Jat Itihas (Utpatti Aur Gaurav Khand)/Shashtham Parichhed

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जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खंड), 1937, लेखक: ठाकुर देशराज

छठा परिच्छेद:

मध्य कालीन राजवंशों की सूची

मध्य कालीन राजवंशों की सूची

[पृ.113]:पिछले परिच्छेद में हमने अति प्राचीन अर्थात वैदिक, रामायण और बौद्ध काल के उन राजवंशो का वर्णन दिया है जो कि ज्ञाति राष्ट्र के पक्षपाती अर्थात जाट थे। अब इस मध्यकाल के राजवंशों का परिचय देना चाहते हैं जो कि जाटों में पाए जाते हैं, तथा राजपूतों में भी जिनका निशान है। इस मध्यकाल को जो कि ईसा की छठी सदी से आरंभ होता है और 12 वीं सदी तक गिना जाता है वास्तव में राजपूत काल कहना चाहिए। क्योंकि यह सर्वसम्मत बात है कि भारत के मौजूदा राजपूत खानदानों का उद्भव इसी काल में हुआ है। अतः यह आवश्यक है कि राजपूत जाति के उद्भव पर भी यहां थोड़ा सा प्रकाश डाले दें। श्री सीवी वैद्य ने 'हिंदू भारत' के उत्कर्ष में लिखा है:- "सामाजिक उन्नति की दृष्टि से भी अर्वाचीन हिंदू राजत्व काल का आरंभ ईशा की नवीं शताब्दी से माना जा सकता है। .... सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इसी समय राजनीतिक आकाश के क्षितिज पर अनेक नए राजवंश प्रकट हुये जिनके वंशज अब भी देश में राज कर रहे हैं। यह भी नि:संकोच कहा जा सकता है कि आजकल प्रत्यक्ष दिखाई देने


[पृ.114]:वाले अर्वाचीन 'हिंदू' हिंदुस्तान के दर्शन इसी समय से होने लगते हैं।* यह महत्वपूर्ण बात हिंदुस्तान का इतिहास लिखने वालों की समझ में आने लगी है। इतिहास लेखकों में सर विंसेंट स्मिथ ने बहुत ही ठीक कहा है कि इसी समय के लगभग राजपूत लोग हिंदुस्तान के इतिहास के रंगमंच पर अवतीर्ण होते हैं। पहले के राजवंश अब लुप्त हो चुके थे। आर्य-बौद्ध-काल में गुप्त और वर्धन ही भारत में प्रमुख राजवंश थे। इसी तरह यवन, शक, हूण आदि विदेशी राजवंश भी यहां राज करते थे। परंतु मध्ययुगीन भारत के पहले काल विभाग में यह सब क्रमशः विनष्ट होते गए। उस समय में भी कुछ क्षेत्रीय बनाने थे जिन्हें वह ह्वेनसांग ने क्षत्रीय ही लिखा है परंतु वह राजपूत नहीं कहलाते थे। उत्तर भारत में वल्लभी के मैत्रक और कन्नौज के वर्म तथा दक्षिण में बादामी के चालुक्य और कांची के पल्लव को उसने क्षत्रीय कहा है राजपूत नहीं। यह राजवंश भी इसी समय के आसपास अस्तड़्गत हुए और समस्त भारत में नए क्षत्रीय घराने उदित हुये जो अपने को राजपूत कहाने में आनंद मानते थे। यद्यपि राजपूत नाम नया नहीं है। आश्चर्य की बात है कि यही राजपूत घराने चाहे उनका महत्व घट ही क्यों न गया हो आज तक राजघरानों के रूप में मौजूद हैं।" (पे.6)

अग्निकुल क्षत्रियों की जरूरत क्यों हुई

अब हमें थोड़ा सा विचार यह और करना है कि क्या यह राजपूत उन्हीं प्राचीन क्षत्रियों के उत्तराधिकारी थे जो कि अति


* अभिप्राय यह है कि बौद्ध-धर्म के स्थान पर नए हिंदूधर्म का पूरा सिक्का बैठ गया था।


