Shekhawati Kisan Andolan

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Author of this article is Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क
13 मई 1952 को जागीरदारों की गोलियों से शहीद हुए करणीराम मील (1914-1952) और रामदेवसिंह गिल (1922-1952) की विद्यार्थी भवन झुंझुनू में स्थित मूर्तियाँ
शेखावाटी किसान आन्दोलन के नेता : बाएं से बैठे हुए-हरी सिंह बुरड़क पलथाना (1884-1966), पृथ्वीसिंह भूकर गोठड़ा (1902-1938), ईश्वरसिंह भामू भैरूपुरा (1885-d.?) एवं अन्य
सरदार हरलाल सिंह शेखावाटी किसान आन्दोलन के सहयोगियों के साथ

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Brief abstract

This article is about Shekhawati farmers movement in Shekhawati region of Rajasthan which was at its peak in the 1930s. Shekhawati encompasses the administrative districts of Jhunjhunu and Sikar. The early phase of the Shekhawati movement was primarily devoted to instituting social reforms within the community. This area was particularly influenced by Arya Samaj. During the 1920's and 30's several educational societies began to contribute to the support of schools for Jat students and Jat reformers from the British Provinces started to direct their attention and action towards the activities of various Thikanas of Shekhawati. A number of Jat Panchayats and Kisan Sabhas were formed in the villages administered by various Thikanadars and bigger Jagirdars. With the passage of time, the Jats of Shekhawati, with outside support of community leaders, rose against the Jagirdars. The Shekhawati farmers movement was considered by the British media as one of the best organized and effective movements in this part of the country. The movement ultimately led not only to abolition of Jagirs and exploitation of farmers but also paved way for extraordinary social and economical uplift of the farmers of this region.

शेखावाटी का नामकरण और विस्तार

शेखावाटी का नाम अति प्राचीन नहीं है. वि.सं. 1502 (1445 ई.) में शेखा ने इस इलाके को जीत कर एक छोटे से राज्य की स्थापना की. शेखा के वंशज शेखावत कहलाये, जिन्होंने सीकरवाटी व झुंझनुवाटी पर अधिकार कर एक विस्तृत राज्य स्थापित किया, जो शेखावाटी नाम से प्रसिद्ध हुआ. आमेर राजा उदयकरण (1367 -1389 ) का पुत्र बाला शेखावत वंश का आदि पुरुष था. उसे बरवाड़ा सहित 12 गाँव जागीर में मिले थे. 1430 में बाला की मृत्यु के बाद उसका बड़ा पुत्र मोकल उसका उत्तराधिकारी हुआ. मोकल बरवाड़े से खासौदा जाति के जाट 'अमरा की ढाणी' में जा बसा. ढाणी को अमरसर गाँव का स्वरुप देकर निकटवर्ती नाण गाँव को भी उन्होंने अपने अधिकार में कर लिया. 1445 में मोकल की मृत्यु के बाद उसका 12 वर्षीय पुत्र शेख अमरसर की गद्दी पर बैठा. यह माना जाता है कि शेख एक मुसलमान फकीर शेख बुरहान के आशीर्वाद से पैदा हुआ था. शेखा से पहले इस इलाके में चौहानों की सत्ता थी. 12 वीं शताब्दी के अंत में चौहान राज्य की समाप्ति के समय चौहानवंश में अनेक जाट वंश भी सम्मिलित थे जो भौमियाचारा पद्धति से इस क्षेत्र में शासन करते थे. [1]

राजस्थान के झुंझुनू और सीकर जिले पूर्णतया शेखावाटी अंचल में आते हैं. शेखावाटी क्षेत्र पूर्व जयपुर राज्य के उत्तर में 27°.20' और 28°.34' उत्तर अक्षांश व 74°.41' और 76°.06' पूर्व देशांतर के मध्य स्थित था. इस प्रदेश का कुल क्षेत्रफल 13784 वर्गकिमी था जिसमें सीकर, झुंझुनू, खेतड़ी, फतेहपुर, नवलगढ़, उदयपुर, लक्ष्मणगढ़, मंडावा, रामगढ़ आदि मुख्य नगर थे. इस जमीन में मोठ, बाजरा, ग्वार, मूंग, तिल आदि की एक वरसाती फसल पैदा होती थी. पीने के पानी का अभावा था. वर्षा बहुत कम होती थी. औसत तीन वर्ष में एक बार अकाल की स्थिति बनी रहती थी. किसान खेती के अलावा पशुपालन भी करते थे. प्राकृतिक उपज में खेजड़ा, झाड़ी, कूंचा, फोग, खीम्प आदि होते थे. (डॉ पेमाराम, p.1)

शेखावाटी में शेखावतों के विभिन्न ठिकाने अथवा पाने थे. इसके अंतर्गत सीकरवाटी, झुंझुनवाटी, सिंघानावाटी, खेतड़ी, खंडेलावाटी, उदयपुरवाटी, नरहड़वाटी आदि जागीरें थी. सीकर और खेतड़ी इनमें सबसे बड़ी और अधिकार प्राप्त इस्टेट थीं. खेतड़ी इस्टेट बड़ी थी. यहाँ का शासक राजा कहलाता था. बाकी के जागीरदार, ठिकानेदार, ठाकुर अथवा भौमिया कहलाते थे.

बीसवीं सदी के आरंभ में सीकर बड़ा ठिकाना था. यहाँ का जागीरदार रावराजा कहलाता था. सीकर के अधीन निम्न छोटे ठिकाने थे - खाचरियावास, खाटू, श्यामगढ़, सरबड़ी, बठोट, पटोदा, मुण्डक, खण्डेला, ठीकरिया बावड़ी, कुचेरा, कोछोर, खूड और दांता आदि. झुंझुनूं निजामत था और शेखावतों के प्रथम पुरुष शार्दूलसिंह शेखावत ने यह जागीर ली थी. बाद में यह जागीर पंचपानों में विभक्त हो गयी.

बीसवीं सदी के आरंभ में झुंझुनू में निम्न ठिकाने थे - अडूका, अलसीसर, इन्द्रपुरा, इस्माइलपुर, उदयपुरवाटी, उदावास, ओजटू, काली पहाड़ी, किशोरपुरा, कुमावास, कुहाड़, कोलिण्डा, खिरोड़, खेतड़ी, ख्याली, गांगियासर, गुडा, गुढा , गोठड़ा, घोडीवारा, चंवरा, चनाना, चला, चिंचडोली, चिराना, चौकड़ी, छऊ, छापोली, जाखल, झाझ, झाझड, टाई, डाबड़ी, डूण्डलोद, डूमरा, ढूंढार, तोगडा, दीपपूरा, दौरासर, धमोरा, नंगली, नवलगढ़, नांगल, निराधनू, नेवरी, पचलांगी, पचेरी, पटोदा, परसरामपुरा, पौंख, बगड़, बडाऊ, बदनगढ़, बलरिया, बलौन्दा, बागोरा, बिसाऊ, भुकानां, भोजनगर, भोडकी, मण्ड्रेला, मंडावरा, मंडावा, मलसीसर, महनसर, मुकुंदगढ़, मोजास, रसूलपुरा, लुटू, सराय, सिरोही, सीगडा, सुलताना, सूरजगढ़, सूरपुरा, सेफरागुवार, हीरवा,


टाई से कुछ ठाकुर लुटू गाँव बस गए थे तो लुटू भी एक ठिकाना हो गया. कोलिण्डा गाँव में ठाकुरों के दो गढ़ थे. इनमें कई इतने छोटे ठिकाने थे की ठाकुर का खर्चा भी पूरा नहीं होता था. कुछ ठिकानेदार इतने अलसी थे कि लगान वसूल करना उनको भारी लगता था और वे अपना ठिकाना किसी दूसरे राजपूत को दे देते थे. वह अपना हिस्सा रख कर असली ठाकुर लो लगाम की रकम दे देता था. ऐसे ठिकानों में अत्याचार और शोषण सबसे अधिक था. [2]

शेखावाटी किसान आन्दोलन के उत्प्रेरक तत्व

दीर्घकाल से सुषुप्त पडी हुई शेखावाटी की स्वाभाविक किसान शक्ति, जो सामंती व्यवस्था के अंतर्गत आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक बदहाली व शोषण का शिकार हो रही थी, में कुछ प्रेरक शक्तियों का समावेश हुआ. ये उत्प्रेरक तत्व मूलत: बाहरी थे, जिनका संसर्ग स्थानीय शक्तियों से हुआ और एक महान आन्दोलन का मार्ग प्रशस्त हुआ. आर्य समाज और समाचार पत्र जागृति के अग्रदूत बने. इस आन्दोलन ने एक बड़े भू-भाग की आबादी का जीवन परिवर्तन करने में अहम् भूमिका निभाई और एक नई व्यवस्था को जन्म दिया. यह आन्दोलन मुख्य रूप से जागीरदारों की स्वेच्छाचारिता और शोषण के विरुद्ध था. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 9)

सैनिकों का योगदान - शेखावाटी की देहाती प्रजा का बाहरी दुनिया से पहला संसर्ग यहाँ के किसान पुत्रों का ब्रिटिश सेना में भर्ती होने के कारण हुआ. प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1919 ) में इस इलाके से 14 हजार जवान सेना में भर्ती हुए, जिनमें से 2000 व्यक्तियों ने अपने प्राण दिए. यह तथ्य निजामत भवन झुंझुनू के मुख्य द्वार पर अंकित है. युद्ध की समाप्ति पर जब ये सैनिक वापस अपने वतन को लौटे तो वे अपने साथ एक नई विचारधारा और आत्मसम्मान का भाव लेकर लौटे. उनका शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ गया था और उन्होंने अपने बच्चों को कस्बों में चल रही पाठशालाओं में प्रवेश दिलाया. ब्रिटिश सेना के पेंशनधारी सैनिक होने से इनकी समाज में भी साख बन गयी. छोटे-छोटे जागीरदार इन सैनिकों से घबराने लगे. आगे चलकर इन सैनिकों व फौजी अफसरों ने शिक्षा, समाज-सेवा व जातीय संगठनों में बढ़-चढ़ कर भाग लिया. इस कारण शोषण से दबे कुचले किसानों में एक नव स्फूर्ति और चेतना आई. [3]

गांधीजी का भिवानी आगमन सन् 1921 - शेखावाटी में किसान आन्दोलन और जनजागरण के बीज गांधीजी ने सन 1921 में बोये. सन् 1921 में गांधीजी का आगमन भिवानी हुआ. इसका समाचार सेठ देवीबक्स सर्राफ को आ चुका था. सेठ देवीबक्स सर्राफ शेखावाटी जनजागरण के अग्रदूत थे. आप शेखावाटी के वैश्यों में प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने ठिकानेदारों के विरुद्ध आवाज उठाई. देवीबक्स सर्राफ ने शेखावाटी के अग्रणी किसान नेताओं को भिवानी जाने के लिए तैयार किया. भिवानी जाने वाले शेखावाटी के जत्थे में प्रमुख व्यक्ति थे -

झुंझुनूवाटी से रामेश्वर रामगढ़िया, रामसिंह कुंवरपुरा, गोविन्दराम हनुमानपुरा, चिमनाराम और भूदाराम (दोनों सगे भी) सांगसी, पंडित ताड़केश्वर शर्मा पचेरी, गुरुमुखसिंह सांई दौलतपुरा, इन्द्राजसिंह घरडाना, लादूराम किसारी, चैनाराम हनुमानपुरा, मामराज सिंह इन्दाली, नेतरामसिंह गौरीर, पन्ने सिंह देवरोड़, घासीराम खरिया, हरलालसिंह हनुमानपुरा, भैरूंसिंह तोगडा, आदि प्रमुख रूप से सम्मिलित हुए. (राजेन्द्र कसवा, p. 70)

खंडेलावाटी और सीकरवाटी के हरबक्स गढ़वाल, रामबक्स गोठडा भुकरान , हरीसिंह पलथाना, पन्ने सिंह बाटड़ानाऊ, मेवाराम फगेडिया, कालूराम सुंडा और गणेशराम महरिया कूदन लादूराम जोशी आदि के साथ काफी युवक भी गए थे. (राजेन्द्र कसवा, p. 70)

यही किसान बाद में शेखावाटी अंचल में चलने वाले जन आन्दोलन के अगुआ बने. भिवानी में पंजाब, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से प्रमुख आर्य समाजी और जन नेताओं से शेखावाटी के इन लोगों ने संपर्क किया और अपनी समस्याएं रखी.

आर्य समाज का प्रभाव - इस समय तक आर्य समाज संस्थापित हो चुका था. समाज सुधार का क्रांतिकारी कार्यक्रम लेकर आर्य समाज शहरी क्षेत्रों से होता हुआ ग्रामीण क्षेत्र में प्रविष्ट हुआ. शेखावाटी में सर्वप्रथम रामगढ़ में छोटे से रूप में आर्यसमाज की गतिविधियाँ प्रारंभ हुई. आगे चलकर सेठ देवीबक्स सर्राफ के प्रयत्नों से आर्यसमाज की बड़े स्तर पर गतिविधियाँ मंडावा में शुरू हुई. शहर के लोग इस और उन्मुख नहीं थे अतः देवीबक्स ने बाहरी क्षेत्रों से संपर्क साधा. देहात के लोग बड़ी संख्या में आर्यसमाज की और उन्मुख हुए और इसके सिद्धांतों को खुलकर अपनाया. प्रारंभ में हरलाल सिंह ने आर्यसमाज द्वारा आरंभ किये हुए कार्यों को आगे बढ़ाने, सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध प्रचार करने, किसानों को संगठित करने एवं शिक्षा प्रचार में लगे रहे. चौधरी गोविन्दराम एवं सेठ देवीबक्स की प्रेरणा से हरलाल सिंह ने आर्यसमाज के सिद्धांतों का गाँवों में जोरशोर से प्रचार किया. अनेक रूढ़ियों से ग्रसित हिन्दू समाज को आर्यसमाज ने उन्नति की एक नई दिशा दी. शेखावाटी के जन-आन्दोलन में आर्यसमाज के भजनोपदेशकों का बड़ा योगदान रहा. मंडावा के आर्यसमाज का सन 1927 में विशाल समारोह हुआ जिसमें युवक हरलाल सिंह झंडा लिए हुए जुलुस के आगे-आगे चल रहे थे. वे सेठ देवीबक्स सर्राफ और चौधरी गोविन्द राम के आर्यसमाज के रंग में रंग गए थे. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 18)

सांगासी में बैठक वर्ष 1921 - राजेन्द्र कसवा (P. 95) लिखते हैं कि सन् 1921 में शेखावाटी से भिवानी गया जत्था जब लौटा तो वह नई ऊर्जा से भरा था. गांधीजी से मिलने और अन्य संघर्षशील जनता को देखने के बाद, किसान नेताओं में स्वाभाविक उत्साह बढ़ा . सन् 1921 में चिमना राम ने सांगासी गाँव में अपने घर अगुआ किसानों की एक बैठक बुलाई. इस प्रथम बैठक में चिमनाराम और भूदाराम दोनों भईयों के अतिरिक्त हरलाल सिंह, गोविन्दराम, रामसिंह कंवरपुरा, लादूराम किसारी, लालाराम पूनिया आदि सम्मिलित हुए. पन्ने सिंह देवरोड़ और चौधरी घासीराम इस बैठक में नहीं पहुँच सके थे लेकिन आन्दोलन करने के लिए सबका समर्थन और सहयोग था. इस बैठक में निम्न निर्णय लिए गए:

  • बेटे-बेटियों को सामान रूप से शिक्षा दिलाना
  • रूढ़ियों, पाखंडों, जादू-टोना, अंध विश्वासों का परित्याग करना और मूर्तिपूजा को बंद करना
  • मृत्युभोज पर रोक लगाना
  • शराब, मांस और तम्बाकू का परित्याग करना
  • पर्दा-पर्था को समाप्त करना
  • बाल-विवाह एवं दहेज़ बंद करना
  • फिजूल खर्च एवं धन प्रदर्शन पर रोक लगाना

इस बैठक के बाद भूदाराम में सामाजिक जागरण का एक भूत सवार हो गया था. वे घूम-घूम कर आर्य समाज का प्रचार करने लगे. अप्रकट रूप से ठिकानेदारों के विरुद्ध किसानों को लामबंद भी करने लगे. विद्याधर कुल्हरी ने अपने इस बाबा भूदाराम के लिए लिखा है कि, 'वह नंगे सर रहता था. हाथ में लोहे का भाला होता. लालाराम पूनिया अंगरक्षक के रूप में साथ रहता था. [4]

बगड़ में सभा 1922 - गाँवों में प्रचार करने के पश्चात 1922 में भूदाराम, रामसिंह, गोविन्दराम आदि ने बगड़ में एक सार्वजनिक सभा करने की योजना बनाई. गाँवों में इसका प्रचार होने लगा. ठाकुरों के कान खड़े हो गए. शांति भंग होने के नाम पर ठाकुरों ने इनको गिरफ्तार करवा दिया और सभा टल गयी. पुलिस ने नाजिम झुंझुनू के समक्ष पेश किया. गोविन्दराम ने जवाब दिया - 'हम अपनी जाति में सुधार के लिए प्रचार कर रहे हैं. हमें यह हक है. हम सरकार के विरुद्ध कुछ नहीं कह रहे हैं.' नाजिम इस जवाब से प्रभावित हुआ और उसने सबको रिहा कर दिया. अब तो किसान नेताओं का हौसला बढ़ गया. वे पुन: बगड़ में ही सभा करने के लिए जुट गए. जागीरदारों ने बगड़ कसबे में आतंक और भय फैला दिया. ठाकुरों ने हुक्म फ़रमाया, 'सभा के लिए स्थान देना तो अपराध होगा ही, जो व्यक्ति सभा में भाग लेगा, उस पर जुर्माना किया जायेगा.'आम जन भयभीत हो गया. कोई भी सभा के लिए स्थान देने को तैयार नहीं हुआ. आखिर , बगड़ का पठान अमीर खां आगे आया. उसने अपने गढ़ में सार्वजनिक सभा करने की अनुमति दे दी. गढ़ में एक बड़ा हाल था. इसमें पांचसौ से अधिक व्यक्ति बैठ सकते थे. आसपास के गाँवों के प्रमुख किसान बगड़ पहुंचे. भूदाराम के साहस के कारण उन्हें राजा की पदवी दी गयी. समाज को संगठित होने और सामंती जुल्मों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने का आव्हान किया गया. प्रकट में भविष में भी होने वाली सभाओं को समाज सुधार की सभाएं कहने का निश्चय किया. अंग्रेज अधिकारीयों को भी इससे कोई परेशानी नहीं थी. (राजेन्द्र कसवा, p. 96-97)

कर्मठ समाजसेवियों से संसर्ग - सौभाग्य से शेखावाटी में उत्तरप्रदेश से कुछ कर्मठ व्यक्ति भी समाज सुधार, जनचेतना, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत थे. इनमें डॉ. गुलजारी लाल एवं मास्टर प्यारेलाल गुप्ता थे. डॉ गुलजारीलाल उत्तरप्रदेश में जहांगीराबाद के रहने वाले थे. वे पेशे से डाक्टर और जन्मजात क्रांतिकारी थे. इनके छोटे भाई डॉ गोविन्दराम नवलगढ़ तथा डॉ श्यामलाल मंडावा में कार्यरत थे. डॉ गुलजारीलाल बम बनाना जानते थे तथा लोगों को बम बनाने का प्रशिक्षण भी देते थे. मास्टर प्यारेलाल गुप्ता बड़े जीवट और निडर व्यक्ति थे. वे स्वामी सत्यदेव परिव्राजक के उपदेशों से प्रभावित होकर सन 1921 में राज्य-सेवा छोड़कर नैनीताल से शेखावाटी के चिड़ावा कस्बे में आ गए थे. अब यही उनकी कर्मस्थली थी. वे यहाँ हाईस्कूल में अध्यापक बन गए. उन्होंने अमर सेवा समिति नामक संस्था खड़ी की और उसकी आड़ में जनजागृति कार्य करने लगे. इस संस्था के सदस्य अर्धसैनिक बन चके थे. आगे चलकर वास्तविक बात उजागार होने पर मास्टर प्यारेलाल और उनके साथियों पर खेतड़ी के जागीरदार अमरसिंह ने अकथनीय अत्याचार किये. उन्हें घोड़ों के पीछे बांध कर घसीटा गया और इसी अवस्था में मारते-पीटते 30 मील दूर लेजाकर खेतड़ी जेल में बंद कर दिया. शेखावाटी के किसी भी शासक द्वारा किये गए अमानुषिक अत्याचार की यह पहली घटना थी. 23 दिनों तक लगातार दी गयी यातनाओं के पश्चात् भारी दवाब के सम्मुख झुककर अमर सिंह ने इन्हें जेल से रिहा किया. गुप्ताजी जेल से छुटकर झुंझुनू आगये और यहाँ हरिजनोद्धार कार्यक्रम चलाने लगे. वे शेखावाटी के विभिन्न क्षेत्रों में निरंतर कार्यरत रहे.(डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 19)

मास्टर प्यारेलाल गुप्ता ने कर्मनिष्ठ अध्यापकों का एक ऐसा समूह खड़ा कर दिया जो स्वतंत्रता की भावना से पूरी तरह ओतप्रोत थे. इसी प्रकार के व्यक्ति मास्टर चंद्रभान थे, वे मेरठ जिले के बामडोली ग्राम के निवासी थे. ये राष्ट्रीय विचारों के युवक थे. सन् 1925 में सरदार हरलाल सिंह के गाँव हनुमानपुरा में पाठशाला खोली तब उसका भार इन्हीं को सौंपा. वे शिक्षा के साथ आर्य समाज के सिद्धांतों का भी प्रचार करते थे. जनजागृति करना उनका प्रथम कार्य था. वे सीकर प्रजापति महायज्ञ में स्वागत समिति के सचिव भी थे. आगे चलकर ये जाट पंचायत के सचिव बने. सीकर ठिकाने ने इन्हें गिरफ्तार कर खूब यातनाएं दी. शिक्षा प्रचार उनका मूल मन्त्र रहा. उन्होंने खादी आश्रम भी स्थापित किया था. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 20)

अमर सेवा समिति का गठन - बगड़ के निकट चिड़ावा में कसबे के प्रबुद्ध लोगों ने अमर सेवा समिति का गठन किया था. मास्टर प्यारेलाल गुप्ता एवं गुलाबचंद नेमानी नेतृत्व देने वाले थे. खेतड़ी केजागीरदार मरसिंह के नाम पर अमर सेवा समिति का नाम रखा था. मास्टर प्यारे लाल गुप्ता राष्ट्रीय भावनाओं को समझ रहे थे और यहाँ के लोगों को समझा रहे थे. उन्हें चिड़ावा का गाँधी कहा जाता था. अमर सेवा समिति का मुख्य कार्य कुरीतियों और रूढ़ियों को ख़त्म करना था. समिति के सदस्य चरखा चलाते थे. खादी पहनने और इसके लिए अन्यों को प्रेरित करते थे. समिति सदस्यों में आत्म-सम्मान बहुत था. वे बेगार प्रथा के विरोधी थे. एकबार खेतड़ी नरेश सन 1922 में चिड़ावा दौरे पर आये. चिड़ावा में जागीरदार का विश्राम था. कैम्प की सेवा के लिए लोगों को बुलाया जाने लगा. एक दिन रामेश्वर नई को उनकी सेवा में बुलाया गया. उसने स्पष्ट रूप से बेगा देने के लिए मना कर दिया. दरबारियों में खलबली मच गयी. उन्होंने नमक-मिर्च लगा कर जागीरदार के कान भरे , 'यह सब अमर सेवा समिति का काम है. समिति आपके विरुद्ध लोगों को भड़कती है.' जागीरदार को मिर्ची लगी. अमरसिंह ने कारिंदों को हुक्म दिया, 'सभी प्रमुख समिति सदस्यों को पकड़ लाओ और मजा चखाओ.' समिति के सात सदस्य पकडे गए थे - मास्टर प्यारेलाल गुप्ता, गुलाबचंद नेमानी, हरिराम मिश्रा, गजानंद पटवारी, धर्मकिशोर श्रीवास्तव, हरदेव दर्जी और हुक्माराम खाती. प्रजा के सामने इनकी पिटाई की गयी. इतना ही काफी नहीं था. सभी के हाथ बांध दिए गए. रात को ही अमरसिंह खेतड़ी के लिए रवाना हो गए. घुडसवार सातों को घसीटते हुए खेतड़ी ले चले. रास्ते में गुलाबचंद नेमानी गंभीर रूप से घायल हो गए. रातोंरात खेतड़ी लेजाकर जेल में बंद कर दिया. शेखावाटी अंचल में सामंतों द्वारा की गयी यह प्रथम क्रूर घटना थी. चिड़ावा में अमर सेवा समिति की घटना के बाद भय का मुकाबला करने के लिए लोग घरों में नहीं दुबके. किसानों के जत्थे के जत्थे खेतड़ी की और कूच करने लगे . सेठ जमनालाल बजाज, घनश्याम बिडला और सेठ बेणी प्रसाद डालमिया ने खेतड़ी जागीरदार को कड़े पत्र लिखे. बजाज और बिड़ला गांधीजी के निकट सहयोगी थे और जयपुर महाराजा से अच्छे सम्बन्ध थे. भारी दवाब के बीच 23 दिन पश्चात् अमरसिंह ने सभी व्यक्तियों को छोड़ दिया. (राजेन्द्र कसवा, p. 96-98)

प्रवासी सेठों द्वारा स्कूल खोलने का अभियान - इस घटना के पश्चात् प्रवासी सेठों ने गाँवों में स्कूलें खोलने का अभियान सा शुरू कर दिया. ध्येय था कि जाटों को शिक्षित करके संघर्ष के लिए तैयार किया जावे. इस घटना के पश्चात् कस्बों में भी जागीरदारों के विरुद्ध आक्रोस फ़ैल गया. अब परिवर्तन आन्दोलन किसानों तक ही सीमित नहीं रहा. जाट बहु संख्यक थे और सबसे अधिक पीड़ित भी. समाज में एक सर्वसम्मत विचार बना कि जाटों को इस आन्दोलन में आगे किया जावे. उन्हीं के नाम से संस्थाएं बनने लगी. बेशक सहयोग सभी जातियों का था. चिड़ावा में अमर सेवा समिति के सदस्यों पर जुल्म हुए, उनसे पूरा शेखावाटी कांप उठा. (राजेन्द्र कसवा, p. 98)

बीसवीं सदी के तीसरे दशक में गांधीजी के नाम का जादू चलने लगा था. प्रवासी सेठों का उनसे संपर्क था. कलकत्ता और बंबई में मारवाड़ी रिलीफ सोसायटी ने सामाजिक कार्यों में आगे बढ़कर सहयोग दिया. इसी दौर में प्रवासी सेठों ने शेखावाटी अंचल में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति ला दी. ऐसे सेठों में सुमार थे पिलानी के बिडला, लोयालका, मुकुंगढ़ के भागीरथ कनोडिया, सीकर के सोढानी, रामेश्वर टांटिया, बिसाऊ के जटिया, नवलगढ़ के पोद्दार, शेकसरिया और जयपुरिया, बगड़ के रूंगटा, पीरामल, चिड़ावा के डालमिया शेकसरिया, डूंडलोद के गोयनका, चूड़ी अजीतगढ़ के नेमानी, मलसीसर के झुनझुनवाला, रामगढ़ के तोदी, फतेहपुर के चमडिया, लक्ष्मणगढ़ के रूईया, चूरू के बागला-लोहिया, राजगढ़ के मोहता आदि. (राजेन्द्र कसवा, p. 103)

किसानों पर अत्याचार

राजस्थान में भूमि का तीन-चौथाई से अधिक भाग जागीरदारों के पास था और खालसा भूमि सिकुड़करबहुत थोड़ी रह गयी थी. ये जागीरदार अपने क्षेत्र में पूरे स्वतंत्र थे. वे राजस्व के अतिरिक्त अनेक तरह की लाग-बाग़ वसूल करते थे. उनसे समय-समय पर बेगार लेते थे. दूसरे कार्य बिना पैसे के करवाते थे. जब फसल पैदा होती तो जागीरदार के आदमी खलिहान पर जा बैठते, कर एवं लाग-बाग़ के नाम से अधिकांश अनाज उठा ले जाते थे. किसान के पास इतना भी नहीं बचाता था की वह वर्ष भर परिवार का भरण-पोषण करे. इसके अतिरिक्त किसान अनेक दूसरे अत्याचारों से भी पीड़ित थे. वह ठाकुर के सामने खाट पर नहीं बैठ सकता था, उसकी स्त्री सोने-चांदी के गहने नहीं पहन सकती थी, शादी के समय वर घोड़े पर नहीं चढ़ सकता था, नाम के आगे सिंह नहीं लगा सकता था, छोटे नाम से पुकारा जाता था आदि आदि. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया, पृ. 27)


शेखावाटी के किसानों की बदहालात चरम पर पहुँच चुकी थी. ठिकानेदार और जागीरदार भूराजस्व के अलावा 80 प्रकार के टैक्स वसूल कर किसानों की कमर तोड़ देते थे. जबरदस्ती लादे गए इन करों को लाग-बाग़ की संज्ञा दी गयी थी. लाग-बाग़ में मलवा, खुंटाबंदी, पानचराई, खूट ग्वार का लादा, कड़वी का लादा, कारेड़ का लादा, हलवेठिया, पालड़ा मेख, न्यौता, कारज खर्च, बाईजी का हाथलेवा, कुंवर-कलेवा, लिखिवा की लाग, जाजम खर्च, ढोलबाग, धुंआ बांछ, हरी, हरी का ब्याज, कांसा लाग, नातालाग, मदे की लाग, चड़स की लाग, श्रीजी की लाग, भगवद की लाग, सहने की लाग, पटवारी की लाग, बलाई की लाग, कोटड़ी खर्च, नाई की लाग, धानकी धोबी तथा कोली की लाग आदि उल्लेखनीय हैं. सीकर के ठिकानेदार द्वारा तो एक साल हरिद्वार स्नान का खर्च भी किसानों से वसूला गया था. नई-नई मोटर गाड़ियों तथा घोड़ा गाड़ियों की कीमत तो प्राय: किसानों से ही वसूल की जाती थी. बिजली व मोटरों के रख-रखाव का व्यय भी किसानों से वसूला जाता था.

उस समय शेखावाटी के किसानों की पशुवत हालत को जान कर रोंगटे खड़े हो जाते थे. कुछ चंद ठिकानेदारों की सुविधा और मनोविनोद के लिए भेंट चढ़ाना लाजमी था. किसान अपने पुत्र-पुत्रियों के नाम के आगे सिंह नहीं लगा सकते थे. किसान सामंत वर्ग के सामने खाट पर नहीं बैठ सकता था. हाथी या घोड़े की सवारी वर्जित थी. गाँव में आने वाले दुल्हों को पहले जागीरदार को भेंट देना अनिवार्य था.

