Vijay Singh Pathik

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Vijay Singh Pathik, from Ajmer, was a revolutionist, a leading Freedom Fighter who took part in Shekhawati farmers movement in Rajasthan. He participated in Bijaulia Kisan Satyagrah in Mewar, Rajasthan.

In Badhala Jat Sabha

Badhala village is in Palsana in Sikar districy. With the efforts of Thakur Deshraj a sabha of Rajasthan Jat Mahasabha took place at Badhala village. It was attended by famous revolutionist Vijay Singh Pathik, Baba Nrisingh Das, Chaudhary Laduram Gordhanpura. It was resolved in this meeting that –

  1. Jat Panchayats be established to prevent the excesses of Jagirdars,
  2. The sons of farmers be given education and fight with Jagirdars with the organizational support.
  3. Efforts are made for the economical, social and cultural development of farmers.
  4. The farmers are given the khatoni parcha after the settlements of their lands.

With these objectives ‘Shekhawati Kisan Jat Panchayat’ was established in 1931 in Jhunjhunu.

Bijolia Farmers movement

Bijolia was the main centre of farmers movement. In 1897 the farmers of Bijolia rose against the Mewar Jagirdar, who had imposed excessive taxes in addition to 84 kinds of Lag-bags. The farmers organized under the leadership of Swami Sita Ram Das. In 1916 Vijay Singh Pathik also joined the movement and with the cooperation of Swami Sitaram Das and Manikya Lal Verma farmers got victory in 1941. [1]

इतर जाट जन सेवक

ठाकुर देशराज[2] ने लिखा है ...श्री विजयसिंह जी पथिक: [पृ.534]: राजस्थान के आदि नेता बीएस पथिक को सभी


[पृ.535]: जानते हैं आपने सीकरवाटी जाट आंदोलन को व्यवस्थित रूप देने के लिए सीकर का दौरा किया और सकीमें बनाई तथा अखबारी प्रोपेगंडा करके मदद दी। आप राजस्थान के बेजोड़ और पुराने लीडर हैं।

बधाला की ढाणी में विशाल आमसभा

पीड़ित किसानों ने बधाला की ढाणी में विशाल आमसभा आयोजित की, जिसमें हजारों व्यक्ति सम्मिलित हुए. इनमें चौधरी घासीराम, पंडित ताड़केश्वर शर्मा, ख्यालीराम भामरवासी, नेतराम सिंह, ताराचंद झारोड़ा, इन्द्राजसिंह घरडाना, हरीसिंह पलथाना, पन्ने सिंह बाटड, लादूराम बिजारनिया, व्यंगटेश पारिक, रूड़ा राम पालडी सहित शेखावाटी के सभी जाने-माने कार्यकर्ता आये. मंच पर बिजोलिया किसान नेता विजय सिंह पथिक, ठाकुर देशराज, चौधरी रतन सिंह, सरदार हरलाल सिंह आदि थे. छोटी सी ढाणी में पूरा शेखावाटी अंचल समा गया. सभी वक्ताओं ने सीकर रावराजा और छोटे ठिकानेदारों द्वारा फैलाये जा रहे आतंक की आलोचना की. एक प्रस्ताव पारित किया गया कि दो सौ किसान जत्थे में जयपुर पैदल यात्रा करेंगे और जयपुर दरबार को ज्ञापन पेश करेंगे. तदानुसार जयपुर कौंसिल के प्रेसिडेंट सर जॉन बीचम को किसानों ने ज्ञापन पेश किया. (राजेन्द्र कसवा: p. 123)

इस बैठक में यह तय हुआ कि जागीरदारों की ज्यादतियां रोकने के लिए संघर्ष किया जाय. इस हेतु जाट पंचायतें स्थापित की जावें. किसानों के बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल खोले जावें. इसी उद्देश्य से 1931 में शेखावाटी किसान जाट पंचायत झुंझुनू में कायम हुई जिसका उद्देश्य किसानों की आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक उन्नति करना और किसानों की जमीन का बंदोबस्त करवा कर उनकी खतौनी पर्चे दिलवाना था. [3]