[पृ.115]:प्राचीन काल से क्षत्रिय नाम से अभिहित होते थे। यदि हां तो फिर राजपूत नाम धारण करने की आवश्यकता क्यों कर हुई। इसका उत्तर पृथ्वीराज के राजकवि चंद्रबरदाई के शब्दों में तो यह है कि धर्म की रक्षा के लिए आबू के यज्ञ से अग्निवंश तैयार किया गया। निश्चय ही यह अग्निवंश सूर्यवंश और चंद्रवंश से अलग है फिर चाहे भले ही इसमें सूर्यवंशी और चंद्रवंशी भी शामिल रहे हैं। डॉक्टर भंडारकर ने उन्हें गुर्जरों में से दीक्षित होना बतलाया है किंतु सीवी वैद्य चंद्र की कथा को काल्पनिक ठहराते हैं। किंतु भाई परमानंद जी ने "तारीख राजस्थान" में इस प्रकार लिखा है:-

"हम यह जानते हैं की अग्निकुल क्षत्रियों की पैदाइश की खास जरूरत इसलिए हुई कि बौद्ध धर्म के फैल जाने से और सब राजाओं के बौद्ध धर्म में आ जाने के कारण क्षत्रियत्व का नाश हो गया था।.... ब्राह्मणों ने एक मौके पर आबू पहाड़ पर एक बड़ा भारी यज्ञ करके क्षत्रिय धर्म को नए सिरे से जिंदा किया।"

बात कुछ भी हो प्राय: इस संबंध के सभी कथनों से यह सारांश निकलता है कि समस्त क्षत्रियों के गणतंत्री और बौद्ध धर्मावलंबी हो जाने के कारण ब्राह्मणों को अपने सिद्धांतों की रक्षा करने और मनवाने के लिए ऐसे क्षत्रियों की आवश्यकता थी जो उनका साथ दे सकें। पहले तो उन्होंने ब्राह्मणों में से ही कुछ लोगों को शासक बनाया, शुंग और कण्व इसके उदाहरण हैं। इन्हें ब्रह्मक्षत्रिय कहने में कोई अत्युक्ति नहीं। बाद में अन्य लोगों को जिनमें अधिकांश


[पृ.116]: तो पुराने ही क्षत्रियों में से थे अपने धर्म में दीक्षित किया।

राजपूत कब और कैसे बने

सबसे बड़ा ऐसा दीक्षा संस्कार आबू में हुआ था। वैसे भारत के प्रत्येक कोने में ऐसे संस्कार होते थे। बौद्ध धर्म से बाहर होते ही प्रत्येक राजा को यज्ञ करना होता था। इतिहास में ऐसी कई घटनाओं का वर्णन है। इन अग्निकुल क्षत्रियों के संबंध में यद्यपि पुराणों ने इस बात को कहा है कि हवन कुंड से निकलने वाले पहले दो पुरुष क्षत्रिय नहीं थे। इसलिए पहले को द्वारपाल का काम सौंपा गया। किंतु ऐसी बात नहीं है। हां यह हो सकता है कि उन्होंने तत्परता के साथ ब्राह्मणों के मिशन को पूरा करने में सहयोग न दिया हो। किंतु परिहार जो कि परतंगण क्षत्रिय थे और भारत के पूर्वोत्तर फाटक पर रहने के कारण प्रतिहार कहलाने लगे थे। उसके बहुत समय पहले से कन्नौज के शासक रह चुके थे। चौहानों का खानदान भी पहले से ही हिमालय की तलहटी में चाहु नाम से शासन करता था। चालुक्य बौद्ध धर्म के आदि से ही शासक थे। प्रमार भी पुराने क्षत्रिय थे। हां यह सही है कि राजपूताना के परमार और परिहारों कि उस समय गुर्जर क्षेत्रियों में गिनती होती थी। इन चार खानदानों के अलावा जो भी खानदान नए हिंदू धर्म के सिद्धांतों को कबूल करते गए वह राजपूतों में गिने जाने लगे। पंजाब में कुछ ब्राह्मण खानदान बिहार में भर लोग भी राजपूत बन बैठे। और ये बढ़ते बढ़ते एक समय 36 हो गए। तभी से राजपूतों के 36 कुल मशहूर हुये हैं। यदि अधिक गहरी छानबीन की जाए तो यह भी पता