किसानों पर अत्याचार के कुछ उदहारण नीचे दिए गए हैं:

  • सन 1922 में रावराजा माधोसिंह की मृत्यु हो गयी. उसने कल्याण सिंह को गोद लिया जो अशिक्षित थे और 36 वर्ष की उम्र में रावराजा बने. उसने जागीर सँभालते ही किसानों को झटका दिया. स्वर्गीय रावराजा के दाह संस्कार, मृत्युभोज आदि पर भारी खर्च के बहाने किसानों पर अधिक कर लगा दिए.
  • सन 1923 में उपज कम हुई फिर भी लगान में कोई कमी नहीं रखी. पनलावा, कुर्ली, रसीदपुरा, आकवा आदि के किसानों ने बढे हुए लगान को चुकाने में असमर्थता प्रकट की. रावराजा के कारिंदों ने किसानों पर अत्याचार किये और अराजकता फैलाई.
  • 1924 में ठिकाने के चौधरियों अथवा लटारों द्वारा खड़ी फसल को अधिक कून्ता गया. विरोध करने पर अनेक गाँवों में किसानों को गिरफ्तार किया गया और उन्हें यातनाएं दी गयी. उनकी उपज को कुर्क किया गया. इससे किसानों में भरी असंतोष पैदा हो गया.
  • 1925 में रावराजा और किसानों के बीच अविश्वास और असंतोष इतना बढ़ गया कि किसानों का एक प्रतिनिधि मण्डल जयपुर दरबार तक पहुँच गया. रावराजा पर किसानों ने इतना दवाब बनाया कि कुछ बिन्दुओं पर समझौता किया गया और आंशिक तौर पर किसानों को राहत दी गयी.
  • अप्रेल 1925 में खंडेलावाटी बडापाना के कर्मचारियों ने ढाणी गंगाराम वाली पर हमला कर उसे लूट लिया और किसानों को पीटा गया. जगह-जगह असंतोष और अराजकता फैलने पर जनवरी 1926 में पुलिस अधीक्षक शेखावाटी ने जयपुर दरबार को रिपोर्ट भेजी कि शेखावाटी के किसानों में जागृति आई है. किसान गलत आदेशों का विरोध करने लगे हैं. ठिकानेदारों के बारे में लिखा गया कि वे मनमानी करते हैं और लाग-बाग़ वसूलने के लिए निर्दयता से पिटाई करते हैं.
  • फ़रवरी 1926 में पश्चिमी डिविजन के दीवान ने रेवेन्यु मेंबर, स्टेटकाउन्सिल जयपुर को एक रिपोर्ट भेजी जिसमें निष्कर्ष निकला गया कि पहले भूमि का लगान दो आने से आठ आने प्रति बीघा था. लेकिन पिछले 25 वर्षों में ठिकाने ने लगान दो रुपये आठ आने प्रति बीघा बढा दिया है. लगान के अलावा जो लाग-बाग़ ठाकुर लेते हैं, वह क्रूर मनमानी का उदहारण है. इसकी कोइ रशीद नहीं देते हैं. (राजेन्द्र कसवा, p. 106-7)

जाट महासभा का पुष्कर में जलसा सन् 1925

महाराजा कृष्णसिंह

सर्वप्रथम सन् 1925 में अखिल भारतीय जाट महासभा ने राजस्थान में दस्तक दी और अजमेर के निकट पुष्कर में अखिल भारतीय जाट महासभा का जलसा हुआ. इसकी अध्यक्षता भरतपुर महाराजा कृष्णसिंह ने की. इस अवसर पर जाट रियासतों के मंत्री, पंडित मदन मोहन मालवीय, पंजाब के सर छोटूरामसेठ छज्जू राम भी पुष्कर आये. इस क्षेत्र के जाटों पर इस जलसे का चमत्कारिक प्रभाव पड़ा और उन्होंने अनुभव किया कि वे दीन हीन नहीं हैं. बल्कि एक बहादुर कौम हैं, जिसने ज़माने को कई बार बदला है. भरतपुर की जाट महासभा को देखकर उनमें नई चेतना व जागृति का संचार हुआ और कुछ कर गुजरने की भावना तेज हो गयी. यह जलसा अजमेर - मेरवाडा के मास्टर भजनलाल बिजारनिया की प्रेरणा से हुआ था. शेखावाटी के हर कौने से जाट इस जलसे में भाग लेने हेतु केसरिया बाना पहनकर पहुंचे, जिनमें चिमनाराम सांगसी, भूदाराम सांगसी, सरदार हरलाल सिंह, चौधरी घासीराम, पृथ्वीसिंह गोठडा, पन्नेसिंह बाटड़, हरीसिंह पलथाना, गोरुसिंह, ईश्वरसिंह, चौधरी गोविन्दराम, पन्ने सिंह देवरोड़, रामसिंह बख्तावरपुरा, चेतराम भामरवासीभूदाराम सांगसी, मोती राम कोटड़ी आदि प्रमुख थे. ये लोग एक दिव्य सन्देश, एक नया जोश, और एक नई प्रेरणा लेकर लौटे. जाट राजा भरतपुर के भाषण से उन्हें भान हुआ कि उनके स्वजातीय बंधू, राजा, महाराजा, सरदार, योद्धा, उच्चपदस्थ अधिकारी और सम्मानीय लोग हैं. पुष्कर से शेखावाटी के किसान दो व्रत लेकर लौटे. प्रथम- समाज सुधार, जिसके तहत कुरीतियों को मिटाना एवं शिक्षा-प्रसार करना. दूसरा व्रत - करो या मरो का था जिसके तहत किसानों की ठिकानों के विरुद्ध मुकदमेबाजी या संघर्ष में मदद करना और उनमें हकों के लिए जागृति करना था.(डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया, पृ. 20-21)

पुष्कर ले लौटने के बाद बगड़ में जाट पंचायत की स्थापना की गयी. प्रचार के लिए भजनोपदेशकों की टोलियाँ तैयार की गयी. अनपढ़ समाज पर भजनोपदेशकों के गीतों का चमत्कारिक प्रभाव पड़ा. भजनोपदेशक अन्य राज्यों से भी आये थे और स्थानीय स्तर पर भी तैयार हुए. पंडित दत्तुराम, भोलासिंह, चौधरी घासीराम, पृथ्वी सिंह बेधड़क, हुकमीचंद, मनसाराम आदि कलाकारों ने गाँव-गाँव को गीतों से गूंजा दिया. स्थानीय स्तर पर मोहरसिंह, सूरजमल साथी, हनुमानदास, बस्तीराम, देवकरण पालोता, तेज सिंह भडुन्दा, गनपतराम महाशय आदि भजनोपदेशक तैयार हो गए. शेखावाटी के ग्रामीण अंचलों को जगाने का श्रेय इन्ही भजनोपदेशक को जाता है. 1925 में झुंझुनू जिले के हनुमानपुरा और कुहाडवास में जन सहयोग से स्कूल खोली गयी. उत्तर प्रदेश के शिक्षक हेमराज सिंह कुहाडवास में और चंद्रभान सिंह हनुमानपुरा में पढ़ाने लगे. इसी क्रम में आगे चलकर कूदन, पलथाना, कटराथल, मांडासी आदि गाँवों में स्कूल खोली गयी. खंडेलावाटी में चौधरी लादूराम रानीगंज ने आर्थिक भार वहन कर शिक्षा की जोत जगाई. शेखावाटी में जनसहयोग से करीब 30 स्कूल खोली गयी. (राजेन्द्र कसवा, p. 100)

पुष्कर सम्मलेन के पश्चात् शेखावाटी में दूसरी पंक्ति के जो नेता उभर कर आये, उनमें प्रमुख नाम निम्न हैं -

इतिहास में आम जन की भागीदारी का यह अनुपम उदहारण है. (राजेन्द्र कसवा, p. 100)

शेखावाटी के जाट संगठन

  • जाट सभा झुंझुनू - सन 1925 में पुष्कर जलसे ने झुंझुनू में जाट सभा बनाने की प्रेरणा दी.
  • शेखावाटी में आर्य समाज की स्थापना - ठाकुर देशराज को शेखावाटी के किसानों की हालत का पता आर्य समाज के जलसों में शिरकत करने के फल स्वरुप हुआ. शेखावाटी में आर्य समाज को प्रतिष्ठापित करने वाले सेठ देवीबक्स सर्राफ थे, जिन्होंने 1927 में मंडावा में आर्य समाज की स्थापना कर जलसा किया. मास्टर कालीचरण एवं पंडित खेमराज ने इस जलसे के बाद नारनौल से रींगस तक जाटों में यज्ञोपवित धारण करवाए. आर्य समाज का दूसरा जलसा 1929 में फिर मंडावा में हुआ. सेठ देवीबक्स ने इस जलसे में भरतपुर से ठाकुर देशराज और कुंवर रतनसिंह को आमंत्रित किया. जलसे में करीब पांच हजार जाटों ने भाग लिया. अखिल भारतीय सार्वदेशिक सभा के स्वामी सर्वदानंद को आर्य समाज मंदिर के उद्घाटन के लिए बुलाया. मंडावा ठाकुर ने मंदिर में ताला लगवा दिया और जलसे को विफल करने हेंतु गुंडे भेजे. परन्तु सरदार हरलाल सिंह ने मंदिर का ताला तोड़ कर जलसा किया. इस जलसे के उपरांत जाटों में बड़ी हिम्मत और चेतना का संचार हुआ. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया, p. 10)
  • सन 1929 में खंडेलावाटी के कस्बे श्रीमाधोपुर में जाट छात्रावास प्रारंभ किया गया.
  • खंडेलावाटी जाट पंचायत - 28 फ़रवरी 1930 को खंडेलावाटी जाट पंचायत मूलचंद (रींगस) व देवासिंह बोचल्या ने स्थापित की.
  • अखिल भारतीय जाट महासभा - मार्च 1930 में दिल्ली में अखिल भारतीय जाट महासभा का वार्षिक जलसा हुआ. इसमें भाग लेने के लिए शेखावाटी से अनेक किसान नेताओं ने भाग लिया. भिवानी के बाद यह दूसरा मौका था जब किसानों ने देश के अन्य किसानों से मिले और अपनी व्यथा कथा सुनाई. दिल्ली सम्मलेन के इस पर विचार होने लगा कि वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन कैसे हो. शेखावाटी के किसान ठाकुर देशराज से मिले और यह तय किया गया कि परिवर्तन की बुलंद आवाज झुंझुनू में विशाल सम्मलेन कर दी जावे.
  • विद्यार्थी भवन झुंझुनू - विद्यार्थी भवन झुंझुनू का शेखावाटी किसान आन्दोलन में काफी योगदान रहा है. झुंझुनूं में अखिल भारतीय जाट महासभा का सम्मलेन सन् 1932 में संपन्न हुआ था.
  • अखिल भारतीय जाट स्टुडेंट कांफ्रेंस - सन 1934 के दिसंबर महीने में 'अखिल भारतीय जाट स्टुडेंट कांफ्रेंस' का आयोजनमास्टर रतनसिंह के संयोजकत्व में पिलानी में किया गया. कालेज के छात्रों और प्रोफेसरों ने भारी परिश्रम किया. कांफ्रेंस का प्रधान सर छोटू राम को बनाया गया एवं कुंवर नेतराम सिंह स्वागताध्यक्ष थे. सर छोटू राम का जुलुस हाथी पर सज-धज कर निकला जिसे देखने सारा शहर उमड़ पड़ा. चौधरी रामसिंह, ठाकुर झुम्मन सिंह, सरदार हरलाल सिंह आदि गणमान्य व्यक्ति इसमें पधारे थे. विभिन्न प्रान्तों एवं देहातों से बड़े तादाद में किसान शरीक हुए थे. इस सम्मलेन ने युवाओं में जन फूंक दी.
  • राजस्थान प्रादेशिक क्षत्रिय जाट सभा - भारतीय जाट महासभा के दिल्ली अधिवेशन, जो धोलपुर महाराजा के नेतृत्व में संपन्न हुआ, में राजस्थान प्रादेशिक क्षत्रिय जाट सभा नामक संस्था गठित करने का निर्णय लिया.
  • शेखावाटी किसान जाट पंचायत - ठाकुर देशराज के प्रयासों से बधाला की ढाणी (पलसाना) में सभा हुई, जुसमें प्रसिद्ध क्रन्तिकारी विजयसिंह पथिक, बाबा नृसिंह देव, ठाकुर देशराज, चौधरी लादूराम (गोरधनपुरा) शामिल हुए. इस सभा में यह तय किया गया कि जागीरदारों की ज्यादतियां रोकने के लिए जाट पंचायत खड़ी की जावे,बच्चों को शिक्षित किया जावे और संगठन के बल पर जागीरदारों से टक्कर ली जावे. किसानों के आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक उन्नति के प्रयास हों तथा उन्हें भूमि बंदोबस्त के जरिये खतौनी, पर्चे दिलवाए जावें. इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए सन 1931 में 'शेखावाटी किसान जाट पंचायत' झुंझुनू में कायम कि गयी.
  • सीकरवाटी किसान जाट पंचायत - शेखावाटी के किसान संगठनों की श्रंखला में अंतिम कड़ी सन 1934 के जनवरी महीने में सीकर में संपन्न 'जाट प्रजापति महायज्ञ' के दौरान जुडी जो 'सीकरवाटी किसान जाट पंचायत' के रूप में सामने आई. इस संगठन ने सीकर ठिकाने के विरुद्ध सिंहनाद किया और एक जबरदस्त आन्दोलन को जन्म दिया. इस संस्था की स्थापना सीकर ठिकाने के किसान आन्दोलन के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने एक नवयुग के आगमन की घोषणा की. कालांतर में यह 'शेखावाटी जाट किसान पंचायत' बन गयी. जिसका नेतृत्व सरदार हरलाल सिंह ने संभाला.
  • प्रजामंडल - प्रजामण्डल ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय रियासतों की जनता के संगठन थे. इनकी स्थापना 1920 के दशक में तेजी से हुई. राजस्थान में प्रजामंडलों के संस्थापन की प्रथम कड़ी के रूप में जयपुर राज्य प्रजामंडल की स्थापना सन 1931 में हुई. किसान सभाएं 1937 में ही जयपुर प्रजा-मण्डल में विलीन हो चुकी थी.
  • 1946 को किसान सभा का पुनर्गठन - सरदार हरलाल सिंह, नरोत्तम जोशी, नेतराम सिंह जैसे नेता प्रजामंडल से प्रभावित थे. चौधरी घासी राम, पंडित ताड़केश्वर शर्मा आदि को कभी विश्वास नहीं रहा कि प्रजामंडल किसानों की समस्याएं हल कर देगा. उनका सोचना था कि पूंजीपतियों के पैसे के बल पर पार्टी चलाने वाले नेता कैसे गाँव, गरीब, किसान और मजदूर का भला कर सकेंगे. 16 जून 1946 को किसान सभा का पुनर्गठन हुआ और यह दो भागों में बात गयी. (राजेन्द्र कसवा,p.201)

झुंझुनूं में जाट महासभा का सम्मलेन सन् 1932

जब राष्ट्रीय स्तर पर गांधीजी डांडी यात्रा कर रहे थे और नमक का कानून तोड़ने के अभियान चला रहे थे तो पन्नेसिंह देवरोड़ (1902-1933) ने शेखावाटी में जन आन्दोलन की हलचलें शुरू की. पन्ने सिंह उस समय शेखावाटी में तेजी से उभर रहे थे. उनमें संगठन निर्माण की अद्भुत क्षमता थी. रींगस के मूल चन्द अग्रवाल ने पिलानी में खादी भण्डार खोल दिया जिसे पन्ने सिंह ही संभाल रहे थे. खादी उत्पादन केंद्र देवरोड़ में खोला गया . कताई-बुनाई का कार्य शुरू किया गया. ठाकुर देशराज झुंझुनू आये औए पन्ने सिंह सहित अन्य किसान नेताओं से मिले. झुंझुनूं में विशाल पैमाने पर सम्मलेन करने के लिए गाँव-गाँव भजनोपदेशक पहुँचने लगे. (राजेन्द्र कसवा: पृ.109)

सन 1931 में ही मंडावा में आर्य समाज का वार्षिक सम्मलेन हुआ. ठिकानेदारों ने भय का वातावरण बनाया किन्तु हजारों स्त्री-पुरुषों ने सम्मलेन में भाग लिया. सभी ने आग्रह किया कि झुंझुनू में होने वाले सम्मलेन में भाग लें. ठाकुर देशराज के नेतृत्व में झम्मन सिंह वकील, भोला सिंह, हुकुम सिंह तथा स्थानीय भजनोपदेशकों की टोलियाँ शेखावाटी अंचल के सैंकड़ों गाँवों में घूमी और झुंझुनू सम्मलेन को सफल बनाने की अपील की.(राजेन्द्र कसवा: पृ.109)

सरदार हरलाल सिंह द्वारा ऊंटों से जनजागरण

जन जागरण के गीतों के माध्यम से गाँव-गाँव को जागरुक किया. घासी राम और हरलाल सिंह पडौसी रियासत बीकानेर के गाँवों में प्रचार करने लगे. राजगढ़ तहसील के जीवन राम जैतपुरा साथ थे जो देर रात तक गाँवों में भजनों के माध्यम से कार्यक्रम करते.(राजेन्द्र कसवा: पृ.110)

झुंझुनू सम्मलेन, बसंत पंचमी गुरुवार, 11 फ़रवरी 1932 को होना तय हुआ जो तीन दिन चला. स्वागत-समिति के अध्यक्ष पन्ने सिंह को बनाया गया. उनके पुत्र सत्यदेव सिंह के अनुसार महासम्मेलन के आयोजन के लिए बिड़ला परिवार की और से भरपूर आर्थिक सहयोग मिला. मुख्य अतिथि का स्वागत करने के लिए बिड़ला परिवार ने एक सुसज्जित हाथी उपलब्ध कराया. यह समाचार सुना तो ठिकानेदार क्रोधित हो गए. उन्होंने कटाक्ष किया - तो क्या जाट अब हाथियों पर चढ़ेंगे? यह सामंतों के रौब-दौब को खुली चुनोती थी. जागीरदारों ने सरे आम घोषणा की, 'हाथी को झुंझुनू नहीं पहुँचने दिया जायेगा.' पिलानी के कच्चे मार्ग से हाथी झुंझुनू पहुँचाना था. रस्ते में पड़ने वाले गाँवों ने हाथी की सुरक्षा का भर लिया. इस क्रम में गाँव खेड़ला, नरहड़ , लाम्बा गोठड़ा, अलीपुर, बगड़ आदि गाँवों के लोग मुस्तैद रहे. हाथी दो दिन में सुरक्षित झुंझुनू पहुँच गया. ठिकाने दारों की हिम्मत नहीं हुई कि रोकें. (राजेन्द्र कसवा: पृ.110)

सम्मलेन के लिए वर्तमान सेठ मोतीलाल कालेज और रानीसती मंदिर के मैदान में विशाल तम्बू लगाये गए थे. एक नया गाँव बस गया था. सम्मलेन का कार्यालय सभा स्थल के निकट, मुख्य सड़क पर 'टेकडी वाली हवेली' में रखा था. आम लोगों के लिए सम्मलेन स्थल पर अनेक भोजनालय बनाये गए थे. झुंझुनू शहर के दुर्गादास काइयां , रंगलाल गाड़िया, बजरंग लाल वर्मा आदि ने खूब दौड़-भाग की. बगड़, चिड़ावा आदि शहरों से भरपूर सहयोग मिला. पूरा झुंझुनू शहर महासम्मेलन का स्वयं ही आयोजक बन गया था. स्वयं सेवकों की पूरी फ़ौज तीन दिन तक सम्मलेन स्थल पर अपनी सेवाएँ देती रही. झुंझुनू की गली-गली उत्साह से सरोबर थी. (राजेन्द्र कसवा: पृ.111)

महासम्मेलन की अध्यक्षता के लिए दिल्ली के आनरेरी मजिस्ट्रेट चौधरी रिशाल सिंह राव को आमंत्रित किया था. चौधरी रिशाल सिंह दिल्ली से रींगस, रींगस से झुंझुनू रेल द्वारा पहुंचे. रेलवे स्टेशन पर किसान नेताओं के अलावा हजारों का जनसमूह अपने मुख्य अतिथि की प्रतीक्षा कर रहे थे. जब वे स्टेशन पहुंचे तो झुंझुनू स्टेशन जय कारों से गूँज उठा. रेलवे स्टेशन पर ऐसी भीड़ बाद में कभी नहीं देखी गयी. स्टेशन से सभा स्थल तक मुख्य सड़क से जुलुस के रूप में जाना तय हुआ. आगे-आगे बैंड बाजा , उसके पीछे सजा हुआ हाथी चलने लगा. हाथी पर चौधरी रिशाल सिंह और उनके पीछे पन्ने सिंह सवार थे. हाथी पर इन दोनों के साथ गनपतराम नाई बैठा था, जो मुख्य अतिथि को चंवर ढुला रहा था. हाथी के पीछे पैदल स्त्रियों का जत्था पांच-पांच की पंक्तियों में गीत गाते चल रहा था. महिला जत्थे के पीछे पांच-पांच की पंक्तियों में पुरुष पैदल हाथों में लाठियां या बरछी लिए चल रहे थे. सबसे पीछे ऊंट सवारों का जत्था था. सजे हुए ऊंट भी पांच-पांच की पंक्तियों में चल रहे थे. (राजेन्द्र कसवा: पृ.111)

चौधरी घासीराम, हर लाल सिंह, राम सिंह बख्तावरपुरा, लादूराम किसारी, ठाकुर देशराज, पंडित ताड़केश्वर शर्मा, जीवन राम जैतपुरा, हुकुम सिंह आदि की मेहनत के कारण पूरा झुंझुनू जिला महासम्मेलन की और उमड़ पड़ा. पन्ने सिंह के बड़े भाई भूरेसिंह ने भी इस सम्मलेन के दौरान उत्साह से कार्य किया. सीकरवाटी से भी काफी संख्या में किसान नेता आये थे. यह परिवर्तन की आंधी थी. इसलिए भूखे-प्यासे, पीड़ित गाँवों के लोग पैदल जत्थों में सभा स्थल की और चल पड़े. प्रथम बार गाँवों की महिलायें गीत गाते हुए आई. झुंझुनू की मुख्य सड़क पर जुलुस सभा स्थल की और बढ़ रहा था. शहर के निवासीगण घरों की छतों पर, दीवारों और मुंडेरों तथा छपरों पर खड़े हो आन्दोलनकारियों का हौसला बढ़ा रहे थे.(राजेन्द्र कसवा: पृ.111)

जयपुर रियासत के पुलिस इंस्पेक्टर जनरल मि. अफ.ऍस. यंग (F.S.Young) , नाजिम शेखावाटी, पुलिस अधीक्षक झुंझुनू व अन्य अधिकारीगण जुलुस के साथ-साथ चल रहे थे. शहर के निवासियों ने अनेक स्थानों पर जुलुस रोककर , मुख्य अतिथि व किसान नेताओं का सम्मान किया. महिलाओं ने आरती उतारी. तत्पश्चात वे भी जुलुस में शामिल हो गए.

सम्मलेन स्थल पर ऊँचा मंच बना हुआ था. अनेक हवन-कुण्ड एक और बने हुए थे. अधिवेशन के दौरान तीनों दिन सुबह यग्य हुआ और जनेऊ बांटी गयी. दिन में भाषणों के अतिरिक्त भजनोपदेशक रोचक और जोशीले गीत प्रस्तुत कर रहे थे. जीवन राम जैतपुरा, हुकुम सिंह, भोला सिंह, पंडित दत्तुराम, हनुमान स्वामी, चौधरी घासी राम आदि ने एक से बढ़कर एक गीत सुनाये. ठाकुर देशराज, पन्ने सिंह, सरदार हरलाल सिंह आदि नेताओं ने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक बदलाव की आवश्यकता प्रतिपादित की. विशाल सम्मलेन को संबोधित करते हुए जयपुर रियासत के आई .जी . यंग (F.S.Young) ने कहा - जाट एक बहादुर कौम है. सामन्तों और पुरोहितों के लिए यह असह्य था. (राजेन्द्र कसवा: पृ.113)

इस ऐतिहासिक सम्मलेन जो निर्णय लिए गए उनमें प्रमुख निर्णय था - झुंझुनू में विद्यार्थियों के पढ़ने और रहने के लिए छात्रावास का निर्माण. दूसरा निर्णय जाट जाति का आत्मसम्मान, स्वाभिमान और सामाजिक दर्जा बढ़ाने सम्बंधित था. जागीरदार और पुरोहित किसान को प्रताड़ित करते थे और उनमें हीन भावना भरने के लिए छोटे नाम से पुकारते थे जैसे मालाराम को मालिया. मंच पर ऐलान किया गया कि आज से सभी अपने नाम के आगे 'सिंह' लगावेंगे. सिंह उपनाम केवल ठाकुरों की बपौती नहीं है. उसी दिन से पन्ना लाल देवरोड़ बने कुंवर पन्ने सिंह देवारोड़, हनुमानपुरा के हरलाल बने सरदार हरलाल सिंह, गौरीर के नेतराम बने कुंवर नेतराम सिंह गौरीर, घासी राम बने चौधरी घासी राम फौजदार. आगरा के चाहर अपना टाईटल फौजदार लगाते हैं अत: चाहर गोत्र के घासी राम को यह टाईटल दिया गया. (राजेन्द्र कसवा: पृ.114)

विद्याधर कुलहरी

जयपुर प्रांतीय जाट क्षत्रीय सभा के सम्मलेन के स्वागताध्यक्ष विद्याधर कुलहरी थे. इस सम्मलेन में जाटों को संगठित रहने, बालक-बालिकाओं को शिक्षा दिलाने, प्रत्येक बालक को यज्ञोपवीत पहनने पर बल दिया. बाल-विवाह रोकने, चढ़ावे में जेवर की रस्म कम करने, शादी में कम खर्चा करने आदि पर भाषण हुए. जलसे में करीब 1500 जाटों ने जनेऊ धारण करने का काम किया. जाटों पर ठिकानेदारों द्वारा की जाने वाली ज्यादतियों का जिक्र कियागया जिसे मनमाने लगान, पैमईस की जरीब छोटी करना, लगान पर ज्यादा ब्याज लेना और अनेक प्रकार की बेगार लेना आदि.(डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया:पृ.22)

झुंझुनू सम्मलेन के फलितार्थ - झुंझुनू का अधिवेशन शेखावाटी के किसानों विशेषकर जाटों के सामाजिक व सांस्कृतिक जीवन में परिवर्तनकारी साबित हुआ. हिम्मत, जोश व स्वाभिमान के साथ उन्हें अपनी जातीय उच्चता का भी भान हुआ. इसी अवसर पर ठाकुर देशराज ने जाट इतिहास लिखने की घोषणा की. पंडितों ने जाटों को यज्ञोपवीत धारण करवाए. समाज के अन्य वर्ग भी उन्हें श्रेष्ठ आर्य तथा क्षत्रिय कौम मानने लगे. इस सम्मलेन ने शेखावाटी ही नहीं जयपुर रियासत व बीकानेर के बड़े इलाकों में भी जाटों की काया पलट दी. उनमें वह रूह फूंक दी जो उनके सहस और कार्यक्षमता को बराबर बढाती रही. इस जलसे में धन की अपील पर लोगों ने कानों की मुर्कियाँ और लड़कियों ने हाथों के कड़े तक उतार दिए थे. यह जलसा शेखावाटी की जागृति का प्रथम सुनहरा प्रभात था. इसने ठिकानेदारों की आँखों के सामने चकाचोंध पैदा करदी. जातीय सुधार के काम बहुत जोरों से होने लगे. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया:पृ.23)

जाट प्रजापति महायज्ञ सीकर सन 1934

झुंझुनू के सम्मलेन के बाद में सीकर के किसानों ने भी वैसा ही बड़ा सम्मलेन सीकर में आयोजित करने की योजना बनाई. किसी प्रकार की परेशानी से बचने के लिए इसे प्रजापति महायज्ञ का नाम दिया गया. इसके प्रचार के लिए सीकर के गाँवों में प्रचारकों और धर्मोपदेशकों के जत्थे आने लगे. झुंझुनू के बड़े सम्मलेन से जागीरदार चौकन्ने हो उठे थे. सीकरवाटी के ठिकानेदारों ने रावराजा सीकर के कान भर दिए कि जाट यज्ञ के माध्यम से भीड़ जुटाकर राजनीति करेंगे. सीकर दरबार भी भयभीत हो गया. (राजेन्द्र कसवा:पृ.118)

पलथाना में आमसभा अक्टूबर सन 1933 - अक्टूबर सन 1933 में पलथाना में महायज्ञ की तैयारी हेतु एक आमसभा का आयोजन किया गया. ठाकुर देशराज द्वारा बुलाई गयी इस बैठक में हरीसिंह बुरड़क पलथाना, सरदार हरलाल सिंह, चौधरी घासीराम, पंडित ताड़केश्वर शर्मा, मास्टर रतनसिंह, चंद्रभान, देवीसिंह बोचल्या, ठाकुर भोला सिंह, हुकुम सिंह, पन्ने सिंह बाटड़ानाऊ, पृथ्वीसिंह गोठडा, गोरुराम, गणेशराम कूदन, गोरुसिंह कटराथल, लेखराम, हरिबक्स- बधाला की ढाणी, ईश्वरसिंह भैरूपुरा आदि शेखावाटी के प्रमुख नेता और कार्यकर्त्ता एकत्रित हुए.(राजेन्द्र कसवा:पृ.118)

कोई दिन सीकरवाटी की महिलाएं एक गीत गाया करती थीं, "चलिए सखी यज्ञ देखन कूँ, सीकर के अस्थाना में । तोही सरपंच दिखाऊँ पलथाना में" सीकर में 1934 में जो शानदार यज्ञ हुआ, इस यज्ञ के लिए और पीछे से तमाम सीकर किसान आन्दोलन के लिए 'सीकरवाटी जाट किसान पंचायत' बनी थी, उसी के सरपंच बनाने का सौभाग्य पलथाना के श्योबक्स राम बुरड़क के पुत्र हरी सिंह बुरड़क को मिला. रणमल सिंह के अनुसार, 'यज्ञ सुचारू रूप से चले एवं तत्काल कोई फैसला लेना हो तो इसके लिए पांच पञ्च नियुक्त किये गए थे. ये थे - हरी सिंह पलथाना, ईश्वर सिंह भामू, पृथ्वी सिंह गोठडा, गोरु सिंह कटराथल और पन्ने सिंह बाटाड.' (राजेन्द्र कसवा:पृ.119)

महायज्ञ के लिए आसपास के मुख्य कार्यकर्ताओं को ही बुलाया गया था परन्तु पांच हजार किसानों की भीड़ एकत्रित हो गयी. सीकर के रावराजा और छोटे ठिकानेदार नहीं चाहते थे कि झुंझुनू की नक़ल पर सीकर में कोई बड़ा सम्मलेन हो. पलथाना की सभा की जानकारी जब रावराजा को लगी तो उसने काफी संख्या में पुलिस पलथाना गाँव में भेज दी. वे हथकड़ी बजा-बजा कर गाँव वालों को भयभीत करने लगे. ठाकुर देशराज ने एक युक्ति निकली. उन्होंने अपने भाषण में घोषणा की कि सीकर में प्रजापति-यज्ञ किया जाएगा जो एक धार्मिक उत्सव है. इस धार्मिक कार्य से किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए. पुलिस हमें हाथकड़ियाँ न दिखाए. हम इस धार्मिक और शुभ कार्य से पीछे नहीं हटेंगे. यज्ञों में विघ्न कौन पैदा करता था, यह पुलिस वाले जानते ही होंगे. हम उन्हें राक्षस तो नहीं कहेंगे लेकिन रावराजा से बात अवश्य करेंगे. पुलिस पर इसका गहरा प्रभाव पडा. कुछ देर रुकने के पश्चात् साड़ी पुलिस चली गयी. (राजेन्द्र कसवा:पृ.118)

इस सभा में यह निर्णय लिया गया कि 20 जनवरी 1934 , बसंत पंचमी के दिन सीकर में विशाल प्रजापति यज्ञ प्रारंभ होगा. इसके लिए विभिन्न उपसमितियां और स्वागत समिति का गठन किया गया. यज्ञ के लिए धन एवं घी एकत्रित करने का काम कार्यकर्ताओं में बाँट दिया गया. देर रात तक जागृति के गीत गए जाते रहे. (राजेन्द्र कसवा:पृ.119)

गाँव-गाँव में उत्साही कार्यकर्ताओं का पहुंचना प्रारंभ हो गया. वयोवृद्ध किसान नेता रणमल सिंह उस समय को याद करते हुए बताते हैं कि 'कोई सरकारी स्कूल नहीं था. हमारे गाँव कटराथल के निकट नीम की ढाणी में सेठों की स्कूल खुली थी. इस स्कूल में मथुरा के शिक्षक दलेलसिंह पढ़ाते थे. बच्चे स्कूल में लंगोटी पहन कर जाया करते थे. किसी-किसी बच्चे के पास ही जांघिया था'. (राजेन्द्र कसवा:पृ.119)

यह माना जाता है कि प्रजापति-यज्ञ को सम्पूर्ण करवाने का बीड़ा गोरु सिंह कटराथल ने उठाया था. गोरूसिंह की निडरता, निर्भीकता, स्पष्टवादिता का सभी सम्मान करते थे. उन्होंने सीकर महायज्ञ की रक्षा के लिए स्वयंसेवकों की सेना बनाई थी और उन्हें आत्मरक्षा के लिए हाथों में लाठियां थमा दी थी. (राजेन्द्र कसवा:पृ.120)


जाट प्रजापति महायज्ञ आरम्भ - आर्य समाज की विचारधारा से प्रेरणा लेकर 20 जनवरी 1934 को सीकर में जाट प्रजापति महायज्ञ आरम्भ हुआ जिसका समापन 29 जनवरी 1934 को हुआ. महायज्ञ के यज्ञपति कुंवर हुकुमसिंह रईस आंगई को बनाया गया. यज्ञमान कूदन के चौधरी कल्लूराम सुंडा थे. ब्रह्मा का कृत्य जाट जाति के पंडित जगदेव शास्त्री द्वारा संपन्न किया गया. मेहमानों के लिए 100 तम्बू व स्थानीय लोगों के लिए 400 झोंपड़ीयां सजाई गयी जो मीलों क्षेत्रफल में फैली हुई थी. द्वारों के नाम महाराजा सूरजमल, वीर जवाहर सिंह व् मुख्य सड़क का नाम कुंवर पन्ने सिंह रोड रखा गया. सीकर में जाटों ने मानो काशीपुरी की रचना कर दी थी. इस यज्ञ में 25 मन घी और 100 मन हवन सामग्री खर्च हुई. दस दिन चले इस यग्य में करीब एक लाख स्त्री-पुरुषों ने भाग लिया. हरयाणा से सर छोटूराम भी आये. जोधपुर, बीकानेर, पटियाला, पंजाब, उत्तर प्रदेश अदि से बहुत से लोग शामिल हुए. इस अवसर पर तलवारें और कटारें बिकने हाई थी जो हाथों हाथ बिक गयी. यज्ञकुण्ड में लगी आहुतियों के धुंए से यज्ञनगर महक रहा था. वेद मन्त्रों के उच्चारण, आचार्यों की दिनचर्या, भजनोपदेशक, व्याख्यानकर्ता व चारों और नंगी तलवारों से सुसज्जित जाट युवकों द्वारा पहरा देना बड़ा ही प्रभावशाली दृश्य पैदा कर रहा था. जयपुर रियासत के पुलिस महानिरीक्षक श्री एस.एफ. यंग (F.S.Young) ने हवाई जहाज से उड़ानें भर कर सारे दृश्य के फोटो एकत्रित किये. यज्ञ में खबर आई कि सीकर के रावराजा ने जिद पकड़ ली है कि जाट मेरे गढ़ के आगे से हाथी पर जुलुस नहीं निकाल सकते. यह सुनते ही यज्ञ-स्थल पर सनसनी फ़ैल गयी. गीजगढ़ से लाये गए हाथी को ठिकाने वालों ने रात में ही गायब करा दिया है, यह सुनकर तो लोग गुस्से से पागल हो उठे. जाटों की जिद के आगे राजा को झुकना पड़ा. मि. यंग के बीच-बचाव से यह तय हुआ कि जुलुस हाथी पर ही निकलेगा और गढ़ के आगे से ही जायेगा. "वैदिक धर्म की जय" और "जाट जाति की जय" के तुमुलघोष के साथ सीकर शहर में "वेद भगवान" का जुलुस निकला गया. हाथी पर वेद की पुस्तक लिए पंडित खेमराज शर्मा बैठे जिनकी गोद में सरदार हरलालसिंह का छोटा लड़का बैठा था. यज्ञ के दौरान तीन हजार किसान स्त्रिपुरुषों ने यज्ञोपवित धारण किया जो कि किसान संगठन का 'प्रतीक चिन्ह' था. कुंवर नेतराम सिंह की पुत्री शीतलकुमारी ने भी यज्ञोपवीत धारण किया. चिमना राम संगासी अपनी वृद्ध पत्नी को सलवार-कुर्ता पहिनाकर यज्ञस्थल लाये थे. सैंकड़ों स्त्रियों ने यज्ञोपवीत धारण किया तथा साड़ी पहनना आरंभ किया. किसान शक्ति का प्रबल ज्वार यज्ञ के समय फूट पड़ा था जिससे सीकर ठिकानेदार पूर्णतया भयभीत हो गया था. यह यज्ञ किसान एकता का जबरदस्त प्रतीक था जिसमें भाग लेने स्थान-स्थान से लोग आये थे. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया:पृ.25-26)

शेखावाटी किसान आन्दोलन पर रणमल सिंह

शेखावाटी किसान आन्दोलन पर रणमल सिंह[5] लिखते हैं कि [पृष्ठ-113]: सन् 1934 के प्रजापत महायज्ञ के एक वर्ष पश्चात सन् 1935 (संवत 1991) में खुड़ी छोटी में फगेडिया परिवार की सात वर्ष की मुन्नी देवी का विवाह ग्राम जसरासर के ढाका परिवार के 8 वर्षीय जीवनराम के साथ धुलण्डी संवत 1991 का तय हुआ, ढाका परिवार घोड़े पर तोरण मारना चाहता था, परंतु राजपूतों ने मना कर दिया। इस पर जाट-राजपूत आपस में तन गए। दोनों जातियों के लोग एकत्र होने लगे। विवाह आगे सरक गया। कैप्टन वेब जो सीकर ठिकाने के सीनियर अफसर थे , ने हमारे गाँव के चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल जो उस समय जाट पंचायत के मंत्री थे, को बुलाकर कहा कि जाटों को समझा दो कि वे जिद न करें। चौधरी गोरूसिंह की बात जाटों ने नहीं मानी, पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया। इस संघर्ष में दो जाने शहीद हो गए – चौधरी रत्नाराम बाजिया ग्राम फकीरपुरा एवं चौधरी शिम्भूराम भूकर ग्राम गोठड़ा भूकरान । हमारे गाँव के चौधरी मूनाराम का एक हाथ टूट गया और हमारे परिवार के मेरे ताऊजी चौधरी किसनारम डोरवाल के पीठ व पैरों पर बत्तीस लठियों की चोट के निशान थे। चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल के भी पैरों में खूब चोटें आई, पर वे बच गए।

चैत्र सुदी प्रथमा को संवत बदल गया और विक्रम संवत 1992 प्रारम्भ हो गया। सीकर ठिकाने के जाटों ने लगान बंदी की घोषणा करदी, जबरदस्ती लगान वसूली शुरू की। पहले भैरुपुरा गए। मर्द गाँव खाली कर गए और चौधरी ईश्वरसिंह भामू की धर्मपत्नी जो चौधरी धन्नाराम बुरड़क, पलथना की बहिन थी, ने ग्राम की महिलाओं को इकट्ठा करके सामना किया तो कैप्टेन वेब ने लगान वसूली रोकदी। चौधरी बक्साराम महरिया ने ठिकाने को समाचार भिजवा दिया कि हम कूदन में लगान वसूली करवा लेंगे।

