Rohtak

From Jatland Wiki
Jump to: navigation, search
Map of Rohtak District

Rohtak (Hindi: रोहतक), ancient name Rohitaka (रोहीतक), is a municipal council located in Rohtak District in the Haryana state of India on N.H. 10, 70 km from the national capital of India, Delhi. The city can feel proud for having one of the highest number of dairies in India, Asia's largest cloth market, and a very reputable Pt BDS PGI MS (previously known as Medical College), MDU ,[citation needed]. It is a big city but does not have malls and multiplexes. Ancient place Khokharakota (खोखराकोट) is very near to Rohtak where coins of Yaudheyas have been found. [1]

Tahsils in Rohtak

  • Maham (महम)
  • Kalanaur (कलानौर)
  • Rohtak (रोहतक)
  • Sampla (सांपला)

Villages in Rohtak tahsil

(This list consists of villages falling under Rohtak tehsil, and not district Rohtak as a whole). Ajaib, अजायब (जाब), Anwal, Asan, Atail, Bahali Anandpur, Bahmanwas, Bahu Akberpur, Bahu Jamalpur, Bakheta, Balab, Baland, Baliana, Banyani, Basantpur, Bhagotipur, Bhainsru Kalan, Bhainsru Khurd, Bhaiyan Pur, Bhalot, Bohar (Part), Busana, Chamari, Chiri, Chulliana, Dataur, Dhamar, Dobh, Gaddi Kheri, Gandhra, Garhi Bohar, Ghilor Kalan, Ghilor Khurd, Ghuskani, Gijji, Gudhan, Gurauthi, Gurnauthi, Hassangarh, Humayupur, Ismaila 9-B, Ismaila-11B, Jalalpur, Jasia, Jindran Kalan, Jindran Khurd, Kabulpur, Kahnaur, Kahni 121/2Biswa, Kahni 7 1/2 Biswa, Kakrana,) Kalanaur Kalan, Kanheli, Kansala, Karaur, Karountha, Katesra, Katwara, Kalhawad, Khadwali, Kherari, Kheri Sadh, Kheri Sampla, Kiloi Dopana, Kiloi Khas, Kisranti, Kutana, Ladhot, Lahli, Mayna, Makrouli Kalan, Makrouli Khurd, Manjha, Maroudi Jatan, Maroudi Rangran, Masudpur, Matana, Mungan, Nandal, Nasirpur, Naya Bans, Nigana, Nunond, Pahrawar, Para, Patwapur, Pilana, Polangi, Ritauli, Rithal Nirwal, Rithal Phogat, Rohtak(M Cl), Rurki, Sahan Majra, Samar Gopalpur, Sampla, Sanga Hera, Sanghi, Sarai Ahmed, Sasrauli, Simli, Singhpura, Sunari Kalan, Sunari Khurd, Sunderpur, Taimurpur, Taja Majra, Titoli,

History

V. S. Agrawala[2] writes that Ashtadhyayi of Panini mentions janapada Kuru (कुरु) (IV.1.172) - It was known to Panini as a janapada and a Kingdom. Hastinapura (VI.2.101) was its capital. The region between triangle of Thanesar, Hisar and Hastinapur was known by three different names. Kururashtra proper between Ganga River and Yamuna with its capital Hastinapur; Kurujangala equal to Rohtak, Hansi, Hisar; and Kurukshetra to the north with its centres at Thaneswar, Kaithal, Karnal.


V S Agarwal [3] writes about Yaudheya (V.3.117) – Panini’s reference to Yaudheyas is the earliest known. The Yaudheyas have a long history as shown by their inscriptions and coins of different ages, and were existing up to the time of Samudragupta. Their coins are found in the east Punjab (now Haryana) and all over the country between the Sutlej and Jamuna, covering a period of about four centuries, 2nd century BC to 2nd century AD. The Mahabharata mentions Rohitaka as the capital of Bahudhāñyaka Country, where a mint site of the Yaudheyas of Bahudhanyaka was found by the late Dr Birbal Sahani. Sunet mentioned by Panini as Sunetra was a centre of Yaudheyas where their coins, moulds and sealings have been found. The Yaudheyas do not seem to have come into conflict with Alexander, since they are not named by the Greek writers. The Johiyas who are found on the banks of the Sutlej along the Bahawalpur frontier may be identified as their modern descendants (ASR, xiv, p.114).


