Jat History Thakur Deshraj/Chapter IX

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जाट इतिहास
लेखक: ठाकुर देशराज
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नवम अध्याय : राजस्थान के जाट-राज्य

प्राचीन जाट-राज्य और वर्तमान राज-घरानों का वर्णन

राजस्थान का मानचित्र

Contents

राजस्थान का राजपूताना एक भ्रामक नाम

राजस्थान, जिसे कि प्रायः राजपूताने के नाम से पुकारा जाता है, प्राचीन समय में अनेक नामों से, अनेक प्रदेशों में बंटा हुआ था। राजपूत, जिनके नाम से यह प्रान्त आजकल मशहूर है, उनका सातवीं-आठवीं सदी में राजपूताने में आना सिद्ध होता है। सोलहवीं सदी से पहले भी यह देश, एक नाम राजपूताने की बजाय प्रदेश वार अनेक नामों से पुकारा जाता था। इस नाम की बुनियाद अकबर के जमाने में पड़ी, किन्तु प्रचार नहीं हुआ। पूर्ण रूप से राजपूताना नाम का प्रचलन टाड के ‘राजस्थान’ के लिखे जाने के पश्चात् अंग्रेज-सरकार के राज्यकाल में प्रसिद्ध हुआ है। अभी पिछले दिनों, राजपूताना या राजस्थान नाम पर एतराज करते हुए, कुंवर सूआलालजी सैल बी. ए. के विद्यार्थी ने यह भी इच्छा प्रकट की थी कि इसका नाम, संख्या के अनुपात से ‘जाटपूताना’ या जाटस्थान होना चाहिए फिर भी, मैं इस मत का समर्थन नहीं करता कि इस प्रदेश का नाम ‘जाटपूताना’ अथवा ‘जाटस्थान’ रखा जाय। मेरी दृष्टि से उचित यही है कि इस प्रदेश का नाम ‘वीरभूमि’ रख दिया जाय। ‘राजपूताना’ नाम से यह भ्रम उत्पन्न होता है कि यह राजपूतबहुल प्रदेश है अथवा इसके गौरवशाली इतिहास के निर्माण में अनुपमेय भूमिका केवल राजपूतों की रही है, जबकि ऐतिहासिक सत्य यह बताता है कि राजपूतों के साथ-साथ, जाटों, भीलों, अहीरों, गूजरों, मीनाओं तथा कुछ अन्य जातियों ने भी इसके महान इतिहास के निर्माण में योग दिया है। इन सभी जातियों ने अपने नियम-विधानों को सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े संकट और अपमान सहे हैं। साथ ही, वे लाखों की संख्या में, आन और मान की रक्षा के लिए, बलिदान भी हुए हैं। भीलों के त्याग और वीरता भुलाने की चीज नहीं है। उदयपुर को ‘हिन्दुआं सूरज’ की उपाधि दिलाने में भीलों का जो खून बहा था, उसका मूल्य कौन चुका सकता है?


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-587


जाटों ने आरम्भ से अन्त तक, विदेशियों से लोहा लिया और गूजरों ने अपने को गाजर-मूली की भांति भीनमाल और अजमेर के क्षेत्र में विदेशियों से लड़कर कटवा दिया था। यह प्रदेश वीर जातियों से भरा पड़ा है। शत्रु से कभी न झुकने वाला चित्तौड़ इस प्रदेश में है तो वहीं रणबांका भरतपुर भी इसी प्रदेश में है, जिसके लिए वियोगी हरि ने ‘वीर सतसई’ में लिखा है-

वही भरतपुर दुर्ग है, अजय दीर्घ भयकारी।
जहं जट्टन के छोकरे, दिए सुभट्ट पछारि॥

इस वीर भूमि पर इन सभी जातियों का एक लम्बे अर्से तक राज्य रहा है। यह सभी जानते हैं कि एक समय कोटा-बूंदी की भूमि पर भीलों का राज्य था और अलवर, जोधपुर तथा अजमेर के बहुत से भू-भागों पर गूजर सरदारी करते थे। जाटों के राज्य के सम्बन्ध में इतना की कहना काफी है कि वे कुछ पहले इस वीर-भूमि के एक बड़े भाग के शासक रह चुके हैं। अब इस अध्याय में जाटों के उन प्राचीन और अर्वाचीन राज्यों का वर्णन करते हैं, जो कि इस प्रदेश की भूमि पर पूर्व समय में अवस्थित थे, अथवा इस समय जाट-जाति का मस्तक ऊंचा कर रहे हैं।

इस समय वीर-भूमि के जाटों की दशा को देखकर यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि कभी इन्होंने शासन किया होगा। कर्नल टाड ने इसी बात को इस भांति लिखा है-

‘जिन जिट वीरों के प्रचण्ड पराक्रम से एक समय सारा संसार कांप गया था, आज उनके वंशधर खेती करके अपना जीवन-निर्वाह करते हैं। उनके देखने से अब यह नहीं ज्ञात होता कि यह प्रचण्ड वीर जिटों के वंशधर हैं।’

किन्तु इतिहास बताता है वास्तव में वे महान् थे और उनके राज्य चाहे वे प्रजातंत्रात्मक रहे हों, चाहे एकतंत्रात्मक, पर वे थे इसी राजस्थान की भूमि पर।

रामचन्द्रपुरा शिलालिपि

कर्नल टाड को, जिट जाति सम्बन्धी, बूंदी राज्य के तीन कोस पूर्व में रामचन्द्रपुरा नामक स्थान में से कूआं खोदते समय पाई गई, एक खोदित लिपि मिली थी। टाड साहब ने उसे लंदन की ‘एशियाटिक सुसाइटी’ की चित्रशाला में भेज दिया था। उसकी प्रतिलिपि उन्होंने अपने ग्रंथ ‘टाड राजस्थान’ में इस प्रकार दी है-

  • यूती वंश में राजा थोत ने जन्म लिया, उनकी यश-किरण समस्त पृथ्वी मंडल पर व्याप्त हुई।
  • राजा चन्द्रसेन पवित्र चित्त, अमित बलशाली और प्रजा समूह के परम-प्रिय पात्र थे, जिन्होंने अपने शत्रुओं को बिलकुल दुर्बल कर दिया और जिन्होंने

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युद्ध में तलवार चलाते समय ऐन्द्रजालिक की भांति विचित्र बाहुबल का परिचय दिया उसका विषय किस प्रकार कहा जा सकता है? प्रजा के प्रति वे बड़ा उदार व्यवहार करते और उस कारण वे शुभमय फल पाते थे। उन विख्यात चन्द्रसेन के औरस से कार्तिक ने जन्म लिया। उन कार्तिक का बाहुबल सर्वत्र विख्यात था। मनुष्य-समाज में उनकी बड़ी प्रशंसा थी। वह अपनी जिन रानी को प्राणों के सरिस चाहते थे उन रानी के विषय में किस प्रकार वर्णन किया जाए? जिस प्रकार अग्नि से शिखा को अलग नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार वह रानी अपने पति के साथ मिलती थी। वे सूर्य-किरण के समान थीं। उनका नाम गुणनिवास था। उनका आचरण उनके नाम के समान था। उन रानी के गर्भ से कार्तिक के माणिक्य के समान भुवनरंजन दो पुत्र उत्पन्न हुये। बड़े का नाम मुकन्द छोटे का नाम दारुक था। उनके सौभाग्य को देखकर शत्रुओं का हृदय विदीर्ण होता था और उनके अनुगामी लोग अनन्त सुख को भोगते थे। देवताओं को जिस भांति कल्पवृक्ष प्यारा है, वैसे ही ये दोनों भ्राता अपनी प्रजा के लिये प्रिय थे। वे प्रजा की प्रार्थना पूर्ण करके जिस वंश में जन्म लिया था, उस वंश की गौरव-गरिमा फैलाते थे। (कर्नल टाड ने यहां कई श्लोक निष्प्रयोजन समझकर उनका अनुवाद नहीं किया)।

  • दारुक के कुहल नाम का एक पुत्र उत्पन्न हुआ । कुहल के औरस से धनुक का जन्म हुआ, उन्होंने बड़े-बड़े कार्य सिद्ध किये। वह मनुष्य के हृदय का भाव अनुभव कर लेते थे। उनका चित्त समुद्र के समान गम्भीर था। उन्होंने पहाड़ी मीना जाति को विताड़ित, परास्त और सर्वथा विध्वंश कर दिया था। उनको फिर कहीं स्थान न मिला। वह अपने छोटे भ्राता दोक के सहित देवता और ब्राह्मणों की पूजा करते थे। उन्होंने अपने धन से अपनी प्राणप्यारी की प्रसन्नता के लिए सूर्य के उद्देश्य से यह मन्दिर स्थापित किया।
  • जब तक सुमेर सुवर्ण बालुका के ऊपर खड़ा है, तब तक यह मन्दिर विराजमान रहेगा। जब तक जगत-दानिणी हथनियों की देह में प्राण रहेगा, जब तक लक्ष्मी धन दान करेंगी, तब तक उनका यश और मन्दिर अक्षय भाव से विराजमान रहेगा।
  • कुहल ने यह मन्दिर और इसके पूर्व पार्श्व में महेश्वर के मन्दिर की प्रतिष्ठा कराई थी। महावली महाराज यशोवर्मा के पुत्र अचल के द्वारा इसकी प्रसिद्धि फैली है।’’ (टाड परिशिष्ट १)


इस शिलालेख के पढ़ने से कम से कम तीन बातें मालूम होती हैं-


पहाड़ी मीना जाति से इनका कब और कहां पर युद्ध हुआ, इसका पता चला


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-589


लेना अवश्य टेढ़ा काम है। यदि हम यह कहें कि मिनण्डर के साथी मीना लागों से जाट नरेश कार्तिक का युद्ध हुआ, तो मानना पड़ेगा कि वे ईसवी सन् 150 वर्ष पहले बूंदी के आस-पास के प्रदेश पर राज्य कर रहे थे। क्योंकि कई इतिहास लेखकों ने भारत पर मिनण्डर के इस आक्रमण का समय ईसवी पूर्व 155 वर्ष माना है।1 उसने चित्तौड़ तक धावा किया था। बहुत संभव है कि इसी आक्रमण के समय महाराज कार्तिक का उनसे युद्ध हुआ हो। इस तरह से उनके वंशज धनुक का समय पहली शताब्दी का आरम्भिक भाग हो सकता है।

इन लोगों तथा इनके मन्दिर की प्रसिद्धि कराने वाले यशोवर्मा के पुत्र अचल के समय पर जब हम ध्यान देते हैं तो इन लोगों का समय ईसवी सन् की तीसरी, चौथी अथवा इससे भी पीछे की सदी मानना पड़ता है, क्योंकि यशोवर्मा नामक नरेश मौखरी वंश में संभूत आठवीं शताब्दी मे कन्नौज का शासक था। उसने 731 ई. में चीन को एक दल भेजा था।2 किन्तु उसके पुत्र का नाम अचल था, ऐसा लेख इस शिलालिपि के सिवाय कोई दूसरा अब तक नहीं मिला है। यदि यशोवर्मा को यशोधर्मा मान लिया जाये तो इन महाराजाओं का समय उनके समय से कुछ ही समय पहले का रहता है, क्योंकि महाराज यशोधर्मा का समय पांचवी, छठी सदी के बीच का है। यशोधर्मा मन्दसौर के जाट-नरेश थे। निकटवर्ती तथा सजातीय होने से यशोधर्मा के पुत्र अचल ने उनकी प्रसिद्धि फैलाई हो यह संभव ही है, किन्तु सुदूरवर्ती (कन्नौज के) यशोवर्मा के पुत्र ने इनकी कीर्ति का प्रचार किया, इसमें दोनों का कोई खास सम्बन्ध होना चाहिये। मौखरी जाट इस समय जाटों में मौजूद हैं। सम्भव है मौखरी यशोधर्मा और कार्तिक के वंशजों में वैवाहिक सम्बन्ध हुआ हो। यदि यह पिछली बात सही है तो कार्तिक के वंशजों का राज छोटे-मोटे रूप में बूंदी के निकटवर्ती प्रदेश पर ईसा की आठवीं सदी तक होना चाहिये। मीना जाति के साथ कार्तिक का जो युद्ध हुआ था, उसे मिनेण्डर के साथियों के साथ मान कर आगे कोई दूसरा युद्ध मानना पड़ेगा। दसवीं सदी तक जयपुर में हम मीनों के छोटे-छोटे राज्य पाते हैं, बहुत संभव है कि ये ही लोग उन पर चढ़कर गये हों।

ऐतिहासिक सामग्री की कमी और छठी सदी के पहले का इतिहास प्रायः अप्राप्त होने के कारण यह निश्चय करने में बाधा पड़ती है कि कार्तिक व उनके पूर्वज और वंशज किस समय में शासक थे। फिर भी हम कह सकते हैं कि उनका समय चौथी और छठी शताब्दी के बीच का है, क्योंकि यशोधर्मा और यशोवर्मा


1. बौद्ध-कालीन भारत (जनार्दन भट्ट कृत) पेज 271।
2. भारत के प्राचीन राजवंश। भाग 2।


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के समय से कुछ पहले उनका राज रहा होगा। तभी तो अचल के द्वारा उनकी प्रसिद्धि फैलाई गई थी।

गौर या गोरा

Text
तस्या प्रणम्य प्रकरोम्यह x x जस्त्रम
(कीर्तिशु) भां गुणा गणोघम (पींन्टपाणाम) (3)
x x कुलो (भद्) वव (ञ् श) गौरा
क्षात्रेप (दे) सतत दीक्षित x शौंडा
x x x
धान्य सोम इति क्षत्र गणस्य मध्ये (4)
... ... ...
x x किल राज्य जित प्रतापो
यो राज्यवर्द्धण (न) गुणै कृत नाम धेयः
x x x
जातः सुतो करि करायत दीर्घ बाहु ।
नाम्ना स राष्ट्र इति प्रोद्धत पुन्य (पय) कीर्ति (6)
सोयम यशो भरण भूषित सर्व गात्रः
प्रोत्फुल पद्मः ......तायत चारु नेत्रः ।
दक्षो दयालु रिह शासित शत्रु पक्षः ।
क्षमां शासति ....यश गुप्त इति क्षितीन्दुः (8)
तेनेयं भूतधात्री क्रतु मिरिहचिता (पूर्व) श्रंगेव भाति
प्रासादे रद्रि तुंगैः शशिकर वषुषैः स्थापितेः भूषिताद्य
नाना दानेन्दु शुभ्रैर्द्विजवर भवनैर्येन लक्ष्मीर्व्विभक्ता ।
x x x स्थित यश वषुशा श्री महाराज गौरः (11)
यातेषु पंचसु शतेष्वथ वत्सराणाम्
द्वे विंशतीसम धिकेषु स सप्तकेषु ।।
माघस्य शुक्ल दिवसे त्वगमत्प्रतिष्ठाम् ।
प्रोत्फुल्ल कुन्द धवलोज्वलिते दश म्याम् (13)
(मूल लेख की छाप से)
Chhoti Sadri Inscription of samvat 547 (491 AD)

आरंभ में ये लोग अजमेर-मेरवाड़े और मेवाड़ तथा बून्दी सिराही के प्रदेश पर फैले हुए थे। अब तो किसी-न-किसी संख्या में सारे उत्तर भारत में पाये जाते हैं। प्राचीन भट्ट लोगों के काव्य-ग्रन्थों में इनको ‘अजमेर के गौर’ नाम से लिखा गया है। इससे ज्ञात होता है चौहानों से पहले ये उस देश में आबाद हुए थे।1

गौर लोगों का एक शिलालेख उदयपुर राज्य के गांव छोटी सादड़ी से दो मील के फासले पर, पहाड़ में भमर-माता के मन्दिर में है। वह ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा में है। पंडित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने उसे देखा है और उसके सम्बन्ध में नागरी-प्रचारिणी-पत्रिका, भाग 13, अंक 1 में ‘गौर नामक अज्ञात क्षत्रिय वंश’ शीर्षक लेख भी लिखा है। उस घिसे हुए और पुराने शिलालेख की पंक्तियां साथ के बाक्स में दी हैं.


1. टाड राजस्थान। छठा अध्याय।


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इन श्लोकों में दो प्रार्थना सम्बन्धी श्लोक हैं। शेष में बताया गया है- महाराज धान्यसोम क्षत्रिय लागों में प्रसिद्ध राजा थे। उनके पीछे राज्यवर्द्धन हुए। राज्यवर्द्धन के पुत्र राष्ट्रों में राष्ट्र-नामक हुए। उनका पुत्र यशगुप्त हुआ। उन गौर नरेश ने संवत् 547 माघ सुदी दसमी (ई. स. 491) को अपने माता-पिता के पुण्य (स्मृति) के निमित्त देवी का मन्दिर बनवाया। इस लेख से स्पष्ट है कि छठी शताब्दी में गौर लोग छोटी सादड़ी के आस-पास राज करते थे। महाराणा रायमल के समय तक वे पूरे शक्तिशाली थे। पं. गौरीशंकर ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ के उसी अंक में लिखते हैं कि-‘‘गौरा-बादल जिनके सम्बन्ध में काव्य भी बन चुके हैं दो व्यक्ति नहीं थे किन्तु बादल ही गौरा था। उसके सम्बन्ध के काव्य 250-300 वर्ष पीछे बने हैं, इसी से ऐसा भ्रम हुआ होगा। गौरा वंश-सूचक और बादल नाम है।’’

गयासुद्दीन (शाह) से राणा रायमल की सन् 1499 ई. में जब लड़ाई हुई तो गौरा ने बड़ी बहादुरी दिखाई। वह कई-कई मुसलमानों को मारता था। उस बुर्ज का ही नाम गौर-श्रृंग (गौर-बुर्ज) रख दिया। उदयपुर के एकलिंगजी के मन्दिर के दक्षिण द्वार के सामने की बड़ी प्रशस्ति में इस लड़ाई और गौरा वीर की वीरता का वर्णन है। चित्तौड़ के किले में गौरा-बादल के महल नाम से दो गुम्बजदार मकान, जो कि पद्मिनी के महलों से दक्षिण की ओर बने हुए हैं, पुकारे जाते हैं।

श्री गौराशंकरजी ओझा अपने उपर्युक्त लेख में लिखते हैं - ‘‘गौर क्षत्रिय वंश का कोई लेख न मिलने और उस वंश का नाम अज्ञात होने के कारण महाराणा रायमल का वृत्तान्त लिखते समय मुझे लाचार होकर और क्षत्रियों को गौड़ क्षत्रिय अनुमान करना पड़ा, जो मुझे अब पलटना पड़ता है।’’ श्री ओझाजी की दृष्टि के


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सामने जाट क्षत्रिय राजवंशों की सूची होती तो उन्हें गौर लोगों को गौड़ लिखने को विवश न होना पड़ना। श्री ओझाजी ही क्या, अन्य अनेक देशी-विदेशी इतिहासकारों ने ऐसी भूलें की हैं। दक्षिण में मामूली स्थिति की एक जाति थी। एक अंग्रेज लेखक ने झट लिख दिया रेड्डी लोग ही राठौर हैं। पंजाब में ‘ओरेटरी’ जाति का पता लगा था। झट दूसरे महानुभाव ने लिख दिया वे अवश्य ही राठौर हैं। खैर! हमारे लिखने का सांराश यह है कि गौर गोरा अथवा गौर जाट क्षत्रिय समुदाय का एक अंग थे, और अब भी राजपूताने में वे इसी नाम से पुकारे जाते हैं। अजमेर के पास ही व्यावर में प्रतापमलजी गोरा को आज भी ढूंढ सकते हैं। गामों से जाकर उनसे पूछिये कि आपकी क्या जाति है? वे कहेंगे गोरा। ब्राह्ममण, बनिये में से क्या है? तब वे कहेंगे जाट। अजमेर-किशनगढ़, उदयपुर और मन्दसौर आदि के जिलों के जाटों से हमें मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। पूछने पर वे अपनी जाति के बजाय वंश (गोत्र) का नाम बताते हैं। यही बात देहाती राजपूतों में भी बहुत अंश में पाई गई। वे भी अपने को राजपूत की अपेक्षा राठोर, गहलौत आदि (वंश का नाम) बताते हैं। यही कारण था कि लोगों ने गोर या गौर को कुछ का कुछ समझने की गलती की।

रणस्तंभपुर (रणथंभौर)

Ranthambore नागिल जाटों द्वारा निर्मित रणथंभौर का किला

रणथम्भोर पर पहले चौहानों का अधिकार था। किन्तु उससे लगभग दो सदी पहले जाटों का अधिकार था। रणथम्भोर में चौहान राजपूत आठवीं सदी से पीछे पहुंचे थे। किन्तु उस समय भी जाटों का जोर कम नहीं हुआ था। भाटों के काव्यों पर यदि हम विश्वास करें तो कहा जाता है कि गौर और नागिल जाटों ने उस स्थान पर बीसियों पीढ़ी राज्य किया था। रणमल नामक एक जाट सरदार ने जिस स्थान पर रणखम्भ गाड़ा था तो आस-पास के राजाओं ने लड़ने की चुनौती दी थी, उसी स्थान पर आज रणस्तंभपुर या रणथम्भोर है। भाग भट्ट चौहान की भी, आस-पास के जाट सरदारों ने मुसलमानों के विरुद्ध सहायता की थी। मुस्लिम-काल में जलालूद्दीन तूनियां जो कि रजिया के दल का था, यहां का शासक बनना चाहता था। रजिया भी रणथम्भोर पर चढ़कर आई। उसने जाटों से सहायता चाही। जब कि वह रणथम्भोर के पास पहुंचने वाली थी कि तूनियां गुलाम सरदार के साथ जाटों का एक बड़ा दल आ गया और वह लौट गई। रजिया ने लौटकर अपनी मर्जीदान के साथ शादी कर ली। अलतूनियां ने बादशाही के जाट-सरदारों की मदद लेकर दिल्ली पर चढ़ाई की।1 जाट बड़ी वीरता के साथ लड़कर इस औरत के लिये काम आये।2


1. तारीख फरिश्ता। उर्दू (नवलकिशोर प्रेस का छपा) पृ. 105, 106।
2. वाकए राजपूताना। जिल्द 3।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-593


नागा और नागिल

ये अपना निकास पंजाब से बतलाते हैं। साथ ही कहते हैं कि उनके नौ राजाओं ने राजपूताने पर राज किया था। अभी यह निश्चय नहीं हुआ कि इनकी राजधानी कहां पर थी। इस समय इनका अस्तित्व जयपुर और यू.पी. के प्रान्तों में पाया जाता है। नागा और नागिलों की भांति जाटों में एक गोत्र नागर भी है। स्यालकोट में नागर जाट अब भी हैं।1 नागरों का असल स्थान नगरकोट में था। जाट लोग आज तक भी नगरकोट की देवी की पूजा के लिए जाते हैं। वे उसी जाट-कन्या के रूप में पूजते हैं। उसके नाम पर कुंवारे जाट लड़के लड़कियों को खिलाते हैं।

नवमी शताब्दी में मेदपाट की भूमि पर इनका नागावलोक नाम का एक राजा राज करता था । इनका वह राजा, अपना शासन, राज-सभा द्वारा करता था। राजधानी उसकी विजौलिया के आस-पास थी। वह राज पूर्ण उन्नति पर था। आजकल की सरकार की भांति इनकी राजसभा उपाधि वितरण करती थी। उन्होंने गूयक नाम के चौहान सरदार को ‘वीर’ की उपाधि दी थी।2

नागौर पर भी एक लम्बे अर्से तक नाग लोगों का शासन रहा था। जिसके कारण वह अहिछत्रपुर भी कहलाता था। नाग लोग आरम्भिक अवस्था में अराजकतावादी और मध्यकाल में प्रजातन्त्री थे। उन्होंने अपने प्रजातन्त्रों की रक्षा के लिए बड़े-बड़े कष्ट सहे थे। उनके समूह के समूह विरोधियों से लड़कर मारे गए। वास्तव में नाग एक समाज था, जिसके विद्वान् आज नागर ब्राह्मण और योद्धा लोग जाटों में पाये जाते हैं। उनके मंत्रि-मण्डल का अधिकांश भाग कायस्थों में शामिल हो गया है। बृज के हिन्दू श्री बलरामजी को शेषनाग का अवतार मान कर पूजते हैं।

जाखड़, सांगवान, शिवराण, सुहाग, भादू, गठवाल

जाखड़


यह गोत्र उन क्षत्रियों के एक दल के नाम पर प्रसिद्ध हुआ है, जो सूर्य-वंशी कहलाते थे। इस गोत्र को जागे (भाट) लोगों ने एक राजपूत के जाटनी से शादी कर लेने वाली बेहूदी दलील के आधार पर राजपूत से जाट होना लिखा है। भाट लोगों की बहियों में कहीं इन्हें चौहानों में से, कहीं उधावतों में से और कहीं सरोहे राजपूतों में से निकला हुआ लिखा है। भाटों की ऐसी बेबुनियाद और बेहूदी गढ़न्तों


1. नागरी प्रचारिणी पत्रिका। भाग 13। अंक 21 पृ. 236।
2. Epigraphia Indica. Vol. VII. P. 119-125


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-594


के सम्बन्ध में पीछे के अध्यायों में काफी लिखा जा चुका है। जाखड़ एक प्रसिद्ध गोत्र है। इसक गोत्र के जाट पंजाब, राजस्थान ओर देहली प्रान्तों में पाये जाते हैं। मि. डब्लयू. क्रुक ने-‘उत्तर-पश्चिमी प्रान्त और अवध की जातियां’ नामक पुस्तक में लिखा है कि “द्वारिका के राजा के पास एक बड़ा भारी धनुष और बाण था। उसने प्रतिज्ञा की थी कि इसे कोई तोड़ देगा, उसका दर्जा राजा से ऊंचा कर दिया जाएगा। जाखर ने इस भारी कार्य की चेष्टा की और असफल रहा। इसी लाज के कारण उसने अपनी मातृ-भूमि को छोड़ दिया और बीकानेर में आ बसा।” जाखर बीकानेर में कहां बसा इसका मता ‘जाट वर्ण मीमांसा’ के लेखक पंडित अमीचन्द शर्मा ने दिया है। जाखड़ ने रिडी को अपनी राजधानी बनाया। भाट के ग्रन्थों में लिखा है कि द्वारिका के राजा के परम रूपवती लड़की थी। उसने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई मनुष्य धनुष को तोड़ देगा, उसी के साथ में लड़की की शादी कर दी जाएगी। साथ ही उसे राजाओं से बड़ा पद दिया जाएगा। जाखड़ सफल न हुआ। जाखड़ एक नरेश था। इस कहानी से यह मालूम होता है कि जाखड़ लोगों का इससे भी पहले अजमेर प्रान्त पर राज्य था, यह भी भाट के ग्रन्थों से पता चलता है। हमें उनके राज्य के होने का पता मढौली पर भी चलता है। मढौली जयपुर राज्य में सम्भवतया मारवाड़ की सीमा के आस-पास कहीं था। उस समय फतहपुर के आस-पास मुसलमान राज्य करते थे। इन मुसलमानों और जाखड़ों में मढौली के पास युद्ध हुआ था। जिला रोहतक में लडान नामक स्थान पर जाखड़ों के सरदार लाड़ासिंह का राज्य था। एक बार पठानों ने उनसे लडान छीन लिया। जाखड़ लोगों ने इसे अपना अपमान समझा और सम्मिलित शक्ति से उन्होंने लडान को फिर पठानों से ले लिया। इस तरह उनके कई सरदारों ने औरंगजेब के समय तक राजस्थान और पंजाब के अनेक स्थानों पर राज किया है। अन्तिम समय में उनके सरदारों के पास केवल चार-चार अथवा पांच-पांच गांव के राज्य रह गये थे।

सांगवान


कहा जाता है कि सांगू के नाम पर उसके साथी सांगवान कहलाये। ये कश्यप गोत्री जाट हैं। आरम्भ में इनका राज्य मारवाड़ के अन्तर्गत सारसू जांगल प्रदेश पर था। इनके पुरखा आदू अथवा आदि राजा से लेकर 13 पीढ़ी तक इनका राज्य सारसू जांगला पर रहा। जिन 13 सांगवान राजाओं ने मारवाड़ के सारसू जांगला प्रदेश पर राज्य किया, उनके नाम क्रमशः इस प्रकार हैं-(1) आदि राजा, (2) युगादि राजा, (3) ब्रह्मदत्त राजा, (4) अतरसोम राजा, (5) नन्द राजा, (6) महानन्द राजा, (7) अग्निकुंमार राजा, (8) मेर राजा, (9) मारीच राजा, (10) कश्यप राजा, (11) सूर्य राजा, (12) सूर्य राजा, (13) शालिवाहक राजा।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-595


इन तेरह जाट राजाओं ने सारसू जांगला में राज किया और राजा की पदवी से भूपित भी रहे।

शालिवाहन के उत्तराधिकारी का नाम लैहर अथवा लहरी था। वह जांगला देश को छोड़कर अपने साथियों समेत अजमेर में आ गया। यहां उसकी पदवी राणा की हो गई। इस समेत नौ पीढ़ी तक सांगवान गोत के जाट नरेशों ने अजमेर की भूमि पर राज्य किया। हमारे मत से लैहर ने जिस स्थान को अपनी राजधानी बनाया था वह वर्तमान का लीड़ी ग्राम हो सकता है। लहैड ने अपने नाम से जो नगर होगा, वह आरम्भ में लैहड़ी रहा होगा और वही वर्तमान में लीडी हो सकता है। इस कुल का अन्तिम राजा संग्रामसिंह अथवा सांगू था। सांगू और उसके साथी मेरवाड़े की भूमि को छोड़कर चर्खी दादरी की ओर चले गये। भाट-ग्रन्थों में जो वंशावली दी गई है, उससे सांगू का समय पन्द्रहवीं-सोलहवीं सदी के बीच का जान पड़ता है और वह शेरशाह सूरी का समय कहा जा सकता है। भाट-ग्रन्थों में सांगू को अब से 20 पीढ़ी पहले लिखा है। औसतन 20 पीढ़ी के 400 वर्ष माने जाते हैं। इसीलिए हमने सांगू को पन्द्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी के मध्य में बताया है। इनका प्रथम राजा जो कि मारवाड़ में सारसू-जांगला पर राज करता था, उस समय आठवीं, दसवी सदियों के बीच का हो सकता था, क्योंकि उसे अब से 50 पीढ़ी पहले बताया गया है।1

शिवराण


राज्य जींद में इस वंश के 25 गांव हैं और लुहारू स्टेट के 52 गांव पूरे शिवराण गोत्र जाटों के हैं। हिसार जिलें में भी अनेक गांव है। भाट लोगों ने लिखा है कि शिवराव नामी राजपूत ने जो अब से 24 पीढ़ी पहले हुआ था, जाटनी से शादी कर ली, इसलिए उसकी सन्तान के लोग शिवराण कहे जाते हैं। इससे भी बड़ा गपोड़ा और क्या होगा कि एक ही आदमी के सिर्फ चौबीसवीं पीढ़ी में सैकड़ों गांव बस गए! हमारा मत है जो कि बिलकुल सही है कि शिवराण-जाट शिवि अथवा सिवोई समूह के जत्थे में से हैं, जो कि शिवि गोत्र अथवा शैव्य जाटों के भाई-बन्धु हैं। मालवा से हटकर जिस समय ये लोग राजस्थान में गए, उस समय इनका एक दल नीमराणे के आस-पास भी पहुंच गया और हुमायूं के समय तक उनका छोटा-मोटा राज इस स्थान पर रहा।

सुहाग


इस वंश के लोग पहले मेवाड़ कोडखोखर नामक स्थान पर सरदारी करते थे।


1. जाट मीमांसा। पेज 22 (ले. अमीचन्द शर्मा)

जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-596


कुछ समय के पश्चात् मारवाड में पहुंचकर एक किला बनवाया उसका नाम अपने सरदार पहलू के नाम पर पहलूकोट (पल्लूकोट) रखा। पल्लूकोट और ददरेड़े के आस-पास कुल भूमि पर आधिपत्य जमा लिया। सरदार पहलू अथवा पल्लू राणा की उपाधि थी। उससे पहले इसी वंश के वीर राणा और वीर राणाओं ने मेदपाट की भूमि पर राज किया था।1

भादू


इस वंश का कुछ वर्णन हम पहले कर चुके हैं। यहां इतना ही बता देना पर्याप्त है कि जांगल देश को भादरा, भादू लोगों ने बसाया था जो आरम्भ में भादरा कहलाता था। संमतराज नाम का राजा बड़ा दानी हुआ है। वह भादू लोगों का एक प्रसिद्ध राजा हुआ है। भागोरे नामक लोगों से उसका युद्ध हुआ था। उस युद्ध के पश्चात् इन लोगों का दल मारवाड़ की ओर चला गया। अजमेर-मेरवाड़े में भी कई गांवों पर इन्होंने अधिकार कर लिया, जो कि अकबर के समय में इसके साथ से निकल गए थे।

गठवाल


हांसी के पास देपाल नामक स्थान में इनका गढ़ था। इन्होंने एक लम्बे अर्से तक देपाल पर राज किया था। कुतुबुद्दीन के समय में हांसी के जाटों ने अपने को स्वतंत्र राजा होने की घोषणा कर दी थी जिससे उन्हें कुतुबुद्दीन से युद्ध करना पड़ा।2 गठवालों को राजपूतों से भी लड़ाइयां लड़नी पड़ीं। उन्होंने मन्दहार राजपूतों के कान तो भली प्रकार ऐंठ दिए थे। यही कारण था कि उन्होंने मलिक की उपाधि प्राप्त की। कल्लानूर राजपूतों को भी मलिक गठवालों ने हरा दिया था। फलस्वरूप राजपूतों ने गठवालों को निमंत्रण दिया और उन्हें बारूद से उड़ा दिया।3 दन्तकथा के अनुसार एक गठवाल स्त्री जो उपस्थित नहीं थी, बच गई और उसी की सन्तान ने देपाल पर अधिकार जमाया।

भूखर, विजयराणिया, गढ़वाल

भूखर


आरम्भ में यह सांभर के निकट आबाद थे। इनके राज्य की शैली भोमिया चोर की थी, किन्तु आगे चलकर अन्य लोगों से यह जमीन का कर लेने लग गए। इससे इनका नाम भूमि-कर लेने से भूकर हुआ। चाहुमान के वंशजों का एक दल


1‘चौधरी गौरव’ नामक हस्त लिखित पुस्तिका से।
2. वाकए राजपूताना जिल्द 3।
3. ट्राइब्स एण्ड कास्ट्स आफ दी नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज एण्ड अवध।


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नवीं शताब्दी में जब सांभर की ओर आया तो इन्हें नये धर्म में दीक्षित चौहानों ने वहां से निकल जाने पर बाध्य कर दिया। कहा जाता है, भूकर और चौहान उस समय तक एक ही थे जब तक कि चौहान लोग आबू के यज्ञ में जाकर नवीन हिन्दू धर्म में दीक्षित न हुए थे। भाट लोगों के हस्त-लिखित ग्रन्थों में लिखा हुआ है कि खेमसिंह और सोमसिंह दो भाई थे। इन्ही की अध्यक्षता में भूकर लोगों ने सांभर प्रदेश को प्रस्थान कर दिया। हिरास नामक स्थान बसाकर खेमसिंह के साथी अपना प्रभाव बढ़ाने लगे। सोमसिंह ने जंगल देश में पहुंचकर भूकर नाम का नगर बसाया। कई पीढ़ियों के बाद इनमें से कुछ लोग पानीपत की ओर चले गए। जिस समय अजमेर और दिल्ली से चौहानों का राज नष्ट हो गया और देहली के तख्त पर बैठकर गुलाम बादशाह शासन करने लगे, उस समय भूकरों के एक लड़ाकू योद्धा उदयसिंह को बख्शी बनाया गया। उदयसिंह योद्धा होने के अलावा भूमि सम्बन्धी प्रबन्ध में बड़ा निपुण था। उदयसिंह का पुत्र कौलासिंह अजमेर का तहसीलदार बनाया गया।

उन दिनों सीकर में प्रदेश पर कालू नाग राज करता था। उसकी राजधानी गोठरा में थी। कालू नाग ने प्रजा की भलाई के लिए एक बड़ा किन्तु कच्चा तालाब भी खुदवाया था। वह देहली के बादशाह की ओर से अपने प्रदेश का माना हुआ मालिक था। उसे अपने राज्य की आय पर बादशाह को खिराज देना पड़ता था। खिराज देने के लिए वह देहली जाया करता था। उसने कौलासिंह को देखा और अपनी लड़की की सगाई उसके साथ कर दी। चूंकि कालू निःसन्तान था, इसलिए गोठरा का प्रदेश उसके धेवते (दौहित्रा) कन्दरसिंह को जो कि कौलासिंह का पुत्र था, मिला। कन्दर के जो पुत्र हुआ उसका नाम डालूसिंह रखा। वह 25 गांवों का सरदार था। बेटे उसके 12 थे। गोठरा गांव में आज तक डालूसिंह की प्रस्तर मूर्ति मौजूद है। डालूसिंह के बेटे का नाम सायरसिंह था। उसके बड़े बेटे का नाम कौलासिंह द्वितीय रखा गया। उसके जो राजकुमार हुआ, उसका नाम नरवद रखा गया। आरम्भ में नरवद अपनी ननसाल रौरू चला गया था। अपने बाप की मृत्यु के पश्चात् इसने गोठरा की सरदारी संभाली। इस प्रदेश पर जब शेखावतों के आक्रमण हुए तो इनका भी छोटा-सा राज्य नष्ट कर दिया गया। किन्तु भविष्य में असन्तोष न बढ़े इसलिए शेखावतों ने ‘करग्राहक’ (तहसील करने वाला अर्थात् लगान लगाने वाला) इन्हीं को रखा। पीछे से इनका दर्जा केवल चौधरी का रह गया। चौधरी की हालत में भी पचोतरा नाम का हिस्सा इन्हें मिलता रहता था। चारागाह के लिए जमीन मुफ्त मिलती थी। जागा (भाट) लोगों के ग्रन्थ को देखने से पता चलता है कि नरवद अब से 11 पीढ़ी अर्थात् लगभग 300 वर्ष पहले पैदा हुए थे। चौधरी रामबक्स उसी के खानदान में से हैं जो कि नरवद से दसवीं पीढ़ी पर है।


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विजयराणिया


विजयराणिया सिकन्दर महान् के समय के प्रतीत होते हैं, यह हम पहले ही लिख चुके हैं। यूनानी लेखकों ने जो कि सिकन्दर के साथ भारत में आये थे, विजयराणिया लोगों का हाल लिखते समय उनके नाम का अर्थ लिख डाला। विजयराणिया यह इनका उपाधिवाची नाम है। रण-क्षेत्र में विजय पाने से इनके योद्धाओं को विजयराणिया की उपाधि मिली थी। जागा (भाट) लोगों ने इन्हें तोमर जाटों में से बताया है। हम उन्हें पांडुवंशी मानते हैं। कुछ लोगों का ऐसा मत है कि तोमर भी पांडुवंशी हैं। भाट लोगों ने इनके सम्बन्ध में लिख रखा है-‘‘सोमवंश, विश्वामित्र गोत्र, मारधुने की शाखा, 3 प्रवर’’। कहा जाता है संवत् 1135 विक्रमी में नल्ह के बेटे विजयसिंहराणिया ने बीजारणा खेड़ा बसाया। फिर संवत् 1235 में लढाना में गढ़ बनवाया। हमें बताया गया है कि लढाने में गढ़ के तथा घोड़ों की घुड़साल के चिन्ह अब तक पाए जाते हैं। उस समय देहली में बादशाह अल्तमश राज्य करता था। अन्य देशी रजवाड़ों की भांति विजयराणिया लोग भी विद्रोही हो गये। इस कारण अल्तमश को उनसे लड़ना पड़ा। इन्हीं लोगों में आगे जगसिंह नाम का योद्धा हुआ, उसने पलसाना पर अधिकार कर लिया और कच्ची गढ़ी बनाकर आस-पास के गांवों पर प्रभुत्व कायम कर लिया। यह घटना संवत् 1312 विक्रमी की है। संवत् 1572 में इस वंश में देवराज नाम का सरदार हुआ। इस समय शेखावतों और कछवाहों के राज्य का विस्तार हो रहा था। जयपुर राज्य के कई स्थानों में ये लोग पाये जाते हैं। इस वंश के लोग बहादुर होते हैं, साथ ही जाति-भक्त भी। यद्यपि इस समय उनके पास राज्य नहीं है, फिर भी वंश गौरव अब तक उनके हृदय में है। उसके उदाहरण मा. भजनलाल अजमेर और चौ. लादूराम गोवर्धनपुरा के हृदयों मे टटोले जा सकते हैं।

गढ़वाल


इनका कुछ वर्णन संयुक्त-प्रदेश के जाटों के इतिहास में हम लिख चुके हैं। गढ़मुक्तेश्वर का राज्य जब इनके हाथ से निकल गया, तो झंझवन (झुंझनूं) के निकटवर्ती-प्रदेश मे आकर केड़, भाटीवाड़, छावसरी पर अपना अधिकार जमाया। यह घटना तेरहवीं सदी की है। भाट लोग कहते हैं जिस समय केड़ और छावसरी में इन्होंने अधिकार जमाया था, उस समय झुंझनूं में जोहिया, माहिया जाट राज्य करते थे। जिस समय मुसलमान नवाबों का दौर-दौरा इधर बढ़ने लगा, उस समय इनकी उनसे लड़ाई हुई, जिसके फलस्वरूप इनको इधर-उधर तितर-बितर होना पड़ा। इनमें से एक दल कुलोठ पहुंचा, जहां चौहानों का अधिकार था। लड़ाई के पश्चात्


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कुलोठ पर इन्होंने अपरा अधिकार जमा लिया। सरदार कुरडराम जो कि कुलोठ के गढ़वाल वंश-संभूत हैं नवलगढ़ के तहसीलदार हैं। यह भी कहा जाता है कि गढ़ के अन्दर वीरतापूर्वक लड़ने के कारण गढ़वाल नाम इनका पड़ा है। इसी भांति इनके साथियों में जो गढ़ के बाहर डटकर लड़े वे बाहरौला अथवा बरोला, जो दरवाजे पर लड़े वे, फलसा (उधर दरवाजे को फलसा कहते हैं) कहलाये। इस कथन से मालूम होता है, ये गोत्र उपाधिवाची है। बहुत संभव है इससे पहले यह पांडुवंशी अथवा कुन्तल कहलाते हों। क्योंकि भाट ग्रन्थों में इन्हें तोमर लिखा है और तोमर भी पांडुवंशी बताये जाते हैं।

भाटी जाट वंश, चाहर

भाटी जाट वंश -

ये लोग आरम्भ के यादव हैं। ब्रज और फिर गजनी-हिरात तथा पंजाब जैसी उपजाऊ भूमि से विताड़ित होकर जब यह समूह जांगल-प्रदेश में आया, जहां न कोई मेवा और फल पैदा होते हैं और न गेहूं जैसा आवश्यक अन्न, जहां पानी के लिए यात्री भटक-भटककर मर सकता है, तो भाटी नाम से दूसरे लागों ने इन्हें पुकारा। भरतपुर और करोली के यादवों के लिए यह बिल्कुल गैर-उपजाऊ अर्थात भण्टड मुल्क में बसे हुए दिखाई दिए। यही कारण था कि जांगल प्रदेश के यादव भाटी नाम से प्रसिद्ध हुए। इस भूमि पर ये उस समय में आ चुके थे जब कि बौद्ध-धर्म पूर्ण यौवन पर था अर्थात् तीसरी-चौथी सदी से पूर्व ही। बौद्ध-धर्म के पश्चात् जब नवीन हिन्दू-धर्म बढ़ने लगा तो इस समुदाय के दो टुकड़े हो गये-एक जाट भट्टी, दूसरे राजपूत भट्टी। यही क्यों, इस्लाम की बाढ़ ने दो के स्थान पर भाटी क्षत्रियों को तीन भागों में बांट दिया। तीसरा दल मुसलमान भट्टी कहलाने लगा। जाट भट्टी और राजपूत-भट्टी दो में कैसे विभक्त हो गये, इसका उत्तर भाट लोगों ने उसी युक्ति से दिया है जा कि नितान्त निर्मूल है। एक जगह भाट लोगों की किताब में हम पढ़ते हैं-

‘एक चौहान राजा कोड़खोखर के, मान, दल्ला और देसाल तीन पुत्र थे। वे तीनों जाटनियों के साथ शादी करने से जाट हो गये। उनके वंशज क्रमशः मान, दलाल और देसवाल गोतों से मशहूर हुए।’

इस कथन का उल्लेख मि. डब्ल्यू. क्रुक और पण्डित अमीचन्द शर्मा दोनों ही अपने लेखों में करते है। एक दूसरे भाट की किताब में इसी वर्णन को इस भांति लिखा है-

‘‘भाटी नेकपाल के तीन पुत्र हुए - नगराज, आलोजी, ऊदल। ऊदल का तो देसवाल, दलाल हुआ, और आलोजी का गोत-कुंडो, मोंड, तोड़ हुआ।’’

यह है भाट ग्रन्थों की उस सत्यता का नमूना जो उन्होंने अनेक जाट गोतों के सम्बन्ध में प्रकट की है। इस विषय पर हम पिछले अध्यायों में काफी प्रकाश डाल चुके हैं। इसलिये यहां यह आवश्यकता नहीं कि उसी विषय की पुनरावृत्ति की जाय।

भटनेर और भटिण्डा पर जाट भाटियों का और जैसलमेर के विशाल प्रदेश


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पर राजपूत भाटियों का राज रहा है। हांसी और हिसार कभी जाट और कभी राजपूतों के कब्जे में एक लम्बे अरसे तक रहे हैं। ‘वाकए-राजपूताना’ के लेखक ने भाटी जाटों के राज्य के विषय में इस प्रकार लिखा है-