कूदन ग्राम के पुरुष तो गाँव खाली कर गए। लगान वसूली कर्मचारी ग्राम कूदन की धर्मशाला में आकर ठहर गए। महिलाओं की नेता धापू देवी बनी जिसका पीहर ग्राम रसीदपुरा में फांडन गोत्र था। उसके दाँत टूट गए थे, इसलिए उसे बोखली बड़िया (ताई) कहते थे। महिलाओं ने काँटेदार झाड़ियाँ लेकर लगान वसूली करने वाले सीकर ठिकाने के कर्मचारियों पर आक्रमण कर दिया, अत: वे धर्मशाला के पिछवाड़े से कूदकर गाँव के बाहर ग्राम अजीतपुरा खेड़ा में भाग गए। कर्मचारियों की रक्षा के लिए पुलिस फोर्स भी आ गई। ग्राम गोठड़ा भूकरान के भूकर एवं अजीतपुरा के पिलानिया जाटों ने पुलिस का सामना किया। गोठड़ा गोली कांड हुआ और चार जने वहीं शहीद हो गए। इस गोली कांड के बाद पुलिस ने गाँव में प्रवेश किया और चौधरी कालुराम सुंडा उर्फ कालु बाबा की हवेली , तमाम मिट्टी के बर्तन, चूल्हा-चक्की सब तोड़ दिये। पूरे गाँव में पुरुष नाम की चिड़िया भी नहीं रही सिवाय राजपूत, ब्राह्मण, नाई व महाजन परिवार के। नाथाराम महरिया के अलावा तमाम जाटों ने ग्राम छोड़ कर भागे और जान बचाई।


[पृष्ठ-114]: कूदन के बाद ग्राम गोठड़ा भूकरान में लगान वसूली के लिए सीकर ठिकाने के कर्मचारी पुलिस के साथ गए और श्री पृथ्वीसिंह भूकर गोठड़ा के पिताजी श्री रामबक्स भूकर को पकड़ कर ले आए। उनके दोनों पैरों में रस्से बांधकर उन्हें (जिस जोहड़ में आज माध्यमिक विद्यालय है) जोहड़े में घसीटा, पीठ लहूलुहान हो गई। चौधरी रामबक्स जी ने कहा कि मरना मंजूर है परंतु हाथ से लगान नहीं दूंगा। उनकी हवेली लूट ली गई , हवेली से पाँच सौ मन ग्वार लूटकर ठिकाने वाले ले गए।

कूदन के बाद जाट एजीटेशन के पंचों – चौधरी हरीसिंह बुरड़क, पलथना, चौधरी ईश्वरसिंह भामु, भैरूंपुरा; पृथ्वी सिंह भूकर, गोठड़ा भूकरान; चौधरी पन्ने सिंह बाटड़, बाटड़ानाऊ; एवं चौधरी गोरूसिंह गढ़वाल (मंत्री) कटराथल – को गिरफ्तार करके देवगढ़ किले मैं कैद कर दिया। इस कांड के बाद कई गांवों के चुनिन्दा लोगों को देश निकाला (ठिकाना बदर) कर दिया। मेरे पिताजी चौधरी गनपत सिंह को ठिकाना बदर कर दिया गया। वे हटूँड़ी (अजमेर) में हरिभाऊ उपाध्याय के निवास पर रहे। मई 1935 में उन्हें ठिकाने से निकाला गया और 29 फरवरी, 1936 को रिहा किया गया।

जब सभी पाँच पंचों को नजरबंद कर दिया गया तो पाँच नए पंच और चुने गए – चौधरी गणेशराम महरिया, कूदन; चौधरी धन्नाराम बुरड़क, पलथाना; चौधरी जवाहर सिंह मावलिया, चन्दपुरा; चौधरी पन्नेसिंह जाखड़; कोलिडा तथा चौधरी लेखराम डोटासरा, कसवाली। खजांची चौधरी हरदेवसिंह भूकर, गोठड़ा भूकरान; थे एवं कार्यकारी मंत्री चौधरी देवीसिंह बोचलिया, कंवरपुरा (फुलेरा तहसील) थे। उक्त पांचों को भी पकड़कर देवगढ़ किले में ही नजरबंद कर दिया गया। इसके बाद पाँच पंच फिर चुने गए – चौधरी कालु राम सुंडा, कूदन; चौधरी मनसा राम थालोड़, नारसरा; चौधरी हरजीराम गढ़वाल, माधोपुरा (लक्ष्मणगढ़); मास्टर कन्हैयालाल महला, स्वरुपसर एवं चौधरी चूनाराम ढाका , फतेहपुरा

सीकर यज्ञ सन 1934 के बाद का किसान आन्दोलन

वर्ष 1934 में सीकर में यज्ञ के सफल आयोजन से सीकर और दूसरे ठिकानेदार बौखला उठे थे. यज्ञ के बाद दस दिन तक अपनी तकलीफों का विश्लेषण किया. महायज्ञ के समय हाथी को भगवा देने तथा हाथी पर बैठकर सभापति का जुलुस न निकालने देने से जाट सीकर रावराजा से नाराज थे. उन्होंने वहीँ यज्ञ की समाप्ति के बाद एक तम्बू में बैठकर ठाकुर देशराज की अध्यक्षता में यह निर्णय लिया की अब किसानों व ठिकानेदारों के अधिकारों का खुलासा करने के लिए पहले सीकर ठिकाने के सवाल को ही उठाया जय तथा उसके बाद छोटे ठिकानेदारों द्वारा होने वाली मनमानियों का खात्मा हो तथा निरंतर बढ़ने वाला शोषण समाप्त हो. इसके लिए 'सीकर जाट किसान पंचायत' की स्थापना की गयी. सीकर के प्रमुख लोगों को इसमें लिया गया और दफ्तरी काम के लिए तथा अन्य काम में अनुभव होने से ठाकुर देवसिंह बोचल्या को इसका जनरल सेक्रेटरी नियुक्त किया. ठाकुर देशराज ने इस पूरे काम की देखरेख तथा बाहरी लोकमत बनाने में प्रचार प्रसार का काम हाथ में लिया. (डॉ पेमाराम:p.90)

रावराजा सीकर द्वारा दमनचक्र - मास्टर चंद्रभानसिंह गिरफ्तार - ठिकानेदार और रावराजा ने जाट प्रजापति महायज्ञ सीकर सन 1934 के नाम पर जो एकता देखी, इससे वे अपमानित महसूस करने लगे और प्रतिशोध की आग में जलने लगे. जागीरदार किसान के नाम से ही चिढ़ने लगे. एक दिन किसान पंचायत के मंत्री देवी सिंह बोचल्या और उपमंत्री गोरु सिंह को गिरफ्तार कर कारिंदों ने अपमानित किया. लेकिन दोनों ने धैर्य का परिचय दिया. मास्टर चंद्रभान उन दिनों सीकर के निकट स्थित गाँव पलथाना में पढ़ा रहे थे. स्कूल के नाम से ठिकानेदारों को चिड़ होती थी. यह स्कूल हरीसिंह बुरड़क जन सहयोग से चला रहे थे. बिना अनुमति के स्कूल चलाने का अभियोग लगाकर रावराजा की पुलिस और कर्मचारी हथियारबंद होकर पलथाना गाँव में जा धमके. मास्टर चंद्रभान को विद्रोह भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया और हथकड़ी लगाकर ले गये. (राजेन्द्र कसवा:p.122)

किसान नेता घरों में पहुँच कर शांति से साँस भी नहीं ले पाए थे कि सीकर खबर मिली कि मास्टर चंद्रभान सिंह को 24 घंटे के भीतर सीकर इलाका छोड़ने का आदेश दिया है और जब वह इस अवधि में नहीं गए तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. ठिकाने वाले यज्ञ में भाग लेने वाले लोगों को भांति-भांति से तंग करने लगे. मास्टर चंद्रभान सिंह यज्ञ कमेटी के सेक्रेटरी थे और पलथाना में अध्यापक थे. सीकर ठिकाने के किसानों के लिए यह चुनौती थी. मास्टर चंद्रभानसिंह को 10 फ़रवरी 1934 को गिरफ्तार करने के बाद उन पर 177 जे.पी.सी. के अधीन मुक़दमा शुरू कर दिया था. (डॉ पेमाराम:p.91)

यह चर्चा जोरों से फ़ैल गयी की मास्टर चन्द्रभान को जयपुर दरबार के इशारे पर गिरफ्तार किया गया है. तत्पश्चात ठिकानेदारों ने किसानों को बेदखल करने, नई लाग-बाग़ लगाने एवं बढ़ा हुआ लगान लेने का अभियान छेड़ा. (राजेन्द्र कसवा:p.122)

बधाला की ढाणी में विशाल आमसभा - पीड़ित किसानों ने बधाला की ढाणी में विशाल आमसभा आयोजित की, जिसमें हजारों व्यक्ति सम्मिलित हुए. इनमें चौधरी घासीराम, पंडित ताड़केश्वर शर्मा, ख्यालीराम भामरवासी, नेतराम सिंह, ताराचंद झारोड़ा, इन्द्राजसिंह घरडाना, हरीसिंह पलथाना, पन्ने सिंह बाटड, लादूराम बिजारनिया, व्यंगटेश पारिक, रूड़ा राम पालडी सहित शेखावाटी के सभी जाने-माने कार्यकर्ता आये. मंच पर बिजोलिया किसान नेता विजय सिंह पथिक, ठाकुर देशराज, चौधरी रतन सिंह, सरदार हरलाल सिंह आदि थे. छोटी सी ढाणी में पूरा शेखावाटी अंचल समा गया. सभी वक्ताओं ने सीकर रावराजा और छोटे ठिकानेदारों द्वारा फैलाये जा रहे आतंक की आलोचना की. एक प्रस्ताव पारित किया गया कि दो सौ किसान जत्थे में जयपुर पैदल यात्रा करेंगे और जयपुर दरबार को ज्ञापन पेश करेंगे. तदानुसार जयपुर कौंसिल के प्रेसिडेंट सर जॉन बीचम को किसानों ने ज्ञापन पेश किया. (राजेन्द्र कसवा:p.123)

मास्टर चंद्रभानसिंह को छुड़ाने के लिए मुख्य जाट किसान सीकर में माजी साहिबा की धर्मशाला में इकट्ठे हुए. सीकर ठिकाने द्वारा मास्टर चंद्रभानसिंह को छोड़ना तो दूर किसान नेताओं को चेतावनी दी की तत्काल धर्मशाला खाली कर दें. तब किसान नेता शामपुरा गाँव में इकट्ठे हुए. शामपुरा गाँव जयपुर राज्य के अधीन था. किसानों ने इस अवसर पर एक मेमोरियल तैयार किया जिसमें सीकर ठिकाने की ज्यादतियों का वर्णन किया गया था और किसानों के हित में मांगें रखी गयी थी. 200 किसानों का एक दल जयपुर के लिए रवाना हुआ तो उन्हें सीकर व रींगस से रेल में नहीं बैठने दिया गया. तब वे 18 फ़रवरी 1934 को पैदल ही कुंवर रतनसिंह भरतपुर के नेतृत्व में जयपुर के लिए रवाना हुए. [दी नेशनल काल, 25 फ़रवरी, 1934, पृ.8] जयपुर में वे जयपुर सरकार के वाइस प्रेसिडेंट सर जॉन बिचम से मिले और 14 सूत्री मांगें पेश की. (डॉ पेमाराम:p.92)

जब सीकर ठिकाने को मालूम हुआ की किसान उसके खिलाफ जयपुर गए हैं तो ठिकाने वाले और चिढ़ गए और जाट नेताओं के खिलाफ गिरफ़्तारी के वारंट जरी कर दिए. 5 मार्च 1934 को मास्टर चंद्रभान के मुकदमें में जब पृथ्वी सिंह, चौधरी हरीसिंह, तेज सिंह और बिरदाराम लौट रहे थे, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इससे पहले 20 आदमी और गिरफ्तार किये जा चुके थे. इनमें ईश्वरसिंह भैरूपुरा भी थे. उन्होंने काठ में देने का विरोध किया तो उन्हें उल्टा डालकर काठ में दे दिया गया और उस समय तक उसी प्रकार काठ में रखा जब तक उनको इस परेशानी से बुखार न आ गया. [अर्जुन, 1 मार्च 1934] फतेहपुर के के एक तहसीलदार ने तो बाजार में सौदा खरीदने आये और पिराणी के चौधरी मुकुन्दसिंह को गिरफ्तार कर लिया और जब उसका भतीजा कारण पूछने आया तो उसे भी पीटा गया. आकवा, घिटकावास आदि गाँवों में बिना वारंट के गिरफ्तारियां हुईं, वो भी एक-एक दो-दो की नहीं, आठ-आठ और दस-दस दिन की. (डॉ पेमाराम:p.93)

इन गिरफ्तारियों और अत्याचारों से जाटों में घबराहट तो बढ़ी परन्तु कुछ कर गुजरने की भावना भी तेज हो गयी. मार्च 1934 से ही भूमि का लगन देना बंद कर दिया. ठिकानेदारों ने गिरफ्तारियों का ताँता मार्च के प्रारंभ से शुरू किया जो अप्रेल के आखिर तक बड़े जोरों से चला. उत्पीडन के हर प्रकार के तरीके अपनाये गए यथा किसानों को काठ में देना, अँधेरी कोठरियों में बंद करना, पीटना और यहाँ तक की स्त्रियों पर भी लगान की वसूली के नाम पर ज्यादतियां करना आदि. [दी नेशनल काल, 14 मार्च 1934] दमन चक्र जोरों पर था. 7 अप्रेल 1934 को कटराथल में सीकरवाटी जाट किसान पंचायत के नेतृत्व में किसान भरी संख्या में एकत्रित हुए और एक मीटिंग की उसमें इन आतंकवादी घटनाओं पर भारी रोष व्यक्त किया गया. इसके प्रतिरोध में ठिकानेदार ने जिन किसानों ने इस मीटिंग में भाग लिया था उनको मारने पीटने और गिरफ्तार करने पर उतर आये.12 अप्रेल 1934 को रसवाड़ी के ठाकुर ने सिंगरावट तहसील में बोसाना गाँव पर हमला कर दिया. खेत खलिहान को लूटा गया. डालूसिंह, तेजसिंह, केशरसिंह, बालूसिंह और अर्जुनराम जैसे अगुआ किसानों को गिरफ्तार कर लिया जब वे अपने खेत खलिहान पर काम कर रहे थे. इसी समय इनकी स्त्रियाँ रोटी लेकर खेत में आ रही थी तो जागीरदार के कारिंदों ने उन्हें बेंतों से मारकर भगा देने का आदेश दिया. इस पर शिकारी जानवरों की तरह सिपाही बेंत लेकर स्त्रियों को पीटने लगे. जब एक बूढी स्त्री बेहोश हो गयी तो उसे चोटी पकड़कर घसीटते-घसीटते दूर लेजाकर डाल दिया. गिरफ्तार किसानों ने जब विरोध किया तो उनको और भी पीटा और रस्सों से बांधकर सिंगारावट तहसील ले जाया गया. जहाँ किसानों के पैर काठ में फंसाकर उन्हें औंधे मुंह जमीन पर डाल दिया गया. 6 घंटे की घोर अमानवीय यातना के बाद उन्हें काठ से निकाल कर बिछीहुई खाटों के दोनों तरफ टांगें करके खड़ा कर उनके सर पर एक-एक भारी पत्थर रखवा दिया और बगलों में एक-एक ईंट रखवा दी. रात को उनके खड़ी-हथकड़ी लगाई और उन्हें सोने नहीं दिया गया. जब उन्होंने खाने को माँगा तो कहा - अभी तुम्हारे सर की गर्मी नहीं उतरी है, जब उतरेगी तब रोटी मिलेगी. (अर्जुन 21 अप्रेल 1934), ठाकुर देशराज: जन-सेवक, पृ.231-232. (डॉ पेमाराम:p.94-95)

सिहोट ठाकुर द्वारा दमनचक्र - सीकर ठिकाने की और से यह दमन-चक्र चल ही रहा था कि सिहोट के ठाकुर मानसिंह ने 200 हथियारबंद आदमियों के साथ सोतिया का बास नामक गाँव पर लगान वसूली के बहाने हमला कर दिया. मारपीट से गाँव में कोहराम मच गया. किसानों व बच्चों को गिरफ्तार कर मारते-पीटते गढ़ में ले गए और वहां कोठरी में बंद कर अनेक प्रकार की अमानुषिक यंत्रणाएं दी व खाने पिने को कुछ नहीं दिया. स्त्रियों द्वारा गाँव में विरोध करने पर ठाकुर के आदमी उन पर टूटपड़े, कपड़े फाड़ दिए और एक स्त्री को नंगा कर दिया. [पिलानिया:सरदार हरलाल सिंह, p.28] डॉ पेमाराम ने ठाकुर देशराज के जन सेवक पृ. 237 -238 में छपे इस गाँव की कानूड़ी देवी उम्र 21 वर्ष, जिसे नंगा किया गया था, का बयान उद्धृत किया है जो रोंगटे खड़े करने वाला है. घरों में घुसकर स्त्रियों के साथ मारपीट की गयी. कई स्त्रियों के तो इतनी चोटें आई कि वे बेहोश हो गईं. सिहोट ठाकुर द्वारा किसान स्त्रियों के साथ इस प्रकार के किये काण्ड से इलाके भर में व्यापक रोष फैला. (डॉ पेमाराम:p.94-95)

कटराथल में महिला सभा - उपरोक्त अमानवीय काण्ड की निंदा करने के लिए 25 अप्रेल 1934 ई. को कटराथल गाँव में महिलाओं की एक बड़ी सभा करने का निश्चय किया. सीकर के अधिकारियों ने सभा न होने देने के अनेक उपाय किये और उस गाँव में धारा 144 लगा दी. धारा 144 तोड़कर श्रीमती उत्तमादेवी पत्नी ठाकुर देशराज के सभापतित्व में बड़ी सभा आयोजित की गयी. इसमें दस हजार से ऊपर स्त्रियाँ एकत्रित हुई. इस सभा की स्वागताध्यक्ष श्रीमती किशोरीदेवी धर्मपत्नी सरदार हरलालसिंह थी. यह महिला-सभा इस इलाके में प्रथम व अनूठी घटना थी. इस सभा में प्रस्ताव पारित किया गया कि सिहोट ठाकुर को दण्ड दिया जाय, किसानों की मांगें जल्दी पूरी की जाएँ और जयपुर सरकार की देखरेख में भूमि-बंदोबस्त चालू किया जाय. [ठाकुर देशराज: जन-सेवक, पृ.233], (डॉ पेमाराम:p.94-95)

शेखावाटी के गाँवों से महिलायें विभिन्न जत्थे, रंग-बिरंगे परिधानों में सज्जित, गीत गाती हुई, कटराथल के लिए आईं. बात-बात में सामंतों का उपहास और उन्हें चेतावनी देते हुए शेखावाटी की मर्दानी महिलाएं सभास्थल पर एकत्रित हुई. महिला जत्थों का नेतृत्व करने वाली महिलाएं थी - दुर्गावती शर्मा (पत्नी पंडित ताड़केश्वर शर्मा) पचेरी बड़ी, फूलादेवी मांडासी, केशरीदेवी भामरवासी, रामदेवी जोशी आदि. महिलाएं निकटवर्ती गाँवों कूदन, कोलीड़ा, पालडी, पलथाना, बीबीपुर, सोतिया बास, गोठडा, भैरूपुरा आदि से आई थीं. (राजेन्द्र कसवा:p.124)

अखिल भारतीय जाट महासभा के प्रयास

सीकर ठिकाने में किसानों पर होने वाली ज्यादतियों के बारे में अखिल भारतीय जाट महासभा भी काफी चिंतित थी. उन्होंने कैप्टन रामस्वरूप सिंह को जाँच हेतु सीकर भेजा.कैप्टन रामस्वरूप सिंह ने चौधरी जगनाराम मौजा सांखू तहसील लक्ष्मनगढ़ उम्र 50 वर्ष बिरमाराम गाँव चाचीवाद तहसील फतेहपुर उम्र 25 वर्ष के बयान दर्ज किये. चौधरी जगनाराम ने जागीरदारों की ज्यादतियों बाबत बताया. बिरमाराम ने 10 अप्रेल 1934 को उसको फतेहपुर में गिरफ्तार कर यातना देने के बारे में बताया. उसने यह भी बताया कि इस मामले में 10 -15 और जाटों को भी पकड़ा था. इनमें चौधरी कालूसिंह बीबीपुर तथा लालूसिंह ठठावता को मैं जानता हूँ शेष के नाम मालूम नहीं हैं. कैप्टन रामस्वरूप सिंह ने जाँच रिपोर्ट अखिल भारतीय जाट महासभा के सामने पेश की तो बड़ा रोष पैदा हुआ और इस मामले पर विचार करने के लिए अलीगढ में अखिल भारतीय जाट महासभा का एक विशेष अधिवेशन सरदार बहादुर रघुवीरसिंह के सभापतित्व में बुलाया गया. सीकर के किसानों का एक प्रतिनिधि मंडल भी इस सभा में भाग लेने के लिए अलीगढ गया. सर छोटू राम के नेतृत्व में एक दल जयपुर में सर जॉन बीचम से मिला. बीचम को कड़े शब्दों में आगाह किया गया कि वे ठिकाने के जुल्मों की अनदेखी न करें. नतीजा कुछ खास नहीं निकला पर दमन अवश्य ठंडा पड़ गया. (डॉ पेमाराम: p.97-98)

कैप्टन वेब (A.W.T. Webb) की नियुक्ति - ठिकाना सीकर जितना ही बर्बरता पर उतरा, उतना ही जाटों का पक्ष सबल बना. देश का लोकमत उनके अनुकूल बना. आखिर सर जॉन बीचम को समझ में आ गया कि किसानों की समस्याओं को टाला नहीं जा सकता. ऐसी स्थिति में जयपुर सरकार ने यह निश्चय किया कि किसी योग्य व अनुभवी अंग्रेज अफसर को पूरे अधिकारों के साथ सीनियर अफसर के पद पर सीकर भेजा जाय. तब जयपुर सरकार ने सीकर-प्रशासन के लिए कैप्टन वेब (A.W.T. Webb) को नियुक्त किया जिसने 24 मई 1934 को चार्ज संभाला. 29 मई 1934 को सीकर वाटी किसान पंचायत के मंत्री देवीसिंह बोचाल्या के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल मि. वेब से मिला. वेब ने सुझाव दिया कि एक कमिटी बनाई जाये जिसमें किसान प्रतिनिधि भी सम्मिलित हों. यह सुझाव किसान नेताओं को जमा नहीं, क्योंकि चार किसान प्रतिनिधियों में से दो किसानों को प्रशासन की और से मनोनीत करना था. 24 जून 1934 ई. को कूदन में सीकरवाटी के प्रमुख जाटों की एक बैठक कमीशन के लिए मेंबर चुनने के लिए हुई जिसमें भरतपुर के ठाकुर देशराज और कुंवर रतनसिंह शालिल हुए. 25 जून 1934 को किसानों की एक आवश्यक बैठक पृथ्वी सिंह के प्रयासों से गोठड़ा गाँव में बुलाई गयी. काफी संख्या में एकत्रित किसानों ने अपनी और से सर छोटूराम, कुंवर रतनसिंह, पृथ्वीसिंह गोठडा एवं ईश्वरसिंह भैरूपुरा को प्रतिनिधि मंडल के रूप में चुन लिया. इन्हें वेब की कमेटी में काम करना था. किन्तु वेब ने 15 जुलाई 1934 को एक पक्षीय घोषणा कर दी. (डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.101) इस घोषणा में नाम मात्र की सहूलियतें थी. किसान पंचायत संतुष्ट नहीं हुई. पंचायत के मंत्री देवी सिंह बोचल्या ने एक विज्ञप्ति जारी कर वेब के ऐलान को मानाने से इनकार कर दिया. इस पर देवासिंह बोचल्या को गिरफ्तार कर लिया. (राजेन्द्र कसवा:p. 125-126)

23 अगस्त 1934 ई. को किसानों व ठिकानेदारों के बीच समझौता - देवीसिंह बोचल्या की गिरफ़्तारी पर विचार करने के लिए शेखावाटी के प्राय: प्रमुख व्यक्ति सीकर पहुंचे. ठाकुर देशराज भी सीकर पहुँच गए. सब लोगों ने सीकर के पास भैरूपुरा में बैठक की. इसमें देवी सिंह की गिरफ़्तारी का विरोध किया गया तथा किसान पंचायत ने गोरुसिंह कटराथल को मंत्री नियुक्त कर उन्हें पूरा अधिकार दिया गया कि वे अपने स्तर पर कुछ भी निर्णय ले सकते हैं. सीकर में इकट्ठे होने वाले जाटों की संख्या को देख कर सीकर के अधिकारी घबरा गए. उन्होंने पंचों को गेस्ट हाऊस में बुलाया और अपनी तकलीफें बताने को कहा. पञ्च लोग अधिकारियों से मिले. अफसरों द्वारा साम-दाम-दण्ड-भेद की नीति अपनाई गयी पर स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. अंत में विवश होकर मि. वेब ने फिर समझौते की बातचीत चलाई. कुंवर रतन सिंह, ठाकुर झम्मन सिंह एडवोकेट एवं मंत्री अखिल भारतीय जाट महासभा, विजयसिंह पथिक आदि के सहयोग से 23 अगस्त 1934 ई. को किसानों व ठिकानेदारों के बीच समझौता हो गया. ठिकाने की और से ए.डब्ल्यू.टी.वेब (A.W.T. Webb), प्रशासक सीकर, दीवान बालाबक्ष रेवेन्यु अफसर, मेजर मलिक मोहम्मद हुसैन खान अफसर इंचार्ज पुलिस आदि तथा किसानों की और से हरीसिंह बुरड़क पलथाना, अध्यक्ष सीकरवाटी जाट पंचायत, गोरुसिंह कटराथल, उपमंत्री जाट किसान पंचायत, पृथ्वी सिंह गोठड़ा, ईश्वरसिंह भैरूपुरा तथा पन्नेसिंह बाटड ने समझौते पर हस्ताक्षर किये. (डॉ पेमाराम:p.108)

किसानों के लिए भारी सफलता - इस समझौते के अनुसार मास्टर चंद्रभानसिंह तथा देवासिंह को रिहा कर दिया गया. समझौते में संवत सन 1933 का लगान एक माह के भीतर देना था. सन 1934 में लगान नहीं बढेगा. फसल ख़राब हुई तो लगान कम किया जायेगा. सन 1934 के पश्चात् लगान एक निश्चित समय के लिए तय किया जायेगा. इसके लिए किसान पंचायत से सलाह-मशविरा किया जायेगा. यथाशीघ्र भूमि का बंदोबस्त किया जायेगा. प्रत्येक तहसील में दो-दो किसान प्रतिनिधि चुने जायेंगे जो किसानों की समस्याओं बाबत मि . वेब से बातचीत करते रहेंगे. समस्त लाग-बाग़ समाप्त की जाएँगी. जयपुर रियासत के कानून के अनुसार जमीन पर किसान का मौरूसी अधिकार होगा. किसान पंचायत द्वारा सुझाये पांच गाँवों में सीकर ठिकाने द्वारा स्कूलें खोली जाएँगी. गोचर भूमि सबके उपयोग के लिए रहेगी. जाटों को भी सरकारी नौकरी में रखा जायेगा. ठिकाने की सीमाओं में माल लाने-ले जाने में जकात नहीं ली जाएगी. इस समझौते में बेगार, नजराना, चिकित्सा आदि के बारे में उचित आदेश दिए गए. (राजेन्द्र कसवा:p.126)

यह समझौता किसानों के लिए भारी सफलता थी क्योंकि इसमें ठिकाने से अनेक रियायतें व सुविधाएँ किसानों को प्राप्त हुई थीं. यह किसानों की सामंती शक्ति के खिलाफ न केवल भारी विजय थी बल्कि किसानों की संस्था सीकरवाटी जाट किसान पंचायत को भी मान्यता दी गयी थी जो किसानों के हितों के लिए संघर्ष कर रही थी. इस समझौते द्वारा किसानों की अधिकांश मांगे मान ली गयी थी. (डॉ पेमाराम:p.110)

किसान 23 अगस्त 1934 के समझौते से संतुष्ट हो गए और अपने काम धंधे लग गए. किसानों की सफलता से ठिकाने के अधिकारी और राजपूत जागीरदार नाराज थे. वे समझौते खो ख़त्म करने के लिए षडयंत्र रचने लगे. अधिकारी कभी गोचर भूमि पर लगान लगाने की बात करते तो कभी घी , तम्बाकू पर जो कस्टम माफ़ हो गया था, उसे फिर लगाने की बात करते. ठिकाने के अधिकारियों ने बेईमानी करना शुरू कर दी. चैनपुरा के चौधरी के पास लगान चुकाने की रशीद थी फिर भी लगान दुबारा माँगा गया. जिन खेतों को किसानों ने कभी जोता नहीं था और जिनमें ठिकाने ने ही घास पैदा करवाई थी, उन खेतों का लगान भी माँगा जाने लगा. ये छोटी बातें तो किसानों ने बर्दास्त कर ली लेकिन ठिकाने ने फसल ख़राब हालत देखते हुए भी समझौते के खिलाफ सीकर जाट पंचायत से राय लिए बिना लगान ज्यादा तय कर दिया तो चौधरियों ने इसका प्रतिरोध किया. किसान संगठित होने लगे और और लगान की वसूली बिलकुल बंद हो गयी. (डॉ पेमाराम: p.111)

24 दिसंबर 1934 का अध्यादेश - सीकर ठिकाने में आन्दोलन होने लगे और किसानों ने लगान देना बंद कर दिया तब 24 दिसंबर 1934 ई. को जयपुर सरकार ने दो अध्यादेश जारी किये. इनके अनुसार जागीरदारों और किसानों के बीच संबंधों और समस्याओं के अध्ययन हेतु एक कमेटी का गठन किया जायेगा. लगान की छपी हुई रशीदें दी जाएँगी. लगान देने से इनकार करना दण्डनीय अपराध होगा. किसानों को उकसाने वालों और लगान नहीं देने वालों को जयपुर स्टेट की सीमा से बाहर किया जायेगा. इस क़ानून से सीकर ठिकाने के प्रशासन को और कड़े अधिकार मिल गए तथा उनका हाथ मजबूत हो गया. 31 जनवरी 1935 ई. को जुडिसियल आफिसर, रेवेन्यु मेंबर और पुलिस इंचार्ज के साथ सीकर ठिकाने की सशस्त्र पुलिस ने सीकर जाट पंचायत के सदस्यों के साथ 16 मुख्य जाट नेताओं को, जिनमें हरी सिंह, ईश्वर सिंह, पृथ्वी सिंह, गोरू सिंह, पन्ने सिंह, गणेश राम, सूरज सिंह, तेजा सिंह, गंगा सिंह आदि प्रमुख थे, किसानों को लगान न देने के लिए भड़काने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.[6] इन गिरफ्तारियों पर किसानों में भारी असंतोष फैला और आस-पास के गाँवों से हजारों की संख्या में किसान सीकर पहुँच गए और उन्होंने सीकर प्रशासक मि. ए. डब्ल्यू. टी. वेब के बंगले को चारों और से घेर लिया और अपने नेताओं की रिहाई की मांग की एवं साथ ही पंचपाना शेखावाटी ठिकानों की तरह चार आना प्रति रूपया लगान में भी माफ़ी की मांग की.यह स्थिति चार-पांच दिन तक रही. जब स्थिति गंभीर हो गयी तो सीनियर अफसर वेब के निवेदन पर जयपुर से एक सशस्त्र पुलिस टुकड़ी शांति और व्यवस्था बनाये रखने के लिए सीकर भेजी गयी. सीकर पुलिस और जयपुर से आई अतिरिक्त सशस्त्र पुलिस ने मिलकर स्थिति को नियंत्रण में किया और किसानों को निर्देश दिया कि वे सीकर से तत्काल चले जावें. (दी स्टेट्समेन दिनांक 16 फरवरी 1935),(डॉ पेमाराम:p.113)

15 मार्च 1935 का समझौता - जब यह देखा गया कि राजस्व वसूली नहीं हो रही है, कानून व्यवस्था उत्तरोत्तर ख़राब होती जा रही है , सीकर के सीनियर अफसर वेब ने ठिकाने में चलने वाले इस संकट को ख़त्म करने हेतु सीकरवाटी जाट किसान पंचायत के प्रतिनिधियों को वार्ता के लिए फिर आमंत्रित किया. पंचायत ने अपनी और से दो प्रतिनिधि सर छोटूराम और कुंवर रतनसिंह भरतपुर को वार्ता करने हेतु नियुक्त किया. अंत में 10 मार्च 1935 ई. को मि. वेब से एक समझौता हो गया. समझौते के अनुसार रावराजा सीकर ने 15 मार्च 1935 को पिछली रियायतों के अलावा निम्न सहूलियतें और देने की घोषणा की- शीघ्र लगान अदा करने वालों को छूट, यूरोपीय अनुभवी सेटलमेंट आफिसर नियुक्त करना, जाट आफिसरों को उच्च पदों पर नियुक्त करना, जाटों द्वारा हाथी पर सवारी पर कोई रोक न लगाना, लगान में मतभेद होने पर उचित जाँच करना, जेल गए जाटों को छोड़ना, सात बीघा का एक प्लाट उपयुक्त जगह पर 'जाट बोर्डिंग हाऊस' हेतु निशुल्क आवंटित करना.(डॉ पेमाराम:p.114)

खुड़ी में गोलीकांड 1935

संभावना यह थी कि ठिकानेदारों के किसानों के साथ हुए दोनों समझौते 23 अगस्त 1934 और 15 मार्च 1935 अब अवश्य ही अमल में आएंगे किन्तु इस समझौते के ठीक पांचवें दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने सारा खेल बिगड़ दिया. 20 मार्च 1935 को खुड़ी गाँव में एक जाट लड़की का विवाह था. जाट घोड़ी पर बैठकर तोरण मारना चाहते थे परन्तु वहां के राजपूत भौमियों ने ऐसा करने से रोक दिया. जाटों ने सीकर के अधिकारियों से भौमियों के इस अनुचित हस्तक्षेप के खिलाफ कार्यवाही करने की प्रार्थना की. सीकर के अधिकारियों ने भौमियों को नेक सलाह देने के बजाय दुल्हे के एक सम्बन्धी को गिरफ्तार कर लिया. इसका नजीता यह हुआ कि भौमियों का दिमाग और शह पर चढ़ गया और उन्होंने दूसरे दिन 22 मार्च 1935 को रतनाराम बजिया का , जबकि वह ठाकुरों की कोटड़ी के सामने से जा रहे थे, सर काट दिया. जाट इस पर भी शांत रहे. उन्होंने तोरण मारने के लिए धरना दे दिया, बारात वापस न की. जाट व राजपूत दिन-प्रतिदिन बड़ी संख्या में एकत्रित होने लगे. स्थिति गंभीर होती गयी. तब 27 मार्च 1935 को कैप्टन वेब स्वयं खुड़ी पहुंचे और जाटों और राजपूतों को बिखर जाने का आदेश दिया. राजपूत तो बिखर गए, परन्तु जाट डटे रहे. तब वेब ने लाठीचार्ज का हुक्म दे दिया. लाठी चलाने में गाँव के ठाकुरों ने भी आगे बढ़कर भाग लिया. वेब के सामने ही बर्बरता का खुला प्रदर्शन हुआ. निहत्ते किसान जमीन पर लेट गए. इस काण्ड में दो आदमी जान से मरे और 100 के लगभग घायल हुए. [बीकानेर कोंफिड़ेंसियल रिकोर्ड, फ़ाइल न. 29-सी, रा.रा.ए. बीकानेर, दी सन्डे स्टेट्समेन 31 मार्च 1935] इस घटना पर महात्मा गाँधी ने 'हरिजन' में बड़े कड़े शब्दों में अपनी टिपण्णी लिखी. "जयपुर राज्य के अंतर्गत सीकर के ठिकाने में खुड़ी नाम का एक छोटा सा गाँव है. ...गत 27 मार्च को राजपूतों की एक टोली ने जाटों की एक बारात को घेर लिया और बेचारे निहत्ते जाटों पर उसने बुरी तरह लाठियां बरसाईं. गुस्ताखी उन बारातियों की यह थी कि उनका दूल्हा घोड़े पर स्वर था. ...राजपूतों ने इस लाठीचार्ज के पहले ही एक जाट को क़त्ल कर दिया... आशा करनी चाहिए कि राज्य के अधिकारी इस मामले की पूरी तहकीकात करेंगे और गरीब जाटों को ऐसा उचित संरक्षण देंगे की जिससे वे उन सभी अधिकारों को अमल में ला सकें जो मनुष्य मात्र को प्राप्त हैं." (ठाकुर देशराज: जाट जन सेवक,पृ.279-280),(डॉ पेमाराम:p.116)

