. Agrawala[2] writes that Panini mentions ganas headed by Kashi (IV.2.116).


Kashi (काशि) is a place name mentioned by Panini in Ashtadhyayi under Kashyadi (काश्यादि) (4.2.116) group. [3]


Kashi (काशि), is mentioned by Panini in Ashtadhyayi. [4]

Kingdom of Kashi

The Kingdom of Kashi was an ancient Indian kingdom located in the region around its capital Varanasi, bounded by the Varuna and Asi rivers in the north and south which gave Varanasi its name. It was one of the sixteen Mahajanapadas, great states that emerged in northern India at the start of the 6th century BCE. The Jataka tales indicate its capital was one of the richest cities in India, speaking highly of its prosperity and opulence.[5]

These stories tell of a prolonged rivalry between the neighboring kingdoms of Kashi and Kosala, with also some occasional conflict with Anga and Magadha. Kashi once was one of the most powerful states in north India,[6] and although King Brihadratha of Kashi conquered Kosala, Kashi was later incorporated into Kosala by King Kansa during Buddha's time. The Kashis along with the Kosalas and Videhans find mention in Vedic texts and appear to have been a closely allied people.

It was in Kashi territory where Siddartha Gautama first started preaching the Buddhism religion.

Jats in Kashi

  • Burdak: The Burdak gotra of Jats are probably related with Virudhaka. Virudhaka (विरूढक) (IAST: Virūḍhaka, Pali: Viḍūḍabha) was son of Raja Prasenjit and king of Kashi. Soon after usurping the prosperous kingdom built up by his father Bimbisara, the parricide Ajatashatru went to war with his aged uncle Prasenjit, and gained complete control of Kashi. Just after this Prasenjit, like Bimbisara, was deposed by his son Virudhaka, and died. The new king, Virūḍhaka (in Pali Viḍūḍabha), then attacked and virtually annihilated the little autonomous tribe of Shakyas, in Himalyan foothills, and we hear no more of the people which produced the greatest of Indians, the Buddha. [8]Probably Virudhaka, like Ajatashatru of Magadha, had ambitions of empire, and wished to embark on a career of conquest after bringing the outlying peoples, who had paid loose homage to his father, more directly under the control of the centre; but his intentions were unfulfilled, for we hear no more of him except an unreliable legend that he was destroyed by a miracle soon after his massacre of Shakyas. A little later his kingdom was incorporated in Magadha. [9]
  • Varan - From Varana River
  • Asiagh - From Asi River

काशी

विजयेन्द्र कुमार माथुर[10] ने लेख किया है ...काशी (AS, p.185) (वाराणसी, उत्तर प्रदेश) - प्राचीन विश्वास के अनुसार काशी अमरनगरी है. विद्वानों का विचार है कि शिव उपासना का यह सर्व प्राचीन केंद्र आर्य सभ्यता के भी पूर्व विद्यमान था क्योंकि शिव (तथा मातृ देवी) की पूजा पूर्व वैदिक काल में भी प्रचलित मानी जाती है किंतु यह प्रश्न पर्याप्त विवादपूर्ण है.

पुराणों के अनुसार इस नगरी का नाम संभवत: मनु वंश के सप्तम नरेश 'काश' के नाम पर ही काशी हुआ था. काशीजानपदीयों का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद की पैप्पलाद-संहिता में कौसल तथा विदेह वाशियों के साथ मिलता है. वाल्मीकि रामायण किष्किंधा कांड 40,22 में काशी, कोसल जनपदों का एकत्र उल्लेख-- महीम् कालमहीम् चैव शैल कानन शोभिताम् । ब्रह्ममालान् विदेहान् च मालवान् काशि कोसलान्'