[पृ.117]: चल सकता है कि कौन सा खानदान कब राजपूतों के अंदर दीक्षित हुआ। आगे चलकर यह दीक्षा और मिलाने का कार्य स्वयं राजपूत भी करने लग गए थे। झाला लोग* उदयपुर के गहलोतों ने महाराणा प्रताप के समय में खुद ही दीक्षित कर लिए थे। ये चौहान प्रतिहार और प्रमार वगैरह भी इसमें आठवीं और दशमी सदियों के बीच ही अग्निवंशी बने थे। क्योंकि चौहानों का पहला पुरुष अनहल अथवा आना अग्नि दीक्षा में शामिल हुआ था। जोकि पृथ्वीराज से 20 पीढ़ी भी पहले नहीं हुआ और पृथ्वीराज का समय 1206 ईस्वी है। अगर उस घटना को हम पृथ्वीराज से 400 वर्ष पहले की भी मान लें तो भी नवीं शताब्दी से पहले मामला नहीं पहुंचता। इसी तरह उन सब कुलों का पता चल सकता है जो इस समय राजपूतों में शामिल हैं कि आया वे कब राजपूत बने?

राजपूतों की इतनी मीमांसा करने से हमारा केवल इतना ही अभिप्राय है कि:-

(1) उनका उद्भव जाटों से बहुत पीछे हुआ

(2) उनमें जो राजवंश है वह राजपूत होने से पहले अवश्य ही भारत की उन क्षत्रिय जातियों में संयुक्त रहे होंगे जो जाट, गुर्जर और अहीर के नाम से प्रसिद्ध हैं। हां उन


* पुराण पंथियों ने झाला को व्रात्य रखा है यथा:- झल्लो मलाच राजन्याद् व्रात्य लिच्छवि रेवच।


[पृ.118]: खानदानों की बात दूसरी है जो क्षत्रियेतर खानदानो- ब्राह्मण, भर, अहलूवालिया आदि से आए।*

इस प्रकरण को भलीभांति समझ लेने के लिए यह आवश्यक है कि भारत के शायद ही किसी राज- खानदान का पूरा समूह राजपूतों में चला गया हो। अगर ऐसा होता तो प्रमार, (पंवार), जाट, मराठा और गुर्जरों में नाम को भी नहीं मिलते। साथ ही यह भी जान लेना चाहिए कि आठवीं सदी से पहले कोई भी खानदान क्षत्रियों का राजपूत नाम से अभिहित नहीं हुआ है। अतः उससे पहले वह सभी खानदान उन्हीं दूसरे जाट, गुर्जर, मराठा और अहीर क्षत्रिय में गिने जाते होंगे जिनका की निर्माण राजपूत शब्द से पहले हो गया था।

हमने खूब छानबीन के साथ मिलान करके देखा है कि राजपूतों के 36 कुलों में से 2 ही 4 ऐसे कुल होंगे जिनका जाटों में अस्तित्व न हो। परिहार, पवार, सोलंकी, चौहान, राठौड़, गहलोत, बैन्स, दाहिमा, भाटी, कछवाहा, यादव, झाला, दहिया, तोमर, पाल, गौड, निकुंभ आदि। परंतु हम यह कह सकते हैं कि राजपूतों में ऐसे कई कुल नहीं हैं जो भारत में वैदिक जमाने से पीढ़ी-दर-पीढ़ी विभिन्न तरीकों से राज करते आए हैं। जैसे, नव, शिवि, पांचाल, कुरु, काश्य, वत्स आदि। इस बात को हम इसलिए कह रहे हैं कि कुछ लोगों की


* देखो इंपीरियल गजेटियर


[पृ.119]: मूर्ख भाटों की गढ़ी हुई दंतकथाओं के आधार पर ऐसी धारणा हो गई है कि हमारा निकास राजपूतों में से है। जिस चीज का जन्म पीछे का है उसमें से पहले जन्मी हुई कोई चीज कैसे पैदा हो सकती है

