Bhadwa Phulera

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Author of this article is Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क
Location of Bhadwa Village in Jaipur district

Bhadwa (भादवा) is in Phulera tahsil of Jaipur district in Rajasthan. It is situated near the border of Nagaur district and in north of the Sambhar lake eastern tip.

Origin

Jat Gotras

Bhadwa Pillar Inscription of Ugam Jat samvat 1116 (1059 AD)

Thakur Deshraj [1] has mentioned about a Stone Pillar Inscription of samvat 1116 (1059 AD) installed in village Bhadwa near a well. The village has an ancient well and a Baori. The well was built by very huge stone slabs and is a unique example of architecture. In the north of this well is a huge blue stone pillar installed by Ugam Jat in samvat 1116. On the south of this kirtistambha is shown Ugam Jat riding a horse and attacking an enemy with sword. There is one enemy shown near the feet of his horse in slaughtered condition. On the northern face of pillar is shown Lord Krishna with shankha, chakra, gada and padma on his head. Near the feet of Lord Krishna is engraved following inscription which reads:

उगम जाट भादवा का संवत 1116 विक्रम आषाढ़ सुदी 9 मंगलवार ।
Translation - Ugam Jat of Bhadwa vikram samvat 1116 ashadh sudi 9 Tuesday.

About 10 km in north of Bhadwa village is the site of ancient temples of about 800 years back and known as 'Jadu Ke Mandir'. These were built by a Jat ruler. These are situated in villages Karad and Kankra in present Danta Ramgarh tahsil of Sikar distrct.

इतिहास

रियासत काल में यह खंगारोत कछवाहों का तजिमी ठिकाना था. निकटवर्ती बधाल गाँव से शासकों की दो ताम्रपत्र मिले हैं. इनमे से एक ताम्रपत्र विसं 872 (815 ई.)का कन्नौज के प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय का है जिसने भद्रासन गाँव में स्थित स्कंधावार से वह ताम्रपत्र प्रसारित किया। भौगोलिक स्थिति को उक्त भद्रासन गाँव भादवा ही प्रतीत होता है. भादवा में दो अलग-अलग खेतों में दो प्राचीन भव्य और कलात्मक पाषाण स्तम्भ हैं. इनमे एक पाषाण स्तम्भ गाँव से पूर्व की तरफ बेरी नामक कुएं के पास गड़ा है. इस स्तम्भ पर घुड़ सवार की आकृति बनी है पर कोई लेख नहीं है. दूसरा स्तम्भ भादवा गाँव के पश्चिम में यहाँ के पूर्व सरपंच ज्वालाप्रताप सिंह के बाग़ वाले खेत में स्थापित है. इस आयताकार स्तम्भ पर एक तरफ हाथ में तलवार लिए घुड़सवार तथा तीन तरफ शेषशाई विष्णु, शिव, तथा अन्य देवताओं की आकृतियां बनी हैं.[2]

इसके निचले भाग पर विसं 1116 (1059 ई.) उत्कीर्ण है. सम्भवतः यह शिलालेख नाडौल के चौहान वंशी शासक अणहिल्ल का स्मारक शीला लेख है. उसके पिता आहिल का भी शिलालेख में नाम आया है सुन्धा पर्वत शिलालेख के अनुसार अणहिल्ल ने शाकम्भरी (सांभर) प्रदेश पर अधिकार कर लिया था वह महमूद गजनवी का समकालीन था भादवा के पश्चिम में 2 कि.मी. पर स्थित मूण्डगसोई (मूण्डबसई) से भी गत वर्ष 12 वीं शताब्दी का एक वंश का शिलालेख उपलब्ध हुआ जो क्षेत्र की प्राचीनता और महत्व पर प्रकाश डालता है. [3]

उगम जाट कीर्ति-स्तम्भ: भादवा गांव

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि राज्य श्री जयपुर के सांभर प्रान्त में करड़ और काकरा नाम के ग्रामों में 800 वर्ष के पुराने जो जादू के मन्दिर कहलाते हैं वे जाट भूमिपति के बनाए हुए हैं। इन मन्दिरों से तीन कोस दक्षिण की ओर भादवा गांव है। यहां एक बहुत पुरानी बावड़ी और एक कुआं है। बड़ी-बड़ी पत्थरों की शिलाओं को घड़कर पूठियों को जोड़-जोड़कर कुएं की नाल बनाई गई है। इस कुएं की मजबूती, सुन्दरता और प्राचीन शिल्प प्रशंसनीय है। इस कुएं से उत्तर की ओर एक बड़ा भारी नील पत्थर कीर्ति-स्तम्भ खड़ा है। कीर्ति-स्तम्भ के दक्षिण भाग में घुड़सवार सामने खड़े हुए दुश्मन पर दाहिने हाथ से तलवार का वार करते हुए वीर उगम जाट बाएं हाथ से घोड़े की लगान खींचे हुए अपनी इतिहास प्रसिद्ध जाति की स्वाभाविक वीरता दिखला रहे हैं। एक शत्रु कटा हुआ घोड़े के पैरों में पड़ा है और दूसरे के सिर के ऊपर उगम वीर की तलवार का वार हो रहा है। कीर्ति-स्तम्भ के उत्तर भाग में ऊपर शंख, चक्र, गदा, पद्म धारे हुए मस्तक पर मुकुट से सुशोभित भगवान कृष्णचन्द खड़े हैं। उनके चरणों के नीचे ऐसा शिलालेख खुदा हुआ है -

उगम जाट भादवा का सं. 1116 वि. आषाढ़ सुदी 9 मंगलवार।

यह अनुमान अच्छी तरह से किया जा सकता है कि उगम जाट कोई साधारण मनुष्य नहीं था। क्योंकि कई हजार रुपयों की लागत का कुआं और बावड़ी जिसने बनवाकर राजाओं के तुल्य अपना नाम चिरस्मरण रखने के लिए ऐसा विशाल कीति-स्तम्भ खड़ा किया था वह अवश्य कोई बड़ा भारी रईस था। और जो इतिहास लेखक भूल से लिख गए हैं कि वर्तमान देवनागरी अक्षर चार-पांच सौ वर्षों से प्रचलित हुए हैं यह लोगों का झूठा विश्वास नराना गांव के सं. 1111 के जेबल्या जाट के कीर्ति-स्तम्भ से अकोदा के हर्षराम चौ. के सं. 1000 के लेख से, और भादवा के उगम जाट के सं. 1116 के कीर्ति-स्तम्भ की नागरी लिपि और हिन्दी भाषा से, खंडित हो जाना चाहिए और जानना चाहिए कि एक हजार वर्ष पहले राजपूताने में नागरी लिपि और हिन्दी भाषा प्रचलित थीं और राजपूताने में बड़े भारी बुद्धिमान बसते थे। और यह भी जाना जाता है कि विक्रम संवत् 1111, और सं. 1116 में राजपूताने के जाटों की कीर्ति, गौरव, स्वतंत्रता, वीरता - ये सब उनके पास मौजूद थीं।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-729



Notable persons

External links

References

  1. Jat History Thakur Deshraj, p.728
  2. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p.87
  3. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p.88

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