Vaisora

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Vaisora (वैसोरा)[1] Vasora (वासोड़ा) Vasoda (वासोड़ा) Vasauda (वासौड़ा)[2] is gotra of Jats. Same as Baisora. Al Mas'údí [3] writes them as Bauüra.

Origin

This gotra is said to be originated after an ancient king of the name Vasudeva (वसुदेव) of Mahabharata period. [4]

History

Al Mas'údí [5] writes about King Bauüra: One of the neighbouring kings of India, who is far from the sea, is the Bauüra, who is lord of the city of Kanauj. This is the title given to all the sovereigns of that kingdom. He has large armies in garrisons on the north and on the south, on the east and on the west, for he is surrounded on all sides by warlike kings.

The river Mihrán takes its course through the country of Mansúra, and falls near Debal into the Indian ocean. In the bays of this sea there are many crocodiles, as in the bay of Sindábúr in the kingdom


[p.22]: of Bághara, in India; the bay of Zábaj, in the dominions of the Maharáj, and the gulfs of the aghyáb [aghbáb], which extend towards the island of Sarandíb [Ceylon]. Crocodiles live more particularly in sweet water, and, as we have said, in the estuaries of India, the water of which is for the most part sweet, because the streams which form them are derived from the rains.

CHAPTER XVI.-The king of India is the Balhará; the king of Kanauj, who is one of the kings of Sind, is Bauüra; this is a title common to all kings of Kanauj.

There is also a city called Bauüra, after its princes, which is now in the territories of Islám, and is one of the dependencies of Múltán. Through this town passes one of the (five) rivers, which form together the river Mihrán in Sind, which is considered by al-Jáhiz as derived from the Nile, and by others from the Jaihún of Khurásán. This Bauüra, who is the king of Kanauj, is an enemy of the Balhará, the king of India.

इतिहास

ठाकुर देशराज[6] लिखते हैं:सम्राट हर्ष या शिलादित्य और यह मालवा का हर्ष बिलकुल भिन्न हैं, किन्तु समकालीन होने से भारी भ्रम हो जाता है। एक बात और भी कठिनाई की आनकर पड़ती है कि जिस समय मन्दसौर के इस वंश का अभ्युदय होता है, उसी समय थानेश्वर में एक दूसरा वंश वैस-वंश प्रकट होता है और साथ ही दोनों समाप्त हो जाते हैं। यही क्यों, दोनों की समाप्ति भी हर्ष पर हो जाती है।

इतिहासों में थानेश्वर के राजाओं का आदि पुरुष पुष्पभूति पाया जाता है। यदि पुष्पभूति को भीमवर्मा का पुत्र मान लिया जाए जो कि समुद्रगुप्त का सामंत बन गया था तो मन्दसौर और थानेश्वर के दोनों राजवंश एक हो जाते हैं। गुप्तों के सामन्त रहने के कारण शायद उनको दूसरे लोग वैस या वैसोरा कहने लग गए हों। इस वंश के लोग राजपूत और जाट दोनों ही समूहों में पाए जाते हैं। अवध में वैसवाड़ा के राजपूत प्रसिद्ध हैं। आगरा प्रांत में बैसोरे नाम के जाट मौजूद हैं। थानेश्वर के राजा बौद्ध थे। मौखरी क्षत्रियों से उनकी लड़कियों की शादी हुई थी जिनकी उपाधि वर्मा थी। इसलिए वैस अथवा वर्द्धन उपाधि वाले होने से इनको वैश्य मानना तो भूल होगी। यह पीछे भी लिखा जा चुका है कि जाटों में मौखरी वंश के लोग भी हैं। धार्मिक मत-भेद के कारण यह वैस क्षत्रिय कुछ जाट और कुछ राजपूत दलों में बंट गए। मालवा के कुछ जाट संयुक्त प्रदेश में और कुछ राजपूतों की तरफ चले गए। संयुक्त-प्रदेश में जो मालवा के जाट हैं वे मान, भूलर, दशपुरिया, वरक, हिरन्द, परमार, पचहरे आदि गोत्र से प्रसिद्ध हैं।


ठाकुर देशराज[7] ने लिखा है....वैसोरा - यह लोग 10 वीं सदी के अंतिम चरण में थानेश्वर में राज करते थे। राजा हर्ष इनमें से प्रसिद्ध बौद्ध नरेश हुआ है। अलमसऊदी नामक अरबी यात्री ने जो कि 953 ई. में भारत में आया था, इस वंश का जिक्र किया है। उसने राजा हर्ष कोरेश लिखा है। शायद कुरुक्षेत्र का अधिपति होने के कारण उसने ऐसा लिखा होगा। यह भी हो सकता है वैसोरा


[पृ.125]: लोग कुरु लोगों की ही एक शाख हों। अलमसऊदी ने वैसोरा शब्द को बाऊरा लिखा है। श्री सीवी वैद्य ने अपनी अटकल से बावरा को परिहार लिखा है, जो बिल्कुल असंगत है। दिल्ली राजपूताने में हजारों की संख्या में वैसोरा जाट हैं।

सीवी वैद्य को एक और भी भ्रम हुआ है। मसूदी ने कन्दहार में हाहज लोगों का राज बताया है, जिसको आप उपाधि मानते हैं। वास्तव में वे हैहय क्षत्रिय थे।

Population

Distribution

Notable persons

References


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