मध्यकाल (600-1200 ई.) के जाट राज्यों का वर्णन

इस विवाद के विषय को आगे के प्रश्नों के लिए छोड़कर मध्य काल के कुछ जाट राज्यों पर प्रकाश डालना चाहते हैं, मध्यकाल के माने है- 600 ई. से 1200 ई. साल तक अतः नीचे की लाइनों में हम इसी बीच के जाट राज्यों का वर्णन करना चाहते हैं।

1. मौर्य

मौर्य - मध्यकाल अर्थात राजपूती जमाने में इनका राज्य चित्तौड़ में था। बाप्पा रावल जिसे कि गहलोतों का विक्रमादित्य कहना चाहिए चित्तौड़ के मौर्य राजा मान के ही यहां सेनापति बना था। 'हिंदू भारत का उत्कर्ष' के लेखक श्री राव बहादुर चिंतामणि विनायक वैद्य लिखा है कि राजा मान से बाप्पा ने चित्तोड़ को अपने कब्जे में कर लिया। यहां हम इस बात को और साफ कर देना चाहते हैं कि राजा मान बौद्ध धर्म का अनुयाई था। इस प्रांत में हारीत नाम का साधु नवीन हिंदूधर्म का प्रचार कर रहा था। 'स्रोत चरितामृत' में भी इस बात को स्वीकार किया है कि हारीत ने बाप्पा को इसलिए काफी मदद दी कि वह उनके मिशन को पूरा करने के लिए योग्य पुरुष था। हारीत अपने षड्यंत्र में सफल हुआ। सारी फ़ौज और राज्य के वाशिंदे राजा मान के खिलाफ हो गए और मान से चित्तौड़ छीन लिया।


[पृ.120]: सीवी वैद्य ने इस घटना का जिस तरह वर्णन किया है उसका भाव यह है। बाप्पा रावल चित्तौड़ के मोरी राजा का सामंत था। रावल के माने छोटे राजा के होते हैं। उदयपुर के उत्तर में नागदा नाम का जो छोटा सा गांव है, वहीं बाप्पा रावल राज्य करता था। आसपास में बसे हुए भीलों पर उसका राज्य था। भीलों की सहायता से ही उसने अरबों का आक्रमण विफल किया था। नवसारी के एक चालुक्यों संबंधी शिलालेख से है पता लगता है कि अरबों ने मौर्यों (शायद के ही मौर्यों) पर भी आक्रमण किया था। हम ऐसा अनुमान कर सकते हैं कि हारित ऋषि ने बाप्पा को मौर्य राजा की सेना में धर्म रक्षा के हेतु भर्ती होने की सलाह दी होगी। कालक्रम से बाप्पा को चित्तौड़ का सर्वोच्च पद प्राप्त हो गया था। यह कैसे हुआ इसमें कई दंतकथाएं हैं। एक तो यह है कि चित्तौड़ के सब सरदारों ने मिलकर राजा के विरुद्ध विप्लव कर दिया और उसे पदच्युत करके बाप्पा को चित्तौड़ का अधीश्वर बनाया। बात कुछ भी हो, इसके बाद मोर्य कुल का राज्य चित्तौड़ से नष्ट हो गया।

अब विचारना यह है कि मान मोर्य से चित्तौड़ का राज्य कब निकल गया। चित्तौड़ में मान मौर्य का जो शिलालेख मिला है उस पर संवत 770 अंकित है अर्थात सन् 713 में मान आनंद से राज्य कर रहा था। अरबों ने जो मौर्य राज्य पर आक्रमण किया था उसका समय सन् 738 नवसारी के



[पृ.121]: चालुक्य के शिलालेख के अनुसार माना जाता है। तब हम यह ख्याल कर सकते हैं कि यदि सचमुच अरबों ने चित्तौड़ के मौर्य राज्य पर हमला किया था तो मान राजा सन् 738 तक तो चित्तौड़ में राज्य कर ही रहे थे।*बाप्पा ने उनसे यह राज्य सन् 740 के इधर-उधर हड़प लिया होगा।

