Sahu

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Sahu

(Sau, Sou, Sehu, Sohu, Sohua, Sohal, Sohar)

Location  : Haryana, Punjab, Madhya Pradesh and Rajasthan

Country  : India, Pakistan, Afghanistan

Languages : Haryanvi, Punjabi, Rajasthani

Religion  : Hinduism

Sahu (सहू) Sau (सऊ)[1] Sou (सोऊ) Sehu (सेहू)[2] Sohu (सोहू) Sohua (सोहुआ) Sohal (सोहल) Sohar (सोहर) Sahu (साहू)[3] is Gotra of Jats found in Haryana, Punjab, Madhya Pradesh and Rajasthan. They are found in Pakistan also. Sahu clan found in Afghanistan.[4] They were supporters of Chauhan Confederacy.

Villages founded by Sahu clan

History

Ram Swarup Joon[5] writes that Sohal, Sohar, Sahu gotras are Chandravanshi.

There is reference to Sohar Kings in the Mahabharata. They are found in large number in the desert areas. In Western Punjab they are Muslim Jats.

The Sahu Jats are found in villages Basain in Gurgaon and 360 villages in district of Ganganagar of Bikaner State.


They have been the rulers of a small republic in Jangladesh. Their capital was at village Dhansia (धाणसिया), situated in Hanumangarh district at a distance of 65 km in Northwest of Churu town in Rajasthan. [6]There were 84 villages in their territory.[7], [8]

Dr Pema Ram writes that after the invasion of Alexander in 326 BC, the Jats of Sindh and Punjab migrated to Rajasthan. They built tanks, wells and Bawadis near their habitations. The tribes migrated were: Shivis, Yaudheyas, Malavas, Madras etc. The Shivi tribe which came from Ravi and Beas Rivers founded towns like Sheo, Sojat, Siwana, Shergarh, Shivganj etc. This area was adjoining to Sindh and mainly inhabited by Jats. The descendants of Shivi in Rajasthan are: Seu, Shivran, Shivral, Sihot, Sinwar, Chhaba etc. [9]

सहू गोत्र का इतिहास

सहू गोत्र बहुतायत से राजस्थान के श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, जोधपुर और नागौर जिलों में पाया जाता है। हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील में इनके इकट्ठे 85 गाँव हैं। यहीं 12 वीं सदी में इनका छोटा सा स्वतंत्र राज्य था, जिसकी राजधानी धानसिया थी। यहाँ पर इनके 52 कुएं थे जिनसे पड़ौस के गाँव पीने का पानी लेजाते थे।

सहू गोत्र का प्रभावशाली शासक श्रीकर्ण था। इसी वंश के अमरसी हुए जिनको आमतौर पर अमरा कहा जाता था। वह हेमछत का पौता था। अमरा बादशाह अकबर का समकालीन था। अमरा ने बादशाह अकबर को कर देना बंद कर दिया था। कहते हैं की अकबरने बीरबल की सहायता से अमरा से संधी की थी। तब से कहावत प्रचलित है –

धानसिया दिल्ली के जोड़े, अमरा सहू अकबर ।
उसका दादा हेमछत, उसका दादा बाबर ।। [10]


सहू गोत्र की एक छोटी सी सेना थी, जिसमें 80 घुड़सवार थे। सहू गोत्र के प्रमुख गढ़ हैं – धानसिया, दुरजाना, भाड़ंग (चुरू)[11]


भाड़ंग (चुरू) में इनके किले के खंडहर अभी भी मौजूद हैं। कहते है जब यह किला बनाया गया तब एक सारण गोत्र के जाट की बली दी गई थी। इस पर सारण और सहू लोगों में लड़ाई हुई जिसमें सारण विजई हुये। तब से सहू लोग गाँव छोडकर इधर-उधर चले गए। इनमे से कुछ बीबीपुर (जींद), मदनहेड़ी (हिसार) व रानीला (भिवानी) में बस गए। कुछ परिवार उत्तरप्रदेश के मेरठ जिले में आबाद हुये। कुछ मुसलमान बन गए जो अब शहीवाल पाकिस्तान में आबाद हैं। कुछ सिक्ख और बिश्नोई भी बन गए। [12]

