Karma Bai

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Author: Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क
Karma Bai (20.8.1615 - 25.7.1634)

Karmabai (20.8.1615 - 25.7.1634) (करमा बाई) was a famous Jat woman from village Kalwa, in Nagaur district, Rajasthan. She was popularly known as Bhakt Shiromani Karmabai. She was a strong devotee of Lord Krishna.

Birth

She was born on 20 August 1615 (bhadwa badi ekam) in the family of Jiwanji Dudi and Ratni Devi in the village Kalwa situated in Nagaur district. She was a strong devotee of Lord Krishna. Karma Bai has mentioned her birth place Anandpur in Maru Pradesh which is same as Kalwa. There was heavy rain fall when she was born. [1]

Her faith

She had abiding faith in the worship of Shri Krishana.It is believed that she had offered 'Khichada' to Lord Krishna. A folk song tells like this -

Thali bhar'r lyayi khichado upar ghee ki batki !

Jeemo mhara syam dhani jeemavai beti Jat ki !!

Karmabai took a living Samadhi in Samvat 1691 (25.7.1634).

There is a temple of Karmabai Ka Mandir at Jagannathpuri.

Temples

See also

  • Kalwa for the history of village Kalwa.

करमा बाई का जीवन परिचय

जन्म : करमा बाई का जन्म कालवा गाँव के किसान जीवनराम डूडी के घर माता रतनी देवी की कोख से भादवा बदी एकं अर्थात 20 अगस्त 1615 ई. को हुआ।[2][3] कर्मा बाई के पिता चौधरी जीवणराम डूडी ईश्वर में बहुत आस्था रखने वाले व्यक्ति थे। उनका नित-नियम था कि जब तक भगवान कृष्ण की मूर्ति को जलपान नहीं कराते तब तक स्वयं भी जलपान नहीं ग्रहण करते थे। उन्होने ईश्वर प्राप्ति के लिए अनेक तीर्थों का भ्रमण किया था। [4]

करमां बाई ने पर्ची में जन्म स्थान मरूप्रदेश का आनंदपुर बताया है जो कालवा ही है। उसके जन्म पर मूसला धार बरसात हुई थी। जिससे गाँव में खुशियाँ फ़ैल गयी थी। करमा बाई पैदा होते ही हंसी थी जो एक चमत्कार था। एक बूढी दाई ने तो कहा कि यह बालिका ईश्वर का अवतार है.[5]

करमा बाई का विवाह: करमा बाई का विवाह सोऊ गोत्र में गाँव मोरेड़ वाया बिदियाद (नागौर) कर दिया गया था। [6][7] [8] परन्तु थोड़े ही समय में वह विधवा हो गयी और आजीवन बाल विधवा के रूप में ही अपना जीवन भगवान की भक्ति में व्यतीत किया।

मनसुख रणवा के अनुसार करमा बाई का विवाह छोटी उम्र में ही अलवर जिले के गढ़ी मामोड गाँव में साहू गोत्र के लिखमा राम के साथ कर दिया। कुछ ही समय बाद पति की मृत्यु हो गयी। करम बाई उस समय कालवा में ही थी। उनका अंतिम संस्कार करने के लिए वह ससुराल गाढ़ी मामोड चली गयी। वह घर और खेत का सारा काम करती थी। अतिथियों की खूब आवभगत करती थी। कालवा ही नहीं आस-पड़ौस के गाँवों में उसकी प्रसंसा होने लगी।[9]

करमा बाई का भगवान को खिचड़ी खिलाना : एक लोक गीत से पता चलता है की इनके पिता भगवान के बड़े भक्त थे और उनको भोग लगा कर ही भोजन ग्रहण करते थे। एक दिन इनके पिता तीर्थ-यात्रा पर गए और भगवान की पूजा अर्चना व भोग लगाने की जिम्मेदारी बाई कर्मा को सौंप गए। दूसरे दिन भोली करमाँ ने खिचड़ी बनाकर भगवान् को भोग लगाया तो भगवान ने ग्रहण नहीं किया। तब करमा बाई ने सोचा कि शायद परदा न होने के कारण भगवान भोग नहीं लगा रहे हैं। उसने अपने धाबलिये (घाघरे) का परदा किया और मूंह दूसरी तरफ फेर लिया, ताकि भगवान् भोग लगा सके। फिर भी नतीजा कुछ न निकला। उसने भगवान से फिर कहा, "भगवान् आप भोजन नहीं करते तो मैं भी नहीं खाऊँगी।" करमा उस दिन भूखी रह गयी। उसने दूसरे दिन फिर खिचड़ी बनाई और घाघरे का परदा करके भगवान के फिर से भोग लगाया। दूसरे दिन भी कोई नतीजा नहीं निकला। तब उसने कहा कि यदि आप नहीं खायेंगे तो मैं न तो खिचड़ी खाऊँगी और न भोग लगाऊंगी। भूखी रहकर प्राण त्याग दूँगी। इस तरह तीन दिन बीत गए। तीसरे दिन भगवान् ने करमाँ को स्वप्न में कहा , "उठ ! जल्दी से खिचड़ी बना, मुझे बड़ी भूख लगी है। " [10] [11]

