Jatwan

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Jatwan (जाटवान) was a Jat chieftain of Rohtak, Haryana. According to the Records of Hari Ram Bhat of Karwara Muzaffarnagar) Jatwan was Gathwala Malik.[1]

According to Sir H. M. Elliot and John Dowson[2] Jatwan was a Jat Chieftain. Hansi was in occupation of Jatwan prior to 1192 . He was a Samanta of Tomar Rulers of Delhi. As per Khataragachchha Brihadgurwavali the ruler of Hansi in 1175 was Raja Bhim Singh.[3]

Muhammad Ghori (1173-1205) attacked India and faced Prithvi Raj Chauhan at Tarain, near Delhi. Jats fought along with Rajputs. Prithvi Raj's commander-in-chief was Chand Ram, a Dahima Jat. Ghori was defeated and wounded and his troops were looted by Jats while retreating. To avenge his humiliation and defeat he attacked again and won Tarain (1192). Ghori made Kutb Uddin Aibak his regent at Delhi. Jats under Jatwan besieged the Muslim commander of Hansi, Haryana, Nasrat Uddin; raised the siege and in an obstinate and fierce battle defeated the Muslims under Kutb Uddin Aibak (1193).

According to H.A. Rose[4]After the defeat of Rai Pithaura in 1192, and the capture of Delhi by Muhammad of Ghor, Jatwan raised the standard of national resistance to Muhammadan aggression at Hansi, but was defeated on the borders of the Bagar by Qutb-ud-din Ibak who then took Hansi. It is apparently not certain that Jatwan was a Jat leader. Firishta says Jatwan was a dependent of the Rai of Nahrwala in Guzerat.[5]

Revolt by Jats under Jatwan

Kalika Ranjan Qanungo[6] writes that After the defeat of Prithviraj in 1192 A.D., the Jats of Haryana raised the standard of tribal revolt, and under a capable chief, named Jatwan, besieged the Muslim commander at Hansi. On receiving this news Qutb-ud-din marched twelve farsakhs, i.e., about 40 miles during one night. Jatwan raised the siege of Hansi and prepared for an obstinate conflict. "The armies attacked each other" says the author of Taj-ul-Maasir "like two hills of steel, and the field of battle [on the borders of the Bager country] became tulip-dyed with the blood of warriors ... Jatwan had his standards of God-plurality and ensigns of perdition lowered by the hand of power" (Elliot, ii. 218).

जाटवान:ठाकुर देशराज

ठाकुर देशराज के अनुसार यह रोहतक के जाटों का एक प्रसिद्ध नेता था। शहाबुद्दीन गौरी ने जिस समय पृथ्वीराज को जीत लिया और दिल्ली में अपने एक सेनापति को, जो कि उसका गुलाम था, विजित देश के शासन के लिए छोड़ गया, जो जाट भाइयों ने विद्रोह खड़ा कर दिया, क्योंकि वे पृथ्वीराज के समय में भी एक तरह से स्वतन्त्र से थे। अपने देश के वे स्वयं ही शासक थे, पृथ्वीराज को नाममात्र का राजा मानते थे। उन्होंने देखा कि कुतुबुद्दीन जहां उनकी स्वतन्त्रता को नष्ट करेगा, वहां विधर्मी भी हैं। अतः इकट्ठे होकर मुसलमानों के सेनापति को हांसी में घेर लिया। वे उसे मार भगाकर अपने स्वतन्त्र राज की राजधानी हांसी को बनाना चाहते थे। इस खबर को सुनकर कुतुबुद्दीन घबरा गया और उसने रातों-रात सफर करके अपने सेनापति की हांसी में पहुंचकर सहायता की। जाटों की सेना के अध्यक्ष जाटवान ने दोनों दलों को ललकारा ‘तुमुल मसीर’ के लेखक ने लिखा है कि दोनों ओर से घमसान युद्ध हुआ। पृथ्वी खून से रंग गई। बड़े जोर के हमले होते थे। जाट थोड़े थे, फिर भी वे खूब लड़े। कुतुबुद्दीन स्वयं चकरा गया, उसे उपाय न सूझता था। जाटवान ने उसे पास आकर नीचे उतर लड़ने को ललकारा, किन्तु कुतुबुद्दीन इस बात पर राजी नहीं हुआ। जाटवान ने अपने चुने हुए बीस साथियों के साथ शत्रुओं के गोल में घुसकर उन्हें तितर-बितर करने की चेष्टा की। कहा जाता है, जीत मुसलमानों की रही, किन्तु उनकी हानि इतनी हुई कि वह रोहतक के जाटों को दमन करने के लिए जल्दी ही सिर न उठा सके। [7]