जयपुर सरकार का कड़ा रुख - खुड़ी कांड के बाद सीकर के अधिकारियों ने जाटों पर हो रहे अत्याचारों पर कोई ध्यान नहीं दिया. सीकर में जो भी जाट आया, पुलिस वालों ने उसे पकड़ा और पीटा. जो आदमी सीकर में माल बेचने गया उसको पीटा और माल छीन लिया. जयपुर के अधिकारियों ने भी जाटों की मांगों पर कोई ध्यान नहीं दिया. उलटे जाटों का दमन करने के लिए कुछ कठोर कदम उठाये. 10 अप्रेल 1935 को जयपुर सरकार ने दो आदेश निकले. एक आदेश से आठ बहरी नेताओं को जयपुर राज्य से निष्कासित कर दिया. ये लोग थे- 1 .बाबा नरसिंहदास अग्रवाल नागौर, 2 . कुंवर रतनसिंह भरतपुर, 3 . ठाकुर देशराज भरतपुर, 4. हुकुम सिंह और 5.भोला सिंह, उपदेशक अखिल भारतीय जाट महासभा, 6. मूलचंद्र अग्रवाल रींगस, 7.तुलसीराम मन्सुदा आगरा, तथा 8. रामानंद उर्फ़ दयानंद जाट भरतपुर [जयपुर ज्यूडिसियल रिकार्ड, फाईल न. 4326 , रा.रा.अ. बीकानेर]. दूसरे आदेश से सीकरवाटी जाट पंचायत और जाट किसान सभा को अवैधानिक संस्थाएं घोषित कर लोगों को इसमें भाग लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया. साथ ही सीनियर अफसर कैप्टन वेब को इन आदेशों को लागू करने तथा ठिकाने में शांति बनाये रखने के लिए विशेष अधिकार प्रदान किये. (दी जयपुर गजट, असाधारण, 10 अप्रेल 1935), (डॉ पेमाराम:p.117)

भैरूपुरा में लगान वसूली - जाट अब गाँवों में संगठित होने लगे. उनकी और से अब गाँवों में सामूहिक प्रतिरोध किया जाने लगा, जिससे गाँवों में स्थिति तनावपूर्ण होने लगी. भैरूपुरा में जाटों ने राजस्व अधिकारियों को लगान वसूल नहीं करने दिया. स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गयी की कैप्टन वेब को को 22 अप्रेल 1935 को लगान वसूल करने स्वयं जाना पडा. स्त्रियों ने कैप्टन वेब को गाँव में घुसने में बाधा पहुंचाई. 200 सीकर पुलिस आदमियों की सहायता से गाँव को घेरकर वह लगान जबरदस्ती वसूल कर लाये. (डॉ पेमाराम:p.118)

कूदन में क्रूरता का तांडव: 25 अप्रेल 1935

यह वास्तविकता है कि कूदन पूरी सीकर वाटी का चेतना केंद्र बन गया था. कूदन में ही कालूराम सुंडा तथा गणेशराम महरिया जैसे किसान नेता थे. पृथ्वी सिंह गोठड़ा का कूदन में ससुराल था. कैप्टन वेब 25 अप्रेल 1935 को कूदन पहुंचा तो वहां आस-पास के गाँवों से बड़ी संख्या में जाट एकत्रित हो गए थे और राजस्व अधिकारियों को लगान वसूल नहीं करने दिया और विरोध को तैयार हो गए. (राजेन्द्र कसवा,p.134)

25 अप्रेल 1935 को कूदन में ग्रामीणों ने देखा कि सैंकड़ों घुड़सवारों ने गाँव को चारों और से घेर लिया है. अन्य गाँवों के बहुत से किसान उपस्थित थे. आन्दोलन का नेतृत्व कूदन ही कर रहा था. भीड़ ने आम सभा का रूप ले लिया. कुछ देर पश्चात रियासती पुलिस के दो सिपाही बखाल में पानी भरने के लिए गाँव के कुए पर आये. गाँव वालों ने उनको पानी भरने से रोक दिया. उसी समय तहसीलदार वगैरह भी आ गए. कुए के निकट ही धर्मशाला है. उसमें बैठकर तहसीलदार ने गाँव के प्रमुख व्यक्तियों को बुलाया. लगान के मुद्दे पर देर तक बात चली और यह सहमती बनी कि लगान चुका देंगे. (राजेन्द्र कसवा,p.136)

धापी दादी का विद्रोह - जिस वक्त धर्मशाला में गाँव के प्रमुख व्यक्तियों के साथ बातचीत चल रही थी, उसी समय गाँव की एक दबंग महिला धापी दादी अपनी भैंस को पानी पिलाने कुए पर आई थी. उसने सुना कि लगान सम्बन्धी चर्चा चल रही है, तो वह कुछ देर खड़ी रही. तभी बातचीत करके गाँव के चौधरी धर्मशाला से बहार निकले. किसी के पूछने पर चौधरियों ने जवाब दिया, 'हाँ हम लगान चुकाने की हामी भर आये हैं'. यह वाक्य धापी ने सुना तो उसके तन-मन में जैसे आग लग गयी. उसके हाथ में भैंस हांकने वाली कटीली छड़ी थी. धापी ने क्रोध में आकर एक छड़ी चौधरी पेमाराम महरिया के सर पर मारी और आवेश में आकर उसे अपशब्द कहे. पेमाराम का साफा कटीली छड़ी के साथ ही धापी के हाथ में आ गया. पेमा राम इस आकस्मिक वार से हक्का-बक्का रह गया और जान बचाने के लिए धर्मशाला की और दौड़ा. पेमा राम को भागकर धर्मशाला में घुसते लोगों ने देखा. धापी दादी छड़ी में उलझे पेमाराम के साफे को लहरा-लहरा कर पूछ रही थी, 'इन दो चार लोगों को किसने अधिकार दिया कि वे बढ़ा हुआ लगान चुकाने की हामी भरें?' सभी ने धापी दादी के प्रश्न को जायज ठहराया.(राजेन्द्र कसवा,p.138)

वास्तव में धापी दादी की बात सही थी. लगान चुकाने का फैसला किसान पंचायत ही कर सकती थी. चौधरियों को तो यों ही लगान में हिस्सा मिलता था. उपस्थित जन समुदाय क्रोधित हो गया. धापी दादी ने आदेश दिया, 'मेरा मूंह क्या देख रहे हो इन चौधरियों को पकड़कर धर्मशाला से बाहर ले जाओ.' बाहर शोर बढ़ रहा था. धर्मशाला में बैठे तहसीलदार, पटवारी, अन्य कर्मचारी और गाँव के चौधरी भय से थर-थर कांपने लगे. उन्हें लगा कि यह भीड़ अब उनकी पिटाई करेगी. चौधरियों ने तहसीलदार सहित कर्मचारियों को बगल के पंडित जीवनराम शर्मा के घर में छुपा दिया. इस भागदौड़ में ग्रामीणों ने एक सिपाही को पकड़कर पीट दिया जो ग्रामीणों को अपमानित कर रहा था. (राजेन्द्र कसवा,p.138)

किसान और रियासती पुलिस आमने सामने -कूदन गाँव के दक्षिण में सुखाणी नाम की जोहड़ी है. जोहड़ी क्या, विशाल सार्वजनिक मैदान जैसा भूखंड था, उसमें किसानों का विशाल जनसमूह खड़ा था. कुछ ही दूरी पर रियासत और रावराजा की पुलिस खड़ी थी. दृश्य कुछ वैसा ही था, जैसे युद्ध के मैदान में सेनाएं आमने-सामने खड़ी हों. अधिकांश किसान निहत्थे थे. सामने घुड़सवार पुलिस थी. जाहिर था यदि हिंसा हुई तो किसान मरे जायेंगे. यही सोच कर पृथ्वीसिंह गोठडा जनसमूह के बीच गए और समझाया, 'हम हिंसा से नहीं लड़ेंगे. हम शांतिपूर्ण विरोध करेंगे.' (राजेन्द्र कसवा,p.139)

कैप्टन वेब द्वारा फायरिंग का हुक्म - कैप्टन वेब ने जनसमूह को तितर-बितर होने का आदेश दिया और साथ ही बढ़े हुए लगान को चुकाने का हुक्म दिया. वेब की चेतावनी का किसानों पर कोई असर नहीं हुआ. वे अपनी जगह से हिले नहीं. मि. वेब ने निहत्थे किसानों पर गोली चलाने का हुक्म दे दिया. जनसमूह में कोहराम मच गया. लोग इधर-उधर भागने लगे. चीख-पुकार मच गयी. जब तूफ़ान रुका तो पता लगा कि पुलिस की गोली से निकटवर्ती गाँव गोठड़ा के चेतराम, टीकूराम, तुलछाराम एवं अजीतपुरा गाँव के आशाराम शहीद हो गए. सचमुच गाँव का चारागाह मैदान युद्ध स्थल बन गया. (राजेन्द्र कसवा,p.136)

इसी बीच जयपुर रियासत की सशत्र पलिस आ धमकी. दिन के 12 बजे कैप्टन वेब एवं एक अन्य अधिकारी बापना सहित 500 पुलिस के सिपाही कूदन गाँव के उस चौक में आये, जहाँ छाछ-राबड़ी की कड़ाही अब भी रखी थी और बड़ी परात में रोटियां थीं. लेकिन उपस्थित जनसमूह नहीं था. गोलीकांड के बाद काफी किसान एक चौधरी कालूराम सुंडा के घर पर एकत्रित हो गए थे. यह बात गाँव कूदन के ही राजपूत सिपाही मंगेजसिंह को पता थी. चौधरी कालूराम सुंडा के घर के दरवाजे पर कैप्टन वेब खड़ा हो गया. चौधरी कालूराम अपनी हवेली के प्रथम मंजिल के कमरे में थे, अंग्रेज अफसर ने कड़क आवाज में हुक्म दिया, 'कालू राम नीचे आओ.'(राजेन्द्र कसवा,p.139)

चौधरी कालूराम नीचे नहीं आये. जब पुलिस हवेली पर चढ़ने लगी तो छत से भोलाराम गोठड़ा ने राख की हांड़ी कैप्टन वेब की और फैंकी वेब ने गुस्से में आकर तुरंत गोली चला दी गोली का निशाना तो चूक गया लेकिन भोलाराम गोठड़ा के चेहरे पर गोली के कुछ छर्रे लगे. इसके पश्चात् वेब खुद छत पर गया. वेब ने ऊपर से किसी हमले की आशंका के परिपेक्ष्य में सर पर एक छोटी खात रखी और छत पर चढ़ गया. ऊपर चढ़े सभी किसानों को गिरफ्तार कर लिया. गाँव कूदन के ही राजपूत सिपाही मंगेजसिंह ने चौधरी कालू राम को गिरफ्तार कर बेब को सौंपा. वेब के हुक्म के अनुसार कालू राम को दोनों हाथ बांध कर पूरे कूदन में घुमाया. कालू राम के घर काम करने वाले चूड़ाराम बलाई को भी गिरफ्तार कर लिया. (राजेन्द्र कसवा,p.140)

राख फैंकने की घटना से अपमानित कैप्टन वेब ने चीख कर हुक्म दिया, 'घर-घर की तलासी लो !' 'कूदन गाँव को जलादो !!' (राजेन्द्र कसवा,p.139)

पुलिस के सिपाही घर-घर में घुसने लगे. घरों की तलासी ली जाने लगी. जो भी पुरुष दिखाई दिया, उसे गिरफ्तार कर लिया. कूदन का ठाकुर सिपाही मंगेजसिंह तलासी लेने और महिलाओं को धमकाने में सबसे आगे था. उनके अमूल्य सामान को नष्ट करने में मजा आ रहा था. किसानों के घरों में घी की भरी हुई हांड़ी रखी थी. मंगेज सिंह जिस भी घर में घुसता, सबसे पहले वह घी की मटकी उठाता और फर्श पर जोर से मारता. किसान के लिए अमृत बना घी फर्श पर बहने लगा. सामान घरों से निकला गया, बर्तन-भांडे तोड़े गए एवं लुटे गए. घरों में फैलाये गए दूध और घी की सड़ांध से पूरा गाँव महक गया. (राजेन्द्र कसवा,p.136)

एक किसान का घर बंद था. पुलिस ने भूराराम खाती को बुलाया और कहा, 'इस किवाड़ को तोड़ दो.' भूरा राम ने आदेश मानने से इनकार कर दिया. उसे गिरफ्तार कर लिया. (राजेन्द्र कसवा,p.140)

25 अप्रेल 1935 को कुल 106 किसानों को गिरफ्तार किया गया. अधिकांश को देवगढ़ जेल में 81 दिन तक बंद रखा गया. कुल 106 में से 57 किसान कूदन गाँव के थे. गिरफ्तार लोगों में 13 वर्ष से 70 वर्ष तक के लोग थे. सीकर उपकारागार के रिकोर्ड के अनुसार दो को छोड़ सभी जाट थे. कालूराम के घर काम करने वाला चूड़ाराम बलाई एक मात्र दलित था. दूसरा भूराराम खाती था. (राजेन्द्र कसवा,p.142)


इस संघर्ष में कूदन के जिन किसानों ने आगे बढ़कर भाग लिया और अंत तक गिरफ्तार नहीं हुए, उनमें प्रमुख थे - गोविन्द राम सुंडा, मुकन्दा राम सुंडा, गोरु राम सुंडा, सुखदेवा राम एवं रामू राम.

83 वर्षीय रामेश्वर सुंडा ने बताया कि उन दिनों गाँव-गाँव में जन जागरण अभियान चरम पर था. भूरसिंह बड्सरा गांवालों को निर्भीक बनाने का आव्हान करते. आगे चलकर द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया तो गाँवों में अंग्रेजों की हार की कामना की जाती. नवयुवक दो दल बनाते. एक अंग्रेजों का दूसरा जर्मन का. नकली लड़ाई लड़कर अंग्रेजों की हार का प्रदर्शन किया जाता. (राजेन्द्र कसवा,p.142)

एक अन्य किसान ने 25 अप्रेल 1935 की घटना का वर्णन करते बताया कि धापी दादी के झाड़वार को झेलकर जब पेमा दादा धर्मशाला में गया तो पूरा सरकारी अमला चौकन्ना हो उठा. एक सिपाही नंगी तलवार लेकर, धर्मशाला के गेट पर पहरा देने लगा. गाँव के गुवाड़ से बहुत से किसान लाठियां लेकर धर्मशाला की और चल पड़े. सिपाही का ध्यान इस जत्थे की और था. तभी गोरु राम कोलीड़ा ने पीछे से घात लगाकर सिपाही की तलवार छीन ली. सिपाही को जमीन पर गिरा दिया. तहसीलदार भाग कर पंडित जीवनराम की हवेली में छुप गया. कहा जाता है कि धापी दादी ने एक सिपाही के भी लाठी मारी थी. गोलीकांड के बाद पूरे गाँव में चीख-पुकार सुनाई देने लगी थी. पुरुषों में भगदड़ मच गयी थी. कोलीड़ा गाँव का नारायण मील भाग कर एक ऊँचे खेजड़ी के पेड़ पर चढ़ गया. उस पर गोली चलाई परन्तु तने की आड़ में बच गया. (राजेन्द्र कसवा,p.143)


पालड़ी गाँव का एक किसान लाठी लेकर, गाँव के गुवाड़ से भाग छूटा. एक घुड़ स्वर की उस पर नजर पडी. घोड़े को दौड़ाते हुए उसने दूर से किसान को चेतावनी दी, 'लाठी फेंक दो, नहीं तो गोली मार दी जाएगी.' किसान अनसुना करता चलता रहा. तब तक घुड़ स्वर उसके नजदीक आ गया. अकस्मात् ही किसान पीछे मुड़ा और घोड़े की नाक पर लाठी का वार कर दिया. इस वार से घोडा बेकाबू हो गया और जिधर से आया था, उसी दिशा में पलट कर पूरे वेग से दौड़ गया. किसान की युक्ति काम आई. वह भी पूरी शक्ति से , जूती हाथों में ले, अपने गाँव की और भाग छूटा. (राजेन्द्र कसवा,p.144)


कूदन गाँव के लादूराम पुत्र हनुमानाराम महरिया का ब्याह निश्चित हो गया था. इसी बीच कूदन गोलीकांड हो गया. हनुमानाराम महरिया जेल चला गया. तब लादूराम के ननिहाल वालों ने निश्चित तिथि पर लादूराम की बारात बनाई और शादी करने चल पड़े. लादूराम का ननिहाल सांखू गाँव में था. (राजेन्द्र कसवा,p.144)

चौधरी शिवबक्स महरिया - सन 1935 में भी कूदन गाँव में करीब दस हवेलियाँ थी. सभी हवेलियों के दरवाजे गोलीकांड के दिन बंद थे. लेकिन मुख्य चौधरी शिवबक्स महरिया की हवेली खुली. यहाँ भय के कोई चिन्ह नहीं थे. शिवबक्स रावराजा सीकर का अतिविश्वस्नीय व्यक्ति था. गोलीकांड के बाद गाँव की हालत ख़राब हो गयी थी. शिवबक्स महरिया ने स्वयं ने पूरे गाँव का लगान चुका दिया था. बाद में शांति होने पर गाँव वालों ने एक-एक करके सबका लगान शिवबक्स महरिया को दे दिया था. शिवबक्स महरिया के कोई संतान नहीं थी. उन्होंने अपने भाई के बेटे राम देव सिंह को गोद लिया जो आगे चलकर राजस्थान सरकार में मंत्री बने . (राजेन्द्र कसवा,p.143)

सीकर वाटी में सामंतों से संघर्ष करने वालों में कूदन के किसान गणेशराम महरिया का नाम आज भी श्रद्धा के साथ लिया जाता है. वर्तमान पीढ़ी 'गणेश दादा' के नाम से याद करती है. गणेश राम महरिया का नाम स्वतंत्रता सेनानियों की सूचि में नहीं है जबकि वे किसान आन्दोलन की अगली कतार में थे. उनके पुत्र हरिप्रसाद महरिया ने बताया कि कूदन के गोलीकांड के दिन सब घरों के दरवाजे बंद हो गए थे. लेकिन महरिया की पोली के भीतर एक हवेली बेधड़क खुली थी. वह थी शिवबक्ष महरिया की हवेली. (राजेन्द्र कसवा,p.146)

इस संघर्ष में कूदन के जिन किसानों ने आगे बढ़कर भाग लिया और अंत तक गिरफ्तार नहीं हुए, उनमें प्रमुख थे - गोविन्द राम, मुकन्दा राम, गोरु राम, सुखदेवा राम एवं रामू राम.

क्रूरता का तांडव अन्य गाँवों में जारी

गोठड़ा गाँव में कैप्टन वेब - कैप्टन वेब को कूदन के अत्याचार से शांति नहीं मिली. वह कूदन काण्ड के दूसरे दिन (26 अप्रेल 1935) सात लारियों में पुलिस लेकर दमन के लिए निकले और गोठड़ा गाँव पहुंचे. गोठड़ा में चौधरी भोलासिंह बड़े हिम्मत वाले आदमी थे. उन्होंने कहा जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं होंगी और जाट पंचायत इजाजत नहीं देगी, तब तक लगान नहीं देंगे. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा वहां के प्रमुख चौधरी रामबक्ष (पृथ्वी सिंह के पिता) से मनचाहा लगान वसूल करना चाह. उनके मना कर देने पर उन्हें तथा स्त्रियों व लड़कों को धूप में खड़ा कर तंग किया . कैप्टन वेब पुलिस को लेकर उनके मकान में घुस गए और उनके घर का तमाम अनाज, कपडे और रूपया-पैसा निकाल लिया. खेती के औजार, रोटी बनाने के बर्तन तक नहीं छोड़े और इस प्रकार उनके घर की पूर्ण लूट की. उसी दौरान जितना नुकशान पृथ्वी सिंह- रामबक्ष का हुआ, सीकरवाटी में किसी और का नहीं हुआ. किन्तु यह परिवार झुका नहीं. बाद में गाँव के दूसरे चौधरी हरदेवसिंह से 600 रुपये उनके सब पड़ौसी किसानों के लगान के वसूल किये. (डॉ पेमाराम,पृ.119)

पलथाना गाँव में कैप्टन वेब - गोठड़ा से चलकर कैप्टन वेब पुलिस बल सहित पलथाना पहुंचा.यह हरिसिंह बुरड़क का गाँव था जो किसान आन्दोलन के प्रमुख नेता थे. वे 25 गाँवों के सरपंच थे. पञ्च-मंडली के भी अध्यक्ष थे. झुंझुनू सम्मलेन से लौटते समय उत्तर प्रदेश के निवासी मास्टर चन्द्रभान को साथ ले आये थे और गाँव में स्कूल प्रारंभ कर दी थी , जिसमें चन्द्रभान पढ़ाते थे. इससे पलथाना में तेजी से लोग साक्षर होने लगे. यह सब रावराजा और अंग्रेज अफसर को चिढाने के लिए काफी था. हरिसिंह ने लगान देने से मना कर दिया. क्रोधित वेब ने हरी सिंह का मकान भी ढहाने का आदेश दे दिया लेकिन मि. यंग ने ऐसा करने से रोक दिया. हरी सिंह की माँ, इन अंग्रेज अधिकारीयों के लिए दूध लेकर आई. कैप्टन वेब ने घृणा से मुंह फेर लिया. यंग अधिक व्यावहारिक था. उसने मुस्कराकर दूध अपने हाथ में ले लिया. बातचीत का आधार बन गया. लोगों ने कहा, 'स्कूल ने क्या बिगाड़ा था? आप लोग तो स्वयं शिक्षा के पक्ष में रहे हैं? यंग के बात समहज में आ गयी. उसने पूछा, 'स्कूल कि मरम्मत के लिए कितने रुपये लगेंगे? गाँव वालों ने 300 रुपये बताये. यंग ने तीन सौ रुपये गाँव में दे दिए लेकिन लगान न देने के लिए. यहाँ दो जाटों से तमाम गाँव के लगान का रूपया वसूल किया और जुरमाना लिया. यहाँ मास्टर चंद्रभानसिंह और चार मुखिया जाट हरिसिंह बुरड़क, तेजसिंह बुरड़क, बिडदा राम बुरड़कपेमा राम बुरड़क को गिरफ्तार कर लिया और स्कूल भवन को पूरी तरह नष्ट कर दिया. इन लोगों को पीटा गया और बाद में इन्हें गाँवों में घुमाते हुए लक्ष्मणगढ़ ले गए. वहां तहसील में इन्हें जूतों से पीटा गया और शहर में अपमानित कर जुलुस निकाला. इन्हें जूतों से पिटवाते हुए इसलिए घुमाया कि लोग जन सकें की आन्दोलनकारियों की इस तरह दुर्गति की जा सकती है. इस प्रकार के अन्यायों का ताँता बंध गया था और गाँवों में जाटों को पीटा जाने लगा. (डॉ पेमाराम, पृ.119)

किसान आन्दोलन के प्रमुख नेता पृथ्वीसिंह गोठड़ा का कूदन गाँव में सुंडा गोत्र में ब्याह हुआ था. कूदन की धापी दादी पृथ्वी सिंह का बहुत सम्मान करती थी. कूदन काण्ड के पश्चात् पृथ्वी सिंह को गिरफ्तार कर लिया था. उन्हें जयपुर जेल में बंद कर दिया था. रियासत ने पृथ्वी सिंह को मुख्य षड्यंत्रकारी माना था, जिसने सीकर वाटी के किसानों को रावराजा और रियासत के विरुद्ध भड़काया था. कूदन के दो गवाह यदि बयान दे देते कि पृथ्वी सिंह ने किसी को नहीं भड़काया है तो केस काफी कमजोर हो जाता. लेकिन आश्चर्य कि कूदन उनका ससुराल होने के बावजूद कोई गवाह नहीं मिल रहा था, उस शख्स के लिए जिसने अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया था. किन्तु कुछ किसानों के लिए यह अपमानजनक स्थिति थी. उस दिन दिनारपुरा गाँव के काना राम एवं कोलिड़ा के महादा राम धापी दादी के पास आये. इन दोनों ने धापी दादी का उग्र रूप देखा. उन दोनों ने धापी दादी के समक्ष समस्या राखी, 'कूदन गाँव में पृथ्वी सिंह के पक्ष में कोई गवाह नहीं मिल रहा है. उस घर का भी कोई सदस्य तैयार नहीं है, जहाँ पृथ्वी सिंह ने सात फेरे लिए.' धापी दादी ने पूरे गाँव को धिक्कारा. गुस्सा इस बात का कि पृथ्वी सिंह शिखर नेता ही नहीं , गाँव के दामाद भी थे. उसने कहा, 'गवाह के रूप में मेरा एक बेटा ले जाओ.' वह बुदबुदाई 'ई गाम को राम निकळग्यो.'(राजेन्द्र कसवा:p.147)

भैरूपुरा गाँव - अगले दिन कैप्टन वेब एवं मि. यंग पुलिस दल के साथ ईश्वरसिंह भामू के गाँव भैरूपुरा पहुंचे. आते ही ईश्वर सिंह को गिरफ्तार कर लिया. पुरुष छुप गए तो महिलाओं ने मोर्चा संभाला. ईश्वर सिंह की पत्नी मंशी देवी ने महिलाओं का नेतृत्व किया. उसने अंग्रेज अफसरों को खरी-खोटी सुनाई. अंग्रेज अफसरों ने समझा बुझा कर गाँव से लगान ले लिया. भैरूपुरा गाँव में औरतों के बदन से उनका जेवर लगान में उतारा. चौधरी ईश्वर सिंह की पत्नी को पीटा गया और उससे लगान के 53 रुपये बकाया के स्थान पर 145 रुपये ईश्वर सिंह की गैर हाजरी में वसूल किये. (डॉ पेमाराम,पृ.119)

कनलाऊ गाँव से पिछला माफ़ हुआ 750 रुपये भी वसूल किया. अपमानित करने के लिए वहां कई जाटों की मूंछें काट दी गयी. इसी प्रकार जेठवा का बास में रामू चौधरी को पीटा और फिर उससे तमाम गाँव का 1700 रुपये लगान वसूल किया और पन्ने सिंह जाट का भी उससे लगान वसूल कर 200 रूपया जुरमाना लिया गया. उसके भी की दाढ़ी काटकर बेइज्जत किया गया. यहाँ भी स्कूल बंद करवा दिया. (डॉ पेमाराम,पृ.119)

राजास गाँव में चार जाटों की दाढी-मूंछें काटकर बेइज्जत किया गया. भूमा गाँव से औरतों का जेवर तक उतरवा लिया और गाँव से लगान के अलावा भारी जुर्माना वसूल किया गया. रोरू गाँव से 200 रुपये जुर्माना का वसूल किया गया. और वहां मास्टर को भी पकड़ कर पीटा. कटराथल गाँव की स्कूल को नष्ट कर दिया गया तथा वहां से एक-दो जाटों का लगान बनिए व ब्राह्मणों से लिया गया. (डॉ पेमाराम, पृ.120)

इस प्रकार पुलिस ने लगान वसूली के नाम पर अनेक गाँवों में तबाही मचादी. अनेक घरों को लूटा, धनाढ्य किसानों के घरों की फर्श तोड़कर खोदा, बहुमूल्य वस्तुएं नष्ट की, स्त्रियों को बेइज्जत किया, उनके गहने उतरवाए. जो किसान डर के मारे घर छोड़कर भाग गए थे उनके घरों और पशुओं को नीलाम कर दिया. एक तरह से आतंकराज कायम कर मार्शल ला की स्थिति पैदा करदी. बाहरी व्यक्तियों, यहाँ तक कि सर छोटू राम तक को सीकर में प्रवेश नहीं करने दिया गया. [दी हिंदुस्तान टाइम्स 7 मई 1935 , पृ. 16 , दी फ्री प्रेस जर्नल 29 मई 1935, पृ.3,(डॉ पेमाराम, पृ. 120]

अत्याचारों की देश और विदेशों में सर्वत्र चर्चा

अब स्कूलों में बच्चे पढ़ेंगे सीकर का इतिहास
शेखावाटी किसान आंदोलन की गूंज ब्रिटिश संसद में
शेखावाटी किसान आंदोलन में महिलाएं

कूदन काण्ड व सीकर के गाँवों में होने वाले अत्याचारों की चर्चा देश में फ़ैल गयी. कूदन काण्ड ऐसी घटना नहीं रही जिस पर सिर्फ जाटों ने ही आंसू बहाए. मानव मात्र से जिसे प्रेम था वे लोग विचलित हुए. उन्होंने जगह-जगह बैठकें कर शोक व्यक्त किया. मारवाड़ी संघ रानीगंज (बंगाल) ने 30 अप्रेल 1935 को अपनी मीटिंग में प्रस्ताव पास करते हुए लिखा कि यह संघटन कांग्रेस एसेम्बली के सदस्यों और जनता की दूसरी संस्थाओं से अपील करता है कि वे घटनास्थल पर अपने प्रतिनिधि भेजकर घटना की शीघ्र जाँच करावें जिससे आतंकग्रस्त जनता को शांति मिल सके. [लोकमान्य 3 मई 1935 ], (डॉ पेमाराम,पृ.121)

सीकरवाटी जाट पंचायत के सरपंच हरीसिंह बुरडक ने भारत सरकार से प्रार्थना करते हुए सारे मामले की जाँच करने के लिए एक निष्पक्ष आयोग नियुक्त करने की मांग की. [दी फ्री प्रेस जर्नल 29 मई 1935 , पृ.3] कुंवर हुकुमसिंह, अध्यक्ष, अखिल भारतीय जाट महासभा, अलीगढ ने भारत सरकार से मांग की कि वह सारा मामला अपने हाथ में लेकर सीकर के किसानों विशेषकर खुड़ी, कूदन, भैरोपुर , गोठडा आदि पर की गयी ज्यादतियों की जांचकर उनकी वाजिब शिकायतों को दूर करने का प्रयत्न करे. [दी हिंदुस्तान टाइम्स 3 मई 1935,पृ.13, (डॉ पेमाराम,पृ.121]

इसी तरह राजपूताना मध्य भारत सभा तथा आल इण्डिया स्टेट्स पीपल्स कांफ्रेंस ने भी अपनी मीटिंग में प्रस्ताव पास कर सीकर के अधिकारीयों द्वारा वहां के किसानों पर की गयी ज्यादतियों की निंदा की और जयपुर दरबार तथा भारत सरकार से इस सारे मामले की एक निष्पक्ष आयोग द्वारा जाँच करवाकर सीकर के किसानों को उचित शिकायतों को दूर करने का निवेदन किया. अखिल भारतीय जाट महासभा की प्रबंध कार्यकारिणी ने भी सर छोटू राम के सभापतित्व में दिल्ली में 5 मई 1935 को बैठक कर निम्न प्रस्ताव पास किये-

  • भारत सरकार से प्रार्थना की जय की वह सीकर की घटनाओं की निष्पक्ष जांचकर दोषी अधिकारियों को सजा दे.
  • 26 मई 1935 ई. को 'सीकर दिवस' के रूप में मनाया जाय. उस दिन काले झंडों से जुलुस निकाले जावें और विरोध सभाएं आयोजित की जावें.
  • सर छोटू राम के नेतृत्व में 15 आदमियों का एक प्रतिनिधि मंडल नियुक्त किया जावे जो 11 मई 1935 को जयपुर के वाइस प्रेसिडेंट सर बिचम से मिलकर उनके सामने सीकर के किसानों की शिकायतें पेश कर उन्हें दूर करने का प्रयत्न करें. (डॉ पेमाराम, पृ. 122)

15 मई 1935 को सर छोटू राम के नेतृत्व में 15 आदमियों का एक प्रतिनिधि मंडल जयपुर के वाइस प्रेसिडेंट सर बिचम से मिलकर जाँच की मांग की परन्तु निराशा ही हाथ लगी. सर बिचम ने यह तो माना कि सीकर घटनाएँ खेदजनक हैं और उन्हें सुधार जायेगा किन्तु जाँच करने से साफ इन्कार कर दिया. (डॉ पेमाराम,पृ.122)

इसमें संदेह नहीं कि सीकर की घटनाओं से सारा देश प्रभावित हुआ. उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर और सहारनपुर जिलों के जाटों ने भी 10 मई से 25 मई 1935 के बीच अपनी अनेक मीटिंगों में सीकर के किसानों पर की गयी अमानुषिक और बर्बरतापूर्ण ज्यादतियों की निंदा की. [जयपुर जुडिसियल रिकोर्ड, फाईल न. 2549 ऑफ़ 1935 , रा.रा.अ. बीकानेर] बंबई के बड़े-बड़े नेता जिनमें नरीमन, जमनादास मेहता और मूलराज करनदास के नाम विशेष उल्लेखनीय थे, पूरा-पूरा दबाव सीकर ठिकाने पर डाला. अमृतलाल सेठ ने अपने प्रसिद्ध गुजराती दैनिक अखबार 'जन्मभूमि' द्वारा सीकर के किसानों के पक्ष में धुआंधार प्रचार किया. कलकत्ता, बंबई, दिल्ली और इलाहाबाद के सभी दैनिक पत्रों ने भी सीकर के इन समाचारों को प्रकाशित किया. इसी बीच अखिल भारतीय जाट महासभा के आह्वान पर 16 मई 1935 को भारत भर में जाटों ने सीकर दिवस मनाया. (डॉ पेमाराम,पृ.122)

हाउस ऑफ़ कोमंस लन्दन में सीकर की गूँज - पृथ्वीसिंह गोठड़ा, गणेश राम कूदन, और गोरु सिंह कटराथल बाहर के इलाकों में जाटों के पास गए और मदद मांगी. इन लोगों के खिलाफ सीकर में वारंट थे और पुलिस चाहती थी कि ये हाथ लग जाएँ तो इन्हें पीस दिया जाये. इधर जून के प्रथम सप्ताह में कुंवर रतन सिंह, ईश्वर सिंह, गणेशराम और ठाकुर देशराज आदि बंबई गए. वहां इनके प्रयासों से सीकर के लिए जोरों का आन्दोलन आरम्भ हो गया और कई मीटिंग भी हुई जिनमें सीकर की स्थिति पर प्रकाश डाला गया. स्थिति यहाँ तक पहुंची कि जून 1935 में 'हाउस ऑफ़ कोमंस' लन्दन में सीकर की गूँज पहुंची. (डॉ पेमाराम, पृ. 122) सीकर ठिकानेदारों द्वारा आन्दोलन कारी जाटों पर किये गए अत्याचार के सम्बन्ध में हाऊस ऑफ़ कोमंस में सवाल पूछे गए. जयपुर दरबार ने इन सब के लिए सीकर के राव राजा को दोषी ठहराया. (दी स्टेट्समेन 20 जून 1935)[7]

इस प्रकार सीकरवाटी में ठिकानेदारों द्वारा किये जा रहे क्रूरतापूर्ण कार्यों की गूँज न केवल देशभर में बल्कि ब्रिटेन तक पहुँच गयी. चारों और से पड़ रहे दबाव में मि. बीचम और मि. यंग ने पृथ्वी सिंह के विरुद्ध गिरफ़्तारी वारंट को वापस लेने की घोषणा कर दी. गिरफ्तार न करने की लिखित घोषणा भी कर दी. यह सुनकर पृथ्वी सिंह आगरा से दिल्ली के लिए चल पड़े. रेल ज्यों ही सीकर पहुंची, पृथ्वी सिंह को पुलिस ने घेर लिया. उन्हें गिरफ्तार कर लिया और मि. यंग के सामने पेश किया. यंग ने पृथ्वी सिंह से कहा, 'यदि तुम माफ़ी मांगलो और भविष्य में शांति से रहने का वचन दो तो तुम्हें रिहा कर दिया जायेगा.' साधारणतया शांत रहने वाले पृथ्वी सिंह विश्वासघात से क्रोधित हो उठे. उन्होंने जबाव दिया, 'माफ़ी मांग कर अपनी माँ के दूध और जन्मभूमि को कलंकित नहीं कर सकता. जो भी सजा होगी, मुझे मंजूर होगी.' पृथ्वी सिंह पर पांच धाराओं के अंतर्गत मुक़दमा चलाया गया और जयपुर की जेल में डाला गया. जेल जाना और रिहा होना पृथ्वी सिंह के लिए साधारण कार्य था. लेकिन मी. यंग ने धोखे से गिरफ्तार किया, इससे यंग के प्रति किसानों में घृणा हो गयी थी. (राजेन्द्र कसवा:पृ. 152)

सीकर का रावराजा कल्याण सिंह अनपढ़ तो था ही और स्वभाव से सीधा अथवा भोला जान पड़ता था. जयपुर रियासत समस्त अराजकता का सेहरा उसी के सर पर बंधना चाहत थी. उच्च स्तर पर यह निर्णय लिया गया कि रावराजा को सीकर से जिलाबदर कर दिया जय. यह भी तय किया गया की गिरफ्तार नेताओं को रिहा किया जाये. इसी से आन्दोलन शांत हो सकता है. (राजेन्द्र कसवा:पृ.153)

सीकरवाटी किसानों की भारी जीत

जाटों के सारे प्रयत्न असफल हो गए. जाट डेपुटेसन जयपुर से लौट आया और दमन में कोई कमी नहीं आई.

