Kharnal

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Author: Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क IFS (R)
Tejaji Statue in Museum under construction at Kharnal
Tejaji Temple Kharnal

Kharnal (खरनाल) is a village in Nagaur tahsil & district in Rajasthan. It is the village in Nagaur district where Tejaji was born. It is situated at a distance of 15 km from Nagaur in the southwest direction on Nagaur - Jodhpur Road.

Variants of name

History

The Kharnal village was abandoned many times in the past and presently it is situated at a distance of 1 mile in northwest of ancient village. Tejaji is considered to be folk-deity and worshiped in entire Rajasthan and Malwa in Madhya Pradesh by all communities.

The ancestors of Tejaji were settled in Khilchipur in Madhya Pradesh. The Naga Jats of Marwar are from Vasuki or Ganapati Nagavansh. The Dhaulya clan started after Dhawal Rao or Dhaula Rao ruler of Nagavansh. Swet Naga in Sanskrit is the Dhaulya Naga in prakrit language. Tejaji's ancestor Udairaj occupied Khirnal and made it his capital. There were twenty four villages in Khirnal pargana and area was quite extensive. This pargana of Khirnal was very famous during those days.[1] Prior to the occupation of the area by Rathores, Dhaulya Jats were the rulers in Kishangarh and Marwar. [2]

तेजाजी के पूर्वज

संत श्री कान्हाराम[3] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-62] : रामायण काल में तेजाजी के पूर्वज मध्यभारत के खिलचीपुर के क्षेत्र में रहते थे। कहते हैं कि जब राम वनवास पर थे तब लक्ष्मण ने तेजाजी के पूर्वजों के खेत से तिल खाये थे। बाद में राजनैतिक कारणों से तेजाजी के पूर्वज खिलचीपुर छोडकर पहले गोहद आए वहाँ से धौलपुर आए थे। तेजाजी के वंश में सातवीं पीढ़ी में तथा तेजाजी से पहले 15वीं पीढ़ी में धवल पाल हुये थे। उन्हीं के नाम पर धौलिया गोत्र चला। श्वेतनाग ही धोलानाग थे। धोलपुर में भाईयों की आपसी लड़ाई के कारण धोलपुर छोडकर नागाणा के जायल क्षेत्र में आ बसे।


[पृष्ठ-63]: तेजाजी के छठी पीढ़ी पहले के पूर्वज उदयराज का जायलों के साथ युद्ध हो गया, जिसमें उदयराज की जीत तथा जायलों की हार हुई। युद्ध से उपजे इस बैर के कारण जायल वाले आज भी तेजाजी के प्रति दुर्भावना रखते हैं। फिर वे जायल से जोधपुर-नागौर की सीमा स्थित धौली डेह (करणु के पास) में जाकर बस गए। धौलिया गोत्र के कारण उस डेह (पानी का आश्रय) का नाम धौली डेह पड़ा। यह घटना विक्रम संवत 1021 (964 ई.) के पहले की है। विक्रम संवत 1021 (964 ई.) में उदयराज ने खरनाल पर अधिकार कर लिया और इसे अपनी राजधानी बनाया। 24 गांवों के खरनाल गणराज्य का क्षेत्रफल काफी विस्तृत था। तब खरनाल का नाम करनाल था, जो उच्चारण भेद के कारण खरनाल हो गया। उपर्युक्त मध्य भारत खिलचीपुर, गोहद, धौलपुर, नागाणा, जायल, धौली डेह, खरनाल आदि से संबन्धित सम्पूर्ण तथ्य प्राचीन इतिहास में विद्यमान होने के साथ ही डेगाना निवासी धौलिया गोत्र के बही-भाट श्री भैरूराम भाट की पौथी में भी लिखे हुये हैं।

तेजाजी के पूर्वज और जायल के कालों में लड़ाई

संत श्री कान्हाराम[4] ने लिखा है कि.... जायल खींचियों का मूल केंद्र है। उन्होने यहाँ 1000 वर्ष तक राज किया। नाडोल के चौहान शासक आसराज (1110-1122 ई.) के पुत्र माणक राव (खींचवाल) खींची शाखा के प्रवर्तक माने जाते हैं। तेजाजी के विषय में जिस गून्दल राव एवं खाटू की सोहबदे जोहियानी की कहानी नैणसी री ख्यात के हवाले से तकरीबन 200 वर्ष बाद में पैदा हुआ था।