Jaina sources tell us that a Yaksha shrine of this place is mentioned in Upanga text, Niryavalika. It is also mentioned in Brihatkathakosha, where the Hindu deity Karttikeya is represented as Jaina Muni. A temple of Parshvanatha was in existence at the time of Babur in V.S. 1584 and 1586.[4]

Rohtak is also said to be a corruption of word Rohtasgarh, a name applied to the ruined Khokrakot sites of two cities, one lying north of Rohtak and the other about 4 km to the east. It is thought that it was named after Raja Rohtas, in whose days the city was built. But this theory is just an imagination by somebody who linked the name 'Rohtak' with 'Rohtas' Famous historian Swami Omanand Saraswati has explained this fact in his book Veerbhoomi Haryana. It is also claimed that the town derives its name from the Rohira (रोहीड़ा) tree called Rohitaka in Sanskrit. It is said that the town was build by clearing a forest of Rohtika trees, and hence its name Rohtak.


Another version connects Rohtak with Rohitaka, mentioned in the Mahabharat. It was possibly the capital of Bahudhanyaka (बहुधान्यक). In the Vinaya of Mulasarvasti-vadins, Jivaka is shown as undertaking a journey from Taxila to Bhadramkara, Udumbra, Rohitaka and Mathura in the Ganga Doab. The ancient road carried the trade of the Ganga valley to Taxila, passing through Rohitaka to Sakala. The ruins of the ancient town are found at Khokrakot or Rohtasgarh. Some experts hold that the town is as old as the Indus Valley Civilization. Some minor finds at Khokrakot are typical of the Indus Valley sites. Clay mounds of coins discovered here have thrown an important light of the process of casting coins in ancient India.

In Mahabharata

Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 29 mentions that Nakula subjugated Western Countries. It includes Bahudhana in verse (II.29.4) [5] ...And the hero first assailed the mountainous country called Rohitaka (Rohtak) that was dear unto (the celestial generalissimo) Kartikeya and which was delightful and prosperous and full of kine and every kind of wealth and produce.


Udyoga Parva/Mahabharata Book V Chapter 19 mentions Kings and tribes Who joined Yudhishthira for war:

And for this reason the land of the five rivers, and the whole of the region called Kuru-jangala, and the forest of Rohitaka which was uniformly wild, and Ahichhatra and Kalakuta, and the banks of the Ganga River, and Varana River, and Vatadhana, and the hill tracts on the border of the Yamuna--the whole of this extensive tract--full of abundant corn and wealth, was entirely overspread with the army of the Kauravas.

ततः पञ्चनथं चैव कृत्स्नं च कुरुजाङ्गलम
तदा रॊहित कारण्यं मरु भूमिश च केवला (V.19.29)
अहिच छत्रं कालकूटं गङ्गाकूलं च भारत
वारणा वाटधानंयामुनश चैव पर्वतः (V.19.30)
एष थेशः सुविस्तीर्णः परभूतधनधान्यवान
बभूव कौरवेयाणां बलेन सुसमाकुलः (V.19.31)