जयपुर में किसानों के सत्याग्रह का निर्णय - अंत में दमन का मुकाबला करने के लिए यह सोचा गया कि सीकर के देहातों में दमन की चक्की में पिसकर मरने से तो अच्छा है कि जयपुर में किसान लोग आवें और सत्याग्रह करें. बाहर से भी जत्थे भेजना तय हुआ. जब यह समाचार जयपुर सरकार के उपाध्यक्ष सर बिचम को मालूम हुआ तो उनका गर्व हवा हो गया और उन्होंने सीकर के मामले में हस्तक्षेप करना स्वीकार कर लिया. (डॉ पेमाराम, पृ. 123)

किसानों की भारी जीत - इस प्रकार आखिर जयपुर को हार मान झक मारकर झुकना पड़ा और उसने सीकर के मामले में हस्तक्षेप किया जिसके अनुसार अनिश्चित समय के लिए रावराजा सीकर को ठिकाने से अलग रहने की सलाह दी गयी. तमाम गिरफ्तार हुए किसानों को रिहा किया गया और जिनके खिलाफ वारंट थे, रद्द किये गए. जून 1935 में कैप्टन वेब, सीनियर अफसर, सीकर ने रावराजा कल्याण सिंह के हस्ताक्षरों से युक्त एक विज्ञप्ति निकाली जिसमें राजस्व में पर्याप्त राहत देते हुए अन्य सुधारों की घोषणा की गयी जिसमें 1932 तक जितना भी लगान बकाया था माफ़ कर दिया गया. सीकर में स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय लड़कियों की स्कूल को 5000 रुपये का अनुदान स्वीकृत किया. ठिकाने के सेटलमेंट विभाग को निर्देश दिए गए कि वह सर्वे के काम को तत्काल पूरा करे. गाँवों में पटेलों का चयन किया गया और पटवारी व्यवस्था लागू की गयी. अनुभवी तहसीलदार नियुक्त किये गए. एफ.एस. (F.S. Young), आई. जी. जयपुर की देखरेख में सीकर पुलिस का पुनर्गठन किया गया. जिसमें मालिक मोहम्मद हुसेन को जिसने जाटों पर ज्यादा अत्याचार किये थे, हटा दिया गया और उसके स्थान पर भृगु प्रकाश को पुलिस अधीक्षक सीकर नियुक्त किया गया. राव राजा सीकर ने आशा व्यक्त की कि नए सुधर कार्यक्रम के साथ अब सीकर के किसान एक नया युग आरंभ करेंगे. सीकर के किसानों की यह भारी जीत थी. (डॉ पेमाराम,पृ.123)

इस प्रकार सीकर के किसान आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण अध्याय भारी सफलता के साथ समाप्त हुआ. बहुत सारी लाग-बागें, बेगार तथा काठ की सजा समाप्त हो गयी. खालसा इलाके में भूमि का सर्वे होकर वाजिब लगान (उपज का 2/5 हिस्सा) तय हो गया और भू-राजस्व का भारी बकाया माफ़ कर दिया. गया. इससे सीकर के किसानों को भरी आर्थिक बोझ से राहत मिली. फिर बहुत से जाटों को ठिकाने की नौकरियों में भी स्थान मिला.(डॉ पेमाराम,पृ.126)

डॉ पेमाराम (पृ.126) के अनुसार इस आन्दोलन में जिन महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने हिस्सा लिया, वे थे-

भूमि बंदोबस्त कार्य संपन्न

शेखावाटी के किसानों की लम्बी लड़ाई के बाद पैमाईस का काम शुरू हुआ. इस समय अनेक नेता जेल में थे. इसी समय सरकार ने लगान की अधिक दर लगाकर खतौनियों का विवरण करवा दिया. किसानों के साथ यह बड़ा विश्वासघात था. जिस समय नेता जेल से झूटकर आये खातौनियाँ बंट चुकी थी. उन्होंने खतौनियों के दुरुस्ती के लिए अभियान चलाया. यह भी तय किया गया कि जब तक खतौनियाँ दुरुस्त होकर नहीं आती तब तक लगान नहीं दिया जाय. इधर सरकार से बात भी जारी थी जिसमें हरलाल सिंह, नेतराम सिंह, विद्याधर कुलहरी, चौधरी घासी राम, पंडित ताड़केश्वर शर्मा आदि शामिल थे. उनके प्रयास से सरकार को झुकना पड़ा और लगान की दर कम कर खतौनियाँ दुरुस्त की गयी. इस प्रकार लगान कम कर खातौनियाँ दुरुस्ती शेखावाटी के किसानों की बड़ी विजय थी. जागीरदार अब मनचाहा लगान वसूल नहीं कर सकते थे और बेदखल भी नहीं कर सकते थे. बंदोबस्त के काम में जागीरदारों ने अड़ंगे डाले और बाधाएँ खड़ी कीं किन्तु सन 1936 से प्रारंभ हुआ यह काम 1942 में पूर्ण हो गया. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 35)

जागीरदारों में बोखलाहट - जागीरदार राज्य सरकार के इस फैसले से बौखला उठे. वे राज्य सरकार के आदेश के विपरीत मनमाना लगान वसूलने लगे. अन्य प्रकार से किसानों को प्रताड़ित करने लगे. इस प्रकार अराजकता की स्थिति बन गयी. सरदार हरलाल सिंह ने जागीरदारों की मनमानी से खिन्न होकर 12 फ़रवरी 1948 को जयपुर रियासत के प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी शिकायतें उनके सामने रखीं. इनमें तीन बातें प्रमुख थी- प्रथम की ठिकानेदारों को खतौनियों से अधिक लगान वसूल करने पर दंड दिया जाय, दूसरी यह कि लगान निजामत में जमा हो तथा अंतिम यह कि पुलिस जागीरदारी जुल्मों को रोकने में किसानों की मदद करे. इस पर शेखावाटी के नाजिम को लगान जमा करने के आदेश दिए गए. पुलिस को भी मदद के लिए कहा गया. इससे स्थिति में कुछ सुधार हुआ. इधर जागीरदार अपने षड्यंत्रों में लगे थे. उन्होंने छोटे जागीरदारों और भूमियों को आगे कर आन्दोलन आरंभ कर दिया. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 35-36)

पंचपाना शेखावाटी में दमन का दौर

हनुमानपुरा अग्नि काण्ड - शेखावाटी में शेखावतों के विभिन्न ठिकाने अथवा पाने थे. सीकर में 'जाट प्रजापति महायज्ञ' की सफलता देखकर शेखावाटी के ठिकानेदार भयभीत हुए. सीकर ठिकाने ने जाटों की इस जागृति का दमन करने की पहल की थी. पंचपाना शेखावाटी के ठिकानेदार भी पीछे क्यों रहते ? वे अब बल प्रदर्शन और आतंक पर उतर आये ताकि जाटों में आई जागृति को नष्ट किया जा सके. सर्वप्रथम इसकी शुरुआत पंचपाना शेखावाटी में हनुमानपुरा में की गयी. यहाँ के सबसे प्रमुख नेता चौधरी गोविन्द राम और सरदार हरलाल सिंह थे. 16 मई 1934 (अक्षय तृतीया) को बलरिया (हीरवा) के ठाकुर कल्याण सिंह ने हनुमानपुरा (दूलड़ों का बास) को जला दिया. आग चौधरी गोविन्द राम के नोहरे में लगाई. और फिर फैलती गयी. चौधरी गोविन्दराम के मकान नोहरे सहित 23 घर जलकर रख हो गए जिसमें हजारों रुपये का नुकशान हुआ. दो गायें मरी, कई भेड़ें और बकरियां भी जल गयी. (नवयुग 29 मई 1934), (डॉ पेमाराम,पृ.127)

जयसिंहपुरा काण्ड - अभी हनुमानपुरा अग्निकांड का फैसला भी नहीं हो पाया था की डूण्डलोद के ठाकुर के भाई ईश्वर सिंह ने जयसिंहपुरा में निहत्थे खेतों में काम करते किसानों को घेरकर गोलियां चलादी और उन्हें लाठियों, बरछों आदि से बुरी तरह पीटा. यह दुर्घटना 21 जून 1934 को दोपहर के समय हल चलाते हुए किसानों के साथ हुई. जयसिंहपुरा के जाटों ने खेतों में हल जोते तो ठिकाना डूण्डलोद का भाई ईश्वर सिंह 100 आदमी हथियारबंद घुड़सवार लेकर मौजा जयसिंहपुरा में पहुंचा. दिन के 12 बजे पहले गाँव की सरहद में घोड़ों को घुमाया और बिगुल बजाया. फिर चौधरी टीकू राम के खेत में पहुंचे. उसका लड़का नारायण सिंह हल चला रहाथा. टीकू राम की लडकी और उसकी पत्नी सूड़ काट रही थी. टीकू राम कटे झाड़-बोझों को समेट कर अळसोटी कर रहा था. उस समय ठाकुर ईश्वर सिंह के आदमी उस परिवार पर टूट पड़े. बंदूकों से फायर शुरू कर दिए और बरछे व लाठियां मारी गयी. चौधरी टीकू राम का सर फट गया. कई गोलियां उनके शरीर पर लगीं और उसके प्राण-पखेरू उड़ गए. टीकू के दोनों लड़के भी जख्मी हुए और उसकी स्त्रियों के भी लाठियों की मार पड़ी. उस समय पास के खेत में काम करने वाले दूसरे लोग दौड़ कर आये तो ईश्वर सिंह ने हुक्म दिया - 'इनको भी मारो'. ईश्वर सिंह खुद अपनी बन्दूक से फायर करने लगे. एक सबल सिंह राजपूत ठिकाने का कामदार , तीसरा जमन सिंह राजपूत मुलाजिम ठिकाने का और चौथा सादुलखान क्यामखानी ये चारों बंदूकों के फायर करने लगे और दूसरे लोग लाठियां और भाले चलाने लगे. 8-9 औरतों और लड़कियों को भाले की चोटें आई और 12 -13 पुरुषों के गोलियां और भाले लगे. मुन्ना के 127 छर्रे लगे, दूल्हा के गर्दन में गोली लगी, किसना के बरछे के घाव हुए. ये चारों गंभीर जख्मी हुए. जीवनी नामक स्त्री के गोली जांघ को चीरती निकली. मोहरी और पन्नी नामक स्त्रियों के पीठ और पसलियों पर लाठियां लगी. (डॉ पेमाराम,पृ.128)

यह सारा वाकया इसलिए हुआ कि ये लोग करीब डेढ़ माह पहिले अपना मकान बनाने के लिए ईंटें बनाना चाहते थे. ठिकाने ने ईंट बनाने से मना किया था. जाटों ने इसके लिए मजिस्ट्रेट के इस्तगासा लगा दिया था. इस बात पर ठिकाने वाले चिड गए और जमीन काश्त करने से रोकना चाहा. तब उन्होंने नाजिम झुंझुनू के दरख्वास्त लगादी. तब नाजिम ने निर्णय दिया कि ठिकाना जमीन काश्त करने से नहीं रोक सकता और किसान अपने खेतों को जोत सकते हैं. जयसिंहपुरा वाले समय पर माल देते हैं, खेत जोतने के लिए अड़ जाना उचित ही था. (ठाकुर देशराज: जनसेवक, पृ. 346 -348), (डॉ पेमाराम,पृ.128)

इस हत्या काण्ड से न केवल शेखावाटी बल्कि राजस्थान भर के किसान तिलमिला उठे और उनमें भारी आक्रोस पैदा हो गया. ठाकुर देशराज, मंत्री राजस्थान जाट सभा, के आह्वान पर 21 जुलाई 1934 को जयसिंहपुरा गोली काण्ड दिवस मनाया गया. अकेले जयपुर में 125 स्थानों पर रोष सभाएं की गयी. इन सभाओं में बड़ी संख्या में किसान इकट्ठे हुए. कूदन गाँव की शोकसभा चौधरी कालू राम के नेतृत्व में हुई. 2000 का जन समूह था जिसमें 700 स्त्रियाँ थीं. पातूसरी गाँव में सिर्फ जाट स्त्रियों की अलग सभा हुई जिसकी अध्यक्षता बनारसी देवी ने की. गौरीर के किसानों ने तो खतरे की उस स्थिति में जयसिंहपुरा दिवस मनाया जबकि बिसाऊ ठिकानेदार के सशस्त्र आदमी गाँव को घेरे हुए थे. (डॉ पेमाराम, पृ. 129)सब जगह शोक सभाओं में इस बात पर जोर दिया गया कि इस गोली काण्ड के नायक ईश्वर सिंह को गिरफ्तार करके सजा दी जाय. किसानों के प्रांतव्यापी रोष का फल यह हुआ कि जयपुर राज्य के तत्कालीन इन्स्पेक्टर जनरल पुलिस मि. यंग को इस काण्ड की जाँच स्वयं करनी पड़ी और मामले को अदालत में पेश किया. राजस्थान जाट सभा ने इस मामले को हाथ में लिया. कुंवर नेतराम सिंह और सरदार हरलाल सिंह ने पैरवी में बड़ी कुशलता दिखाई. ठाकुर ईश्वर सिंह सहित उसके 9 साथियों के खिलाफ गिरफ़्तारी वारंट जारी हुए. [नवयुग 19 सितम्बर 1934 ] ईश्वर सिंह भाग गया. उसे पकड़ कर लाया गया. उसकी गिरफ़्तारी न हो इसके लिए अकेले जयपुर ठिकानेदारों ने ही नहीं अपितु मारवाड़ के जागीरदारों ने भी कोशिश की. राजस्थान जाट सभा ने पूरी ताकत लगाई और ईश्वर सिंह को डेढ़ साल की सजा दिलाने में सफलता प्राप्त की. यह घटना शेखावाटी के किसानों की बड़ी भारी जीत थी. इसके बाद वे कभी ठिकानेदारों से नहीं दबे. (डॉ पेमाराम,पृ.130)

पंचपाना शेखावाटी में लगान बंदी आन्दोलन

1934 में जयसिंहपुरा काण्ड की घटना के बाद पंचपाना शेखावाटी के किसान भारणी में एकत्रित हुए और दो दिन तक लगातार बातें होने के बाद तय किया गया कि 'शेखावाटी किसान जाट पंचायत' के अधीन बढे हुए लगान में कमी व अन्य लाग-बागों की समाप्ति हेतु आन्दोलन प्रारंभ किया जावे. (डॉ पेमाराम,पृ.131)

अगस्त 1934 में सीकर ठिकाना व किसानों के बीच समझौता हो गया था जिसमें लाग-बाग़ व बेगार समाप्ति के साथ अनेक रियायतें व सुविधाएँ सीकर के किसानों को मिलीं. इससे शेखावाटी पंचपाना के किसान भी उत्साहित हुए औए अपने ठिकानेदारों से उसी प्रकार की रियायतों की मांग की. [जयपुर जुडिसियल रिकोर्ड, फाईल न. 2549 ऑफ़ 1935 , रा.रा.अ. बीकानेर] स्थिति गंभीर होती गयी. दीवान, वेस्टर्न डिवीजन ने सितम्बर 1934 में मलसीसर ठिकाने का दौरा किया और लगान तय करने की कोशिश की परन्तु किसानों ने लगान देने से मना कर दिया. ठिकाना खूर में तो किसानों ने मीटिंगें करके लगान व लागबाग न देने के अलावा यह भी तय किया कि जो किसान इसका पालन नहीं करेगा, उसे जाति-बाहर कर दिया जायेगा और भविष्य में उससे खान-पान, शादी-गमी आदि किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखा जायेगा. 15 सितम्बर 1934 की बैठक में यह भी तय किया कि ठिकाने के आदमियों को न तो फसल का कून्ता करने दिया जाय और न उन्हें खेतों और घरों में घुसने दिया जाय. लगभग ऐसी ही स्थिति सब ठिकानों में थी. (डॉ पेमाराम,पृ.132)

1 अक्टूबर 1934 को पंचापना सरदारों का एक प्रतिनिधि मण्डल सर बिचम, वाइस प्रेसिडेंट , स्टेट काउन्सिल, जयपुर से मिला और निवेदन किया कि किसान नेता सामाजिक सुधारों के नाम पर किसानों को बैठकें कर समझा रहे हैं कि जमीन के असली मालिक किसान हैं. वे किसानों को लगान देने से रोक रहे हैं. इसलिए जाट किसानों का आन्दोलन तत्काल रोका जाय और ठाकुरों के अधिकार और सुविधाओं में राज्य के स्थानीय अधिकारी हस्तक्षेप न करें. इसके विपरीत 9 अक्टूबर 1934 को 125 जाट किसानों का प्रतिनिधि मंडल शेखावाटी जाट किसान पंचायत की और से सर बिचम, वाइस प्रेसिडेंट , स्टेट काउन्सिल, जयपुर से मिला और एक मेमोरेंडम अपनी मांगों के सम्बन्ध में दिया. इन घटनाओं से साफ होता है कि पंचपना शेखावाटी में दो पार्टियाँ एक-दूसरे के विपरीत बन चुकी थी और दोनों का स्तर बराबरी का हो चुका था. पंचपाना के सरदार जो इससे पहले किसानों के मालिक थे, ठाकुर थे, वे अब उस पद से वंचित हो चुके थे. शेखावाटी किसान आन्दोलन के इतिहास में यह घटना सबसे महत्वपूर्ण थी जबकि इस घटना से शेखावाटी के ठिकानेदारों की स्थिति बहुत कमजोर हो गयी थी. इन प्रतिवेदनों का यह प्रभाव पड़ा कि जयपुर सरकार की और से पहली बार सीधा हस्तक्षेप हुआ तथा शेखावाटी जाट पंचायत के अस्तित्व को स्वीकार किया. (डॉ पेमाराम,पृ.135)

किसान प्रतिनिधयों को जयपुर सरकार की और से तत्काल कोई कार्यवाही न करने से असंतोष था. अब उन्होंने अपने प्रचार को समाचार-पत्रों व सभाओं द्वारा करना शुरू किया. बाहर के जाट नेताओं से सहायता प्राप्त करने के लिए सरदार हरलाल सिंह और नेतराम सिंह अपने अन्य दस साथियों के साथ रोहतक सर छोटू राम से मिलने गए. हरलाल सिंह, लादू राम और नेत राम सिंह ने लौट कर ठिकाना मलसीसर के गाँवों का दौरा किया और जाट किसानों को निर्देश दिया कि जब तक शेखावाटी जाट किसान पंचायत लगान देने का आदेश न दे तब तक किसी प्रकार का लगान, लाग-बाग़ आदि न दें. परिणाम यह हुआ कि किसानों ने अपनी खड़ी फसल का कून्ता नहीं करने दिया और किसान बिना लगान दिए अपनी फसलें समेटने लगे. ठिकाना डुण्डलोद , मंडावा, मलसीसर आदि ज्यादा प्रभावित हुए. इस समय चिमना राम और भूदा राम सांगसी, नेत राम सिंह गौरीर, हरलाल सिंह हनुमानपुरा, लादू राम किसरी, दलेल सिंह हनुमानपुरा, ठाकुर देशराज अदि किसानों का नेतृत्व कर रहे थे. वे गाँव-गाँव घूमकर आन्दोलन को मजबूत कर रहे थे. जब ठिकानेदार चौधरियों की मदद से लगान वसूल करने की कोशिश करते थे, तो जाटों को मालूम होते ही आस-पास के गाँवों के जाट इकट्ठा होकर वसूल करने वाले चौधरी के घर धरना देते और जुर्माना वसूल करते. अब जाट न केवल उन चौधरियों का बहिष्कार करने लगे जो ठाकुरों का साथ देते थे बल्कि ठिकाने के आदमियों को न तो अपने घरों में घुसने देते थे और न ही कुओं से पानी खींचने देते थे. अन्य जातियों के साथ भी, जो ठिकानों का सहयोग करती थीं, असहयोग का व्यवहार किया जाने लगा. (डॉ पेमाराम,पृ.138)

पुलिस अधीक्षक शेखावाटी ने 9 दिसंबर 1934 को रिपोर्ट भेजी कि लगान तबतक वसूल नहीं किया जा सकता जब तक कि जाट पंचायत आदेश न दे. उसने आगे लिखा कि देवरोड़, अलीपुर, लूनिया, गोठड़ा, गौरीर, सांगासी आदि गाँवों के जाट नेता करीब 300 जाटों के साथ ठिकाना मंडावा के गाँव गुमानसर के मुख्य चौधरी माखन जाट के घर पहुंचे और ठिकाने हेतु लगान तय करने पर उसे अनेक गालियां दीं और न केवल उस पर 51 रुपये जुर्माना किया बल्कि भोजन खर्च के 70 रुपये और वसूल किये. (डॉ पेमाराम,पृ.139)

किसानों द्वारा जयपुर सरकार को मेमोरेंडम पेश करने तथा लगान रोक देने के बाद शेखावाटी के ठाकुरों का दृष्टिकोण किसानों के प्रति हिंसात्मक हो गया. किसानों पर हमले करना, लूट-पाट करना, धमकियाँ देना, झूठे मुकदमें बनाना जैसी बातें आम हो गयी. कोई ठिकानेदार गढ़ में बुलाकर पिटवाता था, तो कोई गाँव का घेरा डालकर तंग करता था. जूते, लात, घूंसे आदि से जाटों को खूब पीटा जाता. राणोली के ठाकुर शोपुरा सुजास गाँव की जाटनी को पिटवाकर अपने दिल की आग शांत की. खूड ठिकाने में एक राह चलते मुसाफिर को गढ़ में लेजाकर केवल इतनी सी बात पर ठिकानेदार ने पिटवाया कि उसने अपना ऊँट रोक कर ठिकाने के उन आदमियों को शर्मिंदा किया था जो किसानों को धर्मशाला में बंद कर पीट रहे थे. महनसर के जेसा राम को मारकर कुएं में ड़ाल दिया. (लोकमान्य 24 नवम्बर 1934, ठाकुर देशराज:जनसेवक, पृ. 353 -354, डॉ पेमाराम,पृ.140)

पकोड़ी ढाणी को केवल इस बात पर लूट लिया कि भौमिया ने किसानों से कहा कि शेखावाटी जाट किसान पंचायत से ताल्लुक तोड़ दो और पंचायत को चंदा न दो. लेकिन जब किसानों ने इनकार किया तो उन पर कई नए कर लगाकर रुपये मांगे. इसी दौरान 17 दिसंबर 1934 को किसान पंचायत की पार्टी ढाणी में पहुंची गयी. 15-16 आदमी गाँव में हारमोनियम बजा रहे थे की एकाएक चारों तरफ से बहुत से ठाकुर के आदमी उन पर टूट पड़े और लाठियों से मारने लगे. घायल व्यक्तियों का कहना था कि उनको मूंज की तरह कूटा गया. कई घायलों को गिरपड जाने के बाद घसीटा गया. कई स्त्रियों ने घर के अन्दर किवाड़ बंद कर लिए तो किवाड़ तोड़ कर उनको बाहर निकाल कर घसीटा गया और पीटा गया. बहुत से लोगों के कपड़े खून से लथपथ हो गए. बेग राज और मूल जी नामक किसानों की हालत बहुत चिंताजनक हो गयी. इसके बाद लूट-पाट आरंभ हुई जो एक घंटे चली. मकानों में घुस कर बर्तन-भांडे, घड़े, खाट आदि तोड़ डाले गए और जिसको जो कुछ मिला ले भागे. आक्रमणकारी दो-ढाई सौ की संख्या में थे. कई स्थानों पर ठाकुरों ने किसानों को पेड़ों पर बांध कर पीटा और उनकी सम्पति जब्त करली क्योंकि उन्होंने लगान नहीं दिया था. (जयपुर रेवेन्यु रिकार्ड, आर-6 जागीर, फाईल न. 1678 , जि.आ.आ.जयपुर), डॉ पेमाराम,पृ.141)

24 दिसंबर 1934 का अध्यादेश - सीकर ठिकाने में आन्दोलन होने लगे और किसानों ने लगान देना बंद कर दिया तब 24 दिसंबर 1934 ई. को जयपुर सरकार ने दो अध्यादेश जारी किये. इनके अनुसार जागीरदारों और किसानों के बीच संबंधों और समस्याओं के अध्ययन हेतु एक कमेटी का गठन किया जायेगा. लगान की छपी हुई रशीदें दी जाएँगी. लगान देने से इनकार करना दण्डनीय अपराध होगा. किसानों को उकसाने वालों और लगान नहीं देने वालों को जयपुर स्टेट की सीमा से बाहर किया जायेगा. इस क़ानून से सीकर ठिकाने के प्रशासन को और कड़े अधिकार मिल गए तथा उनका हाथ मजबूत हो गया. (डॉ पेमाराम,पृ.144)

इन नए अध्यादेशों के अंतर्गत ठिकानेदारों के प्रयास से पुलिस द्वारा स्थानीय जाट नेताओं को गिरफ्तार करने की गति बढ़ गयी. मंडावा ठिकाने के गाँव नारसिंहानी के भींवाराम और नारायण सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया. सोटवाडा गाँव के चौधरी बिशना राम और उसके तीन साथी गिरफ्तार कर हवालात में भेज दिए गए. उन्हें उस समय गिरफ्तार किया गया जबकि वे अपने गाँव का लगान निजामत में जमा करने गए. हेतमसर गाँव के चार व्यक्तियों को 12 जनवरी 1935 को थानेदार मंडावा ने बुला कर हवालात में बंद कर दिया और बाद में उन्हें झुंझुनू भेज दिया गया. [लोकमान्य 17 जनवरी 1935, डॉ पेमाराम,पृ.145]

जयपुर के नए क़ानून में हैड कांस्टेबल तक को अधिकार प्राप्त गो गया कि वह जिसे चाहे लगान बंदी के प्रचार करने के बहाने गिरफ्तार करले. ठिकानेदारों ने इस कानून का खूब लाभ उठाया. इसके अंतर्गत कुछ लोगों को पकड़ा गया उनके नाम इस प्रकार हैं [लोकमान्य 4 फ़रवरी 1935]:

ठाकुर देशराज के झुंझुनू आने पर शेखावाटी के प्रमुख नेताओं ने नई स्थिति पर विचार किया. यह निश्चय किया की एक तो पंचायत का संगठन और मजबूत किया जाय और दूसरे समाचार-पत्रों के माध्यम से लोकमत पक्ष में किया जाय. तदानुसार पंडित ताड़केश्वर शर्मा पचेरी ठाकुर के पास आगरा छोड़ दिए गए और मित्र-मंडल प्रेस कायम कर 'गणेश' नामक साप्ताहिक पत्र निकलना शुरू किया. ताड़केश्वर शर्मा पत्र के संपादक बने और ठाकुर देशराज व्यवस्थापक. 'गणेश' के अलावा दूसरे पत्रों में प्रकाशन का भार भी इन्हीं पर था. नेतराम सिंह, चिमना राम, हरलाल सिंह, घासी राम, लादू राम किसारी आदि नेता अधिकारियों से मिलने व इलाके में संगठन का काम सँभालते. लादू राम किसारी और घासी राम दफ्तरी काम के लिए और डेपुटेशन के संगठन आदि के सँभालने में अधिक रहे और बाकी लोग इधर-उधर की दौड़-धूप करने लगे. धीरे धीरे संगठन जोर पकड़ने लगा. समाचार-पत्रों में अच्छी तरह प्रकाशन होने से लोकमत भी किसानों के पक्ष में होने लगा. (डॉ पेमाराम,पृ.148)

जयपुर सरकार के कठोर कदम - इन सब गतिविधियों को देखकर जयपुर सरकार ने कुछ कठोर कदम उठाना तय किया. 10 अप्रेल 1935 के अध्यादेश नं. 22053 के कंडिका एक में एक आदेश निकाल कर बाहर के आठ नेताओं को जयपुर राज्य से बाहर निकाल दिया. ये लोग थे- 1. बाबा नरसिंहदास अग्रवाल नागौर, 2 . कुंवर रतनसिंह भरतपुर, 3 . ठाकुर देशराज भरतपुर, 4. हुकुम सिंह और 5.भोला सिंह, उपदेशक अखिल भारतीय जाट महासभा, 6. मूलचंद्र अग्रवाल रींगस, 7. तुलसीराम मन्सुदा आगरा, तथा 8. रामानंद उर्फ़ दयानंद जाट भरतपुर. इसके साथ ही जून 1935 में शेखावाटी जाट किसान पंचायत के दफ्तर की ताला तोड़कर तलाशी ली गयी और सारे कागजात पुलिस उठाकर ले गयी. शेखावाटी जाट किसान पंचायत के उप-प्रधान नेत राम सिंह की भी पुलिस ने तलाशी ली और उन्हें जयपुर रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया. (डॉ पेमाराम,पृ.149)

जब अनेक स्थानों से किसानों की और से ज्यादा शिकायतें आने लगीं कि ठिकानेदार किसानों को खेती करने से रोक रहे हैं, तब 18 जुलाई 1935 को दीवान वेस्टर्न डिवीजन ने नाजिम शेखावाटी को निर्देश दिया कि किसानों को खेती करने से न रोका जाय. 5 सितम्बर 1935 को शेखावाटी जाट किसान पंचायत के सदस्यों ने रेवेन्यु मेंबर के मार्फ़त एक प्रार्थना पत्र वाइस प्रेसिडेंट, स्टेट काउन्सिल, जयपुर को भेजकर निवेदन किया कि नेतराम सिंह को रिहा किया जाय और उन पर ठिकाने की झूठी शिकायत के आधार पर चल रहा मुक़दमा वापस लिया जाय. साथ ही हरलाल सिंह, अध्यक्ष शेखावाटी जाट किसान पंचायत, के खिलाफ जारी गिरफ़्तारी वारंट को भी रद्द किया जाय ताकि शेखावाटी में शांति स्थापित हो सके. यह भी मांग की की शेखावाटी में तत्काल भूमि बंदोबस्त की कार्यवाही भी शुरू करने की व्यवस्था की जाय. (डॉ पेमाराम,पृ.150)

जयपुर सरकार ने अब इस समस्या के समाधान हेतु ठोस कदम उठाने का निश्चय किया. वह चाहती थी कि शेखावाटी में शीघ्र भूमि बंदोबस्त करवाकर लगान सम्बन्धी मसले का स्थाई हल निकाला जाय. जयपुर सरकार ने लगान वसूली हेतु शेखावाटी में एक स्पेशियल तहसीलदार साफी-उल्लाह की नियुक्ति कर दी. उस तहसीलदार को हिदायत दी कि वह शेखावाटी का दौरा करे और जहाँ ठिकाना व किसानों के बीच लगान सम्बन्धी मतभेद हो, उसे दूर करे और वहां लगान तय करे. नाजिम शेखावाटी को भी इस सारी व्यवस्था को देखने व अपने इलाके में दौरे करने का निर्देश दिया. (डॉ पेमाराम, पृ. 151) इस व्यवस्था का अच्छा असर हुआ. ठिकानेदार अब वाईस प्रेसीडेंट की सलाहानुसार अपने चौधरियों व किसानों की सलाह से लगान तय करने लगे व वसूल करने लगे. वे समझ गए कि किसानों के साथ सहयोग करना ही अब उनके हित में है. 10 अप्रेल 1936 को रेवेन्यु मेंबर ने आदेश दिया कि ठिकानेदार किसानों से तय किये गए लगान के अलावा अवैधानिक रूप से किसी प्रकार की लाग-बाग़ वसूल न करें. इसके साथ ही शेखावाटी में भूमि बंदोबस्त शुरू करने का आदेश दिया. 1936 ई. में पंचपाना शेखावाटी में भूमि बंदोबस्त शुरू हो गया. इस प्रकार पंचापाना शेखावाटी के किसानों के आन्दोलन का शानदार अध्याय पूरी सफलता के साथ समाप्त हुआ. (डॉ पेमाराम,पृ.154)

शेखावाटी में 1931 से 1936 तक चले आन्दोलन में ठाकुर देशराज एक तरह से आन्दोलन के प्राण थे. उन्होंने शेखावाटी में जागृति लाने तथा किसानों को मार्गदर्शन देने का बीड़ा उठाया और आन्दोलन को सही दिशा में अहिंसात्मक तरीके से चलाया, यद्यपि जागीरदारों और ठिकानेदारों की और से हर प्रकार के हिंसात्मक तरीके अपनाए गए. सीकर में कुंवर रतन सिंह भरतपुर ने अपना पूरा सहयोग दिया. सर छोटू राम तथा अखिल भारतीय जाट महासभा, अलीगढ, के पदाधिकारियों तथा उपदेशक हुकम सिंह और भोला सिंह का भी इस आन्दोलन में भारी सहयोग रहा. स्थानीय नेताओं में चौधरी भूधा राम और चिमना राम सांगासी, सरदार हरलाल सिंह और चौधरी गोविन्द राम हनुमानपुरा, नेतराम सिंह गौरीर, चौधरी घासीराम खरिया, लादूराम किसारी, हरलाल सिंह मांडासी, पंडित ताड़केश्वर शर्मा पचेरी आदि प्रमुख थे, जो अपने जीवन तथा परिवारों को जोखिम में डालकर ठाकुरों के खिलाफ उठ खड़े हुए और जागीरदारों और ठिकानेदारों के अत्याचारों का विरोध करते हुए आम किसानों का इस आन्दोलन में मार्गदर्शन तथा नेतृत्व किया.