"भटनेर जो अब रियासत बीकानेर का भाग है पुराने जमाने में जाटों के दूसरे समूह की राजधानी था। यह जाट ऐसे प्रबल थे, कि उत्थान के समय में बादशाहों का मुकाबला किया और अब आपत्ति आई हाथ सम्भाले। कहा जाता है कि भटनेर का नाम भाटियों से जो कि उनमें अवस्थित हुए थे, सम्बन्ध नहीं रखता है, किन्तु किसी प्रसिद्ध रईस के वरदाई अर्थात् भाट से निकला है। उसको यह मुल्क प्रदान हुआ और उसने कवियों के खानदान को प्रसिद्ध करने के अभिप्राय से, बतौर संस्थापक के अपनी रियासत का पेशे के नाम से नामकरण किया। किन्तु ‘वाकआत जैसलमेरी’ में लिखा है कि भाटियों की आबादी की वजह से इस इलाके का नाम भटनेर हुआ। ‘भारसुथल’ के प्राचीन भूगोल के आधार पर उत्तरी हिस्से का नाम नेर है और जब भाटियों की चन्द शाखाओं ने इस्लाम-धर्म को स्वीकार किया तो अपने नाम से अकार को निकाल दिया, इस तरह भट और नेर मिलकर भटनेर हो गया। जो लोग मध्य-एशिया से भारत पर आक्रमण करते थे, उनके मार्ग में स्थित होने से भटनेर ने इतिहास में भारी प्रसिद्धि प्राप्त की है। विश्वास है कि जाटों ने सिन्ध नदी की नाविक लड़ाई में महमूद गजनवी से मुकाबला होने से पहले ही पंजाब के जंगलों में बस्तियां आबाद कर दी थीं। यह भी विश्वास है कि महमूद से सैकड़ों वर्ष पहले जाट शासक थे। जिस समय शहाबुद्दीन ने भारत को विजय किया था, उससे सिर्फ बारह वर्ष बाद सन् 1205 में उसके उत्तराधिकारी कुतुब को मजबूरन उत्तरी जंगलों के जाटों से बजात खुद लड़ना पड़ा। अभागी रजिया बेगम, फीराज-आजम के योग्य उत्तराधिकारी ने दुश्मन के खौफ से तख्त छोड़कर जाटों की शरण ली। उन्होंने संयोग से गकरों की कुल फौज इकट्ठी करके उक्त मलिका की इम्दाद में शत्रु पर चढ़ाई की। उसके भाग्य में शत्रुओं पर विजय पाना था, किन्तु वे बैर लेने में नेकनामी से मारे गये। फिर 1397 ई. में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया, तब मुल्तान-युद्ध में अड़चन और कष्ट पहुंचाने के कारण उसने भटनेर पर हमला किया। कुल कौम का कत्ल करके मुल्क को प्रकाश रहित कर दिया। सारांश यह है कि भट्टी और जाट ऐसे मिले-जुले हैं कि उनमें भिन्नता करना कठिन है।’’1


तैमूर के हमले के थोड़े दिन बाद एक गिरोह ने अपनी हुकूमत को वापस लेने के लिए मारोट और फूलरा से निकलकर भटनेर पर हमला किया। उस समय भटनेर में तैमूर या दिल्ली के बादशाह का हाकिम शासन करता था। भटनेर उनके


1. वाक-ए राजपूताना, जिल्द 3


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हाथ में आ गया। इस सरदार का नाम वीरसिंह या वैरीसाल था जिसने कि फिर से भटनेर को अपने कब्जे में कर लिया था। वैरीसाल ने सत्ताईस वर्ष हुकुमत की और उसका बेटा भारू उसके बाद भटनेर का शासक हुआ। वैरीसाल के समय में चगताखां ने दिल्ली के बादशाह से मदद लेकर भटनेर पर चढ़ाई की। दो बार तो उन्हें हारकर लौटना पड़ा। तीसरी बार फिर चढ़ाई की। भटनेर के लोग हमलों से तंग आ गये थे, इसलिए भारू ने सुलह के लिए प्रार्थना की। कहा जाता है कि आखिर में भारू और उसके साथी मुसलमान हो गए। जब राठौर प्रबल हुए तो उनके सरदार रायसिंह ने भटनेर की जीत लिया।

मुन्शी ज्वालासहाय जी ‘वाकए राजपूताना’ के लेखक ने आगे लिखा है-

‘‘हाकरा नदी के आसपास बहुत से खंडहर पाये जाते हैं। रंगमहल के मकानात जो दिखाई पड़ते है बहुत जमाने के हैं। धांधूसर जो कि भटनेर से दक्षिण 25 मील के फासले पर है, उसके सम्बन्ध में एक भटनेर निवासी सज्जन ने बतलाया था कि यह कस्बा कभी सिकन्दर के आक्रमण के समय पूरा रईस था।

"x x अगर कोई हांसीहिसार की ओर से बीकानेर में प्रवेश करे तो इन मशहूर खंडहरों के सम्बन्ध की कहावतों की बखूबी जानकारी हासिल कर सकता है, जो पुराने जमाने में परमार, जोहिया अथवा जाट रईसों के महल की बुनियाद थी। इधर से यात्री को काफी ऐतिहासिक सामग्री मिल सकती है।
"अमौर, बंजीर का नगर, रंगमहल, सोदल (सूरतगढ़) माचूताल, रातीबंग, बन्नी, मानिकखर, सूर सागर, कालीबंग, कल्यान सर, फूलरा, मारोट, तिलवाड़ा, गिलवाड़ा, भामेनी, कोरीवाला, कुल ढेरनी, नवकोटि, मासका ये ऐसे स्थान हैं जिनमें से अधिकांश के सम्बन्ध में काफी ऐतिहासिक सामग्री मिल सकती है।’’

‘वाकए-राजपूताना’ के लेख से जहां यह बात प्रकट होती है कि जाटों का एक बडे़ प्रदेश पर लम्बे समय तक राज रहा है तथा उन्होंने प्रत्येक आक्रमणकारी मुसलमान विजेता से सामना किया है, वहां जाट-राज्यों के सम्बन्ध में यह बात भी इस लेख से मालूम हो जाती है कि ये जाट-राज्य सब प्रकार से समृद्धिशाली थे। उनके समय में कला-कौशल की भी वृद्धि हुई। यही तो कारण था कि सिकंदर ने आने के समय उनका धांधूसर नामक नगर पूरे वैभव पर पाया गया। उनकी राजधानियों में जहां सरदारों के रहने के लिए अच्छे-अच्छे राज-भवन थे, वहां प्रजा के सुख के लिए तालाब भी थे। पशुओं के लिए वे काफी गोचर भूमि छोड़ते थे।

खास भटनेर से भाटी जाटों की हुकूमत यद्यपि अकबर के समय अर्थात् सत्राहवीं सदी में नष्ट हो गई थी, किन्तु फिर भी वे जांगल तथा ढूंढार पंजाब के बहुत से भू-भाग को विभिन्न स्थानों पर दबाये रहे। अठारहवीं सदी में कुहाड़वास और उसके प्रदेश पर कुहाड़सिंह और उसका पुत्र पन्नेसिंह शासक था। हालांकि


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यह उनकी बहुत ही छोटी रियासत थी। आगे चलकर कुहाड़सर के भाटी कुहाड़ नाम से प्रसिद्ध हुए। शेखावाटी के लोग-सेवक कुंवर पन्नेसिंह जी से कुहाड़ का शासक पन्नेसिंह 15 पीढ़ी पहले हुआ था। कुहाड़ों की भांति पंजाब से सरककर दूलड़ भाटियों ने भी एक छोटा-सा राज्य स्थापित कर रखा था। मालवा में भी वे चुप नहीं बैठे रहे। भूमि पर कब्जा करके अपने प्रभुत्व को जमाने का अधिकार तो उन्होंने अब तक नहीं छोड़ा है। भाट लोगों की शाखा ने गोरीर और सिंधाना के निकट की भूमि पर प्रभुत्व स्थापित किया ऐसा भी भाट-ग्रन्थों में वर्णन मिलता है।

चाहर -

इस वंश के लोग संयुक्त-प्रदेश के आगरा जिले में बहुत हैं। सच्चाई और सीधेपन के लिये ये खूंटेल जाटों की भांति प्रसिद्ध हैं। रंग के उजलेपन मे खूंटेलों से कुछ हल्के और परिश्रम में श्रेष्ठ होते हैं। सिनसिनवार, खूंटेल तथा सोगरवारों की भांति चाहर भी फौजदार कहलाते हैं। फौजदार का खिताब बादशाहों की ओर से उन लोगों को बताया जाता था जो कि किसी प्रदेश के किसी भाग की रक्षा का भार अपने ऊपर ले लेते थे। चाहर लोगों में रामकी चाहर बड़ा बहादुर हुआ है। इसने सुग्रीवगढ़ के राजा खेमकरण के साथ मुस्लिम सेनाओं को बड़ा तंग किया था। जांगल (बीकानेर) प्रदेश में सीधमुख नामक स्थान पर अब से करीब 550 वर्ष पहले मालदेव नाम का चाहर राज करता था। उस समय देहली में गुलाम बादशाहों का राज्य था। जैसलमेर से लौटते हुए एक मुसलमान सेनापति से मालदेव का युद्ध हुआ था। घटना इस प्रकार बताई जाती है कि मुसलमान सेनापति ने मालदेव के गढ़ से बाहर अपना डेरा डाला। कहते हैं कोई भैंसा सांड बिगड़ गया,स्त्री-पुरुष और बच्चे हाय-हाय करने लगे। मुसलमान सैनिक भी सांड के सामने न आए। मालदेव की पुत्री ने जिसका नाम सोमादेवी था, भैंसे को सींग पकड़कर रोक लिया, वह पूरा बल लगाकर भी न छुड़ा सका। मुसलमान सेनानायक जिसका नाम नहीं लिखा, सोमादेवी को ले जाने के लिये अड़ गया। जाटों की ओर से उसे समझाया गया। आखिर सीधमुख की सीमा पर लड़कर मालदेवजी काम आए और उनके परिवार के लोग उधर से निकलकर झूंझावाटी में आ गये।

चंदलाई, टोंक

चंदलाई -

यह एक गांव है, जो टोंक से मिला हुआ है। पहले इस स्थान को चांदला नाम के जाट सरदार ने आबाद किया था। गांव के निकट ही अपनी बेटी भाला के नाम पर तालाब खुदवाया था। तालाब के कीर्ति-स्तंभ में एक लेख है।


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उस पर वैसाख सुदी 15 संवत् 1027 विं खुदा हुआ है।1 चंदला किस गोत्र के जाट सरदार थे, यह तो कुछ पता लगाया नहीं जा सका है, किन्तु यह सही है कि वे उस गांव के सिर्फ पटेल ही नहीं किन्तु उस इलाके के सरदार अर्थात् राजा थे। संवत् 1027 वि. (ई. 970) में, राजस्थान की विशाल भूमि पर कोई भी एक बड़ा राज्य न था। सारा प्रदेश छोटे-छोटे राज्यों में बटा हुआ था। चौहानों की शक्ति प्रकाश में नहीं आई थी। वे भी उस समय साधारण स्थिति के ही थे। कछवाहे ग्वालियर के नरवर की भूमि पर चार-छः कोस के इलाके पर राज कर रहे थे। परिहार मंडोवर से आगे 25-30 मील भी नहीं बढ़े थे। इसी भांति का चंदेल सरदारों का राज्य था। किन्तु तालाब खुदवाने और शिलालेख लगवाने से पता चलता है कि उसका राज्य चंदलाई से कम से कम 20-20 मील चारों ओर तो अवश्य होगा। क्योंकि केवल बेटी की प्रसन्नता के लिये उसने इतना व्यय कर डाला। उसके कोष में भी अवश्य ही अच्छी रकम होगी। चांदला के पीछे कितने दिनों तक उनका राज चला, यह कुछ भी पता अभी नहीं लगा है। ‘काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ में तथा अजमेर के अर्द्ध साप्ताहिक राष्ट्रीय पत्र ‘राजस्थान संदेश’ में टोंक राज्य के भू-भाग पर एक जाट-राज्य का हाल छपा था। चौधरी रिछपालसिंह जी ने भी ‘जाट-वीर’ में उस राज्य का परिचय दिया है।

टोंक -

इससे 5 कोस उत्तर में पहाड़ के नीचे एक गांव पिराणा है। उसमें जाटों का एक प्रजातंत्री ढंग का राज्य था।2 यह राज्य बड़ा संगठित राज्य था। अपने अधीनस्थ प्रदेश में से गुजरने वाले व्यापारियों तथा मालदार राहगीरों से यह टैक्स वसूल करते थे। माल का चौथाई हिस्सा ये टैक्स में लेते थे। जितनी भूमि इनके अधिकार में थी, उस पर सभी भाइयों और जातियों का इनके यहां समान अधिकार था। किन्तु बदले में ये युद्ध के समय प्रजा में से नौजवान चुन लेते थे। अपने राज्य की रक्षा करने के लिए प्रत्येक बालक, युवा और वृद्ध प्राणों का उत्सर्ग करने को तैयार रहता था। एक बार उधर से होकर मुसलमान बादशाह जहांगीर की बेगमें गुजरीं। पिराणा के जाट-सरदारों ने उनको रोक लिया और तब जाने दिया जबकि उन्होंने टैक्स अदा कर दिया। बेगमों ने जाकर बादशाह से शिकायत की। बादशाह ने मलूकखां नाम के मुसलमान सेनापति को पिराणा के अधीश्वर जाटों को दबाने के लिए भेजा। वह रणथम्भौर के पास के गांव शेरपुर में ठहर गया। उसने जाटों के लड़ने के पराक्रम को सुन रखा था। इसलिए उसने उनके सम्मुख


1. जटवीर, वर्ष 8, अंक 42 (लेखक रिछपालसिंह जी)।
2. राजस्थान सन्देश (अर्द्ध साप्ताहिक) वर्ष 1, संख्या 2।


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पहुंचकर लड़ने का इरादा स्थगित रखा और उनके नष्ट करने का साधन सोचने लगा। आखिरकार मलूकखां की इच्छा पूर्ण हुई। पिराणा के जाटों का डोम लोभ में आकर सारा भेद बता गया। वह कह गया कि - ‘‘भादों बदी 12 को उनके यहां वच्छ बारस का मेला होता है। उस दिन वे झूला डालकर और अलगोजे बजाकर झूलते हैं। वृद्ध, बालक, युवा और स्त्री-पुरुष सभी उस दिन निरस्त्र और निर्भय होकर झूलते हैं।’’ डोम ने यह भी कहा कि -‘‘अब की बार जब इनका त्योहार आएगा मैं ढोल बजा दूंगा, तब तुम आकर उनको नष्ट कर दोगे।’’ आखिर ऐसा ही हुआ निरस्त्र जाटवीरों को मलूकखां ने वच्छ बारस को घेर लिया और अनेक को काट डाला। इस तरह जाटों का यह प्रजातंत्री राज्य नष्ट हो गया। मलूकखां ने नमकहरामी करने के अपराध में डोम को भी करारा दण्ड दिया। पिराणा के जाट वीरों के सरदार जीवनसिंह और रायमल थे। ये दोनों वीर लड़ाई में काम आए फिर भी निरस्त्र होते हुए भी इन्होंने पचासों शत्रुओं के सर तोड़ डाले। इनकी स्त्रियां गर्भवतीं थीं। उनसे जो पुत् हुए स्त्रियों की इच्छा के अनुकूल उनसे उत्पन्न होने वाले पुत्रों का नाम पिताओं के स्मरणार्थ जीवनसिंह और रायमल ही रखे गए। रायमल सांगानेर के पास चले गए और वहां अपने निवास के लिए एक नगर बसाया। जीवन ने स्थान को न छोड़ा। उसने अपने बाप-दादों के खेड़ों के पास ही अपनी बस्ती आबाद की। उसने अपने बसाए हुए नगर का नाम भी पुराना रखा जो कि आगे पिराना के नाम से ही मशहूर हुआ। यह याद रखने की बात है कि उस युद्ध में कुछ स्त्रियां भी मारी गई थीं। उनके चबूतरे आज सतियों के चबूतरे के नाम से प्रसिद्ध हैं। सतियों के पत्थर में संवत् 1478 तक के लेख हैं। इससे मालूम होता है कि इनकी लड़ाई मलूकखां से सन् चौहदवीं शताब्दी में हुई थी। उस समय दिल्ली में खिलजी लोगों का राज्य था।

मान, कुलडिया, खोजा, लोयल, गैना

मान


यह भाटी जाटों की एक शाखा है, ऐसा भाट-ग्रन्थ मानते हैं। इनकी वंशावली जो जाटों की लिखी हुई है, उसमें भाटियों को सूर्यवंशी लिखा है। साथ ही यह भी लिखा है कि भक्त पूरनमल के पिता शंखपति का विवाह इन्हीं लोगों में हुआ था। लगभग पन्द्रह सौ वर्ष पहले इनका एक समूह देहली के पास बलवांसा नामक स्थान में गजनी से आकर आबाद हुआ था। मानसिंह जिसके नाम पर इस वंश की प्रसिद्धि बताई जाती है, उसका पुत्र बीजलसिंह ढोसी ग्राम में आकर अवस्थित हुआ। ढोसी नारनौल के पास पहाड़ों में घिरा हुआ नगर था। इस स्थान पर अब भी दूर-दूर के यात्री आते हैं, मेला लगता है। कई मन्दिर और कुंड यहां पर उस समय के बने हुए हैं। पहले यहां गंडास गोत्र के जाटों का अधिकार था। इसने नागल की पुत्री गौरादेवी से सम्बन्ध किया और फिर ढोसी से 3 मील हटकर


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गौरादेवी के नाम पर गोरीर नाम का गांव बसाया। आगे उनसे जितना भी हो सका, अपना राज्य बढ़ाया। वीजलसिंह से 20 पीढ़ी पीछे सरदार रूपरामसिंहजी हुए। उस समय इस प्रदेश पर शेखावत आ चुके थे। खेतड़ी के शेखावतों से रूपरामसिंहजी का 10, 12 वर्ष तक संघर्ष रहा, किन्तु इन्होंने अधीनता स्वीकार न की। मान लागों के अनेक दल थे और वे अनेक प्रदेशों में बसे हुए हैं। खेतड़ी के शेखावतों से रूपरामसिंह का युद्ध अब से लगभग 80-90 वर्ष पहले हुआ था, क्योंकि कुं. नेतरामसिंहजी गोरीर वालों से रूपरामसिंहजी चार पीढ़ी पहले हुए थे। उस समय सुखरामसिंहजी के पास कितना इलाका था, भाट लोगों की पोथियों से इतना पता नहीं लगता है।

कुलडिया


यह जोहिया जाटों की एक शाखा मात्र है। इनका इतिहास जो इनके डूम, सांसी और भाटों से मिलता है, इस प्रकार है । मरुधर देश की भूमि पर वहिपाल नाम का जोहिया सरदार कोट मरोट नामक गढ़ में बैठकर मारवाड़ के एक बड़े हिस्से पर राज करता था। हिसार में जो सूबेदार उनके समय में था उससे वहिपाल की लड़ाई हुई। यह घटना ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के बीच की है। कोट-मरोट का राज्य इस लड़ाई में इनके हाथ से निकल गया। तब वहिपाल ने काठोद में जाकर राज्य कायम किया। यह स्थान अजमेर से सात-आठ कोस की दूरी पर पच्छिम की ओर है पहाड़ों से सुरक्षित स्थान में रहते हुए इसके वंशजों ने कोलीय में एक अपना किला स्थापित कर लिया। इसी बीच में कोइल पट्टान के राजा ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। भाट ग्रन्थों में लिखा है - “इनकी कुल देवी पाड़ा ने उस कोइल पट्टन के राजा को परास्त करक इनको छुड़ा लिया।” और डीडवाना को अपनी राजधानी बनाया, फिर वहीं पर वहिपाल की और उस देवी की मूर्ति स्थापित की। इनका राज कोलीय से लेकर डीडवाना तक था।

उस समय का एक काव्य गीत इस प्रकार है -

काव्य गीत

सर में देवी सांचली प्रगट पाडल मांय।

दुःख काटे दर्द गमावे करै सिकतियां सहाय।।

सौ, सौ, कोसां समर लै शत्रु भगाये दूर।

ऐसी पाडल माता कहीजे लाद कान्ह हजूर।

वहिपाल जोहिया को संकट काट्यो दर्दगमायो दूर।।

...... तू हाजरा हुजूर।।

इन लोगों का एक दल सांगलीय में कुछ समय निवास करता हुआ बोसांणा,


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चूड़ी और सांगासी में फैल गया। शेखावतों ने अपने समय में इन लागों की स्वतंत्रता नष्ट कर दी। डीडवान के आस-पास राठौरों ने इनके सरदारी तंत्र के जनपद मिटा दिये।

रामनाथ चारण ने ‘राजपूताने के इतिहास’ मे जोहियों के सम्बन्ध में लिखा है कि उनके पास 1500 गांव थे। सीवांणकोट में उनकी राजधानी थी। जोहियों के दो दलों में आपस में तकरार थी। राठौर वीरमदेव को बैठने के लिए उन्होंने कई गांव दिये थे। पीछे से वीरमदेव ने उनके साथ घात करना चाहा, इससे उन्होंने बड़े रण (मारवाड़) के पास लड़ाई करके उसे मार डाला। संवत् 1464 में वीरम के पुत्र ने जोहियों को मारवाड़ की भूमि से निकाल दिया।1

खोजा व ख्वाजा


इस गोत्र के जाट मारवाड़, अजमेर मेरवाड़ा और झूझावाटी में पाये जाते हैं। यह नाम किस कारण पड़ा, यह तो मालूम नहीं हो सका, किन्तु ग्यारहवीं शताब्दी में इनका राज्य टोंक में था यह पता लग गया है। ‘तारीखर राजगान हिन्द’ के लेखक मौलवी हकीम नजमुलगनीखां ने टोंक राज्य के वर्णन में लिखा है -

"शहर टोंक लम्बाई में उत्तर 26 अक्षांश 10 देशान्तर और चौड़ाई में पच्छिम 45 अक्षांश 57 देशान्तर पर देहली से मऊ जाने वाली सड़क से चिपटा हुआ है, देहली से दक्षिण पच्छिम में 218 मील मऊ से उत्तर में 289 मील फासले पर बनास नदी के किनारे पर अवस्थित है। यहां यह नदी प्रायः दो फीट पानी की गहराई से बहती है। शहर के चारों ओर दीवार है और उसमें कच्चा किला है। एक इतिहास में लिखा है कि खोजा रामसिंह ने किसी युद्ध के बाद देहली से आकर संवत् 1300 विक्रमी मिती माघ सुदी तेरस को इस स्थान पर नगर आबाद किया। उस नगर का नाम टोंकरा रखा था। यह आबादी अब तक कोट के नाम से मशहूर है। अर्से के बाद माह सुदी पंचमी संवत् 1337 को अलाउद्दीन खिलजी ने माधौपुर और चित्तौड़ फतह किये, तब इस गांव की दुबारा आबादी हुई। ‘वाकया राजपूताना’ में इसी भांति लिखा हुआ है। किन्तु इसमें शंका यह है कि ‘सिलसिला तालुमुल्क’ के लेखानुसार अलाउद्दीन खिलजी सन् 1295 ई. में शासक हुआ और सन् 1316 ई. में मर गया। इस हिसाब में उसका शासन-काल संवत् 1352 से 1372 के बीच में या इससे एकाध साल आगे-पीछे करार पाता है। सन् 1806 ई. में टोंक अमीरखां के कब्जे में आया। उसने शहर से एक मील दक्षिण में अपने निवास के लिये राज-भवन और दफ्तर बनाये।

इससे मालूम होता है कि राजा रामसिंह के वंशजों ने टोंक पर सन् 1003 से


1.इतिहास राजस्थान। पृ. 146, ले. रामराथ चारण


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सन् 1337 अथवा 1352 तक राज किया। खिलजी अथवा अन्य किसी भी मुसलमान सरदार ने उनका गढ़ तहस-नहस कर दिया। तब फिर से दुबारा बसाया गया।

लोयल


इस वंश के जाट मारवाड़ में रहते हैं। सोलहवीं सदी से पहले नागौर के प्रदेश पर इन्हीं लोगों का राज था। यद्यपि पठान, मुगल नागौर जैसे बड़े-बड़े स्थानों पर कब्जा कर लेते थे, किन्तु इन लोगों ने उनको अपना शासक कभी नहीं माना। यह भूमिया-चारे की पद्धति से अपने अधिकृत प्रदेश पर शासन करते थे। जिन दिनों अकबर बादशाह हुआ और उसे भी इन लोगों ने किसी भांति की भेंट अथवा शाही कर न दिया, तो उसने बहुत से जाट सरदारों को जब यह पता लगा कि बादशाह जब तक शाही कर न ले लेगा, तब तक उनके जाति भाइयों को न छोड़ेगा, तो तोला अकबर बादशाह के पास गए। बादशाह ने यही सवाल किया कि हमें राजस्व (कर) दो। तोला इस बात पर कड़क कर बोला - इसी लोभ के लिये तुमने हमारे जाति भाइयों को पकड़ा है, तो छोड़ दो। हमारे यहां तुम्हारा जैसा घाटा नहीं है। मारवाड़ी भाषा में तोला और अकबर की बातचीत का इस भांति काव्यमय वर्णन किया है-

काव्यमय वर्णन

अकबर सूं तोला मिला करके बात कराड़ी।

पट्टी रहूं मैं नागौररी घर म्हाड़ा खाड़ी।

खच्चर भरले मोहरां की बिरादरी छोड़ म्हाड़ी।।’’

परगना नागौर में खारी गांव में तोला सरदार की राजधानी थी। गांव में पश्चिम दिशा में तोरणां नाम का तालाब है, जो उसी के नाम से मशहूर है। यहां एक शिलालेख है, उस पर संवत् 1565 भादवा सुदी 8 खुदा हुआ है। उसी पत्थर पर तोलाजी की मूर्ति है। वे पांचों हथियार बांधे हुए हैं। उनके आगे छड़ीदार अथवा चोबदार हैं। खारी के समीप किस्ताना, ढोलोलाव नाम के कई तालाब हैं, जो तोला तथा उसके पूर्वजों की समृद्धि और वैभव को प्रकट करते हैं। उनके खजाने में अपार धन भरा रहता था, इसलिए तो उन्होंने अकबर से कह दिया कि मुहरों से खच्चर भर ले।

गैना


इस वंश के जाट सरदार मारवाड़ में हैं। डीडवाने के परगने में इनका राज रहा था। संभवतया जोहिया जाटों का एक दल गैना नाम से मशहूर हुआ।


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गांव बडदू (परगना डीडवाना) में एक कुआं के चबूतरे पर मकराना पत्थर पर सरदार किशानारामजी गैना की एक तस्वीर है, उसमें वे सशस्त्र हैं। साथ ही उनकी सती रानी रामा की भी मूर्ति है। शिलालेख में संवत् 1814 चैत बदी 6 खुदा हुआ है। इनका यह राज कई शताब्दी पहले से चला आता था क्योंकि ऊपर नाम के गांव में संवत् 1134 जेठ बदी का एक शिलालेख व एक गैना गोत्रोत्पन्न लड़की की मूर्ति है। वह किन्हीं कारणों से अपने मायके में ही रहती थी। शत्रुओं से लड़ते हुए अपने इकलौते बेटे के मारे जाने के पश्चात् उसके शोक में मर गई थी। उसके लड़के ने बड़ी वीरता के साथ अपने देश की रक्षा उन शत्रुओं से की थी जो कि सिन्ध की ओर शासक करते थे और जाति के मुसलमान थे।

मरवाड़ की विभूतियां

मरवाड़ के जाट सरदारों में अनेक योद्धा और वीर हुए हैं। साथ ही अनेक दानी, धर्मात्मा और ईश्वर-भक्त भी उनमें एक से एक श्रेष्ठ हुए हैं। तेजाजी के नाम को सारा राजस्थान जानता है। उनका वर्णन आगे दिया जा रहा है। यहां कुछ अन्य जाट सरदार तथा जाट-बालाओं का थोड़ा सा परिचय कराते हैं जिनके शुभ कृत्यों से जाटों का सिर उन्नत हुआ था और अब भी जिन पर जाट जन अभिमान कर सकते हैं।

मरवाड़ में एक चुटीसरा गांव है । उसमें एक बड़े प्रसिद्ध जाट-भक्त हुए हैं । वे सदारामजी महाराज के नाम से पुकारे जाते हैं । रेवाड़ गोत्र के जाटों में उनका जन्म हुआ था । उनके 24 शिष्य थे, जिन्होंने राजस्थान के विभिन्न भागों पर मंदिर स्थापित किये । सभी जातियों के लोग उनकी प्रशंसा करते हैं और श्रद्धा के साथ उनका स्मरण करते हैं । उनके मंदिर निम्न स्थानों में हैं -

1. Chuntisara (चुंटीसरा), 2. Balaya (बलाया), 3. Barangaon (बरणगांव), 4. Phirod (फिड़ोद), 5. Kharnal (खरनाल), 6. Nagaur (नागौर), 7. Phalaudi (फलौदी), 8. Marwar Mundwa (मारवाड़ मुंडवा), 9. Sujangarh (सुजानगढ़) (Bikaner), 10. Utalad (उटालड़) (D.Churu), 11. Desh (देश), 12. Teu (टेऊ), 13. Dulchasar (दुलचासर), 14. Nathasar (नाथासर), 15. Bikaner (बीकानेर), 16. Raghunathsar (रघुनाथसर), 17. Mastramji Acharyon Ke Chok Men (मस्तरामजी आचार्यों के चोक में), 18. Vinaniya Ke Chok Men (विनानिया के चोक में), 19. Gaanvren (गांवरेन), 20. Gachhipura (ग़च्छीपुरा), 21. Jodhpur (जोधपुर), 22. Udaipur (उदयपुर), 23. Jaipur (जयपुर), 24. Nagaur (नागौर) ।

इनके शिष्यों में जोधपुर में जाटों के वास में मूरदासजी के नाम से एक मशहूर संत हुए हैं ।

फूलाबाई - परगना नागौर में गांव माजावास में एक जाट सरदार थे। उनके यहां फूलाबाई नाम की बड़ी प्रसिद्ध बहादुर लड़की थी। ईश्वर भक्ति में दूर-दूर तक उसका नाम फैल गया था। जिन दिनों बादशाह औरंगजेब देहली में शासन करता था, उन्हीं दिनों फूलाबाई की भक्ति का सितारा चमक रहा था। औरंगजेब की आज्ञा से राठौर राजा जसवन्तसिंह जिन दिनों काबुल पर चढ़ाई करने गए थे, उन्हीं दिनों साधुओं


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का एक दल माजावास आया। वे फूलाबाई के तेजोमय ईश्वर-भक्ति से पूर्ण मुखमंडल को देखकर उसके भक्त हो गये। बाल-ब्रह्मचारिणी फूला का उनके हृदय पर इतना प्रभाव पड़ा कि उन्होंने काबुल से लौटते हुए जसवन्तसिंह से फूलाबाई की प्रशंसा की। जसवन्तसिंह ने जोधपुर आने पर फूलाबाई के दर्शन उसके गांव में जाकर किये। फूलाबाई एक ऐसे सरदार की लड़की थी, जिसका कि कई गांवों पर अधिकार था। इसलिए जसवन्तसिंह के साथ में आए हुए सारे सैनिकों को भोज दिया। मारवाड़ में फूलाबाई की प्रशंसा के गीत गाए जाते हैं। उसके भव्य जीवन के गीतों की मारवाड़ी भाषा में एक पुस्तक भी छपी है।

चोटी सराय में चूअरजी नाम के जाट शहीद हुए हैं। उनकी पूजा की जाती है। वहां पर उनकी मूर्ति भी बनी हुई है, किन्तु कोई शिलालेख नहीं है। बहुत सम्भव है कि अधिक खोज करने पर शिलालेख भी मिल जाए। वहां उन्हें चूअरजी जाट जूझा के नाम से पुकारते हैं। जूझा के अर्थ शहीद होते हैं। धर्म, देश और जाति की रक्षा के लिए जो युद्ध-क्षेत्र में मारे जाते हैं, उन्हें जूझा कहते हैं और जो विधर्मी तथा विजातीय लोगों पर विजय पाते हैं, उन्हें बली अथवा महावीर कहने की प्रथा प्राचीन लोगों में थी। पीछे महावीरबली की जगह भूमिया शब्द का प्रयोग होने लग गया था। भूमिया लोंगों की पूजा भी होने लग गई है।

रानाबाई - मारवाड़ के परवतसर परगने में हरनावा गांव में सरदार जालिमसिंहजी सरदारी करते थे। आस-पास के बीसियों गांवों पर उनका अधिकार था। दशहरे पर सभी गांव के चौधरी उनको भेंट देते थे। सरदार जालिमसिंह के एक पुत्री थी, जिसका नाम रानाबाई था। वह हरिभक्ता थी। ईश्वर-सेवा और गौ-सेवा ही उसके लिए आनन्द-दायक थी। उसकी इच्छा आजन्म ब्रह्मचारिणी रहने की थी, इसलिए उसका विवाह नहीं हुआ था। एक समय देहली के बादशाह का सूबेदार इधर से गुजरा। रानाबाई की खूबसूरती को देखकर उसके हृदय में पाजीपन आ गया। एक बार धोखे से जालिमसिंह को अपने यहां बुलाकर दबाव दिया कि रानाबाई की शादी मेरे साथ करा दो। जालिमसिंहजी ने ललकार के साथ उस सूबेदार को भला बुरा कहा। उसने जालिमसिंह को नजरबन्द करा दिया और खुद सेना लेकर हरनामा गांव पर चढ़ गया। रानाबाई ने जब सुना कि वह उसे से शादी करने के इरादे से आया है, सिंहनी की भांति खड़ी हो गई और तलवार लेकर मैदान में निकली। आंखें उसकी लाल हो रही थीं, चेहरा तमतमा रहा था। यवन सैनिक उसे देखकर एक दूसरे के मुंह की ओर देखने लगे। रानाबाई ने झपट कर सूबेदार का सिर काट लिया। सैनिकों में भगदड़ मच गई। जाट लोगों ने जब सुना तो उनका पीछा किया, जालिमसिंह जी छोड़ दिये गए। रानाबाई की कीर्ति सारे मारवाड़ में फैल गई। लोग अब तक उनकी कहानी बड़े चाव से कहते और सुनते हैं। स्वर्गीय पं. जयरामजी ने रानाबाई के चरित्र पर ‘जाट वीर’ में सन् 1926 में एक लेख भी लिखा था।


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परगना फलौदी में चाम्पासर गांव में भगत नाम से एक जाट गोत्र मशहूर है। कहा जाता है, चांपासर में जाठी गोत्र के जाटों में कल्याणजी नाम के एक हरिभक्त हुए हैं। उनकी भक्ति की छाप दूर-दूर के लोगों पर पड़ी थी। यद्यपि वे साधु नहीं बने थे। गृहस्थ रहते हुए भी वे इतने जबरदस्त हरिभक्त हुए कि राठौर नरेश जसवन्तसिंह उनकी सेवा में हाजिर हुए थे और प्रसन्न होकर पांच सौ हल की भूमि का ताम्र-पत्र इनाम कर दिया। वह इनाम अब तक उनके परिवार वालों के पास चला आता है, ऐसा कहा जाता है।

राठौरों के इतिहास में लिखा हुआ है कि जोधाजी राठौर जिन दिनों मारा-मारा फिरता था, उसके बैठने को जगह नहीं थी, साथ की सेना भी नष्ट हो चुकी थी। एक दिन भूखे प्यासे शाम के समय एक जाट सरदार के घर ठहरे। उनके खाने के लिए जब घाटि (दलिया) दी गई तो मारे भूख के शीघ्रता करने से घाटि से उनका हाथ जल गया। इस पर जाट-बाला ने कहा अरे सिपाही! तू जोधा की भांति ही मूर्ख है। गर्म दलिया और प्रबल शत्रु के बीच में हाथ नहीं डालते, उसे किनारों की ओर से निबटाते हैं। जोधा को उस जाट-बाला के इस राजनैतिक ज्ञान पर आश्चर्य हुआ और उसने उसी सिद्धान्त से काम लेकर अपने शत्रुओं पर विजय पाई।1

राजस्थान के संत

ऊपर मारवाड़ के संत और वीर पुरुषों का इतिहास दिया गया है। यहां थोड़ा-सा समय राजस्थान के जाट-संतों का वर्णन करके आगे फिर राजस्थान के जाट राज्यों का वर्णन दिया जाएगा।

धन्ना भगत - धन्ना भगत राजस्थान के ही थे। वे कहां जन्मे थे, कहां उनको ईश्वर का प्रकाश मिला, इसका पूरा वर्णन, ‘धन्ना भगत’ पुस्तक में है। किन्तु वे इतने प्रसिद्ध हैं कि समग्र उत्तरी भारत में उनकी चर्चा है। सूरदास और तुलसीदास से भक्ति में वे तनिक भी कम न थे। हां, इनसे वे कवित्व की शक्ति रखने में अवश्य ही पीछे थे। कहावत तो यहां तक है कि

‘धन्ना जाट का हरिसों हेत, बिना बीज के निपजा खेत।’

भगवानदास (b.?-1740) - अलवर राज्य में एक जाट साधू भगवानदास हुए हैं। ‘मुरक्कए अलवर’ में उनका वर्णन इस प्रकार से दिया हुआ है - आरम्भ में भगवानदास के मां-बाप हरयाणे में रहते थे। वहां से आकर मौजा टीकला परगना बीधोता में आबाद हुए। उनके बाप का नाम गोरखा और मां का नाम केशी था। जाति उनकी जाट थी और हरियाणी थी उपाधि। गौ चराया करते थे। समय पाकर वैराग्य की ओर झुके।


1. कुंवर जगदीश सिंह गहलौत के लिखे राठौरों इतिहास के आधार पर।


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आगे चलकर इतने प्रसिद्ध महात्मा हो गए कि भविष्य की बातें बताने लग गए। उनके तप और सत्यवाणी की चर्चा घर-घर फैल गई। वह समय शाहजहां बादशाह का था। भगवानदासजी के पास दर्शकों की भीड़ लगी रहती थी। नारनौल में उस समय एक मुसलमान हाकिम था। उसने देखा कि मुसलमान लोग भी इस साधु में श्रद्धा रखते हैं और वे इसकी बातों को मानते हैं, इस्लाम के प्रचार का असर भी इस साधु के कारण कम होता है ते उसने भगवानदासजी को पकड़वा मंगाया। उन्हें जेल में डाल दिया। मुसलमान हाकिम को इससे भी संतोष न हुआ। उसने घोड़ों के लिए दाना दलने का काम भगवानदासजी को सौंपा। साधु भगवानदास हंसते हुए दाना दलने लगे। साथ ही वह गाते जाते थे, ‘जो खाएगा मर जाएगा।’ आखिर हुआ भी ऐसा ही। जिन घोड़ों ने भगवानदासजी का दला हुआ दाना खाया, वे मर गए। हाकिम बड़ा भयभीत हुआ। उसने माफी मांगी और भगवानदासजी को छोड़ दिया। इस घटना के बाद उनकी भारी प्रसिद्धि हो गई। ब्राह्मण, राजपूत सभी जातियों के लोग भगवानदासजी के चेले हो गए। उन्होंने अपने शिष्यों को ये हिदायतें कीं -

  • (1) गाजर मूली मत खाओ,
  • (2) तम्बाकू मत पिओ,
  • (3) बैलों को बधिता मत कराओ।

उनके अनुयायी इन बातों का पालन भी करते हैं। उन्होंने अवतारों की फिलासफी के विरुद्ध भी प्रचार किया।1 सन् 1740 में वह मर गए। मौजा टीकला में जो अब परगना बावल में है, उनकी समाधि और छतरी बनाई गई। उनकी मृत्यु का बड़ा भारी शोक मनाया गया था। भादों बदी अष्टमी को वहां पर भगवानदास के नाम पर मेला लगता है। उसमें हजारों आदमी इकट्ठे होते हैं। दूर-दूर से पूजने वाले आते हैं। बहुत-सा चढ़ावा चढ़ाया जाता है। उनके मन्दिर के साथ (महंत) जाट लोग हैं। वही उस चढ़ावे को लेते हैं। मशहूर है कि भगवानदासजी कुछ दिनों के लिए मौजा काठ के माजरे में भी आये थे, जोकि कस्बा करनकोट के पास है। वहां पर साधु भगवानदासजी ने एक कुआं बनवाया था। उसका नाम उन्होंने कृष्ण-कुआं रखा था। आज भी वह कुआं इसी नाम से पुकारा जाता है।

महात्मा निश्चलदास जी

महात्मा निश्चलदास जी महात्मा तो थे ही, साथ ही वह संस्कृत के ऊंचे विद्वान भी थे। वह वे वेदान्ती थे, वेदान्त पर की उनकी टीका बहुत प्रसिद्व है। कहा जाता है - जब संस्कृत पढ़ने के लिए वे काशी जा पहुंचे तो उन्हें बड़ी कठिनाई उठानी पड़ी। वहां ब्राह्मणों के लिए शिक्षा सम्बन्धी विशेष सुविधाएं हैं। निश्चलदासजी का दृढ़ निश्चय था कि वे संस्कृत पढ़ें। आखिर उन्हें अपने को जाट के बजाय ब्राह्मण बताना पड़ा। उन्होंने काशी में सारे शास्त्रों का अध्ययन किया। जब संस्कृत के प्रकांड पडित हो गए, तब आपने राजस्थान में अपने सिद्धान्तों


1.मुरक्क-ए-अलवर पृ. 67।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-612


का प्रचार करना आरम्भ किया। दादू पंथ का राजस्थान में विशेष जोर है। बूंदी के महाराज रामसिंहजी ने महात्मा निश्चलदासजी को अपने यहां बुलाकर अपने यहां के विद्वानों से शास्त्रार्थ कराया। निश्चलदासजी की विजय हुई। बूंदी दरबार में दिन में भी दादू संतों के कहने से मशालें जला करती थीं। महात्मा निश्चलदासजी ने उस पाखंड को हटवाया। निश्चलदासजी के विचारों का लोगों पर इतना जबरदस्त असर पड़ा कि आर्य-समाज के उपदेशकों को उनके प्रभाव के घटाने के लिए ‘निश्चलदास की मति जो बौरानी’ आदि बेढंगी, कविता की रचना करनी पड़ी। उनके समकालीन लोग उन्हें संस्कृत का बृहस्पति कहा करते थे।

बख्तावर जी - मेवाड़ की भूमि पर बख्तावर जी नाम के एक जाट सरदार बड़े नामी संत हो गये थे। वे दीक्षा लेकर अथवा कपड़े बदलकर साधु तो नहीं बने थे, किन्तु मन, वचन से वे पूरे संत थे। ईश्वर-भक्ति और गौ-सेवा यही उनकी दिनचर्या थी। खिलजी का दल जब चित्तौड़ को ध्वंस करने के लिए जा रहा था, तो उसके एक सेनापति ने मार्ग में गौ-वध करना चाहा। गौ-वध के लिए उसके साथियों ने भक्त बख्तावर से एक गाय मांगी। बख्तावर भला वध करने के लिए दे सकता था? छीना-झपटी हुई। साधु स्वभाव के बख्तावर को तलवार पकड़नी पड़ी। अकेले ही ने कई मुसलमानों को मार गिराया। अंत में गौ-रक्षा करता हुआ स्वयं भी बलिदान हो गया। बख्तावरसिंह के बलिदानों का गीत काव्य ‘शीतल भजनावली’ लिखा हुआ है।1

इनके अतिरिक्त और अनेक जाट-संत राजस्थान में हुए हैं। स्थानाभाव से इतने ही संतों का वर्णन किया है। मारवाड़ में तो दानी भी एक से एक बढ़कर हुए हैं। भात देने के समय वर एक गीत भी जाट-चौधरी के दान की प्रशंसा में गाया जाता है। कहते हैं उसने उस कुल रकम को, जो बादशाह देहली को अपने देश का राजस्व चुकाने के लिए देने को जा राह था, एक रोती हुई औरत को इसलिए दे दिया था कि वह भाई के अभाव में इसलिए रो रही थी कि उसक कोई भात लेने वाला न था।

यह प्रसंग साक्षी है कि जाट जहां वीर थे, वहां हरि-भक्त भी पूरे थे। हम अब अन्य राज-वंशों पर प्रकाश डालते हैं।

बधाला- कर्कोटक

बधाला


यह नाम एक गांव के नाम पर प्रसिद्ध हुआ है। तोमर जाटों का वह समूह, जो राजस्थान में बधाल नामक स्थान पर बसा था, वह बधाला के नाम से मशहूर हुआ।


1.खेद है कि उस मारवाड़ी गीत की कापी हमारे पास से इस समय खो गई वरना हम अवश्य उसका कुछ अंश ‘इतिहास’ में देते।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-613


इनके भाट-ग्रन्थों में लिखा है कि दिल्ली से खडगल नामक सरदार ने अपने साथियों समेत राजस्थान में जहां अपने रहने के लिए छावनी बनाई, वहीं आगे चलकर खंडेल नाम से मशहूर हुई। यह भी कहा जाता है कि खडगल के नाम से ही कुल खंडेलावाटी प्रसिद्ध हुआ। खडगल के कई पीढ़ी बाद, बधाल नाम का एक पुत्र हुआ। उसने बधाल में अपना प्रभुत्व कायम किया। खंडेल और बधाल में लगभग 30 मील का अन्तर है। इन लोगों के दसवीं सदी से लेकर चौदहवीं तक, भूमियां ढंग के शासन-तंत्र इस भू-भाग पर रहे हैं।

कर्कोटक

उज्जैन स्थित कर्कोटकेश्वर मंदिर

इनका वर्णन पिछले पृष्ठों में आ चुका है। यह यादव-वंशी समुदाय अब कटेवा नाम से मशहूर है। इन्हीं लोगों के नाम से उस नदी का नाम काटली प्रसिद्ध हुआ, जिसके किनारे यह जमकर बैठ गए। झंझवन से आगे काटली नदी बहती थी। बरसात में वह अब भी बहती है। उसी के किनारों पर कटेवा लोगों का जनपद था। काटली नदी के किनारे खुडाना नामक एक गढ़ है। अब सिर्फ वहां भी मिट्टी का एक टीला अवश्य है। आस-पास के लोग कहते हैं, यह पहले गढ़ था। हमें विश्वास के साथ बताया गया है कि कटेवा लोगों का यहां राज्य था। ऐसा कहते हैं कि यवनों से युद्ध में लड़ते समय देश की रक्षा के लिए अत्यधिक संख्या में सिर कटाने के कारण ये कटेवा मशहूर हुए हैं, जिस भांति कि शिशोदिया। वास्तव में यह कर्कोट या वाकाटक यादव हैं।

नेहरा राजवंश

झुंझुनू के संस्थापक जुझारसिंह नेहरा

इस नाम के लोग ब्राह्मणों में भी पाए जाते हैं, जो कि नेहरू कहलाते हैं। राजस्थान में नेहरा जाटों का लगभग दो सौ वर्गमील भूमि पर किसी समय अधिकार रहा था। उनके नाम से झुंझनूं के निकट का पहाड़ आज भी नेहरा पहाड़ कहलाता है। दूसरे पहाड़ का नाम मौड़ा (मौरा) है जो कि मौर्य लोगों के नाम पर प्रसिद्ध है। थोड़ा-सा परिचय नेहरा लोगों का हम पिछले पृष्ठों में भी दे चुके हैं। नेहरा लोगों में सरदार झूंझा अथवा जुझारसिंह बड़े प्रसिद्ध वीर हुए हैं। उनके नाम से झूंझनूं जैसा प्रसिद्ध नगर विख्यात है। कुंवर पन्नेंसिंह ने ‘रण-केसरी सरदार जुझारसिंह’ नाम की पुस्तक लिखी थी। उसी में से नेहरा और सरदार जुझारसिंह का थोड़ा-सा वर्णन यहां पर हम देते हैं ।

