Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III

From Jatland Wiki
Jump to: navigation, search
मुख्य पृष्ठ और विषय सूची पर वापस जायें
«« पिछले भाग (द्वितीय अध्याय) पर जायें
अगले भाग (चतुर्थ अध्याय) पर जायें »»


जाट वीरों का इतिहास
लेखक - कैप्टन दलीप सिंह अहलावत
This chapter was converted into Unicode by Dayanand Deswal
तृतीय अध्याय: आदि सृष्टि से देश-विदेश में जाटवीरों का राज्य

Contents

जाट आर्य क्षत्रिय हैं

पिछले अध्याय में उदाहरण देकर यह सिद्ध किया गया है कि जाट आर्य नस्ल (वंशज) तथा भारतवर्ष के मूलनिवासी हैं और आदि सृष्टि से इनका राज्य रहा है। आदि सृष्टि से जाट वंशों के विषय में लिखने से पहले यह लिखने की आवश्यकता है कि आदि सृष्टि से ही हमारे आर्यावर्त में सब प्रकार की विद्यायें, विज्ञान, कलाकौशल और कृषि आदि कार्य उन्नति के शिखर पर पहुंच चुके थे और ये महाभारत काल तक प्रायः वैसे ही थे और राजा विक्रमादित्य तथा राजा भोज के शासन काल तक कम व बेश रहे। यह विदेशी विशेषकर अंग्रेज इतिहासकारों के उन लेखों का उत्तर है जिनमें उन्होंने भारतीयों को असभ्य (गंवार), मूर्ख, जंगली और अनपढ़ सिद्ध करने के काफी यत्न किये हैं। उन्होंने लिखा कि प्राचीनकाल के मनुष्य गुफाओं में रहते थे। वृक्षों की छाल और पत्तों से शरीर को ढकते थे और कन्दमूल तथा पशुओं का कच्चा मांस खाते थे। उनको खेती करनी नहीं आती थी। वे शस्त्र तथा औजार पत्थर के बनाते थे, जिसे पत्थर का युग कहा है। इसके पश्चात् धातुयुग चला। यह भी लिख मारा कि आर्यों से पूर्व भारतवर्ष में सिन्धुघाटी सभ्यता विद्यमान थी। इस तरह की अनेक कपोल-कल्पनायें विदेशी इतिहासकारों की मनघड़न्त हैं जो सब मिथ्या हैं। इस प्रकरण का सम्बन्ध जाटों से इसलिए है कि जाटवंशों का राज्य आदि-सृष्टि से ही रहा है और वे क्षत्रिय आर्य नस्ल के हैं।

आदिसृष्टि से आर्यावर्त में सब प्रकार की विद्यायें, विज्ञान, कलाकौशल आदि का संक्षेप में ब्यौरा निम्न प्रकार से है -

विद्या का इतिहास

आदिसृष्टि में सबसे पहला विद्वान् ब्रह्मा हुआ। उसने अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा चार ऋषियों से एक-एक वेद का ज्ञान लिया। ब्रह्मा जी ने अन्य पुरुषों को वेदविद्या पढाई। उस समय में चारों वेद और उनकी शाखायें, ऋग्वेद की इक्कीस शाखा, यजुर्वेद की 101 शाखा, सामवेद की 1000 शाखा और अथर्ववेद की 9 शाखा, कुल 1131 शाखायें पढने पढाने के लिए थीं1

इक्ष्वाकु आर्यावर्त का प्रथम राजा हुआ जो ब्रह्मा जी से छठी पीढी में है। इक्ष्वाकु के समय में अक्षर स्याही से लिखे जाने लगे थे। जिस लिपि में वेद लिखे जाते थे, उसका नाम देवनागरी है2

सबसे पहले लिपि के आविष्कर्ता ब्रह्मा जी थे। इसी कारण इस लिपि का नाम ब्राह्मी लिपि प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रकार व्याकरण, ज्योतिषशास्त्र, वास्तुशास्त्र, गणितशास्त्र, अश्वशास्त्र, नाट्यशास्त्र,


1. स्वामी दयानन्द सरस्वती पूना प्रवचन उपदेशमंजरी दसवां प्रवचन पृ० 81.
2. उपदेशमंजरी नवां प्रवचन पृ० 72.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-155


इतिहास मीमांसा आदि का प्रणयन भी सब विषयों के विद्वान् ब्रह्मा ने ही किया था1

मुण्डकोपनिषद् (प्रथम मुण्डक, प्रथम खण्ड) में लिखा है कि “सब विद्याओं में श्रेष्ठ ब्रह्मविद्या का प्रवचन ब्रह्मा जी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा के लिए किया था।” चरकसंहिता चिकित्सा स्थान 1-4 में आयुर्वेद विद्या की परम्परा इस प्रकार दी है - “ब्रह्माजी ने आयुर्वेद की विद्या दक्ष प्रजापति को दी। दक्ष ने अश्विनीकुमारों को और उनसे इस विद्या को इन्द्र ने प्राप्त किया।” सुश्रुत में भी ब्रह्मा को आयुर्वेद का प्रथम प्रवक्ता बताया है। ब्रह्मा ने हस्त्यायुर्वेद नाम का भी एक ग्रन्थ बनाया था।

धनुर्वेद का आदि प्रवक्ता - महाभारत में लिखा है कि सब अस्त्रों के प्रतिघात के लिए ब्रह्मा जी ने ब्रह्मास्त्र का निर्माण किया। अर्जुन ने भी इस परम्परागत विद्या को ग्रहण किया था2

ब्रह्मास्त्र के निर्माता और शिक्षक स्वयं ब्रह्मा जी महाराज थे3। पुष्पक विमान के आदि निर्माता ब्रह्मा जी थे4। कला-कौशल की व्यवस्था करने वाला विश्वकर्मा नामक एक पुरुष हुआ। विश्वकर्मा परमेश्वर का नाम भी है और एक शिल्पकार का नाम भी था। अस्तु, विश्वकर्मा** ने विमान की युक्ति निकाली, फिर इस विमान में बैठकर आर्य लोग इधर-उधर भ्रमण करने लगे5

इतिहासविद्या प्राचीन ऋषियों से चली थी। जब यवन (यूनान) देश के नौन्सस और स्ट्रैबो तथा प्लायनी और हैरोडोटस जन्मे भी न थे तब उशना काव्य (अवेस्ता का कवि उसा), बृहस्पति तथा अनेक आंगिरस कवि इस दिव्य विद्याविषयक अपने अद्वितीय ग्रन्थ लिख चुके थे। उन्होंने इतिहास तथा पुराण* का शास्त्र साक्षात् ब्रह्मा से सीखा था। भगवान् ब्रह्मा के उपदेश से पृथु वैन्य के काल से इतिहास और पुराण* की विद्या चल पड़ी थी6

बृहस्पति - कौटिल्य, महाभारतकार व्यास और रामायणकर्त्ता वाल्मीकि का पूर्ववर्ती परमविद्वान् अंगिरापुत्र बृहस्पति ऋषि सचिवों का वर्णन करता हुआ सेनापति के विषय में अपने अर्थशास्त्र में लिखता है कि राष्ट्र का सेनापति देश-काल का ज्ञाता, नीतिनिपुण और इतिहास कुशल हो7

नारद - उसी काल का देवर्षि नारद असुरों के विजेता, वीतराग भगवान् सनत्कुमार


1. हरयाणा के वीर यौधेय प्रथम खण्ड पृ० 117 लेखक श्री भगवानदेव आचार्य।
2. हरयाणा के वीर यौधेय प्रथम खण्ड पृ० 115 लेखक श्री भगवानदेव आचार्य।
3. वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड।
4. वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग 15 श्लोक 40, पुष्पकविमान की बनावट वहां पर देखो।
5. उपदेशमंजरी आठवां प्रवचन पृ० 70.
6,7. भारतवर्ष का बृहद् इतिहास प्रथम भाग द्वितीय अध्याय पृ० 19-20 लेखक पं० भगवद्दत्त बी० ए०.
(*)पुराण - (ऐतरेय, शतपथ, साम और गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थों ही के पांच नाम इतिहास, पुराण, गाथा, कल्प और नाराशंसी हैं। पुराण में जगदुत्पत्ति आदि का वर्णन है। यहां पुराण प्राचीन ब्राह्मण ग्रन्थों का नाम है, किन्तु नवीन कपोलकल्पित श्रीमद्-भागवत शिवपुराणादि 18 मिथ्या वा दूषित ग्रंथों का नहीं है। सत्यार्थप्रकाश, एकादश समुल्लास पृ० 218-219)।
(**). बृहस्पति की बहिन का विवाह प्रभास से हुआ। विश्वकर्मा उन्हीं से उत्पन्न हुए। वे सहस्रों शिल्पों के निर्माता देवताओं के बढई कहे जाते हैं। उन्होंने देवताओं के असंख्य दिव्य विमान बनाये हैं। (महाभारत आदिपर्व 66वां अध्याय पृ० 188 श्लोक 27-29)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-156


अपरनाम स्कन्द को कहता है कि “भगवन्, मैं चारों वेद और पांचवें इतिहास, पुराण को पढ़ता हूं इत्यादि। इसी श्रेष्ठ ज्ञान के कारण नारद उपनाम पिशुन ने अपना अद्वितीय अर्थशास्त्र लिखा था।” कृष्ण द्वैपायन का साक्ष्य है कि नारद इतिहास का पण्डित था1

स्वायम्भव मनु - संसार के सर्वप्रथम राजा स्वायम्भव मनु हुए। उन्होंने संसार के लोगों के लिये विधि-विधान अर्थात् न्याय-नियम बनाये। वेदों के आधार पर चार वर्ण और मनुस्मृति जिसे धर्मशास्त्र कहते हैं, बनाई। इनके पुत्र राजा प्रियव्रत ने समस्त पृथ्वी को सात द्वीपों में विभक्त करके अपने सात पुत्रों को उनका अधिपति बना दिया2। (वायु पुराण अ० 7-9)।

उस समय वे एक स्थान से दूसरे स्थानों तक समुद्र तथा वायु मार्ग से जहाजों द्वारा आते जाते थे।

शिवजी महाराज - कुशलचिकित्सक होने से धन्वन्तरि नाम से विभूषित थे। चारों वेदों का सांगोपांग अध्ययन किया। वे सभी अस्त्रों-शस्त्रों की विद्या में सिद्धहस्त थे अर्थात् धनुर्वेद के प्रकाण्ड विद्वान् थे। कैलाश पर्वत, कुरुप्रदेश आदि की शासनव्यवस्था करने के लिए अपने वायुयान का प्रयोग करते थे जिसका आकार बाहर से नन्दी (वृषभ) के समान था। एक बार शंकर जी पार्वती जी के साथ इसी विमान में बैठकर आकाशमार्ग से जा रहे थे। उन्होंने भूमि पर पड़े एक राक्षस बालक के रोने की आवाज सुनाई दी। माता पार्वती को उस पर दया आ गई और विमान रुकवाकर उस बालक की सुरक्षा का प्रबन्ध कर दिया और बड़ा होने पर उसको महादेव जी ने, एक आकाशचारी नगराकार विमान दे दिया4। इस राक्षस बालक का नाम सुकेश था। इसकी माता सालकटंकटा ने इसको जन्म देते ही वहीं छोड़ दिया और वह अपने पति विद्युत्केश के पास चली गई थी। (प्रथम अध्याय, ब्रह्मा के पुत्र पुलत्स्य की वंशावली)।

विष्णु जी महाराज - धनुष धारण करने वाला, वेदों का विद्वान्, वैद्य, आयुर्वेदशास्त्र के ज्ञाता चिकित्सक, सब विद्या तथा कलाओं में निष्णात पण्डित, धनुर्धर, धनुर्वेद, धनुर्विद्या के ज्ञाता थे5

राजा सगर के अनन्तर उपरिचर नाम का राजा हुआ। वह गुब्बारह की विद्या में निपुण था। वह सदा भूमि को स्पर्श न करता हुआ हवा ही में फिरा करता था। पहले के जो लोग लड़ाइयां लड़ते थे उन्हें विमान रचने की विद्या भली प्रकार विदित थी। “मैंने (स्वामी दयानन्द जी) भी एक विमान रचना की पुस्तक देखी है। भाई! उस समय दरिद्रों के घर में भी विमान थे6।”

इक्ष्वाकु राजा हुआ तो वह इससे नहीं कि वह राजकुल में उत्पन्न हुआ था, किन्तु सारे लोगों ने उसे उसकी योग्यता अनुकूल राजसभा में अध्यक्ष पद पर बैठाया। उस समय सारे लोग वैदिक व्यवस्थानुकूल चलते थे। भृगु जी ने अपनी संहिता में यह सब व्यवस्था प्रकट की है और यह ग्रन्थ श्लोकात्मक है7

राज्य की व्यवस्था - राज्यव्यवस्था के सम्बन्ध में मनुस्मृति में लिखा है उसे देखो। केवल


1. भारतवर्ष का बृहद् इतिहास प्रथम भाग पृ० 20, लेखक पं० भगवद्दत्त बी० ए०।
2. प्रथम अध्याय - आदि सृष्टि से आर्यों का चक्रवर्ती राज्य।
3. महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 117.
4. वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग 4 श्लोक 27-29.
5. महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 149.
6. उपदेशमंजरी नवां प्रवचन पृ० 31
7. उपदेशमंजरी नवां प्रवचन पृ० 72.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-157


अकेले राजा ही के हाथ में किसी प्रकार का हुक्म चलाने की शक्ति न थी। वह तो केवल राजसभा में अध्यक्ष का अधिकार चलाता रहता था। राज्य में चार प्रकार के अधिकारी होते थे। राज्याधिकारी, सेनाधिकारी, न्यायाधिकारी और कोषाधिकारी। तीन प्रकार की सभायें थीं। राज्यसभा, विद्यासभा और धर्मसभा। महाभारतकाल तक ये चालू थीं, जैसा कि महाभारत सभापर्व में इनका वर्णन है।

सेना के सिपाहियों को धनुर्वेद की सिखलाई दी जाती थी। उस समय में उनके हथियार शक्ति, असि, शतघ्नी (तोप), भुशुण्डी (बन्दूक), आग्नेयादि अस्त्र, तीर, तलवार आदि शस्त्र होते थे।

सेना को मकरव्यूह, वक्रव्यूह, बलाकाव्यूह, सूचीव्यूह, शूकरव्यूह, शकटव्यूह, चक्रव्यूह इत्यादि कवायद रचना (Formation) सिखलाये जाते थे1। महाभारत युद्ध में द्रोणाचार्य ने कौरव सेना की चक्रब्यूह रचना की थी, जिसमें अभिमन्यु की मृत्यु हुई थी।

प्राचीनकाल में चौदह विद्याओं के पढ़ने की रीति हमारे देश में थी। चार वेद, चार उपवेद, छः अंग मिलकर चौदह होते हैं।

चार वेद - 1. ऋग्वेद 2. यजुर्वेद 3. सामवेद 4. अथर्ववेद।

चार उपवेद - 1. आयुर्वेद इस पर जो ग्रन्थ चरक और सुश्रुत मिलते हैं, उनके बनाने वाले अग्निवेश और धन्वन्तरि ऋषि हैं। 2. धनुर्वेद जिसमें अस्त्र-शस्त्र विद्या का विचार है। इस उपवेद में ब्रह्मास्त्र, पाशुपत अस्त्र, नारायण अस्त्र, वरुण अस्त्र, मोहन अस्त्र, वायव्यास्त्र, व्यूहों आदि की व्यवस्था लिखी है2

तीसरा गन्धर्ववेद - जिसमें विद्वानों ने गान-विद्या का वर्णन किया है। प्राचीन काल में आर्य लोग वेदमन्त्रों का रसीला गायन करते थे।

चौथा अर्थवेद - जिसको शिल्पशास्त्र कहते हैं इसका विचार मयसंहिता, वाराहसंहिता, विश्वकर्म-संहिता आदि पुस्तकों में काफी किया है। ज्योतिषशास्त्र, सूर्यसिद्धान्तादि जिसमें बीजगणित, अंकगणित, भूगोल, खगोल और भूगर्भविद्या है, ये सब आदिकाल में लिखे गये थे और इनकी शिक्षा दी जाती थी।

छः वेदांग - 1. शिक्षा 2. कल्प 3. व्याकरण 4. निरुक्त 5. छन्द 6. ज्योतिष - ये सब मिलकर चौदह विद्यायें हैं3

छः दर्शन - इनको छः शास्त्र भी कहते हैं :- 1. पूर्व मीमांसा दर्शन, जैमिनि मुनिकृत, 2. उत्तर मीमांसा (वेदान्त शास्त्र), व्यास मुनि कृत, 3. वैशेषिक दर्शन, कणाद मुनि कृत, 4. न्याय शास्त्र, गौतम ऋषि कृत 5. सांख्य शास्त्र, कपिल मुनि कृत 6. योग शास्त्र, पतञ्जलि ऋषि कृत। इन सब की शिक्षा दी जाती थी।

ब्राह्मण ग्रन्थ - जिन ग्रन्थों में वेद तथा ईश्वर सम्बन्धी विषयों का विचार है, इनको ब्राह्मण कहा गया। इनमें बहुत से विख्यात पुरुषों का इतिहास भी है। अतः वह वेद का भाग नहीं है। प्रत्येक वेद के कई एक ब्राह्मण हैं। आजकल जो मिलते हैं :- 1. ऋग्वेदसम्बन्धी - ऐतरेय ब्राह्मण,


1. उपदेशमंजरी नवां प्रवचन पृ० 73-74.
2. उपदेशमंजरी दसवां प्रवचन पृ० 82-83; सत्यार्थप्रकाश तृतीय समुल्लास पृ० 51.
3. सत्यार्थप्रकाश तृतीय समुल्लास पृ० 50-52; उपदेशमंजरी दसवां प्रवचन पृ० 83-84.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-158


2. यजुर्वेदसम्बन्धी शतपथ, 3. सामवेदसम्बन्धी - साम ब्राह्मण 4. अथर्ववेदसम्बन्धी - गोपथ ब्राह्मण। इन्हीं “ब्राह्मणों” के पांच नाम इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी हैं। यहां पुराण, प्राचीन ब्राह्मणग्रंथों का नाम है, किन्तु नवीन श्रीमदभागवत, शिवपुराण आदि 18 मिथ्या वा दूषित ग्रंथों का नाम नहीं है।

उपनिषद् - ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक - इन दश उपनिषदों को भी पढने-पढाने की रीति प्राचीनकाल में थी1

प्रत्येक युग में विद्वानों ने विद्या व इतिहास के विषय में अनेक ग्रन्थ लिखे हैं। उनका थोड़ा सा ब्यौरा इस प्रकार है। त्रेता के मध्य में चक्रवर्ती सम्राट् मान्धाता के काल में महर्षि कण्व ने इतिहास ग्रन्थ लिखे थे। इसके बाद याज्ञवल्क्य ऋषि इतिहास के महान् पण्डित थे। ऋषि वाल्मीकि जी ने रामायण लिखी जो इतिहास का एक आदर्श ग्रंथ है। भीष्म जी ने कौणपदन्त नाम से एक अर्थशास्त्र लिखा जो बड़ा विचित्र था। भगवान् वेदव्यास कृष्ण द्वैपायन ने पाण्डवों की मृत्यु के पश्चात् कलि के आरम्भ में अपना भारत ग्रन्थ रचा। वेदव्यास इतिहास के और वेदों के पारदर्शी पण्डित थे। उनके सदृश ऐतिहासिक-बुद्धि गत पांच सहस्र वर्ष में संसारभर के किसी विद्वान् को प्राप्त नहीं हुई। हैरोडोटस, मैगस्थनीज, प्लूटार्क, इब्ने हाकल, अबूरिहां, अलबेरुनी तथा गिब्बन और मैकाले आदि व्यास के विस्तृत और सत्यज्ञान तथा वर्णनशैली के सम्मुख बालक हैं2। विदुरनीति और गीता का उपदेश अद्वितीय है।


महाभारत काल के बाद आज से लगभग 4500 वर्ष पूर्व दाक्षिपुत्र पाणिनि ऋषि हुए जिनको व्याकरण का सूर्य कहा गया है। वे केवल शब्दशास्त्र के ही पण्डित नहीं थे, अपितु इतिहास के भी असाधारण ज्ञाता थे। गोत्रों और ऋषिनामों के सूक्षम भेदों का विश्लेषण पाणिनि के बिना और कौन कर पाया है। कुरु, वृष्णि और अन्धक आदि क्षत्रियों तथा आयुधजीवी आदि संघों तथा पूगों का वृत्त पाणिनि से जाना जा सकता है4। इस महामुनि ने पांच पुस्तकें बनाई हैं - 1. शिक्षा 2. उपादिगण 3. धातुपाठ 4. गणपाठ और 5. अष्टाध्यायी। ये व्याकरण के बड़े विद्वान् हुए हैं। इनकी जितनी प्रशंसा की जाये उतनी ही कम है4। इनकी अष्टाध्यायी पर पतञ्जलि ऋषि ने महाभाष्य लिखा। पाणिनि के महान् व्याकरण पर कात्यायन ने अपना वार्तिक रचा। इसके पश्चात् विष्णुगुप्त कौटिल्य ने महाराज चन्द्रगुप्त मौर्य विषयक एक चरित ग्रन्थ लिखा। आचार्य कौटिल्य (चाणक्य ऋषि) का लिखा अर्थशास्त्र व चाणक्य नीति बड़े प्रसिद्ध हैं। विष्णुगुप्त के पश्चात् अशोक हुआ जिसने शिलालेखों पर उसके राजवर्ष लिखवाये। राजवर्षों की गणना इतिहास के सूक्ष्मज्ञान का फल है। अशोक के बाद खारवेल और सातवाहन राजाओं ने भी अपने राजवर्ष गणनाओं में अपने राज्य की घटनायें लिखी हैं। महाराज समुद्रगुप्त की प्रयाग की प्रशस्ति उस काल में लिखी गई। उसमें ऐतिहासिक ज्ञान की सूक्ष्म छाया है। गुप्त सम्राटों के ताम्रपत्रों और शिलालेखों में संवत् क्रम से सब घटनायें उल्लिखित हैं। इन राजाओं ने


1. सत्यार्थप्रकाश तृतीय समुल्लास पृ० 52-52; उपदेशमंजरी दशवां प्रवचन पृ० 83-84.
2. भारतवर्ष का वृहद इतिहास प्रथम भाग द्वितीय अध्याय पृ० 20-24, लेखक पं० भगवदत्त बी० ए०।
3. भारतवर्ष का वृहद इतिहास द्वितीय अध्याय पृ० 27.
4. उपदेशमंजरी दसवां प्रवचन पृ० 82.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-159


इतिहास ग्रन्थ भी अवश्य लिखाए थे। ऐसा साहित्य विदेशीय आक्रमणकारियों ने नष्ट किया। विक्रम की लगभग सातवीं शताब्दी में हर्षचरित सदृश अपूर्व ऐतिहासिक ग्रंथ लिखा गया। हर्षचरित का रचयिता बाणभट्ट अपने ग्रन्थ में अठाईस पुरातन घटनाओं का विशेष वर्णन करता है1

नोट - मौर्यवंश और गुप्तवंश के राजे-महाराजे तथा हर्षवर्धन महाराज ये सब जाटवंश के थे। इनका वर्णन प्रमाणों सहित अगले पृष्ठों पर यथास्थान पर किया जायेगा। (लेखक)

चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (सन् 375 ई० से 415 ई० तक) के 9 रत्नों में से कालिदास संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में भारत का सर्वोत्तम कवि और नाटककार हुआ है। नाटकों में उसकी मुख्य रचनायें “शकुन्तला”, “मालविकाग्निमित्र”; कविताओं में “मेघदूत” तथा “ऋतुसंहार” हैं। इसके अतिरिक्त “कुमारसम्भव” और “रघुवंश” उसकी अन्य रचनायें हैं।

इसी गुप्तकाल में विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में आश्चर्यजनक उन्नति हुई। आर्यभट्ट इस काल का सबसे महान् वैज्ञानिक, गणित और नक्षत्रविद्या का धुरन्धर विद्वान् था। उसका प्रसिद्द ग्रन्थ “आर्यभट्टीयम्” है। उसने अपनी खोज के आधार पर यह सिद्ध किया कि सूर्य और चन्द्रग्रहण, राहू और केतु नामक राक्षसों के ग्रसने से नहीं होता बल्कि जब चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच में या पृथ्वी की धारा में आ जाता है तब चन्द्रग्रहण होता है। आर्यभट्ट ने यह भी लिखा कि सूर्य नहीं घूमता बल्कि पृथ्वी ही अपनी धुरी के चारों ओर घूमती है। आर्यभट्ट गणित का भी एक उच्चकोटि का विद्वान् था। उसने अंकगणित, बीजगणित, ज्यामिति तथा त्रिकोणमिति में नई खोज की। उसने π (पाई) की सही कीमत 3.1416 निकाली। इस युग में भारतीयों की अन्य महत्त्वपूर्ण खोज दशमलव पद्धति थी। पांचवीं शताब्दी के अन्त में आचार्य वराहमिहिर ने नक्षत्रविद्या का सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथ पंचसिद्धान्तिका लिखा। वह धातुविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान तथा जीवविज्ञान का भी एक उच्चकोटि का विशेषज्ञ था। वाग्भट्ट ने औषधिविज्ञान (चिकित्साशास्त्र) के विषय में एक “अष्टांगसंग्रह” लिखा जो अत्यन्त प्रसिद्ध है। धातुविज्ञान भी उन्नति के शिखर पर था। उसका जीता जागता उदाहरण दिल्ली के निकट महरौली में लोहस्तम्भ (लाट) है। यह स्तम्भ 24 फुट ऊंचा और लगभग साढे-छः टन भारी है। 1500 वर्षों से धूप तथा वर्षा में लगातार खड़ा रहने पर भी यह न तो खराब हुआ है और न ही इसको जंग लगा है। यह धातुविज्ञान का एक चमत्कार है। चित्रकला उन्नति के उच्चशिखर पर थी। अजन्ता और अलोरा की गुफाओं में चित्रकारी के अद्वितीय श्रेष्ठ नमूने देखने को मिलते हैं2

राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य की राजधानी उज्जैन नगरी थी। उसका एक सिंहासन भूमि के अन्दर दब गया था। बहुत समय बाद जब राजा भोज उज्जैन नगरी का राजा बना, तब उसने इस सिंहासन को भूमि से खोदकर ऊपर निकलवाया था। यह सिंहासन बड़ा विचित्र व अद्भुत प्रकार का था। इसके चारों ओर आठ-आठ यानि बत्तीस पुलियां बनी हुई थीं। उन सबके हाथ में एक कमल का फूल था। सोने-चांदी, हीरे-जवाहरात जड़ाऊ यह सिंहासन बहुत


1. भारतवर्ष का वृहद इतिहास द्वितीय अध्याय पृ० 27-28, लेखक पं० भगवदत्त बी० ए०।
2. भारत का इतिहास, हरयाणा विद्यालय बोर्ड, भिवानी अध्याय 10 पृ० 87-89..


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-160


चमकदार व अति सुन्दर था। राजा भोज ने उस पर बैठने के लिए जब अपना पैर रखा तब पहली पुतली ने उनको बोलकर रोक दिया। उस पुतली ने राजा भोज को राजा विक्रमादित्य के गुण, न्याय तथा अच्छा शासन के कारनामे बताये और कहा कि यदि आप में ऐसे कार्य करने की क्षमता हो तो आप सिंहासन पर बैठिये वरना नहीं। इस प्रकार सब बत्तीस पुतलियों ने अलग-अलग बोलकर राजा विक्रमादित्य के गुणगान किए1। देखो! उस समय की यह वैज्ञानिक कला, आज के ग्रामोफोन व टेपरिकार्डर से कहीं बढ़कर थी।

राजा भोज को कुछ-कुछ वेदों का संस्कार था। इनके भोज-प्रबन्ध में लिखा है कि - “राजा भोज के राज्य में और समीप ऐसे-ऐसे शिल्पी लोग थे कि जिन्होंने घोड़े के आकार का एक यान यन्त्र कलायुक्त बनाया था कि जो एक कच्ची घड़ी (24 मि०) में ग्यारह कोस और एक घण्टे में साढ़े सत्ताईस कोस जाता था। वह भूमि और अन्तरिक्ष में भी चलता था और दूसरा एक ऐसा पंखा बनाया था कि बिना मनुष्य के चलाये कलायन्त्र के बल से नित्य चला करता था और पुष्कल वायु देता था।” ये दोनों पदार्थ आज तक बने रहते तो यूरोपियन इतने अभिमान में न चढ़ जाते2

प्राचीनकाल में वायुयान विद्या पर एक बहुत बड़ा ग्रंथ था, जिसका नाम “यन्त्र सर्वस्व” है। इस ग्रन्थ के प्रणेता महर्षि भारद्वाज हैं। इसका कुछ भाग अभी थोड़े दिन पहले मिला है। इसी टीका अथवा भाष्य “बृहद विमान शास्त्र” के नाम से स्वामी ब्रह्ममुनि जी ने किया है और “सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा” ने प्रकाशित करवाया है। इस ग्रन्थ के अध्ययन से भली-भांति विदित हो जाता है कि प्राचीनकाल में विज्ञान और विद्या का ज्ञान उच्चशिखर पर था। उक्त ग्रन्थ में कई ऐसे यन्त्रों का भी वर्णन है जिनको आज का वैज्ञानिक युग नहीं खोज पाया है। यदि हमारे इतिहासकार इस ग्रन्थ को एवं हमारे प्राचीन साहित्य को पढ़ें तो कोई कारण नहीं कि वे भ्रम दूर न हों जो अंग्रेजों ने हमें मूर्ख सिद्ध करने में उत्पन्न किए हैं3। गुप्तकाल के महान् वैज्ञानिक ब्रह्मगुप्त ने न्यूटन (Newton) से शताब्दियों पहले यह ज्ञात किया है कि “सभी चीजें प्रकृति के नियम द्वारा पृथ्वी पर गिरती हैं, क्योंकि पृथ्वी की यह विशेषता है कि यह चीजों को अपनी ओर खींचती है।” (भारत का इतिहास प्री-यूनिवर्सिटी कक्षा के लिए, पृ० 136, लेखक अविनाशचन्द्र अरोड़ा)।

भवन निर्माण आदि - सबसे पहले आदि सृष्टि रचना में मनुष्य की उत्पत्ति त्रिविष्टप (वर्तमान तिब्बत) में हुई। यह त्रिविष्टप ही प्राचीनकाल की अमरपुरी अथवा स्वर्गलोक था। यहां पर ही इन्द्र, विष्णु और महादेव आदि का राज्य था। देवता व विद्वान् अपने में से एक योग्य व विद्वान् व्यक्ति को चुनते थे जिसकी पदवी इन्द्र की था। वही सबका राजा होता था। उसका सिंहासन अमरपुरी या इन्द्रपुरी में था। आदिकाल में ही उसका निर्माण हो चुका था जिसकी कारीगरी व सुन्दरता अद्वितीय थी4विष्णु जी वैकुण्ठ नगरी में रहते थे जो उसकी राजधानी थी और महादेव


1. अधिक जानकारी के लिए देखो - असली किस्सा सिंहासन बत्तीसी प्रकाशक अग्रवाल डिपो (रजि०) 460 खारी बावली, दिल्ली-6.
2. सत्यार्थप्रकाश एकादश समुल्लास पृ० 198-99.
3. वीरभूमि हरयाणा पृ० 64-65 लेखक श्री आचार्य भगवानदेव।
4. उपदेशमंजरी पृ० xx और xviii.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-161


कैलाश को राजधानी बनाकर रहते थे। अलकापुरी, वैश्रवण (जिसको धनपति कुबेर भी कहते थे) की राजधानी थी। ये सब शोभायमान नगर आदिसृष्टि में त्रिविष्टप (स्वर्ग लोक) में बन चुके थे1

लंकापुरी का वर्णन - मुनिवर विश्रवा ने अपने पुत्र वैश्रवण (कुबेर) को कहा कि “दक्षिण के तट पर एक त्रिकूट नामक पर्वत है। उसके शिखर पर एक विशालपुरी है जिसका नाम लंका है। इन्द्र की अमरावती के समान उस रमणीय पुरी का निर्माण विश्वकर्मा ने राक्षसों के रहने के लिए किया है। उसकी चारदीवारी सोने की बनी हुई है। उसके चारों ओर चौड़ी खाईयां खुदी हैं और वह अनेकानेक यन्त्रों तथा शस्त्रों से सुरक्षित है। वह पुरी बड़ी ही रमणीय है। उसके फाटक सोने और नीलम के बने हुए हैं। पूर्वकाल में भगवान् विष्णु के भय से पीड़ित हुए राक्षसों ने उस पुरी को त्याग दिया था। वे समस्त राक्षस रसातल (अमेरिका) चले गये हैं। इसलिए लंकापुरी सूनी हो गई है।” वैश्रवण ने अपने पिता के वचन सुनकर लंकापुरी में जाकर निवास किया2। (आगे का हाल अध्याय 1, वंशावली प्रकरण में देखो)।

आदि सृष्टि से ही भारतीय आर्यों का राज्य सारे संसार में रहा और वहां जाकर कृषि, धातुविद्या, कलाकौशल और शासनव्यवस्था सिखलाई। इसका एक उदाहरण यहां पर दिया जाता है - लंकापुरी छोड़कर राक्षस लोग पाताल (अमेरिका) चले गये थे। ये लोग आर्य ही थे। वहां उनका नेता सुमाली साथ गया था। उसने वहां अमेरिका के लोगों को कृषि, धातुविद्या तथा शासनव्यवस्था सिखलाई। साफ है कि भारतीय आर्य इन सब विद्याओं में निपुण थे3

ये सब राक्षस लंकापुरी से अमेरिका में विमानों और समुद्री जहाजों द्वारा गये। अमेरिका से सुमाली अपने पुत्री कैकसी को विमान में बैठाकर सारे मर्त्यलोक में विचरने लगा। फिर भारतवर्ष में आकर उसका विवाह विश्रवा (रावण के बाप) से कर दिया4

मनुस्मृति में जो समुद्र में जाने वाली नौका पर कर लेना लिखा है वह भी आर्यावर्त से द्वीपान्तर में जाने के कारण है5

अयोध्यापुरी का वर्णन - कौशल नाम से प्रसिद्ध एक बहुत बड़ा जनपद है, जो सरयु नदी के किनारे बसा हुआ है। उसी जनपद में अयोध्या नाम की एक नगरी है, जो समस्त लोकों में विख्यात है। उस पुरी को स्वयं महाराज मनु ने बनवाया था और बसाया था। उसका प्रथम सम्राट् इक्ष्वाकु हुआ। जैसे स्वर्ग में देवराज इन्द्र ने अमरावतीपुरी बसाई थी, उसी प्रकार राजा दशरथ ने अयोध्यापुरी को पहले की अपेक्षा विशेष रूप से बसाया था। वहां सब प्रकार के यन्त्र और अस्त्र-शस्त्र संचित थे। उस पुरी में सभी कलाओं के शिल्पी निवास करते थे। भूमण्डल की वह सर्वोत्तम नगरी, दुन्दुभि, मृदंग वीणा और पणव आदि वाद्यों की मधुर ध्वनि से अत्यन्त गूंजती रहती थी। अग्निहोत्र, शम और दम आदि उत्तम गुणों के सम्पन्न तथा छहों अंगों सहित सम्पूर्ण वेदों के पारंगत विद्वान् श्रेष्ठ ब्राह्मण उस पुरी को सदा घेरे रहते थे6


1. उपदेशमंजरी पृ xv और xviii.
2. वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड तृतीय सर्ग श्लोक 25-32.
3. वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड नवम सर्ग।
4. वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड सर्ग 9.
5. सत्यार्थप्रकाश दसवां समुल्लास पृ० 273.
6. वाल्मीकि रामायण उत्तरकाण्ड पांचवां सर्ग।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-162


नल के द्वारा सागर पर सौ योजन लम्बे पुल का निर्माण - विश्वकर्मा का औरस पुत्र नल जो शिल्पकर्म में अपने पिता के समान था, ने समुद्र पर सौ योजन लम्बा तैयार कर दिया। वह एक बड़ा अद्भुत कार्य था। उस पुल पर से सारी वानरसेना, राम, लक्ष्मण व सुग्रीव के साथ लंका में पहुंच गई1। कुछ पुस्तकों में लिखा है कि नल और नील ने यह पुल बनवाया। (लेखक)

श्री रामचन्द्र जी ने मिथिलापुरी में शिवजी के धनुष को तोड़ा - विश्वामित्र जी राम-लक्ष्मण को लेकर राजा जनक की मिथिलापुरी में पहुंचे। वहां उनकी पुत्री सीता जी के स्वयंवर की शर्त यह थी कि जो शिव-धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यञ्चा चढा दे उसी के साथ सीता जी का विवाह होगा। कोई भी राजा इस धनुष को थोड़ा भी न हिला सका। श्री रामचन्द्र जी ने प्रत्यञ्चा चढ़ाकर ज्यों ही उस धनुष को कान तक खींचा, त्यों ही वह बीच से ही टूट गया।

राजा जनक ने बताया कि यह भगवान् शंकर का धनुष-रत्न है, जो मेरे पूर्वज महाराजा देवरात 2 के पास धरोहर के रूप में रखा गया था। एक दिन मैं यज्ञ के लिए भूमिशोधन करते समय खेत में हल चला रहा था, उसी समय हल के अग्रभाग से जोती हुई भूमि से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हल द्वारा खींची गई रेखा) से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम सीता रखा गया3। अब देखिये यहां दो बातें साफ हैं:- शिवजी महाराज का यह कितना अद्भुत व भारी-भरकम धनुष स्वयं विश्वकर्मा ने अपने हाथों से बनाया था। साथ ही इसके तोड़ने से श्री रामचन्द्र जी की अद्वितीय शक्ति व पराक्रम का पता चल जाता है। प्राचीन काल से राजे-महाराजे अपने हाथ से खेती करते थे। सो, साफ है कि आर्य लोग कृषि कार्य में निपुण थे।

श्री रामचन्द्र जी के द्वारा खर और उसके सेनापति दूषण सहित चौदह राक्षसों का वध - इस युद्ध में श्रीराम ने अपने मण्डलाकार धनुष से अत्यन्त भयंकर और राक्षसों के प्राण लेने वाले असंख्य बाण छोड़ने आरम्भ किये, जिससे सैंकड़ों और हजारों राक्षस मारे गये। उस समय श्रीराम के नालीक, नाराच और तीखे अग्रभाग वाले विकर्णी बाणों द्वारा निशाचर छिन्न-भिन्न हो गये।

श्री रामचन्द्र जी के बाणसमुदायरूपी अन्धकार ने सूर्य सहित सारे आकाशमण्डल को ढक दिया। उस समय श्रीराम उन बाणों को लगातार छोड़ते हुए एक स्थान पर खड़े थे।

कुछ भयंकर बलशाली शूरवीर निशाचर अत्यन्त कुपित हो श्रीराम पर अपने अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करने लगे। परन्तु श्रीराम ने अपने बाणों द्वारा उनके अस्त्र-शस्त्रों को रोककर उनके गले काट डाले। ऐसा देखकर खर अपने बारह महापराक्रमी सेनापतियों सहित उत्तम बाणों की वर्षा करते हुए अपने सैनिकों के साथ श्रीराम पर टूट पड़े। तब तेजस्वी श्री रामचन्द्र जी ने सोने और हीरों से विभूषित अग्नितुल्य तेजस्वी सायकों द्वारा उस सेना के बचे-खुचे सिपाहियों का भी संहार कर डाला। उस युद्ध के मुहाने पर भी श्रीराम ने कर्णि नामक सौ बाणों से सौ राक्षसों का और सहस्र बाणों से सहस्र निशाचरों का एक साथ ही संहार कर डाला4


1. वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड सर्ग 22.
2. देखो जनक वंशावली प्रथम अध्याय।
3. वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड 66वां सर्ग।
4. वाल्मीकि रामायण अरण्यकाण्ड सर्ग 25-26.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-163