यहां यह बताना उचित होगा कि मान के साथी-संगाति चित्तौड़ के छोड़कर बड़े दुख के साथ जावद (ग्वालियर राज्य) की ओर चले गए। ये मौर्य जाट अपना निकास चित्तौड़ से बताते हैं। वे कहते हैं कि ऋषि के श्राप से हमें चित्तौड़ छोड़ना पड़ा। यह ऋषि दूसरा कोई ओर नहीं हारीत है। कहा जाता है कि भाट ग्रन्थों में मान राजा को बाप्पा का भांजा कहा है। हमारे ख्याल से तो वैसा ही था जैसा कि धर्म वीर तेजाजी मीणा लोगों को मामा कहकर पुकारा था। उस जमाने में कोई किसी से रक्षा चाहता तो मामा कहकर संबोधित करता था और वह आदमी जिसे मामा कहा जाता था तनिक भी नाराज न कर खुश होता था।

एक बात और भी है कि बाप्पा के बाद ही तो उसका खानदान राजपूतों में (हारीत से दीक्षित होकर) गिना जाता है। तब हम यह मान लें कि जाट गहलोत और राजपूत गहलोत यहीं से गहलोतों की


* किंतु डॉट राजस्थान 729 में बाप्पा को चितौड़ का अधीश्वर होना मानता है।


[पृ.122]: दो श्रेणियां हो गई इन महाराज ने चित्तौड़ में एक सरोवर भी खुदवाया था जो मानसरोवर कहलाता है। भाट ग्रंथों से टाड साहब ने जो वर्णन बाप्पा के संबंध में दिया है वह तो अलिफलैला अथवा पुराणों के अधिकार गप्प से मिलता है। यथा- उनकी मां ने कहा मैं चित्तौड़ के सूर्यवंशी राजा की बहिन हूँ। झट बाप्पा जिसने आज तक नगरों के दर्शन भी नहीं किए थे चित्तौड़ में पहुंचता है। राजा केवल बाप्पा के यह कहने भर से कि मैं तेरा भांजा हूं उसे बड़े आदर से अपने यहां रखता है। राजा के संबंध सामंत राजा को और बाप्पा को इतना आकर्षित देखकर नाराज़ हो जाते हैं और राजा का उस समय तक तनिक भी साथ नहीं देती जब उस पर चढ़कर शत्रु आता है। बाप्पा जिसके पास कि हारीत के दिए हुये दिव्यास्त्र और गोरखनाथ की दी हुई तलवार थी, शत्रुओं को हरा देता है।* किंतु विजयी देश से लौटकर चितौड़ नहीं आता, अपनी पितृभूमि गजनी को चला जाता है। उस काल वहां


* गुरु गोरखनाथ 13-14वीं सदी के बीच हुये हैं। कुछ लोग उन्हें आल्हा-उदल का समकालीन मानते हैं, जो कि 13वीं शदी में मौजूद थे। किंतु बाप्पा पैदा हुआ था आठवीं सदी में, फिर गोरखनाथ उस समय कहां से आ गया।

गजनी बाप्पा के पितृों की भूमि कहां से आई? वहां तो यादव वंशी कई पीढ़ी से राज करते थे। यह भाटों की गप्प है।


[पृ.123]: गजनी में एक [Mlechha|म्लेछ]] सलीम राज करता था। उसको गद्दी से हटाकर एक एक सूर्यवंशी को गद्दी पर बैठाया और खुद ने सलीम म्लेछ की लड़की से शादी कर ली। अब चित्तोड़ को लौटे। इधर जो नाराज सामामन्त गण थे वे बाप्पा के साथ मिल गए और उन्होंने चित्तोड़ को छीनने के लिए बाप्पा का साथ दिया। बाप्पा के इस कार्य के लिए कर्नल टॉड ने उसको कृतघ्न और दूराकांक्षी जैसे बुरे शब्दों से याद किया है। बाप्पा ने राजा होकर 'हिंदू-सूर्य' 'राजगुरु' और 'चकवे' की पदवियां धारण की। इसके बाद बापपा ने ईरान, तूरान, कंधार, काश्मीर, इस्पहान, काश्मीर, इराक और काफिरिस्तान के राजाओं को जीता तथा उनकी लड़कियों से शादी की। और जब वह मरा तो हिंदू मुसलमान सबने उसकी लाश पर गाड़ने और जलाने के लिए झगड़ा किया। जब कफन उठा कर देखा तो केवल फूल लाश की जगह मिले।

