Lohita

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Lohita (लोहित) was a Nagavanshi mahapurusha .

History

The Mahabharata Book 2: SECTION IX Sabha Parva Kisari Mohan Ganguli, tr.1883-1896 mentions names of following naga kings who attended the Sabha of Yudhishthira:

Vasuki and Takshaka, and the Naga called Airavata; Krishna and Lohita; Padma and Chitra endued with great energy; the Nagas called Kamvala and Aswatara; and Dhritarashtra and Valahaka; Matimat and Kundadhara and Karkotaka and Dhananjaya; Panimat and the mighty Kundaka, O lord of the Earth; and Prahlada and Mushikada, and Janamejaya,--all having auspicious marks and mandalas and extended hoods;--these and many other snakes. These have been described from shloka 8 to 11 as under:

वासुकिस तक्षकश चैव नागश चैरावतस तदा
कृष्णशलॊहितश चैव पद्मश चित्रश च वीर्यवान ।।8।।
कम्बलाश्वतरौ नागौ धृतराष्ट्र बलाहकौ
मणिमान कुण्डलधरः कर्कॊटक धनंजयौ ।।9।।
परह्लाथॊ मूषिकादश च तदैव जनमेजयः
पताकिनॊ मण्डलिनः फणवन्तश च सर्वशः ।।10।।
एते चान्ये च बहवः सर्पास तस्यां युधिष्ठिर
उपासते महात्मानं वरुणं विगतक्लमाः ।।11।।

Jat Gotras originated from Lohita

  1. Lohamsher (लोहमशेर)
  2. Lohmarod (लोहमरोड़)
  3. Loat (लोअत)
  4. Lohit (लोहित)
  5. Loa (लोअ)

लोहित-लोहर-क्षत्रिय (खत्री) जाटवंश

दलीप सिंह अहलावत [1] के अनुसार महाभारतकाल में इस जाटवंश का राज्य कश्मीर एवं ब्रह्मपुत्र क्षेत्र में था। पाण्डवों की दिग्विजय में उत्तर की ओर अर्जुन ने सब जनपद जीत लिए।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-295


उसने लोहित (लोहत) जनपद को भी जीत लिया। यह जनपद कश्मीर में था (सभापर्व अध्याय 26-27-28)। भीमसेन ने पूर्व दिशा के देशों को जीत लिया। उसने लोहित देश (ब्रह्मपुत्र क्षेत्र) पर भी विजय प्राप्त की (सभापर्व अध्याय 29-30)।

कश्मीरी कवि कह्लण ने अपनी पुस्तक राजतरंगिणी में इस राजवंश को लोहर राजवंश लिखा है जो कि कश्मीर के इतिहास में एक प्रसिद्ध राजवंश था। ये लोग कश्मीर में पीरपंजाल पहाड़ी क्षेत्र में आबाद थे। इन लोगों के नाम पर लोहर कोट (लोहरों का दुर्ग) है। सुप्रसिद्ध महारानी दीद्दा का विवाह Ksemagupta (कस्मगुप्त) के साथ हुआ था। वह लोहर नरेश सिमहाराज का पुत्र था, जिसका विवाह जाटवंशज लल्ली साही नरेश भीम की पुत्री से हुआ था। यह भीम काबुल और उदभंग (अटक के निकट औन्ध) का शासक था। अतः दीद्दा लोहरिया जाट गोत्र की थी और काबुल के लल्ली (लल्ल) वंशी जाट नरेश की दुहोतरी थी। इस राजवंश की सन्तान आज भी साही जाट कहलाते हैं1

महारानी दीद्दा ने अपने भाई उदयराज के पुत्र संग्रामराज को अपना उत्तराधिकारी बनाया। उनकी मृत्यु सन् 1028 ई० में हो गई। (कह्लण की राजतरंगिणी, लेखक ए) स्टीन, vi 335, vii, 1284) इसके बाद लोहर जनपद का नरेश विग्रहराज हुआ (देखो कह्लण की राजतरंगिणी Vol. II P. 293, Steins note Ex.)2