पन्द्रहवीं सदी में नेहरा लोगों का नरहड़ में राज्य था, वहां पर उनका एक दुर्ग भी था। उससे 16 मील पच्छिम मे नहरा पहाड़ के नीचे नाहरपुर में उनके दूसरे दल का राज्य था। सोलहवीं सदी के अन्तिम भाग और सत्रहवीं सदी के आरम्भ में नेहरा लोगों का मुसलमान शासकों से युद्ध हुआ। आखिर नेहरा लोगों ने बादशाहों की अधीनता स्वीकार


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कर ली। वे खास वक्त पर बादशाहों को भेंट देते थे। शाहों को भेंट देने के कारण उनकी ‘शाही भेटवाल’ के नाम से पुकारा जाने लगा। आज तक वे ‘शाही भेटवाल’ कहलाते हैं।

जुझारसिंह


झुंझुनू के संस्थापक जुझारसिंह नेहरा की मूर्ती

सरदार जुझारसिंह का जन्म 1721 विक्रम श्रावण महीने में हुआ था। उनके पिता नायब के यहां फौजदार के पद पर थे। युवा होने पर सरदार जुझार नवाब की सेना के जनरल हो गये। उनके हृदय में एक बात थी और वह यह कि वे भारत में फिर से जाट-साम्राज्य स्थापित हुआ देखना चाहते थे। जाट-शाही की स्थापना के सन्दर्भ में पंजाब और ब्रज के जाट राजाओं व गोकुला के बलिदान की चर्चा उनके कानों तक पहुंच गई थी। वे चाहते थे कि मुस्लिम-शाही के विरुद्ध जाट लोग सम्मिलित बगावत कर दें। इन्हीं दिनों, उनकी एक राजपूत से भेंट हुई। वह किसी रिश्ते के सम्बन्ध से, नवाब के यहां आकर, मुलाजिम हुआ था। उसका नाम शार्दूलसिंह था। दोनों में सौदा हुआ। शार्दूल ने वचन दिया कि इधर से नवाबशाही के नष्ट करने पर तुम्हें (जुझारसिंह को) अपना सरदार मान लेंगे। अवसर आया और सरदार जुझार ने झुंझनूं और नरहड़ के नवाबों को परास्त कर दिया, उनके साथी भगा दिए। ‘रणकेसरी जुझारुसिंह’ नामक पुस्तक में लिखा है - जुझारुसिंह को दरबार करके सरदार बनाया गया। सरदारी का तिलक करने के बाद उसे एकान्त में अकेला पाकर राजपूतों ने उनके ऊपर हमला कर दिया और इस भांति उन्हें मार डाला। लिखा गया है कि सरदार जुझार के यह पूछने पर कि यह कैसी सरदारी दी जा रही है, जवाब मिला हम मूर्ख नहीं हैं, “तुम्हें जिन्दों का नहीं तो मरे हुए लोगों का सरदार बना रहे हैं। तुम्हें चाहिए था, सावधान रहते।” इस घृणित कृत्य का समाचार ज्यों ही नगर में फैला, हाहाकार मच गया, जाट सेनाएं बिगड़ खड़ी हुई। उनमें से कुछेक लोभी मनुष्यों को विपक्षियों ने अपने में मिला लिया। कहा जाता है उस समय एक चारण ने शार्दूलसिंह के पास जाकर कहा था -

“सादे, लीन्हों झूंझणूं, लीनो अमर पटै। बेटे पोते पड़ौते पीढ़ी सात लटै।”
अर्थात् - सादुल्लेखां से इस राज्य को झूंझा (जुझारसिंह) ने लिया था, वह तो अमर हो गया। अब इसमें तेरे वंशज सात पीढ़ी तक राज्य करेंगे।

जुझार, अपनी जाति के लिए शहीद हो गए। वह इस संसार में नहीं रहे, किन्तु उनकी कीर्ति आज तक गाई जाती है। झुंझनूं नाम, उनके ही नाम झूंझा पर पड़ा है।

शेखावतों ने जाट-क्षत्रियों के विद्रोह को दबाने के लिए तथा उन्हें प्रसन्न करने के लिए निम्नलिखित आज्ञाएं जारी कीं -


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  • (1) लगान की रकम उस गांव के जाट मुखिया की राय से ली जाया करेंगी,
  • (2) जमीन की पैमायश गांव के लम्बरदार किया करंगे,
  • (3) गोचर भूमि के ऊपर कोई टैक्स न होगा,
  • (4) जितनी भूमि में चारे के लिए गुवार बोई जाएगी, उस पर कोई टैक्स न होगा,
  • (5) गांव से चोरी की हुई वस्तु की खोज का खर्चा तथा राज के अधिकारियों के गांव में आने का एवं खुराक खर्च गांव के लगान में से काट दिया जाएगा। जो नजर राज के ठाकुरों को दी जाएगी वह लगान में वाजिब होगी,
  • (6) जो जमीन गांव के बच्चों को पढ़ाने वाले ब्राह्मणों को दी जाएगी उसका कोई लगान न होगा। जमीन दान करने का हक गांव के मुखिया का होगा,
  • (7) किसी कारण से कोई लड़की अपने मांयके (पीहर) में ही रहेगी तो उस जमीन पर कोई लगान न होगा, जिसे लड़की जोतेगी,
  • (8) गांव का मुखिया किसी काम के लिए बुलाया जाएगा तो उसका खर्च राज देगा,
  • (9) गांव के मुखिया को उसके जोतने के लिए जमीन मुफ्त दी जाएगी। सारे गांव का जो लगान होगा, मुखिया को उसका दसवां भाग दिया जाएगा। अब भी खेतड़ी सीकर जैसे बड़े ठिकानों में यह भाग दिया जाता है, पर अब दसवां भाग नहीं, बीसवां होता है जो पचोतरा कहलाता है,
  • (10) मुखिया वही माना जाएगा जिसे गांव के लोग चाहेंगे, यदि सरदार गांव में पधारेंगे तो उनके खान-पान व स्वागत का कुल खर्च लगान में से काट दिया जाएगा, (11) गांव के टहलकार (कमीन) लोगों को जमीन मुफ्त दी जाएगी,
  • (12) जितनी भूमि पर आबादी होगी, उसका कोई लगान न होगा,
  • (13) इस खानदान में पैदा होने वाले सभी उत्तराधिकारी इन नियमों का पालन करेंगे।

कुछ दिनों तक इनमें से कुछ नियम अनेक ठिकानों में ज्यों-के-त्यों कुछ हेर-फेर के साथ माने जाते थे। कुछ ने एक प्रकार कतई इन नियमों को मेट दिया है।

एक चित्र में सरदार जुझारसिंह घायल अवस्था में टूटी हुई सांग को कंधे पर रखे हुए और घोड़े पर सवार दिखाए गए हैं।

हमें बताया गया है कि सरदार जुझारसिंह के जीवन पर किसी जाटेतर भाई ने प्रकाश डाला है, कुछ अपशब्द भी जुझारसिंह के लिए लिखे हैं, इसीलिए वह उस पुस्तक को सर्व साधारण में नहीं बेचता। झूंझनू का मुसलमान सरदार जिसे कि सरदार जुझारसिंह ने परास्त किया था, सादुल्ला नाम से मशहूर था। झूंझनूं किस समय सादुल्लाखां से जुझारसिंह ने छीना था, इस बात का पता निम्न काव्य में मिलता है-

“सत्राह सौ सत्तासी, आगण मास उदार।
सदे, लीन्हों झुंझनुं सुठि आठें शनिवार।।

सरदार जुझारसिंह के पश्चात् ज्यों-ज्यों समय बीतता गया उनकी जाति के


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लोग पराधीन होते गए, यहां तक कि वे अपनी नागरिक स्वाधीनता को भी खो बैठे। एक दिन जो राजा और सरदार थे, आज उन्हें पक्के मकान बनाने के लिए भी जमीन खरीदनी पड़ती है। उन पर बाईजी का हाथ लगा और भेंट, न्यौता-कांसा आदि अनेक तरह की बेहूदी लाग और लगा दी गई है।

पोनियां, बेणीवाल, सारन, कसवां, असियाग

पोनियां

पोनियां सर्पों की एक नस्ल होती है। इस नाम से जान पड़ता है कि यह नागवंशी हैं। ‘हिसार गजिटियर’ में लिखा हुआ है कि - “ये अपने को शिव गोत्री मानते हैं, साथ ही महादेव की जटाओं से निकलने का भी जिक्र करते हैं।” शिव और तक्षक लोग पड़ौसी थे। साथ ही दोनों ही समुदाय आगे चलकर शैव मतानुयायी भी हो गए थे। इसलिए उनका निकट सम्बन्ध है। सिकन्दर के आक्रमण के पश्चात् शिवोई (शिवी) और तक्षक वंशी लोग पंजाब से नीचे उतर आए थे। उनमें से ही कुछ लोगों ने जांगल-प्रदेश को अधिकार में कर एक लम्बे अर्से तक उसका उपयोग किया था। जांगल-प्रदेश में ईशा के आरम्भिक काल में पहुंच गए थे। उन्होंने इस भूमि पर पन्द्रहवीं शताब्दी के काल तक राज्य किया है। जिन दिनों राठौरों का दल बीका और कान्दल के संचालन में जांगल-प्रदेश में पहुंचा था, उस समय पोनियां सरदारों के अधिकार में 300 गांव थे। वे कई पीढ़ी पहले से स्वतंत्रता का उपभोग करते चले आ रहे थे। उन्हीं के छः राज्य जाटों के जांगल-प्रदेश में और भी थे। रामरत्न चारण ने ‘राजपूताने के इतिहास’ में इन राज्यों को भौमियाचारे राज्य लिखा है। इन राज्यों का वर्णन ‘भारत के देशी राज्य’ ‘तारीख राजगान हिन्द’ ‘वाकए-राजपूताना’ आदि कई इतिहासों में है। हमने भी प्रायः सारा वर्णन उन्हीं इतिहासों के आधार पर लिखा है। उस समय इनकी राजधानी झांसल थी जो कि हिसार जिले की सीमा पर है। रामरत्न चारण ने अपने इतिहास में इनकी राजधानी लुद्धि नामक नगर में बतायी है। उस समय इनका राजा कान्हादेव था। कान्हादेव स्वाभिमानी और कभी न हारने वाला योद्धा था। उसके अन्य पूनियां भाई भी उसकी आज्ञा में थे। गणराज्यों को फूट नष्ट करती है। उसके पोनियां समाज में एकता थी। प्रति़क्षण उपस्थित रहने वाली सेना तो कान्हदेव के पास अधिक न थी, किन्तु उसके पास उन नवयुवक सैनिकों की कमी नहीं थी, जो अपने-अपने घर पर रहते थे और जब भी कान्हदेव की आज्ञा उनके पास पहुंचती थी, बड़ी प्रसन्नता से जत्थे के जत्थे उसकी सेवा में हाजिर हो जाते थे। प्रत्येक पोनियां अपने राज्य को अपना समझता था। वे सब कुछ बर्दाश्त करने को तैयार थे। किन्तु यह उनके लिए असह्य था कि अपने ऊपर अन्य जाति का मनुष्य शासन करता। ऐसी उनकी मनोवृत्ति थी जिसके कारण उन्होंने बीका


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की अधीनता को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया था। वे अपनी स्वाधीनता बनाए रखने के लिए उस समय तक लड़ते रहे जब तक कि उनके समूह के अन्दर नौजवानों की संख्या काफी रही। उनके स्थानों पर राठौर अधिकार कर लेते थे। अन्त में राठौरों ने उनके दमन के लिए उनके बीच में गढ़ को ढहा देते थे। दन्तकथा के आधार पर कहा जाता है कि राजगढ़ के बुर्जो में कुछ पोनियां जाटों को चुन दिया था।

बड़े संघर्ष के बाद पोनियां लोग परास्त कर दिए गए। तब उनमें से कुछ यू.पी. की तरफ चले आये। राठौरों के पास सेना बहुत थी, गोदारे जाटों का समूह भी उनके साथ था। इसलिए पोनियां हार गए। पर यह पोनियों के लिए गौरव की बात ही रही कि स्वाधीनता की रक्षा के लिए उन्होंने कायरता नहीं दिखाई। उन्होंने खून की नदियां बहा दीं। वे बदला चाहते थे, उनके हृदय में आग जल रही थी। उनके नेताओं के साथ जो घात सरदारों ने किया था, उसका प्रतिकार पोनियों ने राठौर नरेश रायसिंह का वध करके किया। ‘भारत के देशी राज्य’ में भी पोनियों के द्वारा बदला लेने की बात लिखी है।

पोनियां जाटों के राज्य की सीमा झांसल (हिसार की सीमा) से मरोद तक थी। मरोद राजगढ़ के दक्षिण में 12 कोस की दूरी पर है। दन्त कथाओं के अनुसार किसी साधु ने पोनियां सरदार से कहा था कि घोड़ी पर चढ़कर जितनी जमीन भूमि दबा लेगा, वह सब पोनियों के राज्य में आ जाएगी। निदान सरदार ने ऐसा ही किया। घोड़ी दिन भर छोड़ने के बाद सांयकाल मरोद में पहुंचने पर मर गई। उस समय पोनियां सरदार ने कहा था-

“झासल से चाल मरोदा आई। मर घोड़ी पछतावा नांही।”

पोनियों की पुरानी राजधानी झांसल में जहां उनका दुर्ग था, कुछ निशान अब तक पाए जाते हैं। बालसमंद में भी ऐसे ही चिन्ह पाए जाते हैं।

राठौर राजा इनके वंशधरों को सन्तुष्ट रखने के लिए कुछ उनके मुखियों को देते रहे। कुछ समय पहले ही दश पोशाक और कुछ नकद के प्रति वर्ष राज से पाते हैं।

बेणीवाल


राठौरों से, जिस समय अपने राज्य की रक्षा के लिए, बेणीवाल जाटवीरों का संघर्ष हुआ, उस समय उनके पास 84 गांव थे। राय सेलाणा नाम के स्थान में इनकी राजधानी थी। राजा का नाम रायसल्ल था जो कि बहादुर किन्तु सीधा सरदार था। गोदारा लोग राठौरों से मिल गये थे। इस कारण इनका युद्ध में बहुत लम्बे अर्से तक डटा रहना कठिन था, इसलिए इन्होंने भी अधीनता स्वीकार कर ली।


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चारण रामरत्न ने बेणीवालों के अधिकार में चालीस गांव लिखे हैं, किन्तु ‘वाकए राजपूताना’ जिल्द दो में मुंशी ज्वालासहायजी ने 150 गांव लिखे हैं।

इनके राज्य में बूकरको, सोन्दरी, मनोहरपुर, कूई और बाई जैसे प्रसिद्ध नगर शामिल थे। पोनियां जिनका कि ऊपर वर्णन किया गया है, बेणीवालों से अधिक शक्तिशाली थे। भादरा, अजीतपुर, सीधमुख, राजगढ़, ददरेवा और सांखू किसी समय उनके अधिकार में रहे थे।

बेणीवाल भी पोनियों की भांति नागवंशी अथवा शिव-गोत्री हैं। बेणी सिर के बालों के गुच्छे को कहते हैं। महादेव की जटाओं से जाटों के पैदा होने की जो फिलासफी है, उसके अनुसार वे शिव-गोत्री अथवा नाग-वंशी ही हो सकते हैं। बीकानेर के सिवाय पंजाब और संयुक्त प्रदेश में भी उनकी आबादी पाई जाती है। बीकानेर राज की ओर से उनके मुखियाओं के लिए पोशाक, सालाना 500 रुपये और 75 रुपये की नदकार बंधी हुई बताई जाती है। बेणीवाल लोग जांगल के उस भाग के शासक थे, जो अन्य लोगों के राज्यों से कहीं अधिक उपजाऊ था। जाटों के ग्रन्थों में इनके दान की और ठाट-बाट की खूब प्रशंसा कही गई है।

सारन


भाट-ग्रन्थों में राव सारन नाम के भाटी और औलाद में हुए लोगों का नाम सारन है। भाट लोग कहते हैं कि सारन ने जाटनी से शादी कर ली थी। इससे उनके वंशज सार कहलाए, यह कथा नितान्त झूठी गढन्त है, जिनका हमने पिछले पृष्ठों में काफी खंडन कर दिया है। सारन वंशीय जाट-क्षत्रिय हैं। सारन व उनके पूर्वज जाट थे। वे उस समय से जाट थे, जिस समय कि लोग यह भी नहीं जानते थे कि राजपूत भी कोई जाति है। जांगल-प्रदेश में उनके अधिकार में 300 से ऊपर नगर और गांव थे। रामरत्न चारण ने उनके अधिकृत गांवों की संख्या 460 बताई है। उनकी राजधानी भाडंग में थी। खेजड़ा, फोगा, बूचावास, सूई, बदनु और सिरसला उनके अधिकृत प्रदेश के प्रसिद्ध नगर थे। राठौरों से उनके जिस राजा का युद्ध हुआ था, उसका नाम पूलाजी था। प्रजा इनकी धन-धान्य से पूरित थी। राज्य में पैदा होने वाली किसी चीज पर टैक्स न था। वहां जो चीजें आती थीं, उन पर भी कोई महसूल न था। कहा जाता है कि जांगल-देश के ब्राह्मण घी, ऊन का व्यापार किया करते थे। राज्य में जितनी भी जातियों के प्रजा-जन थे, सबके साथ समानता का व्यवहार किया जाता था। सारन शांति-प्रिय थे। उनकी प्रवृत्ति थी, ‘स्वंय जियो और दूसरों को जीने दो’। रामरत्न चारण ने अपने लिखे इतिहास में बताया है कि गोदारों जाटों का सरदार पांडु सारणों के अधीश्वर की स्त्री को भगा ले गया, इस कारण जांगल-प्रदेश के सभी जाट-राज्य गोदारों के विरुद्ध हो गए। कहना होगा कि जाटों के लगभग तीन हजार गांवों की सल्तनत को कुल्हाड़ी के


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बेंट गोदारा पांडु ने नष्ट करा दिया। पांडु यदि राठौरों के हाथ अपनी स्वाधीनता को न बेच देता, तो राठौरों पर इतनी आपत्ति आती कि फिर बेचारे जांगल-प्रदेश की ओर आने की हिम्मत तक न करते। गोदारों की शक्ति अन्य समस्त जाट-राज्यों की शक्ति के बराबर थी। यह नहीं कहा जा सकता कि जांगल-प्रदेश के जाटों को राठौरों ने जीता। जाटों के सर्वनाश का कारण उनकी पारस्पारिक फूट थी। उसी फूट का शिकार सारन जाट हो गए। उनका प्रदेश युद्धों के समय उजाड़ दिया गया और वे पराजित कर दिए गये, किन्तु शांति-प्रिय सारनों ने जो वीरता अपने राज्य की रक्षा के लिए दिखाई थी, वृद्ध सारन जाट उसे बड़े गर्व के साथ अपनी सन्तान को सुनाता है।

कसवां


आरम्भ में यह सिन्ध में राज्य करते थे। ईसा की चौथी सदी से पहले जांगल-प्रदेश में आबाद हुए थे। इनके अधिकार में लगभग चार सौ गांव थे। सीधमुख राजधानी थी। राठौरों से जिस समय युद्ध हुआ, उसय समय कंवरपाल नामी सरदार इनका राजा था। इस वंश के लोग धैर्य के साथ लड़ने में बहुत प्रसिद्ध थे। कहा जाता है दो हजार ऊंट और पांच सौ सवार इनके प्रतिक्षण शत्रु से मुकाबला करने के लिए तैयार रहते थे। यह कुल सेना राजधानी में तैयार न रहती थी। वे उत्तम कृषिकार और श्रेष्ठ सैनिक समझे जाते थे। राज उनका भरा-पूरा था। प्रजा पर कोई अत्याचार न था। सत्रहवीं शताब्दी में इनका भी राज राठौंरों द्वारा अपहरण कर लिया गया। इनके पड़ौस में चाहर भी रहते थे। राजा का चुनाव होता था, ऐसा कहा जाता है। चाहरों की ओर से एक बार मालदेव नाम के उपराजा का भी चुनाव हुआ था।

असियाग


इन लोगों को ‘असि’ शब्द के कारण कुछ इतिहासकारों ने असीरिया से लौटे हुए लिखा है, किन्तु बात ऐसी नहीं है। आरम्भ में ये लोग असीरगढ़ में रहते थे। यहीं से एक भाग यूरोप चला गया, जिसके कारण उनके उपनिवेश का नाम असीरिया प्रसिद्ध हुआ। जांगल-प्रदेश में बसने वाले असियाग नाम से प्रसिद्ध हुए। असि तलवार को कहते हैं। कौटिल्य ने शस्त्रोपजीवी और शास्त्रोपजीवी गणों का उल्लेख किया है। असियाग शस्त्रोपजीवी थे अर्थात् जिनकी आजीविका शस्त्र अथवा तलवार (असि) थी। जांगल-प्रदेश के 150 ग्रामों पर इनका अधिकार था। इनके राज्य की सीमा में ही रावतसर, वीरमसर, दांदूसर और गण्डेली आदि थे। इनके राज्य की राजधानी पल्लू में थी। राजा का नाम चोखासिंह। राठौरों के युद्ध में वर्षों तक लड़ने के बाद इनका भी राज्य नष्ट हो गया।


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अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए असियागों ने कोई कसर न छोड़ी थी। स्वतंत्रता-अपहरण हो जाने के बाद भी इन्होंने उद्योग किया कि शत्रु से अपना राज्य छीन लें, किन्तु उस समय तक शत्रु की शक्ति बहुत बढ़ गई थी। देहली के बादशाहों से उस समय राठौरों का सम्बन्ध स्थापित हो जाने के कारण यह एक दम असम्भव हो गया था कि असंगठित जाट, जो कि आपस में ही एक-दूसरे के शत्रु बने हुए थे, अपना राज वापस ले लेते।

गोदारा, जोहिया

गोदारा


भारत की स्वतंत्रता को नष्ट कराने में जिस भांति जयचन्द राठौर का नाम बदनाम है, उसी भांति जांगल प्रदेश के जाट-साम्राज्य को पांडु गोदारा ने नष्ट कराकर अपने नाम को जाटों के लिए अहितकारी सिद्ध कर दिया है। आज उसकी संतान के नौजवान इस बात के लिए पश्चाताप कर सकते हैं कि शासक-जाति के होते हुए भी शासित हैं। किन्तु इतिहास में सभी प्रकार की घटनाएं हमें मिलती हैं। पांडु को यह कुछ भी पता न था कि उनकी संतान के जो अधिकार इस समय सुरक्षित हो रहे हैं, वे भविष्य में नष्ट हो जाएंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं, पांडु बड़ा बहादुर सरदार था। उसके गोदारे बांके योद्धा थे। जांगल-प्रदेश में सबसे अधिक राज्य गोदारों के ही पास थे। उनके अधिकार में 700 गांव थे। इसी एक बात से जाना जाता है कि वे प्रसिद्ध योद्धा और महत्वाकांक्षी थे। पांडु से एक गलती हो गई थी कि वह सारन पूला की स्त्री को ले गया। कहा ऐसा जाता है कि सारन पूला से पहले उस स्त्री की शादी पांडु से होने वाली थी। पांडु ने स्त्री को उठाकर गलती ही की। किन्तु सभी जाट राज्यों का उससे शत्रुता कर लेना उचित न था। एक ओर से मोहिल जाति गोदारों की शत्रु बनी हुई थी, दूसरी ओर से जैसलमेर के भाटी उन्हें हड़प जाना चाहते थे, तीसरी ओर स्वयं जाट उन्हें मिटाने पर तुले हुए थे और चौथी ओर से प्रबल राठौर आक्रांता आ रहे थे। ऐसी हालत में गोदारा क्या करते? आत्म-समर्पण के सिवाय उन्हें कोई चारा नहीं दिखाई दिया। उन्होंने राठौर के साथ जो संधि की थी, उसकी शर्तें मांडलिक राजों से कम नहीं हैं। मुन्शी ज्वालासहाय जी ने लिखा है - बीका के वंशजों ने उन शर्तों का पालन नहीं किया।1

गोदारों का वर्णन जो ‘वाकए राजपूताना’ में लिखा गया है, उसके कुछ अंश हम ज्यों के त्यों उद्धृत करते हैं-

“अपनी कदीम रियासत जोधपुर से आने के कुछ दिनों के बाद बीका 2470 गांव का मालिक हो गया। चूंकि इन दलों के लोगों ने उसे खुद मालिक स्वीकार

1. वाक-ए राजपूताना, जिल्द 3 ।


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कर लिया था, यह स्वीकारी उसे विजय से अच्छी पड़ी। किन्तु तब से अब तक उनमें से आधे देहात बरबाद हो गए हैं। किन्तु सूरतसिंह के जमाने में तो आधे भी न रहे थे। इस देश के जाट और जोहिया उत्तरी देशों में गाढ़ा नदी तक फेले हुए थे। वे अपना निर्वाह प्रायः पशुपालन से करते थे। भेड़-बकरियों के ऊन और भैंसों-गांयों के घी को सारस्वत ब्राह्मणों के हाथ बेच देते थे। उस रुपये से आवश्यक वस्तु मंगा लेते थे। जाटों की प्राचीन सादगी रफा हो के राजपूतों के अधिकृत होने और राज्य बीकानेर के कायम होने में चन्द नगर अनुकूल हो गए थे। बीका के मोहिलों पर विजयी होने से उन्हें विजय करना सुगम हो गया था। किन्तु जाटों में वह फूट न होती जिसने दुनिया की प्रायः सल्तनतों को बर्बाद कर दिया है, तो सहज ही में बिना खून-खराबी के सफल न होता। जाटों के छः दलों में से उनके दो बड़े दलों - जोहिया और गोदारों में अनबन थी। इससे उन्होंने राजी से बीका की हुकूमत को स्वीकार कर लिया। दूसरे वे बीका की फौज के उस अत्याचार को देख चुके थे जो उसने मोहिलों पर विजय पाने के समय किए थे। तीसरे वे यह भी चाहते थे कि हमारे और जैसलमेर के बीच कोई सरहद कायम हो जाए।

गोदारों का सरदार पाण्डु जो सेखसर में रहता था और रूनियां का सरदार जो उससे दूसरे दर्जे पर था, गोदारा जाटों की सभा ने इन दोनों को बीका के पास अधीनता स्वीकार करने की बात तय करने को भेजा। उन्होंने बीका के सामने निम्न प्रस्ताव रखे-

  • 1. जोहिया आदि दीगर फिरकों के मुकाबले में हमारी मदद की जाये,
  • 2. पश्चिमी सीमा की हिफाजत रखें,
  • 3. हमारी जमात के अधिकार और लाभों में कोई हस्तक्षेप न किया जाये, अर्थात् सुरक्षित रखें।

‘भारत के देशी राज्य’ नामक इतिहास में लिखा है कि -

“बीका ने उक्त प्रस्ताव स्वीकारते हुए कहा था - ‘मैं’ तथा मेरे उत्तराधिकारी किसी भी समय तुम्हारे अधिकारों में हस्तक्षेप न करेंगे। और जब तक इस तरह राजतिलक न दिया जाएगा, तब तक राजसिंहासन सूना समझा जाएगा।”

मुन्शी ज्वालासहाय जी ‘वाकए-राजपूताना’ में आगे लिखते हैं -

'इस पर गोदारों ने अपने इलाके में महसूल धुआं फी घर एक रुपया और जोता जमीन फी सौ बीघे पर दो रुपया लगान वसूल करने का अधिकार बीका को दिया।

'इस पशुपालन गिरोह के इस तरह इन्तकाल आतअत करने से शौक आजादी जो आक्सस और जगजार्टिस के किनारे से हिन्दुस्तान के जंगल तक उनके साथ रहा, बखूबी अयां है और अगर्चे उनकी हुकूमत मालिकाना बिलकुल चली गई है लेकिन उनका राजपूत आकाए, उनके नामुमकिन उल-इन्तकाल वापोती यानी


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-622


हुकूक मौरुसी पर दस्तन्दाजी करना चाहें तो अब भी खूरेजी पर मुस्तैद हैं।1

गौदारों की अनबन से बीका को बिना लड़ाई-झगड़ा किए भू-भाग व हुकूमत मिल गई। ऐसा बहुत कम होता है और कुछ एक रस्में जो बतौर यादगार तरज हसूल हुकूमत मालिकाना कदमि वाशिन्दगान मुल्क से कुल हिन्दुस्तान के राजपूतों में जारी है असलियत की जानकारी के लिए बड़े काम की है। फर्मान रवायां मेवाड़ का मुल्क के कदीम वाशिन्दगान यानी भीलों से तिलक कराना आमेर में खजाने व किलआत का मैनों की हिफाजत व अहतमाम में रहना। कोटा-बूंदी का मदीक मालिकान हाडौती के नाम से मासूम होना और औलाद बीका का जाटों से टीका कराना ऐसी रस्में हैं कि उनके सबब से कदीम मालिकान सर जमीन के हकूक और तर्ज हसूल रियासत फर्मान वालिया हाल सहू नहीं हो सकते। आज तक दस्तूर जारी है कि बीका की औलाद में से कोई तख्तनशीन होता है तो पांडु खानदान का कोई शख्स उसके राजतिलक करता है। उस जाट को राज पच्चीस अशर्फियां देता है। अलावा इसके जिस जमीन को बीका ने अपनी राजधानी बनाने के लिए पसन्द किया था, वह एक जाट की मुल्क-मौरूसी थी। उसने भी दावा किया कि शहर के नाम के साथ मेरा नाम भी शामिल किया जाये। उसका नाम नेरा था, इसलिए बीका और नेरा के नाम से शहर का नाम बीकानेर रखा गया। दवामी यादगार मिल्कित के सिवा शेखसर और रूनियां के जमींदार होली और दशहरा पर रईस और उसके सरदारों के टीका करते हैं। रूनियां का सरदार अपने हाथ में नकरई तस्त व प्याला लेता है और शेखसर वाला रईस की पेशानी पर तिलक करता है। रईस इनको एक अशर्फी और पांच रुपये पेश करता है। अशर्फी शेखसर वाला ले लेता है और रुपये रूनियां वाले के पास रहते हैं। अन्य सरदार भी इसी तरह अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार नजर करते हैं।”


ऊपर के वर्णन से मालूम होता है कि गोदारों की जो सन्धि बीकाजी के साथ हुई थी, वह सम्मानपूर्ण थी। उसमें यह कहीं भी जाहिर नहीं होता कि उन्होंने अपनी स्वाधीनता खो दी थी। यह ठीक है कि पीछे से शनैः-शनै उनकी स्वाधीनता नष्ट हो गई। कई इतिहासकारों ने राठौरों को इसके लिए दोष दिया है कि उन्होंने यह अच्छा नहीं किया कि अपने सहायक गोदारों की स्वतन्त्रता नष्ट कर दी, उन्हें ठिकानेदारों के रूप में भी नहीं रहने दिया। कुछ लोगों की ऐसी भी शिकायत है, किन्तु हम इस बात के लिए राठौर शासकों एवं बीकाजी के वंशजों को तनिक भी दोष देना उचित नहीं समझते। राजनीति में ऐसा होता है। यदि हमें भी राठौरों जैसा अवसर प्राप्त होता तो हम भी उनके साथ यही व्यवहार करते।


1. ये शब्द हमारे नहीं. 'वाकए राजपूताना' जिल्द में मुंशी ज्वालासहयजी ऐसा ही लिखा है. (लेखक)

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जोहिया


ये यौधेय-वंशीय हैं। प्रजातंत्री समुदायों में यौधेय बहुत प्रसिद्ध रहे हैं | जैसलमेर, जांगल और मारवाड़ के बहुत से प्रदेश पर किसी समय इनका राज रहा है। राठौरों से पराजित होने से पहले उनका 600 गांवों पर अधिपत्य था। शेरसिंह इनका राजा था। जैसा नाम था, वैसा ही वह शूरवीर भी था। राठौरों को नाकों चने शेरसिंह ने ही चबाए थे। भूरूपाल में उसकी राजधानी थी।

गोदारों से सन्धि हो जाने के बाद बीका जी ने कुछ समय अपनी व्यवस्था ठीक करने और शक्ति संचय करने में लगाया। जब अवकाश मिला तो गोदारों की ओर अपनी सेनाएं लेकर जोहिया जाटों पर आक्रमण किया। शेरसिंह ने अपनी सेनाएं इकट्ठी करके दोनों शक्तियों का मुकाबला किया। शेरसिंह बड़ा बांका योद्धा था। भय उसके पास तनिक भी न फटकता था। वास्तव में यह निरन्तर लड़ने वाले शूरों मे से था। ‘देशी राज्यों के इतिहास’ में सुखसम्पत्ति राय भंडारी ने लिखा है-

“शेरसिंह ने अपनी समस्त सेना के साथ बीका जी के खिलाफ युद्ध करने की तैयारी कर रखी थी। बीका जी जो कई युद्धों के विजेता थे इस युद्ध में सरलता से विजय प्राप्त न कर सके। शत्रुगण अद्भुत् पराक्रम दिखाकर आपके छक्के छुड़ाने लगे। अन्त में विजय की कोई सूरत न देख, आपने षड़्यन्त्र द्वारा शेरसिंह को मरवा डाला।”1


शेरसिंह के मारे जाने के बाद भी जोहिया जाट विद्राही बने रहे। उन्होंने सहज ही में अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका प्रत्येक युवक प्राणों की बाजी लगाकर स्वाधीनता की रक्षा करना चाहता था। जब भी उनका कोई दल संगठित हो जाता, विद्रोह खड़ा कर देते। शेरसिंह के बाद उन्हें कोई उतना योग्य नेता नहीं मिला। जोहिया जाट राठौरों को जांगल-प्रदेश से अवश्य ही खदेड़ देते यदि गोदारे उनके साथ न होते। गोदारों की भी शक्ति जोहियों से कम नहीं थी। दो प्रबल शत्रुओं के मुकाबले में आखिर उन्हें विवश होना पड़ा। धीरे-धीरे उनका विद्रोही स्वभाव भी जाता रहा। जाटों से अब राठौर निष्कंटक हो गए। जाट और राठौरों की सबसे बड़ी लड़ाई सीधमुख के पास ढाका गांव में हुई थी।2

शासन व्यवस्था

इन जाट राजाओं की शासन-व्यवस्था कैसी थी? इस सम्बन्ध में बहुत कम सामग्री मिलती है। किन्तु यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि जितना प्रजा के


1. वाक-ए राजपूताना में भी यही बात लिखी है।
2. रामरत्न चरण का इतिहास।


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लिए उनके शासन में सुख और आजादी थी, वह अब स्वप्न की बात है।

सरदार - इनके राज्य प्रजातंत्री प्रणाली के थे, किन्तु सरदार वंशानुगत होता था। फिर भी अयोग्य व्यक्ति को राजा या सरदार नहीं बनाया जाता था। बड़े सरदारों के नीचे छोटे-छोटे सरदार भी होते थे। गोदारा लोंगों में शेखसर का पांडु बड़ा सरदार माना जाता था, वह कुल गोदारों तथा गोदारे राज्य का सरदार था। दूसरे दर्जे का सरदार रोनियां में रहता था। एक तीसरे सरदार नेरा का भी पता चलता है, जिससे कि बीका जी ने अपनी राजधानी स्थापित करने के लिए जगह मांगी थी। ये सब सरदार आन्तरिक मामलों में स्वतंत्र थे, लेकिन युद्ध के समय सबको बड़े सरदार की आज्ञा मानना आवश्यक था। युद्ध-विग्रह और सन्धि जैसे महत्वपूर्ण विषयों के निर्णय करने में प्रधान सरदार भी स्वतंत्र न था। ऐसे मामले सभा द्वारा निश्चित होते थे।

सभाएं - ऐसी सभाएं दो प्रकार की होती थीं - एक सरदार-सभा अथवा साधारण-सभा, जिसमें केवल सरदार ही उपस्थित होते थे। दूसरी ज्ञाति-सभा जिसमें समस्त कुलपति बैठते थे। दूसरे प्रकार की सभा बुलाने की आवश्यकता बहुत कम होती थी। एक तीसरे प्रकार की नगर सभा भी थी। छोटे सरदार, पटेल और चौधरी इन्हीं नगर-सभाओं की सहायता से कार्य करते थे। नगर-सभाओं के सदस्य कुलपति होते थे। कुलपति वे कहे जाते थे जो एक परिवार के नायक होते थे। कुल की गणना एक ही दादा की सन्तान के कुटुम्बी जनों की हुआ करती थी। कुलपति थामे के नाम से भी कहीं-कहीं पुकारे जाते थे। राठौर-पति बीका जी के साथ युद्ध किया जाए अथवा मित्रता, इस बात का निर्णय गोदारों की सभा द्वारा हुआ था। इस सरदार सभा को ही सुखसम्पत्ति जी भंडारी ने अपने ‘भारत के देशी राज्य’ नामक इतिहास में साधारण-सभा लिखा है। उनका तात्पर्य थोड़े से आदमियों की सभा से है। समस्त गोदारे सरदारों (नेतामंडल) ने जो निश्चय किया था, उसे बीका जी के सामने रखने के लिए शेखसर और रूनियां के सरदार गए थे।

सेना - सेना इनकी दो भांति की हुआ करती थी, एक तो वह जो राजधानी में प्रतिक्षण तैयार रहती थी। इस सेना को वेतन दिया जाता था। दूसरी तरह की सेना स्वयं-सेवक-सेना समझनी चाहिए। इस सेना के नौजवान किसी सरदार के निकट रहकर अथवा केन्द्रीय राजधानी में जाकर युद्ध-विद्या सीखते थे। फिर निरन्तर अपने घर के काम-धन्धों में लगे रहते थे। होली-दशहरा अथवा अन्य ऐसे ही निश्चित दिवसों पर किसी मुख्य स्थान में रहकर ऐसे सैनिक अपनी योग्यता का परिचय देते थे। बनेटी के हाथ दिखाने, अग्नि-बाण, गोफन और तीरों से निशाना लगाने के करतबों का प्रदर्शन होता था, जो दंगल, मेला और प्रदर्शन के नाम से पुकारे जाते थे। श्रेष्ठ रहने वालों को पुरस्कार दिया जाता था। पुरस्कार में वस्त्र, मिठाई और रुपया दिए जाते थे। ऐसे सैनिकों के लिए भूमि


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बिलकुल मुफ्त दी जाती थी। कोई भी कुटुम्ब या घर ऐसा न होता था जिनके यहां से एक-दो सैनिक न हों। वृद्ध लोग स्वयं भी अपने बच्चों को शस्त्रा-विद्या सिखाते थे। प्रत्येक घर में सभी तरह के हथियार रहते थे। युद्ध अधिकतर ऊंटों पर चढ़कर करते थे। सरदार रथ में बैठकर युद्ध करता था। युद्ध के समय रसद गांव वाले पहुंचाते थे। पहले से सेना के आने की खबर सुनकर नगर के पास घने वृक्षों की छाया में खाने-पीने और ठहरने का प्रबन्ध प्रत्येक गांव कर देता था। खास अवसरों पर हथियार पहुंचाने का काम स्त्रियों द्वारा किया जाता था। यहां तक होता था कि कभी-कभी तो सैनिकों के लिए गांवों में घरों से रोटियां गाड़ियों में भरकर तथा सिरों पर रखकर सेना में पहुंचा देते थे। सारांश यह है कि युद्ध के समय सारा राष्ट्र ही लड़ता था। सेना के कम होने पर आह्वान का बाजा या टामक (ढोल) बजाया जाता था। खतरे के समय भी ऐसा ही बाजा बजाया जाता था। ऐसे बाजे के बजने पर चुप बैठे रहना या काहिली दिखाना पाप समझा जाता था।

टैक्स - केन्द्रीय तथा स्थानीय सरदार कुछ टैक्स भी लेते थे, किन्तु वह बहुत ही थोड़ा होता था। साल भर में प्रत्येक घर से एक रुपया या इससे कुछ अधिक लिया जाता था। जमीन पर तो नहीं, किन्तु पैदावर पर कुछ अन्न कर-स्वरूप लेने की प्रथा थी, जो बैलों के अनुपात से भी कहीं-कहीं वसूल होता था।

गोदारा लोगों के बीका जी से संधि करने पर ऐसे ही अधिकार उससे प्राप्त किए थे। ‘वाकय-राजपूताना’ में प्रति घर धुआं टैक्स एक रुपया और प्रति सौ बीघे उपजाऊ जमीन पर दो रुपया के हिसाब से देने की स्वीकारी करने का उल्लेख है।

गाय, भैंस, ऊंट ओर भेड़ सभी लोग पालते थे। सरदार लोगों के यहां पशुओं की संख्या और भी अधिक रहती थी। शिक्षक लोगों को जमीन दान दी जाती थी। प्रजा के सभी लोगों के साथ समानता का व्यवहार होता था। न्याय का काम चौधरियों के हाथ रहता था। राज्य में आने वाली चीजों पर कोई टैक्स न था और न बाहर से आने वालियों पर। प्रजा का प्रत्येक व्यक्ति उन राज्यों को अपना ही राज्य समझता था। इस बात का सबसे बड़ प्रमाण ‘भारत के देशी राज्यों के इतिहास’ की इन लाइनों में पूर्णतः मिल जाता है-

“यद्यपि बीका जी ने जोहिया जाटों को परास्त करके उन्हें अपने अधीन कर लिया था, तथापि वे बड़े स्वाधीनता-प्रिय थे, और अपनी हरण की हुई स्वाघीनता को फिर से प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे थे। अतः रायसिंह जी ने अपने भाई रामसिंह जी के संचालन में एक प्रबल राठौर-सेना उनके दमन करने के लिए भेजी। इस सेना ने वहां पहुंचकर भयंकर काण्ड उपस्थित कर दिया। प्रबल समराग्नि प्रज्वलित हो गई। हजारों जोहिया जाट-गण स्वाधीनता के लिए प्राण-विसर्जन करने लगे। वीर राठौर भी अपने ध्येय से न हटे। उन्होंने इस देश को यथार्थ मरुभूमि के समान कर दिया।”

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बीका जी से लेकर रायसिंह तक जोहिया-वंश के जाट योद्धाओं ने लगातार युद्ध किए। बार-बार स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए प्रयत्न किए और वे प्रयत्न उनके तब तक जारी रहे, जब तक कि भयंकर काण्ड करके राठौरों ने उनके देश को यथार्थ मरुभूमि न बना दिया।

सिक्के - इनके राज्यों में सिक्के का प्रचलन था। किन्तु वे सिक्के कौन से थे? कैसे थे? किस धातु के थे? यह तो पता अभी नही चला। किन्तु इतना पता अवश्य चला है कि सारस्वत ब्राह्मण के हाथ इनके राज्यों की प्रजा ऊन और घी बेचकर बाहर से आवश्यक वस्तुएं मंगाती थी। गोदारों ने बीका जी से धुआं टैक्स रुपयों में ठहराया था। तब अवश्य ही इनके यहां कोई इनके ही सिक्के थे क्योंकि उस समय तक अर्थात् चौदहवीं-पन्द्रहवीं शताब्दी के आरम्भ और अन्त तक भारत में कोई विदेशी शासक तो ऐसा नहीं था जिसका प्रभाव जांगल देश तक हो। वैसे गोदारा आदि जातियां इतनी शक्तिशाली थीं कि बिना मर-मिटे किसी के काबू में आने वाली न थीं। यह नितान्त स्वतंत्र राज्य थे। किसी के मांडलिक भी न थे। तब अवश्य ही इनके यहां अपने सिक्के रहे होंगे।

धार्मिक रस्म-रिवाजों में यह पूर्ण उदार थे। सारांश यह है कि जितनी भी इन राज्यों की शासन-व्यवस्था की झांकी हमें दिखाई दी है, वह श्रेष्ठ तो है ही साथ ही भव्य भी है।

धौल्या

इस वंश के जाट राजस्थान के विभिन्न भागों में पाए जाते हैं। किशनगढ़ और मारवाड़ की भूमि पर राठौरों से बहुत पहले ये लोग राज करते थे। महापुरुष तेजाजी जो कि आज राजस्थान में देवता मानकर हनुमान और भैरव की भांति पूजे जाते हैं, इसी प्रसिद्ध राजवंश में पैदा हुए थे। ‘तारिख अजमेर’ में तेजाजी के सम्बन्ध में लिखा हुआ है कि -

“जाटों के तेजाजी कुल-देवता हैं। उनका जन्म मौजा खरनाल परगना नागौर में हुआ था। वह धौल्या गोत के जाट थे। मौजा पनेर इलाका रूपनगर में उनकी शादी हुई थी।”नोट

कुछ लोग तेजाजी की जन्म-भूमि रूपनगर ही बताते हैं।नोट उनकी जन्म-भूमि खरनाल थी या रूपनगर, इस प्रश्न का हल सहज में हो सकता था, यदि लेखक महानुभाव तेजाजी के समय की राजस्थान की राजनैतिक स्थिति से परिचित होते। तेजाजी का जन्म संवत् 1040नोट के आस-पास हुआ था, क्योंकि ‘तारीख अजमेर’ में उनकी मृत्यु का समय मार्गशीर्ष शुदी दशमी संवत् 1072नोट विक्रमी बताया है। वे तरुण अवस्था में स्वर्गवासी हुए थे। इसीलिए हमने उनका जन्म-समय संवत् 1040 के आस-पास माना है। उस समय समग्र भारतवर्ष छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था। भारत में वल्लभी और भटिंडा (लाहौर) के दो राज्य अवश्य बड़े थे।


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राजस्थान में उस समय सर्वांश में नही तो अधिकांश में गण-राज्य (पंचायती शासन) थे। नागौर से नाग विताड़ित कर दिए गए थे।गूजर लोग भीनमाल से खारिज हो चुके थे। जातियों में परस्पर संघर्ष भी चल रहा था। तेजाजी के पिताजी स्वयं एक प्रजातन्त्र के सरदार थे। उनका नाम ताहरजी था। कुछ लेखकों ने ब़क्सारामजीनोट लिखा है, किन्तु खरनाल के जाट जो तेजाजी के सगोत्री हैं, वे ताहरजी बतलाते हें। ताहरजी के राज्य में खरनाल और रूपनगर प्रसिद्ध स्थान थे। उनका राज्य इतने क्षेत्रफल वाला था, जिसके अन्तर्गत रूपनगरनोट और खरनाल दोनों आ जाते थे। तेजाजी भक्त-प्रकृति के व्यक्ति थे। इसलिए वे घर के और राज के प्रबन्ध से उदासीन रहकर साधु-सन्तों की सेवा में लगे रहते थे। वे खरनाल और रूपनगर दोनों ही स्थानों पर जब जहां इच्छा होती रहते थे।