[पृष्ठ-158]: जायल के रामसिंह खींची के पास उपलब्ध खींचियों की वंशावली के अनुसार उनकी पीढ़ियों का क्रम इस प्रकार है- 1. माणकराव, 2. अजयराव, 3. चन्द्र राव, 4. लाखणराव, 5. गोविंदराव, 6. रामदेव राव, 7. मानराव 8. गून्दलराव, 9. सोमेश्वर राव, 10. लाखन राव, 11. लालसिंह राव, 12. लक्ष्मी चंद राव 13. भोम चंद राव, 14. बेंण राव, 15. जोधराज

गून्दल राव पृथ्वी राज के समकालीन थे।

यहाँ जायल क्षेत्र में काला गोत्री जाटों के 27 खेड़ा (गाँव) थे। यह कालानाग वंश के असित नाग के वंशज थे। यह काला जयलों के नाम से भी पुकारे जाते थे। यह प्राचीन काल से यहाँ बसे हुये थे।

तेजाजी के पूर्वज राजनैतिक कारणों से मध्य भारत (मालवा) के खिलचिपुर से आकर यहाँ जायल के थली इलाके के खारिया खाबड़ के पास बस गए थे। तेजाजी के पूर्वज भी नागवंश की श्वेतनाग शाखा के वंशज थे। मध्य भारत में इनके कुल पाँच राज्य थे- 1. खिलचिपुर, 2. राघौगढ़, 3. धरणावद, 4. गढ़किला और 5. खेरागढ़

राजनैतिक कारणों से इन धौलियों से पहले बसे कालाओं के एक कबीले के साथ तेजाजी के पूर्वजों का झगड़ा हो गया। इसमें जीत धौलिया जाटों की हुई। किन्तु यहाँ के मूल निवासी काला (जायलों) से खटपट जारी रही। इस कारण तेजाजी के पूर्वजों ने जायल क्षेत्र छोड़ दिया और दक्षिण पश्चिम ओसियां क्षेत्र व नागौर की सीमा क्षेत्र के धोली डेह (करनू) में आ बसे। यह क्षेत्र भी इनको रास नहीं आया। अतः तेजाजी के पूर्वज उदय राज (विक्रम संवत 1021) ने खरनाल के खोजा तथा खोखर से यह इलाका छीनकर अपना गणराज्य कायम किया तथा खरनाल को अपनी राजधानी बनाया। पहले इस जगह का नाम करनाल था। यह तेजाजी के वंशजों के बही भाट भैरू राम डेगाना की बही में लिखा है।

तेजाजी के पूर्वजों की लड़ाई में काला लोगों की बड़ी संख्या में हानि हुई थी। इस कारण इन दोनों गोत्रों में पीढ़ी दर पीढ़ी दुश्मनी कायम हो गई। इस दुश्मनी के परिणाम स्वरूप जायलों (कालों) ने तेजाजी के इतिहास को बिगाड़ने के लिए जायल के खींची से संबन्धित ऊल-जलूल कहानियाँ गढ़कर प्रचारित करा दी । जिस गून्दल राव खींची के संबंध में यह कहानी गढ़ी गई उनसे संबन्धित तथ्य तथा समय तेजाजी के समय एवं तथ्यों का ऐतिहासिक दृष्टि से ऊपर बताए अनुसार मेल नहीं बैठता है।

बाद में 1350 ई. एवं 1450 ई. में बिड़ियासर जाटों के साथ भी कालों का युद्ध हुआ था। जिसमें कालों के 27 खेड़ा (गाँव) उजाड़ गए। यह युद्ध खियाला गाँव के पास हुआ था।


[पृष्ठ-159]: यहाँ पर इस युद्ध में शहीद हुये बीड़ियासारों के भी देवले मौजूद हैं। कंवरसीजी के तालाब के पास कंवरसीजी बीड़ियासर का देवला मौजूद है। इस देवले पर विक्रम संवत 1350 खुदा हुआ है। अब यहाँ मंदिर बना दिया है। तेजाजी के एक पूर्वज का नाम भी कंवरसी (कामराज) था।