संदर्भ – डॉ. जयसिंह सहू, जाट समाज आगरा , जुलाई 2015, पृ. 17

सारणों की राजधानी भाड़ंगाबाद

चूरू जनपद की तारानगर तहसील के उत्तर में साहाबा कस्बे से 9 किलोमीटर दक्षिण में वर्तमान में आबाद भाड़ंग गांव कभी पूला सारण की राजधानी भाड़ंगाबाद के नाम से आबाद थी। मौजूदा भाड़ंग गांव के उत्तरी-पूर्वी कोने में 2-3 किलोमीटर दूर यह पुराना भाड़ंगाबाद पूला सारण की राजधानी आज खंडहर के रूप में अवस्थित अपनी करुण कथा सुना रही है। यहां पूरी तरह से खंडहर हो चुके गढ़ के अवशेष तथा आबादी बसी हुई होने के अवशेष के साथ साथ पीने के पानी के लिए बनाए गए पुराने कुए, कुंड तथा तालाब के चिन्ह भी अपनी उपस्थिति बताते हुए दूर-दूर तक मलबे के ढेर बिखरे पड़े हैं जो कभी विशाल आबादी होने का एहसास दिला रहे हैं। भाड़ंगाबाद का यह गढ़ बहुत बड़ी लंबाई-चौड़ाई में बनाया हुआ था जिसमें 12 गांव आबाद थे। इसके साक्ष्य दूर-दूर खेतों में बिखरे पड़े पुराने मकानों के मलबे के ढेर के ढेर दिखाई देते हैं। यह भी साक्ष्य दिखाई देते हैं कि यहां कभी बहुत बड़ी आबादी गढ़ के परकोटे में दुश्मनों के हमलों से बचाव के साथ आबाद थी। इसी गढ़ के पुराने मलबे के ढेर पर विस्थापित भोमिया जी का छोटा सा मंदिर (थान) बना हुआ है। यह है भोमिया जी वही सारण था जो सहूओं का भांजा था, जिसे सहूओं ने गढ़ की नींव में जीते जी दे दिया था। जिसका नाम पीथा सारण बताया जाता है। यह भूमि अब श्री मालसिंह सुपुत्र विशाल सिंह राजवी (राजपूत) के कब्जे में है।

पीथा सारण: अमर शहीद पीथा की करुण गाथा इस प्रकार किंवदंती के रूप में बताई जाती है। कहते हैं कि सहूओं की एक लड़की सारणों के ब्याही थी जिसका पीहर भाड़ंगाबाद तथा ससुराल सहारनपुर था। वह विधवा हो गई तथा उसके एक लड़का था जो दिव्यांग था। विधवा अवस्था में वह पीहर भाड़ंगाबाद में ही अपने परिवारजनों के साथ रहकर अपना समय व्यतीत करती थी। इधर सहू लोगों ने गढ़ बनाना शुरू किया तो जितना गढ़ वे दिन में चिनते उतना ही वापस ढह जाता। सहू बड़े चिंतित हुए। उन्होंने उस समय के तथाकथित जानकार साधु महात्मा आदि से पूछा कि क्या उपाय किया जाए जिससे यह गढ़ पूर्ण हो सके। किसी ने जानकारी दी कि यह गढ़ एक व्यक्ति का बलिदान मांगता है। एक व्यक्ति को जीते जी इसके नींव में चुना जावे तो यह गढ़ निर्विघ्न पूर्ण हो जाएगा। सब लोगों से पूछा गया, कोई भी व्यक्ति तैयार नहीं हुआ। तब यह तय हुआ कि अपना भांजा पीथाराम दिव्यांग व्यक्ति है उसको ही क्यों न नींव में दे दिया जावे। मां के लिए बेटा बहुत ही प्यारा होता है। पीथा राम की मां अबला थी, उसका कोई जोर नहीं चला। उसके कलेजे के कोर, अपने रहे सहे जीवन के सहारे को अपने आंखों के सामने जीते जी गढ़ की नींव में चिन दिया गया। पीथाराम की मां मजबूरी में अपने दिन काटती रही।