तेजाजी कुल सात भाई थे।नोट छः की संतान अब तक मौजा खिडनाल में (जो कि पहले करनाल कहलाता था) रहती है। तेजाजी ने तप करने में पराकाष्ठा कर दी थीं उनका विवाह बाल्य-अवस्था में ही हो चुका था, किन्तु तेजाजी को संतों की संगति में देखकर मां-बाप की यह हिम्मत न होती थी कि उनसे बहू को लाने के लिए कहा जाए। तेजाजी के गोत्र के लोगों का उस समय नाग जाति के लोगों से झगड़ा चल रहा था। किन्तु तेजाजी ऐसे झगड़ों से दूर ही रहते थे। उनके पिता ने आखिर तेजाजी को गौ-सेवा पर नियुक्त किया। उस समय जनपदों के शासक पशु खूब रहते थे। उनके राज्य में अनेक तालाब थे, बावड़ी थी और साथ ही बाग-बगीचे भी थे। वे एक तालाब के किनारे ईश्वर-भक्ति कर रहे थे। उस समय एक गूजरी ने जिसका नाम माना बताया जाता है, बड़ा चुभता हुआ मजाक तेजाजी से किया। उनका भाव यह है -

“जिसकी स्त्री युवावस्था में तड़पे और उसका मर्द सन्त बना फिरै।”नोट

तेजाजी को यह बात चाट गई, वे ससुराल जाने के लिए उसी समय प्रतिज्ञा कर बैठे। ससुराल जाने से पहले उन्हें बहन के यहां भी जाना पड़ा। उनकी बहन का नाम राजा और बहनोई का जौंरा था। कुछ लेखकों ने लिखा है बहन के यहां से लौटकर तेजाजी ससुराल पहुंचे। ससुराल वाले भी पूरे वैभवशाली थे। उनका राज्य भी भरा-पूरा था। उनकी लड़की बोदल (जो कि तेजाजी को ब्याही गई थी)नोट के अलग बगीचे और बावड़ी थे। तेजाजी से उनकी ससुराल वाले अप्रसन्न तो थे ही, क्योकि जवान लड़की को घर में देखकर उन्हें रंज होता था, इसलिए उनका कोई अच्छा सत्कार नहीं हुआ। उनकी ससुराल का गांव पनेर राज्य जयपुर में बनास नदीनोट के किनारे पर कहीं था। उस समय जयपुर के विभिन्न भागों पर मीणा जाति का राज्य था। मीणा लोग पड़ोसी राज्यों के प्रजा जन के पशुओं को चुरा ले जाते थे। पनेर में उसी दिन मीणों ने आक्रमण करके एक गूजरी के गायों के समूह को चुरा लिया। तेजाजी के ससुर बदनाजी बड़े प्रसिद्ध पुरुष थे।नोट वे उस समय की बाहर गए हुए थे। तेजाजी ने जब मीणों


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की गाय चुराने की कहानी सुनी तो वे अपनी लीला नाम की घोड़ी पर सवार होकर मीणों के पीछे पड़े। मीणों की संख्या 150 तक बताई जाती है। संभव है तेजाजी के साथ भी दस-बीस आदमी हों, किन्तु कहा जाता है कि तेजाजी अकेले ही थे। यह बात उनका महत्व बढ़ाने के लिए कही गई है। तेजाजी इस युद्ध में सख्त घायल हुए। मीणे परास्त हुए तेजाजी की कीर्ति चारों ओर फैल गई।

ससुराल से लौटते समय तेजाजी पर महान् संकट आया अथवा यह कहना चाहिए कि तेजाजी का वह समय आ गया था, जिसे अन्तिम काल कहते हैं। बालू नाम के नाग ने उनका रास्ता घेर लिया।नोट उसने शत्रुता निभाने का यह सबसे अच्छा मौका समझा। कहा जाता है कि पहली बार भी इसने तेजाजी को ललकारा था, किन्तु उस समय तेजाजी ने उससे यह इच्छा प्रकट की थी कि मैं ससुराल जाना चाहता हूं, अपनी स्त्री से मिलने के बाद मैं अवश्य इधर आऊंगा। घायल तेजाजी और उनकी वीर विदुषी स्त्री बोदल ने नाग और उसके साथियों का मुकाबला किया। तेजाजी और उनकी धर्मपत्नी मारे गये, किन्तु बालू नाग भी धराशायी कर दिया। बालू ने तेजाजी की अचेत अवस्था में जिह्वा काटने का प्रयत्न किया था। नोटउनकी घायल घोड़ी भागकर खिड़नाल आ गई। उनकी रानी बोदल के और उनके शव खिड़नाल लाए गये। तेजाजी शत्रुओं से लड़ते हुए शहीद हुए थे, इसलिए वे जुझार तेजा कहलाने लगे। नाग बालू के मारे जाने से अन्य नाग भी उस प्रान्त को छोड़कर भाग गए। चारों ओर शांति हो गई। नाग बड़े कड़वे मिजाज के और सभी लागों को दुःखदायी थे। नागों से तेजाजी के शहीद होने से लागों का पीछ़ा छूट गया। सफल चित्रकार ने तेजाजी का ऐसा चित्र कर दिया है, जिसमें उनकी श़हादत का पूरा इतिहास आ जाता है। वह पांचों हथियार बांधे हुए लीला नाम घोड़ीनोट को थामे खड़े हैं। नाग उनके गले में लिपटा हुआ है। शरीर खून से लथपथ है। पास में रानी बोदल खड़ी है। तेजाजी के सिर पर कलगी भी है उनके राज-पुत्र होने की सूचना देती है।

तेजाजी की पूजा पहले उनके राज्य, उनके बहनोई के राज्य तथा ससुराल वालों के राज्य में आरम्भ हुई। पीछे से सर्वत्र राजस्थान में आरम्भ हो गई। उनके नाम का असर और प्रयोग यहां तक हुआ कि सर्प (नाग) काटे का इलाज होने लगा। विश्वास और भावनाओं में राजस्थान में यहां तक परिपक्वता आ गई है कि उनके नाम की डसी बांधने से सर्प के विष का असर नहीं होता है।

तेजाजी के मेले - राजपूताने में अनेक स्थानों पर तेजाजी के मेले भरते हैं। अनेक स्थानों पर उनके मन्दिर हैं। भादों सुदी दसमीं को सहस्रों यात्री उनके मन्दिरों तक पहुचंकर चढ़ावा चढ़ाते हैं। राजा, रईस, गरीब, अमीर, ब्राह्मण, क्षत्री सभी तेजाजी के भक्त हैं।

तेजाजी का सबसे बड़ा मेला पर्वतसर राज्य जोधपुर में होता है।


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वहां तालाब के किनारे उनकी संगमरमर की मूर्ति है। तेजाजी घोड़े पर सवार तलवार, ढाल, बल्लम आदि शस्त्रों से सुसज्जित हैं। दूसरी ओर उनकी सती रानी घोड़ी पर सवार बायें हाथ में सर्प पकड़े हुए हैं। मन्दिर में एक शिलालेख है, जिस पर

‘संवत् 1791 शाके 1656 भादवा बदी 6 भृगवासरे महाराजाधिराज श्री श्री 108 श्री अभवसिंहजी तस्या प्रधारों भंडारीजी श्री विजयराजजी श्री तेजाजी की प्रतिष्ठा’

अंकित किया हुआ है। कहा जाता है भंडारीजी ने तेजाजी की मूर्ति सुरसुरे से, जहां कि तेजाजी शहीद हुए थे, पर्वतसर में लाकर स्थापित की थी। सुरसुरा गांव किशनगढ़ राज्य में है।

भादों सुदी एकादशी को पर्वतसर में, जोधपुर राज्य के मेले में तैनात बड़े-बड़े अफसर और हाकिम शुभ मुहूर्त में, तेजाजी का झंडा खड़ा करते थे। झंडा पर्वतसर हुकूमत से मय लवाजमे के लाया जाता था। 20 सवार, 25 पैदल और 20 पुलिसमैन मय अफसरों के ठीक समय पर झंडे को सलामी देते थे। झंडा खड़ा करने की आज्ञा देने से ठीक पहले जाटों को सम्बोधित करके कहा जाता था -

जाटों! आओ!! झंडा उठाओ!!!

झंडे को सभी लोग हाथ लगाते थे। झंडा खड़ा होते ही 11 तोपों की सलामी होती। झंडा प्रति वर्ष नया बदला जाता। चौबीसों घण्टे बाजे, ढोल मेले के दिनों में बजते रहते थे।

खरनाल स्थित तेजाजी का मन्दिर

तेजाजी के मन्दिर - उनकी जन्मभूमि खिड़नाल में तेजाजी का मन्दिर गांव के बीचों-बीच है। वह बहुत पुराना है। उसका जीर्णोद्धार संवत् 1943 में हुआ है। वहां के शिलालेख में उन लोगों के नाम हैं जिन्होंने मन्दिर की मरम्मत कराई थी। शिलालेख में एक दोहा है जो इस तरह है-

खिजमत हतो खिजमत, शजमत दिन चार।
चाहे जनम बिगार दे, चाहे जन्म सुधार।।

खिड़नाल गांव के पूर्व में एक तालाब के किनारे तेजाजी की एक दूसरी बहन का मन्दिर है। उसका नाम बागल था। वह सती हो गई थी। इस पर मेला भरता है ।

किशनगढ़, बूंदी, अजमेर आदि प्रदेशों में कई स्थानों पर भी तेजाजी के मन्दिर हैं।

यह जाट जाति के प्राचीन गौरव की एक हल्की-सी झांकी है। जुझार तेजा महापुरुष थे। महापुरुषों में सभी का साझा होता है और सभी जातियों में महापुरुषों की पूजा होती है।

राजस्थान की वीर भूमि पर जाटों ने जो सुख उपभोग किया था, आज उतना ही उनके लिए दुःख है। उनकी वर्तमान अवस्था को देखकर लोगों को यह ख्याल नहीं होता कि एक समय राजस्थान उनके अधिकार में नही रहा होगा, साम्राज्य


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के रूप में नहीं तो स्वतंत्र और जनतंत्र के रूप में तो वे उसके अधिकारी रहे ही थे। यदि पूर्ण रूप से खोज की जाए तो अनेक शिलालेख और सिक्के जाट-राज्यों के राजस्थान की भूमि में प्राप्त होंगे। पण्डित जयरामजी आयुर्वेदाचार्य ने किशनगढ़ में भी ऐसे निशानत और शिलालेख देखे थे जिनके आधार पर उन्होंने वहां जाट-राज्य होने का वर्णन ‘जाटवीर’ में प्रकाशित कराया था। उन्हें राजस्थान के एक जाट-राज्य का सिक्का मिला था।

परिहार, चौहान, सोलंकी और राठौर आदि के आने के समय तक राजस्थान जाटों के हाथ में रहा। मीणा और गूजरों सें भी पहले उनके इस प्रदेश में अनेक प्रजातंत्री राज्य थे। कहा जा सकता है कि भीलों के बाद राजस्थान की आदि भोक्ता जाति, जाट-जाति ही है। राजस्थान में वे बहुत प्राचीन समय से बस रहे हैं। यही कारण है कि उन्होंने वर्तमान के अनेक कष्ट सहकर भी अपनी मातृभूमि को नहीं छोड़ा है। कर्नल टाड के समय तक उनके पास बापोती थी अर्थात् अपने बाप-दादों से प्राप्त हुई भूमि के वे स्वतंत्र मालिक थे। कोई उनसे उनकी भूमि को छुड़ा नहीं सकता था।

इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि राजस्थान निवासी जाटों का भूतकाल अति उन्नतावस्था में था और वे इस प्रदेश के अधिकांश भाग के लम्बे अर्से तक शासक रहे हैं।


नोट - लेखक द्वारा तेजाजी के संबंध में यहाँ दी गई जानकारी अधूरी तथा त्रुटिपूर्ण हैं। सही जानकारी के लिए विस्तृत शोध कर प्रकाशित किए गई पुस्तक देखें। - श्री वीर तेजाजी का इतिहास एवं जीवन चरित्र (शोधग्रंथ): लेखक - संत श्री कान्हाराम, मो: 9460360907, प्रकाशक: श्री वीर तेजाजी शोध संस्थान सुरसुरा, अजमेर, 2015, [पृष्ठ-170]: विक्रम संवत 1130 की माघ सुदी चौदस गुरुवार तदनुसार 29 जनवरी 1074 ई. को खरनाल गणतन्त्र में ताहड़ देव जी के घर में शेषावतार लक्ष्मण ने तेजाजी के रूप में जन्म लिया। इस तिथि की पुष्टि भैरू भाट डेगाना की बही से होती है।... अन्य शंसोधित जानकारी इस प्रकार हैं: तेजाजी की पत्नी का नाम पेमल था। सासु का नाम बोदल दे था। ....तेजाजी के पाँच भाई थे : रुपजी, रणजी, गुणजी, महेश जी, नगजी। तेजाजी का जन्म स्थल : खरनाल (नागौर), ससुराल : शहर पनेर, पनेर के पास पनेर नदी बहती थी बनास नहीं। दादा का नाम बक्साराम जी था। तेजाजी के ससुर : रायमल जी मुहता, झांझर जाट, पनेर (अजमेर), रास्ता रोकने वाले नाग का नाम : बासग नाग था। तेजाजी के एक ही बहिन राजल थी। तेजाजी की घोड़ी का नाम लीलण था। Laxman Burdak (talk) 00:49, 16 December 2016 (EST)

भरतपुर राज्य

महाराजा सूरजमल के समय भरतपुर राज्य का विस्तार
सीमा और विस्तार 
किसी समय भरतपुर राज्य बड़ा था। इटावा से अलवर तक उसकी लम्बाई थी और देहली से हिण्डौन तक चौड़ाई। इस समय केवल 76 मील लम्बाई 48 मील चौड़ाई है। इसके उत्तर में गुड़गांव जिला, दक्षिण में जयपुर, करौली-राज्य, पूर्व में मथूरा-आगरा और पश्चिम में जयपुर-अलवर राज्य हैं। भरतपुर राजस्थान का पूर्वी फाटक है। राजस्थान की वर्तमान रियासतों में विस्तार के अनुपात से कुछेक से वह छोटा है, किन्तु उसकी प्रतिष्ठा बहुत बड़ी है। बाहुबल से अर्जित किया हुआ राज्य होने के कारण, वह लोक का श्रद्धाभाजन है। जिस राजवंश का इस समय भरतपुर में शासन है, उसने इसकी स्थापना सन् 1633 ई. में की थी।
प्रसिद्ध स्थान 
भरतपुर-राज्य में पचासों ऐसे स्थान हैं जो ऐतिहासिक होने का महत्व रखते है। किन्तु इस समय के प्रसिद्ध स्थानों में व्याना, कुम्हेर, डीग और कामां हैं।

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ये चारों नगर अति प्राचीन हैं। व्याना में आरम्भ में बाना (जाटों का एक गोत्र विशेष) लोगों की राजधानी थी। बाना चन्द्रवंशी थे। उन्होंने ईरान में जाकर भी अपना उपनिवेश बसाया था। ईरानी आर्यों को भारतीय आर्य असुर कहते थे। उषा देवी का व्याने में मन्दिर है जो बाना लोगों की कन्या थी। बाना लोग श्रीकृष्ण के ज्ञाति-तंत्र (संघ) के आरम्भ में विरोधी थे, किन्तु पीछे से वे भी ज्ञातिवादी ज्ञात (जाट) हो गए। यहां ‘फक्क’ वंश का भी राज है क्योंकि शिलालेख में फक्क वंश का हाल लिखा हुआ है। सम्भव है ‘फक्क’ लोग आगे चलकर फौगाट के नाम से मशहूर हो गए हों। इसका पुराना नाम श्रोणितपुर भी बताया जाता है।

भीम की लाट

यहां एक लाट है जिसे भीम की लाट कहते हैं। वास्तव में यह स्तूप है। ‘व्रजेन्द्रवंश भास्कर’ में लिखा है- ‘महाराज वरिक् विष्णुवर्द्धन ने संवत् 428 वि. में यहां यज्ञ किया था।’1 यह विष्णुवर्द्धन महाराजा यशोधर्मा मन्दसौर वाले के पिता थे जिसने कि हूणों को हराया था और जिसके शिलालेख में संवत् 589 अंकित है। महाराज विष्णुवर्द्धन बरक (वरिक्) गोत्री जाट थे। व्याने पर मुसलमानों का आक्रमण अबूबकर के समय में हुआ था। कुम्हेर को कुम्भीगढ़ अथवा कुवेरपुर भी कहते थे। इसे कुम्भ नाम के जाट सरदार ने बसाया था। डीग का पुराना नाम दीर्घ बताया गया है। स्कन्ध पुराण में इस स्थान को तीर्थो की श्रेणी में गिना है। देहली का लूट का बहुत-सा सामान यहां देखने को मिलता है। कामां जिले को काम्यवन कहते हैं, पहले यहां काम्यक लोगों का राज था। इसका पहला नाम ब्रह्मपुर भी बताया जाता है। यदुवंशी राजा कामसेन ने इसका कामां नाम रखा था, ‘ब्रजेन्द्र वंश भास्कर’ से इसका पता लगता है।

वंश-परिचय 
इस समय भरतपुर पर सिनसिनवार गोत्र के जाट सरदारों का राज्य है। भरतपुर राज्य में डीग के पास सिनसिनी एक गांव है। भरतपुर से पहले यही इनकी राजधानी थी, इसलिए यह सिनसिवार के नाम से प्रसिद्ध हैं, ऐसा अनुमान लोगों को लगाना पड़ा है। सिनसिनी का पहला नाम शूरसैनी था और शौरसैन लागों की यह राजधानी थी। शौरसैन लोगों का किसी समय बड़ा प्रभाव था। उसकी सभ्यता यहां तक बढ़ी-चढ़ी थी कि उत्तरी भारत मे बोली जाने वाली भाषा ही उनके नाम से शौरसैनी कहलाती है। शौरसैन लोग चन्द्रवंशी-क्षत्रिय थे। भरतपुर का राजवंश भी चन्द्रवंशी है किन्तु यह वृष्णि-शाखा के चन्द्रवंशी हें, जिसमें कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हुए थे। द्वारिका ज्ञाति-राज्य नष्ट होने पर यादवों के समूह ‘जदु का डूंग’ बज्रपुर (साइबेरिया) गजनी (अफगानिस्तान) हिरात (ईरान) आदि में फैल गये। सिन्ध में यादवों का एक समूह ‘शिन’ (वैदिक देवता) का उपासक था,

1. ब्रजेन्द्र वंश भास्कर, पृ. 188


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जिसके माहन-जो-दारो की खुदाई में1 कुछ ईंट और सिक्के मिले हैं। एक ईंट के ऊपर ‘शिन शनि सिनी’ लिखा हुआ है। यजुर्वेद अध्याय 8 में ‘शिनाय स्वाहा’ आता है। एक मुहर पर लिखा मिला है ‘सिनी ईसर’। अर्थववेद में ‘सिनीवाली’ शब्द सिनी देवता के लिए प्रयोग किया गया है । सिन्ध देश से इस समुदाय ने लौटकर फिर से ब्रज में अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहा। पहले बयाना पर अपना अधिकार जमाया। कुछ समय पश्चात् सोहेदेव ने शौरसेनी से बलाई लागों को निकालकर अपना अधिकार जमाया। अब शूरसैनी का नाम शिव देवता के उपासक लोगों के कारण शिन-शूरसैनी अथवा शिनसिनी हो गया और वे लोग सिनसिनवार पुकारे जाने लगे। उनका एक समूह सुग्रीवगढ़ में जाकर सुग्रीवगढ़िया या सौगढ़वार कहलाने लग गया था।

बयाना से इन यादवों का एक समूह दूसरी ओर चला गया और आजकल वह करौली के यादव के नाम से मशहूर हैं। करौली के यादव राजपूत कहे जाते हैं और भरतपुर के यादव जाट। इसका कारण साम्प्रदायिक भिन्नता हैं। भाट-ग्रन्थों में इनके वंश का परिचय मूर्खतापूर्ण शैली में दिया गया है कि बालचन्द्र ने जाटिनी का डोला लिया था, उससे दो पुत्र हुए, वे जाट कहलाने लगे। किन्तु सिनसिनवाल क्यों कहलाए इसका कोई कारण नहीं बताया! हमने ऐसी थोथी धारणाओं का काफी खंडन किया है। से बातें कल्पित एवं अनैतिहासिक हैं। गोधारा लोगों को, जहां अनेक भाटों ने चित्तौड़ के राजपूतों में से लिखा है, वहां सिनसिनवालों की वंशावली रखने वालों ने उन्हें भज्जा सिनसिनवाल के पुत्र गंगदेव की औलाद बताया है।2 नवीन हिन्दू-धर्म के मुरीद होते ही करौली के यादवों ने भरतपुर के यादवों की अपेक्षा राजपूतों में अपना चलन कर लिया। भरतपुर के यादव आरम्भ में प्रजातन्त्री शैली से ही कुछेक गांवो पर अपना प्रभुत्व जमाए रहे। किन्तु मुगल सम्राट् औरंगजेब ने उन्हें साम्राज्यवादी बना दिया। महाराज जवाहरसिंह के समय में तो उनकी भावनाएं समस्त भारत पर अधिकार कर लेने की हो गई। महाराज जवाहरसिंह ने इसी भावना से प्रेरित होकर अपने को ‘भारतेन्द्र’ की पदवी से विभूषित कर लिया था।

किन कठिनाइयों का सामना करके किस प्रचंड वीरता से सिनसिनवार जाटों ने इतना बड़ा राज्य स्थापित किया, उसका वर्णन इस प्रकार है-

शहीद-कौम वीर गोकुला

वीरवर गोकुल देव

औरंगजेब के अत्याचारों से देश पीड़ित था। प्रत्येक कोने में हाहाकार मचा हुआ था।


1. नागरी प्रचारिणी पत्रिका, भाग 13, अंक 2, पृ. 244
2. ब्रजेन्द्र वंश भास्कर, पृ. 5


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कहीं दीन के नाम पर मंदिर ध्वंश किए जाते थे तो कहीं चोटी और जनेऊ तोड़े जाते थे। कहीं अबलाएं जबरन भ्रष्ट की जाती थीं और कहीं दुधमुंहे बच्चे दीवारों में चिने जाते थे। देश कराह भरता था और अत्याचारी यवन ठहाका भरते थे। औरंगजेब चाहता था सारा भारत उसके आगे मुसलमान हो जाए। हिन्दुओं पर जजिया लगाया गया। उन्हें चर्ख पर चढ़ाया गया। एक दिन, एक वर्ष भी नहीं, वर्षों तक यही अत्याचार होता गया। अत्याचार का पुत्र असंतोष और असंतोष का पुत्र विद्रोह होता है। शान्ति से जीवन बिताने वाले बृज के जाटों का हृदय असंतोष की आग से धधकने लगा। उससे मथुरा और वृन्दावन के मन्दिरों को यवनों के हाथों से ध्वंश होते हुए न देखा गया। वे नहीं चाहते थे कि उनके जिन्दा रहते हुए हिन्दुओं की अबलाओं का यवन सतीत्व नष्ट करें। उन्होंने विद्रोह का झंडा उठा लिया। विद्रोह के लिए उनको खड़ा करने वाला मथुरा का फौजदार मुर्शिदकुलीखां था, जो कि हिन्दू-स्त्रियों को उड़ाने में ही अपनी बहादुरी समझता था। वे विद्रोही हो गए और मुर्शिदकुलीखां को गढ़ में घेरकर मार डाला1 ओरंगजेब ने इसी समय अब्दुलनवी को मथुरा का हाकिम बनाकर भेजा। वह औरंगजेब ने नीति का बड़ी तत्परता से पालन करने लगा। गोकुला जो इस समय तिलपत में रहता था2 विद्रोही जाट-समूह का नेता बन गया। उसने अपने समस्त साथियों को मुगल-राज्य की नींव उखाड़ फेंकने के लिए आह्वान किया। साथ ही विजेता विद्रोहियों के एक दल को लेकर सादाबाद की लूट से गोकुला की शक्ति नित-प्रति जोर पकड़ने लगी। उसके बढ़ते प्रभाव को देखकर मुगल-सरकार ने लूट-पाट बन्दकर देने की शर्त पर उसे क्षमा कर देने की चर्चा चलाई। किन्तु गोकुला और उसके साथी धर्म-द्रोहियों के विरुद्ध निरन्तर लड़ने की शपथ ले चुके थे। गोकुला ने लूट-पाट जारी रखी। सन् 1670 ई. में औरंगजेब ने खुद जाटों और उनके नेता गोकुला को दबाने के लिए चढ़ाई की। वीर गोकुला भी बीस हजार जाट-सैनिकों को लेकर औरंगजेब के मुकाबले पर अड़ गया। तिलपत से 20 मील की दूरी पर दोनों सेनाएं भिड़ गई। अब्दुलनवी और चार हजार मुगल सैनिकों को वीर जाटों ने धराशायी कर दिया। यदि सहायता के लिए दूसरा दल मुगलों का न आ गया होता तो खेत जाटों के हाथ रहता। हुसैनअलीखां और रजीउद्दीन नाम के मुगल सेनापतियों ने जाटों के सामान और हथियारों की तीन गाड़ियों को लूट लिया। जब जाटों ने जीत के कोई लक्षण न देखे तो मर मिटने के लिए अन्तिम हमला कर दिया। स्त्री और पुरुष सभी ने जौहर के हाथ दिखाए। किन्तु इसी बीच उनके बहादुर सरदार


1. ब्रजेन्द्र वंश भास्कर में इनका नाम कान्हादेव (सिनसिनवार) लिखा है
2. आर्मी कलेक्शन, लेखक - जोन शर्मन


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गोकुला और उदयसिंह ‘सिंघी’ गिरफ्तार हो गए। मैदान मुगलों के हाथ रहा। किन्तु केवल तीन हजार जाटों के मारने में चार हजार मुगल सदा के लिए संसार से विदा हो गये।


गोकुला को गिरफ्तार करके आगरे लाया गया और शेष जाटों को भयभीत करने के लिए जिस समय कोतवाली पर उसके शरीर के जोड़ खोले जा रहे थे, उस समय दर्शक हिलकियां भरकर रोते थे, किन्तु गोकुला निश्चल और प्रसन्नचित्त था। उसे जंजीरों से जकड़कर कुल्हाड़ों से लकड़ियों की भांति काट डाला गया, किन्तु उसकी यह जिद न गई कि ‘छोड़ देने पर फिर विद्रोह की आग जला दूंगा।’ गोकुला के साथी उदयसिंह की भी यही दशा हुई। मुसलमान लेखकों ने लिखा है कि गोकुला के पुत्र और पुत्री को औरंगजेब ने जबरदस्ती मुसलमान बना लिया था, किन्तु यह बात झूठ और बेमानी है। 1

वीरवर राजाराम

वीरवर राजाराम

गोकुला का खून व्यर्थ नहीं गया। जाट दांत पीसते थे, वे मुगलों का ध्वंस करने के लिए उन्मत्त हो रहे थे। उन्हें केवल योग्य नेता की तलाश थी। सच्ची भावनाएं पूरी होती हैं - इस सिद्धान्त के अनुसार उन्हें एक सरदार मिल गया। सिनसिनी के भज्जीसिंह के रणबांके पुत्र राजाराम ने विद्रोही जाटों का नेतृत्व ग्रहण किया। राजाराम ने सिनसिनवार जाटों का, रामकी चाहर की अध्यक्षता में, सोगरिया जाटों के साथ-साथ जिनके पास सोगर का किला था, संगठन किया। उसने बन्दूकों का संग्रह किया और जंगलों में कच्चे दुर्ग बनाकर छावनियां कायम कीं। सबसे मुख्य शिक्षा उसने विद्राहियों को यह दी कि वे अपने सेनानायकों की आज्ञापालन में त्रुटि न आने दें। उसने विश्रृंखलित जाति को संगठित करके आक्रमणकारी के साथ ही चतुर सैनिक बना दिया।


गोकुला की मृत्यु के ठीक पन्द्रह वर्ष बाद जाटों ने राजाराम की अध्यक्षता में मुगलों को दण्ड देने के लिए आगरे पर हमला कर दिया। आस-पास का सारा प्रदेश उनके अधिकार में हो गया। आगरे जिले से मुगल-शासन का अन्त कर दिया। सड़कें बन्द हो गई। मुगल-हाकिम शफीखां को किले में घेर लिया और सिकन्दरे पर आक्रमण कर दिया। इसके थोड़े ही दिन पश्चात् धौलपुर के करीब अगरखां तूरानी को जा घेरा और उसके घोड़े, गाड़ियों, यहां तक कि औरतों को भी छीन लिया।


1. जो मुग़ल सेना साधारण जाट बालाओं को न पकड़ सकी थी, सबने जौहर कर लिया था, वह गोकुला की बेटी को कैसे पकड़ लेती. यह मुस्लिम इतिहासकारों ने जाटों की गरीमा को कलंकित करने के लिए लिखा है-संपादक


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अगरखां और उसका दामाद इस लड़ाई में मारे गए। उसकी लड़की, औरतें जाटों के हाथ लगी। मई सन् 1686 ई. में सफदरजंग ने राजाराम का मुकाबला किया, किन्तु बेचारे को भागना पड़ा और अपने पुत्र आजमखां को मुकाबले के लिए भेजा। आजमखां के आने से पहले ही राजाराम ने सिकन्दरे पर आक्रमण कर दिया। मुगलों के 400 आदमियों को जहन्नुमरशीद कर दिया और शाइस्ताखां जो कि आगरे का सूबेदार था उसके इधर आने से पूर्व ही अकबर की कब्र को खोद डाला और उसकी हड्डियों को अग्नि में झोंक दिया। उसने सोने चांदी के बर्तन, चिराग और दूसरे सामानों को हाथ नहीं लगाया। केवल औरंगजेब का अपमान करने के लिए जिसने कि गोकुला का वध कराया था, उसने बुजुर्ग अकबर की समाधि को अवश्य हानि पहुंचाई।1


मुगलों का नाक में दम करने के कारण राजाराम की धाक यहां तक बैठ गई थी कि जब शेखावतों और चौहानों में लड़ाई हुई तो चौहानों ने अपनी सहायता के लिए राजाराम को बुलाया। उसने बीजल गांव के युद्ध में चौहानों को मदद दी। इसी युद्ध में चार जुलाई सन् 1688 ई. को राजाराम की एक मुगल सैनिक की गोली से मृत्यु हो गई। ऐसा कहा जाता है कि सिनसिनी पर जब वेदारवख्त ने चढ़ाई की तो वह युद्ध में मारा गया था। उसकी मृत्यु का समय सभी लेखकों ने सन् 1688 ई. बतलाया है।

वृद्ध केसरी भज्जासिंह

वीरवर राजाराम के मारे जाने के पश्चात् उसके बूढ़े पिता भज्जासिंह जाटों के सरदार बने। औरंगजेब ने इस समय एक चाल चली। आमेर के राजा बिशनसिंह को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया। कछवाहा सरदार स्वतंत्रता के प्यासे जाटों का दमन करने पर तैयार हो गया। उसने सिनसिनी के किले को तहस-नहस कर देने की लिखित प्रतिज्ञा बादशाह से की। कालिकारंजन कानूनगो लिखते हैं - “वह अपने बाप रामसिंह और दादा जयसिंह की भांति ऊंचा मनसब हासिल करने के लिए उतावला हो रहा था।” मुगल और राजपूतों की सम्मिलित सेना को चार महीने में जाटों ने सिनसिनी के गढ़ तक पहुंचने दिया। एक महीना घेरा डाले पड़े रहे। किले को उड़ाने के लिए सुरंग लगाई। जाटों ने पता पाकर उसका द्वार किले की ओर से पत्थरों से भर दिया। इसलिए बारूद में आग लगाने पर उल्टा मुगल और राजपूतों का नुकसान हुआ। दूसरी सुरंग फिर लगाई गई।


1. ठाकुर साहब ने यह वर्णन तत्कालीन इतिहासों के अधर पर लिखा है. यथार्थ में सिकन्दरा की भूमि और कब्र खोदने का उद्देश्य छिपे हुए खजाने को निकालना था - संपादक

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अबकी बार चालाकी में बिशनसिंह और मुगल-सेनापति वेदारवख्त सफल हुए। किला इनके हाथ आ गया। जाटों ने जिनके पास तोपखाना न था, मुगल और राजपूतों पर हमला कर दिया। तोपों के गोलों के सामने बढ़ते हुए उन्होंने अपने को समाप्त कर दिया। इस युद्ध में 200 मुगल और 700 राजपूत तोपखाना रखते हुए भी जाटों ने मार डाले। यह घटना जनवरी सन् 1690 ई. की है। इस लड़ाई में 1500 जाट वीर-गति को प्राप्त हुए।

ब्रजराज

जाट लोगों को इस बात पर तनिक भी निराशा नहीं हुई कि मुगलों ने उनका सिनसिनी का राज्य छीन लिया। उन्होंने ब्रजराज की अधीनता में संगठित होकर अऊ में रहने वाले मुगल थानेदार पर हमला कर दिया और अऊ को अपने अधिकार में कर लिया। केवल 200 को संख्या में इकट्ठे होकर सिनसिनी पर कब्जा कर लिया। ब्रजराज भी भज्जासिंह के परिवार का था। मुगलों ने फिर सिनसिनी पर आक्रमण किया। ब्रजराज अपने पुत्र भाऊसिंह के समेत वीर-गति को प्राप्त हुआ।

सिनसिनी उस समय कोई बड़ा राज्य न था, वह केवल 30 गांव का राज्य था। किन्तु मुगलों को जाटों का बड़ा भय था। वह समझते थे कि जाटों की शक्ति का बढ़ना हमारे नाश का कारण होगा। स्वतंत्रता के लिए इस समय युद्ध भी मध्य भारत में केवल जाट ही कर रहे थे। वे किसी लोभ और लालच से मुगलों के मित्र नहीं बनना चाहते थे।

वीर चूड़ामणि

वीर चूड़ामणि

यह भज्जासिंह जी के पुत्र और वीरवर राजारामजी के छोटे भाई थे। जदुनाथ सरकार ने इनके विषय में लिखा है-

“चूरामणि में जाटों की जैसी स्थिरता और मराठों जैसी धूर्तता मौजूद थी । राजनैतिक चालाकी उसमें कूट-कूट कर भरी गई थी।”

वह अनुचित दया और शत्रु पर उदारता दिखाने के सिद्धांत के काहिल थे। सन् 1702 ई. में अपने बूढ़े पिता भज्जासिंह के स्वर्गवास के पश्चात् जाटों का नेतृत्व आपने ही संभाला। थोड़े ही दिनों में इन्होंने 500 सवार और हजारों पदाति सैनिक संग्रह कर लिए और हाथरस के जाट-नरेश नन्दराम के साथ मिलकर मेंडू और मुरसान के प्रसिद्ध लुटेरों को अपनी सेना में भर्ती कर लिया। आगरे से पश्चिम 46 कोस दूरी पर, घने जंगलों में, थून नामक स्थान पर एक दुर्ग बनाया। थोड़े ही दिनों में थून-राज्य में 80 गांव हो गए। सेना भी 14-15 हजार उसके पास रहने लगी। इतनी बड़ी सेना के लिए धन की भारी आवश्यकता थी। इसलिए कौटा-बूंदी के सम्पन्न इलाके को भी इन्होंने लूटा।


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सन् 1704 ई. में सिनसिनी को मुगल हाकिम से छीनकर अपने राज्य में मिला लिया। सन् 1705 ई. में आगरे के मुगल-सूबेदार मुख्तारखां और सन् 1707 ई. में राजाबहादुर से सिनसिनी के मैदान में लड़ाई हुई। दूसरी लड़ाई में एक हजार जाट शहीद हुए और दस गाड़ी हथियार उनके दुश्मन के हाथ लगे, किन्तु विजय जाटों की ही रही।1


सन् 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हो गई। चूरामणि ने ऐसे समय पर राज्य बढ़ाने की सोची, किन्तु नीतिमत्ता के साथ इस काम में हाथ डालने लगे। औरंगजेब के बहादुरशाह के शासनकाल में जब बहादुरशाह और आजम में जाजऊ गांव के पास लड़ाई हुई तो चूरामणि ने अवसर के अनुसार हारने वाले को लूटकर जीतने वाले के साथ अपनी सहानुभूति प्रकट की। सन् 1711 ई. में चूरामणि ने बहादुरशाह के साथ पंजाब जाकर उसके अयोग्य लड़कों के गृहयुद्ध को भी देखा था।


बहादुरशाह के बाद उसका लड़का जहांदारशाह राज्य का मालिक हुआ। सन् 1713 ई. में जब जहांदार और फर्रुखसियर में लड़ाई हुई तो युद्ध के अंत में चूरामणि ने दोनों को लूट लिया। इस लूट में उन्हें बहुत-सा धन प्राप्त हुआ। इसी प्रकार हसनपुर की लड़ाई के समय उन्होंने शाही-सेना के हाथियों को छीन लिया। इस पर क्रोधित होकर मुहम्मद अमीनखां ने अफगानों की सेना सरदार चूरामणि का दमन करने के लिए भेजी। अजीजखां ब़ंगश अफगान, सआदतखां और उमरखां रुहेला कई हजार सेना तथा सैकड़ों तोप लेकर अकेले चूरामणि को नष्ट करने के इरादे से अमीनखां के सहायक हो गए। यही क्यों, राजा गोपालसिंह भदौरिया और राजा राजबहादुरसिंह किशनगढ़ भी मुसलमानों का साथ देने लगे थे। चूरामणि ने बड़ी वीरता और सावधानी से काम लिया। पहली बार के आक्रमण में शत्रुओं की सेना के दो भाग कर दिए। अपनी सेना बीच में घुसा दी। दो हमले दक्षिण और पूर्व से उनके शेष सैनिकों ने किए। सारे दुश्मन भाग खड़े हुए। जाटों ने शत्रुओं को भागते समय लूट लिया। एक हजार बैलों और ऊंटों से भरा हुआ धन और सामान चूरामणि के हाथ लगा। ‘फादर वेण्डल’ ने लिखा है कि निकोसियर बादशाह के भाई जफर को जबकि वह आमेर जा रहा था, चूरामणि ने लूट लिया। इस लूट में उन्हें पचास हजार मुहरें हाथ लगीं।

दिल्ली के तत्कालीन बादशाह ने शान्ति बनाए रखने के लिए चूरामणि से प्रस्ताव किया और उनके स्वीकार कर लेने पर 1500 जत का मनसब, 500 घोड़े पुरस्कार और ‘राहदार’ की उपाधि दी। कामकाज के इबारतनामे में लिखा है कि -

“चूरामणि का राज इतना बड़ा हो गया था कि उसको पार करने में 20 दिन लगते थे।”

1.मसीरुल उमरा नामक पुस्तक से


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सन् 1715 ई. में बादशाह फर्रुखसियार ने इकरन, अधापुर, मलाह, बाढ़ा गांव और भरतपुर तथा रूपवास के परगने जागीर में दिए। किन्तु फिर भी वह रुस्तम और खेमकरन सोगरिया के साथ मिलकर लूट-पाट करते रहे। इनको इतने लोभ-लालच देने पर भी फर्रुखसियर जब शान्त न कर सका तो उसने जयपुर के राजा सवाई जयसिंह को सन् 1716 ई. में इनको दमन करने भेजा। इस युद्ध में जीत चूरामणि की हुई और राजपूती तथा शाही सेना वापस लौट गई। सन् 1719 ई. में जब निकोसियर और शमशेखां की लड़ाई हुई तो चूरामणि ने हाथरस के नंदराम के पुत्र गोविन्दसिंह की अध्यक्षता में सेना देकर शमशेरखां की सहायता की। 13 नवम्बर सन् 1720 को अब्दुल्लाखां को लूट लिया और 20 लाख मुहरें उससे प्राप्त कीं। चूरामणि देहली से चम्बल तक जमुना के पश्चिमी प्रदेश के वास्तविक शासक हो गए थे।1


सरदार चूरामणि के स्वर्गवास के सम्बन्ध की घटना कई प्रकार से वर्णन की जाती है-कोई कहता है लड़ाई में मारे गए, कोई कहता है हीरे की कनी खा ली।

इनकी मृत्यु के पश्चात् गृह-कलह आरम्भ हो गया। इनके बेटे हुकमचन्द ने जो कि बादशाहों की अधीनता में रहने के कायल न थे, अपने चचेरे भाई बदनसिंह को कैद कर लिया। बदनसिंह जब कैद से छोड़े गए तो उन्होंने बादशाह की सहायता लेकर थून पर चढ़ाई कर दी। राजा जयसिंह मदद को आए। यदि बदनसिंह साथ न होते तो जयसिंह को थून के किले में मारा डाला जाता, क्योंकि सुरंग से किला उड़ा देने की तैयारी कर ली गई थी। इस गृह-युद्ध का ब्रज में इस प्रकार गायन होता है-

“लेन चहत है दिल्ली आगरा घर की थून दई, बन्धु-बैर अनवन के कारण कैसी कुमति ठई।”

स्वदेश-बन्धु जाटों के राज्य थून को विजय करने के उपलक्ष में, राजा सवाई जयसिंह ने, धर्मद्रोही बादशाह से ‘राजराजेश्वर श्री राजाधिराज’ की उपाधि प्राप्त की।

राजा बदनसिंह

राजा बदन सिंह

सवाई महाराज जयसिंह जी से इनका बड़ा मेल-जोल था। अधिकांश समय उनका जयपुर ही में बीतता था। जयपुर में उनके नाम से एक स्थान बदनपुरा भी है। संवत् 1775 में यह डीग के मालिक बने। डीग में उन्होंने अच्छी-अच्छी इमारतें बनवाईं और कुम्हेर में सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण कराया।

राजा बदनसिंह लड़ाई-झगड़े की अपेक्षा राज्य-व्यवस्था में अधिक संलग्न रहे।


1.हिस्ट्री ऑफ जाट्स, कालिकारंजन कानूनगो कृत


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-639


फिर भी उन्होंने अठारह लाख की आमदनी का जयपुर का इलाका प्राप्त कर लिया और कुछ हिस्सा आगरे की ओर दबा लिया। कामर के सरदार चौधरी मोहनराम और सहार के रईस की लड़की से शादी करने के कारण इनका प्रभाव मथुरा जिले पर हो गया था। आपने अपने दूसरे पुत्र प्रतापसिंह को वैर का मालिक बनाया। महाराजा सूरजमल इनके सभी पुत्रों में श्रेष्ठ थे। अठारह लड़कों की संतानें कोठरी-बन्द के नाम से मशहूर हैं। आपको जयपुर के महारज जयसिंह सवाई ‘ब्रजराज’ कहा करते थे।30

राजा बदनसिंह जी का स्वर्गवास संवत् 1812 विक्रमी में हुआ था। उस समय श्री सुजानसिंह उपनाम सूरजमल जी 22 वर्ष के थे।

महाराज सूरजमल

महाराजा सूरजमल

महाराज सूरजमल एक लम्बे-तगड़े और सुदृढ़ शरीर के योद्धा थे। उनके चेहरे को देखने से ऐसा मालूम होता था, मानो अग्नि निकल रही है। वे नेक मिजाज और सादे चाल-चलन के व्यक्ति थे। उसमें राजनैतिक योग्यता, सूक्ष्म-दृष्टि तथा निश्चल बुद्धिमत्ता एक बड़े अंश में विद्यमान थी। ‘इमादुस्सादत’ का लेखक लिखता है कि-

“यद्यपि वह (सूरजमल) एक कृषक जैसा पहनावा पहनता था और कमवल अपनी ब्रज भाषा ही बोल सकता था, परन्तु वास्तव में वह जाट-जाति का प्लेटो था। चतुराई, बुद्धिमत्ता और लगान तथा अन्य माल के महकमे में आसिफजाह बहादुर निजाम के सिवाय भारत के प्रसिद्ध पुरुषों में और कोई उसकी समानता नहीं कर सकता था। जोश, साहस, चतुराई, अटूट दृढ़ता तथा अजय और न दबने वाला स्वभाव आदि अपनी जाति के अच्छे-अच्छे गुण सूरजमल में एक विशेष अंश में पाये जाते थे।”


महाराजा सूरजमल का चालबाज मराठे और धोखेबाज मुगल दोनों से ही पाला पड़ा था, किन्तु उन्होंने दोनों ही को असफल बना दिया था। अपनी शक्ति और राज का विस्तार दोनों ही के जाल के होते हुए भी बढ़ा लिए थे। सबसे पहले सन् 1732 ई. में महाराज सूरजमल जी ने भरतपुर को रात के समय खेमकरन सोगरिया पर चढ़ाई करके विजय किया। तब से भरतपुर की राज्यश्री की उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी। इन्होंने राजा जयसिंह जयपुर नरेश से मित्रता पैदा कर ली। वह भी इनको पुत्रवत् प्यार करते थे। जब सवाई जयसिंह के बाद ईश्वरीसिंह और माधौसिंह में झगड़ा हुआ तो सूरजमलजी ने उनके बड़े


1. मथुरा मेमायर्स


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-640


ईश्वरीसिंह जी को सहायता दी और माधौसिंह के हिमायतियों को जिनमें मल्हार होल्कर, गंगाधर तांतियां और मेवाड़, मारवाड़ और कोटा, बूंदी के राजा शामिल थे, एक साथ ही परास्त किया। इस युद्ध में पचास शत्रुओं को स्वयं महाराज सूरजमल ने अपने हाथ से काट डाला और एकसौ आठ को घायल किया था।1 यह घटना सन् 1749 की है। बूंदी के कवि सूदन ने इस समय की महाराज की वीरता का इस भांति वर्णन किया है-

“सह्यो भले ही जट्टिनी, जाए अरिष्ट अरिष्ट।

जाठर तस रवि मल्ल हुव, आमेरन को इष्ट।।

बहुरि जट्ट मलहार सन्, लरर लग्यो हर बल्ल।

आंगर है हुलकर, जाट मिहिर, मल्ल प्रति मल्ल।।’’


अर्थात्-जाटिनी ने व्यर्थ ही प्रसूति की पीड़ा नही सही। उसके गर्भ से शत्रु का संहारक और आमेर के राजा का हितैषी सूरजमल उत्पन्न हुआ। फिर जाट सेना के आगे के भाग में मल्हारराव से युद्ध करने लगा (क्योंकि पीछे का भाग उसने जीत लिया) होलकर (रात्रि की) छाया और जाट सूर्य था। दोनों वीर अच्छी तरह युद्ध में भिड़े।

इस युद्ध के पश्चात् महाराज सूरजमल की कीर्ति सारे भारत में फैल गई, क्योंकि उन्होंने शिशोदियों, राठौरों, चौहानों और मराठों को एक ही साथ हरा दिया था। यह बात राजस्थान क्या भारत के इतिहास में एकदम विचित्र और अपूर्व थी।

सन् 1748 ई. में पलवल के स्थान पर महाराज सूरजमलजी ने सआदत अलीखां को और 1752 ई. में घासहरे के ठाकुर रावबहादुरसिंह बड़गूजर को परास्त किया। मेवों को तो अपने पिता के आगे ही परास्त कर चुके थे। सआदत-अलीखां ने महाराज की इन दो शर्तो को मान लिया था कि उसके अधीन मनुष्यों में से कोई न तो पीपल का पेड़ काटेगा, न हिन्दू-मन्दिरों का अपमान करेगा