तेजाजी के जन्म के समय की स्थिति

[पृष्ठ-79]: तेजाजी का जन्म चौहान शासक गोविन्दराज या गोविंददेव तृतीय के समय में हुआ था। तब मुसलमानों की दाखल के कारण गोविंद देव तृतीय ने अपनी राजधानी नागौर से सांभर स्थानांतरित करली थी और नागौर का क्षेत्र तनावग्रस्त सा हो गया था। इसी समय 1074 – 1085 ई. के बीच तेजाजी के पिता ताहड़देव की मृत्यु हो चुकी थी। तेजाजी के पिता 24 गाँव के समूह खरनाल गणराज्य के गणपति थे। उनकी मृत्यु होने पर तेजाजी के दादा बोहित राज (बक्सा जी) गणराज्य एवं तेजाजी के संरक्षक की भूमिका निभा रहे थे। इन गणराज्यों की केंद्रीय सत्ता सांभर के चौहानों के हाथ थी।


[पृष्ठ-80]: उस काल में मरुधर के अंतर्गत नागवंशी जाटों के नेतृत्व में अनेक गणराज्य संचालित थे। गुजरात में गुर्जरों के नेतृत्व में, हाड़ौती में गुर्जर और मीनों के नेतृत्व में। मेरवाड़ा (मेवाड़) में मेरों के, भीलवाडा एवं कोटा क्षेत्र में भीलों के नेतृत्व में गणराज्य चला करते थे।

तेजाजी के पूर्वज मूलतः नागवंश की मालवा शाखा के श्वेतनाग के वंशज थे। भैरूराम भाट डेगाना की पौथी के अनुसार ये नागवंश की चौहान खांप (शाखा) की उपशाखा खींची नख के धौलिया गोत्र के जाट थे। श्वेतनाग (धौलानाग) के नाम पर धौल्या गोत्र बना। धवलपाल इनके पूर्वज थे।


[पृष्ठ-84]: तेजाजी के जन्म के समय (1074 ई.) यहाँ मरुधरा में छोटे-छोटे गणराज्य आबाद थे। तेजाजी के पिता ताहड़ देव (थिरराज) खरनाल गणराज्य के गणपति थे। इसमें 24 गांवों का समूह था। तेजाजी का ससुराल पनेर भी एक गणराज्य था जिस पर झाँझर गोत्र के जाट राव रायमल मुहता का शासन था। मेहता या मुहता उनकी पदवी थी। उस समय पनेर काफी बड़ा नगर था, जो शहर पनेर नाम से विख्यात था। छोटे छोटे गणराज्यों के संघ ही प्रतिहारचौहान के दल थे जो उस समय के पराक्रमी राजा के नेतृत्व में ये दल बने थे।


[पृष्ठ-85]: पनैर, जाजोतारूपनगर गांवों के बीच की भूमि में दबे शहर पनेर के अवशेष आज भी खुदाई में मिलते हैं। आस पास ही कहीं महाभारत कालीन बहबलपुर भी था। पनेर से डेढ़ किमी दूर दक्षिण पूर्व दिशा में रंगबाड़ी में लाछा गुजरी अपने पति परिवार के साथ रहती थी। लाछा के पास बड़ी संख्या में गौ धन था। समाज में लाछा की बड़ी मान्यता थी। लाछा का पति नंदू गुजर एक सीधा साधा इंसान था।

तेजाजी की सास बोदल दे पेमाल का अन्यत्र पुनःविवाह करना चाहती थी, उसमें लाछा बड़ी रोड़ा थी। सतवंती पेमल अपनी माता को इस कुकर्त्य के लिए साफ मना कर चुकी थी। खरनालशहर पनेर गणराजयों की तरह अन्य वंशों के अलग-अलग गणराज्य थे। तेजाजी का ननिहाल त्योद भी एक गणराज्य था। जिसके गणपति तेजाजी के नानाजी दूल्हण सोढ़ी (ज्याणी) प्रतिष्ठित थे। ये सोढ़ी पहले पांचाल प्रदेश अंतर्गत अधिपति थे। ऐतिहासिक कारणों से ये जांगल प्रदेश के त्योद में आ बसे। सोढ़ी से ही ज्याणी गोत्र निकला है।