पाठक समझ गये होंगे कि उस समय विज्ञान का कितना ऊँचा स्तर था और कैसे-कैसे अद्भुत शस्त्र बन चुके थे जो आज के वैज्ञानिक उस प्रकार के शस्त्र अब तक नहीं बना पाये हैं।

इन्द्रजित् और लक्ष्मण का भयंकर युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने इन्द्रजित् का वध कर दिया। परन्तु स्वयं भी घायल था। श्रीराम ने वानर यूथपति सुषेण को कहा कि “तुम शीघ्र ऐसा उपचार करो जिससे लक्ष्मण और विभीषण दोनों के शरीर से बाण निकल जायें और घाव अच्छे हो जायें, और भी सभी घायल वानर सैनिकों को स्वस्थ कर दो।” सुषेण ने लक्ष्मण की नाक में एक बहुत ही उत्तम औषधि लगा दी। उसकी गन्ध सूंघते ही लक्ष्मण के शरीर से बाण निकल गये और उसकी सारी पीड़ा दूर हो गई। उसके शरीर के सब घाव भर गये। इसी तरह सुषेण ने विभीषण तथा सब सैनिकों की तत्काल चिकित्सा कर दी1। आज के वैज्ञानिक इस प्रकार का इलाज अभी तक खोज नहीं पाये हैं।

आर्य लोगों को वारुणास्त्र, आग्नेयास्त्रादि विदित थे अर्थात् पदार्थों के गुणों को जान उनकी विशेष योजना वे करते थे। विशल्यौषधि नामक उन्हें एक औषधि विदित थी, जिससे कैसा ही जख्म क्यों न हो, इस औषधि से झट भर जाता था2

वैदिक काल से अमेरिका में विज्ञान

वैदिक काल से ही आर्यों का राज्य पूरी पृथ्वी पर रहा है। इसी काल में आर्यों का राज्य पाताल (अमेरिका) में भी था। इस विषय में वहां पर इनका राज्य, भवननिर्माण, कलाकौशल विज्ञान तथा अस्त्र-शस्त्र आदि का संक्षिप्त ब्यौरा निम्न प्रकार से है।

मातलि, इन्द्र महाराज का सखा, मित्र, सारथि और मन्त्री था। मातलि की एक सुन्दर कन्या थी जिसका नाम गुणकेशी था। मातलि अपनी पुत्री के लिए योग्य वर खोजने के निमित्त नारद जी के साथ पाताल लोग में गये। वहां पर उन्होंने वरुण देवता के दर्शन किए। वरुण के पुत्र पुष्कर का विवाह सोम की पुत्री से हुआ था। सोम की दूसरी ज्योरत्नाकाली का विवाह अदिति के ज्येष्ठ पुत्र सूर्यदेव से हुआ था। नारद ने बताया, मातले! देखो वह वरुण देवता का भवन है जो सब ओर से सुवर्ण का ही बना हुआ है। जिनके राज्य छीन लिए गये हैं, उन दैत्यों के ये दीप्यमान सम्पूर्ण आयुध दिखाई देते हैं। ये सारे अस्त्र-शस्त्र अक्षय हैं और प्रहार करने पर शत्रु को आहत करके पुनः अपने स्वामी के हाथ में लौट आते हैं। पहले दैत्यलोक अपनी शक्ति के अनुसार इनका प्रयोग करते थे। परन्तु अब देवताओं ने इन्हें जीतकर अधिकार में कर लिया है। इन स्थानों में राक्षस और दैत्य जाति के लोग रहते हैं। यहां दैत्यों के बनाये हुए बहुत से दिव्यास्त्र भी हैं। ये महातेजस्वी अग्निदेव वरुण देवता के सरोवर में प्रकाशित होते हैं। इन धूमरहित अग्निदेव ने भगवान् विष्णु के सुदर्शन चक्र को भी अवरुद्ध कर दिया था।

वज्र की गांठ को गाण्डी कहा गया है। यह धनुष उसी का बना हुआ है, इसलिए गाण्डीव कहलाता है। यह धनुष आवश्यकता पड़ने पर लाख गुनी शक्ति से सम्पन्न हो वैसे-वैसे ही बल भी धारण करता है और सदा अविचल बना रहता है। ब्रह्मवादी ब्रह्मा जी ने पहले इस प्रचण्ड धनुष


1. वाल्मीकि रामायण युद्धकाण्ड 91वां सर्ग।
2. उपदेशमंजरी पांचवां प्रवचन पृ० 32.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-164


का निर्माण किया था। यह चक्र के समान उद्भासित होता रहता है। इस महान् अभ्युदयकारी धनुष को जलेश वरुण के पुत्र धारण करते हैं1

नारद उवाच :- मातले! यह जो नागलोक के मध्यभाग में स्थित नगर दिखाई देता है, इसे पाताल कहते हैं। इस नगर में दैत्य और दानव निवास करते हैं। यहां नागराज ऐरावत, वामन, कुमुद और अञ्जन नामक श्रेष्ठ गज सुप्रतीक के वंश में उत्पन्न हुए हैं2

हिरण्यपुर का दिग्दर्शन और वर्णन -

नारद उवाच : मातले! यह हिरण्यपुर नामक श्रेष्ठ एवं विशाल नगर है जहां दैत्यों और दानवों का निवासस्थान है। असुरों के “विश्वकर्मा मय” ने अपने मानसिक संकल्प के अनुसार महान् प्रयत्न करके पाताल लोक के भीतर इस नगर का निर्माण किया है। यहां सहस्रों मायाओं का प्रयोग करने वाले और महान् बल पराक्रम से सम्पन्न वे शूरवीर दानव निवास करते हैं। इन्द्र, यम, वरुण, कुबेर तथा और कई देवता भी इन्हें वश में नहीं कर सकते।

मातले! तुम, तुम्हारा पुत्र गोमुख तथा पुत्रसहित शचीपति देवराज इन्द्र अनेक बार इनके सामने से मैदान छोड़कर भाग चुके हो। देखो! इनके ये सोने और चांदी के भवन के भवन कितनी शोभा पा रहे हैं। इनका निर्माण शिल्पशास्त्रीय विधान के अनुसार हुआ है। इन सब पर वैदूर्यमणि, मूंगे तथा उत्तम हीरों से जटित होने के कारण उनकी दीप्ति अधिक बढ़ गई है। देवता और दानव परस्पर भाई ही हैं तथापि इनमें सदा वैरभाव बना रहता है3

गरुड़लोक तथा गरुड़ों की संतानों का वर्णन -

नारद ने कहा, मातले! यहां विनतानन्दन गरुड़ के छः पुत्रों ने अपनी वंशपरम्परा का विस्तार किया है, जिनके नाम - सुमुख, सुनामा, सुनेत्र, सुवर्चा, सुरुच तथा पक्षिराज सुबल हैं। विनता के वंश की वृद्धि करनेवाले, कश्यप कुल में उत्पन्न हुए तथा ऐश्वर्य का विस्तार करनेवाले इन छहों ने गरुड़ जाति की सैंकड़ों और सहस्रों शाखाओं का विस्तार किया है। भगवान् विष्णु ही इनके देवता हैं4

नागलोक के नागों का वर्णन -

नारद उवाच :- मातले! यह नागराज वासुकि द्वारा सुरक्षित उनकी भोगवती नामक पुरी है। देवराज इन्द्र की सर्वश्रेष्ठ नगरी अमरावती की तरह यह भी सुख समृद्धि से सम्पन्न है। यहां सुरसा के पुत्र नागगण शोक संताप से रहित होकर निवास करते हैं। इनके रूप रंग और आभूषण अनेक प्रकार के हैं। बहुत से नाग कश्यप के वंशज हैं। मातलि को नागकुमार सुमुख पसन्द आया5

नारद उवाच :- मातले! यह नागराज सुमुख है, जो ऐरावत के कुल में उत्पन्न हुआ है। यह आर्यक का पौत्र और वामन का दौहित्र है। इसके पिता नागराज चिकुर थे, जिन्हें थोड़े ही दिन


1. महाभारत उद्योगपर्व 98वां अध्याय, श्लोक 10-22.
2. महाभारत उद्योगपर्व 99वां अध्याय, श्लोक 1 और 15.
3. महाभारत उद्योगपर्व 100वां अध्याय, श्लोक 1-18.
4. महाभारत उद्योगपर्व 101वां अध्याय, श्लोक 2-4.
5. महाभारत उद्योगपर्व 103वां अध्याय, श्लोक 1-4.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-165


पहले गरुड़ ने अपना ग्रास बना लिया है। मातलि ने नारद से कहा तात! यह श्रेष्ठ नाग सुमुख मुझे अपना जामाता बनाने के योग्य जंच गया है1

नारद ने नागराज आर्यक को मातलि व उसकी पुत्री गुणकेशी के विषय में सब बातें बताईं। मातलि के कहने पर आर्यक ने अपना पौत्र नारद जी व मातलि के साथ इन्द्र के पास भेज दिया, जो स्वर्ग के सिंहासन पर विराजमान थे। दैवयोग से वहां भगवान् विष्णु भी उपस्थित थे।

भगवान् विष्णु ने सुमुख को उत्तम आयु प्रदान की। इन्द्र का वर पाकर सुमुख ने गुणकेशी से विवाह कर लिया और अपने घर चला गया2

राजा मान्धाता के पुत्र अम्बरीष के जो युवनाश्व नामक पुत्र की उत्पत्ति हुई, उससे हारीत नामक पुत्र हुआ, जिससे आंगिरस हारीतगण उत्पन्न हुए। पूर्वकाल की बात है पाताल (अमेरिका) में मौनेय नाम के छः करोड़ गन्धर्व रहते थे। उन्होंने सभी नागकुलों के प्रमुख-प्रमुख रत्नों और अधिकारों का अपहरण कर लिया। नागों ने अपनी बहिन नर्मदा को मान्धाता के पुत्र पुरुकुत्स को लाने के लिए कहा। वह पुरुकुत्स को रसातल (अमेरिका) में लिवा लाई।

रसातल में पहुंचकर पुरुकुत्स ने सभी गन्धर्वों का वध कर डाला। पुरुकुत्स ने नर्मदा से विवाह कर लिया और अपने नगर में लौट आया। इनसे त्रसद्-दस्यु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ3

टिप्पणी :- 1. इस प्रकरण में अमेरिका में राज्य करने वाले तथा वहां पर निवास करने वाले वंशों के नाम आये हैं जैसे - वरुण देवता, दैत्य, दानव, असुर, नागगण, गन्धर्व, गरुड़लोग, राक्षस आदि। ये सब भारतवर्ष से वहां वायुयान तथा जलपोतों द्वारा गये और वहां बस्तियां बसाईं व राज्य किया। ये सब ब्रह्मा जी की सन्तान हैं तथा आर्यवंशज हैं। (इसके लिये देखो ब्रह्मा की वंशावली प्रथम अध्याय, और महाभारत आदिपर्व अध्याय 65-66)।

2. आदि सृष्टि से ही आर्यों का राज्य पूरे भूगोल पर था और उन्होंने दूसरे देशों को विद्या, विज्ञान, अस्त्र-शस्त्र और कृषि, कला-कौशल आदि सिखलाये। पाठक समझ गये होंगे कि भारतीयों के विरुद्ध विदेशियों की लिखी मनघड़न्त बातें असत्य और मिथ्या हैं।

महाभारत काल में विज्ञान, कलाकौशल, अस्त्र-शस्त्र आदि का संक्षिप्त ब्यौरा -

द्रोणाचार्य ने महारथी महात्मा अर्जुन से कहा - महाबाहो! यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र मैं तुम्हें प्रयोग और उपसंहार के साथ बता रहा हूं। यह सब अस्त्रों से बढकर है तथा इसे धारण करना भी अत्यन्त कठिन है। तुम इसे ग्रहण करो। अर्जुन ने हाथ जोड़कर उस उत्तम अस्त्र को ग्रहण किया। उस समय गुरु द्रोण ने अर्जुन से पुनः यह बात कही - “संसार में दूसरा कोई पुरुष तुम्हारे समान धनुर्धर नहीं होगा4।”

भीमसेन, दुर्योधन तथा अर्जुन के द्वारा अस्त्रकौशल का प्रदर्शन -

अर्जुन ने पहले आग्नेयास्त्र से आग पैदा की। फिर वारुणास्त्र से जल उत्पन्न करके उसे


1. महाभारत उद्योगपर्व 103वां अध्याय, श्लोक 23-25.
2. महाभारत उद्योगपर्व 104वां अध्याय, श्लोक 22, 23, 29.
3. विष्णु पुराण (द्वितीय भाग) चतुर्थ अंश, तीसरा अध्याय श्लोक 2-10 और 16.
4. महाभारत आदिपर्व 132वां अध्याय, श्लोक 18-20.
5. महाभारत आदिपर्व 132वां अध्याय, श्लोक 18-20.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-166


बुझाया। वायव्यास्त्र से आंधी चला दी और पर्जन्यास्त्र से बादल पैदा कर दिये। उन्होंने भौमास्त्र से पृथ्वी और पार्वतास्त्र से पर्वतों को उत्पन्न कर दिया। फिर अन्तर्धानास्त्र के द्वारा वह स्वयं अदृश्य हो गया। रंगभूमि में लोहे का बना हुआ सुअर इस प्रकार रक्खा गया था कि वह सब ओर चक्कर लगा रहा था। उस घूमते हुए सुअर के मुख में अर्जुन ने एक ही साथ एक बाण की भांति पांच बाण मारे। वे पांचों बाण एक दूसरे से सटे हुए नहीं थे। एक जगह गाय का सींग एक रस्सी में लटकाया गया था, जो हिल रहा था। अर्जुन ने उस सींग के छेद में लगातार इक्कीस बाण गड़ा दिये। इस प्रकार उन्होंने बड़ा भारी अस्त्रकौशल दिखाया। खड्ग, धनुष और गदा आदि के भी अस्त्रकौशल अर्जुन ने अनेक पैंतरे और हाथ दिखलाये1

दुर्योधन के आदेश से पुरोचन का वारणावत नगर में लाक्षागृह बनाना -

पापी दुर्योधन ने अपने मन्त्री पुरोचन को वारणावत नगर में लाक्षागृह बनाने का गुप्त आदेश दिया। धृतराष्ट्र के आदेश से पांचों पांडव अपनी माता कुन्ती सहित वारणावत चले गये। जाने से पहले विदुर जी ने म्लेच्छों की भाषा में युधिष्ठिर को उनके लाक्षागृह में जलाकर मारा जाने का सारा भेद बता दिया। युधिष्ठिर उस म्लेच्छों की भाषा को ठीक से समझ गये। उधर वारणावत पहुंच कर पुरोचन ने सुरक्षित एवं विश्वसनीय कारीगरों से एक सुन्दर व विचित्र महल तैयार करवा दिया जिसकी दीवारों में सण, मूंज, घास और बांस आदि सब द्रव्यों को घी से सींचकर डाला गया था। पुरोचन के कहने से पाण्डव उस लाक्षागृह में रहने लगे। विदुर के भेजे हुए एक निपुण कारीगर खनक ने लाक्षागृह में सुरंग का निर्माण कर दिया। एक दिन रात्रि के समय कुन्ती ने दान देने के निमित्त ब्राह्मण भोजन कराया। सब स्त्रियां कुन्तीदेवी से आज्ञा ले रात को अपने-अपने घरों को लौट गयीं। परन्तु एक भीलनी और उसके पांच बेटे शराब के नशे में बेहोश होकर उसी घर में सो गए। उसी रात्रि में भीमसेन ने उस जगह आग लगा दी, जहां पुरोचन सो रहा था। फिर उसने लाक्षागृह के प्रमुखद्वार पर आग लगा दी। फिर उस घर के चारों ओर आग लगा दी। पांचों पाण्डव अपनी माता के साथ सुरंग के रास्ते से बाहर निकल गये। भीलनी और उसके पांचों पुत्र तथा पापी पुरोचन वहीं जलकर खाक हो गए।

विदुर जी ने पाण्डवों को गंगा पार उतारने के लिए एक नाव पहले से ही भेज दी थी। नाव चलाने वाले बुद्धिमान् मनुष्य ने वह नाव पाण्डवों को दिखलाई। वह मन और वायु के समान वेग से चलने वाली थी जो सब प्रकार से हवा का वेग सहने में समर्थ थी। उस नौका को चलाने के लिए यन्त्र लगाया गया था। उसमें बैठकर पाण्डव अपनी माता सहित गंगा पार कर गये2

अर्जुन का लक्ष्यवेध करके द्रौपदी को प्राप्त करना -

रुक्म, सुनीथ, वक्र, कर्ण, दुर्योधन, शल्य तथा शाल्व आदि धनुर्वेद के पारंगत विद्वान् पुरुषसिंह राजा लोग महान् प्रयत्न करके भी जिस धनुष पर डोरी न चढ़ा सके, उसी धनुष पर विष्णु के समान प्रभावशाली एवं पराक्रमी वीरों में श्रेष्ठता का अभिमान रखने वाले इन्द्रकुमार अर्जुन ने पलक मारते-मारते प्रत्यञ्चा (चिल्ला) चढ़ा दी। इसके बाद उसने वे पांच बाण भी हाथ में ले लिए और उन्हें


1. महाभारत आदिपर्व 134वां अध्याय, श्लोक 18-25.
2. महाभारत आदिपर्व अध्याय 143-148.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-167


चलाकर बात की बात में लक्ष्य (मछली) वेध दिया। यह बिंधा हुआ लक्ष्य अत्यन्त छिन्न-भिन्न हो, यन्त्र के छेद से सहसा पृथ्वी पर गिर पड़ा। राजकुमारी द्रौपदी ने माला अर्जुन के गले में डाल दी और पाण्डुपुत्र अर्जुन का वरण कर लिया1

अर्जुन और श्रीकृष्ण द्वारा खाण्डव वन को जलाना

धूमकेतु अग्नि ने वरुणदेव से कुछ अस्त्र-शस्त्र लेकर अर्जुन को दिए जो निम्न प्रकार से हैं - 1. दिव्य धनुष 2. अक्षय तरकस 3. कपियुक्त ध्वजा से सुशोभित रथ 4. गाण्डीव धनुष और बाणों से भरे हुए अक्षय एवं बड़े तरकस भी दिए। वह धनुष अद्भुत था, किसी भी अस्त्र-शस्त्र से वह टूट नहीं सकता था और सब दूसरे अस्त्रों को नष्ट कर डालने की शक्ति उसमें मौजूद थी। वह दूसरे लाख धनुषों के बराबर था। उस रथ का निर्माण प्रजापति विश्वकर्मा ने किया था। पूर्वकाल में शक्तिशाली सोम (चन्द्रमा) ने उसी रथ पर आरूढ हो दानवों पर विजय पाई थी। पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने इस गाण्डीव धनुष का निर्माण किया था।

पावक ने श्रीकृष्ण जी को एक चक्र दिया जिसका मध्यभाग वज्र के समान था। माधव! युद्ध में आप जब-जब इसे शत्रुओं पर चलायेंगे, तब-तब यह उन्हें मारकर और स्वयं किसी अस्त्र से प्रतिहत न होकर पुनः आपके हाथों में आ जायेगा। वरुण ने भी कौमादकी नामक गदा भगवान् कृष्ण जी को भेंट की, जो दैत्यों का विनाश करने वाली और भयंकर थी।

इसके बाद अर्जुन और श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर अग्निदेव से कहा - “भगवन्! अब हम दोनों रथ और ध्वजा से युक्त हो सम्पूर्ण देवताओं तथा असुरों से भी युद्ध करने में समर्थ हो गए हैं; फिर तक्षक नागों के लिए युद्ध की इच्छा रखने वाले अकेले वज्रधारी इन्द्र से युद्ध करना क्या बड़ी बात है?” अर्जुन और श्रीकृष्ण ने खाण्डव वन को सब ओर से जलाना आरम्भ कर दिया2

उस आग को बुझाने के लिये देवताओं के स्वामी इन्द्र ने विशाल रथ ले लिये और आकाश में स्थित होकर जल की वर्षा करने लगे3। वर्षा करते हुए इन्द्र की उस जलधारा को अर्जुन ने अपने उत्तम अस्त्र का प्रदर्शन करते हुए बाणों की बौछार से रोक दिया। जब खाण्डव वन जलाया जा रहा था, उस समय महाबली नागराज तक्षक वहां नहीं था, कुरुक्षेत्र चला गया था। परन्तु तक्षक का बलवान् पुत्र अश्वसेन वहीं रह गया था। उसकी माता ने उसे आग से बचाया था। देवराज ने भी अर्जुन को युद्ध में कुपित देख सम्पूर्ण आकाश को आच्छादित करते हुए अपने दुःसह अस्त्र (ऐन्द्रास्त्र) को प्रकट किया। फिर तो प्रचण्ड वायु चलने लगी जिससे वर्षा करने वाले मेघों की उत्पत्ति हो गई4

वे भयंकर मेघ बिजली की कड़कड़ाहट के साथ धरती पर वज्र गिराने लगे। उस अस्त्र के प्रतीकार की विद्याओं में कुशल अर्जुन ने उन मेघों को नष्ट करने के लिए अभिमन्त्रित करके वायव्य नामक उत्तम अस्त्र का प्रयोग किया। उस अस्त्र ने इन्द्र के छोड़े हुए वज्र और मेघों का ओज एवं


1. महाभारत आदिपर्व 187वां अध्याय, श्लोक 19-20-21 और 27.
2. महाभारत आदिपर्व 224वां अध्याय श्लोक 1-34.
3. महाभारत आदिपर्व 225वां अध्याय श्लोक 18.
4. महाभारत आदिपर्व 226वां अध्याय श्लोक 1,4,14.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-168


बल नष्ट कर दिया। तत्पश्चात् असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग युद्ध के लिए उत्सुक हो अनुपम गर्जना करते हुए वहां दौड़े आए। उनके हाथों में तोप, बंदूक, चक्र, पत्थर एवं भुशुण्डी आदि थे। उन्होंने श्रीकृष्ण और अर्जुन पर अस्त्रशस्त्रों की वर्षा आरम्भ कर दी। उस समय अर्जुन ने अपने तीखे बाणों से उन सब के सिर उड़ा दिए। श्रीकृष्ण ने भी चक्र द्वारा दैत्यों और दानवों के समुदाय का महान् संहार कर दिया1। शत्रुघाती श्रीकृष्ण के द्वारा बार-बार चलाया हुआ वह चक्र अनेक प्राणियों का संहार करके पुनः उनके हाथ में चला आता था2

मयासुर द्वारा पाण्डवों के अद्भुत सभाभवन का निर्माण -

दानवों के विश्वकर्मा मयासुर ने उस सभाभवन को बहुत सुन्दरता से बनाया था। उसके भीतर बड़ी बड़ी मणियों की चौकोर शिलाखण्डों से पक्की वेदियां बनाई गईं थीं। मणियों तथा रत्नों से व्याप्त होने के कारण कुछ राजा लोग उस पुष्करिणी के पास आकर और उसे देखकर भी उसकी यथार्थता पर विश्वास नहीं करते थे और भ्रम से उसे स्थल समझकर उसमें गिर पड़ते थे। राजा दुर्योधन उस सभाभवन में घूमता हुआ स्फटिक-मणिमय स्थल पर जा पहुंचा और वहां जल की आशंका से उसने अपना वस्त्र ऊपर उठा लिया। दूसरी ओर वह स्थल में ही गिर पड़ा। तत्पश्चात् स्फटिकमणि के समान स्वच्छ जल से भरी और स्फटिकमणिमय कमलों से सुशोभित बावली को स्थल मानकर वह वस्त्रसहित जल में गिर पड़ा। दुर्योधन की यह दुरवस्था देख भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव जोर जोर से हंसने लगे। इसके बाद दुर्योधन ने एक दरवाजा देखा जो वास्तव में बंद था, तो भी खुला दीखता था। उसमें प्रवेश करते ही उसका सिर टकरा गया। ठीक उसी तरह का एक दूसरा दरवाजा मिला। यद्यपि वह खुला था, तो भी दुर्योधन ने उसे दोनों हाथों से धक्का दे दिया और द्वार के बाहर गिर पड़ा3

मय नामक एक बड़ा शिल्पी था। उसने पाण्डवों के राजसूय यज्ञ के लिए एक विचित्र सभा-भवन बनाया। मय ने ऐसी रचना चातुरी की थी कि स्थल में जल का सन्देह होता था। दुर्योधन ने इसे सचमुच जल समझकर अपने कपड़े उठाकर समेट लिए। यह देखकर भीमसेन मुस्कराया और अक्खड़पन से कह दिया कि अन्धे को अन्धा ही पैदा हुआ4काशी के मानमन्दिर में शिशुमारचक्र को देखो, कि जिसकी पूरी रक्षा भी नहीं है, तो भी कितना उत्तम है कि जिसमें अब तक भी खगोल का बहुत सा वृत्तान्त विदित होता है5

महाभारतकाल में आर्यों का विदेशों में जाना -

महाभारत शान्तिपर्व अ० 327 श्लोक 14-15 - ये श्लोक महाभारत शान्तिपर्व मोक्षधर्म में व्यास शुक संवाद में हैं अर्थात् एक समय व्यास जी अपने पुत्र शुक और शिष्य सहित पाताल (अमेरिका) में निवास करते थे। शुकाचार्य ने अपने पिता से एक प्रश्न पूछा कि आत्मविद्या इतनी


1. महाभारत आदिपर्व 226वां अध्याय, श्लोक 15, 24, 25, 26, 27.
2. महाभारत आदिपर्व 227वां अध्याय श्लोक 10.
3. महाभारत सभापर्व तीसरा अध्याय श्लोक 26, 32, 33 तथा 47वां अध्याय श्लोक 3-12.
4. उपदेशमंजरी स्वामी दयानन्द जी का बारहवां प्रवचन पृ० 97.
5. सत्यार्थप्रकाश 11वां समुल्लास पृ० 183.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-169


ही है या अधिक? व्यास जी ने जानकर उस बात का उत्तर न दिया क्योंकि उस बात का उपदेश कर चुके थे। दूसरे की साक्षी के लिए अपने पुत्र शुक से कहा कि “हे पुत्र! तू मिथिलापुरी में जाकर यही प्रश्न जनक1 राजा से कर, वह इसका यथायोग्य उत्तर देगा।” पिता का उत्तर सुनकर शुक्राचार्य पाताल से मिथिलापुरी की ओर चले। हरिवर्ष (यूरोप) आदि देशों को देखते हुए चीन में आए। चीन से हिमालय और हिमालय से मिथिलापुरी को आए। उसने यह लम्बी यात्रा विमान द्वारा की2

श्रीकृष्ण तथा अर्जुन पाताल (अमेरिका) में अश्वतरी अर्थात् जिसको अग्नियान नौका कहते हैं, उस पर बैठकर पाताल में जा के महाराजा युधिष्ठिर के यज्ञ में उद्दालक ऋषि को ले आए थे। अर्जुन ने पाताल में जिसको “अमेरिका” कहते हैं, वहां के नागवंश के राजा कौरव्य की पुत्री उलूपी से गन्धर्व विवाह किया जिससे बड़ा शक्तिशाली इरावान पुत्र उत्पन्न हुआ। जब महाराजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया था उसमें सब भूगोल के राजाओं को बुलाने का निमन्त्रण देने के लिए भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव चारों दिशाओं में गये थे। उन्होंने यह यात्रा जलपोत तथा विमान द्वारा की3

विज्ञान के चमत्कार द्वारा सिंधुराज जयद्रथ का वध - अभिमन्यु के मारे जाने का मुख्य कारण जयद्रथ था। अर्जुन ने प्रतिज्ञा की थी कि कल के युद्ध में सूर्यास्त तक जयद्रथ को मार दूंगा नहीं तो चिता में जलकर मर जाऊंगा। अगले दिन पाण्डवों ने जयद्रथ को मारने के लिए बड़े भयंकर धावे किए। परन्तु कौरव सेना ने जयद्रथ को काफी पीछे छिपाकर उस तक नहीं पहुंचने दिया। सायंकाल निकट था तब योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण जी ने अपनी विद्याशक्ति से सूर्य को छिपाकर अन्धकार कर दिया। कौरव सेना में खुशी की लहर दौड़ गई और वे अर्जुन को देखने के लिए जयद्रथ को साथ लेकर आगे आए। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि इस दुरात्मा जयद्रथ के वध का यही अवसर है। अर्जुन ने अपने गाण्डीव धनुष से शीघ्रगामी बाण छोड़ा जो जयद्रथ के सिर को काटकर बाज पक्षी के समान उसे आकाश में ले उड़ा और वह सिर जयद्रथ के पिता राजा वृद्धक्षत्र जो वन में तपस्या कर रहा था, की गोद में जा गिरा। जयद्रथ के मारे जाने पर श्रीकृष्ण जी ने अपने रचे हुए अन्धकार को समेट लिया जिससे सूर्य फिर दिखाई देने लगा। इस तरह अर्जुन की प्रतिज्ञा सफल हुई4

महाभारत युद्ध के समय विज्ञान का चमत्कार

गवल्गण का पुत्र संजय हस्तिनापुर में बैठे हुए महाराज धृतराष्ट्र को युद्ध का पूरा समाचार शुरु से अन्त तक बताता रहा। संजय दिव्यदृष्टि (ज्ञान-दृष्टि) से सम्पन्न था। सम्पूर्ण संग्रामभूमि में कोई ऐसी बात नहीं थी जो उसके प्रत्यक्ष न हो। कोई भी बात प्रकट हो या अप्रकट, दिन में हो या रात में अथवा वह मन में ही क्यों न सोची गई हो, संजय सब कुछ जान लेता था5। वह कितना


1. जनक - मिथिला देश के जनकपुरी के राजा को अभी तक जनक ही कहते हैं, यह पदवी थी। इसको सीता जी के पिता जनक न समझें। (उपदेशमंजरी आठवां प्रवचन पृ० 70)
2,3. सत्यार्थप्रकाश एकादश समुल्लास पृ० 173.
4. महाभारत द्रोणपर्व में जयद्रथ वध पर्व।
5. महाभारत भीष्मपर्व दूसरा अध्याय श्लोक 8-12.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-170


विचित्र विज्ञान था कि आज के रेडियो, वायरलेस और टेलीविजन उसकी समानता नहीं कर पाये हैं।

हड़प्पा और मोहन-जोडड़ो - ऐरावती नदी पर स्थित हड़प्पा नगर क्षुद्रकों का एक पुराना नगर प्रतीत होता है। सिन्धुगत मोहन-जोदड़ो नगर इन क्षुद्रकों के साथी अन्य असुरों का नगर था। सतलुज से रावी नदी के आसपास तक क्षुद्रक देश था। वहां से मिली पुरातन-मुद्राओं पर अंकित लिपि असुर-लिपि है। असुर-लिपि में मीन अथवा मत्स्य की आकृति का प्रयोग क्षुद्र-मीना शब्द से प्रकट है। भारतीय इतिहास को न जानते हुए, पाश्चात्य लेखक जॉन मार्शल, मैके और उनके साथी इस विषय में वृथा कल्पनाएं कर रहे हैं। हड़प्पा की स्थिति भारतीय इतिहास में अत्यन्त स्पष्ट है। यूरोप और अमेरिका के लेखकों की कल्पनाओं का इसमें स्थान नहीं। हड़प्पा और मोहन-जोदड़ो के कला-कौशल को वेदकाल से पूर्व का कहना अज्ञान प्रकट करना है। यह कला-कौशल महाभारत युद्ध के काल के आसपास का है1

अश्वमेध यज्ञ की स्मृति रक्षार्थ अर्जुन ने मोहन-कृष्ण और युधरो-युधिष्ठिर के नाम पर मोहन-जोदरो-मोहनजोदड़ो नामक नगर बसाया। किन्तु आर से चार सौ वर्ष पूर्व तक ही इसकी स्थिति का इतिहास मिलता है। इसके बाद का काल इस नगरी के लिए सर्वथा अन्धकारमय रहा। किन्तु समीप की खुदाइयों में सिन्ध के लरकाना जिला में N.W.R. स्टेशन से आठ मील दूरी पर मोहनजोदड़ो नगरी के मकान, सड़क, तालाब, मूर्तियां, हड्डियां, आभूषण आदि वस्तुएं प्राप्त हुई हैं, जिसके आधार पर तत्कालीन सिन्धु-सभ्यता का बड़ा विशद एवं उन्नत परिचय प्राप्त हुआ है। उस समय से भी पूर्व वहां जट्टसंघ का प्रजातन्त्री शासन था। सिन्धु देश का साहित्य इसका साक्षी है। “बंगला विश्वकोष” जिल्द 7 पृष्ठ 6 पर लिखा है कि - पूर्वे सिन्धुदेश जाट गणेर प्रभुत्व थीलो - जाट रमणीगण सुन्दर च औ सतीत्व जन्य सर्वत्र प्रसिद्ध होई। अर्थात् प्राचीनकाल में सिन्धु देश में जाटों का गणराज्य था। और जाटवंश (कुल) बालायें अपने सौन्दर्य और सतीत्व के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध हैं2

आदि सृष्टि से कृषि विज्ञान

पहले अध्याय में सृष्टि की रचना के साथ वेदों की रचना भी लिख दी गई है। सृष्टि के आरम्भ में जब मनुष्यों की उत्पत्ति हुई, तब ईश्वर ने मनुष्यमात्र के कल्याण के लिए जो मार्गदर्शक ज्ञान दिया उसको ही श्रुति या वेद कहते हैं। वेद ईश्वरीय ज्ञान है जिसमें मुख्य चार बाते हैं - 1. विज्ञान 2. ज्ञान 3. कर्म 4. उपासना।

इन वेदों में ईश्वर ने मनुष्यों के लिए कृषि करने तथा पशु पालने का कर्म बताया है जिसके आधार पर आदिसृष्टि से ही आर्य लोग तथा आर्य राजे-महाराजे कृषि करने और पशु पालने लग गये थे। वेदों में लिखे कुछेक उदाहरण निम्न प्रकार से हैं :-

1.

शुनं नः फाला वि कृषन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अभियन्तु वाहै:।
शुनं पर्जन्यो मधुना पयोभि: शुनासीरा शुनमस्मासु धत्तम्॥8॥

1. भारतवर्ष का वृहद इतिहास प्रथम भाग, 10वां अध्याय पृ० 227, लेखक पं० भगवदत्त बी० ए०।
2. क्षत्रिय जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 295-96, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-171


भावार्थ - कृषिकर्म्म करने वाले मनुष्यों को चाहिए कि उत्तम फाल आदि वस्तुओं को बैल के हल आदि से भूमि को उत्तम करके अर्थात् गोड़ के उत्तम सुख को प्राप्त हों, वैसे ही अन्न आदि के लिए सुख देवें॥8॥ (ऋग्वेद मंडल 4 अनुवाक 8 सूक्त 57 मंत्र 8)

2.

अगस्त्यः खनमानः खनित्रै प्रजामपत्यं बलमिच्छमानः।
उभौ वर्णावृषिरुग्रः पुपोष सत्य देवेष्वाशिषो जगाम ॥6॥
भावार्थ - जैसे कुदाल, फावड़ा, कस्सी आदि खोदने के साधनों से भूमि को खोदता हुआ खेती करने वाला धान्य आदि अनाज पकर सुखी होता है वैसे ब्रह्मचर्य और विद्या से राज्य सन्तान और बल की इच्छा करता हुआ निरपराधियों में उत्तम वेदार्थवेत्ता तेजस्वी विद्वान् पुष्ट होता है और विद्वानों में वा अच्छे कर्मों में उत्तम सत्य सिद्ध इच्छाओं को प्राप्त होता है वैसे दोनों परस्पर एक दूसरे को स्वीकार करते हुए स्त्री-पुरुष होवें। (ऋ० म० 1 अ० 6 सू० 179 म० 6)

3.

मूर्धासि राड् ध्रुवासि धरुणा धर्त्र्यसि धरणी।
आयुषे त्वा वर्चसे एवा कृष्ये त्वा क्षेमाय त्वा॥21॥
भावार्थ - जैसे उत्तमांग स्थित शिर से सबका जीवन, राज्य से लक्ष्मी, खेती से अन्न आदि पदार्थ और निवास से रक्षा होती है सो यह सबको आधारभूत माता के तुल्य मान्य करनेहारी पृथ्वी है, वैसे ही विदुषी स्त्री को होना चाहिए। (यजुर्वेद अध्याय 14 मन्त्र 21)

4.

यदश्नासि यत् पिबसि धान्यं कृष्यां पयः।
यदाद्यं यदनाद्यं सर्वं ते अन्न्मविषं कृणोमि॥9॥
भावार्थ - हे मनुष्य! जो तू खेती का उपजा धान्य खाता है और जो तू दूध वा जल पीता है, चाहे पुराना धरा हुआ हो, चाहे नवीन हो, वह सब अन्न तेरे लिए निर्विष करता हूं॥9॥ (अथर्ववेद अष्टम् काण्डम् सूक्त 2 मन्त्र 19)

5.

तुभ्यं पयो यत् पितरावनीतां राधः सुरेतस्तुरणे भुरण्यू।
शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः॥5॥
भावार्थ - मनुष्य लोग जैसा माता पिता और विद्वानों के सेवा धर्म के साथ सुखों को प्राप्त होवें वैसे ही गौ (जो शुद्ध पवित्र पीने योग्य दूध देती है) आदि पशुओं की रक्षा से धर्म के साथ सुख पावें, इनके मन के विरुद्ध आचरण को कभी न करे क्योंकि ये सबका उपकार करनेवाले प्राणी हैं॥5॥ (ऋ० म० 1 अ० 17, सू० 121 मं 5)

6.

अध प्रजज्ञे तरणिर्ममत्तु प्ररोच्यस्या उषसो न सूरः॥
इन्दुर्येभिराष्ट स्वेदुहव्यैः स्रुवेण सिञ्चञ्जरणाभि धाम॥6॥
भावार्थ - मनुष्य गौ आदि पशुओं को रख और उनकी वृद्धि कर। वैद्यकशास्त्र के अनुसार इन पशुओं के दूध आदि को सेवते हुए बलिष्ठ और अत्यन्त ऐश्वर्ययुक्त निरन्तर हों, जैसे कोई हल, पटेला आदि साधनों से युक्ति के साथ खेत को सिद्ध कर जल से सींचता हुआ अन्न आदि पदार्थों से युक्त होकर बल और ऐश्वर्य से सूर्य के समान प्रकाशमान होता है वैसे इन प्रशंसायोग्य कामों को करते हुए प्रकाशित हों॥6॥ (ऋ० म० अ० 17 सू० 121 मं० 6)

7.

पुरा यत् सूरस्तमसो अपीतेस्तमद्रिवः फलिंग हेतिमस्य।
शुष्णस्य चित् परिहितं यदोजो दिवस्परिः सुग्रथितं तदादः॥10॥

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-172


भावार्थ - हे राजपुरुषो! जैसे सूर्य मेघ को मार और उसको भूमि में गिरा सब प्राणियों को प्रसन्न करता है वैसे ही गौओं के मारने वाले को मार, गौ आदि पशुओं को निरन्तर सुखी करो॥10॥ (ऋ० म० 1. अ० 18. सू० 121. मं० 10)

8.

उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथं स्यादिति चेद् भवेत्।
कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद्वैश्यस्य जीविकाम् ॥14॥
अर्थ - यदि दोनों (ब्राह्मण और क्षत्रिय के) कर्म से जीविका न हो तो ब्राह्मण, वैश्य के कर्म खेती और पशुपालन से जीविका करे। (मनुस्मृति अध्याय 10, श्लोक 182)

9.