एक दिन पीथाजी की मां जोहड़ पर पानी लाने गई। वहां पर एक प्यासा सारण जाट पानी पीने के लिए आ गया। उसने पिथा की माता से पानी मांगा। तब पिथा की मां ने राहगीर का परिचय पूछा तो उसने बताया कि मैं सारण गोत्र का जाट हूँ। पीथा की मां ने कहा कि अभी सारण धरती पर जिंदा भी हैं? सारण ने पूछा ऐसी क्या बात हो गई। तब पिथा की मां ने सारी कहानी बताई। सारण वहां से बिना पानी पिए सीधा सहारनपुर पिथा के परिवार वालों को यह खबर देने चला गया। इधर सहू जाटों ने गढ़ की चिणाई कर निर्माण कार्य पूर्ण कर लिया।

सारणों और सहू जाटों का युद्ध: सारणों का निकास सहारनपुर से होना बताया जाता है। मंगलाखेजड़ा दो भाई थे। जो पिथाराम की मां के देवर के लड़के थे। अतः पिथा की मां उनकी काकी (चाची) लगती थी। वे कोलायत स्नान का बहाना बनाकर लंबी-चौड़ी फौज लेकर आए और भाड़ंगाबाद में ठहर गए। मंगला-खेजड़ा ने अपनी चाची से सलाह-मशविरा करके सहू जाटों को निमंत्रण दिया कि आपने नया गढ़ बनाया है तो इस खुशी में हम आपको भेज देंगे। भोज की तैयारी के समय नगाड़ा बजेगा तब गढ़ का गेट बंद हो जाएगा। बाहर वाले बाहर वह अंदर वालों को भोजन कराने के बाद बाहर वालों का नंबर आएगा। नगाड़े इस खुशी में जोर जोर से बजते रहेंगे। इधर मंगला-खेजड़ के साथियों ने हथियारों से लैस हो गढ़ में भोजन कराने वाले व्यक्तियों के रूप में घुसेड़ दिया। जब सारे सहू अंदर आ गए तो गढ़ का गेट बंद कर नगाड़े बजाने शुरू कर दिए। अंदर मारकाट शुरु हो गई। रोने-चीखने-चिल्लाने की आवाजें नगाड़ों के स्वर में सुनाई नहीं दी। बचे हुए सहू गढ़ छोड़कर धानसिया गांव में भाग गए जो अब नोहर-सरदारशहर सीमा पर स्थित है। वहां अपनी राजधानी बनाई। इस प्रकार भाड़ंगाबाद के इस सहूओं के गढ़ पर कब्जा कर अमर शहीद पिथा के बलिदान का बदला सारणों ने ले लिया। आगे चलकर यह भाड़ंगाबाद पूला सारण की राजधानी बनी जिसमें 360 गांव आबाद थे।

सारण लोग गढ़ पर कब्जा होने के पश्चात भाड़ंगाबाद में नहीं बसे। नोहर तहसील के जोजासर गांव के पास बैर नाम की गैर आबाद रेख है, उस में बसे थे जो बाद में गैर आबाद हो गई। खेजड़ ने सहूओं को शरण दी थी तब उसे श्राप मिला था कि तेरे नाम से कोई खेड़ा नहीं बसेगा। खेजड़ ने खेजड़ा गांव तहसील सरदारशहर में एक ही बसाया था।