पनेर के निकटवर्ती गाँव थल, सिणगारा, रघुनाथपुरा, बाल्यास का टीबा स्थित सांभर के चौहान शासक गोविंददेव तृतीय (1053 ई.) के समय के शिलालेख, जो कि तेजाजी के समकालीन था

इन सभी गणराजयों की केंद्रीय सत्ता गोविंददेव या गोविंदराज तृतीय चौहान की राजधानी सांभर में निहित थी। इसके प्रमाण इतिहास की पुस्तकों के साथ-साथ यहाँ पनेर- रूपनगर के क्षेत्र के गांवों में बीसियों की संख्या में शिलालेख के रूप में बिखरे पड़े हैं। थल, सिणगारा, रघुनाथपुरा, रूपनगढ, बाल्यास का टीबा, जूणदा आदि गांवों में एक ही प्रकार के पत्थर पर एक ही प्रकार की बनावट व लिखावट वाले बीसियों शिलालेख बिलकुल सुरक्षित स्थिति में है।


[पृष्ठ-86]: इन शिलालेख के पत्थरों की घिसावट के कारण इन पर लिखे अक्षर आसानी से नहीं पढे जाते हैं। ग्राम थल के दक्षिण-पश्चिम में स्थित दो शिलालेखों से एक की लिखावट का कुछ अंश साफ पढ़ा जा सका, जिस पर लिखा है – विक्रम संवत 1086 गोविंददेव

मंडावरिया पर्वत की तलहटी स्थित रण संग्राम स्थल के देवले

रघुनाथपुरा गाँव की उत्तर दिशा में एक खेत में स्थित दो-तीन शिलालेखों में से एक पर विक्रम संवत 628 लिखा हुआ है। जो तत्कालीन इतिहास को जानने के लिए एक बहुत बड़ा प्रमाण है। सिणगारा तथा बाल्यास के टीबा में स्थित शिलालेखों पर संवत 1086 साफ-साफ पढ़ा जा सकता है। इन शिलालेखों पर गहन अनुसंधान आवश्यक है।


[पृष्ठ-87]: रूपनगढ क्षेत्र के रघुनाथपुरा गाँव के प्राचीन गढ़ में एक गुफा बनी है जो उसके मुहाने पर बिलकुल संकरी एवं आगे चौड़ी होती जाती है। अंतिम छौर की दीवार में 4 x 3 फीट के आले में तेजाजी की एक प्राचीन प्रतिमा विराजमान है। उनके पास में दीवार में बने एक बिल में प्राचीन नागराज रहता है। सामंती राज में किसी को वहाँ जाने की अनुमति नहीं थी। इस गुफा के बारे में लेखक को कर्तार बाना ने बताया। कर्तार का इस गाँव में ननिहाल होने से बचपन से जानकारी थी। संभवत ग्रामीणों को तेजाजी के इतिहास को छुपने के प्रयास में सामंतों द्वारा इसे गोपनीय रखा गया था।

राष्ट्रीय राजमार्ग – 8 पर स्थित मंडावरिया गाँव की पहाड़ी के उत्तर पूर्व में स्थित तेजाजी तथा मीना के बीच हुई लड़ाई के रणसंग्राम स्थल पर भी हल्के गुलाबी पत्थर के शिलालेखों पर खुदाई मौजूद है। पुरातत्व विभाग के सहयोग से आगे खोज की आवश्यकता है।

धोलिया शासकों की वंशावली

संत श्री कान्हाराम[5] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-157]: तेजाजी के पूर्वज नागवंश की श्वेतनाग शाखा से निकली जाट शाखा से थे। श्वेतनाग ही धौलिया नाग था जिसके नाम पर तेजाजी के पूर्वजों का धौलिया गोत्र चला। इस वंश के आदि पुरुष महाबल थे जिनसे प्रारम्भ होकर तेजाजी की वंशावली निम्नानुसार है:-