Rohtak in War of Independence of 1857

दलीपसिंह अहलावत लिखते हैं -

इस स्वतन्त्रता प्राप्ति युद्ध में हरयाणा प्रदेश के रामपुरा, रिवाड़ी, फर्रुखनगर, झज्जर, बहादुरगढ़, बल्लभगढ़, नारनौल, श्यामड़ी (सामड़ी), रोहतक, थानेसर, करनाल, पानीपत, पाई, कैथल, सिरसा, हांसी, नंगली, जमालपुर, हिसार आदि सभी स्थान क्रांतिकारियों के केन्द्र रहे हैं। उपर्युक्त सभी स्थानों पर कुछ न कुछ दिन आजादी के दीवानों की हकूमत रही है। यहां पर मैं केवल जाटों से सम्बन्धित कुछ बातें लिखता हूं -

उस समय रोहतक बंगाल के गवर्नर के मातहत था, तथा कमिश्नरी का हैड क्वार्टर आगरा था। रोहतक का डिप्टी कमिश्नर जोहन एडमलौक था। 23 मई को क्रान्तिकारी सेना ने बहादुरगढ़ में प्रवेश किया और 24 मई को रोहतक पहुंची। डिप्टी कमिश्नर गोहाना के रास्ते करनाल भाग गया। रहे हुए अंग्रेज अधिकारियों को मार दिया गया। जेल के दरवाजे खोल दिये गए, कचहरी को आग लगा दी गयी। क्रान्तिकारी सेना ने शहर के हिन्दुओं को लूटना चाहा परन्तु जाटों ने ऐसा न करने दिया। क्रान्तिकारियों ने खजाने से दो लाख रुपया निकाल लिया। मांडौठी, मदीना, महम की चौकियां लूट ली गईं। सांपला तहसील को आग लगा दी गई। सभी अंग्रेज स्त्रियों को जाटों ने, मुस्लिम राजपूत (रांघड़ों) के विरोध के बावजूद, सही सलामत उनके ठिकानों पर पहुंचा दिया। गोहाना पर गठवाला मलिक जाटों ने कब्जा जमा लिया। अंग्रेजी सेना 30 मई को अम्बाला से रोहतक को चली, परन्तु देशी सेना ने उसे श्यामड़ी (सामड़ी) के जंगल में युद्ध करके हरा दिया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-612


बचे हुए सैनिक 10 जून को सांपला पहुंचे। डिप्टी कमिश्नर सख्त धूप न सह सकने के कारण अन्धा हो गया। रोहतक के क्रान्तिकारी, जिनमें जाटों की संख्या अधिक थी, 14 जून को अंग्रेजों के विरुद्ध दिल्ली पहाड़ी की लड़ाई में शामिल हुए थे।

जब अंग्रेज रोहतक पर किसी तरह भी काबू न पा सके तो उन्होंने 26 जुलाई 1857 ई० को रोहतक को जींद के महाराजा स्वरूपसिंह को सौंप दिया। दिसम्बर के अन्त तक जाटों की खापें अंग्रेजों से युद्ध करने के अतिरिक्त आपस में एक दूसरे पर आक्रमण करती रहीं और बीच-बीच में रांघड़ों तथा कसाइयों से भी लड़ती रहीं।

कप्तान हडसन अपने साथ अंग्रेज सैनिकों को लेकर 16 अगस्त, सन् 1857 को 12 बजे रोहतक पहुंचा था। उसने कुछ लोगों को इकट्ठे देखकर गोली चला दी जिससे 16 आदमी मर गये। यह घटना चारों ओर के देहात में फैल गई। अगले दिन 17 अगस्त को सिंहपुरा, सुन्दरपुर, टिटौली आदि के 1500 जाट चढ़ आये। उन्होंने हडसन की सेना से युद्ध किया जिसमें इनके 50 आदमी शहीद हो गये।