पूला सारण: पूला सारण के बारे में बताते हैं कि यह दो ऐल के थे। पहला पूला सारण ने पूलासर गांव बसाया था, जो बाद में पारीक (पांडिया) ब्राह्मणों को दान में दे दिया था। किंवदंती है कि पूला बड़े लुटेरों के गिरोह में शामिल हो गया था। बादशाह को टैक्स आदि नहीं देता था। बादशाह की बेगम को लूट लिया था। बादशाह ने पकड़ने के लिए पूरी ताकत लगा दी थी। उधर पूला ने गिरफ्तारी से बचने के लिए अपना डेरा दिल्ली में डाल लिया। तीन व्यक्ति उसके साथ ही थे। वह भी साथ ही रहते थे। चमड़े की मसक (भकाल)से यमुना नदी से पानी भरकर लोगों के घरों में डालते थे और अपना पेट पालते थे।

एक दिन घटना ऐसी घटी की पूला के दिनमान ही बदल गए। बादशाह की वही बेगम, जिसे पूला ने लूटा था, वह यमुना में स्नान करने आई थी। वहां उसका पैर फिसल गया और वह पानी में डूब गई। वहां पूला अपने साथियों के साथ पानी भरने आए हुए थे। पूला ने तत्काल नदी में छलांग लगाई और बेगम को नदी से बाहर निकाल लाया। बेगम ने बादशाह को कहा मुझे बचाने वाले को मुंह मांगा इनाम दिया जाए। पूला ने कहा इस बेगम को लूटने वाला भी मैं था और बचाने वाला भी मैं ही हूँ। तब बेगम ने कहा लूटने वाला कसूर माफ कर दिया जाए और मेरी जान बचाने वाले को इनाम दिया जाए। बादशाह ने लूटने का कसूर माफ कर दिया तथा बचाने के लिए मुंह मांगा इनाम देने के लिए कहा। इस पर पूला ने 7 दिन का दिल्ली का राज मांग लिया। बादशाह ने 7 दिन के लिए पूला को दिल्ली का बादशाह बना दिया। पूला ने सात दिन के राज में चमड़े के सिक्के चलाये जिसके बीच में सोने की एक मेख लगाई। चमड़े के सिक्के इसलिए चलाए क्योंकि चांदी व अन्य धातु के सिक्के ढालने में बहुत समय लगता। पूला के पास केवल 7 दिन ही थे।

पूलासर: इधर पूलासर के पारीकों को पता चला तो वे दिल्ली पहुंच गए तथा पूलासर गांव दान में मांग लिया। पूला ने गांव पारीक ब्राह्मणों को दान में दे दिया। 'पूला दादा' के नाम से पूलासर में पूला का मंदिर बना हुआ है। पूला भाड़ंग नहीं आया था।

दूसरा पूला जिसने भाड़ंगाबाद राजधानी बनाई वह कई पीढ़ी बीत जाने पर राजा बना था। पहले पूला ने अपना गाँव दान में देकर अपना नाम अमर कर दिया।

मौजूदा भाड़ंग गांव सुरजाराम जोशी एवं गुणपाल चमार ने बसाया था। सुरजा राम जोशी ने एक जोड़ी खुदवाई जो आज भी सुरजानी जोड़ी कहलाती है।

राव बीका कांधल के राज्य में कांधल राजपूतों ने राज किया। यह पूला सारण राज्य पतन के बाद फिर यह राजवियों के हिस्से में आ गया। 288 बीघा भूमि दे दी गई। 2 बीघा भूमि पर घर बसाने के लिए व एक कुई एवं खेत जाने का रास्ता बीकानेर शासक ने पट्टे पर दे दिया। 1260 बीघा 6000 बीघा भूमि मंडेरणा घोटडा में दी जो भादरा तहसील में पड़ती है। यह गैर आबाद है जो घोटड़ा पट्टा- धीरवास के बीच में पड़ता है।

