Bhanwar Lal Bhakar

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Subedar Bhanwar Lal Bhakar

Subedar Bhanwar Lal Bhakar, Vir Chakra, from village Thebari (Nagaur), Martyr in Kargil war on 12 June 1999, (Unit-02 Rajputana Rifles). Subedar Bhanwar Lal (JC - 203567) 1889 Light Regiment was killed in a fierce combat during the mission led by Major Vivek Gupta while capturing the Point 4950 peak at Tololing. [1]

The Battle of Tololing

The Battle of Tololing was one of the pivotal battles in the Kargil War between India's armed forces and troops from the Northern Light Infantry who were aided by other Pakistan backed irregulars in 1999. The Tololing is a dominant position overlooking the Srinagar - Leh Highway (NH 1) and was a vital link. The Indian army's casualties on the Tololoing peak were half of the entire losses in the whole war.

The objective of Chaman Singh Tewatia's group was to capture a well-fortified enemy post located in a treacherous high altitude terrain at over 15000 feet. Major Vivek Gupta, 2 Rajputana Rifles, and his Company was given the task of recapturing Point 5490.

For details see - http://www.jatland.com/home/Digendra_Kumar

Early life and Education

Family of the Martyr

  • Father - Bhura Ram Bhakar
  • Mother - Smt Choonki Devi
  • Wife - Smt Gogo Devi
  • Brother - Manrupa Ram Bhakar
  • Son - Tiloka Ram Bhakar

भंवर लाल भाकर की वीरता की कहानी

भंवर लाल भाकर राजस्थान में नागोर जिले के थेबड़ी गाँव के रहने वाले थे. भंवर लाल भाकर 12 जून 1999 को करगिल युद्ध में तोलोलिंग पहाड़ी पर शहीद हुए. उनके पिता का नाम भूरा राम भाकर है. वे भारतीय सेना की 2 राजपुताना राइफल्स में सूबेदार थे.

कारगिल युद्ध में सबसे प्रथम और अहम् काम तोलोलिंग की चोटी पर कब्जा करना था. 2 राजपुताना राइफल्स को यह टास्क सौंपा गया. जनरल मलिक ने राजपूताना रायफल्स का गुमरी में दरबार लिया. सभी को तोलोलिंग पहाड़ी को मुक्त कराने का प्लान बताया . [2]

प्लान के अनुसार तोलोलिंग पहाड़ी को मुक्त कराने के लिए कमांडो टीम में मेजर विवेक गुप्ता, सूबेदार भंवरलाल भाकर, सूबेदार सुरेन्द्र सिंह राठोर, लांस नाइक जसवीर सिंह, नायक सुरेन्द्र, नायक चमनसिंह, लांसनायक बच्चूसिंह, सी.ऍम.अच्. जशवीरसिंह, हवालदार सुल्तानसिंह नरवारिया एवं नायक दिगेंद्र कुमार थे. [3]

पाकिस्तानी सेना ने तोलोलिंग पहाड़ी की चोटी पर 11 बंकर बना रखे थे. नायक दिगेंद्र कुमार ने प्रथम बंकर एवं 11 वां बंकर ख़त्म करने का बीड़ा उठाया. भंवर लाल भाकर को एक बंकर नष्ट करना था. गोला बारूद लेकर वे अभियान पर चल पड़े. [4] कारगिल घाटी में बर्फीली हवा चल रही थी. घना अँधेरा था और दिल को दहला देने वाली दुरूह राहें. अचानक गोलों के धमाकों से कलेजा कांप जाता. मौत के सिवाय दूर-दूर तक कुछ दिखाई नहीं देता था. वे पहाड़ी की सीधी चढान पर बंधी रस्सी के सहारे चढ़ने लगे. रेंगते-रेंगते दल अनजाने में वहां तक पहुँच गया जहाँ दुश्मन मशीनगन लगाये बैठा था. दिगेंद्र के हाथ में अचानक दुश्मन की मशीनगन की बैरल हाथ लगी जो लगातार गोले फेंकते काफी गर्म हो गई थी. दुश्मन का भान होते ही बैरल को निकाल कर एक ही पल में हथगोला बंकर में सरका दिया जो जोर के धमाके से फटा और अन्दर से आवाज आई - "या अल्लाह या अकबर, काफिर का हमला !!!". [5]

प्रथम बंकर राख हो गया और धूं-धूं कर आग उगलने लगा. पीछे से 250 कमांडो और आर्टिलरी टैंक गोलों की वर्षा कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे थे. पाक आर्मी भी बराबर हिस्सेदारी निभा रही थी. भंवर लाल के साथियों ने जमकर फायरिंग की लेकिन गोलों ने इधर से उधर नहीं होने दिया. आग उगलती तोपों का मुहँ एक मीटर ऊपर करवाया और आगे बढे. मनसुख रणवा लिखते हैं कि तोलोलिंग पहाड़ी पर युद्ध करने वाले दल में से एक मात्र जिन्दा बचे दिगेंद्र कुमार, महावीर चक्र विजेता, के अनुसार दुश्मन का मुकाबला करते हुए पाँच शिकार कर चुके सूबेदार भंवाल लाल को माथे पर गोलियां लगी थी तो वह इतना ही बता पाया - "दिगेंद्र मैं जा रहा हूँ दुश्मन को ख़त्म कर देना". [6]