इन देशों में सुग्रीव ने वानर सेना को सीता के अन्वेषणार्थ भेजा था. वायु पुराण 2,21,74 तथा विष्णु पुराण 4,8,2-10 ('काश्यस्य काशेय: काशिराज :'काशिराज गोत्रे-अवतीर्य त्वमष्टधा सम्यगायुर्वेदं करिष्यसि....' आदि) में काशी नरेशों की तालिका है. ये भारत के पूर्वज राजाओं के नाम हैं. किंतु इनमें केवल दिवोदास और प्रतार्दन के नाम ही वैदिक साहित्य में प्राप्त हैं. पुरुवंशी नरेशों के पश्चात काशी में ब्रह्मदत्त वंशी राजाओं का राज्य हुआ और बौद्ध साहित्य --विशेषकर जातक कथाओं में इस वंश के सभी राजाओं का सामान्य नाम ब्रह्मदत्त मिलता है. ये शायद मूल रूप से मिथिला के विदेहों से संबंधित थे. महाभारत से विदित होता है कि मगधराज जरासंध के समय काशी का राज्य मगध में सम्मिलित था किंतु जरासंध के पश्चात स्वतंत्र हो गया था. भीष्म ने काशिराज की कन्याओं अंबा और अंबालिका का हरण करके विचित्रवीर्य का उनसे विवाह किया था. अनुशासन पर्व से सूचित होता है कि काशी के राजा दिवोदास ने जो सुदेव का पुत्र था, वाराणसी नगरी बसाई थी. इस राज्य का घेरा गंगा के उत्तरी तट से लेकर गोमती के दक्षिण तट तक विस्तृत था. इस वर्णन से जान पड़ता है की काशी वाराणसी से प्राचीन थी. विष्णु पुराण 5,34, 41 में काशी का श्री कृष्ण के सुदर्शन चक्र द्वारा भस्म किए जाने का वर्णन है. मिथ्या वसुदेव पौंड्रक को सहायता देने के कारण काशी नरेश से श्री कृष्ण रुष्ट हो गए थे इसलिए उन्होंने उसे परास्त कर काशी को नष्ट कर देना चाहा था-- शास्त्रमोक्षचतुरं दग्ध्वातदबलमौजसा कृत्वा गर्भावशेषांतां तदा वाराणसीं पुरीम्.' बुद्ध के समय के पूर्व काशी का राज्य भारत-भर में प्रसिद्ध था और इसकी गणना अंगुत्तरनिकाय के अनुसार तत्कालीन षोडशमहा-

[p.186]:जनपदों में थी. जातक-कथाएं काशी नरेश ब्रह्मदत्त के नाम से भरी पड़ी हैं. काशी के राजकुमारों का तक्षशिला जाकर विद्या पढ़ने का भी उल्लेख जातकों में है. इस समय काशी तथा पार्श्ववर्ती विदेह और कोसल जनपदों में बहुत शत्रुता थी. विदेह की सत्ता को समाप्त करने में काशी का भी बड़ा हाथ था. कई जातक कथाओं में काशीनरेशों की महत्वाकांक्षाओं तथा काशी जनपद की महानता का स्पष्ट उल्लेख है.

गोहिल जातक में उल्लेख है कि काशी सारे भारतवर्ष में सर्व प्रमुख नगरी थी. इसका विस्तार 12 कोस था जबकि इंद्रप्रस्थ तथा मिथिला का घेरा केवल 7 कोस ही का था. तंडुलनालिजातक में उल्लेख है कि नगर की दीवारों का घेरा 12 कोस और मुख्य नगर तथा उप नगरों का घेरा लगभग 300 कोस था. अन्य जातकों में उल्लेख है कि बनारस के आसपास 60 कोस का जंगल था. काशी के कई नरेशों को जातकों में 'सब्ब राजानाम अगराजा' (सर्वराज्ञानाम् अग्रराजा) कहा गया है. महावग्ग में भी उल्लेख है कि प्राचीन काल में काशी राज्य बहुत समृद्धिशाली था. भोजजानीय-जातक में वर्णन है कि काशी के वैभव के कारण आसपास के सभी राजाओं का दांत काशी पर रहता था. एक बार तो 7 पड़ोसी राजाओं ने काशी को घेर लिया था.

बुद्ध के समय मगध का राजा बिंबिसार बहुत शक्तिशाली हो गया था क्योंकि उसने पड़ोस के विदेह आदि राज्यों को जीतकर मगध में मिला लिया था. उसने कोसल देश के राजा प्रसेनजित् की कन्या वासवी (Vasavadatta|वासवदत्ता) से विवाह किया और काशी का राज्य, जो इस समय कौशल के अंतर्गत था, दहेज के रूप में दे दिया. कथाओं में कहा गया है कि काशी को वासवदत्ता की श्रृंगार-प्रसाधन की सामग्री के व्यय के लिए दिया गया था.

