Nagavaloka

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Nagavaloka (नागावलोक) (756 A.D.) was a Nagil clan ruler of Medpat in Rajasthan in the eighth century.

History

Nagil are said to be descendants of Nagavanshi mahapurusha Nagavaloka (नागावलोक). [1] [2][3]

Thakur Deshraj[4] mentions that in the ninth century one of their illustrious king named Nagavaloka ruled on the lands of Medapata. He ruled in democratic way through a system a council (rajasabha) and his capital was at Bijolia. The council used to award titles. A Chauhan chieftain named Guyak was awarded the title of 'Veer.[5]

Nagil Jats later ruled Nagaur and Nohar areas in Rajasthan.

Dr. Kielhorn has published an inscription found on a pillar at Pathari, in the Native State of Bhopal in Central India. According to this inscription a king of the Rastrakutas named Parabala was reigning in the Vikrama year 917 = 861 A.D. This Parabala is most probably the father-in-law of Dharmmapaladeva, So if Parabala married his daughter to the Pala king, the latter must have had reigned for a very long time. Parabala and his father were very long-lived men. His father Karkaraja defeated a king named Nagavaloka, who was a contemporary of Chahamana Guvaka I of Sakambhari and one of whose grants is dated in the year 813 of the Vikrama era = 756 A.D. Dharmmapala had a son named Tribhuvanapala, who is mentioned in the Kha'impur grant as the dutaka, and who seems to have died during the lifetime of his father as Dharmmapala was succeeded by his second son Devapaladeva after a reign of about forty years. [6]

नागावलोक

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि ये अपना निकास पंजाब से बतलाते हैं। साथ ही कहते हैं कि उनके नौ राजाओं ने राजपूताने पर राज किया था। अभी यह निश्चय नहीं हुआ कि इनकी राजधानी कहां पर थी। इस समय इनका अस्तित्व जयपुर और यू.पी. के प्रान्तों में पाया जाता है। नागा और नागिलों की भांति जाटों में एक गोत्र नागर भी है। स्यालकोट में नागर जाट अब भी हैं।1 नागरों का असल स्थान नगरकोट में था। जाट लोग आज तक भी नगरकोट की देवी की पूजा के लिए जाते हैं। वे उसी जाट-कन्या के रूप में पूजते हैं। उसके नाम पर कुंवारे जाट लड़के लड़कियों को खिलाते हैं।

नवमी शताब्दी में मेदपाट की भूमि पर इनका नागावलोक नाम का एक राजा राज करता था । इनका वह राजा, अपना शासन, राज-सभा द्वारा करता था। राजधानी उसकी विजौलिया के आस-पास थी। वह राज पूर्ण उन्नति पर था। आजकल की सरकार की भांति इनकी राजसभा उपाधि वितरण करती थी। उन्होंने गूयक नाम के चौहान सरदार को ‘वीर’ की उपाधि दी थी।2

नागौर पर भी एक लम्बे अर्से तक नाग लोगों का शासन रहा था। जिसके कारण वह अहिछत्रपुर भी कहलाता था। नाग लोग आरम्भिक अवस्था में अराजकतावादी और मध्यकाल में प्रजातन्त्री थे। उन्होंने अपने प्रजातन्त्रों की रक्षा के लिए बड़े-बड़े कष्ट सहे थे। उनके समूह के समूह विरोधियों से लड़कर मारे गए। वास्तव में नाग एक समाज था, जिसके विद्वान् आज नागर ब्राह्मण और योद्धा लोग जाटों में पाये जाते हैं। उनके मंत्रि-मण्डल का अधिकांश भाग कायस्थों में शामिल हो गया है। बृज के हिन्दू श्री बलरामजी को शेषनाग का अवतार मान कर पूजते हैं।

References

  1. Dr Mahendra Singh Arya etc,: Ādhunik Jat Itihas, p. 260
  2. IA, Vol. XLII, pp. 57-64
  3. Yasovarman of Kanau,p.123
  4. Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX, 1992, p. 594
  5. Epigraphia Indica, Vol. VII, p. 119-125
  6. The Palas of Bengal by R D Banergi, p. 53

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