जीवेदेतेन राजन्यः सर्वेणाप्यनयं गतः।
न त्वेवं ज्यायसीं वृत्तिमभिमन्येत कर्हिचित्॥15॥
अर्थ - आपत्ति में फंसा क्षत्रिय भी इस (कृषि और पशुपालन) से जीविका करे, परन्तु अपने से उच्च वर्ण की वृत्ति को कभी न करे। (मनुस्मृति अध्याय 10, श्लोक 95)

इन थोड़े से उदाहरणों से पाठक समझ गए होंगे कि हमारे वेद शास्त्रों में अनेक स्थानों पर ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य को खेती करने व पशु पालने के आदेश हैं। आर्यों तथा जाट क्षत्रियों ने आदि सृष्टि से ही युद्ध करना, खेती व पशु पालना आरम्भ कर दिया था। ऋषिमुनियों के आश्रम में भी असंख्य गायें रहती थीं और राजे-महाराजे अपने हाथ से खेती व पशुपालन करते थे। उनके कुछेक उदाहरण निम्न प्रकार से हैं।

(1). ब्रह्मा की वंशावली में वेन के पुत्र राजा पृथु का वर्णन किया गया है। सम्राट पृथु के समय तक यह पृथ्वी बहुत ऊंची नीची थी। उन्होंने इसको समतल बनाकर कृषि के योग्य बनाया और खेतों में हल चलाकर अनेक प्रकार के अन्न, फूल-फल और सब्जियां पैदा करने लगे1

(2). वैवस्वत मनु जो प्रथम प्रजापति थे, उनका पुत्र इक्ष्वाकु था। सम्राट् इक्ष्वाकु ही अयोध्या का प्रथम राजा था, जिसने आर्यावर्त पर राज्य किया। उन्होंने भी भूमि को खेती योग्य बनाया। बड़े-बड़े जंगलात को काटकर और भूमि को समतल बनाकर कृषि को उन्नत किया2


संसार के सर्वप्रथम राजा स्वायम्भव मनु थे, जिन्होंने लोक के लिए विधि-विधान अर्थात् न्याय-नियम बनाए। उन्होंने वेदों के आधार पर चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनाए। वैश्य का धर्म पशुपालन, खेती करना और व्यापार आदि लिखा है। परन्तु समय के अनुसार सब ही वर्ण पशुपालन तथा खेती करते थे। यह पहले लिख चुके हैं कि जाट क्षत्रिय आर्य हैं जिनके एक हाथ में हल की मूंठ और दूसरे हाथ में तलवार रहती है। इसका तात्पर्य यह है कि क्षत्रिय आर्य समय आने पर शत्रु से युद्ध करते हैं और शान्ति के समय खेती करते हैं और पशु पालते हैं। महर्षि दयानन्द जी ने खेती करने वाले किसान के लिए क्या ही अच्छा लिखा है - “यह बात ठीक है कि राजाओं के राजा किसान आदि परिश्रम करने वाले हैं और राजा प्रजा का रक्षक है। जो प्रजा न हों तो राजा किसका और राजा न हो तो प्रजा किसकी कहावे।”


1. महाभारत शान्तिपर्व 112.
2. विष्णु पुराण चतुर्थ अंश, अध्याय 2.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-173


स्वायम्भव मनु के दो पुत्र प्रियव्रत प्रजापति और उत्तानपाद हुए। प्रियव्रत ने अपने सात पुत्रों में सारी पृथ्वी बांट दी, जिसके सात द्वीप थे। अपने-अपने द्वीपों में वे प्रियव्रत के पुत्र राज्य करने लगे। हर द्वीप में वे वर्णों के आधार पर खेती व पशुपालन करने लगेsup>1।

(3). प्रथम गंगा का नाम पद्मा था, फिर नदी की नहर महाराजा भगीरथ ने निकाली। इसलिए उसका नाम भागीरथी पड़ा2। इससे उत्तरी भारत में बहुत बड़े क्षेत्र में खेतों में सिंचाई होने लगी जिससे पैदावार की बड़ी उन्नति हुई।

(4). कुरु-प्रदेश - इस प्रदेश का नाम कुरुक्षेत्र अथवा कुरु-जांगल भी रहा है । यह तो जगत्प्रसिद्ध है ही कि कुरुक्षेत्र नाम का धर्मक्षेत्र स्थान भी इसी हरयाणा प्रान्त का एक भाग है जिसे प्राचीन काल में महाराजा कुरु ने यहाँ के जंगल कटवा कर और स्वयं अनेक वर्षों तक अपने हाथों से हल चलाकर कृषि के योग्य बनाया था, इसी प्रकार कुरु की सन्तान युधिष्ठिर, अर्जुन आदि पाँचों भाइयों ने योगीराज श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार व सहायता से खाण्डव वन को जलाकर और असुरों का हनन करके इन्द्रप्रस्थ नगर बसाया था। इस क्षेत्र को कृषियोग्य बनाया। कुरु और कुरु की सन्तान ने यहां के जंगलों को काटकर खेती करने योग्य बनाया अपनी बस्ती बसाई और उनकी अनेक पीढ़ियाँ इसके कुछ भाग पर राज्य करती रहीं । इसी कारण इस प्रदेश का नाम कुरु-प्रदेश अथवा कुरु-जांगल है3

विद्वानों का कहना है कि वैदिककाल में वेद सिखलाने के साथ-साथ कृषिविज्ञान भी एक विषय था जिसकी शिक्षा दी जाती थी। रामायण और महाभारत काल में कृषि व पशुपालन का बड़ा महत्त्व था। राजे-महाराजे इन कार्यों पर विशेष ध्यान देते थे और स्वयं भी यह कार्य करते थे। इसके कुछ उदाहरण ये हैं –

(5). चित्रकूट में श्रीराम की पर्णशाला में राम और भरत मिलाप हुआ तब श्रीराम ने भरत को राजनीति का उपदेश दिया। रामचन्द्र जी ने भरत से पूछा -

रघुनन्दन भरत! जहां खेत जोतने में समर्थ पशुओं की अधिकता है, जहां किसी प्रकार की हिंसा नहीं होती, जहां खेती के लिए वर्षा के जल पर निर्भर नहीं रहना पड़ता (नदियों के जल से ही सिंचाई हो जाती है), तथा हमारे पूर्वजों ने जिसकी भली-भांति रक्षा की है, वह अपना कोसल देश धन-धान्य से सम्पन्न और सुखपूर्वक बसा हुआ है। तात! कृषि और गोरक्षा से आजीविका चलाने वाले सभी वैश्य तुम्हारे प्रीतिपात्र हैं न? क्योंकि कृषि और व्यापार आदि में संलग्न रहने पर ही यह लोक सुखी एवं उन्नतिशील होता है4॥43-47॥

(6). महाभारत और रामायण में ऐसे उदाहरण बहुत संख्या में मिलते हैं। राजा जनक ने, हलधर बलदेव ने और योगिराज श्रीकृष्ण जी ने अपने हाथों से कृषि करके और गौवें पालन करके संसार के पुरुषों को यह कार्य करने का यथार्थ प्रमाण दिया।


1. प्रथम अध्याय आदि सृष्टि से आर्यों का चक्रवर्ती राज्य प्रकरण।
2. उपदेशमंजरी प्रवचन 8 पृ० 71.
3. वीरभूमि हरयाणा पृ० 128-129 लेखक श्री आचार्य भगवानदेव।
4. वाल्मीकीय रामायण अयोध्याकाण्ड 100वां सर्ग, श्लोक 43-47.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-174


(7). यूनानी इतिहासकार मैगस्थनीज ने मौर्यकाल के सम्राटों की शासन पद्धति की जानकारी अपनी पुस्तक इण्डिका में दी है। उन्होंने लिखा कि लोगों का मुख्य व्यवसाय खेतीबाड़ी था। राज्य खेती की उन्नति का विशेष ध्यान रखता था। जंगलों को कटवाकर उन्हें खेती-योग्य बनाने पर बल दिया जाता था। सिंचाई की ओर विशेष ध्यान दिया जाता था। अर्थशास्त्र में जल-कर का वर्णन है जिससे ज्ञात होता है कि राज्य सिंचाई का प्रबन्ध करता था। चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में पश्चिमी भारत में गिरनार के निकट एक नदी पर बांध बंधवाया था जिसके जल से वहां के क्षेत्र में कृषि की बड़ी उन्नति हुई थी1

इन थोड़े से उदाहरणों से पाठक समझ गये होंगे कि आदि सृष्टि से ही हमारे आर्यावर्त में सब विद्यायें, कला-कौशल, अस्त्र-शस्त्र, विज्ञान, भवननिर्माण और कृषि कार्य प्रचलित हो चुके थे। सो वेद-शास्त्रों के न जानने वाले देशी और विदेशी इतिहासकारों ने इनके विरुद्ध जो मनघड़न्त लेख लिखे हैं, वे असत्य और न मानने योग्य हैं।

बड़े खेद की बात है कि आज भी हमारे प्रजातन्त्र भारतवर्ष में विद्यार्थियों को यह पढ़ाया जाता है कि -

अब से कई सहस्र वर्ष पहले भारतीय लोग गुफाओं में रहते थे और कन्द-मूल तथा कच्चे मांस का प्रयोग करते थे। मनुष्य को न खेती करनी आती थी न आग जलानी। ये लोग खाल अथवा वृक्ष की छाल से अपने शरीर को ढकते थे। इस युग के लोगों के शस्त्र तथा औजार पत्थर के बने होते थे। इसके बाद मनुष्य ने धातु का प्रयोग सीखा जिसको धातु युग कहते हैं।” लगभग पचास वर्ष पूर्व यह विश्वास किया जाता था कि भारत का इतिहास आर्यों के आगमन से प्रारम्भ होता है। परन्तु आधुनिक खुदाइयों तथा खोजों ने सिद्ध किया है कि आर्यों से पूर्व एक उच्चकोटि की विस्तृत संस्कृति भारत में विद्यमान थी। इसे सिन्धु की सभ्यता के नाम से जाना जाता है। विद्वानों ने अब इसका नाम “हड़प्पा सभ्यता” सुझाया है। आमतौर पर यही माना जाता है कि इस सभ्यता का विनाश आर्यों के आक्रमण के कारण हुआ। सिन्धु-घाटी की सभ्यता का समय ऋग्वेदिक सभ्यता से पूर्व का है। यह एक नगरीय सभ्यता थी जहां नागरिकों को सभ्य जीवन की सभे सुविधाएं प्राप्त थीं। इसके विपरीत ऋग्वेदिक आर्य छप्पर वाले कच्चे मकानों में रहने वाले लोग थे2

इस तरह का इतिहास उन विदेशी विशेषकर अंग्रेज इतिहासकारों के कथन के आधार पर लिख दिया गया है जिन्होंने भारतीयों के इतिहास और संस्कृति को बिगाड़ने के लिए मनघड़न्त तथा कपोलकल्पित लेख लिख डाले, जो असत्य हैं। वेद-शास्त्रों के आधार पर हमारे ऋषि-मुनि व प्रकाण्ड विद्वानों ने जो प्रमाणित इतिहास लिखे हैं जिसमें यह सिद्ध किया है कि आर्य लोग भारत के ही मूलनिवासी हैं, यहां से दूसरे देशों में गये और आदिसृष्टि से लेकर महाभारत तक सब पृथ्वी पर इनका चक्रवर्ती राज्य रहा और आदिसृष्टि से ही आर्यों के बसाये देश आर्यावर्त में सब प्रकार की विद्याएं, विज्ञान, कलाकौशल, भवननिर्माण और कृषिविज्ञान आदि प्रचलित हो चुके थे। जलपोतों और विमानों का भी आविष्कार हो चुका था। यह प्रमाणित और सत्य है। अतः भारत सरकार से मेरा नम्र निवेदन है कि ऊपरलिखित असत्य इतिहास के स्थान पर प्रमाणित व सत्य इतिहास विद्यार्थियों को पढ़ाया जाये।


1. भारत का इतिहास हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी पृ० 54.
2. भारत का इतिहास हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी अध्याय 3 भारत में सभ्यता का उदय पृ० 11-18.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-175


हमारे वेद-शास्त्रों के लेखों पर विदेशी ऐतिहासकों का मण्डन व खण्डन

अब कुछेक उन इतिहासकारों के उदाहरण, जो हमारे वेद-शास्त्रों के आधार पर लिखे गये लेखों को मानते हैं और जो खण्डन करते हैं तथा जिन्होंने हमारे भारतवर्ष के इतिहास का पतन किया है।

हमने प्रथम अध्याय में आर्यों का मूल निवासस्थान प्रकरण में, इनको बाहर से आये बताने वाले और भारतवर्ष के ही मूलनिवासी बतलाने वाले इतिहासकारों के लेख लिखे हैं। उनके अतिरिक्त दूसरे और भी इतिहासकारों के उदाहरण निम्न प्रकार से हैं -

1. सुप्रसिद्ध इतिहासकार इनफनिस्टन महोदय का (जो बम्बई के राज्यपाल भी रहे थे) कथन है कि ब्राह्मदिवस का जो समय आर्य लोग मानते हैं वह ज्योतिषशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार होने से सत्य है। हिन्दुओं की गणनानुसार ब्राह्मदिवस चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष का होता है1

2. आर्यों के विरोधी सुप्रसिद्ध विद्वान् मैक्समूलर साहब ने भी यह स्वीकार किया कि ऋग्वेद न केवल आर्यजाति के लिए अपितु संसार की सम्पूर्ण जातियों के साहित्य में सर्वप्रथम पुस्तक है2

3. चन्द्रनगर के प्रधान न्यायाधीश फ्रैंच विद्वान् लुई जैकोलियट ने संवत् 1926 में “भारत में बाइबिल” नामक एक ग्रंथ लिखा उसमें जैकालियट महाशय ने सिद्ध किया है कि संसार की सब प्रधान विचारधारायें आर्यविचार से निकली हैं। उसने भारत को “मनुष्यमात्र की दौला” लिखा - “प्राचीन भारतभूमि, मनुष्य जाति के जन्मस्थान (दोला) तेरी जय हो! क्या कभी ऐसा दिन भी आयेगा जब हम अपने पाश्चात्य देशों में तेरे अतीतकाल की सी उन्नति देखेंगे3।”

मैक्समूलर को यह पुस्तक बहुत बुरी लगी। उसने इसकी आलोचना में लिखा कि “जैकालियट अवश्य ब्राह्मणों के धोखे में आया है4।”

4. अध्यापक एच० एच० विल्सन जैसा पक्षपाती ईसाई लेखक विष्णुपुराण के अंग्रेजी अनुवाद की भूमिका में लिखता है - अर्थात् सम्प्रति सुदूर बिखरी हुई जातियों की बोलियों से संस्कृत भाषा के निकटस्थ सम्बन्ध, इन जातियों के समान उद्गम को सिद्ध करते हैं। इस सिद्धान्त को यूरोप और अमेरिका के ईसाई अध्यापक देर तक सह नहीं सके। उन्होंने भाषाविज्ञान की धारा को शीघ्र ही एक कल्पित दिशा की ओर मोड़ा5

5. जर्मन लेखक एल० गाईगर के लेख में इतना अंश सत्य है कि भारतीय इतिहास के ज्ञान के बिना मनुष्यमात्र के पुरातन धार्मिक विश्वास समझ में नहीं आ सकते6


1. हरयाणा के वीर यौधेय प्रथम खण्ड पृ० 22 लेखक श्री भगवानदेव आचार्य।
2. क्षत्रिय जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 10 लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री।
3, 4. भारत का वृहद् इतिहास अध्याय 3 पृ० 38 प्रथम भाग लेखक पं० भगवद्दत बी० ए०।
5. भारत का वृहद् इतिहास अध्याय 10 पृ० 205 लेखक पं० भगवद्दत बी० ए०।
6. भारत का वृहद् इतिहास अध्याय 10 पृ० 205 लेखक पं० भगवद्दत बी० ए०।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-176


6. अडोल्फ केगी ने इसी गाईगर मत की प्रतिध्वनि अपने मूल ग्रन्थ में की है। ईसाई लेखक इस विचारधारा को भी सह न सके। ऑक्सफोर्ड के बोडन-आसन्दी के उपाध्याय आर्थर-एनथनि-मैकडानल का लेख देखिए - इस असत्य कथन के पूर्ण खण्डन का यहां स्थान नहीं। परन्तु “वेदान्तान्तर्गत कई बातें, वेद से पूर्वकाल के स्रोतों से ली गई हैं”, यह लेख ईसाई पक्षपात की पराकाष्ठा है और यथार्थ इतिहास से अज्ञानता प्रकट करना है1

7. दाराशिकोह बादशाह ने भी यही निश्चय किया था कि जैसी पूरी विद्या संस्कृत में है वैसी किसी भाषा में नहीं। वे ऐसा उपनिषदों के भाषान्तर में लिखते हैं कि मैंने अरबी आदि बहुत से भाषायें पढ़ीं। परन्तु मेरे मन का सन्देह छूटकर आनन्द न हुआ। जब संस्कृत देखी और सुनी तब निःसन्देह होकर मुझको बड़ा आनन्द हुआ है2

8. “श्रीयन्त्र का गणितीय सूत्र मिला” - मास्को 10 जनवरी (वार्ता)। एक सोवियत वैज्ञानिक ने एक चित्र की गुत्थी सुलझाकर साबित कर दिया है कि भारतीय गणित-विद्या 3000 वर्ष पहले, आज से कहीं ज्यादा उन्नत थी। मास्को विश्वविद्यालय के डाक्टर ए० कुलाशेव ने ‘श्रीयन्त्र’ का अध्ययन किया। ‘श्रीयन्त्र’ तन्त्र-मन्त्र करने वाले इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने एक गणितीय फार्मूला इलेक्ट्रोनिक कम्प्यूटर में डाला तो उन्हें ‘श्रीयन्त्र’ की हूबहू प्रतिलिपि मिल गई। उन्होंने मास्को विश्वविद्यालय में प्रमुख सोवियत वैज्ञानिकों के सामने इसे दिखाया3

9. जोजेफ डेवी कनिंघम ने अपनी पुस्तक “सिक्खों का इतिहास” के पृष्ठ 20 पर लिखा है कि “भारतवर्ष का गणितविज्ञान तथा खगोलविद्या इतनी निपुण थी कि सूर्य व चन्द्रमा के मार्गों का यथार्थ ज्ञान था।”

भारतवर्ष के इतिहास का पतन

1. सायणाचार्य और पण्डित महीधरादि अल्पबुद्धि लोगों के झूठे व्याख्यानों को देखकर आजकल के आर्यावर्त और यूरोप देश के निवासी लोगों ने वेदों के असत्य अर्थ किए हैं जो ठीक नहीं हैं4

डाक्टर मैक्समूलर साहब ने अपने बनाये संस्कृत साहित्य ग्रन्थ में ऐसा लिखा है कि आर्य लोगों को क्रम से अर्थात् बहुत काल के पीछे ईश्वर का ज्ञान हुआ था और वेदों के प्राचीन होने में एक भी प्रमाण नहीं मिलता, किन्तु उनके नवीन होने में तो अनेक प्रमाण पाये जाते हैं। इसी तरह और भी लिखा है। यह प्रमाणों से सिद्ध किया गया है कि वेद सनातन उत्तम हैं सो मैक्समूलर साहब का कहना असत्य है5

पण्डित महीधर ने वेदमंत्रों के असत्य अर्थ किए हैं और उन्हीं का सत्य अर्थ ऋषि


1. भारतवर्ष का बृहद इतिहास अध्याय 10 पृ० 205 लेखक पं० भगवद्दत्त बी० ए०।
2. सत्यार्थप्रकाश 11वां समुल्लास पृ० 183.
3. जनसत्ता 11 जनवरी 1985 पृ० 6.
4, 5. स्वामी दयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्य्भूमिका, वेदविषय विचार प्रकरण को अधिक जानकारी के लिए देखो ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-177


दयानन्द जी ने किया है, उनके बहुत उदाहरण दिए हैं1

2. आर्यावर्त्तीय इतिहास के भ्रष्ट और नष्ट होने के कारणों का उल्लेख करते हुए स्वामी दयानन्द जी ने बताया - (क) हमारे देश के इतिहास में ऐसी गड़बड़ क्यो हुई और इसका क्या कारण है कि किसी स्थान अथवा लेख के दिन आदि का ठीक पता नहीं लगता है। इस विषय में जानना चाहिए कि मतलबी लोगों ने पुस्तकों में तारीखें छिपा दीं और जैनियों और मुसलमानों ने द्वेषभाव से आर्यों की इतिहास-विषयक मूल्यवान् सामग्री व ग्रन्थ जला दिए थे2। (ख) पूर्वकाल में भिन्न-भिन्न विद्यायें भारतखण्ड में वेदों के कारण प्रसिद्ध थीं। जैसे विमान-विद्या और अस्त्र-विद्या इत्यादि। इन विषयों की पुस्तक नष्ट होने से विद्यायें भी नष्ट हो गईं। मुसलमानों ने लकड़ी को जलाने की जगह पुस्तकों को जलाया। जैनियों ने भी ऐसा ही अनर्थ किया। सन् 1857 में जब दंगा फिसाद हुआ था, उस समय किसी एक यूरोपियन ने अमृतराव पेशवा के भारी पुस्तकालय में आग लगा दी थी3

3. अंग्रेजों ने कल्पित इतिहास लिखने आरम्भ किए। अंग्रेज लेखकों ने लिखना आरम्भ किया कि भारत के लोग इतिहासप्रिय नहीं थे। इसमें अंग्रेजों का एक उद्देश्य विशेष था। इस उद्देश्य को अपनाकर अधिकांश जर्मन और अंग्रेज लेखकों ने भारत का इतिहास लिखने का काम आरम्भ किया और उसमें अगणित निराधार कल्पनायें करने लगे। इन सारहीन कल्पनाओं से भारतीय इतिहास सर्वथा विकृत हो गया4

जर्मन लेखक अडोल्फ केगी लिखता है कि पुरातन संस्कृत वाङ्मय अर्थात् ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में इतिहास शब्द का अर्थ “लीजेण्ड” (कल्पित कथा) है। यह उनका भ्रममात्र है। इसी तरह ईसाई पक्षपाती मैकडानल और कीथ ने भी लिखा है।

केम्ब्रिज हिस्ट्री आफ इण्डिया के नाम से जो ग्रन्थ इंग्लैण्ड में लिखा गया है और जिसे वर्तमान पाश्चात्य पद्धति के लेखक वैज्ञानिक (Scientific) इतिहास कहते हैं, वह यथार्थ विज्ञान से कोसों दूर है5

4. संवत् 1890 में होरेस हेमन विलसन ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का अध्यापक था। उसने एक पुस्तक “हिन्दुओं की धार्मिक और दार्शनिक पद्धति” नाम की लिखी। उस पुस्तक में हिन्दू धार्मिक पद्धति का अतिश्रेष्ठ खण्डन है। ये व्याख्यान जॉन मूर के 200 पौंड के पारितोषिक के लिए छात्रों को सहायता देने के निमित्त लिखे गये थे6

5. संवत् 1858-1897 तक इयूजेन बर्नफ नाम का एक संस्कृताध्यापक फ्रांस में था। उसके शिष्य रूडल्फ रॉथ और मैक्समूलर दो जर्मन थे। रॉथ ने संवत् 1909 में निरुक्त ग्रन्थ मुद्रित किया। उसने लिखा है कि जो भाषाविज्ञान शास्त्र जर्मन अध्यापकों ने बनाया है उसके द्वारा वेदमन्त्रों का निरुक्त से अधिक अच्छा अर्थ किया जा सकता है। उसका लेख असत्य है। रॉथ का सहपाठी


1. स्वामी दयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, शंकासमाधानादि विषय प्रकरण।
2. उपदेशमंजरी दसवां प्रवचन पृ० 80.
3. उपदेशमंजरी पांचवां प्रवचन पृ० 31.
4,5. भारतवर्ष का बृहद् इतिहास प्रथम भाग द्वितीय अध्याय पृ० 31-33 लेखक पण्डित भगवद्दत्त बी० ए० ।
6. भारतवर्ष का बृहद् इतिहास प्रथम भाग तृतीय अध्याय पृ० 36-37 लेखक पण्डित भगवद्दत्त बी० ए० ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-178


मैक्समूलर लिखता है कि “वैदिक सूक्तों (मन्त्रों) की एक बड़ी संख्या अत्यन्त अबोध, जटिल, अधम और साधारण है।” आर्यधर्म और मनुष्यमात्र के परमपवित्र धर्मग्रन्थ के सम्बन्ध में ऐसा लेख कोई ईसाईमतपक्षपातान्ध अथवा ज्ञानशून्य नास्तिक व्यक्ति ही लिख सकता है1

मैक्समूलर के पत्र - उसके अनेक पत्रों का संग्रह छपा है2 - कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं -

(क) सन् 1886 ई० में एक पत्र में वह अपनी स्त्री को लिखता है कि “वेद का अनुवाद और मेरा (सायण भाष्य सहित ऋग्वेद का) यह संस्करण उत्तरकाल में भारत के भाग्य पर दूर तक प्रभाव डालेगा। यह उनके धर्म का मूल है और मैं निश्चय से अनुभव करता हूं कि उन्हें यह दिखाना है कि मूल कैसा है, गत तीन सहस्र वर्ष में उससे उपजने वाली सब बातों को उखाड़ने का एकमात्र उपाय है।”
(ख) एक पत्र में वह अपने पुत्र को लिखता है - “संसार की सब धर्मपुस्तकों में से नई प्रतिज्ञा (ईसा की बाइबिल) उत्कृष्ट (श्रेष्ठ) है। इसके पश्चात् कुरान को जो आचार की शिक्षा में नई प्रतिज्ञा का रूपानतर है, रखा जा सकता है। इसके पश्चात् पुरातन प्रतिज्ञा, दाक्षिणात्य बौद्धत्रिपिटक, वेद और अवेस्ता हैं।”
(ग) 16 दिसम्बर 1868 को भारत सचिव ड्यूक ऑफ आर्गाइल को वह एक पत्र में लिखता है - “भारत का प्राचीन धर्म प्रायः नष्ट है और यदि ईसाई धर्म उसका स्थान नहीं लेता तो यह किसका दोष होगा?”

6. अध्यापक अलबर्ट वैबर ने लिखा कि गीता और महाभारत के सिद्धान्तों पर ईसाई प्रभाव पड़ा है3

7. रॉथ, वैबर, मैक्समूलर, मैकडानल, कीथ और अमेरिकावासी अध्यापक हाप्किन्स प्रभृति पाश्चात्य लेखकों ने व्यास जी को Mythical (काल्पनिक) और उसके ग्रन्थ महाभारत को कल्पित कहानी माना4

8. स्वामी दयानन्द सरस्वती का बूह्लर, मोनियर, रूडल्फ हर्नलि और थोबी आदि यूरोपीय विद्वानों से साक्षात्कार हुआ था। स्वामी जी ने उनकी मनोभावना पहचान ली। शेष भारतीय अधिकांश संख्या में यही समझते थे कि ये लोग बहुत विद्वान्, निष्पक्ष और उदारभाव युक्त हैं। स्वामी जी ने इनकी और मैक्समूलर आदि पक्षपातियों की पोल खोल दी थी5

9. सन् 1835 ई० में लार्ड विलियम बैण्टिक के समय विख्यात लार्ड थामस बौबिगंटन मैकाले ने भारत में शिक्षा का आदर्श निर्धारित कर दिया। उसने कहा - भारत में एक ऐसी श्रेणी उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए जो रक्त और रंग में भारतीय हो परन्तु रुचियों,


1. भारतवर्ष का बृहद् इतिहास प्रथम भाग अध्याय 3, पृष्ठ 36-37. लेखक पण्डित भगवद्दत्त बी० ए० ।
2. Life and Letters of Frederich Maxmuller, Two Vols.
3,5. भारतवर्ष का बृहद् इतिहास प्रथम भाग अध्याय 3, पृ० 39-41 लेखक पण्डित भगवद्दत्त बी० ए० ।
4. भारतवर्ष का बृहद् इतिहास प्रथम भाग अध्याय 9, पृ० 197 लेखक पण्डित भगवद्दत्त बी० ए० ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-179


सम्मति, सदाचारों और बुद्धि में अंग्रेजी हो1

10. भारत के गवर्नर जनरल लार्ड बैण्टिक ने मैकाले की नीति के अनुसार भारत में शिक्षा का प्रचलन किया। अंग्रेज और जर्मन अध्यापक भारत में आने लगे। उनकी बताई विद्या वास्तविक विद्या मानी जाने लगी। जो कोई सज्जन भारतीय ढंग की बात कहता था, उसे तर्कविरुद्ध, विद्याविरुद्ध, इतिहासविरुद्ध, बुद्धिविरुद्ध, प्रमाणशून्य कहानी अथवा मिथ्या कथा कहा जाने लगा। इसमें सन्देह नहीं, मैकाले ने भारतीयता को नष्ट करने की जो कूटनीति बरती थी, वह प्रभावशालिनी सिद्ध हुई। आज भारत में अंग्रेजी शिक्षा-प्राप्त लोगों की एक श्रेणी है जो विचार और रुचि आदि में आमूलचूल अंग्रेजी है। उस श्रेणी में भारत के अनेक गणमान्य नेताओं की भी गणना हो सकती है2

इन थोड़े से और संक्षिप्त उदाहरणों से पाठक समझ गये होंगे कि आर्यावर्त्त के इतिहास का पतन कैसे हुआ। जब आर्यों के इतिहास का पतन हो गया तो साथ ही जाट वीरों के इतिहास का पतन भी हो गया क्योंकि ये क्षत्रिय आर्य नस्ल के हैं जैसा कि पिछले अध्याय में लिखकर सिद्ध किया गया है।

जाटों की उत्पत्ति और इनके मूल निवासस्थान के विषय में कुछ देशी-विदेशी इतिहासकारों ने असत्य लेख लिखे हैं और उनका खण्डन विद्वान् इतिहासकारों ने प्रमाण देकर किया है और वास्तविक और सत्य लेख लिखे हैं। इसका विवरण हमने अध्याय 2 में लिख दिया है। इस बारे में यहां पर थोड़ा सा लेख निम्न प्रकार से है -

  • 1. जाटों की उत्पत्ति के विषय में असत्य लेख लिखने वाले इतिहासकार - पं० अंगद शास्त्री, श्री चिन्तामणि विनायक वैद्य, हैरोडोटस, स्ट्राबो, कनिंघम, कर्नल जेम्स टॉड, ग्राउस, मेजर बिंगले, स्मिथ, इवेटसन, चौ० लहरीसिंह वकील मेरठ आदि हैं। (अध्याय 2, जाटवीरों की उत्पत्ति प्रकरण देखो।)
  • 2. नवीन हिन्दू धर्म के चलाने वाले पौराणिक ब्राह्मणों ने, बड़ी-बडी क्षत्रिय योद्धा जातियों को जिनमें जाट, गूजर, अहीर, मराठे आदि भी शामिल हैं, उनके सिद्धान्तों को स्वीकार न करने के कारण म्लेच्छ, यवन, शूद्र्, नास्तिक और पतित करार देकर, आर्य क्षत्रियों को बलहीन कर दिया।
  • 3. ब्राह्मणों के सेवक राजपूतों ने भी जाटों के साथ वही व्यवहार किया। राजपूतों के सहारे से उन पौराणिक ब्राह्मणों, भाटों और चारणों ने जाट, गूजर और अहीरों को क्षत्रिय न कहने और न मानने के काफी प्रचार और लेख लिख डाले। भाटों और चारणों की बहियों में यहां तक लिखवा दिया गया कि फलां राजपूत ने एक जाट की लड़की से विवाह कर लिया, जिस कारण राजपूत समाज ने उसे जाति से बाहर कर दिया, उससे जो लड़का हुआ उसके नाम से जाटों का फलां गोत्र चला। जाटों के काफी गोत्रों का निकास इसी प्रकार से उनकी बहियों में लिखा मिलता है जो कि मनगढंत, बेहूदा और असत्य है*। हम पहले लिख चुके हैं कि राजपूत नाम की जाति (संघ) छठी सदी में बनी और सातवीं सदी से पहले इनका नाम किसी इतिहास में

1,2. भारतवर्ष का बृहद् इतिहास प्रथम भाग अध्याय 3, पृष्ठ 62-63. लेखक पण्डित भगवद्दत्त बी० ए० ।
* जाट इतिहास पृ० 66 लेखक ठा० देशराज ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-180


नहीं आया तथा विदेशी आक्रमणकारी जैसे यूनान, शक, हूण, मुसलमा आदि शत्रुओं से टक्कर वीर जाटों ने पश्चिम भारतीय सीमा पर ली।

जाटों से तो राजपूत अवश्य हुये जो अब तक भी अपना गोत्र जाटों वाला मानते हैं, परन्तु राजपूतों की सन्तान जाट कहलाई यह असत्य है, सो न मानने योग्य बात है1

  • 4. इन पौराणिक ब्राह्मणों के मौखिक व लेखों और भाटों की बहियों (पोथी) के आधार पर कई एक विदेशी इतिहसकारों ने जाटों को शूद्र लिखा2
  • 5. इसी आधार पर ए० एच० बिंगले ने अपनी पुस्तक “जाट्स अहीर और गूजर” में जाटों के कई गोत्रों का निकास, राजपूत पुरुष का विवाह जाट लड़की से हुआ, उनकी सन्तान के नाम से हुआ लिखा है और लिखा है कि ये राजपूतों की औलाद हैं। जैसे 1. गठवाला (मलिक), जाखड़, 3. सांगवान, 4. मान, 5. दलाल, 6. नैन, 7. अहलावत, 8. बैनीवाल, 9. राठी, 10. धनखड़, 11. दहिया, 12. हुड्डा, 13. कादियाण, 14. देसवाल, 15. सहरावत आदि3। यह असत्य लेख है जिसके लिए कोई प्रमाण नहीं है। ऊपरलिखित गोत्रों (वंशों) की उत्पत्ति वैदिककाल से और कई एक की रामायण या महाभारत काल से है और इन वंशो का राज्य देश विदेशों में था, तब तक तो राजपूत जाति का नाम तक भी न था। पूरा ब्यौरा उचित स्थान पर दिया जायेगा। एक भी जाट गोत्र ऐसा नहीं है जो राजपूतों का वंशज हो। इसके ठोस प्रमाण दे दिये गये हैं। आशा है कि जाट-जगत् ऐसी बेहूदी और असत्य बातों पर विश्वास नहीं करेगा।
  • 6. श्रीनिवासाचार्य का लेख - एक वर्ग ऐसा है जो जाटों को उन्नत देखना नहीं चाहता, जो हजारों वर्षों से जाटों का शोषण करता रहा है। मैं जो कुछ जाटों के लिए कर रहा हूं इसासे भी वह मुझ पर अत्यन्त नाराज हैं। किन्तु मैं चाहता हूँ कि आप लोग इस कार्य को आगे बढ़ाते रहना4। पाठक समझ गये होंगे कि यह वर्ग कौन-सा है? पौराणिक !
  • 7. अंग्रेजों की धनराशि देकर इतिहास बदलवाने की नीति -
भारतीय संस्कृति के इतिहास लेखक पं० भगवद्दत की लेख - “सन् 1942-43 के आसपास मैं ग्रीष्म ऋतु में सोलन पर्वत पर वास करता था। एक दिन एक सज्जन मेरे पास आया और लगभग दो घण्टे वेदशास्त्र की बातें करके चला गया। वह जाटों आदि में प्रचार करता था। अगले दिन वह फिर आया यथापूर्व चला गया। वह फिर आया। मैंने उससे बार-बार आने का कारण पूछा। उसने उत्तर दिया कि पण्डित जी, आप इतिहास जानने वाले हो, आप एक ऐसा ग्रन्थ लिख दें, जिससे प्रमाणित हो जाये कि जाट, अहीर, गूजर और राजपूत ये हिन्दू जाति में से नहीं हैं किन्तु कहीं बाहर से आने वाली शक आदि जातियों के वंशज हैं। मैंने कहा कि ऐसा ग्रन्थ के० आर कानूनगो नामक लेखक ने कुछ वर्ष पहले प्रकाशित कराया है। वह बोला पण्डित जी आपको ही लिखना चाहिये। जब मैंने ऐसा करने से इन्कार कर दिया तो वह मुझे 25,000 रुपयों का चैक देने लगे, साथ ही कहा कि इससे अधिक धनराशि

1,2. अध्याय 2 में देखो, जाट क्षत्रिय वर्ण के हैं, प्रकरण ।
3. A.H. Bingley History, Caste and Culture Jats, Gujjars and Ahirs P. 26 to 28.
4. जाट इतिहास पृ० 6 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-181


और भी मिलेगी। ये रुपये अंग्रेजी सरकार की ओर से दिये जाते हैं। मैंने उत्तर दिया कि आप भ्रान्ति में हैं। आपका काम मेरे से सिद्ध नहीं हो सकता। आप किसी अन्य पुरुष के पास जायें1। यह थी अंग्रेजों की मिथ्या नीति।”

अंग्रेजों ने यह भी अनुभव किया कि जब तक वैदिक धर्म की जड़ों को खोखला नहीं किया जाएगा तब तक वे अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल नहीं होंगे। इसके लिए कर्नल बोडन नाम के व्यक्ति ने भारी धनराशि आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी को दी। मिस्टर बोडन के ट्रष्ट द्वारा संस्कृत के ग्रन्थों का अंग्रेजी अनुवाद भारतीयों को ईसाई बनाने में अपने देशवासियों को सहायता पहुंचाने के लिए हो रहा था। मोनियर विलियम्स का सारा परिश्रम हिन्दुत्व को नष्ट करके ईसाइयत की पताका फहराने के लिए था। संस्कृत के योरोपियन विद्वानों में लार्ड मैकाले द्वारा नियुक्त प्रोफेसर मैक्समूलर सर्वोपरि माने जाते हैं। उसने वेदों का अनुसंधान तथा अनुवाद कार्य जान बूझकर बड़े गलत ढंग से किया। उसका लक्ष्य भारत के प्राचीन धर्म को नष्ट करने का तथा भारतीयों को ईसाई बनाने का था। इस कार्य में प्रो० मैक्समूलर भारतीयों के लिये सबसे खतरनाक थे (आर्यों का आदिदेश, पृ० 9-11, लेखक स्वामी विद्यानन्द सरस्वती)।

वैदिककाल में जाट वंशों का निर्माण तथा राज्य

पिछले पृष्ठों पर लिख दिया गया है कि हमारे भारतवर्ष एवं जाटों के इतिहास का किस प्रकार से पतन किया गया। यही कारण है कि जाटों के इतिहास का आदिसृष्टि से अब तक का पूरा ब्यौरा नहीं मिल रहा है। फिर भी मैंने देशी-विदेशी इतिहासकारों की पुस्तकों व शास्त्रों का काफी अध्ययन किया है जिनसे जाट वीरों के राज्य के विषय में जानकारी प्राप्त हुई है। उन लेखों के आधार पर मैं लिखने का प्रयत्न करता हूँ।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने 22 अक्टूबर 1943 ई० को सिंगापुर आजाद हिन्द रेडियो से अपने भाषण में कहा था कि “Let us create history, let somebody else write it.” अर्थात् - “आओ, हम तो इतिहास का निर्माण करें, इतिहास लिखने का काम दूसरों के लिए छोड़ दें।” इसी तरह जाटों ने इतिहास का निर्माण किया है जिनके बहादुरी के कारनामों को सारा संसार जानता है, जिनके कुछ संक्षिप्त प्रमाण अध्याय 2 के अन्तिम पृष्ठों पर लिख दिये गये हैं। जाटों का देश-विदेश में जहां-जहां राज्य रहा, वहां का अलग-अलग अपना-अपना इतिहास तो इन्होंने लिखा था, जो इनके ईर्ष्यालुओं ने नष्ट कर दिया, परन्तु प्राचीनकाल की घटनाओं का इकट्ठा ग्रन्थ या इतिहास पुस्तक इन्होंने कोई नहीं लिखी। जाटों ने आदिसृष्टि से ही इतिहास निर्माण किया जो दूसरों ने ही लिखा। इनके इतिहास की सबसे अधिक जानकारी यूनान व अरब इतिहासकारों के लेखों से मिलती है। आदिसृष्टि से ही जाटवीरों के वंशों का देश-विदेशों में राज्य रहा है।