1925 से 1932 तक गाँव सांगासी शेखावाटी की गतिविधियों का 'पावर हाउस' रहा था. लेकिन 1932 ई. के बाद हनुमानपुरा तथा गौरीर भी शेखावाटी के किसानों की आशा के केंद्र बन गए थे.


झुंझुनू में विद्यार्थी भवन का जलसा सन 1938 - सन 1938 में सरदार हरलाल सिंह ने झुंझुनू में विद्यार्थी भवन का जलसा किया. इसमें हजारों कार्यकर्ताओं के अलावा पंडित हीरालाल शास्त्री एवं स्वामी केशवानंद भी पधारे. किसान पंचायत के स्थगित होने के बाद हीरालाल शास्त्री का जयपुर रियासत में कद बढ़ गया था. हरलाल सिंह उनके प्रमुख विश्वसनीय नेता बन चुके थे. इस जलसे में आई.जी. मि. एफ.एस.यंग (F.S.Young) भी आये थे. सम्मलेन से पूर्व वे डाक बंगले में रुके हुए थे. छात्रावास के मंत्री होने के नाते विद्याधर कुल्हरी मि. यंग को बुलाने गए. यंग ने कहा , 'पास के कमरे में बिसाऊ ठाकुर बिशन सिंह भी रुके हुए हैं. उनसे भी सम्मलेन में सम्मिलित होने का आग्रह कर लें.' विद्याधर कुल्हरी ने ऐसा ही किया. ठाकुर बिशन सिंह सम्मलेन में चलने के लिए ख़ुशी से तैयार हो गए. तीनों सम्मलेन-स्थल पर पहुंचे. (राजेन्द्र कसवा,p.156)

विद्याधर कुल्हरी ने छात्रावास की रिपोर्ट पढी. उस समय छात्रावास के लिए आवंटित भूमि से सटी हुई पांच-छ: बीघा जमीन पड़ी थी जो ठाकुर बिशन सिंह की थी. अपनी रिपोर्ट के अंत में विद्याधर कुल्हरी ने इस जमीन को छात्रावास के लिए देने हेतु मांग कर डाली. मि. यंग ने तत्काल ठाकुर बिशन सिंह से बात की. उदार ह्रदय वाले बिशन सिंह ने मांगी गयी सारी जमीन छात्रावास को देने की घोषणा की. यंग आरंभ से ही छात्रावास के लिए दिलचस्पी रखता था. तत्कालीन परिस्थितियों में यह असाधारण कार्य था जिसके लिए ठाकुर बिशन सिंह को सम्मान से देखा गया. (राजेन्द्र कसवा,p.157)

रावराजा सीकर कल्याण सिंह को देश निकाला

राव राजा सीकर कल्याण सिंह अनपढ़ और सरल व्यक्ति थे. वे दरबार के भौमियों के कहने से आधारहीन हुक्म जारी कर दिया करते थे. ऐसे अवसर सीनियर अफसर कैप्टन वेब जैसे तेज-तर्रार अंग्रेज अफसर को चिढाने के लिए काफी थे. सीकर में पिछले चार-पांच वर्षों से भारी अशांति फैली थी और अनेक काण्ड हुए. शांति बनाये रखने के लिए कैप्टन वेब को दिन-रात मेहनत करनी पड़ी. वह फौजी अफसर किसानों के आंख का कांटा बन गया था. गाँव-गाँव में फैले मामूली ठाकुर भी उद्दंडता करते थे. वे स्वयं को रावराजा समझते और कानून-व्यवस्था को भंग करते रहते. इन दम्भी ठाकुरों पर रावराजा का कोई नियंत्रण नहीं था. इससे अंग्रेज अफसर रावराजा को अयोग्य और मूर्ख समझने लगे. उन्हें शांति स्थापित करने का एक ही मार्ग दिखाई दिया - राव राजा को हटाया जाय. (राजेन्द्र कसवा, p.157)

जयपुर पुलिस ने राव राजा को गिरफ्तार कर लिया और देवीपुरा कोठी ले गयी. लेकिन रावराजा वहां से भाग कर अपने गढ़ में छुप गए. मि. यंग (F.S.Young) रेलवे स्टेशन के समीप एक कोठी में डेरा डाले स्थिति पर नजर रखे हुए थे. शेखावाटी में रावराजा सीकर की हैसियत सबसे ऊँची और अधिकार संपन्न थी. इस पर चोट होने से सामंतों में भय पैदा हो गया. सारे ठिकानेदार राव राजा के गढ़ में एकत्रित हो गए. रावराजा के समर्थन में उन लोगों ने सीकर पब्लिक कमेटी बनाई. पुराने शहर की चार दिवारी के दरवाजे बंद कर दिए गए. रावराजा का गढ़, मंदिर और अनेक दुकानें परकोटे के भीतर थे. भीतर के दुकानदार, पंडित, सेठ-साहूकार दरबारियों एवं मफिदारियों के साथ हो गए. असल में मि. कैप्टन वेब से रुढ़िवादी, पाखंडी, कामचोर भौमिया नाराज थे. वे वेब को किसानों का हितैषी मानते थे और वेब इन लोगों को ऐसी प्रजाति मानता था जो परजीवी और ठग थे. (राजेन्द्र कसवा, p.158)

16 अप्रेल 1938 से लेकर 25 जुलाई 1938 तक सीकर में विद्रोह फूट पड़ा. सीनियर अफसर वेब (A.W.T. Webb) एवं के.एल. बापना (K.L.Bapna) द्वारा सारे अधिकार अपने हाथ में लेने व रावराजा सीकर की किसी बात की परवाह नहीं करने से जयपुर अधिकारियों और रावराजा के बीच पहले से ही तनाव पूर्ण सम्बन्ध थे. ये तनाव पूर्ण सम्बन्ध और भी पराकाष्ठा पर पहुँच गए जबकि जयपुर सरकार ने रावराजा कल्याण सिंह के एक मात्र पुत्र और उत्तराधिकारी को कुंवर हरदयाल सिंह को उसके पिता के नियंत्रण और संरक्षण से हटाकर रावराजा की इच्छा के विरुद्ध उच्च शिक्षा हेतु इंगलैंड भेजना तय किया. राव राजा को जयपुर बुलाया गया और उन्हें अपमानित किया गया. 16 अप्रेल 1938 को सीकर में राव राजा को जबरदस्ती गिरफ्तार करने का असफल प्रयास किया. इससे तनाव बढ़ गया. जयपुर से फ़ौज बुला ली गयी. उधर राव राजा सीकर के पक्ष में सीकर के सारे जागीरदार तथा आस-पास के शेखावाटी में उनके भी और सम्बन्धी शस्त्रों के साथ सीकर किले में जयपुर द्वारा भेजी फ़ौज का विरोध करने के लिए एकत्रित हो गए. इस पर जयपुर सरकार ने राव राजा को 24 मई 1938 को पागल घोषित कर दिया और सीकर ठिकाना 'कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स' के अधीन ले लिया गया. राव राजा सीकर को अजमेर जाना पड़ा और बाद में उन पर सीकर प्रवेश पर निषेधाज्ञा जारी करदी गयी. [जयपुर गजट, असाधारण, 24 मई 1938 ] उन्हें 29 अगस्त 1942 को सीकर में वापस आने की इजाजत दी गयी थी. (डॉ पेमाराम, p.157)

5 जुलाई 1938 को सीकर में गोलीकांड हो गया. रींगस से बड़ी संख्या में शेखावाटी से सशस्त्र राजपूत रेल से सीकर आ रहे थे. सीकर स्टेशन पर उन्हें कहा गया कि वे हथियार रख दें. इनकार करने पर जयपुर पुलिस ने रेल के बंद डिब्बों में बाहर से गोलियां चलादी. जिसमें कुल बीस आदमी मरे, कई घायल हुए और कई गिरफ्तार हुए. स्थिति बहुत तनाव पूर्ण हो गयी थी. उग्रता को देख कर जयपुर सरकार ने सीकर की स्थिति की जाँच के लिए जी.वी.बी. गिलन के नेतृत्व में सीकर जाँच कमीशन की नियुक्ति करदी. 23 जुलाई 1938 को जयपुर महाराजा स्वयं सीकर आये. उन दस आदमियों कोजो मि. यंग के सामने पेश किये गए थे तथा उनको जो गिरफ्तार कर लिए गए थे , को छोड़कर बाकी आम माफ़ी की घोषणा की गयी. तब राजपूतों तथा सीकर के लोगों ने सीकर शहर के दरवाजे खोले. पब्लिक कमेटी सीकर की कुछ बातें जिसमें मि. वेब (A.W.T. Webb) तथा बापना (K.L.Bapna) को हटाने का आश्वासन देने पर 25 जुलाई 1938 को सीकर में फिर से शांति स्थापित हो गयी. (डॉ पेमाराम, p.158)

सीकर रावराजा प्रकरण में जाट किसानों का रुख - सीकर रावराजा के सीकर से निर्वासन प्रकरण में सीकर व पंचापना शेखावाटी के सारे ठिकानेदार व राजपूत पहले से ही रावराजा सीकर के पक्ष में थे. रावराजा सीकर ने सीकरवाटी जाट किसान पंचायत के सदस्यों को देवीपुरा की कोठी में बुलाया. जो पंचे गए वे थे -

राव राजा सीकर ने जाट पंचायत से सहायता की अपील की. जाट नेताओं ने रावराजा से निवेदन किया कि मातहत ठिकानेदार भी किसानों से उसी दर पर लगान लें, जिस दर पर रावराजा लेते है. यह भी कि जाटों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार न किया जाय, किसानों को जमीन से बेदखल ना कर उस पर स्थाई अधिकार दिए जावें, सामाजिक स्तर पर राजपूतों से निम्न न समझा जावे. राव राजा ने इस प्रकरण की समाप्ति पर ये मांगें पूर्ण करने का आश्वासन दिया. लेकिन किसान नेता उसी बैठक में फैसला चाहते थे. अतः कोई निर्णय नहीं हो सका और जाट नेताओं ने राव राजा का साथ देने से मना कर दिया. (डॉ पेमाराम, p.158-159)

इससे रावराजा सीकर जाटों से नाराज हो गए और उन्होंने जाट चौधरियों की बाढ़ ( वह भूमि जो चौधरियों को मुफ्त में दी जाती थी जिस पर कोई लगान नहीं लगता था) खालसा करने का आदेश दिया. मि.यंग ने इस पर जाट नेताओं को बुलाकर कहा कि यदि आप जयपुर महाराजा का साथ देंगे तो हम आप लोगों की तकलीफें दूर कर देंगे. 24 जून 1938 को सीकरवाटी जाट किसान पंचायत की सीकर में एक बैठक हुई जिसमें सीकर के वर्तमान प्रकरण में जाटों द्वारा हिस्सा न लेने के निम्न कारण बताये गए-

  • 1. खूड़ी और कूदन में जाटों के साथ किया गया बुरा व्यवहार
  • 2. राजपूत जागीरदारों द्वारा जाटों पर की गयी ज्यादतियां
  • 3. रावराजा सीकर का कुप्रंध और जाट जाति के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार
  • 4. जाट किसान आन्दोलन के दौरान राव रानी द्वारा कोई सहानुभूति नहीं दर्शाना
  • 5. कैप्टन वेब (A.W.T. Webb) के अच्छे प्रशासन से जाट जाति को अनेक फायदे विशेषकर कृषि सम्बन्धी सुधार, शिक्षा एवं चिकित्सा सुविधाए तथा ग्रामीण उत्थान

इसके साथ ही निम्न प्रस्ताव पारित किये गए-

  • 1.सीकर सहित शेखावाटी के लिए एक ब्रिटिश सेटलमेंट अफसर की नियुक्ति की जाय
  • 2.राजपूत जागीरदारों के आचरण की निंदा करते हुए जयपुर सरकार से लाग-बाग़ और बेगार समाप्त करने हेतु प्रार्थना की गयी तथा
  • 3. ब्रिटिश सरकार व जयपुर दरबार के प्रति निष्ठा के साथ वफ़ादारी व्यक्त की गयी. (डॉ पेमाराम, p. 159)

26 जून 1938 को शेखावाटी किसान जाट पंचायत ने एक वक्तव्य भी प्रकाशित कराया जिसमें खंडन किया गया कि उनका सीकर के रावराजा के वर्तमान प्रकरण से कोई सम्बन्ध नहीं है. यह कि हमारा यह विश्वास है कि सीकर का यह आन्दोलन शेखावाटी और सीकर के सन 1935 -36 में हुए किसानों के जबरदस्त आन्दोलन के फलस्वरूप इधर के ठिकानेदारों और उनसे सम्बंधित हित वाले लोगों की स्वेच्छाचारिता में जयपुर सरकार का कुछ बाधक बनना होना है. यह कि इस आन्दोलन के दौरान किसानों को धमकियां दी जा रही हैं. (डॉ पेमाराम, p. 160)

शेखावाटी किसान जाट पंचायत के प्रतिनिधियों द्वारा उपरोक्त वक्तव्य देने तथा शेखावाटी किसान जाट पंचायत द्वारा सीकर ठिकाने का साथ न देकर जयपुर महाराजा के प्रति निष्ठा प्रदर्शित करने पर मि. यंग (Young) ने अपने 28 जून 1938 के एक गोपनीय पात्र द्वारा जयपुर सरकार से बाहर के किसान नेताओं पर लगे निर्वासन आदेश को निरस्त करने की सिफारिश की. (डी.ओ. न. 347 , 28 जून 1938 ) 11 जुलाई 1938 को निम्न आठ किसान नेताओंपर से जयपुर राज्य में प्रवेश पर लगे प्रतिबन्ध को हटा दिया. - 1. बाबा नरसिंहदास अग्रवाल नागौर, 2 . कुंवर रतनसिंह भरतपुर, 3 . ठाकुर देशराज भरतपुर, 4. हुकुम सिंह और 5.भोला सिंह, उपदेशक अखिल भारतीय जाट महासभा, 6. राम नारायण चौधरी, 7. तुलसीराम मन्सुदा आगरा, तथा 8. रामानंद उर्फ़ दयानंद जाट भरतपुर. (डॉ पेमाराम, p. 161)

सीकर रावराजा के बारे में आन्दोलन के दौरान जब सीकर की जनता ने सीकर शहर के दरवाजे बंद कर लिए तो जयपुर से आने वाली फ़ौज के खाने-पिने के सामान की व्यवस्था सीकर जाट पंचायत की और से उसके कोषाध्यक्ष भगवाना राम खीचडों का बास ने की थी. इससे जयपुर अधिकारियों की जाटों के प्रति सहानुभूति बढ़ गयी और उनकी शिकायतों पर तत्काल ध्यान दिया जाने लगा. बाहर के किसान नेताओं से प्रतिबन्ध हटाना पहला कदम था. मि. यंग ने 1000 रुपये 'जाट बोर्डिंग हाऊस झुंझुनू' को देने के लिए जयपुर प्रधानमंत्री को भेजने हेतु लिखा. इसके साथ ही मि. यंग ने जाटों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार अपनाने तथा पढ़े-लिखे जाटों के लड़कों को सेना, पुलिस, राजस्व और इसी तरह के अन्य विभागों में नौकरियां देने हेतु भी जयपुर सरकार ने सिफारिश की तथा पुलिस में बड़ी संख्या में जाट लड़कों को नौकरियां दीं. मि. यंग की सिफारिश पर जयपुर स्टेट काउन्सिल ने भी 8 अगस्त 1938 की अपनी बैठक में यह निर्णय किया की जाटों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया जाय और स्थानीय पढ़े-लिखे जाटों को प्रशासन के हर विभाग में नियुक्तियां दी जाएँ. साथ ही सामाजिक मामलों में भी जाटों के साथ उचित व्यवहार किया जाय. (डॉ पेमाराम, p. 161)

गोठडा (सीकर) का जलसा सन 1938

जयपुर सीकर प्रकरण में शेखावाटी जाट किसान पंचायत ने जयपुर का साथ दिया था. विजयोत्सव के रूप में शेखावाटी जाट किसान पंचायत का वार्षिक जलसा गोठडा गाँव में 11 व 12 सितम्बर 1938 को शिवदानसिंह अलीगढ की अध्यक्षता में हुआ जिसमें 10-11 हजार किसान, जिनमें 500 स्त्रियाँ थी, शामिल हुए. सम्मलेन में उपस्थ्तित प्रमुख नेता थे -

इस पंचायत में निम्न प्रस्ताव पारित किये गए-

  • 1.जाट बोर्डिंग हाऊस सीकर के लिए 1934 में जमीन देने का वायदा किया गया था, जो अभी तक नहीं दी गयी है. अतः जाट बोर्डिंग के लिए तत्काल भूमि दी जाय.
  • 2. जाट विद्यार्थियों के पढने के लिए राज्य की छात्रवृत्तियां स्वीकृत की जांय
  • 3. पढ़े-लिखे जाटों को उनकी संख्या के अनुपात में ऊँची नौकरियों में नियुक्तियां दी जांय
  • 4.पिलानी के बिड़ला कालेज को डिग्री कालेज कर दिया जाय
  • 5.गाँवों में स्कूल और अस्पताल खोले जांय
  • 6.सीकर और जयपुर की अदालतों में बाहर के वकीलों को उपस्थित होने की इजाजत दी जाय
  • 7.सीकर के वर्तमान प्रशासन में किसी प्रकार का परिवर्तन न किया जाय क्योंकि कैप्टन वेब (A.W.T.Webb) के प्रशासन के दौरान किसानों को पर्याप्त राहत मिली है. अतः वेब को तब तक रखा जाय जब तक की सीकर में भूमि बंदोबस्त पूरा न हो जाय.
  • 8. जाटों को राजनैतिक व सामाजिक मामलों में अन्य जातियों के बराबर अधिकार दिए जांय.
  • 9. जब तक सेटलमेंट न हो जाय तब तक वर्तमान में लगान की दर को आधी कर दी जाय.
  • 10. वर्तमान सीकर विद्रोह के समय जिस किसी ने भी जाटों के साथ दुर्व्यवहार किया उसे सजा दी जाय.
  • 11.जाटों को उनकी भूमि पर पुश्तैनी अधिकार दिए जांय
  • 12. विशेषकर सीकर जागीर इलाकों में सभी प्रकार की लागबाग समाप्त की जाय.
  • 13. अकाल के कारण इस वर्ष जिन किसानों की फसलें समाप्त हो गयी हैं, उनसे लगान न लिया जाय.
  • 14. प्रशासन की और से पशुओं के लिए चारे का प्रबंध किया जाय. (डॉ पेमाराम, p. 162-63)

इस बैठक में मि. यंग (F.S.Young) ने भी भाषण दिया. उन्होंने कहा कि किसानों को जयपुर सरकार से जो कुछ मिले, उसे लेना चाहिय और ठिकानेदारों के पास जाकर भी न्याय की भीख मांगनी चाहिय. शेखावाटी जाट किसान पंचायत के प्रतिनिधियों ने इस भाषण का विरोध किया और कहा कि ठिकानेदारों से निराश होकर ही हम जयपुर की शरण में जाते हैं अतः ठिकानेदारों से भीख मांगने का कहना सहनीय नहीं है. (डॉ पेमाराम, p. 163)

शेखावाटी जाट किसान पंचायत के प्रतिनिधियों से नाराज होने के कारण मि. यंग के कहने पर शेखावाटी पंचायत के प्रधान सरदार हरलाल सिंह को तथा ताड़केश्वर शर्मा पचेरी को 22 सितम्बर 1938 को एकाएक झुंझुनू में गिरफ्तार कर लिया तथा 26 सितम्बर 1938 को पंचायत के सहकारी मंत्री लादू राम किसारी को गिरफ्तार कर लिया गया. इन गिरफ्तारियों से इलाके में जोरों की हलचल मच गयी. झुण्ड के झुण्ड लोग इकट्ठे होकर इन गिरफ्तारियों का विरोध करने लगे और गिरफ़्तारी देने लगे. इन हलचलों से अधिकारी वर्ग घबरा गया और इन नेताओं को 28 सितम्बर 1938 को छोड़ दिया. (डॉ पेमाराम, p. 164)

इस जलसे में पृथ्वीसिंह गोठडा की भूमिका की चर्चा करना आवश्यक है. सामंती काल में, किसी गाँव में होने वाला यह पहला सम्मलेन था. इसमें भरतपुर, आगरा, अलीगढ, मेरठ और दिल्ली से किसान नेताओं और भजनोपदेशकों ने भाग लिया था. शेखावाटी के सभी भागों से किसान नेता, कार्यकर्ता और भजनोपदेशक सम्मिलित हुए. यह सम्मलेन पृथ्वी सिंह की पहल पर ही आयोजित किया गया था. पृथ्वी सिंह दुर्भाग्य से निरंतर बीमार रहने लगे थे. दिन-रात का संघर्ष, जेल जीवन, परिवार को मिलने वाली प्रताड़ना और लूट ने पृथ्वी सिंह को निश्चय ही परेशान किया. लेकिन वे झुके नहीं, न रुके, न टूटे. (राजेन्द्र कसवा: P. 163)

राजेन्द्र कसवा ने दया राम महरिया के साथ गोठड़ा भुकराण का हाल ही दौरा किया और पृथ्वी सिंह के नौकर रामू से बात की जो उनके खेत और घर संभालता था. रामू ने बताया कि गाँव से सटी हुई जोहड़ भूमि में सम्मलेन की व्यवस्था की थी. इसमें पूरे गाँव ने मेजबानी की थी. ऐसा प्रतीत होता था मानो पूरा गाँव नया बस गया हो. जोहड़ में दूर-दूर तक तम्बू लगे थे. महिलाओं के लिए अलग टेंट थे. ग्रामीणों में इतना जोश था कि प्रत्येक घर में दोनों वक्त बीस से पचास मेहमानों को खाना खिलाया जाता था. बीमार होने के बावजूद पृथ्वी सिंह घूम-घूम कर व्यवस्था का जायजा लेते रहे. (राजेन्द्र कसवा: P. 164)

रावराजा के निर्वासन से वापसी के प्रयास - सीकर के रावराजा के निर्वासन के पश्चात् वहां शांति व्याप्त थी. इस दौरान एक दिलचस्प घटना घटी. झुंझुनू में छात्रावास की भूमि बिसाऊ ठाकुर ने दी थी. किन्तु सीकर में प्रयास करने के उपरांत भी जमीन नहीं मिल रही थी. गोठड़ा किसान समेलन में भी यह प्रकरण उठा था. लेकिन रावराजा के निर्वासन के बाद भूमि कौन दे यह समस्या हो गयी. रावराजा के बाहर रहने से रानी चिंतित थी. किसी ने उन्हें बताया कि यदि किसान पंचायत जयपुर दरबार को कह दे तो रावराजा की वापसी हो सकती है. रानी ने किसान पंचायत के नेताओं को बुलाया.

जाट बोर्डिंग हाऊस सीकर की स्थापना - सीकर राव-रानी ने किसान पंचायत के सामने इच्छा प्रकट की कि सीकर राव-राजा को वापस बुलाया जाये. हरीसिंह बुरड़क पलथाना और ईश्वर सिंह भामू ने मांग रखी कि यदि सीकर दरबार जाट बोर्डिंग हाऊस सीकर के लिए भूखंड उपलब्ध करवादे तो पंचायत के नेता रावराजा को वापस लाने का प्रयास करेंगे. उन्होंने रेलवे स्टेशन के निकट भूमि चिन्हित कर रखी थी. सीकर रानी ने वादा किया कि रावराजा के आते ही छात्रावास के लिए जमीन देदी जाएगी. पंचायत के मुखियाओं ने जयपुर महाराजा को लिखकर दिया कि यदि यदि रावराजा को सीकर लाया जाता है तो उनको कोई ऐतराज नहीं है. सितम्बर 1942 में कल्याण सिंह फिर से रावराजा बनकर आ गए. (राजेन्द्र कसवा: पृ.193)

यह अश्चर्यजनक लगता है कि रावराजा के विरुद्ध संघर्ष करने वाले और उत्पीड़न सहने वाले ही उन्हें वापस ले आये. पंचायत के जाट नेताओं ने सोच समझ कर ही यह निर्णय किया था. असल में कल्याण सिंह अनपढ़ जरूर थे किन्तु वे साफ़ दिल व्यक्ति थे. छोटे ठिकानेदार ही उसे निर्दयी बनाए थे. राष्ट्रीय स्तर पर यह लगने लगा था कि देर-सबेर जागीरदारों को जाना ही होगा. अंग्रेज अधिकारियों और जयपुर रियासत ने बंदोबस्त करके कुछ हद तक सीकरवाटी के किसानों को संतुष्ट भी कर दिया था. (राजेन्द्र कसवा: पृ.194)

रावराजा के पुनः आने से सकारात्मक प्रभाव पड़ा. छात्रावास के लिए किसान पंचायत को भूमि आवंटित करने में विलम्ब नहीं हुआ. बसंत पंचमी , फ़रवरी 1943 में, सीकर बोर्डिंग हाऊस का शिलान्यास स्वयं रावराजा ने किया. उस अवसर पर हरीसिंह बुरड़क पलथाना, ईश्वर सिंह भामू भैरूपुरा, कालूराम सुंडा कूदन, कानाराम भूकर दिनारपुरा , डूंगाराम भामू, हरी राम भूकर गोठड़ा आदि किसान नेता उपस्थित थे. कल्याण सिंह ने 12 बीघा भूमि प्रदान की. यही नहीं रावराजा ने अपने पुत्र हरदयाल सिंह के नाम से एक कमरे की राशि भी दी. (राजेन्द्र कसवा: पृ.195)

शेखावाटी किसान आन्दोलन में अंग्रेज अधिकारी

शेखावाटी किसान आन्दोलन के इतिहास में जाटों का वास्ता समय-समय पर कुछ अंग्रेज अधिकारियों से भी पडा. अंग्रेज अधिकारियों की भूमिका स्वतः ही उभर कर आती है. इन अंग्रेज अधिकारियों का विवरण समीक्षात्मक टीप के साथ नीचे दिया गया है.

मि. एफ. एस. यंग (F.S.Young) - मि. एफ. एस. यंग की भूमिका लगभग तटस्थ भाव की नजर आती है. वह अंग्रेज पुलिस अधिकारी था. स्वाभाविक रूप से वह ब्रिटिश सरकार और जयपुर दरबार के प्रति समर्पित था. इसके बाद वह जागीरदारों और किसानों को लगभग बराबरी पर देखता था. उद्देश्य यही था की रियासत को कोई नुकशान न हो. किसानों को शिक्षित करने में उसका बड़ा हाथ था. उसने समय समय पर प्रशंसा की और उनमें आत्म सम्मान जगाया. (राजेन्द्र कसवा: P. 160)


Captain A.W.T. Webb

कैप्टन वेब (A.W.T. Webb) - इसके विपरीत कैप्टन वेब एक क्रूर, अभिमानी किन्तु अनुशासित अफसर माना गया है. इसके पीछे उसके फौजी संस्कार भी जान पड़ते हैं. ऐसा प्रतीत होता है की वह मात्र हुक्म चलाने का आदि था. आन्दोलनकारियों से वह बिलकुल खुश नहीं था. और उन पर गोली चलाना उसके बांयें हाथ का खेल था.(राजेन्द्र कसवा: P. 160)

मि. वेब सबसे पहले तत्कालीन व्यवस्था का एक हिस्सा था. यह तो वह मानता है कि किसान अत्यंत पीड़ित था किन्तु जन आन्दोलन को वह नहीं पचा पाया. ठिकानेदारों-जागीरदारों की अकर्मण्यता, निर्दयता और ऐयाशी के कारण वह उनसे घृणा करता था तो किसान आन्दोलन से भी खुस नहीं था. उसका स्वभाव कुछ ऐसा जान पड़ता है कि यदि वह शांति काल में सीकरवाटी में रहता तो निश्चय ही जनहित के कार्य करता. वह किसानों और ग्रामीण जनता के शोषण से दुखी रहता था. अशिक्षा, धार्मिक पाखंडों, रूढयों, छूअछोत, अंधविश्वासों से निजात दिलाने का कार्य करता, किन्तु आम जन उसके कार्यकाल में अपने अधिकारों के लिए और स्वतंत्रता के लिए उठ खड़ा हुआ था. घमंडी सामंतों और निरीह किसानों, दोनों के लिए वेब समान रूप से अप्रिय साबित हुआ, यही उसके व्यक्तित्व की विशेषता थी. (राजेन्द्र कसवा: P. 163)

सीकर की कहानी- कैप्टन वेब की जुबानी

कैप्टन वेब सीकर में सीनियर अधिकारी के तौर पर 1934 से 1938 तक पांच साल तक रहे. उसका दुर्भाग्य था की ये पांच वर्ष सीकरवाटी में भारी उथल-पुथल के रहे. जन आन्दोलन से चिढ़ने की उसकी अंग्रेज मानसिकता थी. किन्तु वह एक विचारशील व्यक्ति था. उसे समझने के लिए एक छोटी सी पुस्तिका का सहारा लिया जा सकता है, जो उसने स्वयं लिखी थी. इसका हिंदी अनुवाद 'सीकर की कहानी- कैप्टन वेब की जुबानी' नाम से प्रोफ़ेसर भगवान सिंह झाझड़िया एवं गणेश बेरवाल ने किया है. (राजेन्द्र कसवा: P. 160)

शेखावाटी जाटों के वेब के प्रति विचार - 24 जून 1938 को सीकरवाटी जाट किसान पंचायत की सीकर में एक बैठक हुई जिसमें सीकर के रावराजा के जयपुर दरबार से विद्रोह प्रकरण में जाटों द्वारा हिस्सा न लेने के निम्न कारण बताये गए (डॉ पेमाराम:p.159) -

  • 1. खूड़ी और कूदन में जाटों के साथ किया गया बुरा व्यवहार
  • 2. राजपूत जागीरदारों द्वारा जाटों पर की गयी ज्यादतियां
  • 3. रावराजा सीकर का कुप्रंध और जाट जाति के प्रति उपेक्षापूर्ण व्यवहार
  • 4. जाट किसान आन्दोलन के दौरान राव रानी द्वारा कोई सहानुभूति नहीं दर्शाना
  • 5. कैप्टन वेब (A.W.T. Webb) के अच्छे प्रशासन से जाट जाति को अनेक फायदे विशेषकर कृषि सम्बन्धी सुधार, शिक्षा एवं चिकित्सा सुविधाए तथा ग्रामीण उत्थान

जयपुर सीकर प्रकरण में शेखावाटी जाट किसान पंचायत ने जयपुर का साथ दिया था. विजयोत्सव के रूप में शेखावाटी जाट किसान पंचायत का वार्षिक जलसा गोठडा गाँव में 11 व 12 सितम्बर 1938 को शिवदानसिंह अलीगढ की अध्यक्षता में हुआ जिसमें 10-11 हजार किसान, जिनमें 500 स्त्रियाँ थी, शामिल हुए.