यह वंशावली डेगाना (नागौर) निवासी भैरुराम भाट की पोथी से है। भैरुराम भाट का निधन विक्रम संवत 2053 (1996 ई.) में हो गया था। उनके पुत्र माणकराव भाट का भी विक्रम संवत 2061 (2004 ई.) में असामयिक निधन हो गया। अब यह काम सांवतराम करते हैं। सांवतराम भट ने बताया कि बोहित राज के बड़े पुत्र का नाम ताहड़ देव बोलता नाम थिर राज था। ताहड़ देव तेजाजी के पिता थे।

ताहड़देव के भाईयों के नाम नरपाल, जयसी, धूरसी, बुधराज, आसकरण व शेरसी थे। इनमें से बुधराज और आसकरण झुंझार हो गए थे। झुंझार आसकरण की देवली गाँव के उत्तर में स्थित है।

उनकी पौथी के अनुसार तेजाजी के 6 भाई थे। भाईयों के नाम रूपजी, रणजी, गुणजी, महेशजी, नागजी, तेजाजी थे।

तेजाजी महाराज की जन्मस्थली खरनाल

तेजाजी का जन्म धाम - खरनाल
बूंगरी माता (राजल) का तालाब खरनाल
धुवा तालाब पर बड़कों की छतरी खरनाल

संत श्री कान्हाराम[6] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-174]:वीर तेजाजी महाराज की जन्मस्थली गांव खरनाल है। इसे खुरनालखड़नाल भी कहा जाता है। यह गांव नागौर से दक्षिण-पश्चिम दिशा में 16 किमी दूर जौधपुर रोड़ पर बसा है। नागौर जिले का यह गांव देशभर के किसानों का काशी-मथुरा, मक्का-मदीना है। खरनाल की भूमि में कृषि गौ अमृत न्याय व मानवता की इबारतें सत्यवादी वीर व तपधारी जति तेजा द्वारा लिखी गई।


[पृष्ठ-175]:खरनाल गांव के मध्य में वीर तेजाजी महाराज का तीमंजिला भव्य मंदिर बना हुआ है। जिसका जिर्णोद्धार वि.सं. 1943 (1886) को हुआ था। मंदिर पर लिखे शिलालेख पर जिर्णोद्धार कराने वालों की सूचि के अलावा एक दोहा भी लिखा है-

"खिजमत हतौ खिजमत, शजमत दिन चार।चाहै जन्म बिगार दै, चाहै जन्म सुधार।।"

[पृष्ठ-176]:खरनाल के पूर्व में 1 किमी की दूरी पर तालाब की पाल पर बहन राजल बाई का 'बूंगरी माता' के नाम से मंदिर बना हुआ है। जो कि भातृ प्रेम का उत्कृष्ट उदाहरण है। तेजाजी की बहन राजल के मंदिर में भक्तगण शरीर पर उभरे हुये मस्से दूर करने के लिए लोग बुहारी (झाड़ू) चढ़ाते हैं। बुहारी को स्थानीय भाषा में बूंगरी कहा जाता है। अतः बूंगरी चढ़ाने की प्रथा के कारण बूंगरी माता के नाम से पुकारते हैं।


[पृष्ठ-177]:खरनाल कभी एक गणराज्य हुआ करता था। जिसके भू-पति वीर तेजाजी के वंशज हुआ करते थे। वे एक गढी में रहा करते थे। खरनाल तेजाजी मंदिर के बगल में उस गढी के भग्नावशेष आज भी देखे जा सकते हैं। वर्तमान में खरनाल ग्राम पंचायत के रूप में विद्यमान है।

यहां लगभग 600 घर है। इस गांव में धौलिया गौत्री जाटों के लगभग 200 घर है। धौलियों के अलावा यहां इनाणा, खुड़खुड़िया, बडगावा, काला, जाखड़, जाजड़ा, आदि जाट गौत्रों का निवास है। साथ ही सुनार, नाई, खाती, ब्राह्मण, स्वामी, कुम्हार, नायक, मेघवाल, लुहार, हरिजन, ढोली आदि जतियों के लोग निवास करते हैं।