पार्वती जी के पूछने पर शिवजी महाराज बोले कि जट्ट (जाट) महाबली, अत्यन्त वीर्यवान् और पराक्रमी हैं। सम्पूर्ण क्षत्रियों में यही जाति सर्वप्रथम पृथ्वी पर शासक हुई । ये देवताओं के


1. चौ० कबूलसिंह मन्त्री सर्वखाप पंचायत, ग्रा० व डा० मुजफ्फरनगर, के घर रक्खे रिकार्ड से ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-182


समान दृढ़ प्रतिज्ञा वाले हैं। (देव संहिता श्लोक 15) ययातिपुत्र यदु और यदुवों के वंशज जाटों का इस भूमि पर एक अरब चौरानवें करोड़ वर्ष से शासन हैं (जाट इतिहास पृ० 14 - लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज)

वैदिक काल से जाट वंशों (संघों) का निर्माण व उनका राज्य निम्न प्रकार से है। ध्यान रहे कि ये वंश केवल जाटों के ही हैं। यदि किसी दूसरी जाति में भी पाये जाते हैं तो वे जाटों के वंशज हैं या इनसे निकले हुए हैं। ये जाट वंश (गोत्र) जाट गोत्रावली में लिखे हैं।

(क) चन्द्रवंशज जाट

1. अत्रि -

चन्द्रवंश में अत्रि नामक जो वंश प्रचलित है उसके मूलाधार ब्रह्मा जी के पुत्र अत्रि ऋषि माने जाते हैं। अत्रि जाट गोत्र, ब्राह्मणों के अत्रि गोत्र से अलग है क्योंकि महाभारत भीष्म पर्व नवां अध्याय श्लोक 68 में अत्रि वंश को शूद्र लिखा है। ब्राह्मण अपने गोत्र को शूद्र नहीं कह सकते1। एक शिलालेख मिला है जिसके लेख को पढकर कनिंघम ने लिखा है कि “अत्रि वंश (कुल) का शिवसेन था, जो पोथोवर का मण्डलेश्वर (Satrap of Pothower) था2।” यह अत्रि जाट गोत्र है। अत्रि वंश, शतपथ ब्राह्मण, मार्कण्डेय पुराण और महाभारत में भी इसको जाति (संघ) लिखा है। महाभारत में लिखा है कि अत्रि गोत्र का राजा इन्द्रदमन ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान देता था3। मध्यकाल में अलीगढ़ जिले के खडे़हा गांव से यह अत्रि जाटवंश लोकप्रसिद्ध हुआ। इसी गांव से चलकर इस वंश के लोग अलीगढ जिले की खैर और टप्पल तहसीलों में जाकर बस गये, जहां पर इनके 60 गांव हैं। इनमें घरबरा और हरजीगढ़ गांवों के जाट अति उन्नतिशील हैं। ये लोग खड़ेहा गांव से आकर इन गांवों में बसे, इसी कारण इनको खड़िया अत्रि कहते हैं।

2. बुधवार -

महाराजा चन्द्र (जिनसे चन्द्रवंश प्रचलित हुआ) के पुत्र महाराजा बुध के नाम पर यह जाटवंश चला। इस वंश का कोई राज्य का इतिहास नहीं मिलता। किन्तु इनके प्राचीन एवं कुलीन (अच्छा खानदान) होने को सभी ऐतिहासिक प्रमाणित करते हैं। इनमें प्रचलित विश्वास एवं रीति-नीति प्राचीन वैदिकधर्मियों के पूर्णतया अनुकूल है। बेबिलोनिया के शिलालेख पर इनका नाम बुदी लिखा है। इनको फारसवालों ने पूतिया कहा और धर्मपुस्तक बाईबिल में फूत लिखा है4। बुधवार वंश का नाम पुराणों एवं महाभारत सभापर्व और भीष्मपर्व में भी लिखा है।

सातवीं व आठवीं सदी में ये लोग सिन्ध और बलोचिस्तान में थे और वहां बोधी के नाम से कहे गये हैं। बुधवार गोत्र के जाट राजस्थान और पंजाब में भी हैं। इस वंश के जाट व खत्री बराबर की संख्या में हैं। बिजनौर (उ०प्र०) जिले में इस्माईलपुर, नारायण खेड़ी और रोहतक जिला (हरयाणा) के सुनारियां गांव में बुधवार जाटों की आधुनिक उन्नति उल्लेखनीय है। बुधवार गोत्र के जाटों का एक और भी गांव सुनारियां नाम का है जो कि पिपली के निकट जिला कुरुक्षेत्र (हरयाणा) में है।


1. जाट्स दी एनशन्ट रूलरज पृ० 24 लेखक बी० एस० दहिया ।
2. J.F. Fleet, Journal of Royal Asiatic Society, 1941 P. 103.
3. Jats the Ancient Rulers, P. 278, B.S. Dahiya; महाभारत भीष्मपर्व अध्याय 9 में अत्रिवंश का जनपद भारतवर्ष में था।
4. Genesis X 36.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-183


नोट - जब इस बुधवार वंश (गोत्र) का नाम बेबिलोनिया के शिलालेख पर है तथा हैरोडोटस (यूनानी इतिहासकार जो 480 ई० पू० हुआ) और फारस (ईरान) वालों ने, लिखा है तब साफ है कि इनका राज्य वहां पर था।

3. यादव वंश -

इस सुप्रसिद्ध प्राचीन वंश के प्रवर्तक महाराजा यदु थे जो स्वयं चन्द्रवंश में जन्मे थे। चन्द्र ने आचार्य बृहस्पति की पत्नी तारा को छीनकर अपनी पटरानी बना लिया जिससे बुध नामक पुत्र हुआ। जो कि देवों द्वारा चढाई करके तारा को बृहस्पति को दिलवा देने के बाद भी सम्राट् चन्द्र के ही पास रहा। इसी चन्द्र के नाम से ही चन्द्रवंश प्रचलित हुआ। बुध का विवाह मनु कन्या इला से हुआ। जिससे सूर्य और चन्द्रवंश की आपस में मैत्री हो गई। बुध का पुत्र पुरुरवा हुआ जिससे एलवंश की प्रसिद्धि हुई।

सम्राट् पुरुरवा को अपने नाना मनु का विशाल राज्य प्रतिष्ठानपुर (वर्तमान झूसी प्रयाग) मिला। पुरुरवा का विवाह सुन्दरी उर्वशी से हुआ जिससे छः पुत्र हुये। इनमें से आयु और अमावसु ने वंशवृद्धि की। ऐतिहासिकों के मतानुसार चीन, मंगोलिया, तातार देशों के बसाने में आयु ने विशेष सफलता प्राप्त की। आज भी ये तीनों देश ‘अय’ नामक आदि पुरुषा को ही अपना मूल पुरुषा मानते हैं। कर्नल टॉड ने इस बात की पुष्टि की है। उसने तो लिखा है कि ये तीनों देश अपने को चन्द्रवंशी क्षत्रिय बतलाते हैं। यह ‘अय’पुरुरवापुत्र ‘आयु’ही है1। आयु का विवाह स्वर्भानु उपनाम राहु की कन्या प्रभा से हुआ जिससे नहुष आदि पांच पुत्र हुए। नहुष महान् धर्मात्मा राजा हुए। देवताओं ने इन्हें इन्द्र अर्थात् राष्ट्रपति चुना। इनके यति, संयाति ययाति आदि छः पुत्र हुए। विशेष प्रतापवान् होने पर ययाति को राज्य मिला। इन्होंने वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा और अपने कुलगुरु शुक्राचार्य ब्राह्मण की कन्या देवयानी दोनों से विधिपूर्वक विवाह किया। वेदव्यास ने ययाति को सम्पूर्ण वेदों का विद्वान् और सामान्य योद्धा लिखा है। इनके ब्राह्मणी देवयानी से यदु, तुर्वसु और शर्मिष्ठा से द्रुह्यु, अनु, पुरु नामक पांच पुत्र हुए। (देखो ब्रह्मा की वंशावली, प्रथम अध्याय)।

चीनवाले अपने को चन्द्रवंशी मानते हैं। आयु को प्रथम राजा मानते हैं जिसे वे ‘यु’ या ‘अयु’ कहते हैं। वे इसकी उत्पत्ति इस तरह मानते हैं कि एक तारे (बुध) का समागम ‘यू’ की माता के साथ हो गया। इसी से ‘यू’ हुआ। ये बुध और इला ही थे। तातार लोग भी अपने को चन्द्रवंशी मानते हैं। तातार शब्द यों बना है - तातः = पिता तारको यस्य स ताततारः। जिस वंश का तातः (पिता) तारा हो वह वंश ताततार होता है। ताततार शब्द आगे चलकर तातार हो गया। इस प्रकार तातारों का अय, चीनियों का अयु या यू और पौराणिकों का आयु एक ही व्यक्ति है। इन तीनों का आदिपुरुष चन्द्रमा था और ये चन्द्रवंशी क्षत्रिय हैं, यह अच्छी तरह सिद्ध होता है2। जर्मन भी अपने को तातार मानते हैं और इसीलिए चन्द्रमा को अपना पूज्य मानते हैं3


1. क्षत्रिय जातियों का उत्थान पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 282 लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री। तथा जाट इतिहास पृ० 7-8 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज ।
2. जाट इतिहास पृ० 7-8 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज; वैदिक सम्पत्ति पृ० 426 लेखक स्व० पं० रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण; टॉड परिशिष्ट, अध्याय 2.
3. जाट इतिहास पृ० 8 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-184


चीनियों के आदिपुरुष के विषय में प्रसिद्ध चीनी विद्वान यांगत्साई ने सन् 1558 ई० में एक ग्रन्थ लिखा था। इस ग्रन्थ को सन् 1776 ई० में हूया नामी विद्वान् ने फिर सम्पादित किया। उसी पुस्तक का, पादरी क्लार्क ने अनुवाद किया है। उसमें लिखा है कि “अत्यन्त प्राचीन काल में भारत के मो० लो० ची० राज्य का आइ० यू० नामक राजकुमार यून्नन प्रान्त में आया। इसके पुत्र का नाम ती० मोगंगे था। इसके नौ पुत्र पैदा हुए। इन्हीं के सन्ततिविस्तार से समस्त चीनियों की वंशवृद्धि हुई है1।”

ययाति महाराज जम्बूद्वीप के सम्राट् थे। जम्बूद्वीप आज का एशिया समझो। यह मंगोलिया से सीरिया तक और साइबेरिया से भारतवर्ष शामिल करके था। इसके बीच के सब देश शामिल करके जम्बूद्वीप कहलाता था। कानपुर से तीन मील पर जाजपुर स्थान के किले का ध्वंसावशेष आज भी ‘ययाति के कोट’ नाम पर प्रसिद्ध है। राजस्थान में सांभर झील के पास एक ‘देवयानी’ नामक कुंवा है जिसमें शर्मिष्ठा ने वैरवश देवयानी को धकेल दिया था, जिसको ययाति ने बाहर निकाल लिया था2। इस प्रकार ययाति राज्य के चिह्न आज भी विद्यमान हैं।

महाराजा ययाति का पुत्र पुरु अपने पिता का सेवक व आज्ञाकारी था, इसी कारण ययाति ने पुरु को राज्य भार दिया। परन्तु शेष पुत्रों को भी राज्य से वंचित न रखा। वह बंटवारा इस प्रकार था -

1. यदु को दक्षिण का भाग (जिसमें हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरयाणा, राजस्थान, दिल्ली तथा इन प्रान्तों से लगा उत्तर प्रदेश, गुजरात एवं कच्छ हैं)।

2. तुर्वसु को पश्चिम का भाग (जिसमें आज पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, इराक, सऊदी अरब,यमन, इथियोपिया, केन्या, सूडान, मिश्र, लिबिया, अल्जीरिया, तुर्की, यूनान हैं)।

द्रुहयु को दक्षिण पूर्व का भाग दिया।

4. अनु को उत्तर का भाग (इसमें उत्तरदिग्वाची3 सभी देश हैं) दिया। आज के हिमालय पर्वत से लेकर उत्तर में चीन, मंगोलिया, रूस, साइबेरिया, उत्तरी ध्रुव आदि सभी इस में हैं।

5. पुरु को सम्राट् पद पर अभिषेक कर, बड़े भाइयों को उसके अधीन रखकर ययाति वन में चला गया4। यदु से यादव क्षत्रिय उत्पन्न हुए। तुर्वसु की सन्तान यवन कहलाई। द्रुहयु के पुत्र भोज नाम से प्रसिद्ध हुए। अनु से म्लेच्छ जातियां उत्पन्न हुईं। पुरु से पौरव वंश चला5

जब हम जाटों की प्राचीन निवास भूमि का वर्णन पढते हैं तो कुभा (काबुल) और कृमि (कुर्रम) नदी उसकी पच्छिमी सीमायें, तिब्बत की पर्वतमाला पूर्वी सीमा, जगजार्टिस और अक्सस नदी


1. वैदिक सम्पत्ति पृ० 426-27 लेखक स्व० पण्डित रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण ।
2. महाभारत आदिपर्व 78वां अध्याय, श्लोक 1-24.
3. ये वे देश हैं जो पाण्डव दिग्विजय में अर्जुन ने उत्तर दिशा के सभी देशों को जीत लिया था। इनका पूर्ण वर्णन महाभारत सभापर्व अध्याय 26-28 में देखो।
4. जाट इतिहास पृ० 14-15 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज ।
5. महाभारत आदिपर्व 85वां अध्याय श्लोक 34-35, इन पांच भाइयों की सन्तान शुद्ध क्षत्रिय आर्य थी जिनसे अनेक जाट गोत्र प्रचलित हुए । (लेखक)


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-185


उत्तरी सीमा और नर्मदा नदी दक्षिणी सीमा बनाती है। वास्तव में यह देश उन आर्यों का है जो चन्द्रवंशी अथवा यदु, द्रुहयु, तुर्वसु, कुरु और पुरु कहलाते थे। भगवान् श्रीकृष्ण के सिद्धान्तों को इनमें से प्रायः सभी ने अपना लिया था। अतः समय अनुसार वे सब जाट कहलाने लग गये। इन सभी खानदानों की पुराणों ने स्पष्ट और अस्पष्ट निन्दा ही की है। या तो इन्होंने आरम्भ से ही ब्राह्मणों के बड़प्पन को स्वीकार नहीं किया था या बौद्ध-काल में ये प्रायः सभा बौद्ध हो गये थे। वाह्लीक,तक्षक, कुशान, शिव, मल्ल, क्षुद्रक (शुद्रक), नव आदि सभी खानदान जिनका महाभारत और बौद्धकाल में नाम आता है वे इन्हीं यदु, द्रुहयु, कुरु और पुरुओं के उत्तराधिकारी (शाखायें) हैं1

सम्राट् ययातिपुत्र यदु और यादवों के वंशज जाटों का इस भूमि पर लगभग एक अरब चौरानवें करोड़ वर्ष से शासन है। यदु के वंशज कुछ समय तो यदु के नाम से प्रसिद्ध रहे थे, किन्तु भाषा में ‘य’ को ‘ज’ बोले जाने के कारण जदु-जद्दू-जट्टू-जाट कहलाये। कुछ लोगों ने अपने को ‘यायात’ (ययातेः पुत्राः यायाताः) कहना आरम्भ किया जो ‘जाजात’ दो समानाक्षरों का पास ही में सन्निवेश हो तो एक नष्ट हो जाता है। अतः जात और फिर जाट हुआ। तीसरी शताब्दी में इन यायातों का जापान पर अधिकार था (विश्वकोश नागरी प्र० खं० पृ० 467)। ये ययाति के वंशधर भारत में आदि क्षत्रिय हैं जो आज जाट कहे जाते हैं। भारतीय व्याकरण के अभाव में शुद्धाशुद्ध पर विचार न था। अतः यदोः को यदो ही उच्चारण सुनकर संस्कृत में स्त्रीलिंग के कारण उसे यहुदी कहना आरम्भ किया, जो फिर बदलकर लोकमानस में यहूदी हो गया। यहूदी जन्म से होता है, कर्म से नहीं। यह सिद्धान्त भी भारतीय धारा का है। ईसा स्वयं यहूदी था। वर्त्तमान ईसाई मत यहूदी धर्म का नवीन संस्करण मात्र है। बाइबिल अध्ययन से यह स्पष्ट है कि वह भारतीय संसकारों का अधूरा अनुवाद मात्र है।

अब यह सिद्ध हो गया कि जर्मनी, इंग्लैंण्ड, स्काटलैण्ड, नार्वे, स्वीडन, रूस, चेकोस्लोवाकिया आदि अर्थात् पूरा यूरोप और एशिया के मनुष्य ययाति के पौत्रों का परिवार है। जम्बूद्वीप, जो आज एशिया कहा जाता है, इसके शासक जाट थे2

इजरायल (जुडिया) यहूदियों का देश है। इसी में हजरत मूसा और हजरत ईसा जैसे जगत्प्रसिद्ध धर्माचार्य उत्पन्न हुए। बाइबिल में लिखा है कि पश्चिम में आने वालों की एक ही भाषा थी और वे सब पूर्व से ही आये हैं। इनके विषय में पोकाक नामी विद्वान् अपने इण्डिया इन ग्रीस नामी ग्रन्थ में लिखता है कि युडा (जुडा) जाति भारत की यदु अर्थात् यदुवंशीय क्षत्रिय जाति ही है। अतःएव यहूदियों के आर्य होने में कुछ भी सन्देह नहीं रह जाता। साथ ही यह भी सिद्ध हो जाता है कि वे भारत से ही जाकर वहां बसे हैं3

जापान में अभी तक आर्यजाति की एक शाखा मौजूद है, जिसकी अन्य शाखाओं से जापानियों की उत्पत्ति हुई है। उस मूलनिवासी जाति का नाम ऐन्यू है। इसको काकेशियन विभाग के अन्तर्गत समझा जाता है। ऐन्यू लोग अब तक प्राचीन ऋषियों के भेष में रहते हैं अर्थात् दाढी और केश नहीं निकालते। इसलिए इनको आजकल (Hairy Men) बालवाले लोग कहा जाता है। जापानी आर्य



1. जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खण्ड) पृ० 146-47 ले० ठा० देशराज।
2. जाट इतिहास पृ० 14-18 लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज ।
3. वैदिक सम्पत्ति पृ० 420 और 427 लेखक स्व० रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-186


क्षत्रिय ही हैं। जापानियों का ‘बुशिडो’अर्थात् क्षात्रधर्म अब तक प्राचीन क्षत्रियपन का स्मरण दिला रहा है। ऐन्यू लोगों का प्रस्तुत होना, जापान की स्त्रियों में भारतीयपन का होना और पुरुषों का क्षात्रधर्म आदि बातें एकस्वर से पुकार रही हैं कि वे आर्यवंशज ही हैं1

जाट ययाति-वंशज हैं। इसी कारण ययात-यात-जाट नाम का प्रयोग इस वंश के साथ प्रचलित रहा है। परन्तु ययातिवंश के स्थान पर चन्द्रवंशी क्षत्रिय ही बोला जाता रहा। बहुत से जाटगोत्र ययाति के पांच पुत्रों की प्रणाली से तथा सात वीरभद्र की सन्तान से उत्पन्न हुए हैं। समय के अनुसार एशिया और यूरोप में फैल गए थे और लाचारी में बहुत से अपने देश भारतवर्ष में लौट आए2

महाराजा ययाति के ज्येष्ठ पुत्र यदु से चन्द्रवंश की महत्ता और अस्तित्व से विशेष शोभावृद्धि हुई। इनका वंशविस्तार सभी भाइयों से विशेष हुआ। आपके नाम पर ही ‘यादव वंश’चला, जो जाटवंश है। यदु के प्रपौत्र हय (हैहय) से हैहय वंश चला जो ‘कल्चुरि’नाम से प्रख्यात हुआ। हैहयों में कार्तवीर्यार्जुन माहिष्मती नगरी का शासक हुआ। चेदिदेश और गुजरात पर इस वंश का शासन रहा। वर्तमान में इस वंश के व्यक्त्ति बहुत कम हैं।

यदु के पुत्र करोक्षत्री की शाखा में यदु की सातवीं पीढी में प्रथम चक्रवर्ती सम्राट् शशविन्दु हुए जिन्होंने विदर्भ देश पर शासन करते हुए अश्वमेध यज्ञ किया। इसकी पुत्री विन्दुमती का विवाह चक्रवर्ती सम्राट् मान्धाता से हुआ। इस सम्राट् ने अपने बड़े पुत्र पृथुश्रवा को ही सारा राज्य दे दिया। इस सम्राट् पृथुश्रवा के धर्म नामक पुत्र से सम्राट् उशना हुए। उसने 101 अश्वमेध यज्ञ किए। इस कारण उनको ‘याट’ की उपाधि मिली। कुछ ऐतिहासिक इस उशना याट से ही जाट जाति का प्रारम्भ मानते हैं जो कि अनेक वंशों से मिलकर बने हुए जट्ट संघ के लिए अयुक्तियुक्त मत है3

इस यादव वंश में बड़े योद्धा राजे-महाराजे हुए और कईयों के नाम से जाटवंश चले, जिनका उचित स्थान पर वर्णन किया जायेगा। श्रीकृष्ण महाराज इसी यादव वंश में हुए जिन्होंने कई क्षत्रिय संघों को मिलाकर जाट संघ बनाया। वे स्वयं जाट थे। भगवान् श्रीकृष्ण ने क्षत्रियों का एक जाति संघ बनाय जो जाट कहलाया4

भरतपुर नरेश श्रीकृष्ण महाराज के वंशज हैं जो जाटवंश के प्रसिद्ध जाट क्षत्रिय हैं।

यदुवंश के शाखागोत्र
1. वृष्णि 2. अन्धक 3. हाला 4. शिवस्कन्दे-सौकन्दे 5. डागुर-डीगराणा 6. खिरवार-खरे 7. बलहारा 8. सारन 9. सिनसिनवाल 10. छोंकर 11. सोगरवार 12. हांगा 13. घनिहार 14. भोज

महाराजा श्रीकृष्ण जी जाट थे (प्रमाण)

1.

महाराजा ययाति के पांच पुत्रों में से ज्येष्ठ पुत्र यदु से चन्द्रवंश की महत्ता और अस्तित्व में विशेष शोभावृद्धि हुई। यदु के नाम पर ही यादव वंश प्रचलित हुआ जो कि जाटवंश है।


1. वैदिक सम्पत्ति पृ० 420 और 427 लेखक स्वर्गीय पण्डित रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण।
2. जाट इतिहास अनुवाद अंग्रेजी, पृ० 5-6 लेखक रामसरूप जून ।
3. क्षत्रियों जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 283-84 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
4. पूरी जानकारी के लिए देखो द्वितीय अध्याय, (जाटवीरों की उत्पत्ति प्रकरण)


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-187


पं० लेखराम जी के अनुसार यदु से यादव, यादव से जादव, जादव से जाट शब्द संस्कृत व्याकरण के अनुसार बनता है (क्षत्रियों का इतिहास, लेखक श्री परमेश शर्मा तथा राजपालसिंह शास्त्री)। इसी यादव वंश में महाराज श्रीकृष्ण जी उत्पन्न हुए। (देखो यदु की वंशावली)

2.

कर्नल टॉड ने भी इस बात को माना है कि जाट यादव हैं। मि० नेशफील्ड और विल्सन साहब ने भी टॉड की राय को दाद दी है। मि० नेशफील्ड जो भारतीय जातीय शास्त्र के एक अद्वितीय ज्ञाता माने जाते हैं, लिखते हैं - “The word Jat is nothing more than the modern Hindi pronunciation of Yadu or Jadu, the tribe in which Krishna was born.”

अर्थात् जाट यदु या जदु के वर्तमान हिन्दी उच्चारण के सिवा कोई दूसरा शब्द नहीं है। यह वही जाति है जिसमें श्रीकृष्ण पैदा हुए थे।

3.

महाराज श्रीकृष्ण जी वृष्णि गोत्र के थे जो कि जाट गोत्र है। यदुवंश के शाखागोत्र - 1. वृष्णि 2. अन्धक 3. हाला 4. शिवस्कन्दे या सौकन्दे 5. डागुर या डीगराणा 6. खिरवार-[[खरे 7. बलहारा 8. सारन 9. सिनसिनवाल 10. छोंकर 11. सोगरवार 12. हागा 13. घनिहार 14. भोज। ये सब जाट गोत्र हैं जो आज भी विद्यामान हैं।

4.

श्रीकृष्ण जी व्रज से वहां के अन्धक, वृष्णि व भोज आदि जाटगोत्रों को साथ लेकर द्वारिका गये। वहां पहुंचकर कृष्णजी ने यदुवंश के दो कुलों - अन्धक और वृष्णि - का एक राजनैतिक संघ स्थापित किया, जिसका नाम “ज्ञाति संघ” कहलाया। ज्ञाति संघ के प्रत्येक सदस्य को ज्ञात नाम से बोला जाता है। इस संघ के सेनापति स्वयं श्रीकृष्ण जी थे। ज्ञाति व ज्ञात जात अथवा जाट नाम प्रसिद्ध हुआ। ज्ञाति संघ का वर्णन, महाभारत कृष्ण व नारद उवाच में आता है (देखो जाटवीरों की उत्पत्ति)।

5.

29 दिसम्बर 1031 ई० (पहली मुहर्रम 423 हिजरी) को पूरी होने वाली ‘तहकीकए हिन्द’ नामक पुस्तक में प्रसिद्ध अरबी यात्री अबुल रिहा मुहम्मदबिन अहमद अलबुरुनी ने भगवान् श्रीकृष्ण जी को जाट जाति का पूर्वज लिखा है। वह इन परिवारों यो यादव लिखता है। मुस्लिम राष्ट्रों में यह धारणा परम्परागत चलती रही कि जाट यादव संस्कृति के वंशज और युद्धवीर हैं1

6.

‘कारनामा राजपूत’ के लेखक नजमुल गनी ने लिखा है कि इस जाट कौम को भगवान् श्रीकृष्ण से पैदा होने का गुमान (गौरव) सच (ठीक) ही होता है2

7.

कर्नल जेम्स टॉड ने राजस्थान के इतिहास में लिखा है कि जमाना महाभारत में जो चक्र यादव कृष्ण का था, उससे जाट सवार ही मस्सलह (शस्त्रधारी) रहते थे3। (अर्थात् - महाभारत काल में श्रीकृष्ण जी के नेतृत्व में शस्त्रधारी जाट सैनिक थे।)

8.

बुलन्दशहर मेमायर्स के लेखक राजा लक्ष्मणसिंह ने लिखा है कि “यह प्रमाणित सत्य है कि


1, 2, 3. जाटों का उत्कर्ष पृ० 286 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-188


भरतपुर के जाट श्री कृष्णचन्द्र से गौरवान्वित यादवों के वंशज हैं। वर्तमान हिजहाईनेस भरतपुर, जैसलमेर, करौली, मैसूर और सिरमौर रियासतें अपने इतिहासों में श्रीकृष्ण जी को सम्बन्धित करती हैं”1

9.

लगभग सभी प्रारम्भिक जाटशासकों के वंश का वर्णन उल्लेख करते हुए समकालीन कवि उन्हें यदुवंशी बतलाते हैं - कवि सूदन, सुजान चरित्र पृ० 4, कवि सोमनाथ, सुजान विलास (पा० लि०) पृ० 133 व कवि उदयराम सुजान सँवत् में लिखते हैं -

तीन जाति जादवन की, अंधक विस्नी, भोज ।
तीन भाँति तेई भये, ते फिर तिनही षेज ॥
पूर्व जन्म ते जादव विस्नी, तेई प्रकटे आइ सिनसिनी2

10.

एक बार भारतेन्द्र महाराजा जवाहरसिंह को एक सलाहकार ने राय देते हुए कहा कि “महाराज! जयपुर नरेश भगवान् राम की सन्तान हैं जिन्होंने लंका के समुद्र पर पुल बांधा था। इसलिए उस पर चढाई न करिये।” उसके उत्तर में महाराज जवाहरसिंह ने कहा कि “हम भी तो भगवान् श्रीकृष्ण की सन्तान हैं जिन्होंने सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठाए रखा था।” यह भी सुना है कि शेखावाटी के राजपूतों ने ‘जय गोपीनाथ जी की’ करना इसलिए छोड़ दिया है कि कृष्ण जी तो जाटों का पूर्वज था। वे परस्पर ‘जय रघुनाथ जी की’ करते हैं3

11.

जाटों की परम्परा सिन्धु के पश्चिम क्षेत्र में अपना उद्गम और अपने को यदुवंशी मानते हैं4

12.

पांचवीं शताब्दी का एक अभिलेख जाटों को 36 राजकुलों में होने और उनके यदुवंशी होने के दावे को सुदृढ. करता है5

13.

भरतपुर नरेश श्रीकृष्ण जी के वंशज हैं और वे जाटवंश के प्रसिद्ध क्षत्रिय जाट हैं। “क्षत्रिय वंश” श्री कुंवर रिसालसिंह यादव प्रणीत, ग्रन्थ के पृष्ठ 11, 12, 13 पर कृष्ण जी की वंशावली लिखी है। उसमें श्रीकृष्ण से 89वीं पीढी में भरतपुर नरेश महाराजा बदनसिंह हैं। आपके समेत 13 भरतपुर नरेश हुए, उनमें अन्तिम महाराजा बृजिन्द्रसिंह, श्रीकृष्ण जी से 101 वीं पीढी में हुए। ये सब नरेश जाट हैं। (देखो प्रथम अध्याय, महाराज श्रीकृष्ण जी की वंशावली)।

14.

इसी तरह भरतपुर राज्य का इतिहास, लेखक चौबे राधारमण सिकत्तर ने, पृ० 1-3 पर भरतपुर राज्य के नरेशों को श्रीकृष्ण जी के वंशज और यदुवंशी क्षत्रिय लिखा है।

15.

‘महाराजा सूरजमल और उनका युग’ पृ० 15 पर लेखक डॉ प्रकाशचन्द्र चान्दावत ने लिखा है कि “भूतपूर्व भरतपुर राज्य के शासक मूलतः श्रीकृष्ण जी के वंशज एवं यादव (यदुवंशी) क्षत्रिय हैं।”


1. जाटों का उत्कर्ष पृ० 286, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
2. मोतीलाल गुप्त, ‘मत्स्य प्रदेश की हिन्दी साहित्य को देन’ पृ० 214.
3. जाट इतिहास पृ० 652, 732. लेखक ठा० देशराज।
4. वाल्टर हेमिल्टन, दि ईस्ट इण्डिया गजेटियर जिल्द 1, पृ० 233.
5. टॉड जिल्द 1, पृ० 127-128.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-189


16.

जाट इतिहास, लेखक ठा० देशराज ने पृ० 628 पर लिखा है कि “भरतपुर का राजवंश भी चन्द्रवंशी है किन्तु यह वृष्णि शाखा के यदुवंशी हैं जिसमें कि स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण थे।”

17.

जाटों का नवीन इतिहास, परिशिष्ट 2 और 3 पर लेखक यू० एन० शर्मा ने श्रीकृष्ण जी की 64वीं पीढी में सिन्धुपाल से लेकर भरतपुर नरेश महाराजा सवाई बृजेन्द्रसिंह 1929-1948 ई०) तक सबको यदुवंशी लिखा है, जो कि जाट जाति के नरेश हैं। (इस लेखक ने श्रीकृष्ण से सिन्धुपाल तक के नाम नहीं लिखे हैं, जो कि सभी यदुवंशी जाट हैं)।

18.

श्रीकृष्ण जी जाट कुल में पैदा हुए थे। इस बात की प्रामाणिकता को अब से लगभग 950 वर्ष पूर्व विष्णु पुराण के आधार पर अलबुरुनी ने अपनी “भारतयात्रा सम्बन्धी पुस्तक” में स्वीकार किया है1। योगिराज महाराज श्रीकृष्ण जी ने जट या जाट संघ का निर्माण किया था जिसका कि अवशेष चिह्न वर्तमान जाट जाति है2

19.

बिड़ला मन्दिर दिल्ली में महाराजा सूरजमल भरतपुर नरेश का एक विशाल स्मारक (मूर्ति) स्थापित है। उस पर लिखा है कि “आर्य हिन्दू धर्मरक्षक यादववंशी जाटवीर भरतपुर के महाराजा सूरजमल जिनकी वीरवाहिनी जाट सेना ने मुग़लों के लालकिले (आगरा) पर विजय प्राप्त की।” इसी स्मारक के निकट इन्हीं के दूसरे स्मारक के शिलालेख पर लिखा है कि “यादववंशी महाराज सूरजमल भरतपुर जिनकी वीरवाहिनी जाट सेना ने आगरे के प्रसिद्ध शाहजहां के कोट को अधिकार में कर लिया था।”

20.

महाभारत में श्रीकृष्ण जी को कई स्थानों पर वृष्णिवंशी लिखा है जो कि जाटगोत्र (वंश) है -

(क) अश्वत्थामा यह जान गया था कि वृष्णि वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन की विजय निश्चित है (महाभारत कर्णपर्व, अध्याय 17, श्लोक 23)।
(ख) युधिष्ठिर ने भीमसेन से कहा - भीम! देखो यह वृष्णि वंश के प्रमुख वीर श्रीकृष्ण ने बड़े जोर से शंख बजाया है (महाभारत द्रोणपर्व, अध्याय 127, श्लोक 21-22)।
(ग) वृष्णिवंशियों में दो ही महारथी युद्ध के लिए विख्यात हैं। एक तो महाबाहु प्रद्युम्न (श्रीकृष्ण के पुत्र) और दूसरा सात्यकि (द्रोणपर्व, अध्याय 156 श्लोक 4)।
(घ) शल्य ने कर्ण से कहा - महाबाहु ! तुम अर्जुन से प्रसन्न रहने वाले वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण का भी सामना करो (कर्णपर्व अध्याय 79, श्लोक 48)।
(ङ) वृष्णिवंशी बलराम जी (कृष्ण जी के भाई) ने वहां ब्राह्मणों को बहुत धन का दान किया। इसके बाद वे रुषंगु मुनि के आश्रम पर गये। (शल्यपर्व, अध्याय 39 श्लोक 24)।

इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि महाराज श्रीकृष्ण जी जाट थे।

तोमर

4. तोमर

इस सुप्रसिद्ध वंश के आदिपुरुष महाराजा ययाति के पुत्र यदु के भाई तुर्वसु थे। इनको अपने पिता की ओर से भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रदेशों का शासन मिला था। इन्होंने हिन्दुकुश से लगाकर कैस्पियन सागर और जगजार्टिस एवं तरिम नदी तक के प्रदेश पर राज्य स्थापित


1, 2. जाट इतिहास पृ० 5, 8 सम्पादक निरंजनसिंह चौधरी।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-190


किया। इनके नाम पर ही इनके शासित प्रांत का नाम तुर्वसस्वान - तुर्कस्थान, तुर्किस्तान तथा तुर्की पड़ा। महाराजा तुर्वसु के साथ गई विशाल सेना (जो शुद्ध आर्य चन्द्रवंशियों का दल था) वहां बस गई। इन लोगों के आर्यन रूप-रंग के सौन्दर्य के कारण तुर्वस शब्द का अपभ्रंश तुर्क वहां की भाषा में सुन्दर के लिए प्रयुक्त हुआ। देश के नाम पर भी तुर्की निवासी तुर्क प्रसिद्ध हुए। तुर्वस-तर्वस-तंवर शब्द भी भाषा के सरलता की ओर बढ़्ने के नियमानुसार ही प्रचलित हुआ। यह तंवर शब्द तुर्वस की उस सन्तति के लिए प्रयुक्त हुआ जो कि भारत में निवास करती रही अथवा तुर्कस्थान से लौटकर यहां बसी। यह तंवर जाटवंश है और जो तंवर राजपूतों या किसी अन्य जातियों में हैं तो वे तंवर जाटवंश से ही निकले हैं। इस वंश की महत्ता का प्रत्येक ऐतिहासिक ने आदर करते हुए मनोयोगपूर्वक वर्णन किया है। ले लोग प्रायः गौरवर्ण के सुन्दर गठनवाले होते हैं। इतिहास इनकी वीरता की साक्षियों से भरे पड़े हैं। रघुवंशी, प्रतिहार जब कन्नौज पर शासन करते थे, उस समय दिल्ली से कुरुक्षेत्र तक के प्रदेश पर तंवरवंशियों का एकाधिकार था। टॉड साहब ने ततकालीन तंवरों को कन्नौजिये प्रतिहारों का सामन्त लिखा है। शेखावाटी के हर्षनाथ मन्दिर के शिलालेख पर लिखा है कि “सं० 1030 (973 ईस्वी) में, एक रघुवंशी नरेश चन्दनराज ने विद्यमान राजा रुद्रेन तंवर का वध किया।” उक्त शिलालेख का वर्णन ‘एपिग्राफिका इण्डिया’ पुस्तक के पृष्ठ 121 पर किया है। नं० 2 शिलालेख इस बात का सूचक है कि उपरोक्त चन्दनराज के पुत्र सिंहराज ने तंवर नरेश सलवण का वध किया। इन्द्रप्रस्थ से अलग वर्तमान महरौली नामक स्थान पर 808 संवत् में दिल्ली नगरी की स्थापना का इनके गौरव में वृद्धि करने वाला एक शिलालेख दिल्ली म्यूजियम (इण्डियन ऐन्टीक्वेटी पृष्ठ 218) में है -

देशोऽस्ति हरयाणाख्यः पृथिव्यां स्वर्गसन्निभः।
ढिल्लिकाख्या पुरी तत्र तोमरैरस्ति निर्मिता ॥

जिसमें तंवरों द्वारा दिल्ली बसाने का स्पष्ट उल्लेख है।

दिल्ली संस्थापक महाराजा अनंगपाल तंवरवंशी ही थे, जिन्होंने कुतुबमीनार के पास विद्यमान लोहे की कीली को विष्णुपद पहाडी से उठवाकर गड़वाया था1

दिल्ली की स्थापना के विषय में दूसरा लेख - राजा भर्तृहरि का भाई विक्रमादित्य (विक्रम) मल्ल गोत्र का जाट दिल्ली का गवर्नर एक दिल्लू नाम का जाट था जो इन्द्रप्रस्थ पर शासन करता था। वह ढिल्लों गोत्र का जाट था। उसी के नाम पर इस स्थान को दिल्ली कहने लगे2। यह सम्राट् विक्रमादित्य जाट (मल्ल या मालव गोत्र) था। उचित स्थान पर इनका वर्णन किया जाएगा। दिल्लू से दिल्ली नाम पड़ना ही उचित लगता है (लेखक)। चौथी शताब्दी ई० पू० में ढिल्ल या दहला, ढिल्लों गोत्र के नाम पर देहली-दिल्ली नाम पड़ा। (देखो पंचम अध्याय डिल्लों जाटों के नाम पर देहली प्रकरण)।

महाराजा अनंगपाल तंवर की पुत्री कमला का विवाह चौहान राजा सोमेश्वर अजमेर नरेश


1. क्षत्रिय जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 297-298 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
2. चौ० कबूलसिंह मन्त्री सर्वखाप पंचायत गांव व डा० शोरम जि० मुजफ्फरनगर (उ० प्र०) के घर पर सुरक्षित पुराने लेख प्रमाण से।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-191


से हुआ था, जिससे कि सुप्रसिद्ध पृथ्वीराज चौहान का जन्म हुआ। अनंगपाल तंवर के निःसन्तान रहने से उसने अपने धेवते पृथ्वीराज चौहान को ही दिल्ली का राज्य दे दिया। इस तरह से दिल्ले पर से तंवरों का शासन समाप्त हो गया।

सन् 1375 ई० में एक तंवरवंशी वीरसिंह जाट का दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक की सेवा में रहते हुए भिण्ड (ग्वालियर) पर भी अधिकर कर लेना पाया जाता है। वहां पर आज 200 गांव तोमरों के बसे हुए हैं। विक्रमादित्य तंवर जाट का अपने तीन पुत्र शालवाहन, भवानी, परताप सहित महाराणा प्रताप के पक्ष में वीरभूमि हल्दीघाटी के घोर युद्ध में लड़ने का उल्लेख मिलता है।