नोट:- यह संकलन दिनांक 19 दिसंबर 2014 को श्री गणेशराम सारण से भाड़ंग में उनके निवास स्थान पर जाकर किया। श्री गणेश राम ने यह जानकारी अपने भाट एवं पुराने बुजुर्गों से सुनी हुई बताई। गोविंद अग्रवाल द्वारा चूरू का शोधपूर्ण इतिहास में अलग ही विवरण है। चूरू का शोधपूर्ण इतिहास में जाटों के पतन के कारण में मलकी को पूला सारण की पत्नी बताया जाकर उस के अपहरण की कहानी सत्य नहीं है। मलकी पूला सारण की पत्नी न होकर चोखा साहू की पत्नी थी जिसका अपहरण धानसिया गांव में गणगौर के दिन गणगौर के मेले में हुआ था। अतः इस विषय पर सत्य खोज व शोध की आवश्यकता है। भादरा सारणों के बही भाट श्री जसवंत सिंह राव गांव मंडोवरी पोस्ट बड़सिया तहसील परबतसर (नागौर) मोब 9660216254 से जानकारी ली जा सकती है।

संकलनकर्ता - लक्ष्मण राम महला, जाट कीर्ति संस्थान चुरू

सहू पट्टी

चूरू जनपद के जाट इतिहास पर दौलतराम सारण डालमाण[13] ने अनुसन्धान किया है और लिखा है कि पाउलेट तथा अन्य लेखकों ने इस हाकडा नदी के बेल्ट में निम्नानुसार जाटों के जनपदीय शासन का उल्लेख किया है जो बीकानेर रियासत की स्थापना के समय था।

क्र.सं. जनपद क्षेत्रफल राजधानी मुखिया प्रमुख ठिकाने
4. सहू पट्टी 84 गाँव धाणसिया (नोहर) अमरुजी सहू धाणसिया, खुईया, रायपुरा

धाणसिया के सोहुआ

धाणसिया चुरू से लगभग 45 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित था. इस पर सोहुआ जाटों का अधिकार था. दयालदास की ख्यात के अनुसार इनका 84 गाँवों पर अधिकार था और राठोडों के आगमन के समय इनका मुखिया अमरा सोहुआ था. कहा जाता है की पहले भाड़ंग पर सोहुआ जाटों का अधिकार था. किंवदन्ती है कि सोहुआ जाटों की एक लड़की सारणों को ब्याही थी. उसके पति के मरने के बाद वह अपने एकमात्र पुत्र को लेकर अपने पीहर भाडंग आ गयी और वहीं रहने लगी. भाड़ंग के सोहुआ जाट उस समय गढ़ चिनवा रहे थे लेकिन वह गढ़ चिनने में नहीं आ रहा था. तब किसी ने कहा कि नरबली दिए बिना गढ़ नहीं चिना जा सकता. [14] कोई तैयार नहीं होने पर विधवा लड़की के बेटे को गढ़ की नींव में चुन दिया. वह बेचारी रो पीटकर रह गयी. गढ़ तैयार हो गया, लेकिन माँ के मन में बेटे का दुःख बराबर बना रहा. एक दिन वह ढाब पर पानी भरने गयी तो वहां एक आदमी पानी पीने आया. लड़की के पूछने पर जब आगंतुक ने अपना परिचय एक सारण जाट के रूप में दिया तो उसका दुःख उबल पड़ा. उसने आगंतुक को धिक्कारते हुए कहा कि क्या सारण अभी जिंदा ही फिरते हैं ? आगंतुक के पूछने पर लड़की ने सारी घटना कह सुनाई. इस पर वह बीना पानी पिए ही वहां से चला गया. उसने जाकर तमाम सारणों को इकठ्ठा कर उक्त घटना सुनाई. तब सारणों ने इकठ्ठा होकर भाडंग पर चढाई की. बड़ी लड़ाई हुई और अंततः भाड़ंग पर सारणों का अधिकार हो गया. [15] इसके बाद सोहुआ जाट धाणसिया की तरफ़ चले गए और वहां अपना अलग राज्य स्थापित किया. उनके अधीन 84 गाँव थे. [16][17]