बौद्ध साहित्य में काशी के, वाराणसी के अतिरिक्त केतुमती, सुरुंधन, सुदस्सान (सुदर्शन), ब्रह्मवद्धन (ब्रह्मवर्द्धन) पुष्फवती (पुष्पवती) रम्मानगरी (रामानगरी, वर्तमान रामनगर) तथा मौलिनी आदि नाम मिलते हैं. बुध के पश्चात काशी और निकटवर्ती सारनाथ का गौरव काफी दिनों तक बढ़ा-चढ़ा रहा. मौर्य सम्राट अशोक ने सारनाथ को महत्वपूर्ण समझते हुए यहां अपना जगत प्रसिद्ध सिंहस्तंभ प्रतिस्थापित किया (तीसरी सदी ई.पू.).

तत्पश्चात भारत के इतिहास के प्रमुख राजवंशों में से कुषाण, भारशिवनाग, गुप्त, मौखरी, प्रतिहार, चेदि तथा गहड़वारों ने क्रम से यहाँ राज्य किया. इन सभी के राज्य काल के सिक्के तथा पुरातत्वविषयक अवशेष यहां से प्राप्त हुए हैं. 7 वीं सदी में हर्ष के समय चीनी यात्री युवानच्वाङ्ग ने काशी तथा सारनाथ की यात्रा की थी. मुसलमानों के आधिपत्य का उत्तरभारत में विस्तार [p.187]:होने के साथ ही काशी के बुरे दिन आ गए. 1033 ई. में नियाल्तगीन नामक मुसलमान सेनाध्यक्ष ने सर्वप्रथम बनारस पर आक्रमण करके उसे लूटा. 1194 ई. में बनारस को गुलाम वंश के सुल्तानों ने अपने राज्य में शामिल कर लिया. 1575 ई. में अकबर के वित्त मंत्री टोडरमल ने विश्वनाथ का विशाल मंदिर प्राचीन विश्वनाथ के देवालय के स्थान पर बनवाया. 1659 में धर्मांध औरंगजेबने इस मंदिर को तुड़वाकर इसकी सामग्री से वर्तमान मस्जिद बनवाई. तत्पश्चात मराठों के उत्कर्ष काल में अहिल्याबाई होल्कर ने अनेक घाट और मंदिर गंगा तट पर बनवाये. पंजाब केसरी रणजीत सिंह ने भी विश्वनाथ के दुबारा बने हुए वर्तमान मंदिर पर सोने का छत्र चढ़ाया. काशी के अनेक घाटों में दशाश्वमेध, मणिकर्णिका, हरिश्चंद्र तथा तुलसी घाट अधिक प्रसिद्ध हैं. इन सब के साथ पौराणिक तथा एतिहासिक गाथाएँ जुड़ी हुई हैं.

अकबर जहांगीर के समय महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जिस घाट के निकट रहते थे वह तुलसीदास घाट के नाम से प्रसिद्ध है. कहा जाता है कि रामचरितमानस के उत्तरार्ध, किष्किंधा कांड से उत्तर कांड तक, की रचना तुलसीदास ने इसी पुण्य स्थान पर की थी.

काशी का प्रसिद्ध नाम वाराणसी काशी नाम से अपेक्षाकृत नवीन है. किंतु इसका भी उल्लेख महाभारत में है-- 'समेतं पार्थिवं क्षत्रं वाराणस्यां नदीसुत: कन्यार्थमाह्वयद् वीरो रथैने के तरीकेन संयुगे' शांति पर्व 27,9. 'ततो वाराणसीं गत्वार्चयित्वा वृषध्वजम्, कपिलाह्रदे नर: स्नातवा राजसूयमवाप्नुयात' वनपर्व 84,78. पांडवों ने तीर्थ यात्रा के प्रसंग में काशी की यात्रा नहीं की थी किंतु भीम का अपनी दिग्विजय यात्रा में काशीराज सुबाहु पर विजय प्राप्त करने का उल्लेख है-- 'स काशिराजं समरे सुबाहुमनिवर्तिनं वशे चक्रे महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रम:' वनपर्व 30,6-7

केतुमती

विजयेन्द्र कुमार माथुर[11] ने लेख किया है ...केतुमती (AS, p.222) - काशी का एक नाम जिसका बौद्ध-साहित्य में उल्लेख है.