वर्तमानकाल में तंवरगोत्र जाट और राजपूत दोनों में मिलता है। जयपुर के पाटन, दौसा, तंवरावटी और गाजियाबाद के समीप 82 गांव राजपूत तंवरों के बसे हुए हैं। जाट तंवर देहली के चारों ओर मेरठ, मुरादाबाद, बिजनौर, अलीगढ़ में बसे हुए हैं। हुसेनपुर, छाचरी, सराय, उमरपुर, श्यामपुर, हिसामपुर, मुस्तफाबाद, टांडा, इमलिया, चूखेड़ी, भवानीपुर, जटपुरा, पीपलसाना, हाजीपुर, ध्हनसीनी, सिकन्दरपुर, इस्माईलपुर, खलीलपुर, मथुरा में महराना और फालसा गांव तंवर जाटों के हैं।

इस तंवरवंश की बड़ी-बड़ी शाखायें हैं जैसे - 1. ठेनुवा 2. चाबुक-चोपोत्कट-चावड़ा, 3. रावत, 4. सहरावत 5. राव या सराव 6. सलकलान, 7. जंघारा, 8. भिंण्डतंवर 9. आन्तल 10. जेसवाल, 11. गढ़वाल1। इसका वर्णन अध्याय जाट गोत्रावली में किया जायेगा।

5. पुरु-पौरव -

सम्राट् ययाति के आज्ञाकारी उत्तराधिकारी लघुपुत्र पुरु से ही इस जाटवंश का प्रचलन हुआ। महाभारत आदिपर्व, अध्याय 85वां, श्लोक 35, के लेख अनुसार -

पूरोस्तु पौरवो वंशो यत्र जातोसि पार्थिव ।
इदं वर्षसहस्राणि राज्यं कारयितुं वशी ॥35॥

पुरु से पौरववंश चला है। इस चन्द्रवंशी पुरुवंश में बड़े-बड़े महान् शक्तिशाली सम्राट् हुए जैसे - वीरभद्र, दुष्यन्त, चक्रवर्ती भरत (सम्राट चक्रवर्ती भरत के नाम पर आर्यावर्त देश का नाम भारतवर्ष पड़ा), हस्ती (जिसने हस्तिनापुर नगर बसाया), कुरु (जिसने धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र स्थापित किया), शान्तनु, भीष्म, कौरव पाण्डव आदि। इसी पुरुवंश की राजधानी हरद्वार, हस्तिनापुर, इन्द्रप्रस्थ तथा देहली रही।

इसी पुरुवंश में 326 ईस्वी पूर्व जाट राजा पोरस अत्यधिक प्रसिद्ध सम्राट् हुआ। इनका राज्य जेहलम और चनाव नदियों के बीच के क्षेत्र पर था। “परन्तु इनके अधीन अन्य 600 राज्य थे तथा इन्होंने अपना राजदूत कई वर्ष ईस्वी पूर्व रोम (इटली) के राजा अगस्तटस (Augustus) के पास भेजा था।” (यूनानी प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्ट्रेबो का यह लेख है। (Strabo, Geography bk, xv, Ch. 1, P 73)। स्ट्रेबो का यह लेख ठीक ही प्रतीत होता है क्योंकि सम्राट् पोरस के समय भारत व आज के अरब देशों पर एक सम्राट् न था। परन्तु छोटे-छोटे क्षेत्रों पर अलग-अलग राजा राज करते थे। इनमें अधिकतर जाट राज्य थे, जिनका उचित स्थान पर वर्णन किया जायेगा। सम्राट् पोरस उन राजाओं से अधिक शक्तिशाली था।


1. आधार पुस्तक; जाटों का उत्कर्ष पृ० 297-299 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-192


यूनानी शक्तिशाली सम्राट सिकन्दर ने 326 ई० पूर्व भारतवर्ष पर आक्रमण किया। सिकन्दर की सेना ने रात्रि में जेहलम नदी पार कर ली। जब पोरस को यह समाचार मिला तो अपनी सेना से यूनानी सेना के साथ युद्ध शुरु कर दिया। दोनों के बीच घोर युद्ध हुआ। सिकन्दर के साथ यूनानी सेना तथा कई हजार जाट सैनिक थे, जिनको अपने साथ सीथिया तथा सोग्डियाना से लाया था, जहां पर इन जाटों का राज्य था। पोरस की जाट सेना ने सिकन्दर की सेना के दांत खट्टे कर दिए।

पोरस की हार लिखने वालों का खण्डन करते हुए “एनेबेसिस् ऑफ अलेक्जेण्डर” पुस्तक का लेखक, पांचवें खण्ड के 18वें अध्याय में लिखता है कि “इस युद्ध में पूरी विजय किसी की नहीं हुई। सिकन्दर थककर विश्राम करने चला गया। उसने पोरस को बुलाने के लिए एक दूत भेजा। पोरस निर्भय होकर सिकन्दर के स्थान पर ही मिला और सम्मानपूर्वक संधि हो गई।” सिकन्दर अत्यन्त उच्चाकांक्षी था सही किन्तु इस साढे-छः फुट ऊँचे पोरस जैसा कर्मठ और शूरवीर न था। सिकन्दर उसकी इस विशेषता से परिचित था, उसी से प्रेरित होकर उसने भिम्बर व राजौरी (कश्मीर में) पोरस को देकर अपनी मैत्री स्थिर कर ली। पोरस का अपना राज्य तो स्वाधीन था ही। अतः पोरस की पराजय की घटना नितांत कल्पित और अत्युक्ति मात्र है1

सिकन्दर चनाब नदी पार के छोटे पुरु राज्य में पहुंचा। यह बड़े पुरु का (पोरस का) रिश्तेदार था। इसके अतिरिक्त रावी के साथ एक लड़ाका जाति अगलासाई के नाम से प्रसिद्ध थी, इनको सिकन्दर ने जीत लिया। छोटे पुरु का राज्य भी सिकन्दर ने बड़े पुरु को दे दिया। रावी व व्यास के नीचे वाले क्षेत्र में कठ गोत्र के जाटों का अधिकार था। इनका यूनानी सेना से युद्ध हुआ। इन जाट वीरों ने यूनानी सेना को मुंहतोड़ जवाब दिया और आगे बढ़ने से रोक दिया। सिकन्दर ने पोरस से 5000 सैनिक मंगवाये। तब बड़ी कठिनाई के व्यास नदी तक पहुंचा। इससे आगे यूनानी सेना ने बढने से इन्कार कर दिया। इसका बड़ा कारण यह था - व्यास के आगे यौधेय गोत्र के जाटों का राज्य था। उनका शक्तिशाली यौधेय गणराज्य एक विशाल प्रदेश पर था। पूर्व में सहारनपुर से लेकर पश्चिम में बहावलपुर तक और उत्तर-पश्चिम में लुधियाना से लेकर दक्षिण-पूर्व में दिल्ली-आगरा तक उनका राज्य फैला हुआ था। ये लोग अत्यन्त वीर और युद्धप्रिय थे। इनकी वीरता और साधनों के विषय में सुनकर ही यूनानी सैनिकों की हिम्मत टूट गई और उन्होंने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया। ऐसी परिस्थिति में सिकन्दर को व्यास नदी से ही वापिस लौटना पड़ा। वापसी में सिकन्दर की सेना का मद्र, मालव, क्षुद्रक और शिव गोत्र के जाटों ने बड़ी वीरता से मुकाबला किया और सिकन्दर को घायल कर दिया। 323 ई० पू० सिकन्दर बिलोचिस्तान होता हुआ बैबीलोन पहुंचा, जहां पर 33 वर्ष की आयु में उसका देहान्त हो गया2

सिकन्दर की सेना का यूनान से चलकर भारतवर्ष पर आक्रमण और उसकी वापसी तक, जहां-जहां जाट वीरों ने उससे युद्ध तथा साथ दिया, का विस्तार से वर्णन अगले अध्याय में किया जाएगा।


1. क्षत्रिय जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 309 लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री।
2. भारत का इतिहास पृ० 47, हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-193


सम्राट् पुरु (पोरस) के राजवंश का शासन 140 वर्ष तक रहा1। धौलपुर जाट राजवंश भी पुरुवंशज था। राजा वीरभद्र पुरुवंशज थे। उनके पुत्र-पौत्रों से कई जाट गोत्र चले। (देखो वंशावली प्रथम अध्याय)। इस पुरुवंश के जाट पुरुवाल, पोरसवाल, फ़लसवाल पौडिया भी कहलाते हैं। पुरु-पोरव-पोरस जाट गोत्र एक ही है2। पुरुगोत्र (वंश) के जाट आजकल उत्तरप्रदेश, हरयाणा, पंजाब तथा देहली में हैं परन्तु इनकी संख्या कम है। फलसवाल जाट गांव भदानी जिला रोहतक और पहाड़ीधीरज देहली में हैं।

6. नव या नौवार -

‘मथुरा मेमायर्स’ के लेखक ग्राउस साहब ने नव लोगों का वर्णन इस प्रकार किया है - चन्द्रवंशी सम्राट् ययाति के पुत्र अनु के वंश में अनु से नौवीं पीढ़ी में राजा उशीनर हुए। उनकी पांच रानियां थीं - 1. नृगा 2. कृमि 3. नवा 4. दर्व 5. दृषद्वती। इनके एक-एक पुत्र हुआ। उनके नाम नृग, कृमि, नव, सुव्रत और शिवि थे (देखो वंशावली अनु का वंश)। नव ने नवराष्ट्र पर राज किया। कृमि ने कुमिल्लापुरी और शिवि ने शिवव्यास पर राज किया और नृग ने यौधेयों पर राज किया । (नृग के पुत्र यौधेय से यौधेयसंघ बना जो जाट गोत्र है)।

पाणिनि ने उशीनरों को पंजाब के पास रहते थे, लिखा है। ऐतरेय ब्राह्मण ने उन्हें कुरु, पांचालों में शामिल किया है। उशीनर की पांचवीं रानी दृषद्वती के नाम पर दृषद्वती नदी का नाम हुआ, जो महाभारत में कुरुक्षेत्र की दक्षिणी सीमा बताई गई है। आजकल यह नदी लुप्त है। नव ने अपने नाम से एक जनपद नवराष्ट्र के नाम से स्थापित किया और नव की वंशपरम्परा का नाम ‘नव’ प्रचलित हुआ। यह जाट गोत्र है जो राजा नव के नाम से चला।

नवराष्ट्र, जिसका राजा नव था, वह गुड़गांव व मथुरा के समीप रहा होगा और उसकी राजधानी यही रही होगी जो अब नोह (नूह) कहलाती है। (मथुरा मेमायर्स पृ० 320-322)। इस ‘नोह’ को ‘नूह’ भी कहते हैं। महाभारतकाल के पश्चात् पश्चिमोत्तर भारत के खोतानप्रदेश पर भी नव लोगों ने शासन स्थिर किया था। वहां पर भी अभी तक नूह झील है जिसे नव लोगों ने ही खुदवाया था। सन् ईस्वी के प्रारम्भिक काल में ये लोग अपनी पितृ-भूमि वापिस आ गये और जलेसर के पास बस्तियां आबाद कीं। वहां से उठकर वर्तमान ‘नोह’ में एक झील खोदी और वहां पर दुर्ग निर्माण किया। स्वतंत्रता-युद्ध सन् 1857 तक किसी न किसी रूप में ये वहां के शासक रहे हैं। मि० ग्राउस साहब के लेखानुसार 17वीं शताब्दी में भी आगरा-मथुरा के अधिक भाग पर नव क्षत्रियों का ही शासन था। बीच में ये नव, नौवार-नौहवार नाम से भी प्रसिद्ध हुए। बुलन्दशहर में भट्टापारसोल एक गांव, गुड़गांव जिले में दो गांव, आगरा में 98 गांव और गुड़गांव जिले की नूह तहसील के समीप 98 गांव हैं जो इस वंश की विशाल जनसंख्या का परिचय देते हैं। शिवि लोगों का प्रजातंत्र काफी प्रसिद्ध था। उनका पूरा विवरण आगे लिखा जायेगा।

7. कृमि -

मि० ग्राउस ने नव लोगों के साथ कृमि लोगों का भी जिक्र किया है। यह जाट गोत्र है। कर्नल टॉड ने टालेमी के हवाले से लिखा है कि स्कन्धनाभ और जटलैंड के शासन करने वाले जाटों की छः शाखाओं में किम्ब्री, सुरावी और कट्टी अधिक प्रसिद्ध हैं। ये कृमि ही किम्ब्री हैं।


1. मसूदी की लिखित पुस्तक ‘गोल्डन मीडोज’, का संकेत देकर, बी० एस० दहिया ने जाट्स दी एन्शन्ट रूलर्स पृ० 315 में लिखा है।
2. पोरव वंश के शाखा गोत्र - 1. पंवार 2. जगदेव पंवार 3. लोहचब पंवार।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-194


कृमि आजकल किरम कहलाते हैं। इस जाट गोत्र के लोग उत्तरप्रदेश में पाये जाते हैं। कृमि जाटों के नाम पर अफगानिस्तान में कुर्रम जिला है।

8. दर्व -

दर्व लोगों का भी कृमि लोगों की भांति महाभारत में वर्णन है। आजकल दर्व गोत्र के जाट दावर और दारावर कहलाते हैं।

9. भद्रक -

महाभारतकालीन जनपदों में भद्रक लोगों का भी वर्णन आता है। ये जाटवंश अवश्य ही जांगल देश के भादरा नगर के क्षेत्र में रहे होंगे और निश्चित ही भादरा इनकी राजधानी रही होगी। भादरा से जोधपुर और अजमेर की ओर इनका बढ़ना पाया जाता है। ये लोग शान्तिप्रिय पाये जाते हैं और अब भादू और कहीं-कहीं भादा कहलाते हैं।

10. शिवि -

चन्द्रवंशी सम्राट् उशीनर के पुत्र शिवि थे। प्रसिद्ध दानी महाराज शिवि की कथाओं से सारी हिन्दू जाति परिचित है। इसी सम्राट् से शिविवंश प्रचलित हुआ जोकि जाटवंश (गोत्र) है1। पेशावर के उत्तर उद्यान नामक स्थान में इनका राज्य था। शेरकोट झंग में इनके द्वारा बसाया शिविनगर आज भी विद्यमान है। इस शिविवंश का वर्णन रामायण में है। महाभारतकाल में युधिष्ठिर ने स्वयंवर रीति से शिवि नरेश गोवासन की कन्या देवकी से विवाह किया था, जिससे एक पुत्र जिसका नाम यौधेय था, उत्पन्न किया (महाभारत आदिपर्व 95वां अध्याय)। यही राजा गोवासन पूर्व प्रतिज्ञाबद्ध होने से दुर्योधन की ओर से महाभारत युद्ध में शामिल हुआ था। द्रोणपर्व अध्याय 95, श्लोक 38 में लिखा है कि इस राजा गोवासन के अतिरिक्त पांचों पांडवों के साथ द्रोपदी को काम्यक वन में जयद्रथ और शिविवंशी राजा कोटिकाश्य ने भी देखा था। वनपर्व (267-5) में इस कोटिकाश्य को शैव्य सुरथ का पुत्र लिखा है। द्रोणपर्व (22-12) में युद्धलिप्त शैव्य चित्ररथ का वर्णन है। यह शैव्यवंश या शिविवंश एक ही है। एक शिविवंश राजा को द्रोण ने मारा और एक पर श्रीकृष्ण जी ने विजय प्राप्त की थी। वनपर्व (12-31) से यह भी विदित होता है कि ये शिविराजे सिंधुओं के करद थे।

आरम्भकाल (वैदिककाल) में भारतवर्ष में शिवि लोगों को दक्ष राजा से भी भयंकर युद्ध करना पड़ा था। वीरभद्र इनका सेनापति था जो दक्ष को मारकर तथा दक्षनगर (कनखल) को विध्वंस करने के कारण ही प्रसिद्ध हुआ था। ईसा से सन् 326 वर्ष पूर्व जब विश्वविजेता सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया, उस समय शिवि लोग मालव (मल्लों) के पड़ौस में बसे हुए थे। उस समय के इनके वैभव के सम्बन्ध में सिकन्दर के साथियों ने लिखा है - कि इनके पास चालीस हजार तो पैदल सेना थी। इन शिवि2 जाटों ने सिकन्दर की सेना का बड़ी वीरता से मुकाबला किया। कुछ लोगों ने पंजाब के वर्तमान शेरकोट (जि० झंग) जो पाकिस्तान में है, को इनकी राजधानी बताया है। महर्षि पतञ्जलि ने भी इस वंश का वर्णन किया है। बौद्ध-काल में इनकी अच्छी स्थिति थी। बौद्ध लोगों का कहना है कि भगवान् बुद्ध ने पहले एक बार शिवि लोगों में भी जन्म लिया था। शिवि जातक और सुंगयन के यात्रा वर्णन से शिवि जनतन्त्र की स्थिति पेशावर से सात दिन की यात्रा


1. देखो वंशावली, अनु का वंश।
2. शिवि को यूनानियों ने शिबोई कहा है। महाभारत में शैवल, पतञ्जलि ने शैव्य तथा बौद्धग्रन्थों में शिवि लिखा है।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-195


करने पर सिंधुपार निश्चित होती है जहां सम्राट् अशोक के द्वारा महाराजा शिवि की स्मृति में एक स्तूप और विहार के निर्माण कराए जाने का भी परिचय मिलता है।

शिवि लोगों के फैलने का वर्णन हमको तीन स्थानों पर मिलता है -

  1. आरम्भ में ये लोग हरद्वार से शिवालिक की पहाड़ियों और मानसरोवर के निचले हिस्से में आबाद थे। फिर यह उत्तर-पूर्व पंजाब में फैल गये। यही पंजाब के शिवि लोग राजपूताना में चित्तौड़ तक पहुंच गये जहां इनकी राजधानी मध्यमिका नगरी थी। यहां से इनके सिक्के भी प्राप्त हुये हैं जिन पर लिखा हुआ है - मज्झिम निकाय शिव जनपदस
  2. दूसरा समुदाय इनका तिब्बत को पार कर गया जो वहां की भाषा में श्यूची कहलाने लगा। कई इतिहासकारों का मत है कि कुषाण लोग इन्हीं श्यूची (शिवि) लोगों की एक शाखा थे। महाराजा कनिष्क कुषाणवंश के जाट नरेश थे।
  3. शिवियों का एक समूह उद्यान से ईरान की ओर बढ़ गया था। वहां उन्होंने एक शिवस्थान नामक नगर अपने नाम से बसाया जो अब सीस्तान कहलाता है। ईरान से इनका एक दल, जाटों के अन्य दलों के साथ यूरोप में बढ़ गया। स्कण्डनेविया और जटलैंड दोनों में ही इनका जिक्र आता है। टसीटस, टालेमी और पिंकर्टन तीनों का ही कहना है कि - “जटलैंड में जट (जाट) लोगों की छः जातियां (वंश) थीं जिनमें सुरावी, किम्ब्री हेमेन्द्री और कट्टी भी शामिल थीं, जो एल्व और वेजर नदियों के मुहाने तक फैल गईं थीं। वहां पर इन्होंने युद्ध के देवता के नाम पर इमनश्यूल नाम का स्तूप खड़ा किया था।” ये सुरावी ही शिवि जाट और किम्ब्री ही कृमि जाटवंश हैं। इन लोगों में हर गौरी और पृथ्वी की पूजा प्रचलित थी। उत्सवों पर वे हरिकुलेश1 (विष्णु) और बुद्ध2 की प्रशंसा के गीत गाते थे (हर गौरी - शिव पार्वती)। ये लोग संघ (गण) अधिपति को गणपति व गणेश कहते थे। इनकी जितनी भी छोटी-छोटी शाखायें थीं वे ‘जाति राष्ट्र’ (प्रजातन्त्र संघ) में सम्मिलित हो गईं थीं।

अफ़गानिस्तान में शिवि और कुर्रम दो जिले हैं, जो शिवि और कृमि जाटों के नाम पर प्रसिद्ध हुये थे। हाला जाटों के नाम पर हाला पहाड़ भी है जिसे सोमगिरि के नाम से भी पुकारते हैं। जाटों में शिवि गोत्रियों की बहुत बड़ी जनसंख्या रही है, यहां तक कि इनकी अधिकता को देखकर “ट्राइब्स एण्ड कास्ट्स आफ दी नार्थ प्राविन्सेज एण्ड अवध” के लेखक मि० कुर्क साहब ने लिखा है कि “दक्षिण-पूर्व के जाट अपने को दो भागों में बांटते हैं। शिवि-गोत्री या शिव के वंशज और कश्यप गोत्री।” इसी तरह की बात कर्नल टॉड भी प्रसिद्ध इतिहासकार टसीटस के हवाले से लिखते हैं - “स्कन्धनाभ देश में जट नामक एक महापराक्रमी जाति निवास करती थी, इस जाति के वंश की


1. हेरोडोटस मिश्र देश की परम्परा के आधार पर लिखता है - हरकुलीस दूसरी श्रेणी के देवों में से एक है। ये बारह हैं (दक्ष की अदिति कन्या से 12 देव कहलाये जिन में विष्णु सबसे छोटा और गुणवान् था। इनसे पहले 8 देव हुए जो पहली श्रेणी में गिने जाते हैं और विष्णु आदि 12 देव दूसरी श्रेणी में)। यह विष्णु का नाम ही हरकुलीस बन गया (भारत का वृहद इतिहास पृ० 220 लेखक पं० भगवद्दत्त बी० ए०)
2. जिस चन्द्र से चन्द्रवंश चला, का पुत्र बुध था।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-196


बहुत-सी शाखायें थीं। उन शाखाओं में शैव और शिवि लोगों की विशेष प्रतिष्ठा थी।” हिन्दुओं के प्राचीन ग्रन्थकारों ने शिवि लोगों को शैवल और शैव्य करके भी लिखा है।

पंजाब के सिक्ख जाटों मे शिवहोते दल के क्षत्रिय भी शिविवंश के ही हैं। जालन्धर जिले में चक्रदेशराज, बड़ा पिण्ड, छोटी रुडका, चकसाह, पिसौड़ी इसी वंश के बड़े गांव हैं। शिवि वंश के शाखा गोत्र - 1. शिवहोते 2. तेवतिया 3. भटौनिया

यौधेय या जोहिया

11. यौधेय या जोहिया -

चन्द्रवंशी सम्राट् ययाति के चौथे पुत्र का नाम अनु था। अनु की नौवीं पीढ़ी मे उशीनर था जो पंजाब की अधिकांश भूमि का शासक था। उनकी पांच रानियां थीं। बड़ी रानी नृगा से नृग पुत्र हुआ। नृग के पुत्र का नाम यौधेय था। इससे ही यौधेय वंश चला जो जाट वंश है। यह भाषाभेद से जोहिया नाम से प्रचलित हुआ1

यौधेय गणराज्य शतद्रु (सतलुज) नदी के दोनों तटों से आरम्भ होता था। बहावलपुर (पाकिस्तान) राज्य इनके अन्तर्गत था। वहां से लेकर बीकानेर राज्य के उत्तरी प्रदेश गंगानगर आदि, हिसार, जींद, करनाल, अम्बाला, रोहतक, गुड़गावां, महेन्द्रगढ़, दिल्ली राज्य तक प्रायः समूचे उत्तरी दक्षिणी और पूर्वी राजस्थान में फैला था। अलवर, भरतपुर, धौलपुर राज्य इसी के अन्तर्गत आ जाते थे। यौधेयों के समूह के संघों में होशियारपुर, कांगड़ा तक प्रदेशों की गिनती होती थी। देहरादून, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बुलन्दशहर, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, मैनपुरी, एटा, बदायूं, बरेली, बिजनौर, पीलीभीत, मुरादाबाद, रामपुर जिला आदि सारा पश्चिमी उत्तरप्रदेश यौधेय गण के अन्तर्गत था। एक समय तो ऐसा आया था कि मुलतान के पास क्रोडपक्के का दुर्ग तथा मध्यप्रदेश का मन्दसौर तक का प्रदेश भी यौधेयों के राज्य में सम्मिलित था2। सिकन्दर सम्राट् इनकी शक्ति से डरकर व्यास नदी से वापिस लौट गया था।

पौराणिकों ने यौधेय वंश का प्रचालक युधिष्ठिर का पुत्र ‘यौधेय’ लिखा है। परन्तु यह प्रमाणित है कि नृग के पुत्र ‘यौधेय’ से यह वंश चला। हां ! यह सम्भव है कि युधिष्ठिर के पुत्र ‘यौधेय’ का संघ (दल) भी उपरलिखित ‘यौधेय गण’ में शामिल हो गया था। (लेखक)

भारतवर्ष के अतिरिक्त यौधेय का एक समूह हिमालय को पार करके जगजर्टिस नदी को पार करता हुआ कैस्पियन सागर तक पहुंच गया था। वहां पर इन्हें यौधेय की बजाय भाषाभेद से ढे और दहाये नाम से पुकारा गया। यह शब्द यौधेय से धेय और फिर अपभ्रंश होकर धे रह गया - यही धे अंग्रेजी लेखकों ने ढे और दहाये नाम से लिखा। जब इस्लाम का आक्रमण हुआ तो इनका एक बड़ा समूह भारत में लौट आया जो ढे जाट के नाम से पुकारा जाता है और मेरठ के आस-पास के प्रदेशों में आबाद है3

भारतवर्ष में जो यौधेय बाकी रह गये थे, वे आजकल जोहिया कहलाते हैं। महाभारत के युद्ध में यह दल भारी तैयारियों के साथ सम्मिलित हुआ था। इनका उल्लेख महाभारत में आता है। इन्होंने गुप्त, मौर्य, कुषाण सम्राटों से भी टक्कर ली। जैसे - चन्द्रगुप्त मौर्य, समुद्रगुप्त और कनिष्क आदि। सम्राट् सिकन्दर की यूनानी सेना ने इन्हीं वीर यौधेयों की शक्ति से डरकर व्यास नदी से आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया था।


1. क्षत्रिय जातियों का उत्थान-पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 335 लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री।
2. हरयाणे के वीर यौधेय (प्रथम खण्ड भूमिका लेखक श्री भगवानदेव आचार्य।
3. जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खण्ड) पृ० 102 लेखक ठा० देशराज, जधीना - भरतपुर।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-197


भरतपुर राज्य में इनका एक शिलालेख मिला था। इस बात का वर्णन डा० प्लीट ने गुप्तों के वर्णन के साथ किया है। उस शिलालेख में यौधेय गण के निर्वाचित प्रधान का उल्लेख है। इनका प्रधान महाराजा महासेनापति की उपाधि धारण करता था। कुछ अन्य गणों के अध्यक्ष भी राजा और राजन्य की उपाधि धारण करते थे। एकतंत्रियों के मुकाबले में गणतंत्र अपने अध्यक्षों को राजा, महाराजा या राजन्य (राजन्) की उपाधि देने लग गये थे। जाट वंश लिच्छिवि गण ने तो अपने 7077 मेम्बरों को भी राजा की उपाधि दे दी थी। यौधेयों का यह शिलालेख गुप्तकाल का बताया जाता है।

इनकी प्राचीन मुद्रायें लुधियाना के सुनेत स्थान से प्राप्त हुई हैं। सोनीपत (हरयाणा) के किले से और सतलुज तथा यमुना के मध्यवर्ती कई स्थानों से यौधेयों के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जो कि भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं। शुंग काल के सिक्कों पर चलते हुए हाथी और सांड (बैल) की मूर्ति अंकित मिलती है। उन सिक्कों पर ‘यौधेयानाम्’ ऐसा लिखा है। दूसरी तरह के सिक्कों पर ‘यौधेयगणस्य जय’ लिखा है। इस सिक्के पर एक योद्धा के हाथ में भाला लिए त्रिभंगी गति से खड़ी हुई मूर्ति बनाखी गई है। तीसरी तरह के सिक्कों पर उन्होंने युद्ध के देवता कार्तिकेय (जो शिवजी का बड़ा पुत्र था) की मूर्ति अंकित की है। कुछ सिक्कों पर ‘हि’ और ‘त्रि’ भी लिखा हुआ पाया गया है।

ईसा की तीसरी शताब्दी तक यौधेय दल ने मारवाड़ (जोधपुर), जैसलमेर, बीकानेर (जांगल) प्रदेश की बहुत बड़ी भूमि पर अधिकार कर लिया था। दूसरी शताब्दी में शक राजा रुद्रदामन के साथ यौधेयों का युद्ध जोधपुर की प्राचीन भूमि पर हुआ था, क्योंकि रुद्रदामन बराबर पैर फैला रहा था। जोधपुर में यौधेयगण का नेता महीपाल था। रुद्रदामन ने इनके बारे में लिखाया था - सर्व क्षत्राविष्कृत वीर शब्द जातोत्सेकाभिधेयानां यौधेयानाम्। अर्थात् सभी क्षत्रियों के सामने यौधेयों ने अपना नाम (युद्धवीर) चरितार्थ करने के कारण जिन्हें अभिमान हो गया था और जो परास्त नहीं किये जा सकते थे। यह थी उनकी वीरता जिसका उल्लेख उनके शत्रु ने भी किया है। अपनी युद्धकुशलता के लिए वे प्रसिद्ध हो गये थे।

जोधा जी के पुत्र बीका जी राठौर ने जब नया राज्य बीकानेर स्थापित करने का प्रयत्न प्रारम्भ किया तो जोहिया जाटों का वहां 600 गांवों पर अधिकार था1। शेरसिंह नामक वीर योद्धा उनका राजा था जिसकी राजधानी भूरूपाल में थी। इस शूरवीर शेरसिंह ने राठौरों को नाकों चने चबवा दिये। बीका जी ने कुछ समय अपनी व्यवस्था ठीक करने और शक्तिसंचय करने में लगाया।

वहां के निकट क्षेत्र पर गोदारा जाटों की बड़ी शक्ति थी। जोहिया व गोदारा जाटों की आपसी शत्रुता होने के कारण से गोदारों का नेता गोदारा ‘पाण्डु’ जाट ने बीका जी से कुछ शर्तों पर संधि कर ली। अब बीका जी ने अपनी और गोदारों की सेना लेकर जोहिया जाटों पर आक्रमण कर दिया। वीर शेरसिंह ने अपनी सेना लेकर दोनों बड़ी शक्तियों का साहस से मुकाबला किया।


1. कर्नल टॉड Vol II P. 1126-27 पर जोहिया जाटों का 600 गांवों पर अधिकार था, लिखा है; ले० रामसरूप जून ने अपने जाट इतिहास में पृ० 70 पर इनका राज्य 1100 गांवों पर लिखा है। इनके परगने 1. जैतपुर 2. महाजन 3. पीपासर 4. उदयमुख, और 5. कम्भाना थे।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-198


“देशी राज्यों के इतिहास” में सुखसम्पत्तिराय भण्डारी ने लिखा है –

“शेरसिंह ने अपनी समस्त सेना के साथ बीका जी के खिलाफ युद्ध करने की तैयारी कर रखी थी। बीका जी जो कई युद्धों के विजेता थ, इस युद्ध में सरलता से विजय प्राप्त न कर सके। शत्रुगण अद्भुत पराक्रम दिखाक्र साहस छोड़ गया। अन्त में विजय की कोई सूरत न देख, बीका जी ने षडयन्त्र द्वारा शेरसिंह को मरवा दिया।”

‘वाकए-राजपूताना’ में भी यही बात लिखी है। यह युद्ध रामरत्न चारण के लेखानुसार सीधमुख के पास ढाका गांव में हुआ था।

शेरसिंह के मारे जाने के बाद भी जोहिया जाट विद्रोही बने रहे। उन्होंने सहज ही में अधीनता स्वीकार नहीं की। उनका प्रत्येक युवक प्राणों की बाजी लगाकर स्वाधीनता की रक्षा करना चाहता था। शेरसिंह के बाद उन्हें कोई योग्य नेता नहीं मिला।

“भारत के देशी राज्यों के इतिहास” का लेख -

“यद्यपि बीका जी ने जोहिया जाटों को परास्त करके अपने अधीन कर लिया था तथापि वे बड़े स्वाधीनताप्रिय थे और अपनी हरण की हुई स्वाधीनता को फिर से प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे थे। अतः बीका जी के वंशज रायसिंह ने अपने भाई भीमसिंह जी के संचालन में एक प्रबल राठौर-सेना उनके दमन करने के लिए भेजी। इस सेना ने वहां पहुंचकर भयंकर काण्ड उपस्थित कर दिया। प्रबल समराग्नि प्रज्वलित हो गई। हजारों जोहिया जाटगण स्वाधीनता के लिए प्राण विसर्जन करने लगे। वीर राठौर भी अपने ध्येय से न हटे। उन्होंने इस देश को यथार्थ मरुभूमि के समान कर दिया।”

इस तरह से 15वीं सदी में जांगल प्रदेश पर से जोहिया जाटों का राज्य समाप्त हो गया।

इन यौधेयों की कालान्तर में कई शाखायें भी हो गईं। कुलकिया शाखा के लोग अब अजीतगढ़ चूड़ी के पास मौजूद हैं। इस वंश में ढाका शाखा के भी अनेक गांव हैं जिनमें गांव ढानी जयपुर में, ढकौली, पटौली, औगटा, सहदपुर आदि मेरठ में, मिल्क, मानिपुर, छाचरी आदि जिला बिजनौर में सुप्रसिद्ध गांव हैं। जोहिया जाट जोधपुर, बीकानेर तथा जालन्धर जिले में जड़िया, जोड़ा, बिनौला, थाबलक, जड़ियाला, जोहल आदि 12 गांवों में बसे हुए हैं। जोहिया जाट सतलुज नदी के किनारे उस स्थान पर रहते थे जहां बहावलपुर राज्य था। आजकल वह पाकिस्तान में है। उस स्थान पर इस वंश के जाटों के नाम पर जोहियावार प्रदेश (क्षेत्र) विद्यमान है।

जय यौधेय लेखक राहुल सांकृत्यायन, पृ० 5 पर लिखते हैं कि -

भावलपुर रियासत से मुलतान तक फैला एक इलाका जोहियावार कहा जाता है और बहुसंख्यक निवासी जोहिया (यौधेय) कहे जाते हैं। कराची के कोहिस्तान में जोहियार रहते हैं, बल्कि उनके सरदार को ‘जोहिया-जोजन्म’ कहा जाता है। अलवर और गुड़गांव के मेव अब भी यौधेय भूमि में ही बसते हैं और उनकी वीरगाथायें सुनकर आज भी रोमांच हो उठते हैं।

यौधेय के शाखागोत्र - 1. कुलकिया 2. ढाका

12. मद्र -

शिविवंश के संस्थापक शिवि के चार पुत्रों में मद्रक (मद्र) अत्यन्त प्रतापी नरेश थे। इन्होंने अपने नाम पर मद्र जनपद की स्थापना की। इनसे ही मद्रवंश जो जाटवंश है, प्रचलित हुआ। शिवियों की भांति ही मद्र भी उशीनर कहे गये हैं। उशीनर वेदों की कई ऋचाओं का द्रष्टा समझा जाता है। अपने इस पूर्वज पर जाटों को अभिमान होना चाहिए।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-199


मद्र जनपद रावी और व्यास नदियों के बीच का प्रदेश था और मद्र लोगों की राजधानी शाकल (वर्तमान सियालकोट) थी1। मद्र प्रदेश की सीमा ‘नील पुराण’ के अनुसार -

“शतद्रु (सतलुज) और विपाशा (व्यास) पार करके उत्तर की ओर मद्र देश प्रारम्भ होता था। मद्रों की उपकारक ‘देवका नदी’ सियालकोट होती हुई इस मद्र देश में बहती थी।”

इस शाकल को ही सियालकोट माना है2। पाणिनिव्याकरण की काशिका वृत्ति में 4-2-108 पौर्वमद्र व आपरमद्र नामक दो भेदों का उल्लेख है। ऐतरेय ब्राह्मण 30-14 स्थल से हिमवान् के परे उत्तर मद्र का पता चलता है। काशिकावृत्ति के 1-3-36 में मद्राः करं विनयन्ते निर्यातयन्तीत्यर्थः - वाक्य से मद्रों द्वारा कहीं बाहर ‘कर’ भेजने का निर्देश है। लेफ्टिनेन्ट रामसरूप साहब ने अपने लिखित जाट इतिहास पृष्ठ 72 पर लिखा है कि “प्राचीन समय से मद्रों (मद्रकों) की राजधानियां गजनी क्वेटा (पाकिस्तान में) और सियालकोट में थीं।” वे आगे लिखते हैं कि “शाकल नगरी (वर्तमान सियालकोट) के खण्डहरों से एक शिलालेख प्राप्त हुआ था जिसे कर्नल टॉड साहब ने एशियाटिक सोसायटी के पास भेज दिया था। उस शिलालेख पर राजा शल्य को मद्रक जाट लिखा है।” शाकल नरेश राजा अश्वपति के शासन की उत्कृष्टा के प्राचीन ग्रन्थों में पर्याप्त उल्लेख मिलते हैं। मद्रवंश की स्थिति रामायणकाल में भी उन्नत थी। सुग्रीव ने सीता की खोज के लिए वानर सेना को उत्तर दिशा में जाने का आदेश दिया और वहां के देशों का परिचय देत हुए कहा - “उत्तर में म्लेच्छ, पुलिन्द, शूरसेन, प्रस्थल, भरत (इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर के आस-पास के प्रान्त), कुरु (दक्षिण कुरु - कुरुक्षेत्र के पास की भूमि), मद्र, काम्बोज, यवन व शकों के देशों में भली-भांति अनुसंधान करके दरद देश में और हिमालय पर्वत पर ढूंढो3।” मद्र देश में मद्रवंश का शासन था।

मद्रदेश के राजा शल्य की बहन माद्री, नकुल और सहदेव की माता थी। महाभारत के अठारह दिन वाले महायुद्ध में एक दिन का सेनापति मद्रराज शल्य भी था। इसके लिए महाभारत द्रोणपर्व में लिखा है - शल्य को महापराक्रमी अतुल बलशाली और घोड़ों को चलाने में श्रीकृष्ण से भी चतुर, गदायुद्ध में भीम के समान निपुण कहा है। मद्रराज शल्य अनेकों मद्रवंशी क्षत्रियों को साथ लेकर वचनबद्ध होने से दुर्योधन की ओर युद्ध में शामिल हुआ था। यह कर्ण का सारथि बना था।

शल्य के दो पुत्र रुक्मरथ और रुक्मांगद द्रौपदी के स्वयंवर में आए थे (आदिपर्व 177-13)। किन्तु महाभारत युद्ध में शल्य के साथ रुक्मरथ ही आया था।

वाहिक या वरिक जनपद इस मद्र जनपद के अन्तर्गत था। मद्रराज शल्य इनसे छठा भाग ‘कर’ (टैक्स) लेता था। मद्रकों ने सिकन्दर की सेना के साथ, सियालकोट के स्थान पर भयङ्कर युद्ध किया था।


1. ‘प्राचीन भारत’ के लेखक; कथासरित्सागर और मत्स्य पुराण।
2. ‘टाल्मी के भारत’ पृ० 122-123; ‘अल्बुरुनी की यात्रा पुस्तक’ प्रथम भाग पृ० 317.
3. वाल्मीकि रामायण किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 43, श्लोक 11-12.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-200


