Ahulana

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Ahulana (आहूलाणा) is a large village under Ganaur Tehsil in Sonipat district of Haryana,

Founder

Village was founded by Hule Ram son of Jatwan of Gathwala Malik in 1207.[1]

Population

The Ahulana village has population of 3249 of which 1775 are males while 1474 are females as per Population Census 2011.[2]

History

कुतुबुद्दीन ने सं० १२६७ वि० के आसपास दिपालपुर हांसी के पास गठवाले जाटों से युद्ध किया । बहुत घमासान युद्ध हुआ । बहुत थोड़े होने के कारण गठवाला वीर योद्धा हार गए । गठवाला जाट वान योद्धा वीरगति को प्राप्त हुआ । फिर गठवाला वीरों ने रोहतक मंडल में गोहाना के पास अपने पूर्वज हुलराम के स्थान पर हुलोणा ग्राम बसाया । [3]

गोहाना तहसील (सोनीपत जिले में) में गोहाना से तीन मील पश्चिम में गठवाला गौत के जाटों का प्रमुख गांव आहूलाणा है । गठवालों के हरयाणा प्रदेश में 360 गांव हैं । कई पीढ़ियों से इनकी चौधर आहूलाणा में चली आती है । अपने प्रमुख को ये लोग "दादा" की उपाधि से विभूषित करते हैं । इस वंश के प्रमुखों ने कभी कलानौर की नवाबी के विरुद्ध युद्ध जीता था । इस गांव के चौधरी गिरधर ने ब्रिटिश इलाके का जेलदार होते हुए भी लजवाने की लड़ाई (1856) तथा सन् 1857 के संग्राम में प्रमुख भाग लिया था ।

ठाकुर देशराज [4] लिखते हैं कि हांसी के पास देपाल नामक स्थान पर गठवाला लोगों का गढ़ था. इन्होने एक लम्बे अरसे तक देपाल पर राज किया था. कुतुबुद्दीन के समय में हांसी के जाटों ने अपने को स्वतंत्र राजा होने की घोषणा करदी थी जिससे कुतुबुद्दीन से युद्ध करना पड़ा. [5] गठ्वालों को राजपूतों से भी लड़ाइयां लड़नी पडीं. उन्होंने मन्दहार राजपूतों के कान तो भली प्रकार एंठ दिए थे. यही कारण था कि उन्होंने मलिक की उपाधी प्राप्त की. कल्लानूर राजपूतों को भी मलिक गठवालों ने हरा दिया था. फलस्वरूप राजपूतों ने गठवालों को निमंत्रित किया और उन्हें बारूद से उड़ा दिया. [6] दंतकथा के अनुसार एक गठवाला स्त्री जो उपस्थित नहीं थी वह बच गयी और उसी की संतान ने देपाल पर अधिकार जमाया.

Kalika Ranjan Qanungo [7] mentions about this clan:

"A similar phenomenon of a tribal feud in which even aliens range themselves under one faction or another has not altogether disappeared in the Rohtak and Delhi [P.12] districts, where the country-side is divided into two factions - Dahiya and Ahulanas: "the Gujars and Tagas of the tract, the Jaglan Jats of thapa Naultha, and the Latmar Jats of Rohtak joining the Dahiyas, and the Huda Jats of Rohtak . . . joining the Ahulanas." [P.13]

H.A. Rose[8] writes that The Ahulana tradition traces their origin to Rajasthan. Their ancestor was coming Delhi-wards with his brothers, Mom and Som, in search of a livelihood. They quarrelled on the road and had a deadly fight on the banks of the Ghātā, naddi. Mom and Som, who were on one side, killed their kinsman and came over to Delhi to the king there who received them with favour and gave them lands : to Som the tract across the Ganges where his descendants now live as Rajputs. Mom was sent to Rohtak, and he is now represented by the Jats there as well as in Hansi and Jind. The Rohtak party had their head-quarters at Ahulana in that district, and thence on account of internal quarrels they spread themselves in different directions, some coming into the Delhi district.