जाटों के अलावा यहां समस्त किसान जातियों व दलित जातियों का निवास है। जो एकमत तेजाजी को अपना ईष्टदेव मानते हैं। राजपूतों का इस गांव में एक भी घर नहीं है।

यहां की वर्तमान सरपंच चिमराणी निवासी मनीषा ईनाणियां है। धोलिया जाटों के भाट भैरूराम डेगाना के अनुसार वीर तेजाजी महाराज के षडदादा श्री उदयराज जी ने खौजा-खौखरों से खुरनाल/करनाल को जीतकर वर्तमान खरनाल बसाया था। खरनाल 24 गांवो का गणराज्य था। जिसके भूपति/गणपति उदयराज से लेकर ताहड़जी धौलिया तक हुए।


[पृष्ठ-178]:खरनाल के दक्षिण में धुवा तालाब है, जो कि धवलराय जी धौलिया (द्वितीय) द्वारा खुदवाया गया। यह तालाब वर्ष भर गांव की प्यास बुझाता है। तालाब की उत्तरी पाल पर एक भव्य छतरी बनाई हुई है जो कि कोई समाधी जैसी प्रतीत होती है। छतरी के ऊपर अंदर की साइड के पत्थर पर शिलालेख खुदा है। इस पर वि.सं. 1022 (965 ई.) व 1111 (1054 ई.) लिखा हुआ है। यह 'बड़कों की छतरी' कहलाती है। यह निर्माण कला की दृष्टि से अत्यंत प्राचीन लगती है। बताया जाता है कि यह तेजाजी के पूर्वजों ने बनाई थी। इसी तालाब के एक छौर पर तेजल सखी लीलण का भव्य समाधी मंदिर बना हुआ है।

खरनाल के कांकड़ में खुदे तालाब नाड़ियां सबको धोलियों के नाम पर आज भी पुकारा जाता है। धुवा तालाब (धवल राज) हमलाई नाड़ी (हेमाजी) जहां उनका चबूतरा बना हुआ है। चंचलाई - चेना राम, खतलाई - खेताराम,


[पृष्ठ-179]:नयो नाड़ा - नंदा बाबा, पानी वाला- पन्ना बाबा, अमराई - अमरारम, भरोण्डा-भींवाराम, पीथड़ी- पीथाराम, देहड़िया- डूँगाराम द्वारा खुदाए पुकारे जाते हैं। ये धूलाजी शायद वे नहीं थे जिनके नाम पर धौल्या गोत्र चला, बल्कि बाद की पीढ़ियों में कोई और धूलाजी हुये थे। क्योंकि संवत की दृष्टि से प्राचीन धवलराज का तालमेल नहीं बैठता है। भाट की पौथी कहती है कि खरनाल को उदयराज ने आबाद किया जबकि धवलपाल इनसे 9 पीढ़ी पहले हो गए थे।

खरनाल में अन्य संरचनाएं

वहीं दूसरी तरफ नवनिर्मित गजानंद जी (2009) व महादेव जी (2000) के मंदिर है।

इसके अलावा बेहद प्राचीन ठाकुर जी का मंदिर बना हुआ है। खरनाल के कांकड़ में खुदे समस्त तालाबों के नाम वीरतेजाजी महाराज के पूर्वजों पर ही है।

खरनाल गांव के बाहर की तरफ जौधपुर हाईवे पर लगभग 7-8 बीघा में मैला मैदान स्थित है। इसी मैदानमें सड़क से 50 मीटर की दूरी पर "सत्यवादी वीर तेजाजी महाराज" की 6-7 टन वजनी भव्य व विशाल लीलण असवारी प्रतीमा लगी हुई है।जिसका निर्माण स्व.रतनाराम जी धौलिया की चिरस्मृती में उनकी धर्मपत्नी कंवरीदेवी व सुपुत्रों द्वारा 2001 में करवाया गया।मैला मैदान में एक मंच बना हुआ है जहां पर तेजादशमी को विशाल धर्मसभा होती है।जिसमें देशभर के लाखों किसान जुटते हैं।