काशी नामकरण

पौराणिक 16 महाजनपदों में से एक। वाराणसी का दूसरा नाम ‘काशी’ प्राचीन काल में एक जनपद के रूप में प्रख्यात था और वाराणसी उसकी राजधानी थी। इसकी पुष्टि पाँचवीं शताब्दी में भारत आने वाले चीनी यात्री फ़ाह्यान के यात्रा विवरण से भी होती है।[12] हरिवंशपुराण में उल्लेख आया है कि ‘काशी’ को बसाने वाले पुरुरवा के वंशज राजा ‘काश’ थे। अत: उनके वंशज ‘काशि’ कहलाए।[13] संभव है इसके आधार पर ही इस जनपद का नाम ‘काशी’ पड़ा हो। काशी नामकरण से संबद्ध एक पौराणिक मिथक भी उपलब्ध है। उल्लेख है कि विष्णु ने पार्वती के मुक्तामय कुंडल गिर जाने से इस क्षेत्र को मुक्त क्षेत्र की संज्ञा दी और इसकी अकथनीय परम ज्योति के कारण तीर्थ का नामकरण काशी किया।[14]

संदर्भ: भारतकोश-काशी

काश्यप लोग

ठाकुर देशराज[15] ने लिखा है.... काश्यप - शिवि लोगों के वर्णन में मिस्टर क्रूक साहब के हवाले से यह बात हम बता चुके हैं कि जाटों में एक बड़ा समूह काश्यप लोगों का भी है। सूर्यवंश की प्रसिद्धि इन्हीं काश्यप से बताई जाती है। काशी के काश्य भी काश्यप हैं जो कि जाटों के अंदर काफी काशीवात कहलाते हैं। मगध के लिच्छवि शाक्य और ज्ञातृ भी काश्यप ही थे। इनके अलावा सैकड़ों काश्यिप गोत्री खानदान जाटों में मौजूद हैं। पुराणों में तो कैस्पियन सागर को कश्यप ऋषि का आश्रम बताया है। कुछ लोग श्रीनगर से 3 मील दूर हरी पर्वत पर कश्यप ऋषि का आश्रम मानते हैं।

काशि राज्य

काशि राज्य की राजधानी काशि थी जो गंगा नदी के किनारे पर थी। वहां पर काश्य-काशीवत (जाट गोत्र) लोगों का राज्य था। वहां का नरेस सुबाहु था। (जाट इतिहास पृ० 24, लेखक ठा० देशराज)। भीमसेन ने काशिराजा की कन्या बलन्धरा से विवाह करके उससे एक पुत्र सर्वग उत्पन्न किया। [16]

External links

References

  1. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.60
  2. India as Known to Panini, p.74
  3. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.508
  4. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.37, 60, 74
  5. Singh, Upinder (2008). A history of ancient and early medieval India: from the Stone Age to the 12th century. Pearson Education. pp. 258–262. ISBN 9788131711200.
  6. Singh, Upinder (2008). A history of ancient and early medieval India: from the Stone Age to the 12th century. Pearson Education. pp. 258–262. ISBN 9788131711200.
  7. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihas (The modern history of Jats), Agra 1998
  8. A.L. Batham, The Wonders that was India, 1967, p. 47
  9. A.L. Batham, The Wonders that was India, 1967, p. 47
  10. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.185-187
  11. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.222
  12. जेम्स लेग्गे, ट्रेवेल्स ऑफ़ फ़ाह्यान, (दिल्ली, 1972, द्वितीय संस्करण), पृष्ठ 94
  13. ‘‘काशस्य काशयो राजन् पुत्रोदीर्घतपस्तथा।’’ – हरिवंशपुराण, अध्याय 29
  14. ‘‘काशते त्रयतो ज्योतिस्तदनख्येमपोश्वर:। अतोनापरं चास्तुकाशीति प्रथितांविभो।’ ॥68॥ काशी खंड, अध्याय 26
  15. Jat Itihas (Utpatti Aur Gaurav Khand)/Pancham Parichhed,p.99
  16. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III,p.290