H.A. Rose[9] writes that Ghatwal (घटवाल) were one of the Jat tribes of the South-East Punjab. They trace their origin from Garh Ghazni, and place that city in the Deccan and not in Afghanistan. They claim descent from Sarohas . Their head-quarters are at Ahulana in the Gohana tahsil of Rohtak, and they occupy the country between it and the Jumna, being numerous in the north of Delhi and to the south of Karnal. Ahulana is said to have been founded 22 generations ago, and gives its name to theHaulania faction. The Ghatwal are often called Malak, a title they are said to have obtained as follows : —

"In the old days of Rajput ascendancy the Rajputs would not allow Jats to cover their heads with a turban, nor to wear any red clothes, nor to put a crown (mor) on the head of their bridegroom, or a jewel(nat) in their women's noses. The Ghatwals obtained some successes over the Rajputs, especially over the Mandahars of the doah near Deoban and Manglaur, and over those of the Bagar near Kalanaur and Dadri, and removed the obnoxious prohibitions.


[Page-285]: They thus acquired the title of Malak (master) and a red turban as their distinguishing- mark ; and to this day a Jat with a red pagri is most probably a Ghatwal."

Mr. Fanshawe says that the title is a mere nickname conferred by a malik or chief called Rai Sāl ; yet in Rohtak they appear generally to be called malak rather than Ghatwal.* In Jind the Ghatwal reverence Bairagis as their jatheras. In Hissar the Brahmans of Depāl are their parohits to this day, because their ancestor rescued the only surviving woman of the tribe, after the Rajputs of Kalanaur had blown up all the rest of the Ghatwals, who had defeated them.

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत

दलीप सिंह अहलावत[10] लिखते हैं:

जाट इतिहास पृ० 714-715 पर ठा० देशराज ने जाटवान के विषय में लिखा है कि “यह रोहतक के जाटों का एक प्रसिद्ध नेता था। कुतुबुद्दीन ऐबक के विरुद्ध जाटों ने विद्रोह कर दिया। क्योंकि ये पृथ्वीराज के समय अपने देश के स्वयं शासक थे और पृथ्वीराज को नाममात्र का राजा मानते थे। जाटों ने एकत्र होकर मुसलमानों के सेनापति को हांसी में घेर लिया। वे उसे भगाकर अपने स्वतन्त्र राज्य की राजधानी हांसी को बनाना चाहते थे। इस खबर को सुन कर कुतुबुद्दीन सेना लेकर रातों-रात सफर करके अपने सेनापति की सहायता के लिए हांसी पहुंच गया। जाटों की सेना के अध्यक्ष जाटवान ने शत्रु के दोनों दलों को ललकारा। ‘तुमुल समीर’ के लेखक ने लिखा है कि दोनों ओर से घमासान युद्ध हुआ। पृथ्वी खून से रंग गई। बड़े जोर के हमले होते थे। जाट थोड़े थे फिर भी वे खूब लड़े। कुतुबुद्दीन स्वयं घबरा गया। जाटवान ने उसको निकट आकर नीचे उतरकर लड़ने को ललकारा। किन्तु कुतुबुद्दीन ने इस बात को स्वीकार न किया। जाटवान ने अपने चुने हुए बीस साथियों के साथ शत्रुओं के गोल में घुसकर उन्हें तितर-बितर करने की चेष्टा की। कहा जाता है जीत मुसलमानों की रही। किन्तु उनकी हानि इतनी हुई कि वे


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-273


रोहतक के जाटों का दमन करने के लिए जल्दी ही सिर न उठा सके।” (जाट इतिहास पृ० 16-17 पर लेखक कालिका रंजन कानूनगो ने भी ऐसा ही लिखा है)।

हरिराम भाट की पोथी अनुसार लल्ल गठवालों ने जाटवान मलिक के नेतृत्व में मुसलमानों पर धावा किया। यह भयंकर युद्ध तीन दिन और तीन रात चला जिसमें जाटवान शहीद हुआ। जाट इतिहास पृ० 16-17 लेखक कालिकारंजन कानूनगो के अनुसार हरयाणा के जाटों ने एक योग्य नेता जाटवान के नेतृत्व में इस युद्ध में भाग लिया।

जाटवान के बलिदान होने पर लल्ल गठवालों ने हांसी को छोड़ दिया और दूसरे स्थान पर आकर गोहाना के पास आहुलाना (हलाना), छिछड़ाना आदि गांव बसाये। वीर जाटवान के बेटे हुलेराम ने संवत् 1264 (सन् 1207 ई०) में ये गांव बसाये। (हरिराम भाट की पोथी)।

Jat Gotras

External Links

References


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