Yamunotri

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लेखक:लक्ष्मण बुरड़क, IFS (Retd.), Jaipur
Yamunotri temple and ashram

Yamunotri (यमुनोत्री) is the source of the Yamuna River and the seat of the Goddess Yamuna. It is one of the four sites in India's Char Dham pilgrimage. There is the temple devoted to the Goddess Yamuna and the holy hot springs at Janki Chatti (7 km. away).

Variants

Location

It is situated at an altitude of 3,293 metres (10,804 ft) in the Garhwal Himalayas and located approximately 30 kms North of Uttarkashi in Uttarakhand. It is the westernmost shrine in the Garhwal Himalayas, perched atop a flank of Bandar Poonch Parvata.

History

Map of Uttarakhand

According to the legend ancient, sage Asita Muni had his hermitage here. All his life, he bathed daily both in the Ganges and the Yamuna. Unable to go to Gangotri during his old age, a stream of the Ganges appeared opposite Yamunotri for him.

Yamunotri Temple

Yamunotri Temple is situated in the western region of Garhwal Himalayas at an altitude of 3,235 metres (10,614 ft) in Uttarkashi district, Uttarakhand. The original temple was built by Maharani Guleria of Jaipur in the 19th century. The current temple is of recent origin as earlier constructions have been destroyed by weather and the elements. There seems to be a confusion as to who built the temple of Yamunotri. However according to sources, the temple was originally constructed by Maharaja Pratap Shah of Tehri Garhwal.

In Mahabharata

Yamunaprabhava (T) (यमुनाप्रभव) (III.82.39)

Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 82 mentions names Pilgrims. Yamunaprabhava (Tirtha) (यमुनाप्रभव) is mentioned in Mahabharata (III.82.39).[1].... The man that proceedeth to the Yamuna-prabhava (यमुनाप्रभव) (III.82.39) , (the source of the Yamuna) and batheth there, obtaineth the merit of the horse-sacrifice and is worshipped in heaven.

यमुनोत्री

विजयेन्द्र कुमार माथुर[2] ने लेख किया है ...यमुनोत्री (p.769): यमुना नदी का उद्गम स्थल जो उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल के पर्वतों में स्थित है। (देखें: यमुनाप्रभव)

यमुनाप्रभव

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ...यमुनाप्रभव (AS, p.769) नामक एक प्राचीन स्थान का उल्लेख 'महाभारत' (84, 44)में हुआ है। संभवतः यह यमुना का उद्गम स्थान था। इसे 'यमुनोत्री' भी कहा जाता है।

यमुनोत्री परिचय

यमुनोत्री यह वह स्थान है, जहाँ से यमुना नदी निकली है। यहाँ पर प्रतिवर्ष गर्मियों में तीर्थ यात्री आते हैं। पौराणिक गाथाओं के अनुसार यमुना नदी सूर्य की पुत्री हैं तथा मृत्यु के देवता यम सूर्य के पुत्र हैं। कहा जाता है कि जो लोग यमुना में स्नान करते हैं, उन्हें यम मृत्यु के समय पीड़ित नहीं करते हैं। यमुनोत्री के पास ही कुछ गर्म पानी के सोते भी हैं। तीर्थ यात्री इन सोतों के पानी में अपना भोजन पका लेते हैं। यमुनाजी का मन्दिर यहाँ का प्रमुख आराधना मन्दिर है।