अभी वर्तमान में "अखिल भारतीय वीर तेजाजी महाराज जन्मस्थली संस्थान, खरनाल' द्वारा 2-3 बीघा जमीन और खरीदी गई है। जहां वीर तेजाजी महाराज का भव्य व आलिशान मंदिर बनाया जाना प्रस्तावित है।"अखिल भारतीय वीर तेजाजी महाराज जन्मस्थली संस्थान, खरनाल' के चुनाव हाल ही में सम्पन्न हुए हैं।इसके वर्तमान अध्यक्ष 'श्री सुखाराम जी खुड़खुड़िया' है तथा पूर्व अध्यक्ष 'श्री अर्जुनराम जी महरिया' थे।

वीर तेजाजी महाराज मुख्य मंदिर के सेवक "श्री मनोहर दास जी महाराज" है। वीर तेजाजी मंदिर, खरनालके गादिपती पर वर्तमीन में श्री दरियाव जी धौलिया आसीन है। जिनमें तेजाजी का भाव आता है। इनके अलावा औमप्रकाश जी धौलिया भी तेजाजी महाराज के 'घुड़ला' है। मंदिर के गर्भ गृह में वीर तेजाजी महाराज, लीलण सखी व गौमाता के बेहद सुंदर स्वर्ण लेपित धातुमूर्तियां विराजमान है। जिनकी सुबह शाम पूजा अर्चना होती है।

वैसे तो वर्षपर्यंत तेजाभक्त दर्शनार्थ खरनाल आते है मगर सावण भादवा माह में खरनाल धाम तेजाभक्तों से अटा रहता है। यहां तिल रखने की भी जगह नही मिलती। गांव गांव से डीजे पर नृत्य करते वीर तेजाजी महाराज के संघ मेले में चार चांद लगा देते है। बरसात की रिमझिम में तेजाभक्तों के जयकारे एक अलग ही माहौल बना देते है। भादवा शुक्ल नवमी की रात 'माता सती पेमल'को समर्पित होती है। उनके आशीष व अंतिम वाणी के आदेशानुसार नवमी की रात जगाई जाती है। अर्थात् नवमी को रातभर तेजाभक्त रात्री जागरण करते है। खरनाल गांव में रात्री जागरण का कार्यक्रम बेहद भव्य होता है। पहले वीर तेजल महाराज की पूजा अर्चना तत्पश्चात तेजा मंदिर दालान में विभिन्न गांवो से पधारे 'तेजागायकों' द्वारा रातभर टेरैं दी जाती है। झिरमीर बरसात के तेजागायन का लुत्फ उठाना एक अलग ही आनंद से सराबोर कर देता है।भादवा सुदी दशम को मुख्य मेले का आयोजन होता है। जिसमें देश प्रदेश से तेजाभक्त दर्शनार्थ उपस्थित होते है। दर्शनौं का यह क्रम रात तक चलता रहता है। शाम को मेला मैदान में धर्मसभा का आयोजन किया जाता है जिसमें सर्वसमाज के गणामान्य व्यक्ति अपना उद्धबोधन देते है।वीर तेजा दशमी को पूरे नागौर जिले के सरकारी प्रतिष्ठानों में जिला कलक्टर द्वारा राजकीय अवकाश घोषित किया जाता है। इस गांव के कण कण में देवात्मा वीर तेजाजी महाराज का सत व अमर आशीषें मौजूद है। बलवीर घिंटाला तेजाभक्त - मकराना नागौर+91-9024980515- संत कान्हाराम जी सुरसुरा धाम अजमेर+91-9460360907

Birth of Tejaji

Mother and father worshipped Shiva for birth of Tejaji

Tejaji is considered to be folk-deity and worshiped in entire Rajasthan, Uttar Pradesh, and Madhya Pradesh by all communities. Tejaji as a historical person was born on Bhadrapad Shukla Dashmi, dated 29 January 1074, in the family of Dhaulya gotra Jats. His father was Chaudhary Taharji (Thirraj), a chieftain of Kharnal in Nagaur district in Rajasthan. His mother's name was Sugna. Mother and father worshipped Shiva for birth of Tejaji, who took birth as a boon of Shiva. His aura was so strong that he was named Teja.