सीकर ठिकाने से किसानों का समझौता 23 अगस्त 1934

ठाकुर देशराज[4] ने लिखा है ....जनता को यह जानकर प्रसन्नता होगी कि सीकर के जाटों का आंदोलन अंत में प्रशंसनीय सफलता के साथ समाप्त हुआ है। किसानों की मांगों में से अधिकांश पूरी कर दी गई हैं। निशंदेह जमीन का लगान जो रखा गया है वह बहुत अधिक है और अनुचित अवश्य है तो भी सीनियर अफसर की सब इच्छाओं पर विश्वास करते हुए किसान आंदोलन समाप्त करने के लिए सहमत हो गए हैं। सब संबंधितों के साथ न्याय करने के लिए यह अवश्य ही कहना पड़ेगा कि किसानों की ओर से कुँवर रतन सिंह सभापति राजपूताना जाट महासभा भरतपुर, ठाकुर झम्मन सिंह एडवोकेट मंत्री अखिल भारतीय जाट महासभा, अजमेर के वी.एस. पथिक आदि और ठिकाने की ओर से कैप्टन वेब सीनियर ऑफिसर सीकर के सुप्रयास और बुद्धिमानी पूर्ण सुकृत्यों तथा निर्देश के बिना आंदोलन का, बिना एक भी दुर्घटना के, अंत और अनूठा समझोता होना असंभव था। मि. जोन्स वाइस प्रेसिडेंट स्टेट कौंसिल और मि. यंग आई जी पुलिस जयपुर तथा ब्रिटिश भारत प्रेस भी अपनी उस सहानुभूति के लिए जो कि उन्होंने पीड़ित किसानों के प्रति प्रगट की तथा उपरोक्त सफलता में जिसका कुछ कम भाग नहीं है यह सभी बधाई के पात्र हैं।

1934 में सीकर यज्ञ के बाद का आन्दोलन

वर्ष 1934 में सीकर में यज्ञ के सफल आयोजन से सीकर और दूसरे ठिकानेदार बौखला उठे थे. यज्ञ के बाद दस दिन तक अपनी तकलीफों का विश्लेषण किया. महायज्ञ के समय हाथी को भगवा देने तथा हाथी पर बैठकर सभापति का जुलुस न निकालने देने से जाट सीकर रावराजा से नाराज थे. उन्होंने वहीँ यज्ञ की समाप्ति के बाद एक तम्बू में बैठकर ठाकुर देशराज की अध्यक्षता में यह निर्णय लिया की अब किसानों व ठिकानेदारों के अधिकारों का खुलासा करने के लिए पहले सीकर ठिकाने के सवाल को ही उठाया जय तथा उसके बाद छोटे ठिकानेदारों द्वारा होने वाली मनमानियों का खात्मा हो तथा निरंतर बढ़ने वाला शोषण समाप्त हो. इसके लिए सीकर जाट किसान पंचायत की स्थापना की गयी. सीकर के प्रमुख लोगों को इसमें लिया गया और दफ्तरी काम के लिए तथा अन्य काम में अनुभव होने से ठाकुर देवसिंह बोचल्या को इसका जनरल सेक्रेटरी नियुक्त किया. ठाकुर देशराज ने इस पूरे काम की देखरेख तथा बाहरी लोकमत बनाने में प्रचार प्रसार का काम हाथ में लिया. [5]

References

  1. Dr. Raghavendra Singh Manohar:Rajasthan Ke Prachin Nagar Aur Kasbe, 2010,p. 149-150
  2. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.534-535
  3. Dr Pema Ram & Dr Vikramaditya Chaudhary: Jaton ki Gauravgatha, Rajasthani Granthagar, Jodhpur, 2008, p.288
  4. Thakur Deshraj: Jat Jan Sewak, 1949, p.272-273
  5. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.90

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