इसके बाद मुगलकाल तक इन मद्रों के सम्बन्ध में कोई वर्णन नहीं मिलता।

पन्द्रहवीं शताब्दी में लोधी के समय तक ये लोग मुसलमान जाट के रूप में समाना, राज्य पटियाला में बसते थे। सर डेञ्जल एवट्सन साहब ने लिखा है कि “मुसलमान हो जाने से इन लोगों ने सिक्खों से तंग आकर पटियाला छोड़ दिया और सरस्वती नदी के किनारे पेहवा नामक स्थान पर आ बसे। ये मढ़ान कहलाने लगे।” पेहवा और थानेसर के बीच मुर्तिजापुर में इन मद्रों का ढहा हुआ एक किला आज भी है। इन लोगों (मढ़ान मद्रों) की करनाल रियासत थी जिसमें 150 गांव थे। ये तीन लाख वार्षिक के मुनाफेदार (आयवाले) थे। इस वंश के मुसलमान मद्रों की बहुत बड़ी संख्या है। कुरुक्षेत्र के समीप 12 गांव हिन्दू जाट मद्रों के हैं। अमृतसर के भावल गांव के सरदार नानूसिंह मद्र ने अपने भाई भागसिंह, रामसिंह को लेकर जगाधरी के पास बूड़िया नामक विशाल किले पर 1764 ई० में अधिकार कर लिया और 200 गांवों पर शासन स्थिर करके एक बूड़िया रियासत बना ली थी। (इसी बूड़िया में बीरबल का जन्म हुआ था जो सम्राट् अकबर के दरबार में था)। नकुड़ तहसील सहारनपुर में मद्रों के 24 गांव हैं जिनमें रानीपुर, भादी और शुक्रताल प्रमुख हैं। मुरादाबाद में मेदरने नाम से मद्र-रम्पुरा, धनपुर, माख्यल, आलनपुर, कासमपुर, मुबारिकपुर, झलचीपुर आदि गांव मद्र जाटों के हैं। इस प्राचीन राजवंश पर जाटों को अभिमान है।

अहलावत

13. अहलावत -

ब्रह्मा से आठवीं पीढ़ी में चन्द्रवंशी नहुषपुत्र सम्राट् ययाति हुए। ये जम्बूद्वीप के सम्राट् थे। जम्बूद्वीप आज का एशिया समझो (देखो अध्याय 1, जम्बूद्वीप)। इस जम्बूद्वीप में कई देश (वर्ष) थे जिनमें से एक का नाम इलावृत देश था। जिस देश के बीच में सुमेरु पर्वत है, जिस पर वैवस्वत मनु निवास करते थे और जो जम्बूद्वीप के बीच में है, उसका नाम इलावृत देश था। आज यह देश मंगोलिया में अलताई नाम से कहा जाता है। यह्ह अलताई शब्द इलावृत का ही अपभ्रंश है। (“वैदिक सम्पत्ति”, आर्यों का विदेशगमन, पृ० 423, लेखक पं० रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण)।

ययातिवंशज क्षत्रिय आर्यों का संघ (दल) भारतवर्ष से जाकर इस इलावृत देश में आबाद हुआ था। चन्द्रवंशज क्षत्रिय आर्यों का वह संघ इलावृत देश में बसने के कारण उस देश के नाम से अहलावत कहलाया*। यह अध्याय 1 में लिख दिया गया है कि वंश (गोत्र) प्रचलन व्यक्ति, देश या स्थान आदि के नाम पर हुए। देश या स्थान के नाम पर प्रचलित वंशों की सूची में अहलावत वंश भी है (देखो प्रथम अध्याय)।

बी० एस० दहिया के लेख अनुसार - “मध्य एशिया में बसे हुए आर्यों का देश एलावर्त था जिसके नाम से वे अहलावत कहलाये जो जाटवंश (गोत्र) है। ययाति स्वयं एला कहलाता था1।”

इलावृत देश में अहलावत क्षत्रियों का संघ (गण) प्रजातंत्र था। इनके इस देश का नाम महाभारतकाल में भी इलावृत ही था। इसके कुछ उदाहरण निम्न प्रकार से हैं –

यादवों की दिग्विजय - श्रीकृष्ण जी उत्तर की ओर कई देशों पर विजय पाकर इलावृत


  • भाषाभेद से इलावृत शब्द अहलावत कहलाया।
1. जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज पृ० 10, लेखक बी० एस० दहिया आई० आर० एस०।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-201


देश में पहुंचे। यह देवताओं का निवास स्थान है। वहां जम्बूफल है जिसका रस पीने से कोई रोग नहीं होता है। भगवान् श्रीकृष्ण जी ने देवताओं से पूर्ण इलावृत को जीतकर वहां से भेंट ग्रहण की1

महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर पाण्डवों की दिग्विजय - “अर्जुन उत्तर दिशा में बहुत से देशों को जीतकर इलावृत देश में पहुंचे। वहां उन्होंने देवताओं जैसे देवोपम, शक्तिशाली दिव्य पुरुष तथा अप्सराओं के साम स्त्रियां देखीं। अर्जुन ने उस देश को जीतकर उन पर कर लगाया”2

अहलावत क्षत्रिय आर्यों की घटनाओं और उनका अपने देश भारतवर्ष में लौट आने के विषय में कोई प्रमाणित जानकारी नहीं मिलती जो कि खोज का विषय है।

अहलावत जाटों का भारतवर्ष से बाहर विदेशों में रहने का थोड़ा सा ब्यौरा निम्नप्रकार से है -

  1. वृहत् संहिता के लेखक वराहमिहिर ने एक प्रकरण में अहलावतों को तक्षशिला और पुशकलावती के लोगों, पौरवों (पौरव जाट), पंगालकों (पंघल जाट, मद्रा (मद्र जाट), मालवों (मालव/ मल्ल जाट) के साथ लिखा है3। सम्भवतः ये सब लोग भारतवर्ष की उत्तर-पश्चिम सीमा पर थे।
  2. राजतरंगिणी में कल्हण ने लिखा है कि अहलावत और बाना (दोनों जाटगोत्र) द्वारपाल (शत्रु के आने के रास्ते पर रक्षक) थे4। इससे यह बात तो साफ है कि ये लोग शत्रु से पहली टक्कर लेने वाले सबसे आगे थे। सम्भवतः ये भारतवर्ष की सीमा पर रक्षक थे।
  3. भारतीय शक और कुषाणों के वस्त्र तथा शस्त्र, सरमाटियन्ज् यानी एलन्ज की कब्रों से मिले वस्त्र, शस्त्रों के समान थे। असल में यह एलन् शब्द एला शब्द से निकला है जो कि अहलावत जाट हैं। इन सब के पहनने के वस्त्र, लम्बी बूट (जूते), लम्बा कोट, पतलून और टोप एक समान थे। भारतवर्ष के शुरु के गुप्ट सम्राटों, जो धारण जाटगोत्र के थे, के सिक्कों (मुद्रा) पर भी यही पहनावा पाया गया है जो बाद में धोती बांधने लगे थे5। सरमाटियन्ज् या एलन्ज नामक स्थान लघु एशिया में है। इससे साफ है कि अहलावत जाट वहां रहे हैं और वहां राज्य किया है, युद्ध किए हैं। इनकी प्रसिद्धि के कारण ही तो उस स्थान का नाम एलन्ज पड़ा था।

अहलावत जाट अपने देश भारतवर्ष लौट आए। इसका पूर्ण ब्यौरा तो प्राप्त नहीं है परन्तु कुछ बातें इस प्रकार से हैं -


1,2. देखो प्रथम अध्याय इलावृत देश प्रकरण।
3. बृहत् संहिता का हवाला देकर, बी० एस० दहिया आई० आर० एस० ने अपनी पुस्तक “जाट्स दी एन्शन्ट रूलर्ज” के पृ० 171 पर लिखा है।
4. जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज पृ० 224, लेखक बी० एस० दहिया आई० आर० एस०।
5. जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज पृ० 54, लेखक बी० एस० दहिया आई० आर० एस०।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-202


  1. इलावृत प्रदेश में निवास करने वाले आर्यों को ऐल नाम से पुकारा गया है और ये लोग चित्तराल के रास्ते से भारतवर्ष में आए1
  2. एक समय लगभग पूरे एशिया तथा यूरोप पर जाटवीरों का राज्य था। ईसाई-धर्मी तथा मुस्लिम-धर्मी लोगों की शक्ति बढ़ने के कारण जाटों की हार होती गई जिससे ये लोग समय-समय पर अपने पैतृक देश भारतवर्ष में आते रहे और सदियों तक आये। अधिकतर ये लोग भारतवर्ष की पश्चिमी सीमा की घाटियों से आये (विशेषकर खैबर और बोलान घाटी से)। इसका पूरा वर्णन अगले अध्याय में किया जाएगा। सम्भवतः अहलावत जाट भी इन्हीं रास्तों से अपने देश भारतवर्ष में लौट आये।

यह नहीं कहा जा सकता कि ये अहलावत जाट लोग कितने विदेशों में रह गये और कितने भारतवर्ष में आ गये। यहां आने के बाद पंजाब में और फिर राजस्थान, मालवा, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में इनका निवास तथा राज्य स्थापित करने का कुछ ब्यौरा मिलता है जो निम्नलिखित है ।

कुछ लेखकों ने अहलावतों को अहलावत सोलंकी लिखा है2। चालुक्य चन्द्रवंशी जाट हैं जिनको बाद में सोलंकी3 नाम से पुकारा गया। राजपूत संघ बनने पर उन्होंने भी सोलंकी नाम धारण कर लिया था। परन्तु याद रहे कि दसवीं सदी से पहले इनका नाम नहीं चमका था। ग्यारहवीं शताब्दी में राजपूतों ने राज्य स्थापित करने शुरु कर दिये थे। दक्षिण में अहलावतों की पदवी सोलंकी रही।

अहलावत सोलंकी वंश का दक्षिण में राज्य - अहलावत सोलंकी जाटवंश के शासकों की दो शाखायें कही गई हैं। पहली शाखा ने सन् 550 ई० से 753 ई० तक लगभग 200 वर्ष तक दक्षिण भारत में राज्य किया। इनकी राजधानी बादामी4 (वातापी) थी। दूसरी शाखा ने सन् 973 ई० से 1190 ई० तक लगभग 200 वर्ष तक दक्षिण भारत में राज्य किया। इनकी राजधानी कल्याणी थी5

वातापी या बादामी के शासक (सन् 550 ई० से 753 ई० तक)6

इस वंश के पहले दो शासक जयसिंह और रणराजा थे। किन्तु बादामी राज्य का संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था जो इस सोलंकीवंश का तीसरा राजा हुआ। विन्सेन्ट स्मिथ के लेख अनुसार, “चालुक्यवंश दक्षिण में एक प्रसिद्ध वंश था जिसका संस्थापक पुलकेशिन प्रथम था जिसने इस राज्य को छटी शताब्दी के मध्य में स्थापित किया था।”


1. भारत भूमि और उसके निवासी पृ० 251, लेखक सी० वी० वैद्य; जाट इतिहास पृ० 7 लेखक ठा० देशराज।
2. जाट इतिहास उर्दू पृ० 206 लेखक ठा० संसारसिंह; क्षत्रिय जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 363; लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री, जाट इतिहास पृ० 86, लेखक रामसरूप जून। जाट इतिहास इंग्लिश पृ० 69, लेखक लेफ्टिनेन्ट रामसरूप जून; सर्वखाप रिकार्ड, शोरम गांव जिला मुजफ्फरनगर।
3. जेम्स टॉड ने चालूक्य-सोलंकी वंश की गणना 36 राज्यकुलों में की है।
4. वातापी (बादामी) - यह गोदावरी नदी और कृष्णा नदी के बीच पश्चिमी तट के निकट है।
5. कल्याणी - यह वातापी से उत्तर-पूर्व वरंगल के निकट है।
6. हिन्दुस्तान की तारीख (उर्दू) पृ० 377.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-203


1
पुलकेशिन प्रथम ने वातापी को जीतकर अपने राज्य की राजधानी बनाई। इसी खुशी में उसने एक अश्वमेध यज्ञ किया। (अश्वमेध - राजा न्याय धर्म से प्रजा का पालन करे, विद्यादि का देनेहारा, यजमान और अग्नि में घी आदि का होम करना अश्वमेध कहलाता है - सत्यार्थप्रकाश एकादश समुल्लास पृ० 188)।
2
पुलकेशिन प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उसके दो पुत्रों कीर्तिवर्मन और मंगलेश ने अपने शत्रुओं से युद्ध किए। मंगलेश ने अपनी राजधानी बादामी में विष्णु का एक सुन्दर मंदिर बनवाया।
3
पुलकेशिन द्वितीय (सन् 608 ई० से 642 ई०) - इस वंश का सबसे प्रसिद्ध और शक्तिशाली सम्राट् पुलकेशिन द्वितीय था1। चीनी यात्री ह्यूनत्सांग (हुएनसांग) ने अपनी यात्रा समय लिखित पुस्तक “सि-यू-की” में लिखा है कि “पुलकेशिन द्वितीय बड़ा प्रतापी सम्राट् था। उसका राज्य नर्मदा के दक्षिण में बंगाल की खाड़ी से अरब सागर तक और दक्षिण में पल्लव (जाटवंश) राज्य की सीमाओं कांची तक फैला हुआ था2। विदेशी राजा उसका मान करते थे। उसके दरबार में फारस का राजदूत आया था। उसके जलपोत व्यापार के लिए ईरान और दूसरे देशों में जाते थे। उसके राज्य के निवासी बड़े निडर और युद्धप्रिय थे।” पुलकेशिन के चित्रित दरबार में फारस के राजदूत का चित्र आज भी अजन्ता की गुफाओं में देखा जा सकता है*

उत्तरी भारत का शक्तिशाली सम्राट् हर्षवर्धन (606 ई० से 647 ई० तक) वसाति या वैस जाट गोत्र का था। उसने सन् 620 ई० में पुलकेशिन द्वितीय पर आक्रमण किया। दोनों सेनाओं का युद्ध नर्मदा के पास हुआ। हर्ष की असफलता हुई जिसके कारण पुलकेशिन द्वितीय की शक्ति और मान में अधिक वृद्धि हुई3। पुलकेशिन द्वितीय ने पल्लव (जाटगोत्र) राजा महेन्द्रवर्मन को हराया और बढ़ता हुआ कांची तक जा पहुंचा। परन्तु महेन्द्रवर्मन के पुत्र नरसिंह वर्मन ने इस हार का बदला लिया। सन् 642 ई० में उसने बादामी पर आक्रमण किया जिसमें पुलकेशिन द्वितीय हार गया और मारा गया।

4
विक्रमादित्य प्रथम - पुलकेशिन द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र विक्रमादित्य प्रथम सन् 642 ई० में राजगद्दी पर बैठा। इसने पल्लवों को हराया और उनकी राजधानी कांची तक

1. सर्वखाप पंचायत का रिकार्ड जो सर्वखाप पंचायत के मंत्री चौ० कबूलसिंह ग्रा० व डा० शोरम जिला मुजफ्फरनगर (उ० प्र०) के घर में है, में लिखा है कि पुलकेशिन सम्राट् जाट अहलावत गोत्र का था।
2. भारत का इतिहास हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी पृ० 81.
  • - उस समय ईरान का राजा खुसरो द्वितीय था (590-628 ईस्वी)। खुसरो द्वितीय का दूतमण्डल पुलकेशिन द्वितीय के दरबार में आया था। उसके दरबार में भी पुलकेशिन द्वितीय ने एक दूतमण्डल भेजा था। (मध्य एशिया में भारतीय संस्कृति पृ० 41, लेखक सत्यकेतु विद्यालंकार)।
3. भारत का इतिहास, हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी पृ० 81; भारत का इतिहास प्री-यूनिवर्सिटी कक्षा के लिए, पृ० 153, लेखक अविनाशचन्द्र अरोड़ा।
नोट - महाराजा पुलकेशिन द्वितीय का एक शिलालेख मिला है जिस पर लिखे लेख का वर्णन, पं० भगवद्दत बी०ए० द्वारा रचित भारतवर्ष का इतिहास द्वितीय संस्करण पृ० 205 पर किया गया है।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-204


अधिकार कर लिया। उसने दक्षिण के चोल, पांड्य वंश चीर वंश को भी जीत लिया था।

5
विक्रमादित्य द्वितीय - यह विक्रमादित्य प्रथम का पौत्र था। इसने पल्लव राजा नन्दीवर्मन जो हराकर उसकी राजधानी कांची पर अधिकार कर लिया। इसकी मृत्यु के बाद यह वंश कमजोर होता चला गया।
6
कीर्तिवर्मन द्वितीय - यह इस वंश का अन्तिम राजा था। इसको सन् 753 ई० में राष्ट्रकूट वंश (राठी) के राजा वन्तीदुर्ग ने हरा दिया और इसका राज्य छीन लिया। इस तरह से बादामी के शासकों का अन्त हो गया1

सन् 754 ई० से लेकर सन् 972 ई० अर्थात् लगभग 200 वर्ष के अन्तराल में इन अहलावत वंशज जाटों के गौण राज्य स्थापित रहे जिनका ऐतिहासिक महत्त्व नगण्य है।

अहलावत वंश के शासकों का कल्याणी पर राज्य (सन् 973 से 1190 ई० तक2)।

  • 1. तल्प द्वितीय - इसने सन् 973 ई० में राष्ट्रकूट वंश (Rathi) के अन्तिम राजा कक्क को पराजित किया और कल्याणी राजधानी पर चालुक्य (सोलंकी) वंश का राज्य स्थापित किया। इसने परमार राजा मीख से युद्ध किया था।
  • 2. जयसिंह द्वितीय - राजा तल्प के पश्चात् इस वंश का प्रसिद्ध सम्राट् जयसिंह द्वितीय था। इसने जैन धर्म को त्यागकर शिवमत धारण किया। इसने कल्याणी नगर को बसाया और राजधानी बनाई। इसका परमार शासक तथा चोलवंश शासक राजेन्द्र प्रथम से युद्ध हुआ।
  • 3. विक्रमादित्य षष्ठ - कल्याणी के सोलंकी शासकों में यह सम्राट् सबसे प्रसिद्ध हुआ। इसने मैसूर के होयसल वंश के शासक तथा चोलवंश के शासक राजेन्द्र द्वितीय को पराजित किया। इसके दरबार में बल्हण और विज्ञानेश्वर जैसे प्रसिद्ध विद्वान् थे। (सम्भवतः जाट इतिहास पृ० 86 ले० रामसरूप जून साहब ने इसी का नाम अहुमल लिखा है)।
  • 4. विक्रमादित्य षष्ठ के बाद इस वंश के सब शासक दुर्बल थे। इस राज्य के सब प्रान्त धीरे-धीरे स्वतन्त्र हो गये। इस वंश का अन्तिम राजा सुवेश्वर था जिसको देवगिरि (ओरंगाबाद प्रदेश) के यादव वंश के शासक ने सन् 1190 ई० में हराया और उसके राज्य पर अधिकार कर लिया। (यादव वंश = जाटवंश)। इस तरह कल्याणी के सोलंकी वंश का शासन समाप्त हो गया।

अहलावत शासकों के बड़े कार्य -

इस वंश के शासक बड़े और युद्धप्रिय थे जिन्होंने छठी शताब्दी से आठवीं शताब्दी तक और दसवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक दक्षिण में अपने सम्मान, गौरव और प्रधानता को स्थिर रखा।

उन्होंने हर्षवर्धन जैसे शक्तिशाली सम्राट् को हराया और दक्षिण के वंशों चीर, चोल,


1. तारीख हिन्दुस्तान (उर्दू) पृ० 278.
2. तारीख हिन्दुस्तान (उर्दू) पृ० 279-280 पर।
नोट - चोल, पांड्य और पल्ल्व तीनों जाट गोत्र (वंश) हैं।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-205


राष्ट्रकूट, पांड्य, पल्लव, होयसल और परमार आदि के शासकों को कई बार नीचा दिखाया। ईरान आदि देशों से व्यापार जलपोतों से किये। ये शिल्पकला के बड़े प्रिय थे। अजन्ता व अलोरा की गुफाओं की बहुत सी चित्रकारी इन्हीं के शासन में की गईं। ये गुफायें इनके राज्य में थीं। इन्होंने कई प्रसिद्ध व सुन्दर मन्दिर अपने राज्य में बनवाये। जैसे - बादामी में विष्णु मन्दिर, मीगोती में शिवमन्दिर आदि। ये विद्याप्रेमी भी थे। बल्हण और विज्ञानेश्वर जैसे प्रसिद्ध विद्वान् इनके दरबार में रहते थे। ये लोग न्यायकारी, सच्चाईपसन्द थे और अन्याय के विरुद्ध लड़ने वाले थे।

जब अहलावत वंश का दक्षिण में शासन दुर्बल हो गया तथा समाप्त हो गया, तब अहलावत वहां से चलकर उत्तरी भारत की ओर आ गये और जहां-तहां फैल गये। विक्रमादित्य षष्ठ के वंशज बाँसलदेव1 अहलावत के साथ इसी वंश की एक टोली (समूह) दक्षिण से चलकर बीकानेर राज्य की प्राचीन भूमि ददरहेड़ा2 में आकर बस गई। इसी अहलावत वंश के एक राजा गजसिंह की मृत्यु होने पर उसकी विधवा रानी अपने दो बालक बेटों जिनके नाम जून और माड़े थे, को साथ लेकर बांसलदेव के पास पहुंच गई और अपने देवर बांसलदेव के साथ विवाह कर लिया3 परन्तु उससे कोई बच्चा न हुआ। बीकानेर पर राठौर राज्य स्थापित होने से पहले ही इन अहलावत जाटों का यह संघ वहां से चलकर हरयाणा प्रान्त के भिवानी जिले के गांव कालाबड़ाला में कुछ दिन रहा। फिर वहां से चलकर रोहतक जिले में आकर बस गये। सबसे पहले यहां पर शेरिया गांव बसाया। चौ० डीघा उपनाम पेरू अहलावत ने कुछ दिन शेरिया में रहने के बाद डीघल गांव बसाया। डीघल गांव से लगा हुआ गांगटान गांव है जो डीघल का पांचवां पाना भी कह दिया जाता है। डीघल में से निकलकर ग्राम लकड़िया, धान्दलान और भम्बेवा बसे। अहलावत जाटों का सबसे बड़ा गांव डीघल है जो शुरू से ही अहलावत खाप का प्रधान गांव रहता आया है। अहलावत खाप के 26 गांव हैं जो निम्नलिखित हैं -

1. डीघल 2. शेरिया 3. गोछी 4. धान्दलान 5. लकड़िया 6. गांगटान 7. भम्बेवा 8. बरहाना गूगनाण 9. बरहाना मिलवाण। ये सब अहलावत गोत्र के गांव हैं। इनके अतिरिक्त्त अहलावत जाटों के कई-कई परिवार गांव 10. महराना 11. दुजाना 12. बलम में आबाद हैं जो कि अहलावत खाप के गांव हैं। खाप के और गांव 13. सूण्डाना 14. कबूलपुर 15. बिरधाना 16. चमनपुरा 17. मदाना कलां 18. मदाना खुर्द 19. छोछी 20. कुलताना 21. दीमाना 22. पहरावर 23. सांपला 24, खेड़ी 25. नयाबास 26. गढी।

यहां पर आने वाले अहलावत संघ में अहलावत गोत्र के ओलसिंह, पोलसिंह, ब्रह्मसिंह व जून बड़े प्रसिद्ध व्यक्ति थे जिन्होंने यहां के गांव बसाने में विशेष भाग लिया। उनकी प्रसिद्धि के कारण उनके नाम से ओहलाण, पहलाण ब्रह्माणजून गोत्र चले। जिला रोहतक में ओहलाण गोत्र के गांव सांपला, खेड़ी, गढ़ी और नयाबास हैं। ब्रह्माण गोत्र के गांव गुभाणा और


1,3. जाट इतिहास पृ० 87 व इंग्लिश अनुवाद पृ० 70, 89 लेखक ले० रामसरूप जून।
2,3. क्षत्रिय जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 363 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
3. जाट इतिहास उर्दू पृ० 206-207 लेखक ठा० संसारसिंह।
नोट - ददरहेड़ा बीकानेर के निकट है।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-206


खरकड़ी हैं। सांपला गढ़ी से ओहलाण गोत्र के जाटों ने बिजनौर में पहुंचकर वहां रतनपुर गांव बसाया।

अहलावत गोत्र के कुछ और गांव निम्नलिखित हैं - जिला रोहतक में बहलम्भा आधा, इसका निकास डीघल गांव से है। इस बहलम्भा गांव के अहलावतों ने खरकड़ा गांव बसाया। गांव बोहर, माड़ौधी और हुमायूंपुर में कई-कई परिवार अहलावत जाटों के हैं। जिला जींद में गांव रामगढ (पीड़धाना), प्रेमगढ़ (खेड़ा), बहबलपुर, लजवाना खुर्द, छान्यां (फतेहगढ़) और कई परिवार रामकली में हैं। जिला करनाल में बबैल गांव है। देहली प्रान्त में चिराग दिल्ली, पहाड़ी धीरज में अहलावत जाटों के काफी परिवार हैं। राजस्थान व पंजाब प्रान्त में भी अहलावत जाट कई स्थानों पर आबाद हैं। उत्तरप्रदेश में अहलावत जाटों के कई गांव हैं। जिला मेरठ में दौराला, कंडेरा, वलीदपुर, जिला मुजफ्फरनगर में जीवना, रायपुरनंगली, भैसी, बुपाड़ा, जिला बरेली में सुकटिया, जिला बिजनौर में बाकरपुर, धारुवाला, जालपुर, पावटी, अखलासपुर, कबूलपुर, किरतपुर, बाहुपुर, शहजादपुर आदि गांव अहलावतों के हैं। इनमें से कई गांवों का निकास डीघल गांव से है जो अपने आपको डीघलिया कहलाने का गर्व रखते हैं।

अहलावत गोत्र के महान् पुरुषों के नाम से ओहलाण,पेहलाण, ब्रह्माण, जून और माड़े गोत्र चले हैं। अतः इनकी रगों में एक ही धारा का खून बह रहा है। कुछ लेखकों ने जून गोत्र को अहलावत, ओहलाण, पेहलाण, ब्रह्माण गोत्रों का सौतेला भाई (मौसी का बेटा) लिखा है और दन्त्तकथा भी यही प्रचलित है। हमारे लेख से स्पष्ट है कि जून गोत्र भी इन चारों गोत्रों का रक्त भाई या एक ही वंश का है। राजा गजसिंह जिसके पुत्र जून और माड़े थे, अहलावत सोलंकी गोत्र का था1। अहलावत, ओहलाण, पेहलाण, ब्रह्माण गोत्रों के आपस में आमने-सामने एवं एक दूसरे की भांजी या भांजा के साथ विवाह नहीं होते हैं। जून ने छोछी गांव बसाया जो कि डीघल के निकट है। इसी गांव से जून गोत्र के 15 गांव बसे हैं - जिला रोहतक में 1. छोछी 2. नूणा माजरा 3. लोवा 4. खुंगाई 5. समचाणा 6. गद्दी खेड़ी 7. पत्थरहेड़ी 8. देसलपुर 9. अभूपुर, सोनीपत जिले में 10. छतहरा, फरीदाबाद में 11. अजरोंदा, चण्डीगढ़ में 12. मनीमाजरा और देहली प्रान्त में 13. नांगलकबीर 14. ककरोला (कुछ घर) जून जाट गोत्र के हैं।

अहलावत वंश के शाखा गोत्र - 1. ओहलाण 2. पेहलाण 3. ब्रह्माण 4. जून 5. माड़े

अहलावत वंश की प्रसिद्धि प्राचीनकाल से ही रहती आई है, जैसा कि लिख दिया गया है। वर्तमानकाल में हुए अहलावत वंश के कुछेक प्रसिद्ध मनुष्यो का संक्षेप से वर्णन निम्नप्रकार से है -

अहलावत खाप की पंचायत का न्याय तथा डीघल देवताओं2 का गांव की कहावत अति प्रसिद्ध है। इसका कारण साफ है कि इलावृत देश में रहने वाले अहलावत देवताओं का शुद्ध रक्त आज तक भी अहलावतों की रगों में बह रहा है।

डीघल गांव के अहलावत जाटों में कुछेक अति प्रसिद्ध पुरुष:

डीघल गांव आबाद होने के कुछ पीढ़ी बाद नैणा, लौराम और बिन्दरा ये सब एक ही समय में हुए। इनसे कुछ पीढ़ी बाद सन् 1857 ई० के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के समय केहर पहलवान एवं तिरखा थे। 20वीं सदी के आरम्भ


1. जाट इतिहास पृ० 87; जाट इतिहास अग्रेजी अनुवाद पृ० 89 लेखक रामसरूप जून।
2. देखो अध्याय 1 इलावृत देश।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-207


में दीनबन्धु सर छोटूराम ओहलाण, श्री जगदेवसिंह जी सिद्धान्ती अहलावत ग्राम बरहाणा (गूगनाण), चौ० लौटनसिंह पहलवान अहलावत पहाड़ी धीरज दिल्ली में हुए।

चौ० नैणा अहलावत - नैणा का कद लगभग आठ फुट, गठीला शरीर, लोहपुरुष, वीर योद्धा, बड़ा शक्तिशाली, वजन लगभग 64 धड़ी (आठ मन) बताया जाता है। इसके ऐतिहासिक कार्य तो अनेक हैं। लेकिन इनमें से अति प्रसिद्ध एक कार्य का वर्णन इस प्रकार है। एक बार नैणा सांझ होने पर गांव चुलाणा की चौपाल में ठहर गया। वहां के कुछ लोगों ने इसका विशालकाय शरीर तथा खद्दर की धोती, कुर्ता के पहनावे का खूब मजाक उड़ाया। खाने-पीने के लिए किसी ने नहीं पूछा। उस चौपाल के लिए एक बहुत लम्बा व भारी शहतीर बैलगाड़ी में चाल बैल जोड़कर लाया हुआ पड़ा था। उस गांव के निवासियों को सबक सिखलाने के लिए नैणा उस शहतीर1 को अकेला ही अपने कन्धे पर उठाकर तीन कोस दूरी तक अपने गांव डीघल में ले आया। दिन निकलने पर चुलाणा गांव के लोग यह अनुमान लगाकर कि नैणा के सिवाय और कोई भी उस शहतीर को नहीं ले जा सकता, गांव डीघल आये। उन्होंने डीघल गांव के निवासियों के सामने नैणा से अपनी गलती की माफी मांगी और शहतीर ले जाने की प्रार्थना की। नैणा ने इस शर्त पर हां कर ली कि शहतीर को आदमी उठाकर ले जा सकते हैं, उनकी संख्या कितनी भी हो सकती है। चुलाणा निवासी ऐसा करने में असफल रहे। तब गांव डीघल ने उस शहतीर की कीमत चुलाणा के लोगों को दे दी। वह शहतीर गांव के बीच वाली चौपाल में चढ़ा हुआ मैंने (लेखक) तथा दूर-दूर के लोगों ने देखा है। अब भी वह शहतीर दो टुकड़ों में चढ़ा हुआ एक जाट के मकान में देखा जा सकता है (लेखक)। नैणा की खेत में काम करने वाली जेळी का नाला (दस्ता) आज भी उसके खानदान के एक घर में शहतीर के नीचे लगा थाम की शक्ल में देखा जा सकता है। नैणा खानदान में आज 35 घर हैं जिनमें मैं भी हूँ (लेखक)।

चौ० लौराम वैद्य अहलावत जाट - यह अपने समय का बहुत प्रसिद्ध वैद्य हुआ था। इसकी प्रसिद्धि उत्तरी भारत में दूर-दूर तक थी। वह नाड़ी को देखकर हर तरह की बीमारी को जान लेता था और उसका इलाज कर देता था। एक बार दिल्ली के बादशाह की बेगम बच्चा जनने लगी परन्तु बच्चा अन्दर अटक गया जिससे बेगम मरने लगी। दिल्ली के बड़े-बड़े वैद्य जवाब दे गये। बादशाह ने लौराम वैद्य को लाने के लिए तेज रफ्तार घुड़सवार भेजे जो डीघल गांव से उसको दिल्ली दरबार में ले गये। लौराम वैद्य को पर्दे के पीछे से बेगम के हाथ की नाड़ी स्पर्श कराई गई। लौराम ने बादशाह को अलग ले जाकर बताया कि बच्चा उल्टा है। बेगम को मत बताओ और उसकी छत पर तोप का फायर करवा दो। ऐसा करवाते ही बच्चा बाहर आ गया जो कि लड़का था। बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने लौराम वैद्य को मनचाहा इनाम मांगने को कहा। लौराम वैद्य ने बादशाह से कहा कि “मुझे कोई वस्तु या धन आदि नहीं चाहिए, आप दिल्ली शहर में से गुजरने वाली किसानों की बैलगाड़ियों पर महसूल (टैक्स) लेना बन्द कर दो।” बादशाह ने ऐसा ही किया। लौराम वैद्य की प्रसिद्धि उत्तरी भारतवर्ष में दूर-दूर तक फैल गई। किसानों की बैलगाड़ियों


1. उस शहतीर का भार लगभग 25 मन है जो आज भी डीघल गांव के एक मकान में चढ़ा हुआ है। घन फुट के हिसाब से यह भार लिया गया है।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-208


पर कर (टैक्स) बन्द करवाने वाली बात लौराम वैद्य के जाट होने का ठोस प्रमाण है क्योंकि ब्राह्मण, बनिया या अन्य जाति का पुरुष यह मांग नहीं कर सकता। वह तो धन या व्यापार की मांग करेगा।

बिन्दरा अहलावत जाट - यह तलवार का धनी, निडर, साहसी वीर योद्धा था। अन्याय के विरुद्ध युद्ध करना अपना परम धर्म समझता था। इसके वीरता की एक घटना का वर्णन इस प्रकार है। एक समय जिला रोहतक में लडान नामक स्थान पर जाखड़ जाटों के सरदार लाडासिंह का राज्य था। एक बार पठानों ने उनसे लडान छीन लिया। जाखड़ों ने सम्मिलित शक्ति से पठानों से लडान फिर ले लिया1

यह घटना इस तरह से घटी - बहू झोलरी में दिल्ली के मुसलमान बादशाह की ओर से एक नवाब का शासन था। उसने जाखड़ जाटों को हराकर लडान पर कब्जा कर लिया। फिर जाखड़ों के गांव को लूटना शुरु कर दिया। उन पर हर प्रकार के अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। जाखड़ों की पंचायत डीघल आई और मदद मांगी। इस हमदर्दी के लिए डीघल तथा अहलावत खाप के बहादुर युवकों का एक बड़ा दल जिसका सेनापति वीर योद्धा बिन्दरा था, जाखड़ों के पास पहुंच गया। अहलावतों और जाखड़ों ने मिलकर बहू झोलरी पर धावा बोल दिया। मुसलमान सेना साहस छोड़ गई और किले में जा बड़ी। बहादुर बिन्दरा एक अहलावत जाट दस्ता (टोली) को साथ लेकर दीवार पर से कूदकर सबसे पहले किले में घुस गया। फिर तो शेष सभी जाट किले में घुस गये। इन्होंने पठान सेना को गाजर मूली की तरह काट दिया और बिन्दरा ने नवाब का सिर उतार दिया। किले पर जाटों ने अधिकार कर लिया। परन्तु बड़े खेद की बात है कि वीर योद्धा बिन्दरा वहीं पर शत्रु की गोली से शहीद हो गया। इसके पश्चात् जाखड़ों का लडान पर अधिकार हुआ और इनके बहुत से गांव आराम से बस गये। जाटों की शक्ति से डरकर दिल्ली का बादशाह चुपचाप बैठा रहा। जाटों से लोहा लेने का साहस न कर सका। यह है बिन्दरा की वीर गाथा।

केहर पहलवान अहलावत - यह लगभग साढे-छः फुट लम्बा, वजन 48 धड़ी (6 मन), गठीला तथा फुर्तीला पहलवान था। बैलगाड़ियों के काफले के साथ कलकत्ता तक भी गया था। वहां निकट किसी राजा की रियासत (राज्य) के सबसे बड़े पहलवान को कुश्ती में हराकर बड़ी प्रसिद्धि प्राप्त की। राजा ने खुश होकर बहुत इनाम दिया। इसी तरह पंजाब के एक शक्तिशाली मुसलमान पहलवान को लाहौर में हराया। इसने हरयाणा, उत्तरप्रदेश, पंजाब तथा देहली प्रान्त के अनेक पहलवान कुश्ती करके पछाड़ दिये थे। यह कुश्ती में हारा कभी भी नहीं। सारे उत्तरी भारत में इसकी प्रसिद्धि थी और डीघलिया केहर पहलवान के नाम से प्रसिद्ध था।

तिरखा अहलावत - यह लगभग सात फुट लम्बा वजन 56 धड़ी (7 मन), गठीला, फुर्तीला, फौलादी हड्डियों वाला और रौबीला वीर योद्धा था। अपने समय में वीरता तथा सुन्दरता में यह अद्वितीय था। यह तलवार का धनी था। इसको उस समय का वीर अर्जुन कहा गया है। इसकी तलवार लम्बी व भारी थी। एक साधारण युवक उसको उठाकर वार करने में असमर्थ था। इसकी


1. जाट इतिहास पृ० 591 लेखक ठा० देशराज।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-209


अद्भुत शक्ति के कुछ मुख्य उदाहरण निम्न प्रकार से हैं -

  1. डीघल गांव में एक बारात आई हुई थी। वह अपने साथ एक बड़े वजन का मुदगर (मुगदर) व उसको एक हाथ से उठाने वाला पहलवान साथ लाये थे। उस पहलवान ने डीघल वालों को मुदगर उठाने की चुनौती दी और उसने स्वयं उसको उठाकर दिखलाया। डीघल के एक-दो युवकों ने भी उस मुदगर को उसी तरह उठा दिया। हार-जीत का फैसला न होने पर तिरखा को बुलाया गया। यह मुकाबिला एक कच्ची चौपाल के निकट हो रहा था। चौ० तिरखा ने मुदगर में लगा हुआ दस्ता (मूठ) में अपने दोनों हाथों की उंगलियां डाल लीं और मुदगर को अपनी टांगों के बीच आगे-पीछे झुलाकर एक ऐसे झटके से ऊपर को फैंक दिया और वह मुदगर1 चौपाल की छत पर जाकर गिरा जिसके वजन व दबाव से छत की कड़ी टूट गई। वह छत लगभग 12 फुट ऊँची थी और जिसकी मंडेर तो फुट ऊँचाई की थी। बाराती बेचारे लज्जित हो गये।
  2. चौ० तिरखा खरड़ को तालाब के पानी में धोकर ऐसा निचोड़ देता था कि फिर कई आदमी लगकर भी उससे एक बूंद पानी नहीं निकाल सकते थे। उस निचोड़े हुए खरड़2 को तह करके एक हाथ से ऊपर लिखित चौपाल की छत पर फेंक दिया करता था।
  3. गांव बादली [Gulia|गुलिया]] वालों का काज प्रसिद्ध है। उस अवसर पर दूर-दूर से लाखों मनुष्य आये थे। बादली वालों ने एक कटे हुए वृक्ष के तने में एक दस्ता (मूठ) लगवाकर रखवाया था। यह लक्कड़ बहुत भारी तथा असंतुलित था। उस मुदगर को उठाने के लिए तिरखा डीघलिया को पुकारा गया। चौ० तिरखा ने एक हाथ से उस लक्कड़3 को उठा दिया और लोगों के कहने अनुसार एक छोटी टेकड़ी पर उस मुदगर को उठाये-उठाये चढ़ गया। इस अद्वितीय कारनामे को देखकर लाखों आदमियों ने खुशी में तालिया बजाईं और “तिरखा की जय” बोलकर उसका सम्मान किया।
  4. एक बार डीघल की कई बैलगाड़ियां गेहूं भरकर एक स्थान से दूसरे स्थान को जा रही थीं। एक गाड़ी का पहिया गीली भूमि में नीचे को धंस गया। इस गाड़े में 70 मन गेहूं भरे थे और इसको चार बैल खींच रहे थे। सबने मिलकर उस गाड़ी को निकालने के उपाय किये परन्तु असफल रहे। चौ० तिरखा ने उस गाड़ी के धुरा के नीचे से मिटटी निकलवाई और उस धुरा के नीचे अपनी कमर लगाकर ऊपर को पहिये को उठाकर आगे को बाहर कर दिया। यह एक अद्वितीय कार्य है।