अलबरुनी ने इस ‘लोहर कोट’ (लोहरों का दुर्ग) को ‘लोहाकोट’ का संकेत देकर लिखा है कि “इस लोहर कोट पर महमूद गजनवी का आक्रमण बिल्कुल असफल रहा था।”

फरिश्ता लिखता है कि “महमूद की नाकामयाबी का कारण यह था कि इस दुर्ग की ऊंचाई एवं शक्ति अदभुत थी।” (देखो, ‘लोहर का किला’ इण्डियन एक्टिक्योरी, 1897)3

महमूद गजनवी ने भारतवर्ष पर 1001 ई० से 1026 ई० तक 17 आक्रमण किये थे। उसने नगरकोट और कांगड़ा को सन् 1009 ई० में जीत लिया। उसके आक्रमण से भयभीत होकर कश्मीर में तत्कालीन शासन इतना अस्थिर हो गया था कि बिना आक्रमण ही अधिकारहीन हो उठा। तब लोहर क्षत्रियों (जाटवंश) ने ही वहां की सत्ता को स्थिर किया। ऐतिहासिक डफ् के लेखानुसार लोहर वंशज राज कलश ने संवत् 1120 (सन् 1063 ई०) से संवत् 1146 (सन् 1089) तक शासन किया। और संवत् 1159 (सन् 1102 ई०) तक राजा हर्ष, जो लोहर वंशज था, ने शासन किया4

सन् 1258 ई० में खान नल्व तातार ने जब कश्मीर पर आक्रमण करके श्रीनगर को लूटा तथा जलाया तब वहां लोहरवंशी जयसिंह उपनाम सिंहदेव राज्य करता था। उसके भाग जाने पर उसके भाई उदयनदेव ने राज्य सम्भाला। किन्तु उसके सेनापति रामचन्द्र ने राज्य छीन लिया। तिब्बती रैवनशाह ने रामचन्द्र की पुत्री कुतरानी से विवाह करके अपना शासन 2½ वर्ष चलाया। उसकी मृत्यु हो जाने पर लोहरवंशी उदयनदेव ने विधवा कुतरानी से विवाह करके 15 वर्ष अपना शासन चलाया। इस शासक की मृत्यु होते ही इस वंश का राज्य कश्मीर से समाप्त हो गया। तब से आज तक यह


1, 2, 3. जाट्स दी ऐनशनट् रूलर्ज पृ० 263, लेखक बी० एस० दहिया आई० आर० एस०।
4. जाटों का उत्कर्ष पृ० 365, लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री। इसी लेखक ने इस जाटवंश को लोहर क्षत्रिय या खत्री लिखा है।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-296


वंश सर्वथा राज्यहीन है (जाटों का उत्कर्ष पृ० 365-366, ले० योगेन्द्रपाल शास्त्री)।

लोहर क्षत्रिय (खत्री) गोत का विस्तार - इस लोहर क्षत्रिय (खत्री) गोत के जाट

जिला सोनीपत में गढ़ी ब्राह्मण, चटया, सबोली (आधा), सफीपुर (आधा), कुंडली, मनीपुर (आधा)।

दिल्ली प्रान्त में नरेला, बांकनेर, टीकरी खुर्द, सिंघोला, शाहपुर गढ़ी,

जिला जींद में नरेला से गये हुए बंनु, भूड़ा, कसान गांव हैं।

जिला मेरठ में इस वंश के गांव भैंसा और मनफोड़ हैं।

मथुरा के आस-पास इस वंश के लोग हैं जो कि लोहारिया कहलाते हैं। यू० पी० में ये लोग लऊर और लाहर नाम से प्रसिद्ध हैं।

लोहित-लोहर के शाखा गोत्र - 1. लऊर-लाहर 2. लोहारिया-लोहार। इस वंश को लोहर खत्री कहा गया है।

External links

References

  1. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.295-296

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