महाराज सूरजमल ने वैवाहिक-सम्बन्धों द्वारा भी अपना राज्य विस्तृत किया। उन्होंने अपनी शादी होडल के मुखिया चौ. काशीरामजी, जो एक समृद्धिशाली जाट सरदार था, की सुपुत्री रानी किशोरी से की थी। इसी भांति अपने पुत्र नवलसिंह की शादी कोटमणि के शक्तिशाली सरदार सीताराम की लड़की से की थी।

आपने वल्लभगढ़ के राजाओं की मुगलों से सहायता की । उन्होंने 1831 ई. में अहमद बंगश की राजधानी फर्रुखाबाद को भी लूट लिया। 1752-53 ई. में


1. हिस्ट्री आफ जाट्स, कालिकारंजन कानूनगो कृत


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इन्हें मराठों के साथ दुबारा युद्ध करना पड़ा। गाजीउद्दीन इमादुलमुल्क ने अहमदशाह के पुराने मन्त्री सफदरजंग को महाराजा सूरजमल के खिलाफ लड़ने के लिए निमन्त्रित किया। सन् 1753 ई. में रघुनाथ राव पेशवा, होल्कर, इमाद की अध्यक्षता में मराठा और कुछ राजपूत राजाओं ने मिलकर हमला कर दिया। जनवरी सन् 1754 में इनकी सेनाओं ने कुम्हेर को घेर लिया। तीन महीने तक लगातार युद्ध होता रहा। इसी बीच महाराजा सूरजमल ने देहली के बादशाह और ग्वालियर के सिन्धिया से मित्रता कर ली, इसलिए मराठों को कुम्भेर का घेरा उठा लेना पड़ा। 1


सन् 1757 ई. में अहमदशाह अब्दाली ने अपने तमाम साथियों को यह आज्ञा दी कि भरतपुर के समस्त शहरों को नष्ट कर डालो और जो जितने जाटों के सिर को इकट्ठा करेगा, उसे उसका पंचगुना रुपया इनाम में दिया जाएगा। सबसे पहले बल्लभगढ़ पर धावा हुआ। यहां उस समय जवाहरसिंह अपने थोड़े से साथियों के साथ ठहरे हुए थे। दिन भर लड़ने के पश्चात् रात के समय उन्होंने भरतपुर की ओर कूंच कर दिया। 28 फरवरी सन् 1757 को दुर्रानी की सेना ने मथुरा पर आक्रमण किया। यहां महाराज सूरजमल की तरफ से 5000 सैनिक थे। अचानक घिर जाने पर भी उन्होंने बड़ी बहादुरी के साथ पठानों का सामना किया और तीन हजार जाट धर्म की रक्षा करते हुए शहीद हो गए।

मथुरा को तबाह करने के बाद अब्दाली आगरे की तरफ बढ़ा, क्योंकि उसने सुना था कि उधर की तरफ बड़े-बड़े मालदार जाट हैं। किन्तु इसी बीच उसकी फौज में बीमारी फैल गई और उसके 150 सैनिक प्रतिदिन मरने लगे। वह महाराज से सिर्फ अपने खर्चे के लिए पहले एक करोड़ और फिर दस लाख रुपया मांगता रहा, किन्तु महाराज ने उसे कानी कौड़ी भी न दी। वह जाट-राज्य को धूल में मिला देने के इरादे से आया था, किन्तु अपना-सा मुंह लेकर उसे लौट जाना पड़ा।2


अब्दाली के आक्रमणों के समय भयंकर परिस्थितियों में महाराज सूरजमल के लिए बड़ा कठिन था कि वह मराठा और अब्दाली में से किस के साथ मैत्री स्थापित करें । एक और देश को मराठे तबाह कर रहे थे और दूसरी और अब्दाली। अब्दाली यदि विधर्मी था तो मराठे चंचल मनोवृत्ति वाले और अविश्वासी थे।


1. घेरा उठाने का मुख्य कारण मल्हार राव के पुत्र खांडेराव की मृत्यु और महाराज सूरजमल की राजनीतिक चतुरता थी - सम्पादक
2. अब्दाली के लौटने के कारण थे - भरतपुर की सेना की छापामार लड़ाई , महाराज सूरजमल का खरा जवाब, उसके सैनिकों में बैठा जाटों की तलवार का भय और आने वाले गर्मी के मौसम का डर - संपादक


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लेकिन आदर्श इसी में था जो कि स्वयं महाराज सूरजमल ने पसन्द किया था कि वह स्वदेश हित के लिए मराठों में मिल गए। देहली के मंत्रित्व पद के लिए उस समय गाजीउद्दीन और नजीबुद्दौला दोनों ही दांत गड़ाए हुए थे। गाजीउद्दीन के पक्ष में रघुनाथराव जो मराठों का उस समय सबसे बड़ा सरदार था झुका हुआ था। उसने पंजाब से लौट करके देहली को जीत लिया और गाजीउद्दीन को वजीर बना दिया था। नजीबुद्दौला होल्कर की शरण में पहुंचा। लेकिन महाराज सूरजमल देहली का मंत्रि-पद शुजाउद्दौला को दिलाने के पक्ष में थे। वह चाहते थे कि नजीबुद्दौला को खतम कर दिया जाए क्योंकि वह धोखेबाज है और गाजीउद्दौला का इसलिए हटा दिया जाय कि उसका कोई प्रभाव नहीं है। इस तरह महाराज सूरजमल उस भावी भय को मिटा देना चाहते थे, जिसकी आशंका अब्दाली के आक्रमण के समय से ही हुई थी। दत्ताजी सिंधिया और रघुनाथराव महाराज सूरजमल के विचार का समर्थन करते थे, किन्तु मल्हारराव होल्कर ने इमाद क्रे प्रति अपने मोह के कारण इस समय भंयकर भूल की।

होल्कर की इस भूल का परिणाम दो ही वर्ष आगे चलकर के स्पष्ट हो गया। कुछ समय पहले रघुनाथराव ने पंजाब से अब्दाली के लड़के और हाकिमों को खदेड़ दिया था। इसलिए एक तो स्वयं उसकी इच्छा थी कि मराठों से वह बदला ले, दूसरे नजीबुद्दौला और देहली के बादशाह ने उसे भारत आने के लिए निमन्त्रण भी भेजा। अब्दाली के इस भंयकर आक्रमण से सारे उत्तरी-भारत में आतंक छा गया। जिनके पास धन और मान कुछ खोने के लिए था, वे जाट रियासत भरतपुर में भाग आये जो कि हिन्दू व मुसलमान प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति और जाति के लिए शरणस्थल बन गया था। मराठा सरदारों ने भी अपनी स्त्री और बाल-बच्चों को महाराजा सूरजमल की रक्षा में भेज दिया। यहां तक कि हिन्दुस्तान के उस वजीर गाजीउद्दीन ने भी, जो कि महाराज का परम शत्रु था, अपने स्त्री-बच्चों को उन्हीं की शरण भेजना उचित समझा। महाराजा सूरजमल की इच्छा थी कि सिंधिया सरदार की वह किसी आपत्ति के समय में सहायता करे। क्योंकि वह सिंधिया के उस अहसान से उऋण होना चाहते थे, जो कि उसने कुम्हेर पर चढ़ाई के समय किया था।

अब्दाली और दत्ताजी में देहली के समीप बादली नामक स्थान पर घोर युद्ध हुआ। मराठे दिल तोड़कर लड़े। किन्तु विजय अब्दाली की हुई। वजीर गाजीउद्दीन भय के मारे देहली छोड़कर भाग गया। भाग्य ने उसका साथ जब कहीं न दिया तो लाचार होकर उसे भी भरतपुर की शरण लेनी पड़ी, जिसे कि वह कुछ दिन पहले नष्ट कर देने के लिए आतुर था। महाराज ने उसके पूर्व कुटिल व्यवहार को भुलाकर उसे शरण दी और यथोचित स्वागत-सत्कार के साथ रहने की व्यवस्था कर दी।


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अब्दाली से हारने के बाद घायल और पीड़ित मराठों का भरतपुर में पूरी तरह से उपचार किया गया। अब्दाली महाराज सूरजमल के इस व्यवहार से चिढ़ गया कि उन्होंने उसके शत्रुओं को आश्रय दिया है इसलिए उसने दण्ड-स्वरूप महाराज से एक करोड़ रुपया मांगा । लेकिन महाराज शत्रु को इतनी बड़ी रकम देकर और अधिक बलवान बनाने के पक्ष में न थे, अतः उन्होंने उस धन को शत्रु से युद्ध करने में व्यय करना उचित समझा।

एक ओर तो महाराज सूरजमल थे कि अपने कट्टर शत्रु मराठों को इसलिए मदद दे रहे थे कि वे स्वदेशवासी और स्वधर्मी हैं। दूसरी ओर आमेर के माधौसिंह और मारवाड़ के विजयसिंह आदि राजपूत राजा थे, जो विदेशी और विधर्मी अब्दाली की विजय का स्वागत कर रहे थे।

2 फरवरी सन् 1760 को अहमदशाह अब्दाली ने महाराज सूरजमल के विरुद्ध भरतपुर की ओर प्रस्थान किया और तारीख 7 फरवरी को उसने डीग को घेर लिया। इस समय महाराज सूरजमल ने एक चाल चली। मराठा सेना की एक टुकड़ी उन्होंने रेवाड़ी की ओर, दूसरी बहादुरगढ़ की ओर भेज दी और जाट-सेना का तीसरा दल अलीगढ़ की तरफ भेज दिया। 17 मार्च को जाट-सेना ने अलीगढ़ को लूट लिया और वहां के किले को नष्ट कर दिया। अब्दाली को डीग का घेरा उठा लेना पड़ा। उसने मेवात में मराठों का पीछा किया। होल्कर भी इस समय महाराज सूरजमल का मित्र बन गया था। सिकन्दरा नामक स्थान पर अब्दाली ने जनरल साहबपसन्दखां से पराजित होने पर उसने भी भरतपुर में शरण ले रखी थी।

सन् 1760 ई. के पूरे साल, महाराज सूरजमल को केवल शस्त्रों से ही लड़ाइयां नहीं लड़नी पड़ीं, बल्कि राजनैतिक चालों से भी अब्दाली का सामना करना पड़ा।

आखिर सन् 1761 ई. में उस युद्ध के आसार प्रकट होने लगे जो भारतवर्ष के इतिहास में पानीपत के दूसरे युद्ध के नाम से पुकारा जाता है। पेशवा बालाजी बाजीराव ने अपने भाई सदाशिव और लड़के विश्वासराव को एक बड़ी सेना देकर भारतवर्ष के भाग्य के अन्तिम निपटारे के लिए रवाना किया। पेशवा ने राजपूताने के समस्त राजाओं के पास हिन्दू-धर्म की रक्षा के नाते युद्ध में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। किन्तु किसी भी राजपूत राजा ने पेशवा के इस आह्वान को स्वीकार नहीं किया। चम्बल के किनारे पहुंचकर जब भाऊ ने महाराजा सूरजमल को, एक लंबा पत्र लिखकर, धर्म के नाम पर सहायता करने के लिए भेजा, तब महाराजा ने एक सच्चे हिन्दू की भांति मराठों के निमन्त्रण को स्वीकार किया और वह 20,000 जाट सैनिकों के साथ मराठों के कैम्प में पहुंच गए।


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मराठा कमाण्डर-इन-चीफ ने आगरे में एक सभा की और उसमें युद्ध-विषयक परामर्श किया गया। उस समय महाराज ने मराठों को बड़ी उत्तम राय दीं और कहा कि हमें लड़ाई किसी छोटे-मोटे सरदार से नहीं लड़नी है । यह युद्ध तमाम मुसलमानों से है और बड़ा भंयकर युद्ध है। इसलिए इसके पूर्व स्त्रियों को किसी सुरक्षित दुर्ग में भेज देना चाहिए। हमारे साथ पैदल सेना, तोपें अत्यधिक हैं और मैदान में हैं। रसद तक का यथोचित प्रबन्ध नहीं है। इसलिए मेरी समझ से अगर कोई दूसरा स्थान न हो सके, तो मेरे यहां किले में पैदल सेना के साथ स्त्रियों,बालबच्चों और सामान को रखना चाहिए। नहीं तो शत्रु सेना कभी भी नष्ट करने में सफल हो सकती है।1 यद्यपि होल्कर वगैरह ने इस बात का समर्थन किया, परन्तु भाऊ ने इसे उचित सलाह न बताकर ऊट-पटांग बातें कीं, जिससे महाराज सूरजमल ने दूसरी बार भी विवेचनापूर्ण एक-एक पहलू को समझाने की कोशिश की, परन्तु सब बेकार हुई। ठीक कहते हैं ‘विनाशकाले विपरीत बुद्धिः’। अर्थात् नाश होने का वक्त आ जाने पर बुद्धि विपरीत हो जाती है।

एक दूसरी बात सूरजमल के रुष्ट होने की यह और हुई कि भाऊ ने लालकिला देहली के आमखास की चांदी की छत को उनकी इच्छा के विरुद्ध तुड़वा दिया। महाराज उस छत के एवज में पांच लाख रुपया देने को तैयार थे। पर लालची भाऊ को कहीं उससे भी अधिक का माल उसमें दिखाई दे रहा था। वह अपने हठी और लालची स्वभाव होने के कारण महाराज सूरजमल से बिगाड़ बैठा। छत तुड़वा देने पर भी उसे जब 3 लाख रुपये का ही माल मिला तो महाराज सूरजमल ने फिर कहा कि

“आप इस छत को फिर बनवा दीजिए जिससे देहली की प्रजा और आपके प्रति सरदारों का बढ़ा हुआ असन्तोष दूर हो जाए। सहयोगियों की सलाह से राज्य-कार्य कीजिए जिससे शासन के प्रति प्रेम उत्पन्न हो और मैं अब भी कहता हूं कि स्त्रियों को मेरे यहां के किले में भेज दीजिए। क्योंकि भरतपुर के आस-पास में जमींदार खुशहाल हैं इसलिए वहां रसद भी इकट्ठी हो जाएगी। आपको रसद और सैनिकों से मैं पूरी सहायता देता रहूंगा।”

महाराज सूरजमल ने यह बात मार्मिक शब्दों में कही थी, परन्तु भाऊ के पत्थर-हृदय पर कुछ भी असर न हुआ। महाराज ने देख लिया कि इस समय इसके सिर पर दुर्भाग्य सवार है और वह बिना कुछ कहे अपने शिविर को लौट आया।

भाऊ इतने ही से सन्तुष्ट नहीं हुआ, किन्तु उसने निश्चय किया कि सूरजमल


1. महाराज ने एक परामर्श यह भी दिया था कि लम्बी मार की तोपों को मैदान में न ले जाया जाये और अब्दाली का सामना मैदान में जमकर नहीं, छापामार लड़ाई से किया जाय - संपादक

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के डेरों को लूट लिया जाय और उसे गिरफ्तार कर लिया जाय। किन्तु महाराज सूरजमल को होल्कर के द्वारा सूचित किए जाने पर षड्यंत्र का पता लग गया और वह उसी रात अपने लश्करे समेत भरतपुर की ओर रवाना हो गये। भाऊ के सैनिकों ने सुरक्षित उनका पीछा किया, लेकिन वह बल्लभगढ़ के किले में पहुंच चुके थे।

पानीपत के मैदान में वही हुआ, जिसकी कि आशंका की जा रही थी। मराठों को बुरी तरह से परास्त होना पड़ा, क्योंकि इस्लाम के नाम पर मुसलमान सब संगठित हो चुके थे। शुजाउद्दौला भी उनकी सेना में मिल गया था। इस लड़ाई में मराठों को भारी हानि उठानी पड़ी। उनके बड़े योद्धा इस युद्ध में मारे गए। शेष जो बचे वे बड़ी बुरी दशा में पड़ते-गिरते भरतपुर पहुंचे। महाराज सूरजमल ने मराठों की पुरानी बातों को भूल करके उनकी बड़ी आवभगत की। ब्राह्मण सैनिकों को दूध और पेड़ा खिलाया जाता था। घायल सैनिकों की सेवा-सुश्रूषा और इलाज किया गया। महारानी किशोरी ने स्वयं उनकी आवभगत में बड़ी दिलचस्पी ली। उस समय महाराज ने प्रजा में मुनादी करवा दी थी कि जो कोई दुखी सैनिक जिसके यहां पहुंचे उसकी यथोचित सहायता की जाये। इस आवभगत में महाराज का दस लाख रुपया खर्च हुआ। बाजीराव पेशवा की मुसलमान स्त्री से जंग बहादुर नाम का एक लड़का था। महाराज ने उसके उपचार का पूरा प्रबन्ध किया, किन्तु वह बच न सका । उस समय महाराज के यहां बड़े-बड़े सरदारों ने आश्रय लिया था। सदाशिव भाऊ की स्त्री पार्वती बाई भी दुर्दिनों के फेर से वहां पहुंच गई थी। महाराज ने उन सबका उचित सम्मान योग्य प्रबन्ध किया और पार्वती बाई और सरदारों को एक-एक लाख रुपया देकर अपनी अधिरक्षता में दक्षिण की ओर भिजवा दिया। अन्य सभी महाराष्ट्रीय ब्राह्मणों को महारानी किशोरी ने पांच-पांच रुपया और वस्त्र वगैरह देकर विदा किया।


नाना फड़नवीस ने महाराजा सूरजमल के इस सद्व्यवहार के सम्बन्ध में इस प्रकार लिखा था -

“अब हम ग्वालियर में होल्कर के साथ ठहरे हुए हैं। भरतपुर में हमें सूरजमल ने आराम देने में कोई कसर नहीं रखी। हम 15-20 दिन तक वहां रहे, उन्होंने हमारा बड़ा आदर सम्मान किया और हाथ जोड़कर कहा-मैं तुम्हारे ही घर का हूं, मैं तुम्हारा एक सेवक हूं तथा ऐसे ही शिष्टाचार के अन्य शब्द भी कहे। उन्होंने हमें ग्वालियर तक बड़ी हिफाजत के साथ पहुंचा दिया है। अफसोस है कि उस जैसे बहुत थोड़े मनुष्य होते हैं।”

पेशवा यह पत्र पढकर सूरजमल के लिए बड़ा प्रसन्न हुआ।

जब पानीपत की लड़ाई के पश्चात् अब्दाली देहली आया तो वह मराठों को शरण देने के कारण सूरजमल पर चढ़ाई करने की सोचने लगा। नागरमल


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नाम के व्यक्ति को सूरजमल के पास इसलिए भेजा कि यदि सूरजमल कुछ भेंट दे दे तो लड़ाई स्थगित कर दी जाए। महाराज खूब जानते थे कि पठान अभी जल्दी कोई नई लड़ाई नहीं लड़ सकते हैं। इसलिए मार्च सन् 1761 ई. तक सन्धि के भुलावे में ही अब्दाली को डाले रहे और इसी बीच में आगरे पर अधिकार जमा लिया। शहर और किले की लूट से उन्हें 5,00000 रुपये मिले। ऐसे मौके पर एक लाख रुपया शाह को दे दिया। 21 मई सन् 1761 ई. को अब्दाली अपने देश के लिए प्रस्थान कर गया। अब महाराज सूरजमल को अपने राज्य को बढ़ाने का पूरा अवसर मिल गया।

महाराज ने हरयाणे के प्रदेश पर जहां कि जाटों की अधिक आबादी थी और अनेक छोटे-छोटे मुसलमान जागीरदार राज्य कर रहे थे, को विजय करने के लिए जवाहरसिंह की अध्यक्षता में सेना भेजी। छोटे लड़के नाहरसिंह की अध्यक्षता में द्वाबा में अधिकार स्थापित करने और पूर्वी रुहेला सरदारों की चाल का निरीक्षण करने के लिए दूसरी सेना भेजी। जवाहरसिंह ने फर्रुखनगर पर जो कि एक बिलोची सरदार मुसाबीखां के अधिकार में था, चढ़ाई की। यह किला बड़ा मजबूत था, इसलिए महाराज स्वयं तोपखाना लेकर जवाहरसिंह की सहायता को पहुंचे। दो महीने के घेरे के पश्चात् मुसाबीखां ने किले को खाली कर दिया। उसे कैद करके भरतपुर भेज दिया गया। फर्रुखनगर जाट-राज्य में मिला लिया गया। रेवाड़ी, गढ़ी-हरसरू और रोहतक तो पहले ही जाटों के अधिकार में आ चुके थे और वे नवलसिंह तक उनके अधिकार में रहे थे। कहा जाता है कि गढ़ी हरसरू की चढ़ाई में सूरजमल का हाथी जो कि किले के बड़े फाटक को तोड़ने के लिए जुटाया गया था, थककर बिना फाटक तोड़े लौट आया। तब सरदार सीता राम ने जो कि जाट (Ajaz) था, यह देखा तो कुल्हाड़ी लेकर बाहर आया और बड़ी वीरतापूर्वक फाटक को काट डाला। इसके बाद सूरजमल ने दूसरे सरदार बहादुरखां के किले पर चढ़ाई कर दी। इसी समय जाट सेना का एक दूसरा भाग नाहरसिंह और बलरामसिंह तथा अन्य प्रसिद्ध सेनानायकों की अध्यक्षता में मुगल सरकार के अफसरों के हाथ से अनेक स्थानों को जीतते हुए जल्दी से जल्दी नजीबुद्दौला से भिडने के लिए तैयार हो रहा था । लेकिन नजीबुद्दौला इस मौके को टालना चाहता था और सूरजमल इस मौके से लाभ उठाना चाहते थे। इससे पहले सूरजमल के अधिकार में इतना प्रदेश आ गया था कि पूर्व में उनके राज्य की सीमा रुहेला राज्य तक पहुंच गई थी। कोल, जलसेर, एटा के जिले उन्ही के राज्य में थे। जमुना के इस किनारे पर देहली के फाटकों से लेकर चम्बल तक उनके सिवाय और किसी का राज्य नहीं था और गंगा की ओर भी करीब-करीब यही हालत थी। आगरे का किला ले लेने के पश्चात् उन्हें दक्षिण में अपने राज्य का फैलाने के लिए


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बहुत कुछ नहीं करना था। उनका ध्यान देहली के पश्चिम की ओर लगा हुआ था। इसलिए उन्होंने नजीबुद्दौला के सामने दिल्ली के आसपास के जिलों की गर्वनरी देने का प्रस्ताव रखा। पहले तो नजीबुद्दौला संधि की चर्चा चलाता रहा। लेकिन आखिर जब उसने समझ लिया कि सूरजमल से बिना लड़ाई लड़े अथवा गर्वनरी दिए तीसरी युक्ति से काम नहीं चल सकता तो दस-बारह हजार घुड़सवार और पैदलों की सेना लेकर 24 दिसम्बर सन् 1763 ई. को सूरजमल से लड़ने के लिए जमुना पर कदम रखा। हिंडन नदी के किनारे दानों सेनाओं ने आमने-सामने डेरे लगा दिए। पहले दिन की लड़ाई में जाट ही विजयी रहे। जब कि घमासान युद्ध मच रहा था, महाराज सूरजमल केवल 30 घुड़सवारों के साथ मुगल और बिलोचियों की सेना में पिल पड़े और वीरगति को प्राप्त हुए1 जाट सेना इतनी सुव्यवस्थित थी कि सूरजमल की मृत्यु के समाचार चारों ओर फैल जाने पर भी एक भी योद्धा विचलित न हुआ। वे इस भांति लड़ते रहे मानो कुछ भी नहीं हुआ है। जाट-सेना ने विजेताओं की भांति युद्ध-क्षेत्र को छोड़ा। महाराज सूरजमल की लाश शत्रुओं के हाथ न पड़ी। उनकी मृत्यु का विश्वास भी तब तक दुश्मनों को नहीं हुआ, जब तक कि जाट हिंडन को छोड़कर भरतपुर की तरफ न चल दिए।

फादर वेण्डिल ने महाराजा सूरजमल के स्वर्गवास का 25 दिसम्बर रविवार सन् 1663 ई. माना है। उनका मत इसलिए भी सही माना जा सकता है कि उन्होंने भरतपुर का इतिहास इस घटना के 5 वर्ष बाद ही लिखा था।

महाराजा सूरजमल वास्तव में अपने समय के योद्धाओं में भीम, नीतिज्ञों मे कृष्ण और अर्थशास्त्रियों में कौटिल्य थे। एक मुसलमान यात्री ने तो उन्हें भारत का अन्तिम हिन्दू-सम्राट लिखा है। यथार्थ में, वह नवीन युग के प्रवर्तक थे, राष्ट्रीय चेतना के जनक और देश को नयी दिशा देने के लिए प्रतिबद्ध थे।

भारतेन्द्र जवाहरसिंह

महाराजा जवाहरसिंह

महाराज सूरजमल के चार रानियां थीं। जिनसे जवाहरसिंह, रतनसिंह, नवलसिंह, रणजीतसिंह और नाहरसिंह पांच पुत्र पैदा हुए थे। कहा जाता है जवाहरसिंह और रतनसिंह एक राजपूत रानी से थे, जिसके सौन्दर्य से मुग्ध होकर सूरजमल ने उसके साथ शादी की थी। फादर बेण्डिल और इमादुस्सात का लेखक दोनों ही इस बात का समर्थन करते हैं कि जवाहरसिंह की मां एक राजपूतानी थी।


1. महाराज सूरजमल की मृत्यु के बारे में अनेक मत हैं, विस्तार के लिए देखें-
1. इतिहास पुरुष महाराज सूरजमल, ले. डॉ. नत्थन सिंह
2. सूरजमल, ले. के. नटवर सिंह


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-648


महाराज सूरजमल अपनी सब रानियों में वीर किशोरी रानी की, जिसके कोई संतान नहीं हुई थी, अधिक प्यार करते थे। सौभाग्य से जवाहरसिंह को रानी किशोरी ने गोद ले लिया था और इसी के प्रभाव और प्यार के कारण विद्रोह-प्रिय जवाहरसिंह अपने पिता के क्रोध से बच गया था।


आरम्भ में नवयुवक जवाहरसिंह के हृदय में यवन शासकों के लिए भारी घृणा थी। उन्होंने देहली के वजीर को सिर्फ इस बात के लिए फटकार दिया था कि उसने उनके हाथ चूमकर अपवित्र क्यों कर दिया? महाराज सूरजमल की इच्छा नाहरसिंह को अपना उत्तराधिकारी बनाने की थी। नाहरसिंह अपने पिता की आज्ञाकारी, गुरुजनों का सम्मान करने वाला, नम्र और सादा स्वभाव का था। किन्तु वह आवश्यकता के अनुसार निर्भयता और वीरता के गुणों से भरपूर न था। जवाहरसिंह को न ईश्वर से भय था और न मनुष्य से। वह अपने इरादों को पूरा करने तथा बदला लेने में, दोनों मनुष्य और ईश्वर का सामना करने के लिए तैयार रहता था। वह रणकुशल, प्रबन्ध करने में योग्य, फुर्तीला, चतुर तथा वीर होने के कारण जन्म से ही शासक होने के योग्य था। किन्तु महाराज सूरजमल को उसकी निरन्तर लड़ाकू प्रवृत्ति होने से भय था कि बहुत संभव है जाट-जाति को यह नष्ट कर दे। इसी से वह इन्हें जाट-शक्ति अर्थात् अपना राज्य नहीं देना चाहते थे। महाराज सूरजमल जितने मितव्ययी थे, जवाहरसिंह उतने ही अपव्ययी। यही कारण था कि उन्होंने अपनी एक अलग पार्टी बना ली। अलग दरबार और सेना रखने लगे, जिसका कि खर्च सूरजमल को स्वीकार किए हुए धन से कहीं अधिक था। महाराज सूरजमल ने जवाहरसिंह की अल्हड़पन-युक्त वीरता से खूब लाभ उठाया। कठिन से कठिन मोर्चों पर उन्हें भेजा गया। किन्तु उनका खर्च डीग के इलाके की आमदनी से कहीं अधिक बढ़ चुका था। साथ ही जवाहरसिंह को कुछ ऐसे साथी मिले जिन्होंने उनको अपने पिता के विरुद्ध उभाड़ दिया।


महाराज सूरजमल उसके साथियों को दण्ड देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने डीग पर चढ़ाई की। किन्तु जवाहरसिंह ने इसे अपना अपमान समझा और वे लड़ाई के मैदान में आ गए। थोड़े ही समय में उनके साथी तो भाग खड़े हुए, लेकिन वह मैदान में डटे रहे। अनेक लोगों से बीच में घिर जाने के कारण वह जख्मी हो गए। सूरजमल जो कि अपने वीर पुत्र की मृत्यु के मुकाबले में हार जाना पसन्द करते थे, घायल पुत्र के पास लपककर पहुंचे और अपने प्यारे पुत्र को छाती से लगा लिया। तब से वह जवाहरसिंह को बहुत प्रेम करने लगे। उनकी लड़ाकू-प्रवृत्ति को ध्यान में रखते हुए महाराज सूरजमल ने यह विचार किया कि जवाहरसिंह को हरयाणा प्रान्त का स्वतन्त्र शासक बना दिया जाए। यदि उनका यह विचार पूर्ण हो जाता तो महाराज जवाहरसिंह को पंजाब की ओर से आने वाले आक्रांताओं से


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-649


साधन मिलते रहते, और फिर भारत का रूप ही दूसरा होता।


भरतपुर राज्य का विस्तार - महाराज सूरजमल की जिस समय मृत्यु हुई थी, उस समय भरतपुर राज्य का विस्तार और वैभव इस प्रकार था - आगरा, धौलपुर, मैनपुरी, हाथरस, अलीगढ़, एटा, मेरठ, रोहतक, फर्रुखनगर, मेवात, रेवाड़ी, गुड़गांव और मथुरा के जिले उनके अधिकार में थे। गंगाजी का दाहिना किनारा इस जाट-राज्य की पूर्वी सरहद, चम्बल दक्षिणी, जयपुर का राज्य पश्चिमी और देहली का सूबा उत्तरी सरहद थे। इसकी लम्बाई पूर्व से पश्चिम की ओर 200 मील और उत्तर से दक्षिण की ओर 150 मील के करीब थी।1


राज्य की माली हालत के बारे में फादर बेण्डिल लिखता है कि -

"खजाने और माल के विषय में जो कि सूरजमल ने अपने उत्तराधिकारी के लिए छोड़ा, भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ इसे नौ करोड़ बताते हैं और कुछ कम। मैंने उसकी वार्षिक आय तथा ब्याज का उन लोगों से जिनके हाथ में यह हिसाब था, पता लगाया है। जैसा कि मुझे मालूम हुआ है उसका खर्च 65 लाख से अधिक और 60 लाख सलाना से कम नहीं था और राज्य के अन्तिम 5-6 वर्षो में उसकी वार्षिक मालगुजारी एक करोड़ पचहत्तर लाख से कम नहीं थी। उसने अपने पूर्वजों के खजाने में 5-6 करोड़ रुपया जमा कर दिया। जवाहरसिंह के गद्दी पर बैठने के समय 10 करोड़ रुपया जाटों के खजाने में था। बहुत-सा गढ़ा हुआ न जाने कहां है। यहां के गुप्त खजाने में अब भी बहुत अमूल्य पदार्थ और देहली, आगरे की लूट की अद्वितीय तथा छंटी हुई चीजें जिनका मिलना अब बहुत मुश्किल है बताई जाती हैं। खजाने के सिवाय सूरजमल ने अपने उत्तराधिकारी के लिए 5000 घोड़े, 60 हाथी, 15,000 सवार, 25000 से अधिक पैदल, 300 से अधिक तोपें और उतनी ही बारूद-खाना तथा अन्य युद्ध का सामान छोड़ा। "

‘सियार’ का लेखक लिखता है -

“सूरजमल के तबेले में 12,000 घोड़े उतने ही चुनीदा सवारों सहित थे जिनको कि उसने दूसरों के घुड़सवारों पर निशाना लगाने का और फिर अपनी बन्दूकें सुरक्षित होकर भरने के लिए चक्कर खाने का अभ्यास कराया था। यह आदमी रोजाना के अभ्यास से इतने निपुण और भयानक निशानेबाज और मार्च में इतने चतुर बन गए थे कि हिन्दुस्तान में कोई भी ऐसी सेना नहीं थी जो खुले मैदान में उनका सामना कर सके और न ऐसे राजा के विरुद्ध लड़ाई मोल लेना ही फायदा के लिए सम्भव समझा जाता था।”

महाराज जवाहरसिंह तारीख 2 जनवरी सन् 1764 ई. को अपने बाप की गद्दी पर बैठे। उनको भरतपुर के महाराजा होने में कुछ कठिनाइयां भी उठानी पड़ीं। बलराम, जो कि सूरजमल की सेना का एक बड़ा सरदार और


1. De Nabab Rene Madec, see page 45


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नाहरसिंह का मामा था, चाहता था कि नाहरसिंह को भरतपुर का राजा बनाया जाए। जवाहरसिंह उस समय फर्रुखनगर में थे। उन्होंने अपने भाइयों के लिए कहला भेजा कि यह समय उत्तराधिकारी बनने का क्षण नहीं किन्तु अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने का है। मैं अपनी थोड़ी-सी सेना को जो कि मेरे पास है लेकर चढ़ाई करूंगा और पीछे देखूंगा कि पिता का उत्तराधिकारी कौन है? इस धमकी से नाहरसिंह तो भरतपुर को छोड़कर चला गया और बलराम ने इसमें बुद्धिमत्ता समझी कि जवाहरसिंह का साथी बन जाए। जवाहरसिंह की स्थिति निर्बल थी। वैर में उनका चचेरा भाई बहादुरसिंह अपनी स्वतंत्र रियासत कायम करने में लग रहा था। सरदारों की ओर से भी कोई अधिक सहयोग मिलने की आशा नहीं थी। फिर भी वे अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए नजीबुद्दौला (नजफखां) पर चढ़ाई करना चाहते थे।


सन् 1765 अक्टूबर महीने के अंत में एक बड़ी भयानक सेना लेकर देहली के दरवाजे के सामने सूरजमल की मृत्यु का बदला लेने और पानीपत विजय के मुस्लिम प्रभाव को नष्ट करने के लिए महाराज जवाहरसिंह जा डटे। इसके साथ निजी 60 हजार पैदल और सौ तोपें थीं। 25,000 मराठे होल्कर की अध्यक्षता में और लगभग 25,000 सिख वेतन पर बुलाए गए थे। प्रत्येक सिपाही को एक रुपया रोज दिया जाता था।

महाराज जवाहरसिंह ने नजीबुद्दौला (नजफखां) को बाहर निकलकर लड़ने के लिए ललकारा। अफगानों को बाहर निकलने को मौका देने के लिए अपनी सेना को 4-6 कोस पीछे को हटा लिया। नजीबुद्दौला अफगानों के साथ बाहर निकला। जाट भूखे भेड़िये के समान अफगानों पर टूट पड़े। उन्होंने अफगानों को शहर में घुसा दिया। महाराज जवाहरसिंह ने होल्कर तथा दूसरे सरदारों को साथ लेकर जमुना को पार करके शाहदरे को लूट लिया। जाटों की 17 नवम्बर की तोपों की लड़ाई से नजीबखां की सेनायें मैदान छोड़कर किले में घुस गई। अब किले और शहर पर गोला पड़ना शुरू हुआ। तीन महीने तक जाट अफगानों की नाक में दम करते रहे। फरवरी सन् 1765 को सब्जीमण्डी और पशुओं की पैठ के समीप की ऊंची भूमि पर खड़े होकर अफगानों ने सिख और जाटों पर गोलियों की बौछार की। किन्तु जाट गोलियों की कुछ भी परवाह न करके अफगानों के दल में घुस पड़े। विवश होकर अफगानों को फिर भागना पड़ा। जब कि जवाहरसिंह को पूर्ण विजय मिलने ही को थी उनके नमकहराम दोस्त मल्हारराव होल्कर ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया। फादर वेण्डल लिखते हैं-

“मल्हारराव ने बड़ी लापरवाही और खुल्लम-खुल्ला नजीबखां की तरफदारी

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प्रगट की। ऐसे समय पर जब कि रुहेले बिना किसी शर्त के आत्म-समर्पण करने ही वाले थे, उसने तमाम मामले को बिगाड़ दिया। महाराज जवाहरसिंह को विवश होकर संधि की स्वीकृति देनी पड़ी। 14 फरवरी को नजीबुद्दौला की ओर से जाब्तिखां एक हाथी और अदब की पोशाक लेकर जवाहसिंह को भेंट करने आया।”

जवाहरसिंह इस संधि से प्रसन्न नहीं थे। वह मल्हारराव से खुनस मानते हुए डीग को लौट आए। फिर भी देहली की लड़ाई में लूट में उन्हें बहुत से जवाहरात और कीमती सामान हाथ लगे थे। “अष्ट धाती” नाम का फाटक जिसे कि चित्तौड़ से मुसलमान बादशाह देहली में ले गये थे आज तक, भरतपुर में चढ़ा हुआ है। डीग के संगमरमर का सिंहासन भी दिल्ली की लूट का मौजूद है। भरतपुर के देहातों में अब भी ऐसी चीजें पाई जाती हैं जिन्हें वे देहली की लूट से लाया हुआ1 बतलाते हैं। जाटों में ‘दिल्लीवारे की लूट’ नाम की एक कहावत भी प्रचलित है।

देहली की चढ़ाई से लौट आने के पीछे उन्होंने अपरे आन्तरिक शत्रुओं के दमन करने की अत्यन्त आवश्यकता समझी। उन्हें यह भी सन्देह हो गया था कि उनकी सेना के सरदार मल्हारराव होल्कर की साजिश में शामिल थे। उनके पास समरू नाम का प्रसिद्ध जनरल आ चुका था। महाराज ने उसकी अध्यक्षता में एक अच्छी सेना तैयार की। कुछ समय के पश्चात् वह आगरे गए और बलराम तथा दूसरे लोगों को गिरफ्तार करा लिया। बलराम और एक दूसरे सरदार ने अपने अपमान के डर से आत्महत्या कर ली। महाराज जवाहरसिंह चाहते थे कि इन लोगों के पास बेईमानी पूर्वक इकट्ठा किया हुआ धन है, वह उन्हें प्राप्त हो जाए। कहा जाता था कि मोहनराय सरदार के पास निजी सम्पत्ति को छोडकर 80 लाख रुपये नकद थे। लेकिन मृत्यु पर्यन्त इन सरदारों ने जवाहरसिंह को कुछ नहीं बताया। महाराज जवाहरसिंह ने उनको, जिन पर कि कुछ भी धन होने का सन्देह था, अत्यन्त कष्ट दिया।


इतना करने पर भी महाराज जवाहरसिंह को जितनी आशा थी, उतना धन प्राप्त न हुआ, क्योंकि वे लोग जिन्हें पूरे धन का पता था, दुराग्रह-पूर्वक पता बतलाने से मर जाना उचित समझे हुए थे। इसके पश्चात् जवाहरसिंह के विरोध में एक शक्ति बहादुरसिंह की भी थी जिसने महाराज सूरजमल की सेवाओं द्वारा बहुत-सा पुरस्कार भी पाया था। यह जवाहरसिंह का चचेरा भाई था और वैर का


1. यह ठीक है कि जवाहर सिंह ने दिल्ली को ध्वस्त करके नजीब का गर्व चूर्ण कर दिया था, लेकिन मल्हार राव की लालची प्रकृति के कारण, देश के जाट, भारत के इतिहास को नया रूप नहीं दे पाए. बाहरी आक्रान्ताओं के लिए उसे दुर्भेद्य नहीं बना पाए- संपादक


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स्वामी था। बहुत से धन के साथ ही यह एक अच्छी सेना भी रखता था।

महाराज सूरजमल की मृत्यु के बाद बहादुरसिंह को अभिमान हो गया था। वह जाट-राज्य कायम करने और उस पर शासक होने का उतना ही अधिकार समझता था, जितना कि जवाहरसिंह। उसके तत्कालीन व्यवहारों द्वारा प्रकट होता था कि वह बेर के मैदानी क्षेत्र पर स्वतन्त्र शासक बनकर रहना चाहता था। वह जवाहरसिंह के रोकने पर भी बाज न आया। उसने किलेबन्दी करनी शुरू की। जवाहरसिंह अगस्त सन् 1765 में वैर पर चढ़ आये और चारों ओर से घेरा डाल दिया। बहादुरसिंह ने पहले से ही बड़ी तैयारी कर ली थी, इसलिए उसने डटकर सामना किया। तीन महीने तक इसी तरह आक्रमण होते रहे और बहादुरसिंह बेकार करता रहा। आखिरकार वह चालाकी से गिरफ्तार कर लिया गया। जवाहरसिंह द्वारा कैद होकर बहादुरसिंह भरतपुर लाया गया और नवम्बर सन् 1765 में ही छोड दिया गया।

इधर महाराज जवाहरसिंह बहादुरसिंह के दमन में लगे थे और उधर नाहरसिंह जवाहरसिंह का छोटा भाई धौलपुर रहते हुए भरतपुर पर अधिकार कर लेने की चेष्टा में था। वह यह अच्छी तरह जानता था कि जवाहरसिंह बहादुरसिंह से निपट कर तेरी और फिरेगा। संयोग से मल्हारराव होल्कर भी समीप के ही एक जाट सरदार की ताक में फिर रहा था। नाहरसिंह ने भरतपुर पर अधिकार करा देने के लिए उससे लिखा-पढ़ी शुरू की। मल्हारराव देहली की चढ़ाई के बाद से जवाहरसिंह से ऐंठ ही गया था और जब उसने (जवाहरसिंह ने) होल्कर पर विश्वासघात का अपराध लगा कर ठहरे हुए शेष 22 लाख रुपये देने से इनकार कर दिया तो वह और भी कुढ़ गया था। उसने इस अवसर को अपनी कसम निकाल लेने के लिए काफी समझा ओर अत्यन्त प्रसन्नता से नाहरसिंह की सहायता करना स्वीकार कर लिया। उसने उसे (नाहरसिंह को) धर्मपुत्र बनाया और पुत्र की रक्षा के नाते से अपनी सेना चम्बल भेज दी, जो नाहरसिंह की सेना से मिलकर धौलपुर-दुर्ग की रक्षा करने लगी। इस अरसे में जवाहरसिंह भी चुपचाप न बैठा था। उसके पास कुल समाचार पहुंचते रहते थे और वह इस बुद्धिमानी से आक्रमण करने की तैयारी में था कि नाहरसिंह के सहायक मराठों का भी रास्ते में ही मान-मर्दन कर सके।


महाराज जवाहरसिंह ने शीघ्र ही अवसर देखकर अपने पंजाबी सैनिकों के साथ प्रस्थान कर दिया और दिसम्बर सन् 1765 में चम्बल के किनारे पहुंच गया। यहां मराठा सेना का एक हिस्सा, जो कि जाट-प्रदेश में घुस आया था, गिरफ्तार कर लिया गया। महाराज जवाहरसिंह ने जब धौलपुर पर आक्रमण किया तो नाहरसिंह और मराठों की सेना उससे लोहा न ले सकी और विजय-श्री ने महाराज जवाहरसिंह का साथ दिया। धौलपुर पर अधिकार करके वहां के बहुत से मराठों


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को उन्होंने कैद कर लिया। नाहरसिंह वहां से भाग निकला और धौलपुर में एक छोटे से राजपूत जागीरदार के किले में जाकर विश्राम किया। वहीं उसने विष खाकर आत्म-हत्या कर ली और उसका परिवार राजा जयपुर के यहां जाकर रहने लगा।

जवाहरसिंह महाराज सूरजमल की तरह नम्र विचार का न था। वह अवसर पाकर शत्रु को नष्ट कर देने की ताक में रहता था। उसकी इसी नीति के कारण, उसका अपनी सेना का गर्वनर तक, उसके पक्ष में न था। महाराज जवाहरसिंह ने धौलपुर पर अधिकार हो जाने पर देखा कि मराठों की शक्ति इतनी ही है तो वह उन्हें राजपूताने से निकाल भगाने की इच्छा करने लगा। परन्तु ग्रीष्म ऋतु आ जाने से उसके सिख सैनिकों ने अस्वीकार कर दिया। अतः उस समय उसने अपना इरादा स्थगित कर दिया।

परन्तु महाराज जवाहरसिंह के इरादे केवल इरादे ही न थे। उस समय की बढ़ती हुई शक्ति में सिख सैनिक उसकी अध्यक्षता में रहते थे। इसलिए समस्त उत्तरी भारत में सूरजमल के जाट-राज्य की डाली हुई नींव को वह पूरा और दृढ़ कर लेने के विचार में था। अब्दाली के मुकाबले में डटे रहने के लिए सिख काफी थे और इधर वह मराठों के लिए तरकीबें सोच रहा था। मालवा के जाटों को जाट-संघ में मिलाकर वह मराठों का इलाज करने की तैयारी कर रहा था।

गोहद का राणा छत्रसाल अत्यन्त वीरता और बहादुरी से मराठों से युद्ध कर रहा था। पंजाब और भरतपुर के जाटों की भांति वहां के जाटों ने भी अपने स्वतंत्र विचार और महान् साहस का परिचय दिया। मराठों की विशाल सेना के सामने भी वर्षों तक अपने स्वतन्त्र विचार और ध्येय को कायम रखा। महाराज जवाहरसिंह ने वीरवर राणा छत्रशाल की सहायता कर मराठों की शक्ति क्षीण करने की ठान ली।

जब माधोराव पेशवा को इस जबरदस्त जाट-संघ का पता चला तो उसे बड़ा भय हुआ। क्योंकि वह जानता था कि इसकी जड़ बड़ी मजबूत है और वह है जवाहरसिंह, जिसकी मार से मराठे धौलपुर से कुछ दिन पहले ही भाग आए थे और जिनके समाचारों को वह जान चुका था। उसने 1766 बसन्त ऋतु में रघुनाथराव को होल्कर के साथ 60 हजार घुड़सवार और एक सौ बड़ी तोपों के साथ मराठों का दबदबा जमाने के लिए भेजा था। रघुनाथराव ने पहले ही गोहद पर घेरा डाल दिया और बड़ी कड़ी-कड़ी मांगे पेश कीं। जवाहरसिंह इस समय बहुत बीमार था, परन्तु शीघ्र ही स्वास्थ्य लाभ लेने पर मराठों से युद्ध करने पहुंच गया। पर जिस दुर्भाग्य से हमारे देश भर को कितनी ही बार भंयकर विपत्तियां सहनी पड़ी और देश इस चिन्त्य-दुर्दशा तक पहुंच चुका है, वही दुर्भाग्य वहां भी अड़ गया। महाराज के दल में दो दुष्ट जयचन्द खड़े हो गए। उन्होंने थोड़े से लालच


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पर महाराज जवाहरसिंह को उसी के कैम्प में कैद करा देने का वायदा किया। फूट जाने वाले विश्वासघाती अनूपगिरि गोसाई के भेद की सूचना गुप्तचरों द्वारा महाराज को ठीक समय पर लगी। उन्होंने अर्द्ध रात्रि के समय ही अपनी सेना को तैयार किया और एकदम से गोसाइयों के कैम्प पर हमला कर दिया। दुष्ट विश्वासघाती बड़ी कठिनता से भागकर प्राण बचा पाए, परन्तु उसके साथी एक बड़ी संख्या में कैद कर लिए गए। उनका कैम्प लूट लिया। जिसमें 1400 के करीब घोड़े, 10 हाथी, 100 तोपें व अन्य और भी कितना ही सामान महाराज के हाथ आया। इस प्रकार उन्हें उन्हीं की करनी का फल मिल गया।