हम कहते हैं भाट लोगों की यह कोरी कल्पना है। ऐतिहासिक तथ्य इतना ही है कि बाप्पा एक होनहार युवक था। बौद्ध विरोधी हारीत ने उसे शिक्षा दीक्षा दी। नागदा के आसपास के भीलों को उसका सहायक बना दिया। वह अपने भीलों की एक सेना के साथ मान राजा के नौकर हो गया। उधर हारीत अपना काम करता रहा। अवसर पाकर बौद्ध राजा मान को हटाकर बाप्पा को चित्तौड़ का अधीश्वर बना दिया। उस समय चित्तौड़ एक संपन्न राज्य था। भील जैसे वीर बाबा को सहायक मिल गए वह आगे प्रसिद्ध


[पृ.124]: होता गया। हम तो कहते हैं कि अग्निकुण्ड के चार पुरुषों की भांति ही राजस्थान में बाप्पा नवीन हिंदू धर्म के प्रसार के लिए हितकर साबित हुआ। अतः हिंदुओं ने उसे 'हिंदुआं सूरज' कहा तो आश्चर्य की बात नहीं। धीरे-धीरे मेवाड़ से वे सब राज्य नष्ट हो गए जो मौर्य के साथी थे। सिंध के साहसी राय मौर्य का राज्य चच ने और चित्तौड़ का हारीत ने नष्ट कर दिया। इस तरह से सिंध और मेवाड़ से मौर्य जाट राज्य का खात्मा ही कर दिया गया*


* चीनी यात्री ह्वेनसांग ने चित्तौड़ के मौर्य को सिंध वालों का संबंधी लिखा है! टाड चित्तौड़ के मौर्य को परमारों की शाखा लिखते हैं, किंतु सीवी वैद्य का मत उन्हें मौर्य ही मानता है।

2. कुसवान

2. कुसवान - इन लोगों को सुलेमान ने कशविन के नाम से याद किया है और रंग के गोरे बताए हैं। यह कुशान लोगों के उत्तराधिकारी थे। पीछे यह पंजाब को छोड़कर बीकानेर की ओर बढ़ गए थे।

3. वैसोरा - यह लोग 10 वीं सदी के अंतिम चरण में थानेश्वर में राज करते थे। राजा हर्ष इनमें से प्रसिद्ध बौद्ध नरेश हुआ है। अलमसऊदी नामक अरबी यात्री ने जो कि 953 ई. में भारत में आया था, इस वंश का जिक्र किया है। उसने राजा हर्ष कोरेश लिखा है। शायद कुरुक्षेत्र का अधिपति होने के कारण उसने ऐसा लिखा होगा। यह भी हो सकता है वैसोरा


[पृ.125]: लोग कुरु लोगों की ही एक शाख हों। अलमसऊदी ने वैसोरा शब्द को बाऊरा लिखा है। श्री सीवी वैद्य ने अपनी अटकल से बावरा को परिहार लिखा है, जो बिल्कुल असंगत है। दिल्ली राजपूताने में हजारों की संख्या में वैसोरा जाट हैं।

सीवी वैद्य को एक और भी भ्रम हुआ है। मसूदी ने कन्दहार में हाहज लोगों का राज बताया है, जिसको आप उपाधि मानते हैं। वास्तव में वे हैहय क्षत्रिय थे।

4. कैक - मद्रों की भांति ही यह भी शिवि जाटों की एक शाखा में से बताए जाते हैं। सन् 833 में अरब के सरदार अमरानवीन ने इन लोगों को जीत लिया और यह राज्य सदा के लिए नष्ट कर दिया। यह अफगानिस्तान के दक्षिण पूर्व में केकान पहाड़ के आसपास के प्रदेश के अधिपति थे।

5. हाला - यह खानदान कुछ पुराना है। सतवाहन लोगों में हाला एक विद्वान पुरुष हुआ है। जिसने गाथा सप्तमी तैयार कराई थी। राजपूत काल में चंदराम हाला सूस्थान का अधिपति था। इसका देश हालाखंडी के नाम से मशहूर था।