Genealogy of Tejaji

The Genealogy of Tejaji is as under: The primeval man of their ancestry was Mahābal, whose descendants were Bhīmsen, Pīlapunjar, Sārangdev, Shaktipāl, Rāmpāl, Dhawalpāl, Nayanpāl, Gharṣanpāl, Takkapāl, Mūlsen, Ratansen, Śuṇḍal, Kuṇḍal, Pippal, Udayarāj, Narpāl, Kāmrāj, Vohitrāj and Ṭhirarāj or Taharji. Taharji had six sons namely - Tejaji, Raṇaji, Guṇaji, Maheshji, Nagji, and Rūpji. He had two daughters namely - Rājal and Dūngari. Rājal was married. Rājal was married to Jogaji Siyag of village Tabījī (तबीजी). Rājal had become sati on the death of his brother Tejaji.

Tejaji Temples at Kharnal

There are four monuments in Kharnal village about Tejaji:

Tejaji Temple

Statues in Tejaji Temple

There is a big temple of Tejaji in Kharnal facing north direction. In the temple there is a brass statue of Tejaji with mukut and kalgi and a bhala in hand. On the left side there is a brass statue of a ghora decorated with chhevati. On right side is a statue of snake and a statue of Tejaji's sister Rajal or baghal. People of this village tell that the statue of Tejaji had come out of soil naturally. This statue is believed to be about 1000 year old.

Lilan Ghodi Temple

Ghodi Temple Kharnal

Out side the village there is a small temple of Tejaji at a distance of 1.5 km from big temple on the bank of talab. It is known as Ghodi temple where the Lilan ghodi of Tejaji reached and brought about the message of martyrdom of Tejaji. This temple is located in Dhawa johar, the water of which is used for drinking for villagers.

Rajal Temple

Rajal was sister of Tejaji, who became sati after the death of Tejaji. The message of Tejaji's death was brought by his ghodi Lilan. Temple of Rajal is situated at a distance of 1 km from village in the east direction. There is a statue of Rajal in this temple.

Tejaji Smarak

Tejaji Smarak is under construction on the main road near the village. A grand statue has been installed and rest of the works are in progress. Rs 50 lakhs were donated by Mrs Vasundhara Raje Sindhia, the Ex. C M of Rajasthan and Rs 50 Lakhs has been collected by donations from the public for the completion of this Tejaji Smarak.

How to reach Kharnal

Location of Kharnal in Nagaur District

Kharnal is situated at a distance of 15 km from Nagaur in the southwest direction on Nagaur - Jodhpur Road. One can reach from Nagaur or Jodhpur by road. Nearest railway station is also Nagaur.

Jat Gotras in the village

As of 2001 the population of village is 3819 out of which 1278 are SC people. It is the main village of Dhaulya Jats. There are four brances of Dhaulyas descendants of Hema, Dulha, Dhanna and Pipa. There are about 500 families out of them Jat Gotras are as under:

Other castes dwelling in the village are Muslims-Teli, Nayak, Balai, Luhar, Sunar, Brahman and Baniya. There is no Rajput. There are about 300 families of Harijans, one brahman , one sadh, 3 nai families. The pujari of Tejaji temple is Mansa Nath.

Kharnal village in Doda district

Kharnal is also a village in Doda district in Jammu and Kashmir.

See also

Reference

  • Mansukh Ranwa: Kshatriya Shiromani Vir Tejaji (क्षत्रिय शिरोमणि वीर तेजाजी), 2001

External link

Notable persons

  • नारायण सिंह मास्टर, खरनाल- मारवाड़ जाट कृषक सुधार सभा की प्रबंधकारिणी और कार्यकारिणी में रहकर आप ने जाट जाति की सेवा करके अपने को कृतार्थ किया है। [7]

Notes

  1. Mansukh Ranwa, Kshatriya Shiromani Veer Tejaji, 2001, p.13
  2. Jat Vikas Patrika, Jaipur, September 2008, p. 7
  3. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.62-63
  4. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.157-159
  5. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.157
  6. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.174-179
  7. Thakur Deshraj: Jat Jan Sewak, 1949, p.210

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