करमा बाई हडबड़ा कर उठी, जल्दी से खिचड़ी पकाई और परदा कर के भगवान के भोग लगाया। थोड़ी देर में देखा कि भगवान सारी खिचड़ी खा गए हैं। करमा बाई का खुसी का ठिकाना न रहा। अब वह नित्य प्रति भगवान को खिचडी का भोग लगाने लगी और बालरूप में भगवान आकर उसकी खिचडी खाने लगे। यह करमा बाई के भक्ति की चरम सीमा थी।

करमा बाई के घर भगवान द्वारा स्वयं आकर भोजन करने की बात दिन दूनी रात चौगुनी चारों तरफ फ़ैल गयी। [12]नाभादास कृत भक्तमाल में करमा बाई के सम्बन्ध में इस प्रसंग का उल्लेख मिलता है। चारण ब्रह्मदास दादूपंथी विरचित 'भगत माल' में भी इसका उल्लेख इस प्रकार है-

जिमिया खीच करमां घिरे ज्वार का
बडम धिन द्वारिका तणा वासी

काफी दिनों बाद जब करमा बाई के पिता तीर्थ यात्रा पूरी करके वापिस लौटे तो उन्हें यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि प्रभु रोज करमा बाई की खिचड़ी खाने आते हैं। वह भी अपनी आँखों से भगवान के दर्शन कर धन्य हुए।[13][14]

करमा बाई की प्रसिद्धी: इस तरह करमा बाई के प्रेम में बंधे भगवान जगन्नाथ को भी प्रतिदिन सुबह खिचड़ी खाने जाना पड़ता था। अत: प्रभु जगन्नाथ के पण्डितों ने इस समस्या के समाधान के लिए राजभोग से पहले करमा बाई के नाम से खिचड़े का भोग प्रतिदिन जगन्नाथपुरी के मंदिर में लगाने लगे ताकि भगवान को जाना न पड़े। आज भी जगन्नाथपुरी के मंदिर में करमा बाई की प्रीत का यह ज्वलंत उदहारण देखने को मिलता है जहाँ भगवान के मंदिर में करमा बाई का भी मंदिर है और उसके खीचड़े का भोग प्रतिदिन भगवान को लगता है। परचीकार ने लिखा है -

करमां के घर जीमता, जो न पतीजो लोक।
देखो जगन्नाथ में, अज हूँ भोग।
मलुक को टुकरो बंटे, वटे कबीर की पाण।
करमांबाई रो खीचड़ो, भोग लगे भगवान।।

करमांबाई की भक्ति की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। करमांबाई ने अपनी पूरी जिंदगी भगवान की भक्ति में व्यतीत कर दी। करमांबाई की भक्ति का परिणाम है कि आज भी राजस्थान में उनकी वात्सल्य भक्ति के किस्से लोगों की जुबान पर हैं। महिलायें कृष्ण मंदिरों में करमांबाई के खीचड़ले से सम्बंधित भजन भक्ति भाव से गाती हैं। इस तरह करमांबाई अपनी अनूठी वात्सल्य भक्ति के कारण इस संसार में प्रसिद्धि प्राप्त कर संवत 1691 (25.7.1634 ई.) में एक दिन परमात्मा में विलीन हो गयी। वह भगवान में आस्था रखने वालों के लिए एक सन्देश छोड़ गयी कि बाह्य शुद्धता के स्थान पर आत्मा की शुद्धता तथा भगवान से सच्ची प्रीत से प्रभु की प्राप्ति सम्भव है।

करमांबाई अपने भोलेपन की भक्ति के बल वह आज भी ऐसी औरतों के लिए उदाहरण बनी हुई है जो आचार-विचार के बिना भगवान में सच्ची प्रीति रखती हैं। करमांबाई वास्तव में सच्ची प्रीति का प्रतीक थी, जैसे कि परचीकार ने लिखा है -