जाटवान:दलीप सिंह अहलावत

दलीप सिंह अहलावत[8] लिखते हैं:

जाट इतिहास पृ० 714-715 पर ठा० देशराज ने जाटवान के विषय में लिखा है कि “यह रोहतक के जाटों का एक प्रसिद्ध नेता था। कुतुबुद्दीन ऐबक के विरुद्ध जाटों ने विद्रोह कर दिया। क्योंकि ये पृथ्वीराज के समय अपने देश के स्वयं शासक थे और पृथ्वीराज को नाममात्र का राजा मानते थे। जाटों ने एकत्र होकर मुसलमानों के सेनापति को हांसी में घेर लिया। वे उसे भगाकर अपने स्वतन्त्र राज्य की राजधानी हांसी को बनाना चाहते थे। इस खबर को सुन कर कुतुबुद्दीन सेना लेकर रातों-रात सफर करके अपने सेनापति की सहायता के लिए हांसी पहुंच गया। जाटों की सेना के अध्यक्ष जाटवान ने शत्रु के दोनों दलों को ललकारा। ‘तुमुल समीर’ के लेखक ने लिखा है कि दोनों ओर से घमासान युद्ध हुआ। पृथ्वी खून से रंग गई। बड़े जोर के हमले होते थे। जाट थोड़े थे फिर भी वे खूब लड़े। कुतुबुद्दीन स्वयं घबरा गया। जाटवान ने उसको निकट आकर नीचे उतरकर लड़ने को ललकारा। किन्तु कुतुबुद्दीन ने इस बात को स्वीकार न किया। जाटवान ने अपने चुने हुए बीस साथियों के साथ शत्रुओं के गोल में घुसकर उन्हें तितर-बितर करने की चेष्टा की। कहा जाता है जीत मुसलमानों की रही। किन्तु उनकी हानि इतनी हुई कि वे


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-273


रोहतक के जाटों का दमन करने के लिए जल्दी ही सिर न उठा सके।” (जाट इतिहास पृ० 16-17 पर लेखक कालिका रंजन कानूनगो ने भी ऐसा ही लिखा है)।

हरिराम भाट की पोथी अनुसार लल्ल गठवालों ने जाटवान मलिक के नेतृत्व में मुसलमानों पर धावा किया। यह भयंकर युद्ध तीन दिन और तीन रात चला जिसमें जाटवान शहीद हुआ। जाट इतिहास पृ० 16-17 लेखक कालिकारंजन कानूनगो के अनुसार हरयाणा के जाटों ने एक योग्य नेता जाटवान के नेतृत्व में इस युद्ध में भाग लिया।

जाटवान के बलिदान होने पर लल्ल गठवालों ने हांसी को छोड़ दिया और दूसरे स्थान पर आकर गोहाना के पास आहुलाना (हलाना), छिछड़ाना आदि गांव बसाये। वीर जाटवान के बेटे हुलेराम ने संवत् 1264 (सन् 1207 ई०) में ये गांव बसाये। (हरिराम भाट की पोथी)।

References

  1. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III, p.273
  2. The History of India, as Told by Its Own Historians, Part-2, p.217
  3. Harihar Niwas Dwivedi, Dilli Ke Tomar, p.299-300
  4. A glossary of the Tribes and Castes of the Punjab and North-West Frontier Province By H.A. Rose Vol II/J,p.359
  5. T. N., pp. 516-7.
  6. History of the Jats:Dr Kanungo/Origin and Early History,p.18
  7. जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठ-718
  8. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ-273,274

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