उस समय सिंध में मता और नेरून नाम के दो जाट राजा और भी राज करते पाए जाते हैं।

6. सिकरवार - नवमी सदी में इनका राज्य सीकरी (आगरा जिला) में था। सन 812 से 836 के बीच भारत पर एक प्रबल आक्रमण मुसलमानों का हुआ था। उन से मुकाबला करने के लिए उस समय के अनेक राजा मेदपाट में इकट्ठे हुए थे।


[पृ.126]: उसमें सीकरी के सिकरवार भी शामिल थे। आगे चलकर सिकरवार भी 10 वीं सदी में जाट और राजपूत दो भागों में बट गए। कुंवर हुकुम सिंह जी आंगई इन्हीं सीकरी के सिकरवार की विभूति हैं।

7. लोहर - यह वंश 1004 ई. में कश्मीर में राज्य करता था। इससे पहले दाबर या दिबिर वंश का यहां राज्य था। लोहर वंश के शासनकाल में कश्मीर की हालत सुधर गई थी। संग्रामदेव, अनंतदेव और हर्ष, उत्कर्ष इस वंश के प्रसिद्ध राजा हुए हैं। सन् 1018 ई में इस वंश से यह राज्य छिन गया। इस खानदान के लोग उत्तर प्रदेश में लऊर और लाहर नाम से मशहूर हैं।

8. बलहारा

8. बलहारा - आजकल के बलाहरिया 857 ई. में मानकिर में राज्य करते थे। अरबी यात्री सुलेमान ने लिखा है कि बल्हारा राज्य संसार के 4 बड़े राज्यों में था। सुलेमान ने यह भी लिखा है कि बल्हारा लोगों के राज्य में अरबों का आदर था। इनकी सेना में हाथी-घोड़ों की बड़ी-बड़ी पलटने थी। इनका जुर्ज (गुजर) साथ सदैव मनोमालिन्य रहता था। संभव है भीनमाल के गूजरों उनका झगड़ा रहता हो। सीवी वैद्य इन की राजधानी मानकिर को बल्लभीरायका मान्यखेट बतलाते हैं। इससे वे राष्ट्रकूटों की राजधानी मानते हैं। किंतु इस बात को भूल जाते हैं कि वह राष्ट्रकूट कन्नौज के गाहडवाल व राठौरों से भिन्न थे। ये तो जस्टीन के समय के आराष्ट्र (जाट राठौड़)


[पृ.127]: हैं और जिनको किसी समय एडस्ट्राई ने रावी के किनारे 10 हाथी और हजारों पदाति सेना के साथ देखा था।*

9. तक्षक - बहुत पुराना खानदान है। नवीं सदी में यह लोग असीरगढ़ में राज्य करते थे। तक्षक गोत्र के जाट मालवा राजपूताना दोनों ही में हैं।

10. नाग - यह नागहृद और नागौर में राज करते थे। इनसे सातवीं शताब्दी में यह दोनों ही स्थान निकल गए।

11. गोदारा - 12. जोहिया, 13. बेनीवाल, 14. पूनिया, 15. चाहर, 16. शिवरान, 17. नेहरा, 18. कुलरिया, 19. सिहाग, 20. खोजा खानदान बीकानेर शेखावाटी तोरावाटी और टोंक की भूमि पर राज्य करते थे। इनका वर्णन जाट इतिहास में विस्तारपूर्वक दिया गया है।

21. राठी इनका राज्य राठ प्रांत अलवर में था। यह लोग चंद्रवंशी राजा राष्ट्र की संतान में से थे।

22. परमार - प्रमार हुमायूं के समय में उमरकोट में परमार राजा राज करते थे। हुमायूं की जीवनी के लेखक ने उसे जाट लिखा है। कर्नल टॉड आबू के परमार राजा को भी जाट (जित) लिखते हैं।

23. राणा

23. राणा - यह लोग गोहद में बारहवीं सदी में अपना आधिपत्य जमा चुके थे। आगे इन्हीं लोगों ने ग्वालियर पर कब्जा कर लिया था।


*मि. क्रुक की जाति विभाजन पुस्तक में देखो।

छठा परिच्छेद समाप्त

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