जाट समाज पत्रिका में अक्टूबर 1999 अंक में प्रकाशित लेख से जानकारी मिलती है कि भंवर लाल भाकर ने मोर्चे पर रवाना होने से पहले प्रफुल्लित होकर कहा था कि - "देश के लिए कुछ कर गुजरने का सुनहरा मौका मिला है". भंवर लाल के पिता भूरा राम भाकर ने बताया कि उनके बेटे ने कारगिल में रवाना होते समय जो बात कही थी, उससे लगता है कि उसे अपनी सहादत का आभास हो गया था. अपने पुत्र की सहादत पर गर्व करते हुए उन्होंने बताया कि भंवर लाल ने चलते हुए कहा था - "देश की रक्षा के लिये सबसे पहले फौजियों को ही बलिदान देने का मोका मिलता है. अब जब मोका आया है तो मैं हरगिज पीछे नहीं हटूंगा और अपने प्राणों की बाजी लगा कर देश की सीमाओं की रक्षा करूँगा". [7]

भंवर लाल जब स्कूल में पढ़ता था तभी से उसकी तमन्ना फौज में भरती होने की थी. वह बचपन से ही बहुत साहसिक प्रवृति के थे. [8]

12-13 जून 1999 की रात में शहीद हुए भंवर लाल की अन्तेष्ठी 17 जून 1999 को उनके पैतृक गाँव नागोर जिले के थेबड़ी में की गई. भंवर लाल का पार्थिव शरीर लेकर राजपुताना रायफल्स के बीजा राम कूंकड़ा लेकर आए थे. श्री कूंकड़ा ने बताया कि भंवर लाल ने विजय अभियान में जाने से पहले बताया था कि मैं अपने काम पर जा रहा हूँ और काम को अंजाम देकर ही रहूँगा. श्री कूंकड़ा ने बताया कि तोलोलिंग की पहाड़ी पर उसने सेना के अभियान में हमें बड़े जोश के साथ चढाया था. आमने-सामने की लडाई में हम उसके साथ पहाड़ी पर बने बंकर के नजदीक पहुँच गए थे, उसी समय दुश्मन की दो गोलियां भंवर लाल के बाएँ हाथ में आकर लगी, मगर वह शीघ्र ही हाथ पर पट्टी बाँध कर फ़िर घुसपैठियों को खदेड़ने में लग गए. उसी समय किसी ने भंवर लाल को पीछे हटने को कहा लेकिन उसने जोर से दहाड़ लगाकर बाकी सैनिकों का हौसला बंधाते हुए कहा - "भारतमाता के सपूतो, वीरो, दुश्मनों को मारो और कब्जा करलो". इस प्रकार वह सबसे आगे घुसपैठियों को मारते हुए बंकर पर चढ़ गया. घुसपैठिये तो भाग गए, बाकी मारे गए, लेकिन जब बंकर पर चढा भंवर लाल भागते हुए घुसपैठियों से लड़ रहा था तो कहीं दूर छिपे घुसपैठियों ने निशाना साधा और गोलियां भंवर लाल के सीने में आकर लगी. उसके सीने से घुटने तक कई गोलियां लगी. भारतमाता को आखिरी सलाम करते वह वहीं शहीद हो गए. [9]

शहीद का सम्मान

थेबड़ी गाँव में शहीद सूबेदार भँवर लाल भाकर की प्रतिमा लगाई गई है. उनके बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित करने ग्रामीण व परिजन प्रतिवर्ष आते हैं.

शहीद सूबेदार भँवर लाल भाकर के परिजनों को भारत सरकार द्वारा बोरावड़ (मकराना) में पेट्रोल पंप आवंटित किया है.

Gallery of Images

नोट

  • श्री रमेश दधीच (मोब: 09413194024) - गाँव बीदासर , जिला चूरू, राजस्थान द्वारा जानकारियाँ और चित्र ई-मेल से उपलब्ध कराये।
  • तिलोका राम भाकर - शहीद भँवर लाल के पुत्र तिलोका राम, मोबाईल नं. - 09929496236

सन्दर्भ

  1. http://kargil.myiris.com/Gallantry/galstory.html
  2. मनसुख रणवा: महावीर चक्रधारी दिगेंद्र कुमार, जयपुर, 2008, p. 49
  3. मनसुख रणवा: महावीर चक्रधारी दिगेंद्र कुमार, जयपुर, 2008, p. 51
  4. मनसुख रणवा: महावीर चक्रधारी दिगेंद्र कुमार, जयपुर, 2008, p. 51
  5. मनसुख रणवा: महावीर चक्रधारी दिगेंद्र कुमार, जयपुर, 2008, p. 53
  6. मनसुख रणवा: महावीर चक्रधारी दिगेंद्र कुमार, जयपुर, 2008, p. 54
  7. जाट समाज पत्रिका, आगरा, अक्टूबर 1999, p.46
  8. जाट समाज पत्रिका, आगरा, अक्टूबर 1999, p.46
  9. जाट समाज पत्रिका, आगरा, अक्टूबर 1999, p.46

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