इसी समय अब्दाली ने फिर पैर बढ़ाया और मराठों की तरह वह भी भारत में पुनः रौब-दौब बैठाने पंजाब में उपस्थित हुआ। अब्दाली से सामना करने के लिए जवाहरसिंह और रघुनाथराव में एक संधि हुई-एक तरह से उन्होंने झगड़ों का फैसला किया। आपस में तय पाया कि-1. जो कैदी भरतपुर में हैं छोड़ दिए जाएं, 2. यदि कि मराठे दूसरी सन्धि की शर्तों को पूरा कर दें तो जवाहरसिंह मल्हरराव के तय किए हुए बकाया रुपये दे देगा, 3. रघुनाथराव, महाराज जवाहरसिंह के राज्य के आस-पास का राजपूताने का हिस्सा राजा को 5,00000 रुपया सलाना लगान पर दे दें।


इस प्रकार ये शर्तें दोनों ओर से ही साफ दिल से नहीं हुई थीं और न इन्हें निभाने की इच्छा ही थी, अगर किसी आरे वालों को इसे तोड़ देने से लाभ दिखलाई पड़ता। सन् 1767 के मध्य तक सिखों के जोर पकड़ जाने से अब्दाली का भय न रहा। उस समय जवाहरसिंह चुपचाप बैठा न रहा। उसने वर्षा ऋतु में ही युद्ध के लिए कदम बढ़ाया। अटेर और भिंड जहां के राजा मराठों के अधीन थे, महाराज जवाहरसिंह पहले इन्हीं की ओर बढ़ा। वह उस ओर बहुत बढ़ गया, जितना कि उसने स्वयं न सोचा था। उसने अपनी शक्तिशाली सेना के साथ कालपी तक मराठे और छोटे-छोटे अन्य जागीरदारों को अपने अधिकार में कर लिया। इस तरह जाट-राज्य की सीमा उसने बहुत कुछ बढ़ा दी।


भारतवर्ष में एक शक्ति इस समय और पैर जमा रही थी और वह थी अंग्रेज। परन्तु अंग्रेज भी किसी ऐसे मित्र की खोज में थे जो उनकी मदद कर सके। चतुर अंग्रेजों ने महाराज जवाहरसिंह के पास 19 अगस्त सन् 1765 ई. को एक पत्र भेजा, जिसमें लिखा था कि महाराज अगर समरू नामक फ्रेंच को अपने यहां से हटा दें तो अंग्रेज बाहरी आक्रमण के विरुद्ध भरतपुर की सहायता करेंगे। परन्तु महाराज ने इस पत्र पर किंचित भी ध्यान न दिया। यहां तक कि महाराज इसके लिए एकदम भूल गए। लेकिन अंग्रेज महाराज जवाहरसिंह से संधि करने के लिए व्यग्र हो रहे थे। वे बार-बार इसकी चेष्टा कर रहे थे। जवाहरसिंह ने देखा कि संधि के लिए मराठे जब स्वयं प्रार्थना कर रहे हैं तो उनसे तो संधि के


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लिए दरख्वास्त की गई है, वह शीघ्र ही अब्दाली के विरुद्ध अंग्रेजों में जा मिला। संधि शर्तों को ईमानदारी से पालने के कारण वह अधिक अंग्रेजों की तरफ आकर्षित हुआ। जवाहरसिंह ने भी अपनी मित्रता को पूरी तरह निभाया। अंग्रेजों से मित्रता होने पर उसने अब्दाली से किसी तरह का सम्बन्ध न रखा और उसके प्रार्थना करने पर भी अपने निश्चय और पद पर अटल रहा। इसी तरह मराठों से अंग्रेजों के कारण मित्रता तोड़ दी। महाराज जवाहरसिंह ने इस समय भी जब भी मौका मिला, मराठों के राज्य पर हाथ मारा और उनकी उदासीनता के कारण मराठों के बहुत से अधिकृत प्रदेश पर अपना कब्जा कर लिया।


देहली के आस-पास और मेरठ के जाटों ने जब सुना कि जाट नरेश जवाहरसिंह देहली पर चढ़ाई करने को आया है, तो वे लाठी, बल्लम जो भी हाथ लगा, लेकर सेना में आ मिले। इसी तरह ब्रज के जाट भी उनके साथ सम्मिलित हुए थे। जब उन्होंने मालवे पर चढ़ाई की तो वहां के जाटों का हाल और प्रेम भी वह देख चुके थे। अब उनकी इच्छा राजपूताने के पश्चिम ओर के जाटों को देखने की हुई। उनका राज्य तीन ओर तो बढ़ चुका था, अब यह चौथी दिशा बाकी थी जिस पर कि उन्होंने अब तक ध्यान न दिया था।

मांवडा-मंढोली युद्ध: अलवर के राज्य के संस्थापक राजा प्रतापसिंह ने जवाहरसिंह को उधर की तरफ बढ़ने का अधिक प्रोत्साहन दिया। उसने समर्थन ही नहीं, बल्कि इनसे प्रार्थना की, क्योंकि वह जयपुर-नरेश से झगड़ा करके महाराज सूरजमल के संरक्षण में आया था। इसलिए वह चाहता था कि जिस राज्य ने इसके साथ अन्याय किया है, उसका बदला ले। वास्तव में भरतपुर और जयपुर के विरोध का कारण भी अधिकतर यही था। लेकिन बाद में इसी के विश्वासघात से महाराज जवाहरसिंह को भंयकर हानि उठानी पड़ी थी। इस हानि का फल भी जवाहरसिंह के लिए बहुत बुरा हुआ। महाराज ने जिसकी भलाई की, उसी ने धोखा दिया। ठीक ही है -

“पयः पानं भुजंगानां केवलं विषवर्द्धनम्।”

भारतेन्दु जवाहरसिंह ने पुष्कर स्नान के उद्देश्य से सेनासहित यात्रा शुरू की। प्रतापसिंह भी महाराज के साथ था। जाट-सैनिकों के हाथ में बसन्ती झण्डे फहरा रहे थे। जयपुर नरेश के इन जाटवीरों की यात्रा का समाचार सुन कान खड़े हो गए। वह घबड़ा-सा गया। हालांकि जवाहरसिंह इस समय किसी ऐसे इरादे में नहीं गए थे, पर यात्रा की शाही ढंग से। जयपुर नरेश या किसी अन्य ने उनके साथ कोई छेड़-छाड़ नही की और वह गाजे-बाजे के साथ निश्चित स्थान पर पहुंच गए।


स्नान-ध्यान करने के पश्चात् भी महाराज कुछ दिन वहां रहे। राजा विजयसिंह से उनकी मित्रता हुई। इधर महाराज के जाते ही राजपूत सामंतो में तूफान-सा मच गया। उधर के शासित जाट और इस शासक जाट राजा को वे एक दृष्टि से देखने


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लगे। इस क्षुद्र विचार के उत्पन्न होते ही सामंतों का संतुलन बिगड़ गया और वे झुण्ड जयपुर नरेश के पास पहुंचकर उन्हें उकसाने लगे। परन्तु जाट सैनिकों से जिन्हें कि उन्होंने जाते देख लिया था, उनकी वीरता और अधिक तादात को देखकर, आमने-सामने का युद्ध करने की इनकी हिम्मत न पड़ती थी।

जवाहरसिंह को अपनी बहादुर कौम के साथ लगाव था, उसकी यात्रा का एकमात्र उद्देश्य पुष्कर-स्नान ही नहीं था, वरन् वहां की जाट-जनता की हालत को देखना भी था। उनको मालूम हुआ कि तौरावाटी (जयपुर का एक प्रान्त) में अधिक संख्या जाट निवास करते हैं तो उधर वापस लौटने का निश्चय किया। राजपूतों ने लौटते समय उन पर आक्रमण करने की पूरी तैयारी कर ली थी। यहां तक कि जो निराश्रित प्रतापसिंह भागकर भरतपुर राज की शरण में गया था और उन्होंने आश्रय ही नहीं, कई वर्ष तक अपने यहां सकुशल और सुरक्षित रखा था, षड्यन्त्र में शामिल हो गया। उसने महाराज की ताकत का सारा भेद दे दिया। राजपूत तंग रास्ते, नाले वगैरह में महाराज जवाहरसिंह के पहुंचने की प्रतीक्षा करते रहे। वे ऐसा अवसर देख रहे थे कि जाट वीर एक-दूसरे से अलग होकर दो-तीन भागों में दिखलाई पड़ें तभी उन पर आक्रमण कर दिया जाए।


तारीख 14 दिसम्बर 1767 को महाराज जवाहरसिंह एक तंग रास्ते और नाले में से निकले। स्वभावतः ही ऐसे स्थान पर एक साथ बहुत कम सैनिक चल सकते हैं। ऐसी हालत में वैसे ही जाट एक लम्बी कतार में जा रहे थे। सामान वगैरह दो-तीन मील आगे निकल चुका था। आमने-सामने के डर से युद्ध न करने वाले राजपूतों ने इसी समय धावा बोल दिया। विश्वास-घातक प्रतापसिंह पहले ही महाराज जवाहरसिंह का साथ छोड़कर चल दिया था। घमासान युद्ध हुआ। जाट वीरों ने प्राणों का मोह छोड़ दिया और युद्ध-भूमि में शत्रुओं पर टूट पड़े। जयपुर नरेश ने भी अपमान से क्रोध में भरकर राजपूत सरदारों को एकत्रित किया। जयपुर के जागीरदार राजपूतों के 10 वर्ष के बालक को छोड़कर सभी इस युद्ध में शामिल हुए थे। सब सरदार छिन्न-भिन्न रास्ते जाते हुए जाट-सैनिकों पर पिल पड़े। जाट सैनिकों ने भी घिर कर युद्ध के इस आह्नान को स्वीकार किया और घमासान युद्ध छेड़ दिया। आक्रमणकारियों की पैदल सेना और तोपखाना बहुत कम रफ्तार से चलते थे। जाट-सैनिकों ने इसका फायदा उठाया और घाटी में घुसे। करीब मध्यान्ह के दोनों सेनाएं अच्छी तरह भिड़ीं। इस समय महाराज जवाहरसिंह जी की ओर से मैडिक और समरू की सेनाओं ने बड़ी वीरता और चतुराई से युद्ध किया। जाट-सैनिकों ने जयपुर के राजा को परास्त किया। परन्तु जाटों की ओर से सेना संगठित और संचालित होकर युद्ध-क्षेत्र में उपस्थित न होने के कारण इस लड़ाई मे महाराज जवाहरसिंह को सफलता नहीं मिली। लेकिन वह स्वयं सदा की भांति असाधारण वीरता और जोश के साथ अंधेरा होने तक युद्ध करते रहे।


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जयपुर सेना का प्रधान सेनापति दलेलसिंह, अपनी तीन पीढ़ियों के साथ मारा गया। यद्यपि इस युद्ध में महाराज को विजय न मिली और हानि भी बहुत उठानी पड़ी, परन्तु साथ ही शत्रु का भी कम नुकसान नहीं हुआ। कहते हैं युद्ध में आए हुए करीब करीब समस्त जागीरदार काम आये और उनके पीछे जो 8-10 साल के बालक बच रहे थे, वे वंश चलाने के लिए शेष रहे थे। इसमें सन्देह नहीं कि महाराज जवाहरसिंह को वहां के जाटों की परिस्थिति और मनोवृत्ति का भी पता चल गया कि बहुत दिन तक शासित रहने के कारण उनका स्वाभिमान मर चुका है। नहीं तो क्या कारण था कि जब वह देहली की और चढ़ाई करने गया था तो यू.पी. और मेरठ के जाट प्रत्येक घर से लाठी कंधे पर रखकर उससे आ मिले और महाराज पर इधर आक्रमण होने पर भी उनके कानों पर जूं भी न रेंगी।


महाराज जवाहरसिंह की यात्रा शुभ फलदायक न हुई। अब उनका मध्याह्न सूर्य ढला। परिवर्तनशील संसार का यही नियम है कि यहां हमेशा एक-सी धाक (समय) नहीं रहती। इस महत्वाकांक्षी जाट सरदार को भी परिवर्तन का सामना करना पड़ा। उसके शत्रुओं ने जब सुना कि जवाहरसिह को जयपुर वाले युद्ध से हानि हुई है तो उन्होंने देख लिया कि अब मौका है। यह समाचार सुनते ही चम्बल पार का प्रदेश विद्रोही बन गया और जिस शीघ्रता से वह जाट-राज्य में मिला था, उसी तरह निकल भी गया। इधर माधौसिंह का भी साहस बढ़ गया था और भारी हानि उठाने के कारण बदला लेने के लिए 60 हजार सेना के साथ जाट-राज्य में घुस गया। फर्रुखनगर का नवाब मुसाबीखां बलोच (जो कि एक वर्ष पूर्व ही भरतपुर से उदारतापूर्वक कैद से रिहा हुआ था) और रुहेले राजपूतों की सहायता करने को तत्पर हो गए। ठीक ही कहा है, ‘दुर्दिन पड़े रहीम कहि, भूलत सब पहिचान’ की भांति सिख भी महाराज की मित्रता छोड़ने पर उतारू हुए और उसके दोनों बाहरी प्रान्तों को छोड़ना शुरू किया। माधौसिंह ने आगे बढ़ने और आगरे के दुर्ग को मुसाबीखां की सेना से मिलकर जीतने के लिए शाही हुक्मनामा भेजा।


इस समय प्रत्येक व्यक्ति महाराज जवाहरसिंह को राजपूतों से सुलह करने की सलाह दे रहा था, परन्तुं स्वाभिमानी जाट-सरदार ने गौरवपूर्ण समझौता युद्ध की बीच लड़कर तय कर लेना पसन्द किया। वह युद्ध के लिए तत्परता से तैयारी करने लगा। उसने सिखों को लूट के लोभ के बदले 7 लाख रुपये दिए। एम. मैडिक का भत्ता सेना बढ़ाने के लिए 5000 रुपये महावार बढ़ा दिया। जब राजपूतों को भय हुआ। वे सोच रहे थे जवाहरसिंह स्वयं सन्धि का प्रस्ताव करेगा, परन्तु अब उन्होंने देखा कि सिखों को उसने अपनी ओर कर लिया है, तो वे घबरा गए। उनके सभी इरादों पर पानी तो फिरा, लेने के देने पड़ गए। जाट-राज्य से सकुशल निकल जाना उन्हें असम्भव मालूम हुआ। आगत भय की आशंका से महाराज जवाहरसिंह से उन्होंने सन्धि कर लेना ही अपनी रक्षा का एक


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मात्र उपाय सोचा। जाट-नरेश से सन्धि-प्रार्थना कर सन्धि कर ली गई और वह शीघ्रता से अपने स्थान पर लौट गए। इस तरह से राजपूत पंजाब के भयानक घुड़सवारों के आने से पहले ही अपने देश में पहुंच गए।

जब से जवाहरसिंह राजपूताने से लौटा था, तब से वह शान्त न बैठा था। उसके शत्रुओं ने भूल की थी कि वह साहसहीन हो गया है, यद्यपि उस समय उसके शत्रुओं के एकदम खड़े हो जाने से उसे हानि तो बहुत उठानी पड़ी थी, पर वह अस्थिर न हुआ था। उसका स्वभाव ही अल्लहड़पन की वीरता से ओत-प्रोत था। वह यह तो जानता ही न था कि भय किसे कहते हैं। लड़ाई करने की इच्छा उसकी रग-रग में भरी थी। बिना लड़ाई उसके लिए जीवन नीरस था। माधौसिंह के चले जाने पर जब उसने देखा कि यह आया हुआ युद्ध रूपी खेल खेलने का अवसर निकल गया तो मैडिक के साथ एक किले को जहां राजपूतों का एक दूसरा वंश राज्य करता था, अधिकार में करने की तैयारी कर कूच कर दी। डेढ़ महीने पश्चात् वह किले पर चढ़ने में समर्थ हुआ। उसकी सेना जब किले के गोले-बारूद से भयभीत हो गई तो भी यह निडर भाव से डटा रहा। दूसरी बार वह किले की दराज के नीचे से गया और दुर्ग-रक्षक डरकर अधीन हो गये।


महाराज जवाहरसिंह इस तरह दृढ़चित्त और अदम्य उत्साह से फिर सम्भल बैठा था, जिसे जानकर शत्रुओं को भय होने लगा था। अत्यन्त शीघ्रता से महाराज ने बिगड़ी हई परिस्थिति को फिर वैसा ही बना लिया। उसके हथियार पहले की भांति चमकने लगे और राज्य धन-धान्य से समृद्ध होने लगा जिससे प्रजा का प्रेम भी प्राप्त हो गया। उसने अपनी सेना का यूरोपियन ढंग से संगठन किया, तोपखाने बढ़ाये जिससे बाहर वाले उसकी प्रतिष्ठा करने लगे। उसके शत्रुओं को बड़ा भय हुआ कि कहीं उसके क्रोध का ज्वालामुखी फिर से न उबल पड़े। परन्तु दुर्भाग्य से होना कुछ और ही था जिससे उसके शत्रुओं के घर में घी के चिराग जल गये।

जून सन् 1768 में जवाहरसिंह किसी घातक धोखे से मार डाले गये। ‘ब्रजेन्द्र-वंश भास्कर’ में उस घातक का नाम सुजात मेव लिखा है। ‘इमाद’ का लेखक लिखता है कि महाराज जबरसिंह ने केवल अजां देने पर एक मनुष्य की जिह्वा निकलवा ली थी। आगरे की मस्जिद को बाजार कर दिया था और उसमें अनाज की दुकानें खुलवा दी थीं। कोई भी कसाई मांस नहीं बेच सकता था। इससे सम्भावना होती है कि किसी तास्सुबी मुसलमान ने उन पर हमला करके मार डाला होगा।


महाराज जवाहरसिंह की मृत्यु के लिए इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि जाटों का सितारा, हिन्दु-धर्म का रक्षक, जिसकी अभी भारी आवश्कता थी, असमय में ही विलुप्त हो गया। उनके निधन से जाट-साम्राज्य की गाड़ी तो रुक गई


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पर साथ ही हिन्दु-हितों को भी भारी ठेस लगी।1

वह यह देख चुके थे कि हर मौके पर, भारत में रहने वाले ईरानी, तूरानी मुसलमान तथा बिलोच बाहरी आक्रान्ताओं का साथ देते थे, देश को फिर से अफगानों का गुलाम बनाने की योजना में लगे थे, यहां के कुछ सूफी सन्त फतवा जारी करके अब्दाली का समर्थन कर रहे थे। अतः उनको इस वर्ग से घृणा हो गई थी।

महाराज रतनसिंह

महाराजा रतनसिंह

जवाहरसिंह की मृत्यु के पश्चात् मई 1968 में महाराज रतनसिंह गद्दी पर बैठा। यह जवाहरसिंह का छोटा भाई था। परन्तु उसमें शासन-योग्यता की कमी थी। उसके शासन-काल में विशेष उल्लेखनीय घटना नहीं हुई। दुस्सादत के लेखक अनुसार उसने दस महीने तेरह दिन राज्य किया। कहते हैं कि वह एक जादूगर गुसाईं के बहकावे में आ गया। उसने उन्हें सोना बनाकर दिखाने का चमत्कार बतलाया। जब महाराज ने उसे बना हुआ सोना दिखलाने के लिए कहा तो उसने एकान्त में अकेले राजा को दिखाने का वायदा किया और जब राजा को अकेला पाया तो तो उन्हें तलवार से मार डाला और स्वयं भी मर गया।

महाराज केहरीसिंह

महाराजा केहरीसिंह

यह रतनसिंहजी के सुपुत्र थे। जिस समय उनके पिता का स्वर्गवास हुआ, उस समय वे केवल दो वर्ष के थे। दानशाह नामक एक सरदार को महाराज के शासन-कार्य में सहकारी नियुक्त किया गया। किन्तु उससे महारानी किशोरी असन्तुष्ट थीं, इसलिए उसे निकालकर कुंवर नवलसिंह जी को महाराज का सहकारी नियुक्त किया गया। यह महाराज जवाहरसिंह के भाई थे। महारानी किशोरी और उनका मनमुटाव आरम्भ से ही था। फिर भी महारानी किशोरी चाहती थीं कि राज-काज भली प्रकार चले। इसलिए एक दिन उन्होंने इन्हें कुम्हेर में इसलिए बुलाया कि वैमनस्य की पहली बातें भूला दी जाएं। किन्तु नवलसिंह जी को कुम्हेर जाने पर कुछ सन्देह मालूम हुआ। उन्हें बताया गया कि आपको यहां धोखे से बुलाया गया है। वह चुपचाप वहां से चल दिए और पांच हजार सैनिक लेकर कुम्हेर पर चढा़ई कर दी। राव रणजीतसिंह भी इस चिन्ता में थे कि भरतपुर पर उनका अधिकार जमे। इस समय को लड़ाई के लिए उपयुक्त समझा और नवलसिंह के मुकाबले पर आ डटे। उन्होंने सिख और मराठों की बीस हजार सेना किराए पर


1.कहना यह चाहिए कि भारत के राष्ट्रीय एवं सांस्कृतिक उत्कर्ष का विकास काफी समय के लिए अवरुद्ध हो गया- संपादक


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मंगा ली। इस बार विजय कुंवर नवलसिंह की ही हुई। यह घरेलू युद्ध बराबर चार महीने चला था।

रणजीतसिंहजी को अपनी हार से दुःख हुआ था इसलिए वे चुप न बैठे। फिर उन्होंने मराठों का बुलाया। इस बार मराठा एक लाख सेना लेकर चढ़ आये। नवलसिंह ने बीस-पच्चीस हजार नागे कर मराठों का मुकाबला किया। अऊ नामक स्थान पर युद्ध हुआ। लगातार पांच दिन तक युद्ध होता रहा। विजय का कोई उपाय न देखकर नवलसिंह ने मराठों को सत्तर लाख रुपये देकर अपने देश को वापस चले जाने पर तैयार कर लिया। इस सन्धि के अनुसार यमुना के पूर्ववर्ती देश भी मराठों को देने पड़े। लौटते हुए मराठों से राव रणजीतसिंह ने रूपवास में भेंट करके - “आप तो हमें राज दिलाने आये थे, अब कहां जा रहे हैं?” मराठों ने कहा - “हम आपको राज्य तो दिलाना चाहते हैं।” इस पर उनका मान बिगाड़ने के लिए रणजीतसिंह ने कहा - “भरतपुर तो हमारा है ही, आप क्या दिलाएंगे?” वास्तव में उनके हृदय को एकदम इतनी हानि होते देखकर दुःख हुआ था। वे अपने भाई नवलसिंह के पास गोवर्धन पहुंचे, क्योंकि इस समय नवलसिंह गोवर्धन में ही थे।

भरतपुर के राज-परिवार को इस तरह घरेलू झगड़ों और शाही युद्धों में फंसा हुआ देखकर माचेड़ी के राव प्रतापसिंह ने जो कि किसी समय भरतपुर में शरणागत रहा था, भरतपुर के अधीनस्थ अलवर, बहादुरपुर, देहरा, मिदौली, वानसूर, बहरोर, बरौद, रामपुर, हरसौरा, हाजीपुर, नारायनपुर, थानागाजी और गढ़ी मासूर पर अधिकार कर लिया। अलवर को प्रतापसिंह ने युद्ध द्वारा और बहादुरी के साथ प्राप्त नहीं किया, किन्तु अलवर के किलेदारों को लालच देकर अपनी ओर मिलाया था। उन लोगों की कई महीने की तनख्वाहें चढ़ी हुई थीं।1 राजधानी भरतपुर में आन्तरिक कलह छिड़ा हुआ था। प्रताप सिंह एक स्वतंत्र राजा बन गया और अलवर का किला भरतपुर के हाथ से कतई निकल गया। यह घटना सन् 1775 से 1782 के बीच की है।

इससे भी पहले नजफखां ने आगरे पर 1773 ई. में आक्रमण किया। दुर्ग के जाट सिपाहियों ने डटकर युद्ध किया, किन्तु नजफखां सवाया पड़ा। नजफखां जब रुहेलखण्ड की ओर गया तो कुंवर नवलसिंह ने बदला चुकाने के लिए उसकी राजधानी देहली पर चढ़ाई की। दस हजार सवारों से ही सिकन्दराबाद को विजय कर लिया। किन्तु अपने सरदारों के षड़यंत्र के कारण वापस लौट आए। आगरा जाटों के ही अधिकार में रहा। दूसरी बार नवलसिंह ने समरू की सेना लेकर देहली पर फिर चढ़ाई की। किन्तु उस समय नजफखां रुहेलखण्ड से लौट आया था।


1. राजपूताना गजेटियर


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थोड़े ही दिनों बाद नजफखां ने धोखे से बरसाने और डीग पर चढ़ाई कर दी। लगातार चौदह महीने तक नवलसिंह ने उससे युद्ध किया। विवश होकर उन्हें डीग छोड़नी पड़ी। इन्हीं दिनों सम्वत् 1833 वि. में नवलसिंह की मृत्यु हो गई। नवलसिंहजी साहित्यिक पुरुष थे। उनके पास शोभाराम नाम का कवि रहता था। उसने ‘नवल रसनिधि’ नामक काव्य पुस्तक लिखी है।

नवलसिंह की मृत्यु के पश्चात् राव रणजीतसिंह महाराज केहरीसिंह के मंत्री नियुक्त हुए। दानशाह ने इनको थोड़े दिन भी आनंद से मंत्रित्व न करने दिया। वह रुहेलों को चढ़ा लाया। अचानक रात्रि में रुहेलों ने रणजीतसिंह की सेना पर छापा मारकर बहुत नुकसान पहुंचाया। दानशाह ने कुम्हेर के किलेदार को भी बहकाना चाहा। किन्तु वह दानशाह की बातों में नहीं आया। राव रणजीतसिंह को इसी वर्ष डीग पर अधिकार करके नजफखां से भी लड़ना पड़ा।

संवत् 1834 वि. में जबकि महाराज केहरीसिंह केवल बारह वर्ष के थे उनके शीतला (चेचक) निकल आई और इसी संक्रामक रोग में उनका स्वर्गवास हो गया। नवलसिंह ने केहरीसिंह के राज्य की रक्षा के लिए घर और बाहर के सभी लोगों से युद्ध किए थे। किन्तु केहरीसिंह राज का सुखोपभोग करने का समय आने से पहले ही इस संसार से चल बसे। इस समय यह प्रश्न खड़ा हुआ कि जाट-राज्य का अधीश्वर किसे बनाया जाए?

महाराजा रणजीतसिंह

महाराजा रणजीतसिंह

महाराज केहरीसिंह के बाद भरतपुर और जाट-जाति का अधीश्वर महाराज रणजीतसिंह को बनाया गया। अब वे राव से महाराज हो गए। डीग इस समय तक भी नजफखां के अधिकार में था।31 किन्तु उसके पीछे लोगों ने विद्रोह खड़ा कर दिया। विद्रोह को शान्त करने के लिए जब नजफखां डीग की ओर आया तो महाराज रणजीतसिंह और महारानी किशोरी देवी ने मार्ग में उससे मुलाकात की और उसकी आवभगत भी की। नजफखां जानता था कि जाट डीग को उसके कब्जे में रहने नहीं देंगे, इसलिए उसने अपना अहसान करने की गर्ज से नौ लाख की आमदनी के अन्य परगने महाराज रणजीतसिंह को दे दिए और आप इस तरफ के झगड़ों से निश्चिन्त हो गया।

सन् 1782 ई. में नजफखां मर गया। महादाजी ने जो कि अपना राज्य बढ़ाने की चेष्टा में लगा हुआ था, मिर्जा नजफखां के दिए हुए इलाके को


1. डीग के सम्बन्ध में 'इन्तखाब्बुत्त्वारीख' में लिखा है कि डीग और देहली इस समय बराबर की शोभा और व्यापार के केंद्र बने हुए थे और डीग भारतवर्ष भर के दुर्गों से रक्षित स्थानों में प्रथम श्रेणी का था.


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अपने कब्जे में करने के लिए लड़ाई छेड़ दी। महाराज रणजीतसिंह अभी अपनी शक्ति का संगठन भी भली प्रकार नहीं कर पाये थे, इसलिए वे सेंधिया पर विजय प्राप्त न कर सके। उनके हाथ से परगने निकल गए। सन् 1783 ई. में मुगलों के कर्मचारियों की अनबन से लाभ उठाकर महाराज रणजीतसिंह ने डीग पर अपना अधिकार जमा लिया। उन्हीं दिनों मिर्जा शफी की रणजीतसिंह के राज्य में अऊ नामक स्थान पर मृत्यु हो गई। महादाजी सेंधिया जब ग्वालियर से आगरा आया तो उसने सन्देह किया कि शफीखां को महाराज रणजीतसिंह ने मरवा डाला है। किन्तु जब वह देहली की ओर जाने लगा तो राजमाता किशोरी और महाराज रणजीतसिंह ने उससे मार्ग में भेंट करके सब बातें समझाई। वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने महाराज रणजीसिंह से मित्रता कर ली और दस लाख वार्षिक आमदनी के ग्यारह परगने उसने महाराज को दे दिए।

सन् 1786 ई. में महादाजी सेंधिया का जयपुर और जोधपुर के सम्मिलित राजाओं से ‘तोंगा’ नामक स्थान पर युद्ध हुआ। सेंधिया की इस बार हार हुई। महाराज रणजीतसिंह ने मित्र के नाते सेंधिया की सेवा-सुश्रूषा की और उसे ग्वालियर पहुंचा दिया। सेंधिया के ग्वालियर चले जाने पर रुहेलों ने भरतपुर पर धावा किया। महाराज रणजीतसिंह ने मराठों की फौज के द्वारा उनको मार भगाया।

उन दिनों मराठों की ओर से अलीगढ़ में पैरन नाम का फ्रांसीसी अफसर और हाकिम था। महाराज रणजीतसिंह ने कई बार उसे सहायता दी। इस सहायता के बदले में कामी, खोरी, पहाड़ी के तीन परगने उससे प्राप्त किये। महाराज सूरजमल और जवाहरसिंह के समय जिन सारे प्रान्तों पर अधिकार था आज वे मराठा, रुहेले और पठानों के हाथ में चले गए थे। थोड़े से परगने वापस करके वे बड़ा अहसान करते थे। अलवर का नरुका कछवाहा जैसा आदमी भी इस समय से लाभ उठा चुका था। सबसे अधिक कृतघ्न मराठे थे जिनकी सहायता महाराज सूरजमल ने भारी विपत्तियों में की थी, उन्होंने उनके पुत्र और पौत्र के राज्य को चारों ओर से दबा लिया था। धौलपुर के महाराज लोकेन्द्रसिंह जी ने तो आखिर इनसे तंग आकर अंग्रेजों से मित्रता कर ली। सन् 1803 ई. में जब लार्ड लेक ने आगरा जीत लिया तो पड़ौसी के नाते से महाराज रणजीतसिंह ने भी अंग्रेजों से मित्रता कर ली। उस समय ऐसी मित्रताएं खेल हो रही थीं । ऐसा अविश्वास फैलाया था मराठों ने।

इस समय अंग्रेजों का सूर्य उत्तरोत्तर चढ़ता जाता था। सारे देशी राजा उनके मित्र और मांडलिक बन चुके थे। केवल जसवंतराय होल्कर ही ऐसा आदमी था जो अंग्रजों के अधीन नहीं हुआ था और उनकी जड़ उखाड़ फेंकना चाहता था। उसकी अंगेजों से कई स्थानों पर मुठभेड़ भी होती रही थी। अंत में 20 हजार


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सैनिक और 130 तोपें लेकर उसने दिल्ली पर चढ़ाई कर दी। किन्तु दिल्ली के रेजीडेण्ट ने बड़ी बहादुरी और योग्यता से होल्कर का सामना किया। होल्कर दिल्ली से लौट कर डीग पहुंचा। महाराज रणजीतसिंह की अंग्रेजों से मित्रता हो चुकी थी। किन्तु शरणागत को आश्रय न देना उनके धर्म के विरुद्ध था। ऐसा भी कहा जाता है कि यह अफवाह उड़ रही थी कि अंग्रेजों का गोवध की और झुकाव है, इसी से महाराज ने सहधर्मी होल्कर की सहायता करना उचित समझा। होल्कर ने डीग में शरण ही नहीं ली, किन्तु वहां बैठकर उसने अंग्रेजों से युद्ध भी किया। विजय-लक्ष्मी होल्कर के पक्ष में न थी। वहां भी उसे हारना पड़ा और भागकर भरतपुर आया। महाराज ने उसे किले में ले लिया। लार्ड लेक को जो कि होल्कर के पीछे पड़ा हुआ था, महाराज रणजीतसिंह का यह कृत्य बहुत अखरा। उसने सन् 1805 ई. की दूसरी जनवरी को भरतपुर पर चढ़ाई करने के लिए डीग कूच कर दिया। भरतपुर के पश्चिम की ओर अंग्रजी-सेना ने डेरे डाल दिए। सेनाध्यक्ष मेटलेंड दुर्ग की ओर गए। चौथी जनवरी सन् 1805 ई. को खाइयां खोदी गई। छठी जनवरी को किले पर गोलाबारी करने के लिए टीले बनाए गए। इस प्रकार तैयारी करके सातवी जनवरी को लार्ड लेक ने किले पर हमला कर दिया। बिना अवकाश लिए भरतपुर किले पर अंग्रेज दो दिन तक गोलाबारी करते रहे। जाट वीर भी चुप न थे। वे बड़े धैर्य के साथ अंग्रजों का मुकाबला करते रहे। वे भी गोलों का जवाब गोलों से दे रहे थे। नवमीं जनवरी को अंग्रेजों को प्रतीत हुआ कि दीवार में सूराख हो गया है। अंग्रेजी फौजों को उस सूराख के रास्ते किले में घुसने की आज्ञा दी। संध्या के सात बज चुके थे। बादल हो रहे थे और कभी-कभी बिजली भी चमक रही थी। अंग्रेजी सेना ने तीन भागों में विभक्त होकर, तीन ओर से, किले पर आक्रमण किया। पहले भाग का सेनापति लेफ्टीनेण्ट रिपन था। उसके साथ 240 गोरे और देशी सिपाही थे। अपनी सेना की तोपों के बायीं ओर से उसने किले पर आक्रमण किया। दूसरे भाग के सेनापति मिस्टर हाक्स ने दो गोरी और दो काली पल्टनें लेकर दक्षिण की ओर से धावा किया। लेफ्टीनेण्ट मेटलेण्ड बीच के भाग से 500 गोरे और एक पल्टन देशी सिपाहियों के साथ टूटे हुए हिस्से की ओर बढ़े। जाट-योद्धाओं को चतुर अंग्रेजों की इस चाल का पता लग गया। उन्होंने अन्धाधुन्ध गोले बरसाने आरम्भ कर दिए। रात्रि के बारह बजे तक गोले बरसते रहे। गोलों की वर्षा रात्रि के अंधकार, जाटों की किलकिल ने मेटलेण्ड की अक्ल को चकरा दिया। वह मार्ग भूल गया और दलदल में जा फंसा। अंग्रेज साहसी होते हैं। आन के लिए प्राणों का लोभ उन्हें भयभीत नहीं करता। एक अंग्रज युवक विल्सन अपने 20 साथियों के साथ टूटी हुई दीवार में से निकलकर ऊपर चढ़ गया। किन्तु जाटों ने उन सब को दीवार के ऊपर से ढकेल


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दिया । अंग्रेजी सेना हानि उठाकर वापस आई। इस आक्रमण में तीन अंग्रेज, दो सौ देशी सैनिक मारे गए।

लार्ड लेक इस हानि से हताश हुआ। उसने दूसरे आक्रमण की आयोजना की। छः दिन तक तैयारी की गई । तारीख 16 जनवरी को भरतपुर किले पर दूसरा आक्रमण किया गया। इस बार भारी-भारी तोपों को काम में लाया गया। जाट लोगों ने इन दिनों में टूटे हुए स्थानों की मरम्मत कर ली थी। दोनों ही दल समझते थे कि अबकी बार में फैसला हो जाएगा। सोलहवीं जनवरी को बड़े जोर से अंग्रेजी सेना ने किले पर धावा किया। गोलों के धमाकों से दीवार का एक हिस्सा टूट गया। किन्तु जाटों ने गोलों की बौछार में लकड़ी और पत्थर डालकर सूराख को पाट दिया और दीवार की मरम्मत भी कर दी। चार दिन तक अंग्रेजी सेना दीवार को तोड़ती रही और जाट वीर उसकी मरम्मत करते रहे। मरने का भय किधर भी नहीं था। जाट गोरों से लड़ने में बड़े प्रसन्न होते थे। अपनी स्त्रियों को उनकी सूरतें दिखाकर ताली पीटकर हंसते थे। लगातार गोलों की मार से दीवार में एक बड़ा छिद्र हो गया। दीवार के सहारे जो खाई थी उसमें जाटों ने पानी भरने के नल खोल दिए। मोती-झील से इन नालियों का सम्बन्ध था। पानी लबालब भर दिया। इधर महाराज रणजीतसिंह ने अमीरखां को बुला लिया। अमीरखां के आने की खबर सुनकर जाट वीरों में और भी साहस भर गया। वे अंग्रेजों के आने की बाट देखने लगे। अंग्रेजों ने भी इस समय एक चाल चली। तीन देशी सैनिक भरतपुर के किले की और दौड़ाए और उनके पीछे गोरे सैनिक लगा दिए। वे देशी सैनिक चिल्लाते थे कि हमें फिरंगियों से बचाओ। जाट गोता खा गए, उन्होंने उन देशी सैनिकों को जो कि चांदी के टुकड़ों के गुलाम बनकर यह प्रपंच रच रहे थे, किले में घुसा लिया। वे थोड़ी ही देर में दीवार और भीतरी बातों को देखकर उल्टे भाग गए और सारा भेद दीवार और सेना का अंग्रेज सेनापतियों को बता दिया।

21वीं जनवरी को बड़ी प्रसन्नता और आशाओं के साथ अंग्रेजों ने किले पर आक्रमण करने की तैयारी की। कप्तान लिण्डसे 470 सैनिक और उन भेदी सिपाहियों को साथ लेकर आगे बढ़े। खाई को पार करने के लिए पुल और सीढ़ियां बनाई गई थीं किन्तु वे ओछी रहीं। और भी अंग्रेजी सेना कप्तान लिण्डसे की सहायता को पहुंच गई। खाई तैर कर पार करने की सोची गई। खाई में धड़ा-धड़ अंग्रेजी सैनिक कूदने लगे, किन्तु जाटों ने एक को भी टूटी दीवार तक न पहुंचने दिया। 1517 कूदने वालों को जाटों ने गोली का निशाना बना दिया, जिनमें 17-18 तो अफसर थे। इस तीसरे आक्रमण में जहां अंग्रेजी के इतने आदमी मारे गए, भरतपुर वालों ने केवल 25 आदमी ही खोये। इधर तो अंग्रेज खाई पर जूझ


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रहे थे, उधर पीछे से अमीरखां पिंडारी ने हमला करके उनके कैम्प में लूट-पाट मचा दी।

अंग्रेजी सेना हिम्मत हार चुकी थी, किन्तु लार्ड लेक के लिए यह बड़ी शर्म की बात होती कि वह हार कर लौट जाता। इसलिए उसने सैनिकों में एक घोषणा पत्र बांटकर उत्साह पैदा करने की चेष्टा की। रसद कम हो चुकी थी। तारीख 23 जनवरी को मि. वेल्स मथुरा की ओर से रसद ला रहे थे। अमीरखां ने अचानक ही आक्रमण करके रसद को लूट लिया। उसके पास चार तोपें थीं। मि. वेल्स उसके धावे का सामना नहीं कर सके। 28 जनवरी को आने वाली अंग्रेजी की रसद पर होल्कर, रणजीतसिंह और अमीरखां तीनों की सेनाओं ने आक्रमण किया, किन्तु सफलता नहीं मिली। क्योंकि इस समय अंग्रेज सावधान हो चुके थे।

छठी फरवरी को अंग्रेजी सेना ने अपने डेरे पश्चिम की बजाय भरतपुर की दक्षिण ओर जमाये। खाई को पार करने के लिए 40 फुट लम्बे और 16 फुट चौड़े बेडे़ बनाए। अमीरखां अपने देश को लौट गया, क्योंकि महाराज रणजीतसिंह उससे नाराज हो गए थे। अंग्रेजों ने एक सुरंग बनायी, किन्तु जाटों को जब पता चल गया तो वे उसमें घुस गए और जिस समय अंग्रेजों के कारीगर उसे आगे खोदने को पहुंचे तो जाटों ने उनको मारकर औजार छीन लिए। इस युद्ध में अंग्रेजों को नुकसान रहा। 20वी फरवरी को अंग्रेजी सेना ने किले पर फिर आक्रमण किया। इस बार सेनाध्यक्ष मि. डेन थे। तोपों की धूंआधार मार से दीवार का कुछ हिस्सा टूट गया। लेफ्टीनेण्ट डेन ने अपनी सेना को उस टूटे हुए स्थान की ओर बढ़ने को कहा। किन्तु अंग्रेजी सेना इतनी भयभीत थी कि आगे बढ़ने से उसने साफ इन्कार कर दिया। दीवार का हिस्सा अवश्य टूट गया था, किन्तु यह किसी को विश्वास नहीं होता था कि वे जाटों के निकट पहुंचकर जीवित भी रह सकेंगे। डेन के बराबर कहने और धमकी देने पर इतनी बड़ी सेना में से केवल 14 आदमी तैयार हुए। वे दीवार तक पहुंच गए और ऊपर भी चढ़ गए, किन्तु जाटों ने उनकी बड़ी दुर्गति की। साथ ही उस बारूद में आग लगा दी जो टूटे हुए स्थान पर बिछा रखी थी। डेन आगे की ओर थोड़ा भी और बढ़ जाता तो चन्द ही मिनटों में उसे चौथे आसमान की सैर करनी होती।

इस आक्रमण में 49 अंग्रेज सिपाही और अंग्रेजी सेना के 113 देशी सिपाही मारे गए और 176 अंग्रेज तथा 556 इंडियन सिपाही घायल हुए।

लार्ड लेक बड़ा हैरान हुआ। उसका अब तक जो अभिमान था वह मिट गया। उसे पता चल गया कि हिन्दुस्तान में ऐसे लोग हैं जो यूरोपियन सैनिकों के होश ठिकाने कर सकते हैं। उसने अपने साथियों को इकट्ठा किया और हारने के दुष्परिणाम पर स्पीच देते हुए बताया कि - हम यदि यहां से हारकर लौटते हैं तो हमारी स्थिति क्या हो जाएगी?