हिसार में सन् 1857 में हरयाणवी फौज की लाइट पलटन तथा 14 नम्बर घुड़सवार रिसाला था। इनमें जाट सैनिक थे जिन्होंने क्रान्ति कर दी। पंजाब के तत्कालीन चीफ कमिश्नर सर जॉन लारेन्स ने एक अनुभवी जनरल वॉन कोटलैंड को सेना देकर वहां भेजा। हिसार, सिरसा, हांसी और उनके देहात में जहां भी जो अंग्रेज मिले, उनको मौत के घाट उतार दिया गया। जहां रोहतक और करनाल के युद्धों में सिक्खों ने अंग्रेजों की सहायता की, वहां हिसार के युद्ध में महाराजा बीकानेर के 800 सैनिक अंग्रेजों की तरफ होकर क्रान्तिकारी सेना से लड़े।

कुरुक्षेत्र के ब्राह्मणों के आदेश से हरयाणवी सेना ने इलाके के जाटों के साथ मिलकर थानेसर की सरकारी इमारतें जला दीं और तहसील पर कब्जा कर लिया। पाई के जाटों ने कैथल जीत लिया। असन्ध के मुसलमान राजपूत पानीपत तक चढ़ आये। खरखौदा के लोग बादशाही फौज में जा मिले। गदर के समाप्त होने पर खरखौदा की देहात के 20 आदमी गोली से उड़ा दिये गये और 14 को फांसी पर लटकाया गया।

इस तरह हरयाणा के अन्दर फैले विद्रोह को दबाने के लिये सिक्ख व राजपूत फौज तथा अंग्रेजी फौज ने भारी अत्याचार किये तथा सन् 1857 ई० के अन्त तक सारे प्रदेश पर अधिकार कर लिया गया।

जब गदर समाप्त हुआ तो प्रायः सभी गांवों के मुखिया लोगों और खासकर नम्बरदारों को फांसी पर चढ़ा दिया गया। झज्जर के चारों ओर की सड़कें उल्टे लटके मनुष्यों की लाशों से सड़ उठी थीं। रांघड़ों के नम्बरदारों तथा सामड़ी (गोहाना तहसील में) गांव के 10 जाट नम्बरदारों एवं एक ब्राह्मण को रोहतक की कचहरी व शहर के बीच नीम के वृक्षों पर (वर्तमान चौधरी छोटूराम की कोठी के सामने के वृक्षों पर) फांसी पर लटकाया गया था। फांसी से पहले अंग्रेज हाकिमों ने उन 10 जाट नम्बरदारों से पूछा - “बोलो क्या चाहते हो?” जाटों ने कहा कि हमारे ग्यारहवें साथी मुल्का ब्राह्मण को छोड़ दो। मुल्का ब्राह्मण ने अपने साथियों से अलग होने से


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-613


इन्कार कर दिया। उसे भी उनके साथ ही फांसी दे दी गई। सारी लाशें गांव में लाकर जलाई गईं। उनके नाम ये हैं - 1. मुल्का ब्राह्मण 2. हरदयाल 3. श्योगा 4. बहादुरचन्द 5. हरकू 6. जमनासिंह 7. हरिराम 8. शिल्का 9. भाईय्या। नं० 2 से 9 तक सब जाट थे। शेष दो नामों का पता नहीं चला।

......दिल्ली के चारों ओर 150-200 मील दूरी तक के प्रान्त हरयाणा में जाट, अहीर गुर्जर, राजपूत आदि योद्धा जातियां बसती हैं, जिनमें जाटों की संख्या और जातियों से अधिक है।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-618


हरयाणा प्रान्त के वीरों ने इस स्वतन्त्रता युद्ध में सब प्रान्तों से बढ़-चढ़कर भाग लिया था। इस युद्ध के शान्त होने पर हरयाणा प्रान्त की जनता पर अंग्रेजों ने जो भीषण अत्याचार किये उनको स्मरण करने से वज्र हृदय भी कांप उठता है। स्वतन्त्रता युद्ध की समाप्ति पर अंग्रेजों ने इस विशाल प्रान्त को अनेक भागों में विभाजित करके इस वीर प्रान्त की संगठन शक्ति को चूर-चूर कर दिया।