तीर्थस्थल: यमुना देवी का तीर्थस्थल, यमुना नदी के स्त्रोत पर स्थित है। यमुना देवी का मन्दिर गढ़वाल हिमालय के पश्चिमी भाग में स्थित है। यमुनोत्री का वास्तविक स्त्रोत जमी हुई बर्फ़ की एक झील और हिमनद (चंपासर ग्लेसियर) है जो समुद्र तल से 4421 मीटर की ऊँचाई पर कालिंद पर्वत पर स्थित है। यमुना देवी के मंदिर का निर्माण, टिहरी गढ़वाल के महाराजा प्रताप शाह द्वारा किया गया था। अत्यधिक संकरी-पतली युमना काजल हिम शीतल है। यमुना के इस जल की परिशुद्धता, निष्कलुशता एवं पवित्रता के कारण भक्तों के हृदय में यमुना के प्रति अपार श्रद्धा और भक्ति उमड पड़ती है। पौराणिक आख्यान के अनुसार असित मुनि की पर्णकुटी इसी स्थान पर थी। यमुना देवी के मंदिर की चढ़ाई का मार्ग वास्तविक रूप में दुर्गम और रोमांचित करने वाला है। मार्ग पर अगल-बगल में स्थित गगनचुंबी, मनोहारी नंग-धडंग बर्फीली चोटियां तीर्थयात्रियों को सम्मोहित कर देती हैं। इस दुर्गम चढ़ाई के आस-पास घने जंगलो की हरियाली मन को मोहने से नहीं चूकती है। मंदिर प्रांगण में एक विशाल शिला स्तम्भ है जिसे दिव्यशिला के नाम से जाना जाता है। यमुनोत्री मंदिर परिशर 3235 मी. उँचाई पर स्थित है। यमुनोत्री मंदिर में भी मई से अक्टूबर तक श्रद्धालुओं का अपार समूह हरवक्त देखा जाता है। शीतकाल में यह स्थान पूर्णरूप से हिमाछादित रहता है।

चार धाम: गढ़वाल हिमालय की पश्चिम दिशा में उत्तरकाशी ज़िले में स्थित यमुनोत्री चार धाम यात्रा का पहला पड़ाव है। पहला धाम यमुनोत्री से यमुना का उद्गम मात्र एक किमी की दूरी पर है। यहां बंदरपूंछ चोटी (6315 मी.) के पश्चिमी अंत में फैले यमुनोत्री ग्लेशियर को देखना अत्यंत रोमांचक है। यमुना पावन नदी का स्रोत कालिंदी पर्वत है। यमुनोत्री का मुख्य मंदिर यमुना देवी को समर्पित है। पानी के मुख्य स्रोतों में से एक सूर्यकुण्ड है जो गरम पानी का स्रोत है।

यात्रा सम्बंधी सूचनाएँ: चारों धाम यमुनोत्री, गंगोत्री, बद्रीनाथ और केदारनाथ की पूरी यात्रा करनी हो तो यमुनोत्री से प्रारंभ करें। इनमें से एक या दो स्थान ही जाना हो तो भी यात्रा ऋषिकेश से प्रारंभ होती है। केवल बद्रीनाथ के लिए कोटद्वार स्टेशन से भी मोटर बसें चलती हैं। यहाँ बस रोड बना हुआ है। यह मार्ग ऐसा है कि पहाड़ों के पत्थर गिरने से अनेक बार कहीं भी अवरूद्ध हो जाता है। अतः बस कहाँ तक के लिए मिलेगी, यह ठीक पता ऋषिकेश में ही चल सकता है। जहाँ से पैदल जाना होता है, वहाँ कुली मिलते हैं। एक कुली एक मन भार ले जाता है। वहाँ उनकी रजिस्टर में कार्यालय में नाम लिखाकर ले जाना चाहिए। उनकी मज़दूरी का रेट कार्यालय से पूछ लें।

उत्तराखण्ड की पूरी यात्रा में रबड़ के जूते चाहिए होते हैं जो फिसलने वाले न हों, साथ में एक मज़बूत छड़ी सहारे के लिए और बरसाती रखना अच्छा है। यहाँ छाता काम नहीं देता। कोई अन्जान फल, शाक, पत्ती को न छुएँ, वे विषैले हो सकते हैं। बिच्छू बूटी इधर बहुत हैं जो छू जाए तो पीड़ा देती है। प्यास लगने पर झरने का पानी सीधे न पीवें अन्यथा हिल डायरिया होने का भय है। मिश्री किसमिस कुछ अपने पास रखें और एक हल्का गिलास भी रखें। कुछ खाकर पानी पीएँ। पानी पहले लोटे या गिलास में भर लें, एक मिनट रहने दे, जिससे उसमें जो कण हैं, नीचे बैठ जाएँ तब पीएँ। नीचे का एक घूँट जल फेंक दें और फिर गिलास भरना हो तो ऐसा ही करें।