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21वी फरवरी को चौथा आक्रमण फिर किया गया। इस बार अंग्रेज सैनिक प्राणों की बाजी लगाकर आगे को बढ़ने लगे। जाटों की तोपें दीवारों के ऊपर ऊंचे-ऊंचे चबूतरों पर रखी हुई थीं। अंग्रेजी सेना से वीर बिना बुर्जों पर पहुंचे हुए जाटों का कर ही क्या सकते थे। इसलिए दीवारों पर चढ़ने के लिए अंग्रेजी सेना के सिपाही दीवार पर एक-दूसरे के कंधे पर चढ़कर चढ़ने लगे। किन्तु जाटों ने ऊपर से लकड़ी और ईंट-पत्थर फेंककर उनके इस प्रयत्न को निष्फल कर दिया। आगे बढ़ने वाले को गोली का निशाना बना देते थे। तोपों के गोलों से जो छेद अंग्रेजी सेना ने किए थे, उसमें से घुसने का प्रयत्न भी किया गया, किन्तु वहां भी पिटना पड़ा। ऊपर की ओर जो कोई चढ़कर पहुंचता था, वह लुढ़क पड़ता तो उसके साथ ही कई और भी लुढ़क जाते थे। गोलियों, पत्थरों और लक्कड़ों की मार से जाटों ने अंग्रेजी सेना के पैर उखाड़ दिए। किन्तु इस समय लेफ्टीनेण्ट ‘टेम्पल्टन’ नामक एक अंग्रेज किसी तरह से दीवार पर चढ़ गया और बुर्ज पर चढ़कर अंग्रेजी पताका को फहराना ही चाहता था कि जाट वीरों ने उसे मार डाला और पैर पकड़कर खाई में फेंक दिया। इस समय जाट वीरों ने अपने कौशलों को और भी बढ़ा दिया। गोले-गोलियों के सिवा मिट्टी और लकड़ियों के कुण्डों में बारूद भरकर उसमें बत्ती लगा कर फैंकने लगे। यही क्यों, ईंटों की वर्षा भी आरम्भ कर दी। इस निकट मार से अंग्रेज-सेना मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुई। इस बार के आक्रमण में अंग्रेजों के कई प्रसिद्ध-प्रसिद्ध सेना-नायक मारे गए। चारों लड़ाइयों में अंग्रजी सेना के 3203 आदमी मारे गए, ऐसा अंग्रेज लेखकों ने लिखा है। यदि इसी बात को सही माना जाए तो 8-10 हजार घायल भी हुए होंगे। खाई लोथों से पट गई थी, जिन पर होकर आने-जाने वालों ने अपना रास्ता बना लिया।

इस चौथी बार भी हार होने के कारण लार्ड लेक की चिन्ता और भी बढ़ गई। वह बहुत सोचता था किसी भांति विजय प्राप्त हो, किन्तु विजय स्वप्न मालूम होती थी। जाटों ने इसी समय उनके तोपखाने में आग लगा दी, इससे अंग्रेजों का और भी नुकसान हुआ। लार्ड लेक को आज की जैसी कठिनाई का पहले मौका न पड़ा था। अब उसने फौज हटा कर छः मील की दूरी पर उत्तर-पूर्व में अपने डेरे डाले।

महाराज रणजीतसिंह की यद्यपि विजय हुई थी, फिर भी उन्होंने यही उचित समझा कि टंटे को मिटा दिया जाए। क्योंकि वह पिछले 6-7 वर्ष से लगातार युद्धों में फंसे हुए थे। राह-कोष में भी घाटा था। इसलिए संधि की चर्चा चलाई गई। मि. लेक को तो मानो मन चाही वस्तु मिल गई। वे संधि करने पर तैयार हो गए। लार्ड लेक ने भरतपुर वालों का बड़ा सम्मान किया। अंत में दोनों ओर से निम्न शर्तों पर सन्धि हो गई -

  • 1. डीग का किला अभी कुछ दिन अंग्रेजों के ही पास रहेगा। यदि भरतपुर

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महाराज अंग्रेजों से शत्रुता न करेंगें तो डीग का किला उन्हें लौटा दिया जाएगा।

  • 2. भरतपुर नरेश बिना अंग्रेजों की राय के किसी भी यूरोपियन कर्मचारी को अपनी सेना में भर्ती न करेंगे।
  • 3. वह इस युद्ध के व्यय स्वरूप बीस लाख रुपये अंग्रजों को देंगे।
  • 4. भरतपुर नरेश और अंग्रेज परस्पर एक-दूसरे के मित्र और शत्रु को अपना मित्र और शत्रु समझेंगे।
  • 5. उनका एक पुत्र इस सन्धि की पूर्ति में सदैव ब्रिटिश फौजी अफसरों के साथ दिल्ली अथवा आगरे में रहेगा।
  • 6. महाराजा रणजीतसिंह यह बीस लाख रुपया किस्तों में दे सकेंगे।
  • 7. ईस्ट-इंडिया कम्पनी वचन देती है कि जब अन्तिम किस्त के पांच लाख देने को शेष रह जाएंगे तो गवर्नमेण्ट महाराजा साहब की मित्रता का प्रमाण पाएगी तो वह किस्त छोड़ देगी।

इस सन्धि-पत्र पर महाराज रणजीतसिंह और लार्ड लेक के हस्ताक्षर हो गए।

भरतपुर में लार्ड लेक की इस हार को विलायत तक बड़े-बड़े रंग देकर पहुंचाया था। स्वयं लार्ड लेक की इस हार का विवरण इस प्रकार दिया था -

“भरतपुर की भूमि उबड़-खाबड़ है। साथ में कोई अच्छा इंजीनियर नहीं था, इससे पूर्व कभी उसकी परिस्थिति का पता लगा नहीं। बस यही कारण था कि विजय प्राप्त नहीं हुई।”

ड्यूक आफ विलिंगटन ने जो तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड बेलेजली के भाई थे, लार्ड लेक की हार का कारण इस तरह बताया था - ...उन्हें नगर-वेष्टन (परकोटे) का कुछ ज्ञान न था इसलिए असफलता हुई ।

इसमें कोई सन्देह नहीं इस युद्ध का प्रभाव अंग्रेजों के शत्रुओं पर बहुत बुरा पड़ा। भरतपुर के गौरव-गान की चर्चा तो गीत-काव्यों में गाई जाने लगी।

महाराज रणजीतसिंह आजीवन अंग्रेजों के मित्र बने रहे। उन्होंने सन्धि का पूर्णतः पालन किया। भरतपुर-युद्ध को साल भर भी न हो पाया था कि दिसंबर 1805 ई. में उनका स्वर्गवास हो गया। उनके चार पुत्र थे, बड़े राजकुंवर रणधीरसिंह थे। वही गद्दी पर बिठाए गए।

महाराज रणधीरसिंह

महाराजा रणधीरसिंह

अपने पिता रणजीतसिंह की मृत्यु के बाद सन् 1805 ई. में आप राज सिंहासन पर बैठे। सबसे पहले रणधीरसिंह ने राज्य के भीतरी प्रबन्ध को सुधारने की चेष्टा की। वेतन देर से मिलने के कारण उपद्रव करने वाली सेना को तोड़कर रणधीरसिंह ने शांति स्थापित करने में अपनी बुद्धिमानी का अच्छा परिचय दिया था। इन्होंने महाराजा रणजीतसिंह की छतरी और महल बनवाए।


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पिण्डारियों के दमन में अंग्रजों की सहायता की। बड़ी रीति के साथ 18 वर्ष तक आपने राज किया। सन् 1832 ई. में आपका स्वर्गवास हो गया।

महाराज बलदेवसिंह

महाराज रणधीरसिंह निःसंतान मरे थे। इसलिए नियम के अनुसार उनके भाई बलदेवसिंह राजा बनाए गए। किन्तु रानी ‘लक्ष्मी’ जो कि महाराज रणधीरसिंह की महारानी थी, इनसे नाराज थीं, वे किले की कुंजियों को लेकर वृन्दावन चली गई। वहीं उनका स्वर्गवास हो गया। इस तरह देवर-भाभी का यह झगड़ा तो शांत हो गया, किन्तु उनके छोटे भाई राव लक्ष्मणसिंह के पुत्र दुर्जनसाल और माधौसिंह उपद्रव पर उतारू हो गए। उन्होंने एक दिन तो महाराज बलदेवसिंह पर जवाहर बुर्ज में आक्रमण कर दिया। उनके स्थान को तोड़ डाला। किन्तु माधौसिंह को पकड़ लिया गया और झगड़ा बढ़ने नहीं पाया। इस घटना के बाद महाराज को सन्देह हो गया कि मेरे पश्चात् यह मेरे पुत्र बलवंतसिंह को अवश्य हानि पहुंचाएंगे। इसलिए उन्होंने सर डेविड अक्टरलोनी को बुलाकर बालक बलवंतसिंह को स्वत्वाधिकारी स्वीकार करा दिया। इसके कुछ दिन ही बाद 26 फरवरी 1825 ई. को बलदेवे सिंह जी का स्वर्गवास हो गया। उनके स्वर्गवास के पश्चात् वही हुआ, जिसकी कि उन्हें आशंका थी। दुर्जनसाल और उसके पुत्र जगतसिंह ने सेना को अपनी ओर मिला लिया। माधौसिंह जो कि अब तक कैद में था, उसे कैद से छुड़ा लिया और बालक महाराज बलवन्तसिंह और मांजी अमृतकुवरि को कैद कर लिया। राज्य पर दुर्जनसाल और माधौसिंह ने कब्जा तो कर लिया, किन्तु अनेक सरदार उनके विद्वेषी और बालक बलवन्तसिंह के पक्षपाती थे। अक्टरलोनी के स्थान पर मुकर्रिर हुए।

थोड़े दिन ही बाद माधौंसिंह और दुर्जनसाल में भी अनबन हो गई। माधौसिंह डीग में जाकर सेना-संगठन करने लगा। परिस्थिति अनुकूल देखकर सर चार्ल्स मेटकाफ ने भरतपुर पर चढाई करने की घोषणा जारी की। 10 दिसम्बर सन् 1825 को अंग्रेजी सेनाएं लार्ड केम्बलमियर की अध्यक्षता में भरतपुर पहुंच गई। 23 दिसम्बर से लड़ाई आरम्भ हो गई। 5 जनवरी सन 1826 तक भरतपुर पर गोले बरसाए जाते रहे। कई बार किले पर धावा किया गया। कई बार किले में घुसने की चेष्टा की गई। 18 जनवरी तक यही होता रहा। इस युद्ध में अंग्रेजी-सेना के 61 अंग्रेज, 41 देशी सिपाही मारे गए और 282 अंग्रेज, 183 हिन्दुस्तानी घायल हुए।

इस गृह-कलह के कारण 60 लोहे की तोपें और 73 पीतल की तोपें भरतपुर


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की अंग्रेजों के हाथ लगीं। अजेय दुर्ग भरतपुर केम्बलमियर ने जीत लिया। यह बात भरतपुर के इतिहास में लिखी गई। केवल गृह-कलह से ही ऐसा हुआ। भरतपुर विजय के बाद अंग्रेजो की धाक समस्त राजपूताने पर बैठ गई।

महाराज बलवन्तसिंह

महाराजा बलवन्तसिंह

अंग्रेंजो ने भरतपुर को विजय करने के पश्चात् वहीं दरबार किया और उसी दरबार में 5 फरवरी सन् 1826 ई. को महाराज बलवन्तसिंह को राज-गद्दी दी गई। मांजी श्रीमती अमृतकौर की रेजेन्सी में राज्य-प्रबन्ध सौंपा गया। संवत् 1884 विक्रमी (1827 ई.) में महाराज का पिछोरवाल राजपुत्री से विवाह हुआ। महाराज ने युवा होते ही भोलानाथ दीवान और उसके साथियों को कैद कर लिया। संवत् 1899 (1842 ई.) में लार्ड एलनवरा से मिलकर आपने बल्लभगढ़ के राजा को पुनः उसका राज दिलाया।

संवत् 1907 विक्रमी (1850 ई.) में आपको पुत्र लाभ हुआ जिनका शुभ नाम महाराज यशवंतसिंह रखा गया। आपकी प्रजा आपसे बहुत प्रसन्न थी। आप भी प्रजा की प्रसन्नता के लिए सदैव प्रयत्न करते रहते थे। इस प्रकार 27 वर्ष सुख-शांति के साथ राज करके 21वीं मार्च सन् 1853 ई. को आप इस संसार से पधार गये। महाराज काव्य-प्रेमी थे। उनके दरबार में कई कवि रहते थे। वह स्वयं भी कविता करते थे।

महाराज यशवंतसिंह

महाराजा यशवन्तसिंह

जिस समय बलवन्तसिंह का स्वर्गवास हुआ, उस समय उनके प्यारे पुत्रा यशवन्तसिंह की आयु केवल तीन वर्ष की थी। इसलिए राज्य का कार्य-भार भाऊ ग्यासीरामजी करने लगे। चार महीने बाद ही महाराज की मां का भी स्वर्गवास हो गया। मेजर मोरीसन महाराज के अभिभावक (A.D.C.) नियुक्त हुए। सिपाही-विद्रोह में भरतपुर ने भी अंग्रेजों को सहायता दी। सिपाही-विद्रोह के पश्चात् मोरीसन चले गए और कप्तान निक्सर भरतपुर के पोलीटिकल एजेण्ट नियुक्त होकर आए। महाराज यशवन्तसिंह को अंग्रेजी, हिन्दी, फारसी की शिक्षा दी गई। उसमें आपने पूर्ण निपुणता प्राप्त की। सन् 1858 ई. में आपका विवाह पटियाले के महाराज नरेन्द्रसिंह की सुपुत्री के साथ हुआ। सन् 1868 ई. में रानीजी से कुंवर भगवन्तसिंह का जन्म हुआ। किन्तु 5 दिसम्बर सन् 1869 को भगवन्तसिंह का स्वर्गवास हो गया। पुत्र शोक में महारानी जी भी 7 फरवरी सन् 1870 ई. को इस संसार से चल बसीं।

11 मार्च सन् 1862 ई. को ब्रिटिश सरकार की ओर से महाराज को भी भारत के अन्य महाराजाओं की भांति गोद लेने का अधिकार मिल गया था।


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सन् 1871 ई. में महाराज को राज्य के पूर्ण अधिकार प्राप्त हुए। महाराज ने मेयो कालेज की स्थापना के लिए पचास हजार रुपये दान दिए थे। आपने अलवर के महाराज श्यौदानसिंह को मथुरा के सेठों से तीन लाख रुपया कर्जा भी दिलाया था।

सन् 1871 ई. में महाराज अजमेर गए थे। वहां से लौटकर मि. जैकब के साथ जयपुर ठहरे और आमेर के महलों को नंगी तलवारों के साथ देखा। इस तरह बीस दिन तक जयपुर में रहे। राज्य का प्रबन्ध महाराज यशवन्तसिंह ने बड़ी योग्यता के साथ किया। आज तक प्रजा उनके न्याय और प्रेम का बखान किया करती है।

9 सितम्बर सन् 1872 ई. में युवराज रामसिंह का जन्म हुआ। बड़ी धूम-धाम के साथ उत्सव मनाया गया। सन् 1875-76 ई. में प्रिन्स आफ वेल्स सप्तम एडवर्ड भारत में पधारे। उस समय महाराज ने उनको भरतपुर में बुलाकर खूब आव-भगत की। देहली में जो प्रथम दरबार हुआ था, उसमें आपको सरकार की ओर से जी. सी. एस. की उपाधि दी थी। उन्होंने अपने यहां से पोलीटिकल एजेण्ट को हटा दिया था, क्योंकि वह अपने काम में किसी का हस्तक्षेप नहीं चाहते थे। उस समय पोलीटिकल एजेण्ट ‘हरि पर्वत’ आगरे में रहने लग गया था। संवत् 1934 में राज्य में भारी अकाल पड़ा। तब आपने प्रजा की पूरी सहायता की। लगान तो माफ कर दिया साथ ही कर्जा भी दिया और बोहरों से भी अपनी जिम्मेदारी पर दिलाया। डीग और भरतपुर में सदावर्त खोल दिए। लोंगों को काम देने के लिए घने का बाड़ा बनवाया और किले की मरम्मत कराई।

भरतपुर का नमक बड़ा प्रसिद्ध है। भरतपुर में नमक का कटरा नाम की एक मंडी अब तक है। प्रतिवर्ष 1,50,000 मन नमक तैयार होता था, जिसकी वार्षिक आय 3,00,000 रुपये भरतपुर राज्य को और 45,00,0000 रुपये की आय भरतपुर सरकार को होती थी। राज्य में नमक बनाने की 51 फैक्ट्रियां थी। भरतपुर के 50,000 प्रजाजनों का नमक के व्यापार से निर्वाह होता था। सन 1879 ई. में भारत-सरकार के परामर्श से नमक बनाना बन्द कर दिया गया। कहा जाता है यह बन्दी 50 वर्ष के लिए हुई थी। गवर्नमेण्ट ने क्षति-निवारणार्थ 1,50,000 रुपये नकद महाराज को दिया और एक हजार मन सांभर नमक प्रतिवर्ष देने का वचन दिया।

सन् 1884 ई. में महाराज ने सिवाय मादक वस्तुओं के अन्य सब चीजों पर से चुंगी उठा ली। काबुल के अमीर और अंग्रेजों में जब लड़ाई हुई तो महाराज ने अंग्रेजों को मदद दी।


सन् 1886 ई. मे महाराज ने ‘माफी’ की जमीनों की पटवारियों द्वारा


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पैमायश कराई। किन्तु पथैने के ठाकुरों (जाट सरदारों) ने महाराज की इस आज्ञा को नहीं माना और लड़ाई के लिए तैयार हो गए। महाराज ने एक सेना भेजकर उनका दमन किया। पथैने के गढ़ को गिरा दिया। राजपाल जो कि मन्हींसिंह का कारिन्दा था, इस युद्ध में बड़ी बहादुरी से लड़ा। पथेने वालों के 25 आदमी मारे गए और 15 घायल हुए। पथैने के ठाकुरों को परास्त करने के बाद महाराज ने उनके साथ भलमनसाहत का व्यवहार किया।

सन् 1886 ई. की 30वीं नवम्बर को महाराज कुमार नारायणसिंह और सन् 1887 ई. की 7वीं जनवरी को महाराजकुमार रघुनाथसिंह का जन्म हुआ।

सन् 1890 ई. में भारत सरकार ने महाराज की तोपों की सलामी 17 की बजाए 19 कर दी। 1892 ई. में एक दुःखद घटना यह हुई कि राजकुमार नारायणसिंह का स्वर्गवास हो गया।


महाराज यशवन्तसिंह ने अपने जीवन में ऐसे कृत्य किए, जिनसे उनका यशवन्तसिंह होना सार्थक हो गया। प्रजा के साथ हिल-मिलकर बैठना, भाई-चारा निभाना, दुःख-सुख में शामिल होना यह उनकी विशेषताएं थीं। वे बड़े हंस-मुख, हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति थे। उनके चेहरे से तेज टपकता था। वह धार्मिक जीवन बिताते थे। प्रातः काल चार बजे बिस्तरे से उठकर नित्य-नियम करते थे। इन्साफ का कार्य भी आप खूब सुनते थे। यही कारण है कि जब सन् 1893 ई. की 22 दिसम्बर को आपका स्वर्गवास हुआ तो प्रजा में हाहाकार मच गया। कोई ऐसा जन न था जिसने महाराज के लिए आंसू न बहाए हों। वे स्वतन्त्रता प्रिय और दबंग नरेशों में से थे।

महाराज रामसिंह

महाराजा रामसिंह

महाराज यशवन्तसिंह की मृत्यु के पीछे उनके ज्येष्ठ पुत्र राज सिंहासन पर विराजे। 25 दिसम्बर सन् 1893 ई. को उनका राज-तिलक हुआ। इनके सहकारियों में कुछ अयोग्य लोग प्रविष्ट हो गए जो प्रजा के शुभ-चिन्तक की अपेक्षा अहितकारी थे। संयमी न होने के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया था, ऐसा इतिहासकार मानते हैं। सन् 1900 ई. में महाराज रामसिंह ने एक नाई को गोली से मार दिया। इसी घटना से आपको अंग्रेजी सरकार ने गद्दी से हटाकर देहली की छावनी में भेज दिया। इनके दो सुपुत्र हुए थे। एक स्वनाम-धन्य महाराज श्री कृष्णसिंह और दूसरे कुंवर गिरराजसिंह ।

सन् 1922 ई. में आप देवली से आगरा आ गए थे और कोठी भरतपुर में रहते थे। सन् 1929 ई. में आपका स्वर्गवास हो गया।


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महाराज श्रीकृष्णसिंह

महाराजा श्रीकृष्णसिंह

आपका जन्म 4 अक्टूबर सन् 1899 ई. को हुआ था। महाराज रामसिंह के गद्दी से हट जाने पर सन् 1900 ई. की 26 अगस्त को आपको राजगद्दी पर बिठाया गया था। चूंकि आप नाबालिग थे, इसलिए सरकार ने राज्य का प्रबन्ध स्टेट-कौंसिल के हाथ में दिया। महाराज यशवन्तसिंह के समय में ‘पंचायत’ नाम की राज-सभा थी, उसी का रूप पलटकर स्टेट-कौंसिल हो गया। राजमाता श्रीमती गिर्राज कुमारी जी ने आपके लालन-पालन और शिक्षा का पूणतः प्रबन्ध किया। जब महाराज साहब कुछ सयाने हुए तो ‘मेयो कॉलेज’ अजमेर में पढ़ने के लिए भेजे गए। सन् 1910 ई. में आप इंग्लैंड भी गए। उन्हीं दिनों सप्तम एडवर्ड का स्वर्गवास हुआ था। महाराज भी बादशाह की अर्थी में शामिल हुए। सन् 1914 ई. में महाराज ने दुबारा अपनी माताजी के साथ विलायत की यात्रा की। लड़ाई के लिए भरतपुर से 25 लाख से ऊपर सहायता सरकार को दी गई। इंग्लैंड से लौटकर महाराज फिर मेयो कॉलेज में पढ़ने लगे।

आपका विवाह फरीदकोट की वीर राजकुमारी श्रीमती राजेन्द्रकुमारी के साथ हुआ था।

28 नवम्बर सन् 1918 ई. को भारत के तत्कालीन लार्ड चेम्सफोर्ड ने भरतपुर आकर महाराज को अधिकार दिए। इसी प्रसन्नता के समय एक महान् खुशी यह हुई कि 30 नवम्बर सन् 1918 ई. को श्रीमानजी के यहां युवराज श्री ब्रजेन्द्रसिंह जी देव का शुभ जन्म हुआ। प्रजा में भारी खुशी हुई। नगर-नगर और गांव-गांव में आनन्द-बधाए गाए जाने लगे।

महाराज श्रीकृष्णसिंह

सन् 1919 ई. में महाराज ने सेना का पुनः संगठन किया। राजमाता हिन्दी और लिपि देवनागरी कर दी गई, क्योंकि अंत तक राजकीय सारा कार्य उर्दू में होता था। 24 सितम्बर सन् 1922 को श्रीमती राजमाता गिर्राजकुमारीजी का र्स्वगवास हो गया। महाराज ने लंका की भी यात्रा की थी और शिमले में ‘ब्रज-मण्डल’ की स्थापना की। आपके समय में प्रारम्भिक शिक्षा अनिवार्य कर दी गई। समाज-सुधार-एक्ट पास किया गया। क्रेडिट बैंक व सोसायटी तथा ग्राम-पंचायत-एक्ट पास किया गया। क्रेडिट बैंक व सोसायटी तथा ग्राम-पंचायत-एक्ट जारी करके प्रजा को प्रबन्धाधिकार दिए। राज्य भर में देशी औषधालयों की स्थापना की। व्यापार और कला-कौशल में प्रजा की रुचि बढ़ाने के लिए प्रति वर्ष क्वार के महीने में भरतपुर में प्रदर्शिनी करने की नींव भी आप ही ने डाली। आपकी मित्रता भारत के अनेक राजा, रईस और अंग्रेजों से थी। बेलजियम के बादशाह से भी आपका सामाजिक सम्बन्ध था। वह अपनी महारानी समेत भरतपुर में पधारे भी थे। गौ-रक्षा के लिए राज्य के प्रत्येक बडे़ नगर में प्रबन्ध किया गया।


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सन् 1924 ई. की भयंकर बाढ़ में प्रजा के जान-माल की रक्षा के लिए जो आपने कष्ट उठाए और प्रजा की सेवाएं कीं, वे भारत के वर्तमान देशी नरेशों के लिए अनुकरणीय थीं।

महाराज को इस बात पर बड़ा अभिमान था कि मैं जाट हूं। वह अपने जातीय गौरव से पूर्ण थे। सन् 1925 ई. में पुष्कर में होने वाले जाट-महासभा के अधिवेशन के आप ही प्रेसीडेण्ट थे। आपने कहा था-

“मैं भी एक राजस्थानी निवासी हूं। मेरा दृढ़ निश्चय है कि यदि हम योग्य हों तो कोई शक्ति संसार में ऐसी नहीं है जो हमारा अपमान कर सके। मुझे इस बात का भारी अभिमान है कि मेरा जन्म जाट-क्षत्रिय जाति में हुआ है। हमारी जाति की शूरता के चरित्रों से इतिहास के पन्ने अब तक भरे पड़े हैं। हमारे पूर्वजों ने कर्तव्य-धर्म के नाम पर मरना सीखा और इसी से, बात के पीछे, अब तक हमारा सिर ऊंचा है। मेरे हृदय में किसी भी जाति या धर्म के प्रति द्वेषभाव नहीं है और एक नृपति-धर्म के अनुकूल सबको मैं अपना प्रिय समझता हूं। हमारे पूर्वजों ने जो-जो वचन दिए, प्राणों के जाते-जाते उनका निर्वाह किया था। तवारीख बतलाती है कि हमारे बुजुर्गों ने कौम की बहबूदी और तरक्की के लिए कैसी-कैसी कुर्बानियां की हैं। हमारी तेजस्विता का बखान संसार करता है। मैं विश्वास करता हूं कि शीघ्र ही हमारी जाति की यश-पताका संसार भर में फहराने लगेगी।”

आपने अपने व्यय से भरतपुर में हिन्दी-साहित्य-सम्मेलन भी कराया था। देश के प्रत्येक हितकर कार्य में वे भाग लेते थे। प्रजा में ज्ञान और जीवन पैदा करने के लिए उन्होंने ‘भारत-वीर’ नाम का पत्र भी निकलवाया था। वे प्रजा को शासन-कार्य में सहयोगी बनाना चाहते थे, इसी उद्देश्य से उन्होंने शासन-समिति की स्थापना की थी। म्यूनिसिपल कमेटियां कायम की थीं। महाराज जहां एक ओर समाज-सुधार और प्रजा-हित के कार्य कर रहे थे, वहां दूसरी ओर उनके विरोधियों की संख्या बढ़ रही थी। सन् 1928 ई. में उन्हें अपव्ययी सिद्ध करके सरकार ने राज्य छोड़ देने पर विवश किया। उन्होंने गवर्नमेण्ट के इस कार्य का विरोध किया। वे न्याय के लिए अन्त तक लड़े। देहली में उनके जन्म-दिवस के अवसर पर, जब इन लाइनों का लेखक उनकी सेवा में उपस्थित हुआ था, तब उन्होंने कहा था -

“मैं अपने अधिकार को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हूं। तुम्हारा (प्रजा का) अधिकार (शासन-समिति) में पहले ही दे चुका हूं।”

आज सारा भारत कहता है कि महाराज श्रीकृष्णसिंह वीर थे, देश-भक्त और समाज-सुधारक थे। वे भारत के मौजूदा राजाओं में से सैकड़ों से बहुत श्रेष्ठ थे। ऐसे महारथी का देहली में मार्च सन् 1929 ई. को स्वर्गवास हो गया। उनके लिए राजा-प्रजा, हिन्दु-मुसलमान, गरीब-अमीर सभी श्रेणियों के लोग रोए। उनकी मृत्यु से सारे भारत के हृदयवान् लोगों


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के हृदय को धक्का लगा। दूसरे केवल पांच ही महीने बाद राजमाता श्रीमती राजेन्द्रकुमारी का जुलाई सन् 1929 को स्वर्गवास हो गया। आपने चार राजकुमार और तीन राजकुमारियां छोड़ी जिनमें मंझली बहन का सन् 1930 में विछोह हो गया।

महाराज व्रजेन्द्रसिंह

महाराजा ब्रिजेन्द्रसिंह

महाराज सर श्रीकृष्णसिंह के. सी. एल. आई. के स्वर्गवास के पश्चात् उनके ज्येष्ठ राजकुमार श्री व्रजेन्द्रसिंह देव भरतपुर की गद्दी पर बैठाए गए। आपके तीन छोटे भाइयों के नाम हैं - मीठू सिंह, बच्चू सिंह और मान सिंह

महाराज व्रजेन्द्रसिंह
  • बच्चू सिंह के पुत्र हैं - अनूप सिंह और अरुण सिंह। अनूप सिंह पंजाब में व्यापार कर रहे हैं तथा अरुण सिंह का स्वर्गवास हो गया है। अरुण सिंह डीग से दो बार विधायक रहे हैं.
  • मान सिंह के तीन पुत्रियाँ हैं जिनमें सबसे बड़ी दीपा हैं ।

महाराज विश्वेन्द्र सिंह

महाराज विश्वेन्द्र सिंह का जन्म 23 जून 1962 को मोती महल भरतपुर में हुआ. आप 8 जुलाई 1985 को पिता के उत्तराधिकारी बने. आपका विवाह 15 फ़रवरी 1989 को महारानी दिव्या कुमारी के साथ हुआ. सन 1989 से 1994 तक राजस्थान विधान सभा के सदस्य रहे. आप 9 वीं (1989/1991), 13 वीं (1999) और 14 वीं (2004) लोकसभा में सांसद बने.

सूरजमल जयंती और भरतपुर-सप्ताह का आयोजन

महाराज श्रीकृष्णसिंह के निर्वासन के समय से ही राजपरिवार और प्रजाजनों पर विपत्तियां आनी आरम्भ हो गई थीं। उनके स्वर्गवास के पश्चात् तो कुछेक पुलिस के उच्च अधिकारियों ने अन्याय की हद कर दी थी। सुपरिण्टेंडेण्ट पुलिस मुहम्मद नकी को तो उसके काले कारनामों के लिए भरतपुर की जनता सदैव याद रखेगी। धार्मिक कृत्यों पर उसने इतनी पाबन्दियां लगवाईं कि हिन्दु जनता कसक गई। यही क्यों, भरतपुर-राज्यवंश के बुजुर्गों के स्मृति-दिवस न मनाने देने के लिए भी पाबन्दी लगाई गई। जिन लोगों ने हिम्मत करके अपने राज के संस्थापकों की जयंतियां मनाई, उनके वारंट काटे गए। ऐसे लोगों में ही इस इतिहास के लेखक का भी नाम आता है। आज तक उसे भरतपुर की पुलिस के रजिस्टरों में ‘पोलीटिकल सस्पैक्ट क्लाए ए’ लिखा जाता है।1 उसका एक ही कसूर था कि उसने दीवान मैकेंजी और एस. पी. नकी मुहम्मद के भय-प्रदर्शन की कोई परवाह न करके 6 जनवरी सन् 1928 ई. को महाराज सूरजमल की जयंती का आयोजन किया और महाराज कृष्णसिंह की जय बोली। इसी अपराध के लिए दीवान मि. मैंकेंजी ने अपने हाथ से वारण्ट पर लिखा था

“मैं देशराज को दफा 124 में गिरफ्तार करने का हुक्म देता हूं और उसे जमानत पर भी बिना मेरे हुक्म के न छोड़ा जाए।”

हवालातों के अन्दर जो तकलीफें दी गई, पुलिसमैनों के जो कड़वे वचन सुनने पड़े, उन बातों का यहां वर्णन करना पोथा बढ़ाने का कारण होगा। पूरे एक सौ आठ दिन तंग किया गया। सबूत न थे, फिर भी जुटाए गए। गवाह न थे, लालच देकर बनाए गए - उनको तंग करके गवाही देने पर


1. बीकानेर के सुप्रसिद्ध राजनैतिक केस में भरतपुर पुलिस के सी. आई. डी. इन्सपेक्टर ने यही बात अपनी गवाही में कही थी।


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विवश किया गया। किन्तु आखिर जज को यही कहना पड़ा कि पुलिस सबूत जुटाने में और देशराज से बहस करने में फेल हुई।

जिस किसी प्रजाजन और राजकर्मचारी पर यह सन्देह हुआ कि यह जाट-हितैषी और स्वर्गीय महाराज श्रीकृष्ण का भक्त है, उसे दण्ड दिया गया। दीवान ने महाराज और महारानी तथा बाबा साहब (श्री रामसिंह) के अंत्येष्ठि कर्मों के समय पर सम्मानित भाव से उपेक्षा की। आखिर जाटों के लिए यह बात असहय्य हो गई और सन् 1929 ई. के दिसम्बर के अन्तिम दिनों में भरतपुर-सप्ताह मनाने का आयोजन हुआ। सारे भारत के जाटों ने भरतपुर के दीवान मैंकेंजी और मियां नकी की अनुचित हरकतों की गांव-गांव और नगर-नगर में सभाएं करके निन्दा की। राव बहादुर चौधरी छोटूराम जी रोहतक, राव बहादुर चौधरी अमरसिंह जी पाली, ठाकुर झम्मनसिंह जी एडवोकेट अलीगढ़ और कुंवर हुक्मसिंह जी रईस आंगई जैसे प्रसिद्ध जाट नेताओं ने देहातों में पैदल जा-जा कर जाट-सप्ताह में भाग लिया। आगरा जिला में कुंवर रतनसिंह, पं. रेवतीशरण, बाबू नाथमल, ठाकुर माधौसिंह और लेखक ने रात-दिन करके जनता तक भरतपुर की घटनाओं को पहुंचाया। महासभा ने उन्हीं दिनों आगरे में एक विशेष अधिवेशन चौधरी छोटूराम जी रोहतक के सभापतित्व में करके महाराज श्री ब्रजेन्द्रसिंह जी देव के विलायत भेजने और दीवान के राजसी सामान को मिट्टी के मोल नीलाम करने वाली उसकी पक्षपातिनी नीति के विरोध में प्रस्ताव पास किए। इस समय भरतपुर के हित के लिए महाराज राजा श्री उदयभानसिंह देव ने सरकार के पास काफी सिफारिशें भेजीं।

सूरजमल सताब्दी में जाने वाला पहला जत्था

आखिरकार गवर्नमेण्ट की आज्ञा से कुछ दिनों बाद दीवान मैकंजी साहब की भरतपुर से दूसरे स्थान की नियुक्ति का हुक्म हुआ। जबकि उन्हें शहर की म्यूनिस्पलटी की ओर से मान-पत्र दिया जा रहा था, पं. हरिश्चन्द्रजी पंघेरे ने उनको उसी समय छपा हुआ विरोध-पत्र देकर रंग में भंग और मान में अपमान का दृश्य उपस्थित कर दिया। मुकदमा चला और पं. जी को एक साल की सजा हुई। उसके थोड़े ही दिन बाद नरेन्द्रकेसरी (महाराज श्री कृष्णसिंह के जीवन चरित्र) को बेचते हुए बालक दौलतराम पंघोर को गिरफ्तार किया गया। कहा जाता है कि जिस समय श्रीमान् दीवान साहब भरतपुर से विदा हुए उस समय ठा. उम्मेदसिंह तुरकिया और पं. सामंलप्रसाद चौबे ने उन्हें काले झण्डे स्टेशन भरतपुर पर दिखाए। उनके बाद में भी मियां नकी अपनी चालें बराबर चलता रहा। भुसावर के आर्य-समाजियों को अनेक तरह से केवल इसलिए तंग किया कि वे उधर जोरों से वैदिक-धर्म का प्रचार कर रहे थे। पं. विश्वप्रिय, ला. बाबूराम, ला. रघुनाथप्रसाद, चौधरी घीसीराम पथैना पर केस भी चलाया गया। पेंघोर के पटवारी किरोड़सिंह और कमलसिंह पर तो ‘भरतपुर तू वीरों की खानि’


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जैसी भजन पुस्तकों के छापने के कारण मुकदमा चलाया गया और सजा दी गई। उनके भाई प्यारेलाल पटवारी को अलग किया गया। एक मास्टर और बीहरे पर केवल इस पुस्तक को रखने के कारण मुकदमा चला। सन् 1928 ई. से सन् 1933 ई. तक जब तक मियां नकी जी भरतपुर में रहे किसी को दफा 124 ए. व 108 में और किसी को दफा 153 में रगड़ते रहे। ऐसे लोगों में श्रीमान् गोकुलजी वर्मा और पं. गोकुलचन्द दीक्षित विशेष उल्लेखनीय हैं। वर्माजी को तो दो बार जेल पहुचाने से भी मियां साहब को संतोष नहीं हुआ। इसी प्रकार उसने राव राजा श्री रघुनाथसिंह जी के विरुद्ध भी मुकदमा बनाने की धृष्टता की। दीवानों को बना लेना उसके बाएं हाथ का काम था। भले से भले दीवान को उसने हिन्दुओं के विरुद्ध कर दिया। स्वर्गीय महाराज साहब द्वारा पेंघोर के जिन महंत श्री स्वामी सच्चिदानन्दजी को महामान्य की उपाधि मिली थी उन्हीं को राजद्रोही साबित करने की चेष्टा की गई। बाबू दयाचन्द, भोली नम्बरदार, जगन्नाथ, किशनलाल और उसके बूढ़े बाप आदि अनेक सीधे नागरिकों को तंग किया गया। यह सब कुछ महाराज श्री कृष्णसिंह के स्वर्गवास के बाद उनकी प्यारी प्रजा के साथ हुआ। यही क्यों, मेव-विद्रोह के लक्षण भी दीखने आरंभ हो गए थे। यदि दीवान श्री हैडोंक साहब थोड़े समय और सावधान न होते तो स्थिति भयंकर हो जाती।

इस एडमिन्सट्रेशनरी शासन में सबसे कलंकपूर्ण बात यह हुई कि ‘सूरजमल शताबदी’ जो कि बसंत पंचमी सन् 1933 ई. में भरतपुर की जाट-महासभा की ओर से मनाई जाने वाली थी, हेकड़ी के साथ न मनाने की आज्ञा दी गई। ठाकुर झम्मनसिंह और कुंवर हुक्मसिंह जैसे जाट-नेताओं को कोरा जवाब दे दिया गया। इस घटना ने जाट-जाति के हृदय को हिला दिया। यद्यपि महासभा नहीं चाहती थी कि कानून तोड़कर भरतपुर में ‘सूरजमल शताब्दी’ मनाई जाए। किन्तु उत्साह और जोश के कारण जाट लोगों के जत्थे बसंत-पंचमी 30 जनवरी सन् 1933 ई. को भरतपुर पहुंच गए और नगर में घूम-घूमकर उन्होंने ‘सूरजमल शताब्दी’ मनाई। इसी शताब्दी-उत्सव का ‘जाटवीर’ में इस भांति वर्णन छपा था - सूरजमल शताब्दी नियत समय पर मनाई गई

जाट-जगत् यह सुनकर फूला नहीं समाएगा कि बसन्त पंचमी ता. 30 जनवरी सन् 1933 ई. को नियत समय पर भरतपुर में परम प्रतापी महाराज सूरजमल की शताब्दी अपूर्व शान और धूम-धाम के साथ मनाई गई।


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पिछली बातें

जाट-जगत् को सूरजमल शताबदी के सम्बन्ध की पिछली बातों की खबर तो ‘जाटवीर’ द्वारा मिलती ही रही हैं इसलिए उन सब बातों पर प्रकाश डालने की जरूरत नहीं, किन्तु कुछेक बातों का लिखना उचित भी है। ता. 13 जनवरी को जाट-महासभा के डेपूटेशन को भरतपुर के कुचक्रियों द्वारा बहकाए हुए प्रेसिडेण्ट मि. हेडोंक ने जो सूखा जवाब दे दिया था उससे जाट-जगत् तिलमिला उठा था। ता. 22 जनवरी की मीटिंग की ओर सभी जाट भाइयों की निगाह लगी हुई थी।

यद्यपि भरतपुर के प्रतिष्ठित प्रेसिडेण्ट कौंसिल साहब के सूखे और कड़वे फैसले ने बड़े-बड़े राज-भक्त और उपाधिकारी जाटों के दिल पर गहरा आघात किया था, किन्तु फिर भी उन्होंने अपनी ब्रिटिश शासन-परस्ती का सबूत देने के लिए बड़ी सहनशीलता से काम लिया और सूरजमल शताब्दी को मुल्तबी कर दिया। लेकिन सर्व-साधारण जाट-जगत् ने भरतपुर के प्रेसिडेण्ट साहब के फैसले को अपमानजनक और अन्यायपूर्ण समझा और वह तिलमिला उठा। चारों ओर से यही सुनाई देने लगा कि वह आज्ञा ऐसी है जैसी असभ्य सरकार भी नहीं दे सकती।

बस यही बात थी प्रायः भारतवर्ष के सभी प्रान्तों के जाट-युवक व वृद्ध भरतपुर की ओर सूरजमल की जयन्ती मनाने के लिए चल पड़े।

उत्साह

यद्यपि महासभा शताब्दी को मुल्तबी कर चुकी थी फिर भी सूरजमल शताब्दी समिति, जिसका कि जन्म आदि-सृष्टि की भांति हुआ था, के पास बीसियों स्थानों से तार आने लगे कि हम आ रहे हैं। लगभग दो हजार मनुष्यों के बिस्तर भरतपुर-दर्शन के लिए बंध चुके थे। फिर भी ता. 30 जनवरी को हिन्डोन, खेरली, जाजन पट्टी, आगरा और मथुरा में 500 जाट आ चुके थे जो स्वागत-समिति ने यहीं रोक दिए।

सूचना

ता. 29 जनवरी को शताब्दी स्वागत समिति के सेक्रेटरी ने भरतपुर के प्रेसिडेण्ट साहब को इस आशय का तार दिया -

“सूरजमल शताब्दी हमारा धार्मिक उत्सव है। उसे कल बसन्त-पंचमी को भरतपुर में मनाया जाएगा और कल 10 बजे रेलवे-स्टेशन से प्रेसिडेण्ट का जुलूस निकलेगा। अतः सहयोग देने की कृपा करें।”

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इसी तरह का एक तार भरतपुर के पोलिटीकल एजेण्ट महोदय को भी दिया गया ।

भरतपुर में इस तार के पहुचते ही जो कार्यवाही हुई, वह इस तरह सुनने में आई है कि - दीवान ने कौंसिल के मेम्बरों को बुलाकर मीटिंग की। एक मेम्बर इस पक्ष में थे कि उन्हें यहां आते ही गिरफ्तार किया जाय, पर नहीं मालूम कि उनकी राय का क्या हुआ? रात के नौ बजे सी. आई. डी. वालों को स्टेशन पर तथा शहर के दरवाजों पर नियुक्त कर दिया। उन्होंने उसी समय से स्टेशन पर प्रत्येक ट्रेन के मुसाफिरों में सूरजमल के जयन्ती के आगत जनों की तलाश की। कहा जाता है कि स्वयं दीवान साहब भी बेचैनी के साथ स्टेशन तक लगातार भागदौड़ करते रहे।

बसन्त-पंचमी

भरतपुर में यद्यपि इस खबर को छिपाने की काफी कोशिश अधिकारियों की ओर से हुई थी, कि यहां ब्रज के धर्म-प्रिय और हिन्दु जाट सरदार शताब्दी मनाने आ रहे हैं। फिर भी अधिकारियों की फुस-फुस से जनता को पता चल ही गया। इधर ठीक 10 बजे की ट्रेन से बसन्ती पोशाक में सजे हुए शताब्दी के प्रेसिडेण्ट ठाकुर भोलासिंह मय अपने साथियों के स्टेशन पर उतरे। ‘महाराज सूरजमल की जय’, ‘महाराज ब्रजेन्द्रसिंह की जय’ और ‘जाट-जाति की जय’ से प्लेटफार्म गूंज गया। बैंड बाजे से (भरतपुर) प्रेसिडेण्ट तथा उनके साथियों का स्वागत हुआ। बैंड बाजे और बीन बाजे वालों ने बाजे में यही एक स्वागत-गान गाया। जिस समय जुलूस प्लेटफार्म से बाहर निकला, उस समय सरकारी मोटरें और गाड़ियां इधर-उधर से जुलूस का चक्कर काटने लगीं। ठाकुर हुक्मसिंह, ठाकुर रामबाबूसिंहपरिहार’ के भतीजे कुं. बहादुरसिंह, कुं. प्रतापसिंह और चिरंजीव फूलसिंह परिहार-वंश के नवयुवक अपनी भड़कीली बसन्ती पोशाक में जनता के मन को मोह रहे थे। चौधरी गोविन्दराम, चौ. थानसिंह, कुं. जगनसिंह, कुं. नारायणसिंह, राजस्थानी सैनिक तथा अन्य जाट-वीर अपनी गम्भीर मुद्रा से हंसते हुए उत्साह प्रकट कर रहे थे। साथ में लम्बे बांसों में महाराज सूरजमल तथा भरतपुर के अन्य महाराजगान के फोटू थे, जिन पर पुष्प-मालाएं लहरा रही थीं।

गिरफ्तारी की आशंका

आशंका यह थी कि पुलिस जुलूस को भंग करेगी और लोगों को गिरफ्तार करेगी, किन्तु पुलिस ने उस समय तक कुछ नहीं किया, जब तक कि जुलूस प्रवेश द्वार गोवर्धन दरवाजे तक पहुंचा। किन्तु हुआ यह कि एक भले-मानस मोटर लेकर आए। पहले तो मोटर को जुलूस के आगे-पीछे घुमाया और फिर कहने लगे -


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आप लोग मोटर में बैठकर चलिए, इतनी तकलीफ क्यों उठाते हो? मालूम होता है कि जुलूस को वह मोटरों के द्वारा शीघ्रता से घुमाकर बाहर निकाल देना चाहते थे, किन्तु उनसे साफ कह दिया कि आपकी महरबानी को सधन्यवाद अस्वीकार करते हैं। बेचारे अपना-सा मुंह लेकर चले गए। यइस मौके पर अधिकारियों ने एक और भी चाल चली। हिन्दी-साहित्य-समिति के द्वारा भी सूरजमल-शताब्दी मनाने का आयोजन कर डाला और उसके जुलूस को इसके जुलूस में मिला दिया। यह कार्यवाही इसलिए की गई जान पड़ती है कि भरतपुर की आम पब्लिक को इस बात से अंधेरे में रखा जाए कि दीवान की हेकड़ी में दी हुई आज्ञा का उल्लंघन करके यह वृज-वासी हिन्दु तथा जाट लोग शताब्दी मना रहे हैं। साहित्य-समिति का जुलूस भी इसी जुलूस में शामिल हो गया। ठाकुर भोलासिंह से काफी तौर पर कहा कि प्रेसिडेण्ट साहब पैदल न चलिए, घोड़ा गाड़ी में बैठ जाइए या मोटर ले लीजिए। किन्तु उन्होंने अस्वीकार कर दिया और राज-महलों से आगे निकलकर अपना जुलूस भी अलग कर लिया और बाजार में होते हुए नाज-मण्डी में गंगा-मन्दिर के पास, जहां सभा का आयोजन किया गया था, ठहर गए।

दूसरा जत्था

सूरजमल सताब्दी में जाने वाला दूसरा जत्था

भरतपुर पुलिस की अब तक की स्वच्छन्दता और प्रेसिडेण्ट साहब की भूल से यह बात सही-सी जान पड़ रही थी कि स्टेशन से जाने वाला पहला जत्था शहर में पहुंचने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया जाएगा। इसी खयाल से दूसरा जत्था दूसरे रास्ते से शताब्दी-समिति के मंत्री ठा. कुंवर लालसिंह, कुंवर बलवन्तसिंह, आगरे जिले के कुंवर श्री रामसिंह, सेन्ट्रल इण्डिया के भाई जादवेन्द्र, राजस्थानी भाई सूरजमल और दलेलसिंह सरदार थे। ज्यों ही इन्होंने भरतपुर में चौबुर्जा पर इक्कों से उतरकर ‘महाराजा सूरजमल की जय’ बोली कि सी. आइ. डी. वाले अचानक शहर में इस तरह जत्थे को आता देखकर भौचक्के हो गए। यह जत्था भी गंगाजी के मन्दिर के पास, ठीक साथ ही साथ, अपने पहले आए जत्थे में मिल गया।

सभा-समारोह

यद्यपि इन लोगों के साथ ही हजारों मनुष्यों की भीड़ थी फिर भी कुछ उत्साही भाइयों ने प्रमुख मुहल्लों में बुलावा दे दिया। थोड़ी ही देर में मंडी खचा-खच भर गई। चारों ओर भीड़ जमा हो गई। मंगल-गान के बाद स्वागताध्यक्ष कुंवर बहादुरसिंह (सुपुत्र स्वर्गीय ठाकुर पीतमसिंह परिहार, जमींदार कठबारी) ने अपना छपा हुआ भाषण पढ़ा । अनन्तर ठाकुर हुक्मसिंह परिहार ने ठाकुर भोलासिंह जी फौजदार का प्रख्यात नाम इस महोत्सव के प्रधान बनाए जाने के लिए पेश किया।


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कुंवर प्रतापसिंह परिहार सुपुत्र ठाकुर रामसरनसिंह परिहार ने समर्थन व कुंवर लालसिंह ने अनुमोदन किया। करतल-ध्वनि के बीच ठाकुर भोलासिंह सभापति के आसन पर आसीन हुए और अपने छपे हुए वीर-रस पूर्ण भाषण को पढ़ा। इसके बाद ठाकुर तारासिंह का मर्मस्पर्शी भाषण हुआ और तत्पश्चात् निम्नलिखित प्रस्ताव सर्व-सम्मति से पास हुए -

  • (1) यह शताब्दी महोत्सव निश्चय करता है कि प्रत्येक दसवें वर्ष महाराजा सूरजमल की यादगार में सूरजमल शताब्दी-महोत्सव मनाया जाया करेगा।
  • (3) पंजाब-केसरी महाराज रणजीतसिंह की सन् 1939 ई. में शताब्दी मनाने का जो आयोजन सिख-समाज की ओर से हो रहा है, उस पर यह महोत्सव हर्ष प्रकट करता है और सर्व जाट भाइयों से निवेदन करता है कि इस पवित्रा कार्य में सहयोग दें। महाराज रणजीतसिंह जाट-जाति के ही सपूत थे।
  • (4) इस महोत्सव की राय है कि प्रतिवर्ष महाराज श्री कृष्णसिंहजी की स्मृति मनाई जाया करे।

कार्यवाही समाप्त होने ही को थी कि सी. आई. डी. ने कहा कि आप लोग कोतवाली के सामने पहुंचते ही गिरफ्तार कर लिए जाएंगे। अतः सब लोग शेष यात्रा करने ‘सूरजमल कीर्ति-गान’ (जाट-जाति के सुप्रसिद्ध कवि ठाकुर रामबाबूसिंह ‘परिहार’ द्वारा रचित) गाते हुए कोतवाली के सामने पहुंचे ओर आध घण्टे तक ‘सूरजमल-गान’ को दुहरा-दूहरा कर गाया। अन्त में महाराज सूरजमल की जय बोलकर बीसों सहयोगियों तथा आठों बैंड वालों के साथ ट्रेन में बैठकर रवाना हो गए। इस तरह महाराज सूरजमल की यह एतिहासिक शताब्दी सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गई।

धारणाएं

लोगों का कहना है कि भरतपुर कौंसिल के प्रेसिडेण्ट साहब ने जाटों के वास्तविक जोश का ख्याल करके अपनी त्रुटि को संभाल लेने की चेष्टा कर ली थी।

विशेष बातें

जिन लोगों को दूसरे दिन के लिए रोका जा रहा था, वे इस बात के लिए नाराज हो रहे थे कि हमें आज ही क्यों नहीं भेजा जाता। कठवारी के मुख्य-मुख्य सरदार ठा. छिद्दासिंहजी, ठा. गोपीचन्दजी, ठा. कलियानसिंहजी, (ठा. रामबाबूसिंहजी ‘परिहार’ के बड़े भाई) और महाशय


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प्यारेलालजी ने आए हुए लोगों की आव-भगत में अपनी पूरी शक्ति लगा दी थी।


शाम को जब दोनों जत्थे महाराज सूरजमल की जय बोलते हुए वापस लौटे तो परिहार बन्धुओं ने आगे बढ़कर स्वागत किया। श्रीमती ठकुरानी उत्तमादेवीजी ने सबकी आरती उतारी। इसके पश्चात् ठा. तारासिंहजी, ठा. भोलासिंहजी, कु. पन्नेसिंहजी, सरदार हरलालसिंग जी आदि के भाषण हुए।1

मीठी विजय

भरतपुर कौंसिल के प्रेसिडेण्ट को उल्टा-सीधा समझाकर जो लोग जाट-जाति को कोरी बातून जाति साबित करने की चेष्टा में थे उनकी यह धारणा भ्रम-मूल सिद्ध हुई। उनके इस भ्रम को मिटाने के लिए यह एक जीता-जागता उदाहरण है। फिर भी भरतपुर के दीवान साहब ने असलियत को समझकर ऐसा काम किया, जिसके लिए उन्हें हृदय से धन्यवाद देना पड़ता है और जाट-जाति तथा ब्रजवासियों को इस ‘सूरजमल जयन्ती’ के मनाने के निश्चय को साहसपूर्वक नियत समय पर पूर्ण करने के लिए बधाई है।

नोट - भरतपुर राजघराने की वर्तमान जानकारी ठाकुर देशराज की पुस्तक में नहीं थी जो जाटलैंड टीम द्वारा जोड़ी गयी है. सुधार के लिए जाटलैंड सदस्य बहादुर सिंह ने सराहनीय प्रयास किये.

