Chahar Deo

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Raja Chahar Deo ruled at the Narwar fort in Gwalior region at the end of 13th century. Coins of Chahar Deo are found in the region with "Asawar Sri Samant Deo" marked on one side and "King riding horse" on the other side. Raja Chahar Deo ruled Narwar till vikram samwat 1355.

Chahars Moved out of Narwar

After the fall of his rule at Narwar his descendents moved to "Brij Bhumi" region of Uttar Pradesh. Other group of Chahar Jats moved to Matsya and Jangladesh regions of Rajasthan.

राजस्थान में चाहर गोत्र

  • ऋषि - भृगु
  • वंश - अग्नि
  • मूल निवास - आबू पर्वत राजस्थान। शिव के गले में अर्बुद नाग रहता है उसी के नाम पर इस पर्वत का नाम आबू पर्वत पड़ा।
  • कुलदेव - भगवान सोमनाथ
  • कुलदेवी - ज्वालामुखी
  • पित्तर - इस वंश में संवत 1145 विक्रम (सन 1088 ई.) में नत्थू सिंह पुत्र कँवरजी पित्तर हुए हैं, जिनकी अमावस्या को धोक लगती है। इस वंश की बादशाह इल्तुतमिश (r. 1211–1236) (गुलाम वंश) से जांगल प्रदेश के सर नामक स्थान पर लड़ाई हुई।

राजा चाहर देव - इस लड़ाई के बाद चाहरों की एक शाखा नरवर नामक स्थान पर चली गयी। सन् 1298 ई. में नरवर पर राजा चाहरदेव का शासन था। यह प्रतापी राजा मुस्लिम आक्रांताओं के साथ लड़ाई में मारा गया और चाहर वंश ब्रज प्रदेश और जांगल प्रदेश में बस गया। इतिहासकारों को ग्वालियर के आस-पास खुदाई में सिक्के मिले हैं जिन पर एक तरफ अश्वारूढ़ राजा की तस्वीर है और दूसरी और अश्वारूढ़ श्रीसामंत देव लिखा है। इतिहासकार इसे राजा चाहरदेव के सिक्के मानते हैं।[1]

राजा चाहडपाल

राजा चाहडपाल को नरवर का अंतिम जाट राजा माना जाता है इसके सिक्के मुद्राए नरवर और चाहरवाटी क्षेत्र से बड़ी संख्या में मिली हैं । जाट सम्राट चाहड़पाल के वंसज आज चाहरवाटी छेत्र में निवास करते हैं । इसके सिक्को पर शिवजी का प्रिय नंदी का अंकन है साथ ही चाहर देवा लिखा हुआ है दूसरी तरफ एक अश्व सवार का अंकन है इसके वंशज चाहर वाटी क्षेत्र में आकर बस गए इनके बाद नरवर पर कच्छपघात जाति का पुन अधिकार हो गया जो आगे जाकर कुशवाहा ,कच्छवा नाम से जानी गई।

नरवर का किला: विदेशी यात्री टिफिनथलर ने नरवर किले की सुरक्षा के बारे में वर्णन करते हुए लिखा है कि – “नरवर किले को जीत पाना बेहद दुष्कर है। सुरक्षा के दृष्टि से इसका कोई जवाब नहीं”। इस शहर का ऐतिहासिक महत्व भी रहा है और इसे 12वीं शताब्दी तक नालापुरा के नाम से जाना जाता था। इस महल का नाम राजा नल के नाम पर रखा गया है जिनके और दमयंती की प्रेमगाथाएं महाकाव्य महाभारत में पढ़ने को मिलती हैं। आज भी नरवर में नाग राजाओं के सिक्के तथा अन्य पुरातत्वीय सामग्री बहुतायत में मिलती है। नरवर का किला समुद्र-तल से 1600 और भू-तल से 500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. लगभग 8 वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला हुआ है इस दुर्ग के पूर्वी ओर पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर लंबवत् एक दूसरा पहाड़ है, जिसे हजीरा पहाड़ कहते है, क्योंकि इसके पश्चिमी भाग के शिखर पर दो कलात्मक हजीरा निर्मित हैं। दुर्ग के दक्षिण–पश्चिम एवं उत्तर में लगी हुई सिंध एवं पूर्व से अहीर नदी ने चारो ओर से प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान कर दी है। नरवर दुर्ग में अनेक हिंदू मंदिर निर्मित है। कनिंघम के अनुसार किले की भौगोलिक संरचना अजीब है, यह एक बत्तख के सिर, गर्दन और पेट जैसी है। लेकिन आज नक्शे के आधार पर यह सर्वविदित है कि किले के वायवीय दृश्य में उसकी संरचना कंगारू जैसी है। किले पर प्रवेश के लिए चार मुख्य द्वार हैं। एक द्वार पूर्व देशा में नरवर सदर बाजर से, द्वितीय द्वार पश्चिम दिशा में उरवाही द्वार, तृतीय द्वार दूलह द्वार उत्तर में, तथा चतुर्थ पश्चिम दक्षिण दिशा में।

प्राचीन काल से ही किले के दो द्वार चालू रहे हैं। किले की सम्पूूर्ण पहाडी का ढलान एकदम सीधा है। किले में चारों द्वारों के अतिरिक्त चढना अत्यन्त दुष्कर है।

Reference - Facebook Post of Laxman Ram Jat, 29.7.2021

References

  1. अनूप सिंह चाहर, जाट समाज आगरा, नवम्बर 2013, पृ. 26-27

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