इस पंचायत में अन्य प्रस्तावों के साथ निम्न प्रस्ताव भी पारित किया गया -

सीकर के वर्तमान प्रशासन में किसी प्रकार का परिवर्तन न किया जाय क्योंकि कैप्टन वेब (A.W.T.Webb) के प्रशासन के दौरान किसानों को पर्याप्त राहत मिली है. अतः वेब को तब तक रखा जाय जब तक की सीकर में भूमि बंदोबस्त पूरा न हो जाय.(डॉ पेमाराम:p.162)

शेखावाटी जाट किसान पंचायत के इन संकल्पों से यह स्पस्ट होता है कि जाट कैप्टन वेब से काफी खुस थे. वे कैप्टन वेब को शेखावाटी के प्रशासक रूप में रोकना चाहते थे. जाटों के इस अहसान को 'सीकर की कहानी- कैप्टन वेब की जुबानी' पुस्तक में कैप्टन वेब ने इस अहसान को निम्न शब्दों में व्यक्त किया-

जागीरदार और किसान के मध्य होने वाला स्थाई संघर्ष एक चरम की और पहुँच रहा था. मुझे उस समय की कटु यादें आती हैं जब किसान की पीड़ा उन्हें उकसाने का करण बनी और राजनैतिक दृष्टता करने वालों के समूहों के लिए दरवाजे खुल गए. हमने उस तूफ़ान का मुकाबला किया परन्तु इस दौरान हिंसक मृत्यु और निर्दयता से घायल होने पर भारी क्षति सहन करनी पड़ गयी थी. ईश्वर को अवसर प्रदान करने पर धन्यवाद् है कि जिनकी कठिनाईयों को दूर करने का प्रयत्न कर मैंने उनके प्रति अपनी सहानुभूति प्रमाणित की और मैं वहां के सीधे-सादे लोगों द्वारा बाद में परेशानी के समय में दी गयी सहायता के प्रति कृतज्ञ रहूँगा और उसकी स्मृति सदा दिल में संजोये रखूँगा." (भगवान सिंह झाझड़िया, p.71)

राजपूतों के बारे में कैप्टन वेब के विचार -

  • कैप्टन वेब राजपूतों के बारे में लिखते हैं कि यह आश्चर्यजनक नहीं है कि राजपूत जाति भारत में भी सबसे अधिक नफ़रत का पात्र थी. उनसे पीड़ित लोग कहते हैं कि ईश्वर ने छ: बार इस डाकू जाति को दमित किया और सातवां अवसर भी शीघ्र ही आने वाला है. वे आगे कहते हैं कि राजपूतों को याद रखना चाहिय कि चूहों और विजेताओं के लिए दुर्भाग्य से क्षमादान नहीं होता. राजपूत अपने आप को विशिष्ट वर्ग मानते हैं (भगवान सिंह झाझड़िया, p.27) और दूसरी जातियों में जन्म लेने को एक त्रासदी मानते हैं. ....अपने आप तक सीमित होने पर राजपूतों का प्रशासन का तरीका रुखा और सहज है. ब्रिटिश लोगों के आगमन से पूर्व कोई भी राजपूत अपनी जनता की भलाई के बारे में नहीं सोचता था. उसका ध्यान फ़ौज और किसानों से वसूल किये जाने वाले हर एक रुपये पर केन्द्रित था (भगवान सिंह झाझड़िया, p.28) . ...वे अब भी अपने हृदयों में इस विश्वास को गले लगाते हैं कि राजनीती और शासन की कला में विश्वासघात अपरिहार्य तत्व है. (भगवान सिंह झाझड़िया, p.29)
  • जो लोग शताब्दियों से तलवार के डर से उनकी प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ती करते रहे अब उनके विरोध में उठ रहे हैं. अब वे दिन लद रहे हैं जब जागीरदार किसानों को जानबूझकर अज्ञान में रखते थे ताकि वे और कठोर परिश्रम करें. राजपूत अब अधिक समय तक सम्पन्नता में नहीं रह सकते. (भगवान सिंह झाझड़िया, p.30)
  • मेरे जैसे लोग जो राजपूत का हित चाहते हैं उन्हें सिर्फ समय न खोने की राय दे सकते हैं कि जीवित वस्तुओं को समय के साथ बदलना चाहिए या वे फिर न उठने के लिए गिर जायेंगे. ...परन्तु जिस व्यवस्था से वे चिपके हैं जिसको उन्होंने अब तक अनिवार्य माना है उसके अलावा जीने के और भी तरीके हैं.(भगवान सिंह झाझड़िया, p.30)

पंचपाना शेखावाटी में व्यापक हलचल

सीकर किसानों की अधिकांश शिकायतें दूर - सीकर प्रकरण से लेकर अभी तक की स्थिति का अवलोकन करें तो हम पाते हैं की सीकरवाटी किसान जाट पंचायत के सीकर के मामले में जयपुर का साथ देने तथा जयपुर की फ़ौज के लिए खाद्य सामग्री की व्यवस्था करने की वजह से जयपुर सरकार ने सीकर के किसानों की अधिकांश शिकायतें दूर कर दी थीं, जिसकी वजह से अगले कुछ वर्षों तक सीकर में कोई किसान आन्दोलन नहीं हुआ और सीकर में शांति रही. जबकि पंचापाना शेखावाटी में इससे विपरीत स्थिति रही और वह व्यापक हलचलों का केंद्र रहा. (डॉ पेमाराम, p. 164)

इन्ही दिनों प्रजामंडल के प्रधानमंत्री हीरा लाल शास्त्री ने शेखावाटी का दौरा किया. हरलाल सिंह, नेतराम सिंह, विद्याधर कुलहरी, रामचंद्र तथा अन्य किसान नेता उनके साथ थे. इन लोगों ने शेखावाटी के गाँवों में घूम-घूम कर एक सप्ताह तक फसल के बारे में जाँच की. इन्होने कहा कि अकाल कि स्थिति में ठिकानेदारों को लगान व लागबाग न दें जब तक कि वे इसमें उचित छूट न दें. ठिकानेदारों ने जयपुर जाकर किसान नेताओं के खिलाफ शिकायतें कीं. जयपुर सरकार अब किसानों से और प्रजामंडल से नाराज हो गयी. जयपुर के अधिकारीयों ने अब प्रजामंडल पर प्रहार करने का निश्चय किया. 16 दिसंबर 1938 को सेठ जमनालाल बजाज, अध्यक्ष जयपुर राज्य प्रजामंडल के जयपुर राज्य में प्रवेश पर रोक लगादी. 12 जनवरी 1939 को जयपुर राज्य प्रजामंडल को गैर कानूनी घोषित कर दिया. 24 जनवरी 1939 को झुंझनु में किसान पंचायत के दफ्तर की तलाशी ली गयी और पंचायत के प्रधान नेतराम सिंह को गिरफ्तार कर लिया. इसके साथ ही गाँवों में पंचायत के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने के लिए लारियां घुमने लगीं. हरलाल सिंह मंडासी को 24 जनवरी को उनके गाँव से गिरफ्तार किया. 26 जनवरी 1939 को राम सिंह बख्तावरपुरा को उनके गाँव में सोते हुए गिरफ्तार कर लिया. 24 से 31 जनवरी तक शेखावाटी में दमन का चक्र जोरों से चला और गाँवों से कोई दो दर्जन लोगों को लगानबंदी कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया. वास्तव में किसान पंचायत पर दमन का कारण उसका जयपुर प्रजामंडल के संपर्क में आना था. (डॉ पेमाराम, p. 167)

किसान आन्दोलन के दमन का सबसे भयंकर दृश्य शेखावाटी में था. जहाँ किसानों पर घोड़े दौडाए गए और जगह-जगह लाठी चार्ज हुआ. झुंझुनूं में 1 से 4 फ़रवरी 1939 तक एकदम अराजकता थी. पहली फ़रवरी को पंचायत के 6 जत्थे निकले, जिसमें तीस आदमी थे. इनको बुरी तरह पीटा गया. दो सौ करीब मीणे और करीब एक सौ पुलिस सिपाहियों ने जो कि देवी सिंह की कमांड में घूम रहे थे, लोगों को लाठियों और जूतों से बेरहमी से पीटा. जत्थे के नायक राम सिंह बडवासीइन्द्राज को तो इतना पीटा कि वे लहूलुहान हो गए. रेख सिंह (सरदार हरलाल सिंह के भाई) को तो नंगा सर करके जूतों से इतना पीटा कि वह बेहोश हो गए. उनकी तो गर्दन ही तोड़ दी. चौधरी घासी राम, थाना राम भोजासर, ओंकार सिंह हनुमानपुरा, मास्टर लक्ष्मी चंद आर्य और गुमान सिंह मांडासी की निर्मम पिटाई की. इन दिनों जो भी किसान झुंझुनू आया उसको सिपाहियों ने पीटा. यहाँ तक कि घी, दूध बेचने आने वाले लोगों को भी पीटा गया. (डॉ पेमाराम, p. 167)

दूसरी तरफ ठिकानेदारों द्वारा गाँवों में भी दमन किया जा रहा था. ककोड़ा गाँव में तो इस्माइलपुर के ठाकुर के भाई गंगा सिंह, जो कि फरार था, के निर्देशन में ठिकाने के आदमियों ने जोरदार लूट व मारपीट की. कई लोगों को भारी चोटें आईं जिसमें रामदत्त की माँ स्वरूपा तो अस्पताल में मर गयी. बडवासी में 4 फ़रवरी को कुछ किसानों को पकड़ लिया गया और नवलगढ़ की गढ़ी में काठ में दे दिया गया. 7 फरवरी को इसी गाँव से 15 आदमियों को ठिकाने के नौकर पकड़ लाये जिन्हें नवलगढ़ में खूब मारा-पीटा और बेइज्जत किया. रिजाणी गाँव में भी खूब मारपीट हुई. नवलगढ़ के कामदार हेम सिंह ने मुरादपुर के किसानों को बुलाकर पीटा. पातूसरी गाँव में तो लूट-खसोट का इतने जोरों का प्रदर्शन किया गया कि बहुत से किसान गाँव छोड़ कर भाग गए. नवलगढ़ ठिकाने की और से वायदापुरा में भी जबरदस्त मारपीट की गयी. (डॉ पेमाराम, p. 169)

प्रजामंडल एवं जाट पंचायतों में गठबंधन

सन 1938 में कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित हुआ जिसमें कहा गया कि कांग्रेस रियासती जनता से अपनी एकता की घोषणा करती है और स्वतंत्रता के उनके संघर्ष के प्रति सहानुभूति प्रकट करती है. त्रिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस ने रियासती जनता के प्रति समर्थन की घोषणा कर दी, इससे जनता में बड़ा उत्साह और उमंग जगी. आल इण्डिया स्टेट्स पीपुल्स कांफ्रेंस की स्थानीय इकाइयों के रूप में जगह-जगह प्रजामंडल अथवा लोकपरिषदों का गठन हुआ. राजस्थान में प्रजामंडलों के संस्थापन की प्रथम कड़ी के रूप में जयपुर राज्य प्रजामंडल की स्थापना सन 1931 में हुई. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 36)

सन 1938 के प्रजामंडलों की कोई राजनीतिक गतिविधियाँ नहीं थी. इसी साल प्रजामंडल ने संवैधानिक सुधार एवं कृषि सुधर के लिए आन्दोलन चलाये. किसान सभाएं 1937 में ही जयपुर प्रजा-मण्डल में विलीन हो चुकी थी. इसी साल सेठ जमनादास बजाज और पंडित हीरालाल शास्त्री इसके सचिव बने. इसी के साथ इसके वार्षिक अधिवेशन नियमित रूप से होने लगे. प्रजामण्डल का उद्देश्य जनता के लिए प्राथमिक नागरिक अधिकार प्राप्त करना और जयपुर राज्य में समग्र विकास की प्रक्रिया शुरू करना था. अब तक प्रजा मंडल का काम शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित था. ग्रामीण क्षेत्रों में पैठ नहीं होने से प्रजा मंडल ने जाट पंचायत के साथ जागीरदार विरोधी संधि में शामिल होने पर विचार किया. उधर शेखावाटी में भी यह विचार चल रहा था कि क्या हमें किसान पंचायतों का विलय प्रजा मंडल में कर देना चाहिय. एक गुट, जिसमें चौधरी घासीराम, पंडित ताड़केश्वर शर्मा, विद्याधर कुलहरी आदि थे, का सोच था कि इससे किसानों की मांगें उपेक्षित होंगी, क्योंकि अपनी बहुविध गतिविधयों में प्रजा मंडल इस और पूरा ध्यान नहीं दे पायेगा. दूसरी और सरदार हरलाल सिंह, चौधरी नेतराम सिंह आदि इस विचार के थे कि प्रजा मंडल जैसे सशक्त संगठन में शामिल होने से किसान पंचायतों को सीमित क्षेत्र से निकाल कर विशाल क्षेत्र तक पहुँचाने का यह एक सशक्त माद्यम बन सकेगा. प्रजामंडल में शामिल होने से उनकी पहुँच सीधी जयपुर राज्य से हो जाएगी जिससे जागीरी जुल्मों का वे अधिक सक्रियता से और ताकत से मुकाबला करने में समर्थ होंगे. इस द्विविध विचारधारा के कारण शेखावाटी का राजनीतिक संघर्ष विभाजित हो गया. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 37)

16 जून 1946 को किसान सभा का पुनर्गठन - प्रथम गुट के लोग जिसमें चौधरी घासी राम, विद्याधर कुलहरी आदि प्रमुख थे, किसान सभा में बने रहे जबकि दूसरे लोग प्रजा मण्डल से जुड़कर आजादी के संघर्ष की मूल धारा में चले गए. इन परिस्थियों में 16 जून 1946 को किसान सभा का पुनर्गठन किया गया. इस समय शेखावाटी के कुछ प्रमुख किसान नेताओं ने प्रजामंडल से अपने संबंधों का विच्छेद कर लिया. ये थे चौधरी घासी राम, पंडित ताड़केश्वर शर्मा, विद्याधर कुलहरी और तारा सिंह झारोड़. विद्याधर कुलहरी को झुंझुनू जिला किसान सभा का अध्यक्ष बनाया गया. इस विभाजन से शेखावाटी किसान आन्दोलन की गति कम हो गयी. आगे चलकर जयपुर राज्य से प्रजामंडल के कारण उनका संघर्ष शुरू हुआ. इस समय वे कई मोर्चों पर एक साथ लड़ रहे थे. प्रथम मोर्चा ठिकानेदारों के विरुद्ध, दूसरा उनके हिमायती जयपुर राज के विरुद्ध तथा तीसरा अपने ही उन भाईयों के विरुद्ध जो ठिकानों के अंध भक्त बने हुए थे. इस समय शेखावाटी के विविध क्षेत्रों में किसान सम्मलेन आयोजित कर किसानों की समस्याओं पर विचार-विमर्श किया जाता था. ऐसे सम्मेलनों कि अध्यक्षता या सभापतित्व सरदार हरलाल सिंह किया करते थे. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 37-38)

प्रजामंडल की शेखावाटी में गतिविधियाँ - नवंबर 1937 में में प्रजामंडल के महासचिव हीरा लाल शास्त्री ने शेखावाटी का दौरा किया. सरदार हरलाल सिंह तथा चौधरी नेतराम सिंह आदि उनके साथ थे. 25 एवं 30 नवम्बर 1937 को उनका भाषण हनुमानपुरा में हुआ. 16 दिसंबर 1938 को प्रजामंडल के अध्यक्ष सेठ जमनालाल बजाज के जयपुर राज्य में प्रवेश पर रोक लगा दी गयी और 'पब्लिक सोसायटीज एक्ट' के तहत प्रजामंडल को 12 जनवरी 1939 को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया. प्रजामंडल के दमन का कारण उसका जाट किसान पंचायत से मेल जोल बढ़ाना था और किसानों को भी इसी संधि की सजा दी जा रही थी. सेठजी ने दो बार 1 फ़रवरी और 5 फ़रवरी को जयपुर की सीमा में प्रवेश की कोशिश की किन्तु दोनों ही बार उन्हें बलपूर्वक खदेड़ कर राज्य से बाहर कर दिया गया. शेखावाटी में इस पर भयंकर प्रतिक्रिया हुई. किसानों ने जगह-जगह सत्याग्रह व आन्दोलन शुरू कर दिए. किसानों पर घोड़े दौडाए गए और लाठी चार्ज हुआ. झुंझुनू में 1 से 4 फ़रवरी तक एकदम अराजकता की स्थिति रही. इसी दौरान प्रजामंडल के प्रभाव में आकर शेखावाटी जाट किसान पंचायत का नाम बदल कर किसान पंचायत और जाट बोर्डिंग हाऊस झुंझुनू का नाम विद्यार्थी भवन कर दिया. सन 1942 में झुंझुनू एवं सन 1942 में श्रीमाधोपुर में प्रजामंडल के वार्षिक अधिवेशन आयोजित किये गए लेकिन ठिकानों की ज्यादतियां अब नए सिरे से शुरू होने लगीं, क्योंकि अब जयपुर दरबार व ब्रिटिश अधिकारी भी उन्हें शह दे रहे थे. ठिकाने कई तरह की लाग-बाग़ और मोहराने मांगने लगे. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 37)

किसान दिवस का आयोजन: 1 मार्च 1939

जयपुर राज्य की किसान विरोधी नीति के कारण पूरे राज्य में 1 मार्च 1939 को किसान दिवस मानाने का निर्णय प्रजामंडल ने लिया. झुंझुनू में भी किसान दिवस मनाने की जोरों से तैयारी होने लगी. इस दिन शेखावाटी पंचायत के उप प्रधान सरदार हरलाल सिंह द्वारा झुंझुनू में सत्याग्रह किये जाने की घोषणा की गयी और इसकी सूचना जयपुर सरकार को भी दी गयी. पुलिस और ठिकानों में हलचल मच गयी. पुलिस ने इस दिन भारी प्रबंध किया. झुंझुनू के चारों और 2 मील तक पुलिस गस्त लगा दी. नवलगढ़ ठाकुर मदन सिंह के कामदार हेम सिंह अपने घुड़सवारों के साथ गश्त लगा रहे थे. जयपुर से भी बड़ी संख्या में पुलिस व नागाओं को झुंझनु भेजा गया. (डॉ पेमा राम, p. 171)

सरदार हरलाल सिंह 1 मार्च 1939 को गिरफ़्तारी नहीं दे सके. इसी समय प्रजामंडल के आगरा कार्यालय ने घोषणा की कि सरदार हरलाल सिंह 15 मार्च 1939 को झुंझुनू में गिरफ़्तारी देंगे. इससे लोगों में जोश की लहर फ़ैल गयी. किसानों ने 15 मार्च के लिए सत्याग्रहियों के जत्थे तैयार करने शुरू कर दिए. हर गाँव में लोग सत्याग्रही बनाने को तैयार थे. 15 मार्च के दिन नगर के चारों और घोड़ों पर चढ़े पुलिस स्वर चक्कर लगा रहे थे. सर्वत्र पुलिस फैली हुई थी. शहर का कोई आदमी नजर नहीं आ रहा था. पूरे शहर में धरा 144 लगी हुई थी. सुबह दस बजे का समय था. अचानक शहर की सरहदों से 'इन्कलाब जिंदाबाद' के नारे सुनाई देने लगे. झुंझुनू शहर के हर कोने से सत्याग्रहियों के जत्थे प्रविष्ट होने लगे. पुलिस का लाठी चार्ज शुरू हो गया. लाठियों की बौछार के बीच ही सत्याग्रही आगे बढ़ते गए. लोग खून से लथपथ हो गए. इसी समय सारा पुलिस घेरा तोड़कर सरदार हरलाल सिंह वहां पहुँच गए और भाषण देना शुरू कर दिया. पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर सेन्ट्रल जेल भेज दिया. इस प्रकार जयपुर राज्य और ठिकानेदारों की समस्त चालों और दुरभि संधियों को नाकाम करते हुए सरदार हरलाल सिंह ने अपना लक्ष्य पूरा किया. उनकी गिरफ़्तारी से बड़ी उत्तेजना फ़ैल गयी. लोगों के जत्थे निरंतर आते रहे और गिरफ्तार होते रहे. जनता पर इस समय जो कहर ढाए वे वर्णनातीत हैं. सैंकड़ों लोग बेहोश होकर गलियों में गिर पड़े. अनेकों के सर से रक्त की धारा बह निकली, पर उन्होंने झंडे को झुकने नहीं दिया. विद्यार्थी भवन से छात्रों की एक टोली झंडा लेकर निकली जिसे बेरहमी से पीटा गया. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 39)

सरदार हरलाल सिंह के झुंझुनू पहुँचने की कहानी बड़ी रोचक है. पुलिस ने कमर कसली थी कि 15 मार्च 1939 को हरलाल सिंह तो क्या. किसी भी किसान को झुंझुनू नहीं पहुँचने दिया जायेगा. सरदार हरलाल सिंह आगरा में थे. पुलिस की योजना थी कि उन्हें रास्ते में ही गिरफ्तार किया जाये. लेकिन सरदार निश्चित दिवस से दो दिन पूर्व ही आगरा से रवाना हो गए. वे नारनौल तक गाड़ी में गए. वहां भेष बदला और ऊँट पर स्वर होकर रात को गुमनाम रास्ते से झुंझुनू के लिए चल पड़े. काटली नदी के किनारे बसे गाँव भामरवासी में वे ख्याली राम के घर रुके. दूसरी रात्रि को वे छुपते-छुपाते, झुंझुनू से सटी नेत की ढाणी में पहुंचे. वहां से पैदल चलकर झुंझुनू के एक सेठ रंगलाल गाड़िया के घर छुप गए. पुलिस और घुड़सवार पैनी दृष्टि गडाए थे लेकिन लम्बे-चोडे डील-डौल वाले सरदार हरलाल सिंह ने उनको चकमा दे दिया. उनको आगरा से सुरक्षित झुंझुनू पहुँचाने में ख्याली राम भामरवासी का विशेष योगदान बताया जाता है. ख्याली राम के साथ दु:साहसी युवकों की टोली रहती थी जो जोखिम भरे कार्य करने में हमेशा आगे रहती थी. (राजेन्द्र कसवा, p. 170)

किसानों तक यह सन्देश पहुंचा दिया गया था कि सरदार हरलाल सिंह सुरक्षित झुंझुनू पहुँच गए हैं और सही समय पर अपनी गिरफ़्तारी देंगे. इससे आन्दोलनकारियों में दुगुना उत्साह फ़ैल गया. 15 मार्च 1939 को सूर्योदय होने के साथ ही चारों और से सत्याग्रही किसान गाँवों से टिड्डी दल की तरह उमड़ पड़े. तिरंगा झंडा लिए महात्मा गाँधी की जय, पंडित नेहरु की जय, ब्रिटिश हुकूमत का नाश हो, जागीरदारी प्रथा ख़त्म हो, सरदार हरलाल सिंह की जय के नारे लगाते हुए आगे बढ़ने लगे. रेलवे स्टेशन के पास हजारों आदमियों को पुलिस व घुड़सवारों ने घेर रखा था. उन पर भयंकर बल प्रयोग किया गया. चार वर्ग किमी में घोड़े दौडाए गए , लाठी चार्ज किया गया परन्तु सत्याग्रहियों का आना जारी रहा. पुरुष जत्थों के पीछे महिला जत्थों का आना प्रारंभ हुआ. पुलिस एक बरगी हैरान रह गयी और आखिर उन पर टूट पडी. वीर महिलाएं अपने साथ सैंकड़ों अन्य महिलाओं को लेकर पहुँचीं. उन्होंने तिरंगे के पास पुलिस को फटकने नहीं दिया और आगे बढती गईं. पुलिस ने इन पर भी अकथनीय अत्याचार किये. निहत्थी और सर्वथा अहिंसक भीड़ पर घोड़े दौड़कर जागीरदारों ने नृशंस अत्याचार की पराकाष्ठ कर दी थी. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 39)

झुंझुनू में लाखों किसानों का प्रवेश - वह ऐतिहासिक दिन था, जब दूसरी बार झुंझुनू में लाखों किसान प्रवेश कर गए. स्त्रियों के जत्थे गीत गाते, रंग-बिरंगे परिधानों में अपनी अलग ही पहचान बना रहे थे. उनके साहस को देखकर पुलिस और ठिकानेदार चकित थे. कहाँ से आया यह जोश?. सबसे बड़े महिला जत्थे का नेतृत्व हरलाल सिंह माण्डासी की माँ फूला देवी कर रही थी. हरलाल सिंह मांडासी की माताजी फूला देवी ने पुलिस के घेरे में पंचायत के कार्यकर्ताओं की सभा का संचालन बड़ी वीरता से किया. उसकी बहू और हरलाल सिंह मांडासी की पत्नी रामकुमारी, ख्याली राम भामरवासी की पत्नी किशोरी देवी, हरकोरी पत्नी रडमल सिंह गोठडा, गौरादेवी हनुमानपुरा, मोहरी देवी पातुसरी आदि अन्य महिलाएं विभिन्न जत्थों का नेतृत्व करती हुई आगे बढीं. ये सभी महिलाएं अनपढ़ थीं. इस आन्दोलन के सात दशक के अधिक समय में यह जिला महिला शिक्षा में अग्रणी हो गया. लेकिन झुंझुनू के इतिहास में बाद में कभी ऐसा आन्दोलन नहीं हुआ, जिसमें महिलाओं और पुरुषों ने इस भांति भाग लिया हो. (राजेन्द्र कसवा, p. 171)

इन सब आन्दोलनकारियों को लारियों में भरकर जंगल में ले जाया गया और लारियों को अलग अलग रोक कर लारियों से उतारते समय लाठियों व जूतों से उन्हें बुरी तरह पीटा गया. वापस आने पर इन्हें घोड़े दौड़ाकर बहुतों को घायल कर दिया. इधर स्टेशन पर यह चल रहा था और उधर सत्याग्रह कार्यालय से महिलाओं का जत्था राम प्यारी के नेतृत्व में निकला. पुलिस ने महिलाओं को घेर लिया और गिरफ्तार कर लिया. (डॉ पेमा राम, p. 172)

महिलाओं का जत्था - बाद में यह निर्णय हुआ की शेखावाटी के आन्दोलनकारी जत्थे बनाकर जयपुर जायेंगे और वहां धरना देंगे. पंडित तदाकेशावर शर्मा की योजना थी की पहले महिलाओं का जत्था झुंझुनू से जयपुर भेजा जाय. 18 मार्च की तिथि तय की गयी. अब जत्थे निरंतर जयपुर भेजे जाने लगे. श्रीमती दुर्गादेवी (पंडित ताड़केश्वर शर्मा की पत्नी) पचेरी के नेतृत्व में महिलाओं ने जयपुर के जौहरी बाजार में गिरफ़्तारी दी. इन महिलाओं में ऐसी भी शामिल थीं जिनकी गोद में अति अल्पायु के शिशु थे. सब पर सत्याग्रह का जूनून चढ़ा था, अतः व्यक्तिगत सुख-स्वार्थ की बात पीछे छूट गयी थी. इस जत्थे में किशोरी देवी पत्नी ख्याली राम भामरवासी , फूला देवी माता हरलाल सिंह मांडासी , रामकुमारी पत्नी हरलाल सिंह मांडासी, गोरा पत्नी गंगासिंह हनुमानपुरा, मोहरी देवी पत्नी सुखदेव पातुसरी आदि प्रमुख रूप से सम्मिलित हुई. (राजेन्द्र कसवा, p. 172)

19 मार्च 1939 को एक जत्था, जिसमें करीब 50 महिलाएं थीं, किशोरी देवी (धर्म पत्नी सरदार हरलाल सिंह) के नेतृत्व में गिरफ़्तारी देने जयपुर गया परन्तु उनके पहुँचने से पहले ही सत्याग्रह समाप्त हो गया अतः वे जयपुर से लौट आईं. आगे चलकर समझौता होने पर सभी गिरफ्तार लोगों को जेल से रिहा कर दिया. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 40)

पंचपना शेखावाटी में दमन का दौर जारी

सन 1938 के बाद सीकर में कई साल तक शांति रही लेकिन पंचपना शेखावाटी में स्थिति इसके विपरीत रही. शेखावाटी का यह हिस्सा, जिसमें झुंझुनू, खंडेलावाटी और उदयपुरवाटी शामिल थे, जागीरदारी प्रथा के समाप्ति तक किसान संघर्ष का समरांगन और रियासत की राजनीति का केंद्र बना रहा. शेखावाटी में किसान तो आंदोलित थे ही और थोड़ी सी सफलता भूमि बंदोबस्त व निश्चित भूमिकर के रूप में मिलते ही ठिकानेदार भी आंदोलित हो गए. किसान आन्दोलन के रूप में उन्हें अपना सर्वनाश दिखाई देने लगा, अतः वे काफी सक्रीय हो गए. उदयपुरवाटी के भौमिये बल प्रदर्शन व विद्रोह पर उतर आये थे जिसके फलस्वरूप जगह-जगह संघर्ष और हिंसा होने लगी. सबसे गंभीर समस्या पंचपना उदयपुरवाटी व सीकर के जागीरी इलाके की थी, जहाँ एक-एक पेड़ व एक-एक जोहड़ के लिए लड़ाई लड़ी जा रही थी. जहाँ भौमिये और पानेदर कुछ भी छोड़ने को तैयार नहीं थे, वहीँ जाट किसान कुछ भी देने को तैयार नहीं थे. आर-पार की लडाई खिचती ही चली जा रही थी. जयपुर सरकार के अधिकारी इसे हवा दे रहे थे. 1940 में ठिकाना बिसाऊ के कर्मचारियों ने (बाजीसर के चौधरी घडसी राम की हत्या कर दी. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 40-41)

भामूओं की ढाणी पर हमला - शेखावाटी के ठिकानों ने मनमाना लगान वसूल करने हेतु किसानों पर ज्यादतियां की. 24 जून 1943 को खंडेला ठिकाने के 150 आदमियों ने भामूओं की ढाणी पर लगान वसूली हेतु हमला बोला जिससे तीन किसान और एक स्त्री बुरी तरह घायल हुए. (हिंदुस्तान टाईम्स, 2 जुलाई 1943 ) (डॉ पेमा राम,p. 195)

भोडकी में ठिकानेदारों का बड़ा भारी सशस्त्र बल प्रदर्शन - 17 सितम्बर 1943 को पानेदार और भौमियों की एक बैठक हुई जिसमें सरकार से उनकी बंदोबस्त सम्बन्धी शिकायतों को दूर करने की मांग की. इसी समय शेखावाटी और उदयपुरवाटी के भौमियों, जिसमें भोड्की और गुढ़ा के भौमिये प्रमुख थे, ने मिलकर भोडकी में इकट्ठे होकर एक बड़ा भारी सशस्त्र बल प्रदर्शन किया और तहसीलदार, नाजिम व पुलिस के अधिकारियों का मुकाबला किया. इनका मुकाबला करने हेतु जयपुर सरकार द्वारा जयपुर से तोपें व फ़ौज के रिसाले भेजे गए तथा अतिरिक्त पुलिस तैनात की गयी. लेकिन इस उद्दंड व्यवहार पर कोई कठोर कारवाही नहीं की गयी. ठिकानेदारों की बंदोबस्त सम्बन्धी शिकायतों के निराकरण हेतु 3 दिसंबर 1943 को पंडित पशुपतिनाथ कोल को शेखावाटी से हटाकर उनके स्थान पर ठाकुर दूल्ह सिंह को शेखावाटी के लिए स्पेशल सेटलमेंट कमिश्नर नियुक्त किया. (डॉ पेमा राम, p. 196)

इसके साथ ही जागीरदारों को संतुष्ट करने के लिए 12 जनवरी 1944 को एक स्पेशल कमिटी नियुक्त की जिसके चेयरमेन प्रधानमंत्री के अलावा रेवेन्यु मिनिस्टर, आर्मी मिनिस्टर, रेवेन्यु बोर्ड मेंबर तथा शेखावाटी तोरावाटी राजपूत सभा के सात प्रतिनिधि लिए गए. इस कमिटी ने 7 जून 1944 को रिपोर्ट दी जिसमें चाही जमीन पर लगान बढ़ाने, बंदोबस्त हो जाने के बावजूद ठिकानेदारों की भूमि सम्बन्धी शिकायतें सुनने, पेड़ों पर जागीरदारों का अधिकार होने, पान चराई और खूंटा बंदी की लागें वसूल करने, प्राकृतिक उपज पर लाग लेने, गाँवों के नजदीक के अलावा बाकी जोहड़ पर ठिकानों का अधिकार होने आदि सम्बंधित सिफारिशें थीं. ये सभी जागीरदारों के पक्ष में थी. इस कमिटी में कोई किसान प्रतिनिधि नहीं था. (डॉ पेमा राम 198)

ढाणी शिवसिंहपुरा में गोलीकाण्ड - जागीरदार मनमाना लगान वसूल करना चाहते थे और किसान देने को तैयार नहीं थे. अब तो संघर्ष अवश्यम्भावी हो गया था. किसान फिरसे संगठित होने लगे. मुख्य समस्या उदयपुरवाटी और खंडेला इलाके की थी. इसलिए ज्यादा संघर्ष यहीं हुआ.

पचेरी काण्ड - 16 सितम्बर 1944 को पचेरी गाँव के ठाकुर शिवसिंह व संग्राम सिंह, जो पचेरी की एक-चौथाई जमीन के पानेदर थे, ने ढाणी शिवसिंहपुरा में दतू यादवबिरजू यादव नाम के दो किसानों को गोलियां चलाकर भून दिया तथा अनेक महिलाओं एवं किसानों को घायल कर दिया. सैंकड़ों मुकदमे बेदखली के कर दिए. वकील करणी राम भोजासर, पंडित ताड़केश्वर शर्मा, विद्याधर कुलहरीनरोत्तम लाल जोशी ने बड़ी हिम्मत व दिलेरी से पचेरी के किसानों की मदद की. पूरा शेखावाटी क्षेत्र किसान सभा व प्रजामंडल के नेतृत्व में खुद्बुदाने लगा. जगह-जगह जुलुस व सभाएं होने लगी. किसानों का एक जुलुस बंशीलाल लुहाडिया के नेतृत्व में 8 अप्रेल 1945 को दांतारामगढ़ में निकला. ठिकाना दांता ने सैंकड़ों राजपूतों की सहायता से ( जो बाहर के थे तथा लाठियों, तलवारों व बंदूकों से लैस थे) जुलुस पर हमला कर दिया. इसमें दो महाजन, एक मुसलमान, एक चरण, एक कुम्हार, एक जूजर और नौ जाट बुरी तरह घायल हुए. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 41)

देवगांव पर हमला - सन 1945 जून माह में देवगांव के एक किसान ने घरेलू कार्य के लिए खेत से पेड़ काट लिया. इसको मुद्दा बनाकर गोठड़ा के भौमीयों का किसानों से संघर्ष हो गया. मंडावर, खिरोड़, चिराना, मोहनबाड़ी के करीब 300 भौमिया राजपूतों ने बंदूकों, भालों, तलवारों से लैस होकर देवगांव पर हमला कर दिया. देवगांव के किसान, जो की 50 -60 की संख्या में थे, ने भी लाठियों और फरसों से मुकाबला किया. किसानों की औरतें और लड़कियां भी लडाई के मैदान में आ गईं. भौमियों ने बंदूकों से फायर शुरू कर दिया. दो किसान गोविन्द राम खटकड़कुशला राम ऐचरा मारे गए और एक लड़की सहित 15 आदमी घायल हुए. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 41)

कैमरी की ढाणी (खिरोड़) में भौमियों का बर्बर अत्याचार - अक्टूबर 1945 में खिरोड़ गाँव की सीमा में कैमरी की ढाणी में भी ऐसा ही झगडा हुआ. बंदूकों व अन्य शास्त्रों से लैस करीब 500 भौमियों ने कैमरी की ढाणी की तरफ कूच किया. सैंकड़ों किसान भी लाठियों, फरसों से लैस होकर आ गए और दोनों पक्षों में जम कर लड़ाई हुई. बंदूकों की गोलियों से चार किसान शहीद हुए. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 42). अक्टूबर 1945 में खिरोड़ गाँव में भौमियों ने बर्बर अत्याचार किये. किसानों ने लगान के रूप में आधा बांटा भौमिया लेना चाहते थे. किसान देने को तैयार नहीं थे. इस पर 15 गाँवों के करीब 500 भूमियों ने सशस्त्र खिरोड़ पर हमला बोला. सैंकड़ों किसान भी लाठियां, जेलियाँ व गंडासियां लेकर आ गए और भौमियों को ललकारा. किसानों और भौमियों में जमकर लड़ाई हुई. भौमियों की बंदूकों से नोपा राम, पेमा राम, नानग राम की घटना स्थल पर मौत हो गयी और लिखमा राम की जयपुर अस्पताल में जाकर मौत हुई. 28 व्यक्ति घायल हुए जिनमें 10 स्त्रियाँ भी थीं. (डॉ पेमा राम,p. 203)


मांडासी में क़त्ल - सन 1946 में ही मंडावा ठिकाने ने मांडासी पर हमला किया और एक किसान बेगराज मांडासी मारा गया. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 42)

मोल्यासी में गोली चली - सीकर के मोल्यासी गाँव में 23 दिसंबर 1945 को चौधरी लेख राम कसवाली ने प्रजामंडल की सभा बुलाई. जब आदमी इकट्ठे हो गए और सभा का समय हो गया तो मोल्यासी के ठाकुरों ने सभा करने का विरोध किया तथा भारी संख्या में हथिया लेकर आये. एकत्रित भीड़ ने हटने से मन कर दिया तो उन पर गोलियां चला दी जिससे लेखराम कसवालीरिडमल सिंह छर्रे लगने से घायल हो गए. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 42)

उस समय की परिस्थितियों का वर्णन राजेन्द्र कसवा (मेरा गाँव मेरा देश वाया शेखावाटी, पृ. 198-199) ने स्वतंत्रता सेनानी रणमल सिंह के शब्दों में कुछ यों किया है:

"मौल्यासी गाँव में 23 दिसंबर 1945 की रात को मीटिंग रखी गयी थी. नेतृत्व देने वालों में किसनसिंह बाटड , मास्टर कन्हैया लाल स्वरूपसर, कुमार नारायण वकील, चन्द्रसिंह बिजारनिया, लालसिंह कुलहरी माधोपुर, लेखराम कसवाली और मैं (रणमल सिंह) थे. बदरी नारायण सोढानी को भी आना था, लेकिन वे नहीं पहुँच सके.
"हम लोग मंच को ठीक कर ही रहे थे कि रात को 10 बजे 50 राजपूत नारे लगाते आये. उनका जय घोष था - करणीमाता की जय. मैं मंच पर खड़ा हो गया. मेरे साथ एक फौजी हनुमान महला भी खड़ा था. हमारे अन्य साथियों ने समझाया कि हमें बिना मीटिंग किये चलना चाहिए. लेकिन मैं नहीं माना. मैं भाषण देना चाहता था लेकिन राजपूतों के शोर के कारण कुछ बोल नहीं पा रहा था. तब मैंने भी जोर-जोर से नारे लगाने शुरू कर दिए - 'भारत माता की जय ! महात्मा गाँधी की जय ! 'ठिठुरती रात में, जब चारों और सन्नाटा बिखरा था, गाँव के चौक में गर्जना हो रही थी.
"एक राजपूत ने आकर मेरे कान में कहा, "राजपूत सरदारों के पास हथियार हैं. मुकाबला करना ठीक नहीं है. लेकिन मैं रूका नहीं और जोर-जोर से नारे लगाता रहा. इससे मेरा गला भी ख़राब हो गया. तभी एक राजपूत ने मंच पर आकर बर्छी से मुझ पर वार किया. सर व नाक पर चोट आई (इस चोट के निशान आज भी उनके सर तथा नाक पर हैं) . मैं बेहोश होकर गिर पड़ा. मुझे सीकर लाया गया और इलाज कराया गया. इसके बाद मैंने विरोध स्वरुप पांच दिन उपवास रखा.
"मैं तो बच गया लेकिन यह आंकड़े हैं कि सम्पूर्ण शेखावाटी में आन्दोलन के दौरान 117 व्यक्ति मरे थे. इनमें 104 जाट, 8 जाटव, 4 अहीर एवं एक ब्राहमण था. ...."