करमां कुल में जाटणी, नरतन को अवतार।
प्रेम प्रीत की पूतली, सिरजी सिरजणहार।।

करमांबाई मंदिर

करमांबाई मंदिर कालवा

कालवा में मंदिर: चन्द्र प्रकाश डूडी [15] ने लेख किया है कि करमांबाई की भक्ति को ध्यान में रखते हुए उसके प्रभु में विलीन होने के बाद उस समय के जाट समाज ने उसके जन्म स्थान कालवा में मंदिर बनाना चाहा, परन्तु उस ज़माने में राजपूत ठाकुरों का राज होने के कारण मंदिर नहीं बनाने दिया। ठाकुर यह नहीं चाहते थे कि जाटों की कोई औरत पूजनीय हो न ही यह चाहते थे कि इस समाज में कोई इतना सम्मान पाए कि वह महान हो कर इतिहास के पन्नों में अमर हो जाये। ठाकुरों ने उसकी भक्ति को उजागार नहीं होने दिया। यही कारण है था कि कुछ वर्ष पूर्व तक सिवाय जगन्नाथपुरी के कहीं पर भी करमांबाई का कोई मंदिर नहीं था।[16]

चन्द्र प्रकाश डूडी [17] ने लेख किया है कि वह स्वयं कालवा गाँव के रहने वाले हैं और तन-मन-धन से मंदिर बनाने के लिए तैयार हुये। कालवा गाँव में सड़क के किनारे गाँव के ही भूतपूर्व सरपंच, सैनिक और स्वतन्त्रता सैनिक गुमाना राम डूडी ने अपनी जमीन माँ कर्मा बाई के मंदिर के नाम करदी। जनसहयोग से अब यह मंदिर बन चुका है।

करमा बाई का लोक गीत

थाली भर कर लाई रे खीचड़ो, ऊपर घी की बाटकी।
जीमो म्हारा श्यामधणी, जीमावे बेटी जाट की।।
बाबो म्हारो गाँव गयो है, कुण जाणै कद आवैलो।
बाबा कै भरोसे सावरा, भूखो ही रह ज्यावैलो।।
आज जीमावूं तन खीचड़ो, काल राबड़ी छाछ की। जीमो म्हारा.....
बार बार मंदिर ने जड़ती, बार-बार पट खोलती।
जीमै कैयां कोनी सांवरा, करड़ी करड़ी बोलती।।
तू जीमै जद मैं जीमू, मानूं न कोई लाट की ।। जीमो म्हारा.....
परदो भूल गयी रे सांवरिया, परदो फेर लगायो जी।
धाबलिया कै ओले, श्याम खीचड़ो खायोजी।।
भोला भक्ता सूं सांवरा, अतरी काँई आंट जी। जीमो म्हारा.....
भक्त हो तो करमा जैसी, सांवरियो घर आयोजी।।
भाई लोहाकर, हरख-हरख जस गायोजी।
सांचो प्रेम प्रभु में हो तो, मूर्ती बोलै काठ की ।। जीमो म्हारा.....

अधिक जानकारी के लिये पढ़ें

राजस्थान के जाटों का इतिहास, 2010, पृ.142-150 लेखक: डॉ पेमा राम. उपरोक्त जानकारी के अलावा पुस्तक में करमा बाई की परची, अनेक दोहे तथा चौपाईयां दी गयी हैं।

बाहरी कड़ियाँ

करमा बाई की चित्र वीथी

References

  1. मनसुख रणवा:'राजस्थान के संत - शूरमा एवं लोक कथाएं', 2010, पृ. 1
  2. Chandra Prakash Dudi: Jat Bandhu, Agra, 25.1.1995
  3. सुखवीर सिंह दलाल:जाट वीरांगनाएं, दिल्ली, 1995 ई., पृ.146
  4. Chandra Prakash Dudi: Jat Bandhu, Agra, 25.1.1995
  5. मनसुख रणवा:'राजस्थान के संत - शूरमा एवं लोक कथाएं', 2010, पृ. 1
  6. Chandra Prakash Dudi: Jat Bandhu, Agra, 25.1.1995
  7. सुखवीर सिंह दलाल:जाट वीरांगनाएं, दिल्ली, 1995 ई., पृ.146
  8. डॉ पेमा राम: राजस्थान के जाटों का इतिहास, पृ.142
  9. मनसुख रणवा:'राजस्थान के संत - शूरमा एवं लोक कथाएं', 2010, पृ. 1
  10. Chandra Prakash Dudi: Jat Bandhu, Agra, 25.1.1995
  11. डॉ पेमा राम: राजस्थान के जाटों का इतिहास, पृ.142-144
  12. Chandra Prakash Dudi: Jat Bandhu, Agra, 25.1.1995
  13. Chandra Prakash Dudi: Jat Bandhu, Agra, 25.1.1995
  14. सुखवीर सिंह दलाल:जाट वीरांगनाएं, दिल्ली, 1995 ई., पृ.147
  15. Chandra Prakash Dudi: Jat Bandhu, Agra, 25.1.1995
  16. सुखवीर सिंह दलाल:जाट वीरांगनाएं, दिल्ली, 1995 ई., पृ.147-148
  17. Chandra Prakash Dudi: Jat Bandhu, Agra, 25.1.1995

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