Rajal

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Tejaji goes to Rajal's sasural Tabiji
Author: Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क IFS (R)

Rajal (1076-1103 AD) was daughter of Kharnal Chiftain Tahar Dev and sister of Tejaji of Dhaulya Gotra. She became sati on the death of his brother Tejaji in 1103 AD. Her temple is situated on the bank of pond in Kharnal, Nagaur, Rajasthan.

Tejaji goes to Rajal's sasural

When Tejaji was proceeding for his Sasural Paner to bring his wife Pemal, he was asked to bringfirst his sister Rajal so that she can receive Pemal on her first arrival to Kharnal. [1]

When Tejaji was on way to village Tabiji to bring his sister Rajal, he was attacked by Meena sardar. Tejaji inserted the bhala in ground and challenged the enemies to take it out. Enemies could not do it and ran away. There was a war and Tejaji was victorious. He reached village Tabiji, got permission of her sister's husband Jogaji Siyag and brought Rajal to Kharnal. [2]

बाई राजल का जन्म

बूंगरी माता (राजल) का तालाब खरनाल

संत श्री कान्हाराम[3] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-183]: तेजाजी के जन्म के तीन वर्ष बाद ताहड़ जी की बड़ी पत्नी रामकुँवरी की कोख से विक्रम संवत 1133 (1076 ई.) में एक कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया राजलदे (राजलक्ष्मी) । बोलचाल में उसे राजल कहा जाता था। वह तेजाजी के बलिदान के बाद लगभग 26 वर्ष की आयु में विक्रम संवत 1160 (1103 ई.) के भादवा सुदी एकादश को धरती की गोद में समा गई।

खरनाल के एक किमी पूर्व में एक तालाब की पाल पर इनका मंदिर बना हुआ है। जन मान्यता के अनुसार जहां मंदिर बना है उसी स्थान पर एक साथी ग्वला द्वारा तेजाजी के बलिदान का समाचार सुन वह धरती की गोद में समा गई थी। लोगों की मान्यता , आस्था है कि मंदिर में लगी प्रतिमा भूमि से स्वतः प्रकट हुई थी।

तेजाजी ने जब ससुराल के लिए विदाई ली, उससे पहले अपनी बहन राजल को ससुराल से लेकर आए थे। राजल का ससुराल अजमेर के पास तबीजी गाँव में था। वहाँ के राव रायपाल जी के पुत्र जोराजी (जोगजी) सिहाग से राजल का विवाह हुयाथा। राजल के एक पुत्र भी था।

कुछ लोगों की मान्यता के अनुसार तेजाजी के एक और भोंगरी या बुंगरी अथवा बागल बाई के नाम से एक छोटी बहिन थी। लेकिन धौलिया वंशी खरनाल के जाटों के डेगाना निवासी भैरूराम भाट की पौथी में छोटी बहन का उल्लेख नहीं है। वहाँ तेजाजी के राजल नाम की छोटी बहन बताई गई है।

जमीन में समाने के बाद तेजाजी की बहिन का जो मंदिर बना हुआ है वह बुंगरी माता का मंदिर कहलाता है। शायद इसी बुंगरी नाम की गफलत के कारण बुंगरी नामक छोटी बहन और होने की भ्रांति हुई।


[पृष्ठ- 184]: काफी खोज करने के बाद पता चला कि शरीर पर उबरने वाले मस्सों को मिटाने के लिए आमजन इस मंदिर में बुहारी (झाड़ू) चढ़ाते हैं। झाड़ू को स्थानीय भाषा में बुंगरी कहा जाता है। बुंगरी चढ़ाने से इनका नाम बुंगरी माता प्रसिद्ध हो गया है। बुंगरी माता का मंदिर तथा तालाब (जोहड़) बड़ा रमणीय है। इस तालाब की मिट्टी की पट्टी आँखों पर बांधने से आँखों की समस्त बीमारियाँ मिट जाती हैं।

पास ही बुंगरी माता (राजल दे) की सहेली जो तेजाजी को माँ जाया भाई जैसा मानती थी उसकी भी समाधि मौजूद है। कहते हैं कि वह सहेली भी राजल के साथ धरती में समा गई थी। यह सहेली कौन थी इसका ठीक-ठीक पता नहीं है। कुछ लोग उसे नायक जाति की तो कुछ लोग मेघवाल जाति की कन्या बताते हैं।


[पृष्ठ- 269]: लीलण घोड़ी सतीमाता के हवाले अपने मालिक को छोड़ अंतिम दर्शन पाकर सीधी खरनाल की तरफ रवाना हुई। परबतसर के खारिया तालाब पर कुछ देर रुकी और वहां से खरनाल पहुंची। खरनाल पहुँचने का समय था भादवा सुदी ग्यारस रविवार विक्रम संवत 1160 (29 अगस्त 1103 ई.)। सीधी मानक चौक में जाकर खड़ी हुई। खरनाल गाँव में खाली पीठ पहुंची तो तेजाजी की भाभी को अनहोनी की शंका हुई। लीलण की शक्ल देख पता लग गया की तेजाजी संसार छोड़ चुके हैं। तेजाजी की बहिन राजल बेहोश होकर गिर पड़ी, फिर खड़ी हुई और माता-पिता, भाई-भोजाई से अनुमति लेकर माँ से सत का नारियल लिया और खरनाल के पास ही पूर्वी जोहड़ में चिता चिन्वाकर भाई की मौत पर सती हो गई। भाई के पीछे सती होने का यह अनूठा उदहारण है। राजल की सहेली कोयल बाई भी जमीन में समा गई। राजल बाई का मंदिर खरनाल में गाँव के पूर्वी जोहड़ में हैं।

External links

References

  1. Mansukh Ranwa: Kshatriy Shiromani Veer Tejaji, 2001, p. 21
  2. Mansukh Ranwa: Kshatriy Shiromani Veer Tejaji, 2001, p. 26
  3. Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p. 183-184

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