राजेन्द्र कसवा (मेरा गाँव मेरा देश वाया शेखावाटी, 2012, पृ. 176) ने लेख किया है कि शेखावाटी किसान आन्दोलन जब चल रहा था तब कैसा आतंक था, इसका सटीक संस्मरण रणमल सिंह ने सुनाया.

"मैं बहुत छोटा था तब पिताजी के साथ एक बार सीकर गया. तब देखा कि एक किसान ऊँट गाड़ी में खेजड़ी की सूखी छड़ी बेचने आया था. छड़ी बेचकर जब किसान वापस जाने लगा तो रावराजा सीकर के व्यक्तियों ने पकड़ लिया. इन व्यक्तियों को 'तरवारिया' कहा जाता था. तरवारियों ने किसान को बिना भाड़ा दिए ही रामगढ़ जाने को मजबूर कर दिया. मैंने पिताजी से पूछा, 'ये कौन लोग हैं और किसान को क्यों धमका रहे हैं? पिताजी ने उत्तर दिया, 'बेटा ये राज के आदमी हैं. अपनी मनमर्जी के बादशाह. किसी से भी बेगार ले सकते हैं."
"सन 1938 में मैं सीकर पढने गया था. खांजी के डेरे में स्कूल चलती थी, जहाँ अब नगरपरिषद है. स्कूल में कुल 20 लड़के ही ऐसे थे जो गाँव से आये थे. इनमें 6 सीकर तहसील के, 9 फतेहपुर तहसील के और 5 लक्ष्मंगढ़ तहसील के थे. हमें देखकर रावराजा के कारिंदे कटाक्ष करते, 'तुम लोग खेती करो, ग्वाली करो, मजूरी करो. पढाई से तुम्हारा क्या वास्ता? क्या करोगे पढ़कर? तुम पढ़ गए तो खेती कौन करेगा? न जाने हमें वे क्या-क्या कहकर चिढाते. उस दिन एक दरबारी ने मेरा नाम पूछा. मैंने 'रणमल सिंह' बताया तो कहा, सिंह मत लगाओ. राम का नाम ही अच्छा लगता है."

चनाणा गोलीकांड - सन 1946 में झुंझुनू जिले के चनाणा गाँव में किसान सम्मलेन का आयोजन किया गया था. सम्मलेन के अध्यक्ष नरोत्तम लाल जोशी व मुख्य अतिथि पंडित टिकाराम पालीवाल थे. किसान नेता सरदार हरलाल सिंह, नेतराम सिंह, ठाकुर राम सिंह, ख्याली राम, बूंटी राम और स्वामी मिस्रानंद आदि उपस्थित थे. सम्मलेन आरंभ हुआ ही था कि घुड़सवार, ऊँटसवार व पैदल भौमिया तलवारें, बंदूकें, भाले व लाठियां लेकर आये. सीधे स्टेज पर हमला किया जिसमें टिकाराम पालीवाल के हाथ चोट आई. दोनों ओर से 15 मिनट तक लाठियां बरसती रहीं. भौमियों के बहुत से आदमी घायल होकर गिर पड़े तो उन्होने बंदूकों से गोलियां चलाई जिससे कई किसान घायल हो गए और सीथल का हनुमान सिंह जाट मारा गया. किसानों ने हथियार छीनकर जो मुकाबला किया उसमें एक भौमिया तेज सिंह तेतरागाँव मारा गया और 10 -12 भौमियां घायल हुए. सभा में भगदड़ मच गयी और दोनों तरफ से क़त्ल के मुकदमे दर्ज हुए. आगे चलकर समझौता हुआ और दोनों ओर से मुकदमे उठा लिए गए. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 42-43)

उदयपुरवाटी में संघर्ष - उदयपुर (भौमियावाटी ) पैंतालिसे के नाम से प्रसिद्ध था. काश्तकार माली भाईयों की हालत सबसे बुरी थी. न पेट भर रोटी, न कपडा, न मकान और न किसी का सहारा. कोई भी जनसेवक इस क्षेत्र में घुस नहीं सकता था. माली बड़े भयभीत थे तथा खुलकर अपना रोना भी नहीं रो सकते थे. उदयपुरवाटी और सीकर जागीर में किसानों की समस्या ज्यों की त्यों बनी रही. उनकी मूल समस्या इन दो इलाकों में भूमि बंदोबस्त था. उदयपुरवाटी युद्धस्थल बन गयी थी. गाँव-गाँव व खेत-खेत में झगडे होने लगे. 1947 -48 के दौरान उदयपुरवाटी में लड़ाई खेतों से चलकर घरों तक पहुँच गयी. ओलखा की ढाणी, रघुनाथपुरा, गिरधरपुरा, धमौरा आदि में भौमियों और जाटों में संघर्ष हुआ. 1947 में ही 400 भौमियों ने हुक्मपुरा गाँव पर आक्रमण किया. गाँव को लूट लिया और एक किसान हरलाल सिंह को गोली से उड़ा दिया. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 43-44)

मलसीसर में किसान सम्मलेन 1945

21 नवम्बर 1945 को प्रजामंडल ने जयपुर स्टेट से बातें करने के लिए एक उपसमिति का गठन किया. इसके संयोजक विद्याधर कुलहरी बनाये गए. दो सदस्य थे - सरदार हरलाल सिंह और नरोत्तम जोशी. पंडित ताड़केश्वर उपसमिति के मंत्री एवं सत्यदेव सिंह देवरोड़ आफिस इंचार्ज बनाये गए. इस उपसमिति ने जयपुर दरबार से बातचीत की परन्तु उनके कान पर जूं नहीं रेंगी. तब सरदार हरलाल सिंह, चौधरी घासी राम, नेतराम सिंह आदि ने गाँवों में तूफानी दौरे शुरू किये. किसानों को सावधान किया कि खतौनियों में दर्ज लगान से अधिक लगान बिलकुल न दें. (राजेन्द्र कसवा,p.189)

ठिकाने दारों द्वारा प्रतिदिन किसानों को परेशान किया जाने लगा. 19 दिसंबर 1945 को चौधरी घासीराम ने झुंझनु जिले के मलसीसर गाँव में किसानों का विशाल जलसा आयोजित किया. पंडित हीरा लाल शास्त्री ने इस सम्मलेन कि अध्यक्षता की. झुंझुनू, सीकर एवं चूरू जिले से करीब दस हजार किसान इस सम्मलेन में उपस्थित हुए. प्रसिद्ध भजनोपदेशक पृथ्वी सिंह बेधड़क, जीवन राम, मोहर सिंह, देवकरण पालोता, सूरजमल साथी आदि ने ऐसे गीत प्रस्तुत किये कि जानलेवा जाड़े के बावजूद किसान आधीरात तक डटे रहे. मलसीसर अति पिछड़े क्षेत्र में आता है. यहाँ के निवासियों ने प्रथम बार इतना बड़ा सम्मलेन देखा. (राजेन्द्र कसवा,p.190)

मलसीसर का ठाकुर असभ्य और क्रूर समझा जाता था. वह अन्य ठाकुरों से दुगुना लगान वसूल करता था. किसानों में वह फूट पैदा कर अपना स्वार्थ पूरा करता था.उसी मलसीसर में, ठीक गढ़ के सामने, चौधरी घासी राम ने किसानों का जलसा कर ठाकुर को सीधी चुनौती दी थी.(राजेन्द्र कसवा,p.190)

पंडित हीरालाल शास्त्री को दिन के बारह बजे ही सम्मलेन स्थल पर पहुँचाना चाहिए था. परन्तु वे विलम्ब से पहुंचे. जाड़े का मौसम था. घासी राम की योजना थी कि चार बजे तक सम्मलेन समाप्त हो जायेगा. इससे किसान रात होने से पूर्व ही अपने अपने घरों में चले जायेंगे. दूर के किसानों के ठहराने की व्यवस्था थी. जिस समय चूरू जिले के गाँव दूधवा खारा के किसान नेता हनुमान सिंह बुडानिया मंच से भाषण कर रहे थे, ठाकुर के कारिंदे हथियारों से लैस होकर गढ़ के बाहर आ गए. सभा में कानाफूसी होने लगी. हनुमान सिंह को समझते देर नहीं लगी. उन्होंने अपनी आवाज ऊँची करते हुए कहा, 'किसानो, तुम, क्यों चिंता करते हो? तुम लोग तो जमीन पर बैठे हो. मैं मंच पर खड़ा हूँ. ठाकुर की पहली गोली मुझे ही लगेगी. लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि अब इन बंदूकों में जान नहीं है.' (राजेन्द्र कसवा,p.190)

ठाकुर के कारिंदे आगे नहीं बढे. तभी हीरालाल शास्त्री का काफिला आ पहुंचा. उनके साथ कुम्भा राम आर्य, सरदार हरलाल सिंह और नरोत्तम जोशी आदि थे. किसान बहुत समय से बैठे उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे. आते ही कुम्भा राम आर्य ने भाषण शुरू किया. कुम्भाराम आर्य ने कहा, 'किसानों, इन जागीरदारों से डरने की जरुरत नहीं है. परिवर्तन का शंख बज चुका है. ठाकुरों की तलवारों में जंग लग चुकी है. बंदूकों में पानी भर गया है. मैं ठाकुरों को चेतावनी देता हूँ कि वे अब समय की आवाज सुनें. अब किसानों को जानवर नहीं अन्नदाता समझें. तुम स्वयं को अन्नदाता समझना छोड़ दो. अब तुम्हारे पाप का घड़ा भर चुका है.' (राजेन्द्र कसवा,p.191)

सम्मलेन स्थल पर उस दिन किसानों में चर्चा हुई कि नरोत्तम जोशी जान बूझकर शास्त्री और हरलाल सिंह को विलम्ब से लाये. इसका कारण बताया जाता है कि जोशी चौधरी घासी राम से उनकी अधिक लोकप्रियता के कारण ईर्ष्या करते थे और सम्मलेन को असफल बनाना चाहते थे. बार-बार किसानों का मुद्दा उठाना जोशी को अच्छा नहीं लगता था. सम्मलेन के संयोजक चौधरी घासीराम ही थे. जोशी की यह सोच बताई जाती है कि लेट होने से रात को किसान सर्दी में भूखे रहेंगे और घासी राम पर क्रुद्ध होंगे. यह ईर्ष्या संगठन के लिए खतरनाक थी. (राजेन्द्र कसवा,p.191)

सम्मलेन समाप्त होने के बाद पंडित नरोत्तम जोशी ने चौधरी घासी राम को एक और लेकर कहा, 'तुमने इतनी भीड़ इकट्ठी करली, अब ये लोग तुम्हें भूखे पेट गलियां देते जायेंगे. इनके खाने की कोई व्यवस्था हो नहीं सकती.' चौधरी घासीराम इनके विलम्ब से आने पर पहले ही नाराज थे. झुंझलाकर बोले, 'तुम अपनी करलो. मेरा नाम घासीराम है. एक भी ऊँट या किसान यहाँ से भूखा नहीं जायेगा.' (राजेन्द्र कसवा,p.191)

बड़े सभी नेता मलसीसर से खिसक लिए. घासीराम ने हाड़तोड़ शर्दी में कड़क आवाज में कहा, 'सभी किसान खाना खाकर जायेंगे. ऊंटों के लिए चारे की व्यवस्था है.'

आस-पास के गाँवों के किसान चले गए. लेकिन फिर भी बहुत बड़ी संख्या में मौजूद किसानों को मीठे चावल पकाकर खिलाये गए और ऊंटों के लिए चारे की व्यवस्था की. निकटतम गाँवों के लोगों ने चारे और लकड़ी का ढेर लगा दिया. गुड़ और चावल बाजार से मंगाए गए. ऐसी व्यवस्था चौधरी घासी राम ही कर सकते थे. सम्मलेन की सफलता के पीछे चौधरी घासीराम की कर्मठता और नेतृत्व क्षमता थी. उन्होंने किसानों का एक मजबूत संगठन खड़ा कर लिया. गाँवों में वे एक मसीहा समझे जाते थे. (राजेन्द्र कसवा,p.192)

बीबासर में लगान वसूली - 5 जनवरी 1946 को मंडावा ठिकाने के कर्मचारी गाँव बीबासर में लगान लेने पहुंचे. उन्होंने किसानों को धमकाना शुरू कर दिया. किसी भी तरीके से लगान लेना चाहते थे. कुछ भयभीत किसानों ने लगान दे दिया था. सत्यदेव सिंह के नेतृत्व में वहां किसान कार्यकर्ताओं ने धरना दिया. हरदेव सिंह बीबासर, भौरु सिंह तोगडा सहित आस-पास के गाँवों के अनेक किसान कार्यकर्ताओं का जमघट लग गया. धरना रात-दिन निरंतर चलता था. किसान रात को समय बिताने के लिए वे देशभक्ति के गीत गाने लगे. सत्य देव सिंह धरना स्थल से थोड़ा हटकर घूम रहे थे. सहसा ही गोली चलने की आवाज आई. धरना-स्थल के किसान चोकन्ने हो गए. उन्हें लगा की ठिकानेदारों के कारिंदों ने गोली चलाई है. लेकिन कारिंदों में कोई हलचल नहीं हुई. बाद में पता लगा कि बीबासर गाँव का डकैत सूरजभान वहीँ पहाड़ी पर छिपा हुआ था. अँधेरा होने पर उसने ठिकानेदारों का कैम्प समझकर गोली चलादी. सौभाग्य से गोली किसी को लगी नहीं. असलियत प्रकट होने पर सूरजभान ने भी खेद प्रकट किया. रात को ही पुलिस गाँव में आ गयी थी. यह देख कर सूरजभान वहां से तुरंत फरार हो गया. (राजेन्द्र कसवा,p.192)


पुलिस ने बीबासर में 17 किसानों को गिरफ्तार किया ये सभी पैदल जाने को तैयार नहीं थे. पुलिस के पास ऐसी गाड़ी नहीं थी, जिसमें पंद्रह व्यक्ति बैठ सकें. गिरफ्तार किसानों को वहीँ छोड़ दिया गया. धरना बराबर चलता रहा. आखिर 15 जनवरी को पुलिस द्वारा बीबासर गाँव से 13 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर जयपुर सेन्ट्रल जेल में डाल दिया. इनमें प्रमुख थे - 1. सत्यदेव सिंह देवरोड़, 2. भैरू सिंह तोगडा, गाँव टिड्डियापुरा के 3. ओंकार सिंह, 4. सुरजन सिंह, 5. जयनारायण, 6. तेजसिंह, गाँव फतहसर के 7. लादू राम व 8. राम कँवर सिंह, गाँव बीबासर के 9.अर्जन व 10.पन्ना, बाकरा के 11. भानी राम, बास कुलड़िया के 12.पेमा राम, बाडलवास के 13. नाथू सिंह. बाद में ताड़केश्वर शर्मा को 16 जनवरी 1946 को झुंझुनू में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. (डॉ पेमा राम. p.205)

महरामपुर में किसानों की बृहत सभा आयोजित 1947 - जयपुर राज्य किसान सभा ने महरामपुर में 16 फ़रवरी 1947 को किसानों की एक बृहत सभा आयोजित की. झुंझुनू के डिप्टी कमिश्नर, पुलिस अधीक्षक, नाजिम और डिप्टी इंस्पेक्टर पुलिस बहुत से पुलिस दल के साथ पहुँच कर सारी शेखावाटी में दो महीने के लिए दफा 144 लगा दी. स्थल पर दफा 144 तोड़ने पर पंडित ताड़केश्वर शर्मा, राधावल्लभ अग्रवाल, दुर्गादत्त जयपुर, ख्याली राम मोहनपुरा, शिवकरण उपदेशक, माली राम अध्यापक, मान सिंह बनगोठडी और डूंगर सिंह को गिरफ्तार कर लिया. जयपुर राज्य किसान सभा ने धरा 144 उठाने की मांग की और न उठाने पर शेखावाटी की जनता के मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए विद्याधर कुलहरी, ईश्वर सिंह भैरूपुरा, देवासिंह बोचल्या, राधावल्लभ अग्रवाल और आशा राम ककड़ेऊ की एक सर्वाधिकार युक्त कमेटी बना दी जो जनता के सामने सविनय अवज्ञा भंगकरने का प्रोग्राम रखे और सत्याग्रह चलाये. साथ ही गाँवों में आये दिन होने वाले झगड़े-फसादों के समय रक्षार्थ 'किसान रक्षा दल' के संगठन का निर्णयलिया तथा 'किसान सन्देश' नामक बुलेटिन निकालने का निश्चय किया. (किसान सन्देश 13 मार्च 1947) (डॉ पेमा राम, p.216 )

काश्तकार संरक्षण अधिनियम, 1949 लागू - 30 मार्च 1949 को संयुक्त राजस्थान के मुख्य मंत्री की शपथ हीरा लाल शास्त्री को दिलाई गयी. उनके कार्यकाल में किसानों के लिए कोई विशेष कार्य नहीं हुआ. उदयपुरवाटी में किसी प्रकार का बंदोबस्त नहीं हुआ था. भौमिये लोग मनमाना लगान वसूल करते थे और लगान न देने पर किसान को बेदखल कर देते. भौमिया लोगों ने यह समझ लिया कि सरकार अब किसानों के हित में कानून बनाकर उन्हें भूमि पर मालिकाना हक़ दे दे गी. इसलिए अब वे बड़ी संख्या में किसानों को भूमि से बेदखल करने लगे. इस गंभीर स्थिति को देख कर राजस्थान सरकार ने किसानों को संरक्षण देने के लिए जून 1949 में "काश्तकार संरक्षण अधिनियम, 1949 " (Rajasthan Protection of Tenants Act, 1949) जारी किया, जिसके अनुसार 1 अप्रेल 1948 को जिस किसान के कब्जे में जितनी जमीन थी, उसे अगर बेदखल कर दिया तो उसे कानूनन वह जमीन वापस मिल जाएगी. बेदखल किसानों को इससे भारी लाभ हुआ. उदयपुरवाटी में हजारों की संख्या में किसानों ने भूमि पर वापिस कब्ज़ा दिलाने हेतु अर्जियां दीं. वकील करणी राम ने इस समय उदयपुर वाटी में काफी काम किया. उन्होंने किसानों की पैरवी कर उन्हें राहत पहुँचाने की भरसक कोशिश की , जिससे वह उदयपुरवाटी में काफी लोकप्रिय हुए. (डॉ पेमा राम. p. 218 )

राजस्थान उपज लगान नियमन अधिनियम, 1951 - अगस्त 1949 में राजस्थान और मध्य प्रदेश सरकार की प्रार्थना पर केन्द्रीय सरकार ने जागीर समस्या का अध्ययन करने तथा उसका निदान सुझाने के लिए वेंकटाचारी की अध्यक्षता में एक जागीर जाँच कमिटी की नियुक्ति की. यह कमिटी 'राजस्थान-मध्य भारत जागीर जाँच कमेटी' के नाम से प्रसिद्द हुई. दिसंबर 1949 के अंत में इस कमेटी ने रिपोर्ट सौंप दी. जांच कमिटी बनाने व अन्य कानून बनाने की आशंका से उदयपुरवाटी के भौमिये और भी शंकित थे. यहाँ के भौमियों के पास एक या आधा गाँव तक जागीर में थे. किसी-किसी के पास तो सिर्फ कुछ खेत ही थे. फिर भी उनकी ठसक किसी जागीरदार से कम नहीं थी और अपना सारा खर्च उन्ही खेतों पर निकालते थे. राजस्थान सरकार ने जागीरदारों व भौमियों के इस मनमाने लगान लेने पर रोक लगाने के लिए "राजस्थान उपज लगान नियमन अधिनियम, 1951" (Rajasthan Produce Rents Regulation Act, 1951) बनाया. इसके अनुसार जागीरदार उपज का 1/6 भाग लगान के रूप में अधिक से अधिक ले सकता था. (डॉ पेमा राम 219 )

भौमियों द्वारा झाझड गाँव में लूट

प्रथम आम चुनाव 1952 में उदयपुरवाटी और नवलगढ़ से दो सामंतों (देवी सिंह और भीम सिंह) के विधायक बनने से भौमियों का हौसला बढ़ गया था. वे प्रचार करते कि हमारी जागीर अब भी कायम है और आगे भी रहेगी. उन्हें वोट द्वारा भी समर्थन मिल चुका था. यह भारतीय लोकतंत्र की विडम्बना थी. इससे किसानों की सामत आ गयी. कानून के अनुसार किसान उपज का 1/6 भाग लगान के रूप में देना चाहते थे. किन्तु ठिकानेदार 1/4 से कम पर बिलकुल तैयार नहीं थे. झुंझुनू के कलेक्टर ने करणी राम को तैयार किया कि वे किसानों और भौमियों में समझौता करावें. आजादी मिले पांच साल हो चुके थे परन्तु जागीरदार अब भी धौंस पट्टी से लगान वसूल करने में लगे थे. (राजेन्द्र कसवा, p. 215)

16 अप्रेल 1952 को भौमियों ने एक राय होकर झाझड गाँव की सरहद में फैली हुई ढाणियों के खलिहान लूटने की योजना बनाई. यहाँ अधिकांश माली किसान थे. जब उनको भौमियों के षड्यंत्र का पता लगा तो वे भी मुकाबले के लिए तैयार हो गए. लड़ाई हुई और दोनों और से काफी लोग घायल हो गए. झाझड गाँव के एक ठाकुर का हाथ कट गया. भयभीत भौमियों ने भागने में ही सलामत समझी. आम किसान में इस आत्म विश्वास को जगाने का जिम्मेवार भौमियों ने करणी राम को ही माना. (राजेन्द्र कसवा, p. 215)

करणी राम समझौता कराने को प्रयत्नशील थे लेकिन ठाकुर लोग उनसे क्रुद्ध थे. इस घटना के बाद उदयपुरवाटी में आतंक बढ़ गया. ठाकुरों ने सन्देश पहुंचा दिया कि करणी राम उदयपुरवाटी क्षेत्र में न आयें. करणी राम उसी दौरान जयपुर भी गए. वहां कुम्भा राम आर्य ने उन्हें सलाह दी कि वे उदयपुरवाटी न जाएँ. लेकिन करणी राम गरीब किसानों को बेसहारा नहीं छोड़ सकते थे. यह उनके स्वभाव के प्रतिकूल था. इसी कारण 11 मई 1952 को उदयपुर वाटी में करणी राम ने बड़ी आम सभा बुलाई. भौमियों ने भी उसी दिन अलग से अपनी बैठक रखी. इसमें करणी राम को भी आमंत्रित किया. करणी राम भौमियों की इस बैठक में पहुंचे. कहा जाता है कि इस बैठक में जागीरदारों ने करणी राम का सम्मान किया और यह आश्वासन भी दिया कि जो समझौता करणी राम कराएँगे, उसे वे मानेंगे. इसके लिए दो दिन बाद 13 मई को चंवरा में एक आम सभा करने की घोषणा जागीरदारों ने की. यह मना जाता है कि 11 मई को जागीरदारों ने करणी राम को इसलिए बुलाया कि भाड़े के कातिल उनकी पहचान करलें. कुछ शुभ चिंतकों ने करणी राम को सलाह दी की 13 मई को वे चंवरा की सभा में न जाएँ. करणी रामने अनसुना कर दिया. (राजेन्द्र कसवा, p. 216)

करणीराम और रामदेवसिंह की शहादत

Main article: Karni Ram Meel

अप्रेल 1952 में करणीराम और रामदेवसिंह की जोड़ी ने उदयपुरवाटी इलाके में एक सभा बुलाई जिसमें 20 -25 हजार आदमी इकट्ठे हुए. पूरा उदयपुरवाटी खुदबुदा रहा था, किसान मरने मारने को तैयार हो चुके थे और भौमिया भी अपना 'वाटर-लू' लड़ने की तैयारी कर रहे थे. लगानबंदी आन्दोलन अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था. ऐसे में स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राजस्थान सरकार ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल मंगवाकर उदयपुरवाटी भेजा जिसका कैम्प चंवरा गाँव में लगा था. 12 मई 1952 की रात को करणीराम ने सुना कि चंवरा गाँव में सारे जागीरदार इकट्ठे होई गए है और जबरन फसल उठाने की योजना है. वहां भारी संख्या में किसान इकट्ठे हो गए हैं. इस पर करणीराम और कुछ साथी झुंझुनू लौटने का कार्यक्रम रद्द कर ऊँट गाडी से रवाना होकर कालका ढाणी में रुके और 13 मई को सुबह चंवरा गाँव पहुँच गए. वहां रामदेवसिंह गिल और अन्य कार्यकर्ता भी आ गए. करणीराम ने किसानों से शांति बनाये रखने की अपील की. वे पक्के गांधीवादी और अहिंसा के पुजारी थे. उसके बाद तेज धूप के कारण सभी किसान व कार्यकर्ता अलग-अलग ढाणीयों में आराम करने चले गए. रामदेव सिंह व करणीराम दोनों सेडू गूजर की ढाणी में आकर रुके और लेट गए. करीब 3 बजे दोपहर भौमियों के भेजे हुए कातिल रामेश्वर दरोगा व गोवर्धनसिंह ने बन्दूक से फायर कर सोते हुए करणीराम व रामदेव सिंह को गोलियों से भून दिया और फरार हो गए. उस दोपहर संभावित आसन्न जानलेवा हमले की चेतावनी उन्हें कुछ शुभचिंतकों ने दी थी और सुझाया था कि वे यहाँ से तत्काल अन्यत्र चले जाएँ परन्तु उन जाबाजों ने कायरों की भांति भागकर जान बचाने की अपेक्षा वीरों की भांति मृत्यु को सहर्ष वरण करना उचित समझा. वे हंसते-हंसते शहीद हो गए. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 45)

हत्या का समाचार सुनकर कुछ ही देर में हजारों की संख्या में जनसमूह इकठ्ठा हो गया. लोगों में भारी रोष व क्रोध फ़ैल गया. इतने में जयपुर से सरदार हरलाल सिंह, कुम्भाराम आर्य व पुलिस महानिरीक्षक पहुँच गए. उन्होंने उत्तेजित जन समूह से शांति बनाये रखने की अपील की. लोग दोनों शहीदों की लाश लेकर विद्यार्थी भवन झुंझुनू पहुँच गए और 14 मई 1952 को वहीँ उनका अंतिम संस्कार किया. हर वर्ष इन शहीदों के निर्वाण दिवस पर गाँवों में मेले लगते हैं. इन दोनों शहीदों की मूर्तियाँ विद्यार्थी भवन झुंझुनू एवं जिलाधीश कार्यालय के सामने पार्क में स्थापित हैं जो इन दोनों शहीदों की अमर कीर्ति का बखान कर रही हैं. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 46)

करणी राम - रामदेव के बलिदान की चर्चा पूरे राजस्थान में फ़ैल गयी थी. विशेषकर शेखावाटी के किसानों ने इसे प्रेरणा और आदर्श के रूप में लिया. उनके दिल से भय मिट गया. वे अब जागीरदारों के कृत्यों का खुले आम विरोध करने लगे. गाँवों में करणी राम - रामदेव की शहादत के गीत प्रचलित हो गए थे. महिलाएं ये गीत गाती हुई अपने खेतों में जाती. (राजेन्द्र कसवा, p. 219)

जागीरदारी प्रथा का अंत

करणीराम और रामदेवसिंह की शहादत व्यर्थ नहीं गयी. जो गोलियां करणीराम और रामदेवसिंह के सीने में दागी गयी थीं वे वास्तव में जागीरदारी सामंती व्यवस्था के पेट में लगी थीं. शेखावाटी का यह अंतिम बलिदान जागीरदारों के अत्याचारों की चरम सीमा थी. इसके साथ ही जागीरदारों का अस्तित्व जाता रहा. जागीरदारी प्रथा का शीघ्र अंत हुआ. इस बलिदान ने ऐसी ज्योति प्रज्वलित की जिसके प्रकाश में जागीरी अत्याचार का अंधकार विलीन हो गया. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 46)

"राजस्थान लैंड रिफोर्म एंड रिजम्प्शन ऑफ़ जागीर एक्ट" (Rajasthan Land Reform And Resumption of Jagir Act) 18 फ़रवरी 1952 को कानून बन गया था परन्तु इस कानून का क्रियान्वयन दो साल तक नहीं हो सका क्योंकि जागीरदारों ने राजस्थान उच्च न्यायलय से स्थगनादेश प्राप्त कर लिए थे. आखिर शहीदों का खून रंग लाया और जुल्मों का अंत हुआ. "राजस्थान लैंड रिफोर्म एंड रिजम्प्शन ऑफ़ जागीर एक्ट 1954" (Rajasthan Land Reform And Resumption of Jagir Act, 1954) पारित किया गया. इस कानून के तहत 16 जून 1954 को खेतड़ी व सीकर जैसी बड़ी जागीरें समाप्त कर दी गईं. बची हुई जागीरें भी धीरे-धीरे जब्त कर ली गईं. इसीबीच राजस्थान टेनेंसी एक्ट 1955 बन चुका था जिसके तहत किसानों के भूमि सम्बन्धी अधिकार स्पस्ट कर दिए गए और उन्हें खातेदारी अधिकार भी मिल गए. सन 1963 तक राजस्थान से सम्पूर्ण जागीरदारी प्रथा ही समाप्त हो गयी. (डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: पृ. 46)

किसान बना जमीन का मालिक - अब किसान जमीन का मालिक था. जमीन जोतने वाला किसान जमीन पर खातेदारी अधिकार प्राप्त कर उसका स्वामी बन गया. इस तरह से जागीरदारी प्रथा की समाप्ति के साथ ही शेखावाटी किसान आन्दोलन पूरी सफलता के साथ समाप्त हुआ. शेखावाटी किसान आन्दोलन की पूर्णाहूति के साथ एक नए युग का सूत्रपात हुआ. एक ऐसे युग का जिसमें जागीरदारी प्रथा समाप्ति के साथ ही जागीरदारों का शोषण समाप्त हो चुका था और किसान स्वयं अपनी भूमि का मालिक बन चुका था. सब प्रकार की लाग-बाग़ और बेगार समाप्त हो चुकी थी और अपनी पूरी पैदावार किसान के घर पहुँचने लगी. इससे किसान की खुशाली बढ़ी. जीवन स्तर ऊपर उठा. कच्ची घास की झोंपड़ी का स्थान हवेलियों ने लिया. आर्थिक के साथ सामाजिक क्षेत्र में भी भारी परिवर्तन आया. किसान का सम्मान बाधा. राजस्थान के झुंझुनू और सीकर जिले, जो शेखावाटी के अंतर्गत आते हैं, ये जिले आज हर क्षेत्र में अग्रिम गिने जाते हैं. सेना और शिक्षा में राजस्थान में इन जिलों की कोई मिसाल नहीं है. शेखावाटी के ये सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन किसान आन्दोलन के ही परिणाम हैं. (डॉ पेमा राम 227 )

शेखावाटी किसान आन्दोलन:जाटनेताओं की सूचि

List of Jat Freedom fighters from Sikar district:

See here - Freedom fighters from Sikar district


List of Jat Freedom fighters from Jhunjhunu district:

See here - Freedom fighters from Jhunjhunu district


List of Jat Freedom fighters from other districts:

Shekhawati farmers’ movement against abolition of Jagirs got great support from outside Kisan leaders like:


List of other persons connected with Shekhawati farmers movement:

  • A.W.T. Webb - Senior Officer Sikar (1934-38)
  • Dr Govind Ram (डॉ गोविन्दराम) - Jahangirabad, Uttar Pradesh
  • Dr Guljari Lal (डॉ. गुलजारी लाल) - Jahangirabad, Uttar Pradesh
  • Dr Shyam Lal (डॉ श्यामलाल) - Jahangirabad, Uttar Pradesh
  • F.S.Young - The British Inspector-General of Police for Jaipurprincely State
  • Kanwar Lal Bapna (K.L.Bapna) - Public Prosecutor Jaipur appointed as Judicial Commissioner Jaipur in 1935
  • Malik Mohammad Husain - SP Sikar, who is responsible for excesses on Jats, who was removed in 1935 from this post
  • Master Pyare Lal (मास्टर प्यारेलाल गुप्ता) - Village ?
  • Ram Narain Chaudhari (Agrawal) - Neem Ka Thana, (Sikar)
  • Seth Devibaks Sarraf (सेठ देवीबक्स सर्राफ) - Mandawa
  • Sir John Bicham - Vice President, State Council Jaipur princely State till April 1939.
  • W.F.G. Brown - European Settlement Commissioner appointed in shekhawati in 1938

शेखावाटी किसान आन्दोलन:शहीदों की सूचि

List of Jat Martyrs in Shekhawati farmers movement: Ran Mal Singh has reported that total 117 people became martyres in Shekhawati farmers movement out of which 104 were Jats, 8 Jatavas, 4 Ahirs and 1 Brahman. Here is the partial list which members may expand:

Martyrs in Shekhawati farmers movement

शेखावाटी किसान आन्दोलन:जाटनेताओं के चित्र

External links

पठनीय पुस्तकें

  • शेखावाटी में स्वाधीनता आंदोलन व जन आंदोलनों में भजनोपदेशकों की भूमिका - विषय पर श्री रघुनाथ सी. सै. स्कूल के प्रधानाचार्य पितराम सिंह गोदारा द्वारा प्रस्तुत डाक्टरेट थीसिस (जाट एक्सप्रेस, 10 अप्रेल 2013.

References

  1. डॉ पेमाराम: शेखावाटी किसान आन्दोलन का इतिहास, 1990, p.3
  2. राजेन्द्र कसवा: मेरा गाँव मेरा देश (वाया शेखावाटी), जयपुर, 2012, ISBN 978-81-89681-21-0, P. 63-64
  3. डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया: राजस्थान स्वर्ण जयंती प्रकाशन समिति जयपुर के लिए राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी जयपुर द्वारा प्रकाशित 'राजस्थान में स्वतंत्रता संग्राम के अमर पुरोधा - सरदार हरलाल सिंह' , 2001 , पृ. 9
  4. विद्याधर कुल्हरी:मेरा जीवन संघर्ष, पृ.27
  5. रणमल सिंह के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक - 'शताब्दी पुरुष - रणबंका रणमल सिंह' द्वितीय संस्करण 2015, ISBN 978-81-89681-74-0 पृष्ठ 113-114
  6. दी स्टेट्समेन दिनांक 16 फरवरी 1935
  7. (Robert W. Stern: The cat and the lion: Jaipur State in the British Raj, pp.281-283)

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