धौलपुर-राज्य

सीमा और विस्तार 
इस राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा पर ब्रिटिश-राज्य का आगरा जिला है। दक्षिणी-पूर्वी ओर चम्बल नदी बहती हैं। विश्वत रेखा से उत्तर में राज ग्वालियर, पश्चिम में करौली व भरतपुर रियासत हैं। विश्वत रेखा से उत्तर 26 अक्षांश 30 देशान्तर और 28 अक्षांश 20 देशान्तर के मध्य स्थित हैं। पूर्व-उत्तर से दक्षिण-पश्चिम लम्बाई 54 मील और उत्तर-पश्चिम से से दक्षिण-पूर्व चौड़ाई 32 मील है। क्षेत्रफल 1626 वर्ग मील है।

इस राज्य के दक्षिण-पूर्व में चम्बल बहती हुई ग्वालियर की ओर चली गई है। बानगंगा भी इस राज्य में बहती है। चम्बल से कहीं-कहीं सिंचाई भी हो जाती है। जमीन कहीं-कहीं बड़ी उबड़-खाबड़ है। कहीं-कहीं पहाड़ी भी हैं।


1. अंग्रेज दीवान मैकेंजी और उनकी गुलाम पुलिस के कोतवाल 'नकी' को देश के जाटों ने एक बार फिर दिखा दिया कि जाटों में बड़ी से बड़ी ताकत से टकराने की शक्ति रही है.वे अपने देश, नेता, समाज, राष्ट्र और सांस्कृतिक वैभव के लिए संघर्ष करना जानते हैं; पर आवश्यकता है, उनको नींद से जगाने और सक्रीय बनाने की. एक बार जागने के बाद वे तूफ़ान बन जाते हैं, जिसको रोक पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव होता है- संपादक


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-682 कोई-कोई हिस्सा उपजाऊ भी है। धौलपुर, बाड़ी, राजखेड़ा और श्रीमथुरा इस राज्य के नामी कस्बें हैं। आगरा-ग्वालियर वाली सड़क इसी राज्य में होकर गुजरती है। रेलवे लाइन भी खास धौलपुर होकर आगरे से ग्वालियर को जाती है।

धौलपुर


आगरा-ग्वालियर सड़क पर आगरे से 34 मील की दूरी पर स्थित है। एक मील के फासले पर चम्बल नदी बहती है। चम्बल के किनारे पर एक विशाल किला बना हुआ है। यद्यपि बरसात में चम्बल का पाट बहुत बढ़ जाता है किन्तु किला इतनी ऊंचाई पर है कि वहां तक पानी नहीं पहुंचता। मुगल-काल में धौलपुर मुसलमानों के अधीन था। ‘हुमायूं नामे’ में धौलपुर का कई स्थानों पर वर्णन आता है। मुसलमान शासकों ने वहां कई मसजिदें बनवाई थीं। कहा जाता है घौलपुर बहुत पुराना शहर है। एक अंग्रेज ने जिनका नाम मि. टफन्थलर था, लिखा है कि धौलपुर को धौल्या गोत्र के जाटों ने बसाया था। उन्होंने अलवर राज्य में स्थित धौलागढ़ को भी बसाया था। जहां कि उनकी एक वीर लड़की की पूजा होती है जो कि धौलागढ़ की देवी कही जाती है। ब्रज के जाटों में धौलागढ़ की देवी मशहूर है। बारहवीं सदी के आस-पास धौलपुर आबाद किया गया, यह भी हमारा ख्याल है।

बाड़ी

धौलपुर से दक्षिण-पश्चिम पहाड़ों के बीच में स्थित है। यहां से धौलपुर 18 मील दूर रह जाता है। इसके सम्बन्ध में कोई खास बात उल्लेखनीय नहीं है।

राजाखेड़ा

यह परगने का सदर मुकाम है और धौलपुर से उत्तर-पश्चिम 23 मील के फासले पर आबाद है इधर गोलापूर्व ठाकुरों की आबादी अच्छी संख्या में है।

श्रीमथुरा

यह एक ऐतिहासिक स्थान है। शायद मथुरा के नाम पर भक्ति प्रधान हृदय के व्यक्तियों द्धारा यह प्रसिद्ध हुई है।

राणा वंश - गोहद के राणा

गोहद का किला

धौलपुर के शासक जाट-कुल दिवाकर राणावंश के हैं। कहा जाता है कि राणा जाट सूर्यवंशी हैं। सूर्यवंश और चन्द्रवंश क्या हैं, इसके दुहराने की यहां आवश्यकता नहीं है। पिछले अध्यायों में इस बात का हम वर्णन कर ही चुके हैं। कुछ लोग कहते हैं कि राणा जाट शिशोदिया वंश के हैं। वास्तव में बात यह हो सकती है कि शिशोदिया और राणा एक ही वंश-वृक्ष की दो शाखाएं हों। रस्म-रिवाजों के अन्तर से कुछ लोग इनमें से राजपूत हो गए और शेष जाट कहलाते रहे।


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यह भिन्नता नवीन हिन्दु-धर्म के विस्तार के साथ हुई।

गोहद के राणा

राणा वंश के लोग गोहद में आकर आबाद हुए। वास्तव में ये लोग ईरान से लौटकर पंजाब में आबाद हुए थे और वहां से चलकर गुजरात होते हुए राजस्थान में आकर आबाद हुए। पुराने रस्म को मानते रहने वाले समुदाय ने गोहद में अपनी बस्ती आबाद की। बप्पा तथा उनके साथी हारीत नाम के साधु के उपदेश से नवीन हिन्दु-धर्म में दीक्षित होकर कालानुसार शिशोदिया नाम से प्रसिद्ध हुए। इस विषय में भाटों का जो कथन है, उससे हमारा कथन कहीं अधिक सही और बुद्धि-संगत है। राणा लोग आरम्भ में बमरौली में बसे थे। वहां से ग्वालियर पहुंचे। वहां उनका मुस्लिम सम्राटों के विरुद्ध युद्ध जारी रहा। ग्वालियर से हटकर गोहद में अपना राज स्थापित किया और अपने सरदार सुरजनसिंह देव को ‘राणा गोहद’ बनाया। यह घटना 1505 ई. की है।

अब से 150 वर्ष पूर्व तक वे शान्ति के साथ गोहद में प्रजा सत्तात्मक ढंग से शासन करते रहे। उनके कुछ दल आगरे के पास बमरौली कटरा, मथुरा जिले में झुड़ावई गांव में फेल गए।

मराठों के उत्कर्ष के समय में राणा वीर भी सचेत हुए। उन्होंने संतोष की वृत्ति को उस समय के लिए आग्राह्य समझकर तलवार संभाली। उधर जाटों की संख्या कम होने के कारण मराठों के साथ मिलकर ही वह अपनी वीरता के जौहर दिखाने लगे। उनके सहयोग से मराठा लोग खूब लाभ उठाते थे। विजय पाकर वे खुशी मनाते थे।

बाजीराव पेशवा को उन्होंने सहयोग दिया, इसलिए वे गोहद के हाकिम मराठों की ओर से भी मान लिए गए। यह घटना सन् 1735 व सन् 1740 ई. के बीच की है। जिस सरदार को मराठों ने गोहद को अधीश्वर स्वीकार किया था, वह अठारहवीं सदी के मध्य में स्वर्गवासी हो गए। उनके पश्चात् उनके भतीजे ने अध्यक्ष की कमान संभाली। चाचा से बढ़कर भतीजा निकला। उन्होंने अपने राज्य को खूब बढ़ाया। वह पूरे राजनीतिज्ञ थे। मराठों को वे परख चुके थे। मराठे जहां बहादुर थे, वहां स्वार्थी भी पूरे थे। मराठों की इसी मनोवृत्ति ने राणा वीरों को उनसे अलग हो जाने पर बाघ्य कर दिया। जब पानीपत का युद्ध हुआ तो गोहद के राणा भीमसिंह मराठों की सहायता से दूर रहे। उन्होंने मराठों के साथ जितना बलिदान किया था, उसका मूल्य मराठों ने कुछ नहीं के बराबर उनको चुकाया था। यही कारण था कि जब मराठे पानीपत की सन् 1761 ई. की लड़ाई में पराजित होने के बाद शक्ति-संचय करने में व्यस्त थे, राणा लोगों ने भीमसिंह की अध्यक्षता में ग्वालियर पर कब्जा कर लिया। ग्वालियर पर अधिकार प्राप्त करने वाले राणा सरदार श्री लोकेन्द्रसिंह के चाचा थे। श्री लोकेन्द्रसिंह (महाराजा छत्रसिंह राणा) ने अपने को गोहद का महाराज राणा होने की घोषणा कर दी।


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उनका ऐसा करना उचित ही था। जिस भांति मराठों को मराठा-साम्राज्य स्थापना का अधिकार था, उसी भांति जाटों को भी अधिकार था कि वे समस्त भारत पर जाट-शाही स्थापित करने की घोषणा कर लेते। सैनिक जातियां यदि संगठित रूप से अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहें तो किसी भी समय वे अपने उद्देश्य के लिए प्रयत्न कर सकती है। संसार भर में सदैव सैनिक-बल का शासन रहा है और शायद भविष्य में भी रहेगा. मराठे लोकेन्द्र सिंह की सैनिक-शक्ति से परिचित थे। उनमें उस समय इतना दम न था कि वे लोकेन्द्रसिंह और उनके साथी जाटों के साथ छेड़छाड़ करें। आगरे से इटावा तक इस समय भरतपुरी जाटी का बसन्ती झण्डा फहरा रहा था।

मराठे लगातार 6 वर्ष तक चुप रहे। इस बीच में शक्ति-संचय कर सन् 1767 ई. में उन्होंने राणा पर चढ़ाई की। इस बीच में मराठों का पेशवा रघुनाथ राव बन चुका था।

लोकेन्द्रसिंह ने पहले से ही इस युद्ध के लिए तैयारी कर ली थी। वह स्वयं भी प्रसिद्ध रण-बांके योद्धाओं में से थे। उन्हें तलवार पर विश्वास था। मराठे दिल तोड़कर लड़े, किन्तु जाट सिपाही हटना तो जानते ही नहीं थे । रघुनाथ राव पेशवा की समझ में आ गया कि जाट-मुगल और पठानों की भांति मराठों से भयभीत होने वाले सैनिक नहीं हैं। इसलिए उसने राजा के सामने तीन लाख रुपये की मांग पेश की। तीन लाख मिलने पर वह वापस लौट जाएगा और राणा को स्वतन्त्र राजा मान लेगा। इस प्रस्ताव से राणा भी सहमत क्यों न होते। उन्होंने तीन लाख रुपये रघुनाथराव को दे दिये। मराठे वापस लौट गए। खिराज देने की शर्त को राणा ने कभी नहीं निभाया।

अंग्रेज -सरकार ने ऐसे बहादुर और मराठों के विद्रोही राजा से लाभ उठाने की बात सोची। अंग्रेज सरकार को बम्बई हाते की ओर मराठों के आक्रमण का डर था। दिल्ली और बम्बई के बीच अंग्रेज अपना ऐसा दोस्त चाहते थे जहां बीच में उनकी फौज को आराम से ठहाराया जा सके। ऐसे ही राजनैतिक कारणों से प्रेरित होकर अंग्रेजों ने लोकेन्द्रसिंह से मैत्री-सम्बन्ध स्थापित करने की इच्छा प्रकट की। लोकेन्द्रसिंह और अंग्रेजों के बीच जो सन्धि हुई, उसका संक्षिप्त रूप यह है -

  • धारा 1. धारा-आनरेबुल इंग्लिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी व महाराज लोकेन्द्रसिंह बहादुर दोनों पक्षों के उत्तराधिकारियों में सदैव मित्रता रहेगी और निम्नलिखित कार्यों के लिए उनमें सदैव एकता रहेगी।
  • धारा 2. -जब कभी दोनों पक्षों में से किसी की मराठों से लड़ाई होगी तब अगर महाराज लोकेन्द्रसिंह साहब अपने देश-विजय करने के लिए कम्पनी-सरकार से अंग्रेजी सेना चाहेंगे तो उनकी लिखित पत्रिका

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अंग्रेजी फौज के प्रधान सेनापति के पास पहुंचने पर आवश्यकतानुसार सेना उनके पास पहुंच जाएगी। जब तक उन्हें जरूरत होगी, उनके पास रहेगी। उनके विदा करने पर वापस आएगी। इस फौज का व्यय महाराज साहब से मछलीदार सिक्कों में बीस हजार मासिक लिया जाएगा। जिस समय फौज कम्पनी के मुल्क व नवाब अवध के मुल्क से कूंच करेगी और जिस समय उक्त स्थान पर वापस आ जाएगी, फौज के वेतन के दिन होंगे। मंजिल प्रतिदिन चार कोस की समझी जाएगी।
  • धारा 3. यह सेना महाराज साहब को भीतरी-बाहरी शत्रुओं से सुरक्षित रखने और मराठों से विजय करके उनके देश की वृद्धि करने में संलग्न रहेगी।
  • धारा 4. इस प्रतिज्ञा-पत्र के अनुसार जो प्रदेश-सेना सरकार कम्पनी या सेना महाराज साहब या दोनों सम्मिलित रूप से युद्ध द्वारा अथवा संधि द्वारा मराठों से हासिल करेंगें उन 56 मुहालों के समेत जो महाराज के कदीम मुल्क हैं और इस समय मराठों के अधिकार में हैं, बटवारा इस हिसाब से होगा कि एक रुप्ये में नौ आना कम्पनी सरकार सात आना महाराज बहादुर का होगा। कुल आमदनी की ओसत की जांच दोनों ओर के अमीन दो साल की जमाबन्दी से कर लेंगे। प्रदेश और दुर्ग महाराज साहब के अधिकार में ही रहेंगे। कम्पनी के हिस्से की रकम महाराज साहब वसूली में से खिराज के तौर पर कम्पनी-सरकार को देते रहेंगे।
  • धारा 5. जब कभी महाराज तथा कम्पनी की सेना को महाराज साहब के प्रदेश से बाहर मराठों से लड़ना पड़ेगा, तो प्रार्थना-पत्र के पहुंचने पर महाराज साहब दस हजार सेना एकत्रित करेंगे। खर्च दोनों ओर अलग किया जाएगा और यदि वापसी के समय महाराज अंग्रेजी-सेना को रखने की इच्छा प्रकट करेंगे तो धारा दूसरी के अनुसार उन्हें फौज का खर्चा देना होगा। किन्तु कम्पनी-सरकार को अधिकार न होगा कि महाराज की फौज को उज्जैन वा द्वाबा इंदौर की सीमा के बाहर उनकी खास मंजूरी के बिना भेजे। इस विषय में उनसे प्रार्थना भी न करेंगे।
  • धारा 6. जबकि अंग्रेजी सेना महाराज साहब के देश व सेना की रक्षा या अन्य प्रदेश के विजय करने में नियुक्त होगी, महाराज साहब उसे आज्ञा प्रदान करेंगे (अर्थात् वह सेना महाराज की अधीनता में रहेगी)। किन्तु अंग्रेजी सेना आज्ञा-पालन अंग्रेजी-कमान अफसर के द्वारा करेगी।
  • धारा 7. जब कभी महाराज साहब और कम्पनी सरकार की फौजें दैवयोग से कहीं दूर की लड़ाई पर होंगी तब अंग्रेजी सेनापति उचित सेनाओं के लिए महाराज साहब की राय लेगा। किन्तु मत-विभिन्नता के समय पर अन्तिम निर्णय

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अंग्रेजी कमान-अफसर की राय पर होगा। परन्तु महाराज साहब अपनी फौज के स्वयं ही संचालक व नायक होंगे।
  • धारा 8. जब कभी अंग्रेजी सरकार और मराठों के बीच सन्धि होगी, उस समय जो अहदनामा होगा, महाराज साहब बतौर एक फरीक के उसमें शामिल होंगे। उस अहदनामे में महाराज साहब के वर्तमान अधिकृत प्रदेश और किला ग्वालियर कदीम से महाराज साहब का खानदान उस पर अधिकारी रहा है। बशर्ते कि किला मजकूर उनके कब्जे में होगा। साथ ही अन्य प्रदेश भी जो विजय होने पर महाराज साहब के अधिकार में सिद्ध होंगे, पूर्वानुसार महाराज साहब के अधिकार में रहने की सम्मति दी जाएगी।
  • धारा 9. महाराज साहब के मुल्क में कोई अंग्रेजी कोठी न बनाई जाएगी और न कोई आदमी अंग्रजों का जब तक कि गवर्नर जनरल व कौंसिल अंग्रेजी महाराज साहब से मंजूरी हासिल न कर लेगी उनके राज में पहुंचेगा। सेना की सेवाओं के लिए उनकी प्रजा बेगार में नहीं पकड़ी जाएगी और न महाराज साहब के अतिरिक्त कोई उन पर किसी तरह की हुकूमत करेगा।
  • - बमुकाम फोर्ट विलियम किला कलकत्ता तारीख 2 दिसम्बर सन् 1778 ई. में मुहर व दसतखत निर्णय हुआ।

इस सन्धि-पत्र के अनुसार 1778 ई. में दो हजार चार सौ सैनिकों के साथ कप्तान पोफम की अधीनता में अंग्रेजों ने महाराज की सहायता के लिए फौज भेजी। कप्तान पोफम ने लहार के किले से मराठों को महाराज की फौज की सहायता से निकाल दिया। लहार पर महाराज राणा का अधिकार हो गया। इसी वर्ष चौथी अगस्त 1780 को किला ग्वालियर भी फतह कर लिया गया। राणा गोहद का ग्वालियर पर भी झण्डा गाड़ दिया गया।

13 अक्टूबर सन् 1781 ई. को जो अहदनामा अंग्रेजी सरकार और माधौजी सेंधिया के बीच हुआ, उसके अनुसार महाराणा को सम्मति दी गई थी कि जब तक अहदनामा सरकार अंग्रेजी पर वे कायम रहेंगे, ग्वालियर और अन्य प्रदेश उनकी सम्पत्ति समझे जाएंगे और सेंधिया उसें हस्तक्षेप न कर सकेगा।

कहा जाता है कि सन् 1781 ई. व 1782 ई. में अंग्रेजों के विरुद्ध जो संगठन हुआ था, राणा उसमें शामिल हुए थे। इसलिए अंग्रेजों ने अपनी ओर से सन्धि तोड़ दी। हो सकता है यह बात सही हो, क्योंकि स्वतन्त्रता की आग प्रत्येक देशवासी के हृदय में होती है। किन्तु बात यह थी कि सिंधिया से बार-बार राणा के पीछे अंग्रजों को टक्कर लेने में कठिनाई मालूम पड़ रही थी। सन 1782 ई. के मई महीने में सलवाई के स्थान पर सन्धि करके सिंधया ने जब अंग्रजों के युद्ध से छुट्टी पाई तो उसने ग्वालियर को वापस लेने के लिए राणा पर चढ़ाई कर दी। सिंधया जैसे प्रचण्ड आदमी का बड़ी बहादुरी के साथ महाराणा ने मुकाबला किया।


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किन्तु, आखिकार उन्हें ग्वालियर खाली करना पड़ा। गोहद भी उनके हाथ से निकल गया। अंग्रेजों ने कुछ भी मदद न की। राणा साहब भी कैद हो गये। महाराणा को तथा उनके साथियों को 22 वर्ष तक परेशानी उठानी पड़ी।

धौलपुर के राणा - गोहद से आकर बने धौलपुर के राणा

राणा कीरतसिंह (r.1803 - 1835)

धौलपुर के राणा - सन् 1804 ई. में सिंधिया और अंग्रेजों की फिर अनबन हो गई। दौलतराम के पुत्र माधौजी सिंधिया से अंग्रेजो की लड़ाई हुई और किला ग्वालियर तो अपने कब्जे में रखा और गोहद राणा लोकेन्द्रसिंह के पुत्र महाराज राणा कीरतसिंह को सौंप दिया। किन्तु एक ही बरस बाद सिंधिया से अंग्रेजों को सन्धि करनी पड़ी, जिसके अनुसार ग्वालियर और गोहद वापस कर देने पड़े। गोहद महाराज राणा कीरतसिंह से अंग्रेजों ने सिंधिया को दिला दिया, किन्तु उसके बदले में धौलपुर, बाड़ी और राजाखेड़ा के परगने राणा साहब को अंग्रेजों ने दिए। गोहद में महाराज राणाओं ने 44 वर्ष तक राज किया था। अब वे गोहद की बजाए धौलपुर के राणा कहलाने लगे।

चम्बल नदी धौलपुर और ग्वालियर की सरहद नियुक्त हुई। सिंधिया और महाराणा साहब में प्रेम-भाव स्थापित नहीं हुआ। सन् 1831 ई. में महारानी बीजाबाई और उनके भाई सिन्धुराव ग्वालियर से निकाले गये, तब महाराणा ने उनका स्वागत-सत्कार भली प्रकार किया।

महाराज भगवन्तसिंहजी (r.1836 - 1873)

सन् 1836 ई. में महाराज राणा कीरतसिंह का स्वर्गवास हो गया। श्री भगवन्तसिंह राजसिंहासन पर बैठे। सन् 1837 ई. में सरकार अंग्रेजी की ओर से राज्य को खिलअत प्रदान हुआ।

कहा जाता है कि महाराज सिंधिया सरावगी वैश्यों द्वारा धौलपुर के साथ साजिश कर रहे थे, इसलिए महाराज भगवन्तसिंहजी ने सरावगियों के मन्दिर में पारसनाथ की बजाए महादेव की मूर्ति स्थापित कर दी। सिंधिया ने सरकार अंग्रेज को इस मामले में हस्तक्षेप के लिए लिखा, किन्तु सरकर अंग्रेज ने इस मामले को गैरदस्तन्दाजी बता दिया।

सन् 1858 ई. में विद्राहियों द्वारा ताड़ित होकर जो अंग्रेज धौलपुर भाग आये, महाराज राणा ने उनकी पूर्ण रूप से हिफाजत की।

महाराज राणा भगवन्तसिंह निहायत खुश-मिजाज और हरदिलअजीज थे। सारी प्रजा उनकी सराहना करती थी। राज के काम में उनकी चतुर भौजाई भी सहयोग देती थी।

सन् 1861 ई. में राज्य में कुछ षड्यंत्रकारियों ने बगावत खड़ी कर दी। वे महाराज राणा के प्राणों के भी ग्राहक हो गये। महाराज को विवश होकर आगरा जाना पड़ा। देवहंस जो कि राज की ओर से मुख्तार था, महाराज को गद्दी से


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हटाना चाहता था। अंग्रेज-सरकार ने इस मामले को अपने हाथ में लिया। जांच में मालूम हुआ कि गदर के समय में उसने इलाका आगरे में भी लूट पाट की थी। उसे कैद करके बनारस भेज दिया गया।

सरकार ने महाराज को गोद लेने का हक और के. सी. आइ. ई. का खिताब दिया था।

देवहंस के बाद सर दिनकर के भाई गंगाधरराव राज्य के दीवान नियुक्त हुए। मुन्शी प्रभुलाल को नायब दीवान बनाया गया। राज्य की दशा सुधरने लगी। कर्जा भी कम हुआ। महाराज के यहां एक गजरा नाम की निहायत हसीन स्त्री की पहुंच का कुछ इतिहासकार वर्णन करते हैं कि 28 वर्ष की युवावस्था में महाराज राणा के बेटे का देहान्त हो गया। उसकी और महाराजा की अनबन भी रहती थी। उसने अपने पीछे एक पांच वर्ष का सुकुमार बालक छोड़ा। महाराज राणा उसकी बडे़ लाड़-चाव से शिक्षा कराने लगे। पोलीटिकल एजेण्ट भी उन्हें खूब प्यार करते थे और कहा करते थे कि वह राजकुमार बड़े योग्य साबित होंगे।

1871 ई. में गंगाधराव ने दीवानों से इस्तीफा दे दिया और प्रभुलाल को खराब काम करने के कारण निकाल दिया गया। इससे एक साल पहले महाराज ने कलकत्ते में जाकर ड्यूक आफ कनाट से मुलाकात की थी और सितारे हिन्द का प्रथम श्रेणी का खिताब भी प्राप्त किया था। कहा जाता है, महाराज राणा का खिताब भी उन्हें इसी मौके पर मिला था। गंगाधरराव के दीवानी से अलग होने पर कुछ दिन तक सर दिनकरराव ने दीवानी का काम किया। पीछे पटियाले से हकीम अब्दुलनबीखां को बुलाया गया। आगरा में लाट-साहब से मुलाकात करने के बाद अब्दुलनबीखां को स्थायी रूप से दीवान बना दिया गया। यह बड़ा योग्य आदमी निकला। रियासत पर जितना भी कर्ज हुआ था, इसने उसे चुकाने में बड़ी योग्यता दिखाई। डांग के आसपास से कुछ लुटेरे गूजरों का दमन किया। कुछेक बदचलन लोगों के कारण धौलपुर की जो बदनामी हो रही थी उसे मिटाया। राज्य भर में दौरा किया। जगह-जगह थाने कायम किये। तहसील के काम के लिए तहसीलदार बनाए। वह अपने काम में बहुत होशियार था। 1872 ई. में महाराज राणा के ऐसे सुयोग्य दीवान का इन्तकाल हो गया। राज की भलाई के लिए महाराज ने निम्न सुधार किए।

1. इजलास खास की स्थापना की जिसमें महाराजा सहब व दीवान बैठकर अपीलें तथा संगीन मुकद्दमों को सुनते थे।,

2. महमामा पंच सरदारान जिसमें विभिन्न जातियों के प्रतिष्ठित व्यक्ति बैठते थे, वे अपनी राय और रिपोर्ट इजलास खास को देते थे,

3. अदालत आला दीवानी व फौजदारी के लिए दो हाकिम


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नियुक्त किए। एक दीवानी और दूसर फौजदारी सम्बन्धी निर्णय करता था, 4. महकमा माल की स्थापना जमीन सम्बन्धी मामलों के लिए की गई ।

5. दफ्तर इलाका गैर महकमे इसलिए कायम किए कि इलाका अंग्रेजी और अन्य रियासतों के सम्बन्ध की कुल कार्रवाही उसी के जरिए से हो और

6. फौजी विभाग सेना सम्बन्धी समस्त हिसाब और कार्य इस महकमे के द्वारा होते थे। इसके अलावा अन्य महकमे भी बनाए।

राज्य में जेलखाना बनाने की तैयारी हो रही थी। उनकी इच्छा थी कि आबपाशी का इन्तजाम भी करें। क्योंकि राज्य में चम्बल, वान उटगन नाम की नदियां थीं। हिन्दी, उर्दू, फारसी की शिक्षा के लिए मदरसे भी खोले गये।

सन् 1873 ई. में महाराज राणा भगवन्तसिंह का स्वर्गवास हो गया।

उनके सम्बन्ध में तत्कालीन पोलीटिकल एजेण्ट ने लिखा था -

“महाराजा साहब निहायत खुशमिजाज बामुरव्वत व हरदिलअजीज हैं। सरकार अंग्रेजी के निहायत वफादार और श्रीमती साम्राज्ञी मलिका महान् अर्धाश्वरी इंगलिस्तान व हिन्दुस्तान के पूर्णतः हितचिन्तक हैं। इस बात मे कुछ भी संकोच नहीं करते। इधर से गुजरने वाले यूरोपियन अंग्रेज यात्री और सरकारी कर्मचारियों की आव-भगत बहुत अच्छी तरह से करते हैं।”

धौलपुर पहले राजनैतिक दृष्टि से आबू से सम्बन्ध रखता था। किन्तु पीछे से भरतपुर के पोलीटिकल ऐजण्ट धौलपुर पधारे और राज्य का शासन-सूत्र चलाने का प्रबन्ध किया। गद्दी नशीन महाराज नाबालिग थे। सर दिनकर राव को राज्य का दीवान बनाया गया। सर दिनकर राव ने अवैतनिक रूप से कार्य करके राजभक्ति प्रकट की। उनका कहना था कि राज्य से हमने बहुत लाभ उठाया है।

महाराज निहालसिंह (r.1873 - 1901)

नाबालिग महाराज राणा ‘प्यारे राजा साहब’ राज्य के मालिक हुए। उनकी शिक्षा का प्रबन्ध उनकी माताजी के सुपुर्द हुआ। उनकी माताजी पटियाले के महाराज नरेन्द्रसिंह जी की पुत्री थी। वह शिक्षित और बहुत चतुर थी। सर दिनकर राव ने पोलीटिकल एजेण्ट को यही राय दी थी। एक अंग्रेजी पढ़ा हुआ ब्राह्मण भी उनकी शिक्षा के लिए रखा गया। यह भी प्रबन्ध किया गया कि कभी-कभी महाराज आगरा जाकर अंग्रेज लोगों तथा उनकी मेम साहिबान से बातचीत किया करें, इससे अंग्रेजी बोलना उन्हें जल्द आ जाएगा। सन् 1873-74 में धौलपुर मदरसे के हेडमास्टर से उन्होंने अंग्रेजी सीखी। साथ ही हिन्दी, संस्कृत और फारसी भी सीखते रहे।

महाराज राणा अंग्रेजी के क्रिकेट पोलो आदि खेल में बड़ी प्रसन्नता से शामिल होते थे।


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सन् 1876 में महाराजा साहब प्रिन्स-आफ-वेल्स सप्तम एडवर्ड के दरबार में शामिल हुए। दरबार से लौटते हुए महाराज ग्वालियर व शाहजादे साहब धौलपुर में आए, उनका आतिथ्य-सत्कार खूब किया।

पंज सरदारों में उस समय ठा. दरियावसिंह (जाट) रिश्तेदार महाराणा साहब, कुंवर हरदेवसिंह खानदान महाराणा साहब, लल्लू लक्ष्मणसिंह, लाला सुन्दरलाल और मीर आबिद थे। माल, फौजदारी, दीवानी और सेना का काम पंज सरदारों के उत्तदायित्व में था।

अब तक राज्य की जमीन का बन्दोबस्त न हुआ था। सन् 1875 में मि. स्मिथ को बन्दोबस्त के लिए बुलाया गया। मुंशी कन्हैयालाल और दुर्गाप्रसाद के सहयोग से सन् 1877 तक बन्दोबस्त हो गया, और जमाबन्दी की कठिनाई भी हल हो गई।

राज्य की आय-व्यय का मिती-वार हिसाब रखा जाने लगा जिससे खर्च करने में आमदनी के हिसाब से विचार कर लिया जाता था। सन् 1875 ई. में मौजा सहानपुर को जो कि जागीर में था, खालसे में मिलाया गया।

धौलपुर में दो खिराज गुजार रियासते हैं। दोनों यादव राजपूतों की हैं। एक सरमथुरा की और दूसरी बिजौली की। सरमथुरा से खिराज में बीस हजार रुपये आते थे और बिजौली से 1631 रुपये सालाना खिराज में महाराणा धौलपुर को मिलते थे। ये दोनों टांकेदार कहलाते थे। राजा ग्वालियर में एक मौजा निमरौल का है, वहां टांकेदार नहीं थे, किन्तु गुजार थे।

धौलपुर राज्य में 380 देहात मालगुजारी देने वाले थे। 210 गांव नानकार थे। जिन लोगों को जमाबन्दी में कुछ दिया जाता था, नम्बरदारी आदि का हक था, ऐसे हक लेने वाले गांवों को नानकार कहा जाता था। पीछे से यह नानकारी हटाना मुनासिब समझा गया।

महाराज राणा निहालसिंह के समय तक जो प्यारे साहब भी कहे जाते थे, इस राज ने 61 देहात जागीरदारों में दे रखे थे। जागीरदार लोग सवारों की नौकरी देते थे। उन्हें राज-सेवा के उपलक्ष में जागीरें दी गई थीं।

इस समय मालगुजारी और सायर से राज-कर में आमदनी भी बढ़ी। चूंकि अनेक लोगों ने अनेक गांवों में मुआफी के नाम पर जमीन के बहुत से हिस्से पर कब्जा कर रखा था, उसकी जांच करके जमीन पर लगान बांध दिया गया। कस्टम चौकियों पर रवाना होने का कायदा हो जाने से आमदनी बढ़ गई और जो गड़बड़ पहले होती थी, वह भी कम होने लगी।

पंज सरदारों ने पंचायत के जरिए नमक और अफीम पर जो कि आगरा बम्बई के बीच धौलपुर होकर जाते थे, महसूल बांध दिया। स्टाम्प जारी होने से भी राज की आमदनी बढ़ी। इसी भांति कोयले व सरपते की बिक्री से भी आमदनी बढ़ गई।


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कहने का सारांश यह है कि राज्य की आमदनी बढ़ाने के तरीकों पर खूब ध्यान दिया गया।

सन् 1884 ई. में महाराज राणा नौनिहालसिंह को राज के कुल अधिकार अंग्रेज सरकार की ओर से प्रदान किए गए।

महाराज राणा नौनिहालसिंह बड़ी खुश तबियत के आदमी थे। उनकी यह इच्छा कभी नहीं रहती थी कि कोई भी प्रजा-जन उनकी जात खास से दुःख पा सके। फिजूलखर्ची उनके समय में खूब हुई। महाराज राणा नहीं चाहते थे कि इतना खर्च हो, इसलिए वे सम्भल भी गए। सन् 1888 ई. में उनकी नेकनाम दादी-साहिबा का स्वर्गवास हो गया।

इन महाराज के समय में अस्पताल, तालाब, इमारतों की मरम्मत, आबपाशी के साधनों में अच्छी तरक्की हुई। रेलवे लाइन और कुछ सड़कें भी बनीं। पोलीटिकल एजेण्ट के रहने के लिए भी अलग भवन निर्माण हुआ।

कहा जाता है कि ये महाराज घोड़े के बड़े प्रसिद्ध चढ़ने वाले थे। रेल के साथ शर्तबन्दी पर घोड़ा दौड़ाने की चर्चा इनके सम्बन्ध में आगरा जिले के सभी वर्ग के लोगों से सुनी जाती है। प्रजाजनों के साथ हिलमिलकर बात करने में महाराज खूब प्रसन्न होते थे।

धर्म-कर्म में इस राजवंश की निष्ठा सदैव से अधिक मात्रा में चली आई है। आपके समय भी सैकड़ों ब्राह्मणों को पूजा-पाठ के लिए वेतन दिया जाता था।

अंग्रेज सरकार की ओर से आपको ‘सेन्ट्रल इण्डिया हार्स’ में आनरेरी मेजर और फ्रन्टियर मेडिल और सी. बी. की उपाधियां मिली थीं। आपने ब्रिटिश सरकार के पक्ष में तेराह के युद्ध में बहुत सहायता दी थी। अतः अंग्रेज सरकार उनकी बड़ी इज्जत करती थी। सन् 1901 में महाराज के लिए भी वह समय आ गया जो कि सभी के लिए आता है। वह स्वर्ग सिधार गए।

महाराज रामसिंह (r.1901 - 1911)

महाराज रामसिंह

महाराज निहालसिंह के बाद राजगद्दी पर उनके बड़े बेटे रामसिंह बैठे। इन्होंने लगभग ग्यारह वर्ष राज किया। इनके समय में राज्य में साधारण सुधार हुए। नए ढंग के कानूनों का प्रचलन जो कि ब्रिटिश-भारत में हो चुका था, इनके राज्य में भी होने लगा। धौलपुर की भूमि की प्राकृतिक बनावट बड़ी बेढंगी है। सैकड़ों मील भूमि वैसे ही पड़ी रह जाती है। ‘राजपूताना गजेटियर’ में धौलपुर की खेती के योग्य भूमि 256,985 एकड़ बताई है। बंजर भूमि जिस पर खेती नहीं होती 234,862 एकड़ लिखी है। कुछ भूमि ऐसी भी ‘गजेटियर’ ने बताई है कि जिस पर कभी फसल हो जाती है, कभी नहीं। ऐसी भूमि 88,923 एकड़ है। महाराणा रामसिंह के समय तक राज्य छः परगनों में विभक्त हो चुका था।


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वे परगने मनिया, कुलारी, बारी, बिसहरी, राजाखेड़ा और धौलपुर के नाम से मशहूर थे। उनके समय राज्य की आय ग्यारह लाख रुपये से अधिक न थी। खास शहर धौलपुर की आबादी भी शनैः-शनैः बढ़ रही थी। उनके समय में लगभग बीस हजार जनसंख्या धौलपुर की थी। इनको सरकार ने के. सी. आई. ई. का खिताब भी दिया था। सन् 1911 ई. में महाराज रामसिंह जीमहाराज रामसिंह का स्वर्गवास हो गया। उनके कोई पुत्र न था। इसलिए उनके छोटे भाई श्री उदयभानसिंह राजसिंहासन पर बैठे। उस समय आप भी नाबालिग थे। इसलिए राज्य का प्रबन्ध पोलीटिकल एजेण्ट व कौंसिल के द्वारा होने लगा।

महाराज राणा उदयभानसिंह (r.1911- 1948)

महाराज राणा उदयभानसिंह

श्रीमान् जी का जन्म सन् 1901 ई. हुआ था। आप महाराज रामसिंहजी के छोटे भ्राता थे। 1911 ई. में ज्येष्ठ भ्राता के स्वर्गवास होने पर गद्दी पर बैठे। सन् 1913 ई. में राज्यधिकार प्राप्त हुए। आपने केडिट कोर में भी शिक्षा पाई थी। महाराज राणा बहादुर का उपाधि सहित पूरा नाम ‘रईस उद्दौला पिहदार उल्मल्क महाराजधिराज श्री सवाई महाराज राणा लेफ्टीनेण्ट कर्नल सर उदयभानसिंह लोकेन्द्र बहादुर दिलेरगंज जयदेव के. सी. एस. आई., के, सी. बी. ओ.’ था। यह अभिमान की बात थी कि भरतपुर की भांति महाराज राणा धौलपुर भी सरकार अंग्रजों को कोई खिराज नहीं देते थे। महाराज राणाओं के लिए 17 तोपों की सलामी थी। श्रीमान् जी जातिय कार्यों में भी खूब दिलचस्पी लेते थे। मेरठ में जिस समय जाट महासभा का वार्षिक अधिवेशन हुआ था, श्रीमान् जी ने उसका सभापतित्व ग्रहण करके अपने जातीय प्रेम का परिचय दिया था। लखावटी का प्रसिद्ध जाट कालेज आप ही के नाम पर प्रसिद्ध है। आप उसके संरक्षक हैं। सन् 1930 ई. में देहली में होने वाले जाट महासभा को महोत्सव में पधार कर आपने अपने हृदय-द्वार को खोलकर बता दिया था “मैं अपनी जाति की जितनी भी सेवा करूंगा उतना ही मुझे आनन्द प्राप्त होगा।” भरतपुर की भलाई के मामलात में महाराज श्री कृष्णसिंह के पश्चात् आपने पूर्ण दिलचस्पी ली थी। पहली ‘गोलमेज कान्फ्रेन्स’ में शामिल होकर देश और गवर्नमेण्ट के लिए उनके हृदय में जो सद्भाव हैं, उन्हें भली-भांति प्रकट किया था। इस बात पर उन्हें अभिमान था कि उनका जन्म उस महान् जाट जाति में हुआ है जो सदैव उन्नत और उदार विचारों वाली सिद्ध हुई है। पिछले वर्ष आप नरेन्द्र-मंडल के प्रो. चांसलर नियुक्त हुए हैं। यह बात आपकी सर्वप्रियता का उदाहरण है। आप एक तपस्वी और धर्मिष्ठ नरेश हैं। ईश्वर-वन्दना, संत-सेवा, मिलनसारी और मृदुभाषण आपके सर्वोत्कृष्ट गुण हैं। अन्याय और पक्षपात आपके राज्य में उस समय तक प्रवेश नहीं कर सका था। प्रजा न कर-भार से दुखित थी और न बेगार की मार से पीड़ित।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-693


राजस्थान की अन्य रियासतों की जब हम प्रजा के सुख की दृष्टि से तुलना करते हैं तो धौलपुर हमें सर्वश्रेष्ठ दिखाई देता है। शारीरिक स्वास्थ्य के अनुपात से सभी राज्यों की प्रजा से धौलपुर की प्रजा श्रेष्ठ दिखलाई पड़ती थी। अधिकांश भारतीय-नरेश शराबी, कबाबी और विलासी बने हुए थे। महाराज राणा एकदम इन दुर्व्यसनों से कोसों दूर थे। वास्तव में धौलपुर के महाराज राणा “तपेश्वर और राजेश्वर” का संमिश्रण थे। यदि हम यह कह दें कि वे कलियुग के ‘जनकराज विदेह’ हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

राजस्थान में जाट जनसंख्या

राजस्थान में जाटों की संख्या प्रायः सभी जातियों से अधिक है जो कि कुल आबादी का 92.8 फी हजार है। सन् 1931 की राजपूताना सेंसस रिपोर्ट के अनुसार 19,42,152 राजस्थान में और करीब 30,000 अजमेर-मेरवाड़ में है। अलग-अलग खास-खास रियासतों में जिनमें जाट अधिक तादाद में बसते थे उनकी संख्या इस प्रकार थी -

  • भरतपुर रियासत - 72,378,
  • बीकानेर रियासत - 2,15,947,
  • जयपुर रियासत - 3,13,609,
  • मारवाड़ रियासत - 2,83,933,

विश्नोई जाट जो बीकानेर, जेसलमेर और मारवाड़ (सांचौर इलाका) में ज्यादा बसते हैं, राजस्थान में 69,873 हैं। बीकानेर, जयपुर, भरतपुर, मारवाड़, किशनगढ़ और मेवाड़ इन रियासतों में हर एक दूसरी जाति से इनकी संख्या अधिक थी। किसी-किसी रियासत में उनकी आबादी कुल आबादी का 23 प्रति सैंकड़ा तक थी।1

भरतपुर-राज्य की ड्योढी़, डीग, कुम्हेर और नदवई, बीकानेर की प्रत्येक तहसील जयपुर की मालपुरा, सांभर, शेखावटी, तोरावटी, खेतड़ी और सीकर, किशनगढ़ की अराई, किशनगढ़, रूपनगर और सरवाड़ की विलाड़ा, डिडवाना, जोधपुर, मालानी, मेरता, नागौर, पर्वतसर और सांभर, मेवाड की भीलवाड़ा, कपसिन और रसमिन तहसील और निजामतों में वे मधु-मक्खियों की भांति भरे पड़े हैं।

राजपूतों जिनके कि नाम से यह प्रान्त सम्बोधित होता है, की आबादी कुल 6,33,830 समस्त राजस्थान में थी जो कि कुल आबादी का 56.5 था। विश्नोई जाटों को मिलाकर राजपूताने के जाटों की जो संख्या होती है राजपूत उनमें आधे के करीब होते थे। अर्थात् राजस्थान में जाट राजपूतों से दुगुनी संख्या में बसे हुए थे और उनसे पहले से भी।



1. सन् 1931 की राजपूताना सेंसस रिपोर्ट के आधार पर।


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राजस्थान में जाटों के गोत्र और वंश

राजस्थान में जाटों के कुछ एक गोत्र और वंश इस प्रकार हैं -

इनमें से अनेक गोत्र वंशो के नाम पर और अनेक व्यक्ति, उपाधि, गांवों के नाम पर पड़ गये हैं। हमारे पास राजस्थान के 700 गोत्रों की सूची है। इनमें से अनेक राजपूताने की भूमि के किसी न किसी हिस्से के शासक रह चुके थे।

राजस्थान में अनेक स्थानों पर जाटों की ओर से छोड़ी हुई गोचर भूमि ब्राह्मण और साधुओं और मन्दिरों को दान दी हुई जमीन अब तक चली आती है, जो कि उनके शासक होने का प्रबल प्रमाण है।1


1. हम राजपूताने के प्राचीन जाट-राज्यों का एक अलग इतिहास लिखने का आयोजन कर रहे हैं। (लेखक)

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नवम अध्याय समाप्त

नोट - इस पुस्तक में दिए गए चित्र मूल पुस्तक के भाग नहीं हैं. ये चित्र विषय को रुचिकर बनाने के लिए जाटलैंड चित्र-वीथी से लिए गए हैं.


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