Jai Singh Bamraulia

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Jai Singh Bamraulia (1067 AD) was father of Viramadeva Bamraulia and a prominent samant of Tomar Rulers of Gwalior. He lived in Bairat area of Jaipur in Rajasthan.

History

संवत 1124 (1067 AD) में मत्स्य प्रदेश वर्तमान राजस्थान में जयपुर के पास गढ़ बैराठ में जयसिंह बमरौलिया ने निवास किया.[1] वह एक वीर, साहसी योद्धा था, उसने जाट, अहीर और गुर्जर तथा अन्य जातियों का संगठन बनाकर सेना तैयार की थी. (Ojha, p.33)

जयसिंह बमरौलिया की दिल्ली के तोमर सम्राट से मित्रता

जयसिंह बमरौलिया तथा दिल्ली के तोमर सम्राट - इस समय दिल्ली में तोमर सम्राट अनंगपाल II (1051-1081) का साम्राज्य था. अनंगपाल II तथा गजनी सुलतान इब्राहिम(1059-1099) के मध्य तंवर हिन्दा तथा रूपाल (नूरपुर) पर युद्ध हुआ था, दोनों राज्य तोमर साम्राराज्य के अंतर्गत थे. सम्राट ने इब्राहिम को आगे बढ़ने से रोका था.[2] इस युद्ध में जय सिंह 3000 सैनिक लेकर तोमर सम्राट के पक्ष में इब्राहिम के विरुद्ध युद्ध में भाग लेने पहुंचा था. जय सिंह के नेतृत्व में उसकी सेना ने रणक्षेत्र में अदम्य साहस का परिचय दिया, जिसे तुर्क सेना तोमर साम्राज्य में प्रवेश नहीं कर सकी. [3] (Ojha, p.33)

तोमर सम्राट द्वारा जयसिंह बमरौलिया को राणा की उपाधि - दिल्ली तोमर सम्राट अनंगपाल ने युद्धक्षेत्र में जयसिंह को अदम्य साहस एवं वीरता प्रदर्शित करने के के अपलक्ष में आगरा के पास बमरौली कटारा की जागीर तथा राणा की उपाधि से विभूषित कर छत्र चंवर प्रदान किये.[4] और इनके इनके पुत्र विरमदेव बमरौलिया को साम्राज्य के सबसे महत्वपूर्ण स्थान तुहनगढ़ की सुरक्षा का दायित्व सौंपा. (Ojha, p.33)

गढ़ बैराठ से बमरौली आगमन - तोमर सम्राट द्वारा प्रदत्त बमरौली कटारा की जागीर[5] में राणा परिवार आकर रहने लगे. रामदेव उर्फ़ विरहमपाल ने अपने समय में वहां रह रहे मुसलमानों को मार भगाया तथा उनकी जागीर को अपनी जागीर में मिला लिया.[6] (Ojha, p.34)

बमरौलिया जाट: इन जाटों ने बमरौली में अपनी स्थिति बहुत सुदृढ़ करली थी तथा यहाँ 172 वर्षों तक रहने के कारण ये लोग बमरौलिया जाट क्षेत्रीय के नाम से सम्बोधित किये जाने लगे.[7] (Ojha, p.34)

बमरौलिया जाटों का ऐसाह की और पलायन :दिल्ली सुलतान फरोजशाह तुगलक के शासनकाल में सन 1367 में आगरा सूबेदार मुनीर मुहम्मद था. उस समय बमरौली कटारा का जागीरदार रतनपाल बमरौली कटारा छोड़कर अपने मित्र तोमर राजा के पास ऐसाह (वर्तमान मुरैना जिले की अम्बाह तहसील में राजस्थान सीमा के पास चाम्बल किनारे गाँव, दिल्ली से पूर्व यहाँ तोमरों की राजधानी थी) पहुंचा. जहाँ वह तोमरों के प्रमुख सामंत के रूप में स्थापित हुए.[8] तोमर सम्राट देव वर्मा द्वारा रतनपाल बमरौलिया को पचेहरा (जटवारा) निवास हेतु प्रदान किया गया. (Ojha, p.35)

पचेहरा से बगथरा आगमन - केहरी सिंह बमरौलिया (1390-1395) को ऐसाह के तोमर राजा वीरसिंह देव (1375-1400) के शासनकाल में अपनी वीरता प्रदर्शित करने का अवसर मिल गया. उस समय 1394 में वीरसिंह देव ने ग्वालियर दुर्ग पर दिल्ली सुलतान की ओर से नियुक्त अमीर को पराजित कर ग्वालियर में तोमर राजवंश की नींव डाली. 4 जून 1394 को दिल्ली सुलतान नसीरुद्दीन मुहम्मद को पराजित कर ग्वालियर में स्वतंत्र तोमर राज्य स्थापित किया.[9](Ojha, p.35)

वीरसिंह देव तोमर ग्वालियर के प्रथम स्वतंत्र तोमर शासक बने. तोमर राजा वीर सिंह देव तथा दिल्ली सुलतान के मध्य हुए युद्ध में केहरी सिंह बमरौलिया ने वीरसिंह देव का साथ दिया. केहरी सिंह की जाट सेना की छापामार युद्ध प्रणाली की भयंकर मार से सुलतान की सेना भाग खड़ी हुई थी. जब वीरसिंह देव ग्वालियर के स्वतंत्र राजा बन गए तब केहरी सिंह को बगथरा गाँव निवास हेतु प्रदान किया. [10] (Ojha, p.35)

स्थानीय जाटों से वैवाहिक सम्बन्ध - बगथरा गाँव में बसने के बाद इन बमरौलिया जाटों ने स्थानीय बिसोतिया गोत्र के जाटों से वैवाहिक सम्बन्ध बनाये तथा अपने बल में वृद्धि की.[11] (Ojha, p.35)

जाट संघ - केहरी सिंह बमरौलिया ने बगथरा में निवास करने के दौरान स्थानीय जाटों का एक संगठन बनाया और तोमर राजा का युद्धों में साथ देकर उनका विश्वासपात्र बन गया. इस प्रकार ये बमरौलिया जाट तोमर राजाओं के प्रमुख सामंत बन गए. [12] (Ojha, p.36)


External links

References

  1. Kannu Mal, Dholpur Rajya Aur Dhaulpur Naresh,p.8
  2. Harihar Niwas Dwivedi, Dilli Ke Tomar, p.240-241
  3. Kannu Mal, Dholpur Rajya Aur Dhaulpur Naresh,p.8
  4. Mohan Lal Gupta, Jaipur: Jilewar Sanskritik Evam Aitihasik Adhyayan, p.248-249
  5. Kannu Mal, Dholpur Rajya Aur Dhaulpur Naresh,p.8
  6. Kannu Mal, Dholpur Rajya Aur Dhaulpur Naresh,p.8
  7. Kannu Mal, Dholpur Rajya Aur Dhaulpur Naresh,p.8
  8. Mohan Lal Gupta, Jaipur: Jilewar Sanskritik Evam Aitihasik Adhyayan, p.175
  9. Harihar Niwas Dwivedi, Dilli Ke Tomar, p.30
  10. Kannu Mal, Dholpur Rajya Aur Dhaulpur Naresh,p.9
  11. Kannu Mal, Dholpur Rajya Aur Dhaulpur Naresh,p.9
  12. Mohan Lal Gupta, Jaipur: Jilewar Sanskritik Evam Aitihasik Adhyayan, p.175

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