Distribution in Rajasthan

Villages in Hanumangarh district

Ardaki, Bashir, Bhagwan, Bhanai, Bolanwali, Chindalia, Dalpatsinghpur, Daulatpura Tibbi, Dhaban, Dhalewal, Dingarh, Dudhwali Dhani, Gheu, Ghotda, Hanumangarh, Jagasari, Jorkiyan, Kanau, Karanpura, Kharsandi, Khedasari, Khuiyan, Kishanpura Utradha, Kuji, Maliya Nohar, Mojgarh, Munnawali Hanumangarh, Nagrana, Nanau, Nuwan, Pacca Saharana, Ramgarh, Ramgarh Ujjalwas, Ratanpura, Rawatsar, Sangaria, Toparia, Ujjalwas,

Villages in Ganganagar district

Ganeshgarh,

Villages in Nagaur district

Dabda, Shyamsar,

Villages in Barmer district

Barmer, Baytoo, Gangavas, Sarnu (सरनू),

Villages in Jalor district

Sahu Ki Dhani,

Villages in Bikaner district

Kuntasar (90), Nakodesar,

Villages in Churu district

Chhapar Churu (2), Dhani Mana, Dholia, Lachhadsar, Raipura Churu, Ramsisar Bhedwaliya, Sahawa, Sardarshahar,

Locations in Jaipur city

Hanuman Nagar, Khatipura, Mansarowar Colony, Murlipura Scheme, Officers Campus, Tonk Road,

Villages in Jaipur district

Jhag (5),

Villages in Jhunjhunu district

Patusar, Sotwara,

Villages in Alwar district

Mojpur,

Villages in Jodhpur district

Bhawi(Bilara), Gagari, Heeradesar (Bhopalgarh), Godawas (Bhopalgarh), Sangaria (Near Jodhpur City),

Distribution in Haryana

Villages in Bhiwani District

Ranila,

Villages in Jind District

Bibipur Jind, Pauli,

Villages in Sirsa District

Bagpurberi, Gigorani, Karamshana, Khari Sureran, Munnawali,

Distribution in Punjab

Barenka, Bhagsar, Karmga,

Distribution in Madhya Pradesh

Villages in Indore District

Sahu Khedi,

Villages in Dewas District

Namanpur,

Distribution in Pakisthan

According to 1911 census[18], It was one of the the principal Muslim Jat clans with population in various districts:

Montgomery District (Sahiwal District) Sahu (1,178),

Amritsar District Sohal (218),

Gurdaspur District Sohal (197),

Shahpur (Sargodha District) District Sohal (810),

Muzaffargarh District Sahu (870),

Bahawalpur State Sahu (1,131),

Notable persons

  • Jagdish M Sahu is notable person of Sahu Jat from Dhani Chhipolai village.
  • Gopal Ram Shahu - Lectures Technical Education. VP. Dabra VIA. Maulasar, Nagaur. Present Address : B-18, CHITRAKOOT VIHAR, TILAWALA, JAGATPURA, JAIPUR. Resident Phone Number : 0141-2758017
  • Amar Singh Sahu - Executive Director, Drillcon (Raj) Pvt Ltd, Date of Birth:5-February-1960, VPO. Sahawa, Teh : Taranagar, Distt. Churu (Raj), Present Address : 142 - 144, Shriram Vihar, Opp. RIICO Mansarovar, New Sanganer Road, Jaipur - 302020 (Raj), Resident Phone Number : 0141 - 2399021, Mobile Number : 9929033350, Email Address : as_sahu@hotmail.com
  • Mahabir Sahu - G M, PARLE BISCUITS PVT. LTD, Date of Birth : 25-August-1962, Village - Dholia, PO - Dadrewa, Dist - Churu, Rajasthan. Present Address : 277-278, Hanuman Nagar Extension, Sirsi Road, Jaipur, Resident Phone Number : 0141-2246205, Mobile Number : 9829069710, Email Address : sahum@parle.biz
  • Hema Ram Sahu - RPS Dy.SP, Date of Birth : 10-January-1960, VPO.- Kuntasar, Teh.-Sri Dungargarh, Dist.-Bikaner, Rajasthan, Present Address : 129, Officers campus Extn., Sirsi road, Jaipur, Resident Phone Number : 0141-2355792, Mobile Number : 9414444811
  • Rajendra Sahu - RJS VPO. Jorkiyan, teh. Dist. Hanumangarh, Present Address:Phone : 01552-264421, Mob: 9414062133, Date of Birth : 15-April-1976
  • Sahib Ram Sahu - RPS ( Retd.), Date of Birth : 3-August-1941, VPO. Jorkiyan, Teh. Dist. Hanumangarh, Present Address:Phone :01552-264421
  • Sh Chaudhary Roopa Ram Sohu - Engineer & Ex-Sarpanch of Dabda Gram Panchayat. They belong to Dhansiya's (Churu) Sahu family.
  • Harish Chandra Sohu - S/O Chaudhary Roopa Ram Sohu is Geologist & posted in G.S.I. He is from Dabda village in Nagaur district.
  • Kheta Ram Sahu - RAS (2012), from Baytu (Baytu, Barmer) [20].
  • Sher Singh Sahu - Retired RTS.Present Address- 2/21 Mukta Prasad colony, Bikaner. Mobile No. 09414663408
  • Jai Singh (Sahu): RAS 2001 batch, OSD UID project in dept of IT, M:+91 9414086221
  • Rahul Sahu: IRS 2011 Batch, From: Jhunjhunu, M: +91 95 30 703695
  • Shivchand Sahu - Advocate, प्रदेश प्रमुख, कानून एवं विधिक विषय विभाग, भारतीय जनता पार्टी, राजस्थान। कार्यालय:C-51, सरदार पटेल मार्ग, सी-सकीम, जयपुर, मो: 94140-72487, Email: advocateshivchandsahu@gmail.com

See also

These are variants of Sahu and need to be merged:

References

  1. O.S.Tugania:Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu,p.60, s.n. 2337
  2. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. स-160
  3. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. स-144
  4. An Inquiry Into the Ethnography of Afghanistan, H. W. Bellew, p.77,92,106,116
  5. Ram Swarup Joon: History of the Jats/Chapter V, p. 103
  6. Mahendra Singh Arya et al: Adhunik Jat Itihas,p.282
  7. GSL Devra, op. cit., Cf. Dayaldas ri Khyat, Part II, pp. 7-10
  8. Jibraeil: "Postion of Jats in Churu Region", The Jats - Vol. II, Ed Dr Vir Singh, Delhi, 2006, p. 222
  9. Dr Pema Ram:Rajasthan Ke Jaton Ka Itihas, p.14
  10. Dr. Jay Singh Sahu, Jat Samaj Agra, July 2015, p. 17
  11. Dr. Jay Singh Sahu, Jat Samaj Agra, July 2015, p. 17
  12. Dr. Jay Singh Sahu, Jat Samaj Agra, July 2015, p. 17
  13. 'धरती पुत्र : जाट बौधिक एवं प्रतिभा सम्मान समारोह, साहवा, स्मारिका दिनांक 30 दिसंबर 2012', पेज 8-10
  14. पंरेऊ, मारवाड़ का इतिहास, प्रथम खंड, पेज 92
  15. गोविन्द अग्रवाल, चुरू मंडल का शोधपूर्ण इतिहास, पेज 112-113
  16. दयालदास ख्यात, देशदर्पण, पेज 20
  17. Dr Pema Ram, The Jats Vol. 3, ed. Dr Vir Singh,Originals, Delhi, 2007 p. 203
  18. Census Of India 1911, Volume XIV Punjab Part 2, by Pandit Narikishan Kaul
  19. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.198
  20. Jat Gatha, September-2015,p. 15

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