यमुनोत्री और केदारनाथ के मार्ग में कहीं-कहीं जहरीली मक्खी होती हैं, जिनके काटने पर फोड़े हो जाते हैं। शरीर को ढक कर रखें, काटने पर डिट्टोल, टिंचर या जम्बक लगावें। कच्चे सेब आड़ू आदि न खाएँ। यहाँ सर्दी बहुत पड़ती है, गरम कपड़े साथ में अवश्य ले जायँ। ऊपर दाल नहीं पकती, आलू से काम चलाना पड़ता है।

यहाँ गरम पानी के कई कुंड हैं। उनमें पानी खौलता रहता है। यात्री कपड़े में बाँध कर आलू-चावल उसमें डूबा रखते हैं तो वे पक जाते हैं। इन गरम कुंडों में स्नान करना संभव नहीं है। स्नान के लिए अलग कुण्ड बना है, जिनमें जल कुछ शीतल रहता है। यमुना जल इतना शीतल है कि उसमें भी स्नान नहीं किया जा सकता है।

कलिन्द पर्वत से बहुत ऊँचे से हिम पिघलकर यहाँ जल के रूप में गिरता है। इसी से यमुना का नाम कालिन्दी है। यहाँ छोटा सा यमुनाजी का मंदिर है। यहाँ असित मुनि का आश्रम था। उनके तप से गंगाजी का एक छोटा झरना यहाँ प्रगट हुआ जो अभी है।

संदर्भ: भारतकोश-यमुनोत्री

गंगोत्री एवं यमुनोत्री यात्रा का विवरण

Map of Uttarkashi

लेखक द्वारा की गई वर्ष 1982 में गंगोत्री एवं यमुनोत्री यात्रा विवरण यहाँ दिया जा रहा है:

गंगोत्री एवं यमुनोत्री यात्रा का विवरण

स्वामी जैतराम जी द्वारा वर्णन

ठाकुर देशराज[4] ने लिखा है ....स्वामी जैतराम जी ने अपनी सुलेखनी द्वारा कई एक अभूतपूर्व बातें लिखी हैं। आप गंगा का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि हिमालय से जितने नदियां निकली हैं वे सब गंगा हैं। परंतु प्रसिद्ध नाम थोड़े ही हैं। विष्णु गंगा का नाम भागीरथी है।


[पृ. 213]: गंगोत्री ब्रह्म गंगा आलखासन पहाड़ से निकलती है। वहां अलखावत पुरी देववासा है। उत्तरी हिमालय से आई हुई, देवप्रयाग में नंदगंगा से मिल गई, विष्णु गंगा भी वही गंगा में शामिल हो गई, करण गंगा विष्णु गंगा में पांडु के सरसे पांडु गंगा में सब गंगा मिल गई। रुद्र गंगा रुद्रप्रयाग से तथा अखैनन्दा अखंड आसन से निकाल कर रुद्र गंगा में मिल गई। जटांबरी अखैनंदा में शरीक हो गई परंतु इन सब गंगाओं में केवल भागीरथी का इनाम प्रसिद्ध है। लक्ष्मण झूला से सारी ही धाराएं शामिल होकर चलती हैं। देवप्रयाग से यमुनोत्री 161 मील दूर पड़ती है। यमुनोत्री में जाटों का एक हवन कुंड है जो सुरबाद के जाट गणों की तपोभूमि का हवन कुंड बतलाया जाता है। ब्रहम ऋषि जमदग्नि ने तप किया तब से यमुनोत्री तो आम हो गई। महाराजा हरिराम गढ़वाल फिर से जटावी गंगा पर जाट का कब्जा स्थापित किया। यह राजा जिस संवत में हुआ है उसका पता सर्व संवत नाम की पुस्तक से मिल सका है। यमुनोत्री से करीब 54 मील की दूरी पर आपका आसन पाया जाता है। यह आसन यमुनोत्री हरिहर आश्रम ब्रह्मचर्य से उत्तर पूर्व की ओर 54 मील पर है।

See also

References

  1. यमुना प्रभवं गत्वा उपस्पृश्य च यामुने, अश्वमेध फलं लब्ध्वा स्वर्गलॊके महीयते (III.82.39)
  2. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.
  3. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.769
  4. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.212-213