बड़े खेद की बात है कि लौराम, नैना, केहर, तिरखा आदि के अतिप्रसिद्ध कारनामों का कोई लेख व रिकार्ड नहीं रक्खा गया है। उनके कारनामों की तुलना तक विदेशी आज तक भी नहीं पहुंच पाये हैं। भारतवासियों विशेषकर जाट जाति को उन पर गर्व है।

श्री जगदेवसिंह जी सिद्धान्ती शास्त्री - आपका जन्म बरहाणा (गूगनान) गांव के चौ० प्रीतराम


1. मुदगर का वजन लगभग 40 धड़ी (5 मन)
2. खरड़ का वजन लगभग 16 धड़ी (2 मन)
3. लक्कड़ का वजन लगभग 56 धड़ी (7 मन)


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-210


अहलावत के घर सन् 1900 ई० में हुआ। आप अपने समय के उच्चकोटि के वेदविद्या के प्रकाण्ड विद्वानों में गिने जाते हैं । आप सन् 1922 से 1929 ई० तक गुरुकुल मटिण्डू तथा फिर आर्य महाविद्यालय किरठल के संचालक रहे। हैदराबाद सत्याग्रह में साढ़े-चार मास जेल काटी। आप ऋषि दयानन्द के कट्टर अनुयायी तथा एक आदर्श आर्यनेता थे। इलाहाबाद हाईकोर्ट में जाटों को शूद्र लिखा हुआ था। काण्ठ राज्य का एक केस जिला मुजफ्फरनगर की अदालत में था। वहां सिद्धान्ती जी ने एक पक्ष का वकील बनकर यह सिद्ध कर दिया कि जाट शूद्र नहीं अपितु द्विज (क्षत्रिय) हैं। (पूरी जानकारी के लिए देखो द्वितीय अध्याय, जाट क्षत्रिय वर्ण के हैं, प्रकरण)

आप को सन् 1956 ई० में सर्वखाप पंचायत हरयाणा (विशाल हरयाणा - 300 खापों) का प्रधान चुना गया। इस पद पर आप लगातार सन् 1979 ई० स्वर्गवास होने तक रहे। आप के विषय में अधिक वर्णन दशम अध्याय में किया जायेगा।

चौ० लोटनसिंह पहलवान अहलावत - आपका गांव पहाड़ी धीरज दिल्ली है। आप अपने समय के बड़े शक्तिशाली प्रसिद्ध पहलवान थे। आप एक वीर योद्धा, निडर साहसी तथा कट्टर आर्य थे। लोटनसिंह सच्चा गोरक्षक था। इसने वह काम पूरा किया जो ईश्वर का आदेश है कि - “गौओं को मारनेवाले को मार, गौ आदि पशुओं को निरन्तर सुखी करो” (ऋ० मं० 1/अ० 18/ सू० 120/ मं० 10)। इस वीर आर्य योद्धा ने दिल्ली में गोवध करने वालों को मौत के घाट उतारना आरम्भ किया। मुसलमान व अंग्रेज सरकार इसके विरोधी बन गये। इसने अपने साथी वीर आर्यों का संघ बनाया। किसी से न डरकर सैंकड़ों कसाई एवं उनके साथ्ही मुसलमानों को मौत के घाट पहुंचा दिया।

पूरी दिल्ली के मुसलमानों में हाहाकार मच गई। कसाइयों ने इससे डरकर गोवध करना बन्द कर दिया। चौ० लोटन पहलवान की इस वीरता की प्रसिद्धि पूरे भारतवर्ष में फैल गई। यह है चौ० लोटनसिंह पहलवान की वीर गाथा।

दीनबन्धु सर चौ० छोटूराम ओहलाण - आप बड़े बुद्धिमान्, विद्वान्, राजनीतिज्ञ, कुशल शासक, सच्चे देशभक्त, ऋषि दयानन्द जी के सच्चे शिष्य, सिद्धान्तों के धनी, कर्मयोगी, समाज सुधारक, किसानों के हितकारी, निपुण कार्यकर्त्ता और निडर नेता थे। आपका सबसे बड़ा गुण यह है कि बिना मांगे ही आपने पंजाब के किसानों की बिगड़ी आर्थिक, सामाजिक व मानसिक दशा को सुधारा तथा उनको चहुंमुखी उन्नत किया जो आज तक कोई दूसरा नहीं कर सका है। इसी कारण तो आपको “किसानों का मसीहा” कहा गया है। आपके इन गुणों का विस्तार से वर्णन “आप की जीवनी” दशम अध्याय में किया जायेगा।

दहिया

14. दहिया

कुछ इतिहासज्ञ दहियावंश की उत्पत्ति सूर्यवंश में महान् महिमाशाली दधीचि ऋषि से मानते हैं। और कुछ इतिहासकारों ने इनका प्रचलन चन्द्रवंशी जाट राजा वीरभद्र के पौत्र दहिभद्र से लिखा है2। महाभारत तथा पुराणों में यह लेख तो है कि दधीचि ऋषि एक महान् ऋषि तथा अद्वितीय दानी थे जिसने देवताओं के मांगने पर शस्त्र बनाने के लिए अपने प्राण त्यागकर


1. जाट इतिहास उर्दू पृ० 276, लेखक ठा० संसारसिंह; जाटों का उत्कर्ष पृ० 339, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
2. जाट इतिहास हिन्दी पृ० 83-84, तथा जाट इतिहास अंग्रेजी अनुवाद पृ० 17 लेखक ले० रामसरूप जून।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-211


अपनी हड्डियाँ उनको दान कर दीं1। परन्तु यह कहीं नहीं लिखा है कि उनके नाम से क्षत्रिय आर्यों का संघ या वंश प्रचलित हुआ। सो दधीचि ऋषि से दहियावंश (गोत्र) प्रचलित होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। दूसरा मत दहिभद्र के नाम से दहियावंश प्रचलित होने का है। इसका संक्षिप्त वर्णन इस तरह से है - पुरुवंशी राजा वीरभद्र जाट राजा था जिसके गण (संघ) शिव की जटाओं (शिवालिक पहाड़ियों) में थे। इसकी राजधानी हरद्वार के निकट तलखापुर थी। यह शिवजी महाराज का अनुयायी था। वीरभद्र की वंशावली, राणा (जाटगोत्र) धौलपुर के राजवंश के इतिहास में मिली है, जिसमें लिखा है कि राजा वीरभद्र के 5 पुत्र और 2 पौत्रों से 7 जाटगोत्र चले जिसमें दहिभद्र* से दहिया गोत्र चला लिखा है (देखो द्वितीय अध्याय, राजा वीरभद्र की वंशावली)। अतः स्पष्ट है कि दहिया (गोत्र) चन्द्रवंशज राजा वीरभद्र का वंशज है और वैदिक काल से ही प्रचलित है। दहिया लोगों ने प्राचीन समय से ही बड़े-बड़े युद्ध किए हैं। ये लोग अपनी वीरता एवं निडरता के लिए अति प्रसिद्ध हैं। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है -

वैदिककाल में दहिया लोग हरद्वार से लेकर कैलाश पर्वत तक के क्षेत्र में थे। उस समय का इनके राज्य स्थापित तथा युद्ध करने का ब्यौरा प्राप्त नहीं है। इन लोगों ने महाभारत युद्ध में भाग लिया था। उस समय ये चीन की दक्षिणी भूमि पर रहते थे2। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद ये लोग अन्य जाटवंशों की तरह भारतवर्ष से ईरान और फिर कैस्पियन सागर एवं अरल सागर तक पहुंच गये थे। कर्नल जेम्स टॉड ने, जस्टिन और हैरोडोटस इतिहासकारों का हवाला देकर लिखा है कि ईसा से हजारों वर्ष पहले दहिया महाजाति दल सिर दरिया के पूर्व में आबाद था3। इनके निकट क्षेत्र में हेर, भुल्लर और सिहाग जाटवंश बसे हुए थे। दारा (Darius) और् सिकन्दर महान् के बीच युद्ध में दहिया लोगों ने भाग लिया था। इन लोगों को चीनियों ने बल्ख दहिया, यूनानियों ने दहाय, ईरानियों ने दही कहा है जो आजकल दहिया कहे जाते हैं। ये लोग उत्तरी ईरान, कैस्पियन सागर, अरल सागर, सिर दरया तथा अमू दरिया घाटी तक फैल गये थे। यहां पर इन्होंने बस्तिया बसाईं और राज्य स्थापित किया। जिस क्षेत्र पर इन लोगों का अधिकार था, ईरानियों ने उसको दहिस्तान का नाम दिया4 और इनके नाम से कैस्पियन सागर को दधी या दहाय-सागर कहा गया। डी० पी० सिंघल के 500 ई० पूर्व बनाए गये एशिया के नक्शे पर भी दहिया लोगों को |कैस्पियन सागर के क्षेत्र पर दिखाया गया है।

ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में हूणों ने चीन से जाटों को, जो चीनी भाषा में यू-ची (गुट्टी) बोले जाते थे, बाहर निकाल दिया था। वे लोग ऊपर लिखे हुए क्षेत्र में दहिया लोगों के पास पहुंचे थे, वहां पर दहिया संघ ने उनका हार्दिक स्वागत किया था।

529 B.C. में (529 ई० पू०) महान् सम्राट् सायरस ने जाट राज्य मस्सागोटाई की जाट रानी


1. श्रीमद् भागवत पुराण षष्ठ स्कन्ध, अध्याय 9-10.
2. जाट इतिहास पृ० 84, लेखक ले० रामसरूप जून।
3. जाट इतिहास अंग्रेजी अनुवाद पृ० 79 लेखक रामसरूप जून।
4. R.G. Kent, Languages, Vol XII, P. 298; Steingass Persian-English Dictionary, 498 - Daghistan.
  • . दहिभद्र के नेतृत्व में चन्द्रवंशी (पुरुवंशी) क्षत्रिय आर्यों का संघ (गण), दहिया संघ या वंश प्रसिद्ध हुआ। इन संघों (गणों) में चन्द्रवंशी शिवि गण भी थे। (इसी अध्याय में देखो शिवि वंश प्रकरण)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-212


तोमिरिस पर आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में रानी की ओर से दहिया जाट भी लड़े थे।

बरुसुस (Berossus) के लेख अनुसार सायरस जब मारा गया, तब दहिया जाटों के साथ युद्ध कर रहा था1

सम्राट् सिकन्दर महान् यूनान से विजय करता हुआ Oxus River (अमू दरिया) पर पहुंचा तो यहां दहिया जाटवीरों ने उससे टक्कर ली थी। दहिया लोगों के साथ मिलकर युद्ध करने वाले कंग जाट एवं दूसरे जाट भी थे। इन जाटों का सेनापति स्पितम था। जाटों ने यूनानी सेना का एक पूरा डिविजन मौत के घाट उतार दिया। यह घटना 328 B.C. में समरकन्द के स्थान पर हुई । जब सिकन्दर वहां पहुंचा तो उसने अपने सब यूनानी सैनिक मृत पाये। यह देखकर उसने पीछे हटकर अपना सैनिक कैम्प लगाया। अपने सेनापति स्पितम (Spitama) के नेतृत्व में शूरवीर जाटों ने वहां पर भी उसके मुख्य कैम्प पर धावा कर दिया। जब सिकन्दर जाटों को पराजित न कर सका तब उसने वहां की आम जनता व स्त्रियों पर अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। इस बड़े अन्याय को देखकर जाटों ने निराश होकर अपने नेता स्पितम का सिर उतार दिया और उस सिर को सिकन्दर के सामने हाजिर कर दिया। यह देखकर सिकन्दर ने जनता पर अपने भयंकर अत्याचार करने बन्द कर दिए। तब जाट बड़ी संख्या में सिकन्दर की सेना में शामिल हो गये।

यूनानी लेखकों के अनुसार, “जब यूनानी सैनिकों ने पंजाब में आगे बढ़ने और युद्ध करने से इंकार कर दिया था तब सिकन्दर ने उनको अपनी सेना के जाटों को आगे बढ़ने की धमकी दी थी। 326 ई० पू० सिकन्दर की जाटसेना ने पौरवसेना पर सबसे पहले आक्रमण किया था। उस जाट सेना में अधिकतर दहिया जाट सैनिक थे2।” (सिकन्दर का यूनान से चलकर भारतवर्ष पर आक्रमण और उसकी सेना से जाटों ने लोहा लिया, के विषय में पूरा वर्णन उचित स्थान पर किया जाएगा)।

दहिया जाटों का ईरान (फारस) में भी निवास एवं राज्य था, इसके कुछ प्रमाण निम्नलिखित हैं - R. Sankrityayana राहुल सांकृत्यायन) ने लिखा है कि “दहिया लोग उच्च कोटि के घुड़सवार एवं निशाने बाज थे। ईरान में कहे जाने वाले पार्थी, एक दहिया जाति थी3।” Psykes ने लिखा है कि “ईरान में दहिया लोगों का एक डिविजन (Division) था, जो अरबेला के युद्ध में Persian Army (ईरानी सेना) में शामिल होकर लड़े थे4।” यूनानी इतिहासकार स्ट्रेबो (Strabo) ने लिखा है कि “दही (दहिया) राजा अर्सेसज़ (Arsaces) ने पार्थिया को जीतकर वहां राज्य स्थापित कर दिया था5।” इस राज्य का नाम ईरान में अर्ससिड साम्राज्य (Arscid Empire) था, जिसको


1. जाट्स दी एनशेन्ट रूलर्ज पृ० 131 लेखक बी० एस० दहिया आई० आर० एस० (संकेत हवाला) Sykes, op. Cit. P. 153).
2. Jats the Ancient Rulers, P. 252, B.S. Dahiya IRS.
3. Madhya Asia Ka Itihas Vol. 1, P. 74, in Hindi by Rahul Sankrityayana.
4. A History of Persia, Vol. 1, P. 307.
5. Rowlinson, op. Cit. P. 520.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-213


224 सन् ई० में ससानिडज (Sassanids) ने उखाड़ दिया था1। इस Arscid (अर्ससिड) दहिया राजकुल के राजा Valarasaces वलारससेज़ ने दूसरी शताब्दी ई० पू० अरमेनिया में एक हिन्दू आबादी स्थापित की थी। इन हिन्दुओं के बनाये हुए श्रीकृष्ण जी के मन्दिरों को चौथी शताब्दी ई० में St. Gregory (ग्रेगुरी) ने बरबाद कर दिया2। A.S. Altekar, Indo-Asian Culture, Oct. 1958, PP 120-21).

ईरान में दहिया जाटों का शासन 256 ई० पू० से 224 AD तक, 480 वर्ष रहा।

दहिया लोग विदेशों से अपने पैतृक देश भारतवर्ष में कई बार आये। पहली बार ये लोग सिकन्दर के साथ सैनिकों के रूप में आये और फिर बड़ी संख्या में कुषाणों के साथ आये। यहां पर ये लोग पहले सिन्धु-सतलुज संगम के क्षेत्र में रहने लगे। इन वीर जाटों के विषय में कर्नल जेम्ज़ टॉड ने लिखा है कि “दहिया जाट एक प्राचीन जाति है जिसका निवास स्थान सिन्धु-सतलुज नदियों के संगम के क्षेत्र में था। सिकन्दर महान् से घोर युद्ध करने वाले दाही लोग दहिया ही हैं3।” टॉड ने दहिया जाटवीरों को 36 राजकुलों की सूची में शामिल किया है।

सिंध प्रान्त से दहिया लोग राजस्थान में पहुंच गये थे। वहां पर इन्होंने राज्य स्थापित किये। इसके प्रमाण शिलालेखों से मिले हैं, जो निम्न प्रकार से हैं –

  • 2. दूसरा शिलालेख राणा जगधर दहिया ने अपने पिता राणा विक्रमसिंह (पुत्र कीर्तिसिंह व माता नाईला के स्वर्गारोहण की स्मृति में केवाय माता मन्दिर के पास खड़े हुए स्मारक स्तम्भ पर ज्येष्ठ सुदी 13 सम्वत् 1300 (1 जून 1243 ई०) के दिन सोमवार को अंकित कराया था5
  • 3. तीसरा शिलालेख राज्य जोधपुर में भारौठ के समीप मंगलाणा गांव से मिला है, जो 26 अप्रैल 1215 ई० रविवार के दिन लिखवाया गया था। इस शिलालेख को महामण्डलेश्वर राणा कड़वाराव दहिया के पौत्र एवं पद्मसिंह दहिया के पुत्र जयन्तसिंह ने लिखवाया था6
  • 4. चौथा शिलालेख “चन्द्रावती सीतलेश्वर महादेव मन्दिर” से प्राप्त हुआ है। उस पर राजा

1. Rowlinson, op. Cit. P. 530, note 4.
2. Jats the Ancient Rulers, P. 281, by B.S. Dahiya IRS.
3. Col. Tod, op. Cit Vol. 1 P. 98.
4. Epigraphica Indica Vol. XII P. 56-57.
5. एपिग्राफिका इण्डिका जिल्द 12 पृ० 58.
6. इण्डियन एन्टिक्वेरी जिल्द 14, पृ० 87-88.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-214


भीवासीह दहिया और उनका पुत्र रौत उदा दहिया लिखा है1

भाट मुहणोत नैणसी ने सम्वत् 1722 (सन् 1665 ई०) में दहिया जाटों के विषय में खोज करके लिखा है कि “दहिया लोगों का निवासस्थान गोदावरी नदी के किनारे नासिक प्रम्बक के समीप थालनेरगढ़ था। यह स्थान दहिया जाटों की राजधानी थी।”

दहिया जाट हरसारे, भारौठ, पर्वतसर, देरावर राज्य जोधपुर में और साबर घटियाली अजमेर में बसे हुए हैं। जोधपुर राज्य में जालौर* का किला भी दहिया जाट राजाओं का बनवाया हुआ है जो मारवाड़ राज्य के इतिहास से प्रमाणित है। सिरोही राज्य में कैर, जोधपुर में जालौर, सांचौर, बाली, पाली, जसवन्तपुरा और मालानी के जिलों में दहिया लोग आबाद हैं जो राजपूतों का शासन होने पर उनके प्रभाव से राजपूत हो गए। अम्बाला जिले की खरड़ तहसील में भी 12 गांव दहिया राजपूतों के हैं।

दहिया जाटों का एक दल राजस्थान से आकर हरयाणा राज्य के रोहतक व सोनीपत जिलों में बस गया। ये लोग दहिया राणा एवं दहिया बादशाह2 कहलाते हैं। सबसे पहले यहां पर दहिया जाटों ने सोनीपत जिले में बरौना खेड़ा बसाया। यहां से इस वंश का विस्तार होकर रोहतक एवं सोनीपत जिलों में 42 गांव बसे। जिला रोहतक की झज्जर तहसील में गांव बिरधाना दहिया जाटों का है। सोनीपत जिले में दहिया जाटों के गांव निम्नलिखित हैं -

बरौना, किढौली, रोहना, पहलादपुर, खुर्मपुर, निलौठी, गोपालपुर, नाहरा, नाहरी, हलालपुर, मण्डौरा, मण्डौरी, थाना कलां, थानाखुर्द, बिन्धरौली, गढ़ी बाला, झरोट, रोहट, झरोटी, मटिण्डू, पीपली, खांडा, सेहरी, सिलाना, नकलोई, भटगांव, रतनगढ़, भदाना, सिसाना, गढ़ी सिसाना, बिधलान, ककरोई, तुर्कपुर, भौवापुर, नसीरपुर, तिहाड़ कलां, तिहाड़ खुर्द, कवाली, मल्हामाजरा, मोहमदाबाद, फतेपुर।

इन गांवों के अतिरिक्त मेरठ में वणा, झिझोखर, भोजपुर; बिजनौर में लक्खूवाला, नियमपुरा, तिमरपुर, सिकन्दरपुर, मिर्जापुर, जसमौरा, पृथ्वीपुर; मुजफ्फरनगर में नूनांगली; सहारनपुर में नवादा और अम्बाला में सिढौरा के समीप राजपुर गांव दहिया जाटों के हैं।

दहिया जाटों में कुछेक अति प्रसिद्ध पुरुष:

महात्मा निश्चलदास (1791-1863)

1. महात्मा निश्चलदास दहिया - आपका जन्म सोनीपत जिले के गांव किढौली में सन् 1791 ई० में एक दहिया जाट परिवार में हुआ। आपको बाल्यकाल से ही संस्कृत विद्वान् बनने की धुन थी। फलतः आप काशी गए और यह जानकर कि केवल ब्राह्मणों के लड़के ही संस्कृत शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार रखते हैं, आपने स्वयं ब्राह्मण कहकर महात्मा विशुद्धानन्द से शिक्षा प्राप्त की। आप संस्कृत भाषा के बृहस्पति कहे जाते हैं, और वेदान्तशास्त्र के धुरन्धर विद्वान् थे। आपके द्वारा लिखित


  • आजकल जालौर राजस्थान का एक जिला है।
1. SL No. 1856 of Inscriptions of North India.
2. बी० एस० दहिया ने अपनी पुस्तक जाट्स दी एन्शन्ट रूलर्ज पृ० 222-223 पर लिखा है कि वास्तव में शाही एक पदवी है जो सब जाटों के लिये थी। अब भी इनको जाटशाही कहा जाता है, विशेषकर दहिया जाटों को बादशाह कहा जाता है। यह पदवी उस समय से आरम्भ है जबकि ये लोग मध्य एशिया में थे।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-215


“वृत्ति प्रभाकर”, “विचार-सागर”, “युक्तिप्रकाश” एवं “तत्वसिद्धान्त” नामक ग्रन्थ आपके प्रकांड पाण्डित्य का पूर्ण परिचय प्रदान करते हैं। इन ग्रन्थों के आधार पर आप अपने समय में एक उच्चकोटि के विद्वान् प्रसिद्ध हुए। आपका वह शास्त्रार्थ बड़ी ख्याति रखता है जो महाराजा रामसिंह बूंदी नरेश की अध्यक्षता में चक्रांकित सम्प्रदाय वालों के साथ हुआ था। चक्रांकित सम्प्रदाय के साधु दिन में भी अपने आगे मशाल जलवाकर चला करते थे। मुख्य विवाद इसी मूर्खता पर था। महात्मा निश्चलदास ने उन साधुओं को शास्त्रार्थ में हरा दिया और यह कुप्रथा बन्द हो गई। आपके उपदेशामृत से राजस्थान और हरयाणा की जनता विशेष प्रभावित हुई। आप पर न केवल दहिया जाटों अथवा अन्य जाटों को भी गर्व है बल्कि पूरे भारतवर्ष की जनता को भी प्रेरणा प्राप्त हुई है। सन् 1863 ई० में आपका स्वर्गवास हो गया।

2. चौ० पीरूसिंह दहिया - आपका जन्म दहिया जाट के घर सोनीपत के मटिण्डू गांव में हुआ था। आप उन आर्यपुरुषों में से थे जिनको स्मरण करके हरयाणा की जनता आज तक प्रेरणा लेती है। आपने चारों ओर सुधारवादिता और आर्यत्व की धूम मचा दी थी। आपने गुरुकुल मटिण्डू की नींव डाली। यह संस्था आज तक ऋषि दयानन्द जी के सन्देश को प्रसारित कर रही है। यह गुरुकुल आज भी शिक्षा क्षेत्र में काफी उन्नतिशील है। चौ० पीरूसिंह जी दहिया खाप के माने-ताने नेता थे।

कर्नल होशियारसिंह दहिया परमवीर चक्र

3. कर्नल होशियारसिंह दहिया परमवीर चक्र - कर्नल होशियारसिंह का जन्म 5 मई सन् 1936 ई० को चौ० हीरासिंह दहिया जाट के घर जिला सोनीपत के गांव सिसाना में हुआ था। आप भारतीय थलसेना में एक साधारण सिपाही भर्ती हुए और उन्नति करके 30 जून सन् 1963 ई० को लेफ्टिनेन्ट का पद प्राप्त कर लिया। अफसर बनकर आप नं० 3 ग्रेनेडियर पलटन में आ गये। आपने सन् 1971 ई० के भारत-पाक युद्ध के समय मेजर के रूप में पाकिस्तानी सेना के पुरजोर आक्रमण को बड़ी बहादुरी और साहस से निष्फल कर दिया और उसके मोर्चों पर अधिकार कर लिया था। इस महान् शूरता के लिए आपको 17 दिसम्बर 1971 को परमवीर चक्र (जीवित) से विभूषित किया जो कि भारतवर्ष का सर्वोच्च शूरता पारितोषिक (तमग़ा) माना जाता है। इस सन्दर्भ में संक्षिप्त सा वर्णन उल्लेखनीय है -

15 दिसम्बर 1971 को मेजर होशियारसिंह शकरगढ़ के क्षेत्र में नसन्ता नदी के पार 3 ग्रेनेडियरज़ पलटन की एक कम्पनी की अगुवाई कर रहे थे। आपको जरपाल नामक स्थान पर स्थित शत्रु के मोर्चे पर अधिकार करने का आदेश मिला। आपने अपनी कम्पनी के साथ शत्रु की धुआंधार गोलाबारी तथा मशीनगनों के भारी कारगर फायर के नीचे आक्रमण कर दिया तथा हाथों-हाथ के युद्ध के पश्चात् शत्रु के मोर्चों पर अधिकार कर लिया। अगले दिन शत्रु ने टैंकों के साथ तीन भयंकर प्रत्याक्रमण किये। आपने उनकी तनिक भी परवाह न करते हुए अपने जवानों को मोर्चों में डटे रहने के लिए अत्युत्साहित किया। इस प्रकार शत्रु का हमला विफल कर दिया तथा शत्रु 85 मरे हुए सैनिकों को छोड़कर जिनमें एक कमांडिंग अफसर तथा तीन अन्य अफसर भी सम्मिलित थे, भाग खड़ा हुआ। यद्यपि मेजर होशियारसिंह गम्भीर रूप से घायल हो गए थे फिर भी युद्ध बन्द होने तक मोर्चे से लौटने के लिए इन्कार कर दिया। इस युद्ध के दौरान आपने भारतीय सेना की सर्वोच्च प्रथाओं के अनुसार सर्वोच्च वीरता, अदम्य युद्ध-साहस तथा नेतृत्व प्रदर्शित किया।

आजकल आप कर्नल के पद पर ग्रेनेडियरज पलटन के कमांडिंग अफसर हैं।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-216


यदि हम कर्नल होशियारसिंह को चतुर शेर (Clever Tiger) कहें तो उचित होगा आप पर न केवल दहिया जाटों अथवा जाट जाति को गर्व है बल्कि सब भारतवासियों को भी गर्व है।

डबास गोत्र दहिया गोत्र की शाखा है।

जाखड़

15. जाखड़ -

जाखड़ जाटवंश (गोत्र) दहिया जाटवंश की तरह ही वैदिककाल से है। इस वंश का संचालक राजा वीरभद्र का पुत्र जखभद्र* था। जाखड़ चन्द्रवंशी हैं। जाखड़ एक प्रसिद्ध गोत्र है।

आरम्भ में जाखड़ जाटों का दल शिवालिक की पहाड़ियों एवं हिमालय पर्वत की दक्षिणी तलहटी में रहा। अपने देश भारतवर्ष से ये लोग विदेशों में गये और वापिस लौटकर आ गये, इसका कुछ संक्षिप्त ब्यौरा इस प्रकार से है - महाभारत और मार्कण्डेय पुराण का हवाला देकर बी० एस० दहिया ने लिखा है कि “जाखड़ लोग कश्मीर के उत्तर में दूर मध्य एशिया बल्ख के क्षेत्र में निवास करते थे। ये अपने केसरिया रंग के लिए सदियों तक प्रसिद्ध रहे। इसका वर्णन महाभारत में भी है1।” इससे साफ है कि जाखड़ लोग कश्मीर के रास्ते से वहां पर गये।

समय के अनुसार अन्य जाटों की तरह जाखड़ जाट भी अपने पैतृक देश भारतवर्ष में लौट आए। इनका पश्चिमी घाटियों से होकर भारतवर्ष में आना सिद्ध होता है। इन लोगों ने विदेशी आक्रमणकारियों का समय-समय पर मुकाबला इन ही पश्चिमी घाटियों पर किया। जाखड़ जाट अफगानिस्तान, सिन्ध प्रान्त और पश्चिमी पाकिस्तान में बसे और वहां से इनकी कुछ संख्या राजस्थान में जाकर बस गई। वहां पर इन लोगों ने कई स्थानों पर राज्य किया।

मि० डब्ल्यू क्रुक साहब ने अपनी पुस्तक “उत्तरी-पश्चिमी प्रान्त और अवध की जातियां” में लिखा है कि “द्वारिका के राजा के पास एक बड़ा भारी धनुष और बाण था। उसने प्रतिज्ञा की थी कि उसे कोई तोड़ देगा, उसका दर्जा राजा से उंचा कर दिया जाएगा। जाखड़ ने उस भारी कार्य की चेष्टा की और असफल रहा। इसी लाज के कारण उसने अपनी मातृभूमि को छोड़ दिया और बीकानेर में आ बसा।” इस कहानी से साफ है कि जाखड़ गोत्र (वंश) का एक जाट राजा था जिसका राज्य गुजरात में कहीं था। इससे पहले जाखड़ लोगों का अजमेर प्रान्त पर राज्य था। यह भाट ग्रन्थों में लिखा है। जाखड़ राजा बीकानेर में आकर कहां बसा, इसका पता “जाट वर्ण मीमांसा” के लेखक पंडित अमीचन्द शर्मा ने दिया है कि “जाखड़ राजा ने रेणी को अपनी राजधानी बनाया।” जाखड़ लोगों का राज्य मढौली पर भी था। मढौली जयपुर राज्य में मारवाड़ सीमा के आस-पास थी। उस समय फतेहपुर के आस-पास मुसलमान राज्य करते थे। इन मुसलमानों और जाखड़ों का युद्ध मढौली के पास हुआ था2

जाखड़ जाटों के बीकानेर में भी कई छोटे-छोटे राज्य थे3। जब राजस्थान में राजपूतों के राज्य


1. Jats the Ancient Rulers, P. 282, B.S. Dahiya IRS.
2. जाट इतिहास पृ० 591, लेखक ठा० देशराज।
3. जाट इतिहास उर्दू पृ० 368, लेखक ठा० संसारसिंह।
  • चन्द्रवंशी (या पुरुवंशी) राजा वीरभद्र के पुत्र जखभद्र के नेतृत्व में चन्द्रवंशी क्षत्रिय आर्यों का संघ (गण), जखभद्र के नाम पर जाखड़ वंश (गोत्र) कहलाया। इस गण में चन्द्रवंशी शिवि गण भी थे। (इसी अध्याय में देखो, शिविवंश प्रकरण)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-217


स्थापित हो गये तब जाखड़ जाटों का एक दल रोहतक जिला (हरयाणा) में आ गया। इनका नेता लाढसिंह था। यहां पर जाखड़ों ने साहलावास, लडान आदि बहुत गांव बसाये। लाढसिंह बहादुर ने एक बड़े क्षेत्र पर जाखड़ जाटों का राज्य स्थापित किया जिसकी राजधानी लडान थी। दिल्ली के बादशाह की ओर से बहू झोलरी पर एक मुसलमान नवाब का शासन था। उसने बड़ी शक्तिशाली सेना के साथ जाखड़ों पर आक्रमण कर दिया और लडान पर अधिकार कर लिया। नवाब की सेना ने जाखड़ों के गांव को लूटना शुरु कर दिया और उन पर हर प्रकार के अत्याचार करने आरम्भ कर दिये। जाखड़ों के बुलावे पर डीघल गांव के जाट वीर योद्धा बिन्दरा के नेतृत्व में अहलावत जाटों का एक दल जाखड़ों से आ मिला। इन दोनों वंशों के जाटवीरों ने मुसलमान सेना एवं नवाब* को मौत के घाट उतार दिया और बहू-झोलरी के किले पर अधिकार कर लिया। एक पठान सैनिक की गोली लगने से बिन्दरा वहीं पर शहीद हो गया। इस तरह से जाखड़ वीरों ने लडान का अपना राज्य फिर वापिस ले लिया और इनके बहुत से गांव आराम से बस गये थे। जाटों की शक्ति से डरकर दिल्ली का बादशाह जाखड़ों पर आक्रमण करने का साहस न कर सका।

आई-ने-अकबरी में लिखा है कि जाखड़ों के नेता वीर लाढसिंह ने पठानों और दिल्ली के बादशाहों से युद्ध करके अपनी वीरता का प्रमाण दिया1

इस तरह जाखड़ों के कई सरदारों ने औरंगजेब के समय तक राजस्थान और पंजाब के अनेक स्थानों पर राज किया। अन्तिम समय में इनके सरदारों के पास केवल चार-चार अथवा पांच-पांच गांव के राज्य रह गये थे2

जाखड़ पाकिस्तान में सिंधबिलोचिस्तान के प्रान्तों में बड़ी संख्या में हैं जो मुसलमान हैं। राजस्थान-बीकानेर आदि कई स्थानों पर बसे हुए हैं। इनके कुछ गांव अलवर एवं जयपुर में भी हैं। अलवर के चौ० नानकसिंह जाखड़ आर्यसमाज के सेक्रेटरी (मन्त्री) थे और जयपुर के माखर गांव के चौ० लाधूराम जाखड़ शेखावाटी जाट पंचायत के प्रधान थे। कश्मीर में जाखड़ मुसलमान हैं।

हरयाणा प्रान्त के रोहतक जिले में जाखड़ जाटों के गांव निम्न प्रकार से हैं - राजस्थान से जिला रोहतक में जाखड़ जाटों का एक दल आया। उसका नेता चौ० लाढसिंह था। उसी के नाम पर यहां उसने सबसे पहले लडान गांव बसाया। यह जाखड़ों की राजधानी थी। लडान गांव से जाखड़ों के अन्य गांव बसे। आज यहां जाखड़ जाटगोत्र के 19 गांव हैं। इनके अतिरिक्त 19 गांव अन्य जाटगोत्र और दूसरी जातियों के जाखड़ खाप में शामिल हैं। इस तरह से जाखड़ खाप के 38 गांव हैं। इनका ब्यौरा निम्नलिखित है -


  • - नोट - जब नवाब की सेना युद्ध क्षेत्र से भागकर किले में जा घुसी तो सबसे पहले वीर बिन्दरा अपने अहलावतों की एक टोली के साथ किले की दीवार लांघकर अन्दर गये। फिर तो सभी जाट अन्दर घुस गये। बिन्दरा ने स्वयं अपनी तलवार से नवाब का सिर उतार दिया।
1. जाट इतिहास पृ० 84 एवं अंग्रेजी अनुवाद पृ० 88 लेखक ले० रामसरूप जून।
2. जाट इतिहास पृ० 591 लेखक ठा० देशराज।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-218


जाखड़ खाप का प्रधान गाँव लडान रहता आया है। जाखड़ खाप की प्रधानता आज भी लडान गांव में ही है।

16. अंजना -

चन्द्रवंशी जाट राजा वीरभद्र के पुत्र अतिसुरभद्र के नाम से अञ्जना जाटवंश (गोत्र) का प्रचलन हुआ। इस गोत्र के जाट अधिकतर पाकिस्तान में शाहपुर, मियांवाली और जेहलम जिलों में हैं जो कि मुसलमान हैं। सिख जाटों में भी यह गोत्र बड़ी संख्या में है। इस गोत्र के जाट गुजरात, मालवा और मेवाड़ में भी हैं।

17. भिम्भरौलिया -

राजा वीरभद्र के पुत्र ब्रह्मभद्र के नाम से यह भिम्भरौलिया नाम का जाटगोत्र प्रचलित हुआ। जाट राणा धौलपुर इसी गोत्र के थे। जाट राणा धौलपुर की राजवंशावली में वीरभद्र से लेकर धौलपुर के राजाओं तक सब राजाओं के नाम लिखे हुए हैं। इस गोत्र के जाट हरयाणा, हरद्वार क्षेत्र, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में भी हैं। पाकिस्तान में ये लोग मुसलमान हैं।

18. कल्हन -

राजा वीरभद्र के पुत्र कल्हनभद्र के नाम से कल्हन जाटगोत्र का नाम प्रचलित हुआ। कल्हन जाटगोत्र के लोग काठियावाड़ और गुजरात में हैं।

पूनिया

19. पौनिया-पूनिया -

चन्द्रवंशी राजा वीरभद्र के पुत्र पौनभद्र के नाम से यह पौनिया या पूनिया जाटगोत्र प्रचलित हुआ। इस वंश को हिसार गजेटियर ने शिवगोत्री और महादेव की जटाओं से उत्पन्न लिखा है। इसका तात्पर्य यह है कि राजा वीरभद्र व उसकी सन्तान शिवजी (महादेव) की अनुयायी थी। यह पहले लिखा जा चुका है कि राजा वीरभद्र का राज्य हरद्वार से लेकर शिवालिक की पहाड़ियों तक था जिसकी राजधानी तलखापुर थी। चन्द्रवंशी क्षत्रिय आर्यों का एक गण1 (संघ) जो शिवालिक की पहाड़ियों में रहता था, पौनभद्र की शक्ति तथा गुणों से प्रभावित होकर उसके नाम से पौनिया कहलाया। यह प्रमाणित तथा सत्य है। परन्तु जटाओं (सिर के बालों का समूह) से मनुष्यों की उत्पत्ति होना प्रकृति तथा ईश्वरीय नियम (विधि) के विरुद्ध है। सो, यह जटाओं से पौनिया वंश की उत्पत्ति होने वाली बात असत्य है।

पूनिया या पौनिया जाटों का शिवालिक क्षेत्र से विदेशों में जाकर राज्य करने का संक्षिप्त ब्यौरा निम्न प्रकार से है - यूनानी इतिहासकार हैरोडोटस का हवाला देकर बी० एस० दहिया ने लिखा


1. इस गण में चन्द्रवंशी शिवि लोगों का गण भी था (देखो इसी अध्याय में शिवि गोत्र प्रकरण)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-219


है कि “पौनिया जाटों की एक स्वतंत्र रियासत काला सागर के निकट लघु एशिया (Asia Minor) में थी। वहां से महान् सम्राट् दारा (Darius) ने इनको अमरिया के निकट बैक्ट्रिया (Bactria) क्षेत्र में भेज दिया।” पौनिया और तोखर गोत्र के जाट छठी शताब्दी ई० पू० यूरोप में थे1

दूसरे जाट वंशों एकी भांति समय अनुसार पौनिया जाट भी विदेशों से अपने पैतृक देश भारतवर्ष में लौट आये। ये लोग भारतवर्ष के उत्तर-पश्चिमी दर्रों से आये। पहले ये लोग इसी पश्चिमी सीमा में बस गये। इसके प्रमाण इस बात से हैं कि आज भी पौनिया जाटों की संख्या पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर बसे हुए बन्नूं, डेरा ईस्माइलखान, डेरा गाजीखान, डेरा फतहखान नगरों में हैं। ये डेरा नाम वाले तीनों किले पौनिया जाट राजा जसवन्तसिंह ने अपने तीन पुत्रों सहित इस्लाम में प्रवेश करने पर बनवाये थे। डेरा इस्माइलखान के किले पर यह लेख लिखा हुआ है। वहां पर एक कहावत भी प्रचलित है कि “मान पैनिया चट्ठे, खानपीन में अलग-अलग लूटने में कट्ठे।” अर्थात् ये तीनों गोतों के जाट उधर के आतंककारी बहुसंख्यक गिरोह थे। उस क्षेत्र में मान और चट्ठा मुसलमानधर्मी जाटों की भी बड़ी संख्या है।

भारत की पश्चिमी सीमा से चलकर पौनिया जाटों का एक बड़ा दल जांगल प्रदेश (राजस्थान) में सन् ईस्वी के आरम्भिक काल में पहुंच गया था2। इन्होंने इस भूमि पर पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्तिम काल तक राज्य किया था3जोधपुर प्रसिद्ध हो जाने वाले देश से पौनिया जाटों ने दहिया लोगों को निकाल दिया था4। जिस समय राठौरों का दल बीका और कान्दल के संचालन में जांगल प्रदेश में पहुंचा था उस समय पौनिया जाट सरदारों के अधिकार में 300 गांव थे। इनके अतिरिक्त जांगल प्रदेश में पांच राज्य जाटों के और थे। पौनिया के 300 गांव परगनों में बांटे हुए थे जिनके नाम - 1. भादरा 2. अजीतगढ़ 3. सीधमुख 4. दादर 5. राजगढ़ 6. साकू थे। ये बड़े नगर थे जिनमें किले बनाये गये थे। इन जाटों का यहां प्रजातंत्र राज्य था। उस समय इनकी राजधानी झासल थी जो कि हिसार जिले की सीमा पर है।