मेरठ, आगरा, सहारनपुर आदि इसके इसके भाग उत्तरप्रदेश में मिला दिये। भरतपुर, अलवर आदि राजस्थान में मिला दिये। कुछ भाग को दिल्ली प्रान्त का नाम देकर के पृथक् कर दिया। नारनौल को पटियाला राज्य, बावल को नाभा और दादरीनरवाना को जींद स्टेट में मिला दिया, ये झज्जर प्रान्त के भाग थे। शेष गुड़गांव, रोहतक, हिसार, करनाल आदि को पंजाब में मिला दिया। इस प्रकार हरयाणा भूमि को खण्डशः करके हरयाणा नाम ही मिटा दिया गया।

ईश्वर की कृपा से 108 वर्ष पश्चात् 1 नवम्बर 1966 ई० को पुनः हरयाणा नाम के प्रान्त की स्थापना हुई, किन्तु यह बहुत छोटे क्षेत्र वाला प्रान्त है, जिसे पंजाब प्रान्त से अलग करके हरयाणा प्रान्त नाम रखा गया।

Early history

Rohtak was the captal of sons of Shiva namely, Kartikeya and Ganesha. During Mahabharata period also Rohtak area was having dominance of Jats as is today.[6]


V S Agarwal [7] writes about Yaudheya (V.3.117) – Panini’s reference to Yaudheyas is the earliest known. The Yaudheyas have a long history as shown by their inscriptions and coins of different ages, and were existing up to the time of Samudragupta. Their coins are found in the east Punjab (now Haryana) and all over the country between the Sutlej and Jamuna, covering a period of about four centuries, 2nd century BC to 2nd century AD. The Mahabharata mentions Rohitaka as the capital of Bahudhāñyaka Country, where a mint site of the Yaudheyas of Bahudhanyaka was found by the late Dr Birbal Sahani. Sunet mentioned by Panini as Sunetra was a centre of Yaudheyas where their coins, moulds and sealings have been found. The Yaudheyas do not seem to have come into conflict with Alexander, since they are not named by the Greek writers. The Johiya Rajputs who are found on the banks of the Sutlej along the Bahawalpur frontier may be identified as their modern descendants (ASR, xiv, p.114).

Jat Monuments

Jat Gotras in Rohtak

Ahlawat, Bajar, Balhara, Bamal, Bamel, Bazaad, Beniwal, Berwal, Budhwar, Bura, Dahiya, Dalal, Dangi, Deshwal, Dhandhi, Dhaka, Dhall , Dhankhar, Duhan Gahlot, Gawaria, Goyat, Gulia, Hooda, Jatain, Joon, Kadiyan, Kanchap, Khatri, Khokhar, Kundu Loura, Malik, Nain, Nandal, Ohlan, Pawariya, Pawria, Phogat, Rad, Rana, Rathi, Redhu, Saran, Sehrawat, Saroha, Sihmar, Sindhu, Singhal, Siwach,

Notable persons from Rohtak

Gallery of people from Rohtak

Further reading

Jatland Links

http://www.jatland.com/forums/showthread.php?t=7147 - Discussion on Rohtak

See also

Rohita - History of Mahabharata period

External Links

  • [1] and [2] - Website of BDS Post Graduate Institute of Medical Sciences, Rohtak


Reference

  1. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.615
  2. V. S. Agrawala: India as Known to Panini, 1953, p.54
  3. V S Agarwal, India as Known to Panini,p.445
  4. Encyclopaedia of Jainism, Volume-1 By Indo-European Jain Research Foundation p.5538
  5. ततॊ बहुधनं रम्यं गवाश्वधनधान्यवत, कार्तिकेयस्य दयितं रॊहीतकम उपाद्रवत Mahabharata (II.29.4)
  6. Dr Natthan Singh: Jat - Itihas (Hindi), Jat Samaj Kalyan Parishad Gwalior, 2004 (Page 28-29)
  7. V S Agarwal, India as Known to Panini,p.445

Back to Places Haryana