रामरत्न चारण ने “राजपूताने के इतिहास” में इन राज्यों का वर्णन किया है और पौनिया जाटों की राजधानी लुद्धि नामक नगर बताया है। “टॉड राजस्थान”, “तारीख राजस्थान हिन्द” और “वाकए-राजपूताना” आदि इतिहासों में इनका वर्णन है। उस समय पौनिया जाटों का राजा कान्हादेव था। वह स्वाभिमानी और कभी न हारने वाला योद्धा था। सब पूनिया भाई उसकी आज्ञा का पालन करते थे। पौनिया जाट वारों के एक हाथ में हल की हथेली (मूठ) और दूसरे हाथ में तलवार रहती थी। इन्होंने बीका की राठौर सेना के साथ बड़े साहस से युद्ध किये और राठौर इनको हरा न सके। आपसी फूट के कारण गोदारे जाटों ने, पौनिया जाटों के विरुद्ध, राठौरों का साथ दिया। इन दोनों बड़ी शक्तियों ने मिलकर पौनिया जाटों को हरा दिया। पौनिया जाट वीरों ने कायरता नहीं दिखाई और खून की नदियां बहा दीं।


1. Jats the Ancient Rulers P.90 by B.S. Dahiya, IRS
2, 3. जाट इतिहास पृ० 613 लेखक ठा० देशराज।
3. जाट इतिहास उर्दू पृ० 372 लेखक ठा० संसारसिंह ।
4. जाट इतिहास पृ० 84 और अंग्रेजी अनुवाद पृ० 97, लेखक रामस्वरूप जून।
4. पूरी जानकारी के लिए देखो द्वितीय अध्याय, (जाटवीरों की उत्पत्ति प्रकरण)


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-220


इन्होंने इसका बदला राठौर नरेश रायसिंह का वध करके लिया। यह बदला लेनी की बात “भारत के देशी राज्य” इतिहास में भी लिखी हुई है। पौनियों की पुरानी राजधानी झांसल में जहां उनका किला था, कुछ निशान अब तक भी हैं। बालसमद में भी ऐसे ही चिह्न पाये जाते हैं। राठौरों के राजा पूनिया लोगों को खुश करने के लिए इनके मुखियों को दस पौशाक और कुछ नकद प्रतिवर्ष दिया करते थे। पौनिया जाटों की हार होने पर कुछ ने तो वह मरुभूमि छोड़ दी और बहुत से शासित रूप से वहीं रहते रहे। वहां पौनियागढ़ का नाम बदलकर राजगढ (शार्दूलपुर) रखा गया जिसके चारों ओर 100 गांव पौनिया जाटों के अब भी बसे हैं।

बीकानेर से चलकर चौ० नैनसुख पौनिया अपने एक संघ के साथ गुड़गांवा होता हुआ मुरादाबाद पहुंच गया। वहां नैनसुख ने पौनियों की “मुरादाबाद रियासत” की स्थापना की। सन् 1857 ई० के विद्रोह में, चौ० नैनसुख के वंशज गुरुसहाय पूनिया ने, अंग्रेजों की बड़ी सहायता की थी। जिसके पुरस्कार में ब्रिटिश सरकार ने मुरादाबाद नगर का चौथाई भाग और इसी जिले के 50 गांव और बुलन्दशहर में 17 गांव दिए थे। इस रियासत के राजा ललतूसिंह और रानी किशोरी प्रान्तीय ख्याति प्राप्त हो चुके थे। इस रियासत के वैवाहिक सम्बन्ध भरतपुर जैसे ऊँचे राजघरानों के साथ थे। उत्तरप्रदेश में पौनिया जाटों की बड़ी संख्या है। वहां इनके गांव निम्नप्रकार से हैं। मुरादाबाद जिले में 2 गांव, मेरठ जिले में 10 गांव, अलीगढ़ जिले में सासनी के समीप 10 गांव हैं और अलीगढ़ जिले की अतरौली तहसील में “पौनियावाटी” सुप्रसिद्ध है, जहां के पौनिया जाटों के 84 गांव मुगल पतनकाल में सर्वथा स्वतंत्र हो गये थे। आगरा जिले में टूण्डले के समीप पौनियों की एक टीकरी नाम की अच्छी रियासत थी। चुलाहवली, मदावली, बलिया, नंगला यहां के प्रसिद्ध गांव इनके हैं। बुलन्दशहर जिले में पौनियों का मण्डौना गांव बड़ा प्रसिद्ध है।

जालन्धर जिले में 9 गांव पौनियां सिख जाटों के हैं। अम्बाला में नूरपुर, जांडली, मानका, हिसार में लाडवा, सातरोड कलां व खुर्द, हांसी के पास [[Kharak Punia}खरक पूनिया]], सिरसाना, विदयान खेड़ा, ज्ञानपुरा, मतलौहडा और सरेरा गांव पौनिया जाटों के हैं। जिला पटियाला (पहले रियासत पटियाला) में भी बहुत गांव पौनिया जाट सिक्खों के हैं। भिवानी जिले (पूर्व जींद रियासत) में 150 गांव पौनियां जाटों के हैं। जैसा कि पहले लिख दिया गया है, पाकिस्तान में पौनिया जाट बड़ी संख्या में आबाद हैं।

पौनिया जाटों का एक शिलालेख जिला देहरादून (उ० प्र०) में चूहदपुर के समीप जगत् ग्राम में मिला है। इन लोगों का राज्य यमुना किनारे जगाधारी के निकट क्षेत्र पर था।2

पौनिया जाट हिन्दू, सिक्ख और मुसलमान तीनों धर्मानुयायी हैं। अन्य जाटवंशों (गोत्रों) की अलग-अलग जनगणना में पौनिया जाटवंश के लोग सबसे अधिक संख्या में हैं। परन्तु प्रतिष्ठा (सम्मान) की दृष्टि से सब जाटवंश (गोत्र) एक समान हैं चाहे उनकी जनसंख्या कम हो या अधिक हो।


1. जाट इतिहास उर्दू पृ० 373 लेखक ठा० संसारसिंह; जाटों का उत्कर्ष पृ० 328 लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री ।
2. Studies in Indian History and Civilization P. 263 by Buddha Prakash का हवाला देकर लिखा है बी० एस० दहिया ने अपनी पुस्तक “जाट्स दी एनशन्ट् रूलर्ज” पृ० 267 पर।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-221


20. चीना या चीमा चन्द्रवंशी जाट गोत्र -

चीना क्षत्रिय चन्द्रवंशी सम्राट् ययाति के पुत्र अनु के वंशज हैं। ये लोग आर्यावर्त से चीन देश में गये और वहां बस्तियां बसाकर राज्य किया। ये चीना क्षत्रिय अपभ्रंश होकर चीमा कहलाये1। यह स्मरण रखना चाहिये कि चीन, यवन और शक आदि शब्द विदेशी नहीं, किन्तु भारतीय हैं और बहुत पुराने हैं। चीन शब्द के विषय में प्रो० हीरन लिखते हैं कि चीन शब्द हिन्दुओं का है और हिन्दुस्तान से ही आया है। पंचतन्त्र की एक कथा में लिखा है कि एक कौलिक विषणु का रूप धारण करके किसी राजकन्या के पास जाया करता था। वहां उस कन्या के सर्वांगसुन्दर वर्णन में “चीना नाभिः”लिखा हुआ है। वहां चीना शब्द का अर्थ गहरा है। अमरकोश में मृगों का भेद वर्णन करते हुए एक प्रकार के मृग को भी चीन कहा गया है। इन प्रमाणों से मालूम होता है कि चीन शब्द के असली अर्थों के कारण ही गहराई में रहने और तेज तबीयत होने से चीनवालों को चीनी कहा गया है। चीन में बसने वाले मूल पुरुष आर्य ही थे। चीनियों के विषय में टॉड साहब ने अपने राजस्थान के इतिहास, परिशिष्ठ, अध्याय दूसरे में इनके वंश का हाल लिखा है। उसका सारांश यह है कि - “मंगोल, तातार और चीनी लोग अपने को चन्द्रवंशी बतलाते हैं। इनमें से तातार के लोग अपने को ‘अय’ का वंशज कहते हैं। यह ‘अय’ पुरुरवा का पुत्र आयु ही है। इस आयु के वंश में ही यदु था जिसका पौत्र हय था। चीनी लोग इसी हय को हयु कहते हैं और अपना पूर्वज मानते हैं2।”

चीन वालों के पास यू की उत्पत्ति इस तरह से लिखी हुई है कि एक तारे (बुध) का समागम यू की माता के साथ हो गया। इसी से यू हुआ। यह बुध और इला के समागम जैसी बात ज्ञात होती है। इस तरह से तातारों का अय, चीनियों का यू और पौराणिकों का आयु एक ही व्यक्ति हैं। इन तीनों का आदिपुरुष चन्द्र (चन्द्रमा-सोम) था। यह अच्छी तरह सिद्ध होता है कि ये लोग चन्द्रवंशी क्षत्री हैं3

चीना जाटों ने पौराणिकों के सिद्धान्तों को अस्वीकार करके बौद्धधर्म अपनाया था। इस विरोध के कारण से ही ये व्रात्य घोषित कर दिये गये। यह महाभारत एवं मनुस्मृति में भी लिख दिया गया। उदाहरण के तौर पर - महाभारत आदि पर्व, अध्याय 85वां, श्लोक 34-35, “अनु से म्लेच्छ जातियां उत्पन्न हुईं।” मनुस्मृति अध्याय 10, श्लोक 43-45 - “पौण्ड्रक, औड्र्म द्रविड, *काम्बोज, यवन, *शक, पारद, *पल्हव, *चीना, किरात, *दरद और खश क्षत्रिय जातियां धार्मिक क्रियाओं के त्याग करने से और ब्राह्मणों के उपदेशों को न मानने के कारण शूद्रता को प्राप्त हो गईं। बहिष्कृत जो जातियां हैं चाहे वे म्लेच्छभाषायें बोलती हैं या आर्य भाषायें, वे सब दस्यु कहलाती हैं4।” किन्तु इन वंशों के प्राचीन आर्यक्षत्रिय होने पर कोई


1. क्षत्रिय जातियों का उत्थान पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 382 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री ।
2. वैदिक सम्पत्ति पृ० 414 एवं 426, लेखक स० प० रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण ।
3. वैदिक सम्पत्ति पृ० 426, लेखक स० प० रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण एवं जाट इतिहास पृ० 7-8 लेखक श्रीमदाचार्य श्रीनिवासाचार्य महाराज।
4. पूर्ण विवरण के लिए देखो जाट वीरों का इतिहास द्वितीय अध्याय (जाट क्षत्रिय वर्ण के हैं)।
* ये जाट गोत्र हैं


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-222


सन्देह नहीं है। इन क्षत्रियवंशों का राज्य शासन रहा है और ये सब महाभारत युद्ध में सम्मिलित होकर लड़े हैं। यह वर्णन उचित समय पर किया जाएगा। चीना-जाटों को ही ऐतिहासिक चीन की प्राचीन भूमि के आदिशासक मानते हैं और कुछ विद्वान् इनको चीन देश से महाभारत युद्ध में आई हुई सेना की सन्तान मानते हैं, जो कि एक भ्रम है। इस वंश का मूल चीनी नहीं है, न ये पीले रंग के हैं, न ही इनकी नाक चपटी तथा उंचाई कम है। इनकी नाक ऊंची, रंग गेहुंआ और डीलडौल लम्बा है। इनकी आकृति यही सिद्ध करती है कि ये लोग महाभारत के ही आर्यक्षत्रियों की सन्तान हैं। महाभारत वनपर्व में चीनावंश के शासन होने का वर्णन है कि “पाण्डव-चीन, तुषार, दरद और कुलिन्द्र देशों में गये जहां रत्नों और मणियों की खानें थीं।” इनमें से चीना, तुषार, दरद जाटवंश हैं और इन नाम के देशों में इनका शासन था। मि० कनिंघम ने पंजाब के जाटों की प्रधानशाखाओं में चीना और भराईचों को भी मुख्य माना है। ह्युनत्साङ्ग (Hiuen-Tsang) ने लिखा है कि चीना (चीमा) जाटों का चीनाभुकती नाम का राज्य पंजाब में था1। इस वंश के जाट मुसलमान अधिक, सिक्ख उनसे कम और हिन्दू कोई नहीं है। ये चीना (चीमा) मुसलमान जाट शाहपुर, झंग, लायलपुर, सियालकोट और जेहलम जिलों में बड़ी संख्या में बसे हुए हैं। पंजाब में चीमा सिक्ख जाट बहुत हैं।

21. आन्ध्र जाट वंश -

चन्द्रवंशी सम्राट् ययाति के पुत्र अनु का प्रपौत्र दीर्घतमा* था जिसके अङ्ग, वङ्ग, कलिङ्ग, सुह्म, पुण्ड्र और आन्ध्र नामक पुत्र थे। इन सबने अपने नाम से प्रान्त बसाये। आन्ध्र ने अपने नाम से आन्ध्रालय (आस्ट्रेलिया) बसाया था। वहां से कुछ आन्ध्र लोगों ने भारतवर्ष में आकर आन्ध्रप्रदेश बसाया2। इस आन्ध्र के नाम पर आन्ध्र वंश प्रचलित हुआ था जो कि जाट वंश (गोत्र) है।

वैदिक सम्पत्ति के लेखक पं० रघुनंदन शर्मा साहित्यभूषण ने पृ० 414 पर लिखा है कि आन्ध्र लोग आन्ध्रालय अर्थात् आस्ट्रेलिया को गये।

दक्षिण भारत में एक प्रदेश आज भी ‘आन्ध्र’ के नाम पर प्रसिद्ध है। आन्ध्रवंश के राजाओं का राज्य इस आन्ध्रप्रदेश एवं कई अन्य प्रदेशों पर वैदिककाल में ही स्थापित हो गया था। रामायणकाल में भी इस वंश का राज्य आन्ध्र देश पर था। रामायण में लिखा है कि “सुग्रीव ने सीताजी की खोज के लिए सेनापति अङ्गद के नेतृत्व में वानरों को दक्षिण दिशा के कई देशों के अतिरिक्त ‘आन्ध्र देश’ में भी जाने का आदेश दिया3।” इन आन्ध्रवंश जाटों का राज्य महाभारत काल में भी था। पांडवों की दिग्विजय के अवसर पर सहदेव ने आन्ध्र देश के राजा को दूतों द्वारा ही वश में करके उससे टैक्स (कर) लिया (महाभारत सभापर्व, अध्याय 31वां)।


1. Jats the Ancient Rulers P. 249 by B.S. Dahiya I.R.S.
2. जाट इतिहास पृ० 26, लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज।
3. वाल्मीकीय रामायण किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 41वां, पृ० 794.
4. क्षत्रिय जातियों का उत्थान पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 309-310, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
* अनु की 13 वीं पीढ़ी में हुआ (देखो अनु की वंशावली)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-223


इस वंश के राजा, युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में पधारे और द्रव्य लाये। आन्ध्रवंश के शूरवीर कौरवों की तरफ होकर महाभारत युद्ध में लड़े थे (महाभारत कर्णपर्व)।

इस आन्ध्रवंश के राजाओं का पुराणों में वर्णन इस प्रकार से है। श्रीमदभागवत में 22, विष्णु पुराण में 30 (चतुर्थ अंश, अध्याय 24, श्लोक 43-50, शासन 456 वर्ष), मत्स्य पुराण में 30 जिनका शासन 448 वर्ष रहा, वायुपुराण में 176 आन्ध्रराजाओं का शासनकाल 172 वर्ष लिखा है3। इस मतभेद का कारण विभिन्न स्थानों में आन्ध्रराजाओं का राज्य होना ही हो सकता है। इनका परिचय आन्ध्र, आन्ध्रभृत्य, सातवाहन और शातकर्णी के नाम से दिया है। इसी कारण मि० स्मिथ को यह अनुमान करना पड़ा कि “आन्ध्रों के तीन प्रकार के राज्य थे - एक प्रजातन्त्री स्वतन्त्र, दूसरा मौर्यों के आधीन परतन्त्र, तीसरा एकतन्त्री।” इसी को पुराणों ने अनेक धाराओं में लिखा है1

सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य के समय 30 बड़े परकोटे नगर आन्ध्रों के थे। इनकी सेना में एक लाख पैदल, दो हजार घुड़सवार थे। इनकी राजधानी कृष्णा नदी के किनारे श्री काकुलंम थी। सम्राट् बिन्दुसार ने आन्ध्रों को मौर्य शासन के आधीन किया था। किन्तु सम्राट् अशोक के बाद ये लोग फिर स्वतन्त्र हो गये थे। इनका प्रभाव बहुत विस्तृत था2

आन्ध्र लोगों को स्वतन्त्रता दिलाने वाला सिमुक था3। इस वंश के 30 शासक हुए हैं जिन्होंने 220 ई० पू० से 225 सन् ईस्वी तक 445 वर्ष राज्य किया। गोदावरी और कृष्णा नदियों के बीच के क्षेत्र पर इनका स्वतन्त्र राज्य रहा। उत्तर में आन्ध्र लोगों ने 28 ई० पू० कण्व वंश जिनका राज्य पाटलिपुत्र में था, को हराकर राज्य किया। आन्ध्रवंश के 30 शासक हुए जिनमें अधिक प्रसिद्ध ये थे -

  • 1. सिमुक - इसने मौर्यवंश के पराधीन आन्ध्र लोगों को 220 ई० पू० में स्वतन्त्रता दिलाई। इसके शासनकाल में बड़ी उन्नति हुई4
  • 2. कृष्ण - यह सिमुक का छोटा भाई था। इसने नासिक को अपने राज्य में मिला लिया था5/
  • 3. श्रीसतकर्णि - यह सम्राट् सिमुक का पुत्र था। इसने मालवा, विदर्भ तथा नर्मदा घाटी के प्रदेशों को जीत लिया था। इसने दो अश्वमेध यज्ञ किये और “दक्षिणापथपति” की उपाधि ग्रहण की6
  • 4. श्री गौतमीपुत्र सतकर्णि - यह इस वंश का सुप्रसिद्ध और शक्तिशाली शासक था। इसने सन् 106 से130 ई० तक राज्य किया। उसे शक, यवन, पल्हव आदि विदेशी जातियों का नाशक कहा गया है। इसके काल में शक जाति पश्चिमी भारत में काफी शक्तिशाली थी। इसने उनको हराया और एक शक शासक की कन्या से विवाह किया। सन् 130 ई० में इस सम्राट् की मृत्यु हो गई7। इस सम्राट् के पुत्र राजा श्रीपल्माई से शक सम्राट् जोरवम्न ने आन्ध्रराज्य का कुछ भाग छीन लिया।

1. क्षत्रिय जातियों का उत्थान, पतन एवं जाटों का उत्कर्ष पृ० 309-310 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
2. जाटों का उत्कर्ष, पृ० 310, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
3, 6, 7. भारत का इतिहास पृ० 65, हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी।
3, 4, 5, 6. हिन्दुस्तान की तारीख उर्दू पृ० 240.
7. जाटों का उत्कर्ष, पृ 310, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-224


  • 5. श्रीयज्ञ सतकर्णि - यह आन्ध्रवंश का अंतिम प्रसिद्ध राजा था। इसने भी शकों के साथ युद्ध जारी रक्खा। समुद्रपार देशों से इसके अच्छे सम्बन्ध थे। इसके बाद आन्ध्रवंश के शासक दुर्बल थे। शक सम्राट् रुद्रदामन ने लगभग सन् 225 में यह आन्ध्रराज्य जीत लिया1

आन्ध्रवंश अथवा सातवाहन वंश के शासनकाल में उद्योग-धन्धे तथा व्यापार बहुत उन्नत थे। इस काल में पश्चिमी देश जैसे मिस्र, रोम, सीरिया आदि से घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध थे। इन देशों के व्यापारिक जहाज भारत की भड़ौच बन्दरगाह पर माल उतारते और नगरा एवं पैठन मण्डियों से माल लादकर ले जाते थे। भारत से मलमल, सूती कपड़ा और मसाले बाहर के देशों में जाते थे और इनके बदले में शीशे का सामान, मदिरा, जूता तथा अन्य वस्तुएँ आती थीं2

इस आन्ध्रवंश का राज्य कश्मीर, पंजाब, सिन्ध, दक्षिणी भारत, बिहार और उड़ीसा में था। इस वंश की बडियार शाखा का राज्य मैसूर रियासत पर था जो दक्षिण का सर्वाधिक प्रगतिशील राज्य था। बडियार वंश के जाट जोधपुर जिले में हैं। आन्ध्रवंश के अनेक गांव हैं जिनमें बिजनौर जिले के नांगल, कादीपुर, मोहनपुर आदि हैं3

आन्ध्रवंश के शाखा गोत्र - 1. सातवाहन-सातकर्णी 2. बड़ियार। इस वंश को आन्ध्रभृत्य भी कहते हैं।

(ख) सूर्यवंशज जाट

1. कश्यप/ काश्यप -

ब्रह्मा के पुत्र मरीचि से कश्यप का जन्म हुआ था। कश्यप ऋषि से ही सूर्यवंश* की प्रसिद्धि बताई जाती है। इनके नाम पर कश्यप या काश्यप जाटवंश प्रचलित हुआ। पुराणों ने तो कैस्पियन सागर को कश्यप ऋषि का आश्रम बताया है। कुछ इतिहासकारों ने श्रीनगर से तीन मील दूर हरिपर्वत पर कश्यप ऋषि का आश्रम लिखा है।

“ट्राईब्स एण्ड कास्ट्स ऑफ दी नार्थ वेस्टर्न प्राविन्सेज एण्ड अवध”नामक पुस्तक में मिस्टर डब्ल्यू कुर्क साहब लिखते हैं कि दक्षिण पूर्वी प्रान्तों के जाट अपने को दो भागों में विभक्त करते हैं - शिवि गोत्री या शिवि के वंशज और कश्यप गोत्री।

मगध के लिच्छवी, शाक्य और ज्ञातृ भी काश्यप ही थे। इनके अतिरिक्त सैंकड़ों काश्यप गोत्री खानदान जाटों में विद्यमान हैं। काशी के काश्य भी काश्यप हैं जो कि जाटों के अन्दर काशीवत कहलाते हैं। (जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खण्ड, पृ० 100, लेखक ठा० देशराज)

नेहरा

2. नेहरा -

सूर्यवंशी वैवस्वत मनु के इक्ष्वाकु, नरिष्यन्त (उपनाम नरहरि) आदि कई पुत्र हुए। नरहरि की सन्तान सिंध में नेहरा पर्वत के समीपवर्ती प्रदेश के अधिकारी होने से नेहरा नाम से प्रसिद्ध हुई। इस तरह से नेहरा जाटवंश प्रचलित हुआ।

जयपुर की वर्तमान शेखावाटी के प्राचीन शासक नेहरा जाट थे जिन्होंने सिंध से आकर नरहड़ में किला बनाकर दो सौ वर्ग मील भूमि पर अधिकार स्थिर कर लिया था। यहां से 15 मील पर इन्होंने


1. जाटों का उत्कर्ष, पृ० 310, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
2, 3. भारत का इतिहास पृ० 65, हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड भिवानी, हिन्दुस्तान की तारीख उर्दू पृ० 244।
3. जाट इतिहास पृ० 76, लेखक ले० रामस्वरूप जून
* असल में सूर्यवंश का प्रचलन तो कश्यपपुत्र विवस्वत् से हुआ था।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-225


नाहरपुर बसाया। उनके नाम से झुंझनूं के निकट का पहाड़ आज भी नेहरा कहलाता है। दूसरे पहाड़ का नाम मौड़ा (मौरा) है जो मौर्य जाटों के नाम पर प्रसिद्ध है। मुगल शासन आने से पूर्व शेखावत राजपूतों ने नेहरा जाटों को पराजित कर दिया और इनका राज्य छीन लिया। नेहरा जाटों की यह नेहरावाटी आवासभूमि शेखावतों के विजयी होते ही शेखावाटी के नाम पर प्रसिद्ध हो गई।

शेखावतों से बदला लेने के लिए नेहरा जाटों ने मुगलों को समय समय पर भेंट देकर सन्तुष्ट करने का प्रयत्न किया। इस कारण ये “शाही भेंटवाल” के नाम से पुकारे जाने लगे। मुगलों से इन्हें कोई सहयोग न मिला क्योंकि मुग़ल राजपूतों से सामूहिक समर्थन प्राप्त कर चुके थे।

नेहरा जाटों में सरदार झूंझा अथवा जुझारसिंह बड़े प्रसिद्ध वीर हुए हैं। उनके नाम से झुंझनू नगर विख्यात है। कुंवर पन्नेसिंह जी ने “रणकेसरी सरदार जुझारसिंह” नाम की पुस्तक में लिखा है -

सरदार जुझारसिंह का जन्म संवत् 1721 विक्रमी श्रावण महीने में हुआ था। उनके पिता झुंझनूं के नवाब सादुल्ला खां के यहां फौजदार के पद पर नौकरी करते थे। युवा होने पर सरदार जुझारसिंह उसी नवाब की सेना में जनरल हो गये। वे भारत में फिर से जाटसाम्राज्य स्थापित हुआ देखना चाहते थे। उन्हीं दिनों उनकी मुलाकात एक राजपूत शार्दूलसिंह से हुई जो नवाब के यहां आकर नौकर लगा था। दोनों में निर्णय हुआ। शार्दूलसिंह ने वचन दिया कि नवाबशाही को नष्ट कर्ने पर हम आपको अपना सरदार मान लेंगे। अवसर आने पर सरदार जुझारसिंह ने झुंझनूं और नरहड़ के नवाबों को परास्त कर दिया। अन्त में सत्रह सौ सतासी, आगण मास उदार। सादै, लीन्हों झूंझनूं सुठि आठें शनिवार।

विजय प्राप्त करके एक बार पुनः नेहरावंश की ओर राजस्थान का ध्यान आकर्षित कर ही लिया। किन्तु शेखावत और कछवाहा राजपूतों ने एक दरबार करके विजयी सरदार जुझारसिंह को सरदार घोषित करने के नाम पर धोखे से एकान्त में मार डाला। यह सूचना मिलने पर वहां के जाटों ने विद्रोह कर दिया। जाट-क्षत्रियों के इस विद्रोह को दबाने के लिए शेखावतों ने उन्हें कई तरह के प्रलोभन दे दिए। सरदार जुझारसिंह अपनी जाति के लिए शहीद हो गये। उनकी कीर्ति आज तक गाई जाती है। इस घटना के कुछ समय पश्चात् नेहरा जाटों ने शेखावाटी छोड़ दी। वहां से आकर नेहरा जाटों ने देहली से मेरठ वाले मार्ग पर बेगमाबाद गांव बसाया। वहां से मुदाना, याकूबपुर्र, मवई, औरंगाबाद, गदाना, गावडी, कादराबादबिसौखर आदि 12 गांव नेहरा जाटों ने बसाये। मोदीनगर की औद्योगिक बस्ती इन्हीं की भूमि पर आबाद है1

नेहरा जाटगोत्र के लोग हरयाणा के रोहतक जिले में सुन्दरपुर, निन्दाना, गूढा आदि गांवों में आबाद हैं। कुछ हिसारजींद जिलों में बसे हैं। पंजाब के पटियाला जिले में ये लोग सिक्खधर्मी हैं। पाकिस्तान में इनकी बड़ी संख्या है जो कि मुसलमानधर्मी हैं।

नेहरा का शाखागोत्र - भेंटवाल-भेंटवाण

काकुस्थ या काकवंश

3. काकुस्थ या काकवंश -

सूर्यवंशज वैवस्वत मनु का पुत्र इक्ष्वाकु था जो कि वैवस्वत मनु


1. जाटों का उत्कर्ष, पृ० 355-356, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-226


द्वारा बसाई गई भारत की प्रथम नगरी अयोध्या का शासक हुआ था। इक्ष्वाकु के विकुशी नामक पुत्र से पुरञ्जय जिसने देव-असुर युद्ध में असुरों को जीत लिया। इसी कारण वह ‘काकुस्थ’ नाम से प्रसिद्ध हुआ जो कि जाटवंश है। भाषाभेद से यह काकुस्थ जाटवंश दक्षिणी तैलगु में काक, काकतीय, पंजाब, कश्मीर में कक्क, कक्कुर और उत्तरप्रदेश में काकराणा नाम से बोला जाता है। इसी परम्परा में प्रतापी सम्राट् रघु हुए जिनके नाम पर इस काकुस्थवंश का एक समुदाय रघुवंशी प्रचलित हुआ जो कि जाटवंश है। इसी भाव का एक श्लोक इण्डियन ऐन्टिक्वेरी भाग 11 में भी अङ्कित है -

काकुस्थमिक्ष्वाकुरघूंश्च यद्दधत्पुराऽभवत्त्रिप्रवरं रघोः कुलम् ।
कालादपि प्राप्य स काकराणतां प्ररूढतुर्यं प्रवरं बभूव तत् ॥
“इक्ष्वाकु, काकुस्थ और रघु नाम से प्रसिद्ध कुल (वंश) ही कलियुग में काकराण के नाम से प्रचलित हुआ।”

विष्णु पुराण चतुर्थ अंश/अध्याय 2/ श्लोक 14 के अनुसार काकुस्थ वंश के 48 राजपुत्रों का दक्षिण देश में शासन स्थिर हुआ। वहां पर यह वंश काक नाम से प्रसिद्ध था। इस काकवंश का 'वांगलार इतिहास' प्रथम भाग के 46-47 पृष्ठ पर तथा राजपूताने के इतिहास गुप्त इन्सक्रिप्शन आदि पुस्तकों में वर्णन है। इतिहासज्ञ फ्लीट ने गुप्तों के परिचय में प्रयाग के किले में मौर्य सम्राट् अशोक के विशाल स्तम्भ पर गुप्तवंशी सम्राट् समुद्रगुप्त द्वारा खुदवाए हुए एक लेख का उल्लेख किया है। उस पर लिखा है -

“समुद्रगुप्त को काक आदि कई जातियां कर दिया करती थीं।” इससे अनुमान किया गया है कि काकवंश एक प्रमुख एवं प्राचीनवंश है जो गुप्तों के समय में राज्यसत्ता में था। उस समय इनकी सत्ता दक्षिण में थी। 11वीं शताब्दी तक ये वहां शासक रूप से रहे। तामिल भाषा में इन्हें काकतीय लिखा है।

दक्षिण में काकवंश - इस काकवंश का दक्षिण में होना ईस्वी सन् से कई सदियों पहले का माना गया है। राजपूत युग में इस वंश के वेटमराज नामक महापुरुष उपनाम त्रिभुवनमल ने महामंडलेश्वर की उपाधि धारण करके वरंगल को अपनी राजधानी बनाया। इनके पुत्र परोलराज का संवत् 1174 में लिखवाया हुआ शिलालेख मिला है जिस पर बहुत सी विजयों का वर्णन है। इसने अपने राज्य की भूमि को तालाबों से सींचे जाने का प्रबन्ध करके यश उपार्जित किया। इसके पुत्र रुद्र ने मैलिगीदेव का राज्य जीता और दोम्भ को हराया। संवत् 1219 और 1242 के शिलालेख इन घटनाओं को सम्पुष्ट करते हैं। दक्षिणी नरेशों में इसका स्थान विशिष्ट था। इसने अपनी विशाल एवं सुशिक्षित सेना के बल पर पूर्व में कटक, पश्चिम में समुद्र, उत्तर में मलयवन्त और दक्षिण में सेलम तक अपने राज्य की सीमायें बढा ली थीं। इसकी मृत्यु होने पर इसके भाई महादेव ने कुछ दिन राज्य किया। महादेव के पुत्र गणपति ने संवत् 1255 में राज्य पाकर चोल राज्य को जीता और दक्षिण के प्राचीन राज्यवंशों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थिर किए। पांड्यों से इसे हानि उठानी पड़ी। इनकी दानमहिमा और सिंचाई विभाग के प्रति सतर्कता प्रसिद्ध रही। सम्राट् गणपति के समय के पश्चात् ईस्वी सन् 1309 (संवत् 1366) में


1. वाल्मीकीय रामायण बालकाण्ड सर्ग पांचवां, श्लोक 6.
2. Guptas Inscriptions (गुप्त्त शिलालेख)।
3, 4. जाटवंश हैं।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-227


अलाउद्दीन खिलजी के प्रधानमंत्री मलिक काफूर ने देवगिरि को पार करके तेलंगाना राज्य पर, जिसकी राजधानी वरंगल थी, आक्रमण कर दिया। उस समय वहां का शासक काकतीय1 वंशज प्रताप रुद्रदेव था। इसने बड़ी वीरता से मुसलमान सेना का सामना किया। अन्त में विवश होकर सुल्तान की अधीनता स्वीकार कर ली। इस राजा ने मलिक काफूर को 300 हाथी, 7000 घोड़े और बहुत सा धन देकर संधि कर ली2

ऐतिहासिक मिश्रबन्धु के लेखानुसार मलिक काफूर ने इस चढाई में बीस हजार मन सोना वरंगल के चारों ओर से लूटा। यह लूट का माल 1000 ऊंटों पर लादकर दिल्ली लाया गया। इसके अतिरिक्त वरंगल के राजा प्रताप रुद्रदेव ने दिल्ली के सम्राट् को प्रतिवर्ष कर देना भी स्वीकार कर लिया। उसने मलिक काफूर को कोहनूर हीरा और अपार धनराशि दी3

अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के पश्चात् वरंगल की राजा प्रतापदेव ने दिल्ली के बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया। इसी कारण से बादशाह गयासुद्दीन तुगलक ने अपनी सेना से वरंगल पर आक्रमण कराया, परन्तु शाही सेना विफल रही। उसने दो वर्ष पश्चात् सन् 1323 (संवत् 1380) में अपने पुत्र द्वारा वरंगल पर फिर आक्रमण कराया। इस बार वरंगल के राजा की हार हुई और वरंगल का नाम सुल्तानपुर रखा गया। वहां से काक/काकतीय वंश की सत्ता समाप्त हो गई। वहां सेये लोग अपने उन प्राचीन वंशधरों से आ मिले जो कि मालवा, गुजरात, सिंध और मारवाड़ प्रान्तों में बसे हुए थे। सिंध में ‘ककस्थान’ क्षेत्र इसी काकवंश का बसाया हुआ है, जो आज भी विद्यमान है।

मरुस्थान (राजस्थान) में काकवंश -

काकवंश के लोगों ने मरुस्थल में मांडव्यपुर जीतकर मण्डौर नामक एक प्रसिद्ध किला बनवाया जहां पर हरिश्चन्द्र राजा हुए। किन्तु इस किले के निर्माण के पूर्व ही आठवीं शताब्दी में काकवंशी इधर विद्यमान थे। इनके दो शिलालेख मिले हैं। एक जोधपुर से चल मील पर मण्डौर के विष्णु मन्दिर से संवत् 894 चैत्रसुदी 5 का लिखवाया हुआ और दूसरा जोधपुर से 20 मील पर घटियाले से संवत् 918 चैत्रसुदी 2 का लिखवाया हुआ। इस पर काकवंश के वहां पर राज्य करने वाले राजाओं की वंशावली अंकित है। इस वंशावली में राजा हरिश्चन्द्र को वेदशास्त्रों का ज्ञाता लिखा है और उसकी भद्रा नामक रानी से भोगभट्ट, कक्क, रज्जिल और दद्द नामक चार पुत्रों की उत्पत्ति भी लिखी है। रज्जिल को राज्य मिला, जिसका पुत्र नरभट्ट उपनाम पेल्ला पेल्ली था। नरभट्ट का पुत्र नामभट्ट उपनाम नाहाड़ था, जिसने मेड़ता को अपनी राजधानी बनाया। इसके तात और भोज नामक दो पुत्र हुए। तात ने मांडव्य ऋषि के पुराने और पवित्र आश्रम में रहकर अपना जीवन बिताया। वह धर्म के पथ पर अडिग रहा जिससे उसकी बड़ी प्रसिद्धि हुई। इसकी परम्परा में यशोवर्द्धन, चन्दुक और शिलुक हुए।


1. जाटवंश है।
2,3 . जाट इतिहास उर्दू पृ०185 लेखक ठा० संसारसिंह; जाटों का उत्कर्ष पृ० 278-280 लेखक कविराज योगेन्द्रपाल शास्त्री; भारत का इतिहास (प्री-यूनिवर्सिटी कक्षा के लिए) पृ० 191, लेखक अविनाशचन्द्र अरोड़ा; प्री-यूनिवर्सिटी भारत का इतिहास पृ० 142; हिन्दुस्तान की तारीख (उर्दू) पृ० 117-391.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-228


शिलुक के एक शिलालेख को सन् 1894 ई० के ‘जनरल रायल एशियाटिक सोसायटी’ के पृष्ट 6 पर उद्धृत किया गया है - शिलुक ने देवराजभट्टी का राज्य छीनकर त्रवणी और बल्ल देशों पर अपना राज्य स्थापित किया। बल्ल क्षेत्र के राजा देवराजभट्टी को पृथिवी पर पछाड़कर उसका राजसिंहासन और ताज छीन लिया। इस शिलुक के पुत्र झोट का बेटा भिलादित्य था जो अपने पुत्र कक्क को राज्य देकर हरद्वार चला गया, जहां पर 18 वर्ष बाद स्वर्गीय हो गया।

भिलादित्य के पुत्र कक्क ने व्याकरण तर्क आदि शास्त्र एवं शस्त्रों में पूर्ण निपुणता प्राप्त की। इसने मुद्रगिरि (मुंगेर) बिहार में गौण्डवंशियों को परास्त किया। भट्टीवंशी राजकुमारी पद्मिनी से विवाह करके इसने दोनों वंशों में सद्भावना स्थापित की। इस रानी से पुत्र बाऊक और दूसरी रानी दुर्लभदेवी से कक्कुक पुत्र का जन्म हुआ। इसका एक शिलालेख पटियाला में मिला है जिस पर लिखा है कि कक्कुक ने राज्याधिकार प्राप्त करके मरु, माड़, बल्ल, त्रवणी, अज्ज और गुर्जर वंशों में अपने सद्-व्यवहार से प्रतिष्ठा प्राप्त की। जनरल रायल एशियाटिक सोसायटी सन् 1895 ई० के पृष्ठ 517-518 पर लिखा है कि “कक्कुक ने रोहन्सकूप और मण्डौर में जयस्तम्भ स्थापित किए।” यह संस्कृत भाषा का महान् पण्डित था। एक शिलालेख का उल्लेख एपिग्राफिका इण्डिया के 9वें भाग में पृष्ठ 280 पर किया गया है। यह श्लोक राजा कक्कुक ने स्वयं बनाया था। इस विद्वान् राजा ने लिखा था कि “वह मनुष्य अतीव सौभाग्यशाली है जिसका यौवन काल विविध सांसारिक भोगों में, मध्यम-काल ऐश्वर्य में और वृद्धावस्था धार्मिक कार्यों में व्यतीत होती है।”

इस कक्कुक के बाद इस वंश की राज्यसत्ता समाप्त हो गई और मण्डौर का शासन राठौरों के हाथ में आ गया। राव जोधा जी ने मण्डौर का ध्वंस करके जोधपुर नामक नगर को बसाकर वहां राजधानी और किले का निर्माण कराया। यहां से वैभवशून्य होने पर इस काकवंश के लोगों ने मरुभूमि को छोड़ दिया और यहां से जाकर हरयाणा के जींद जिले में रामरायपुर में अपनी सत्ता स्थिर की और बस्तियां बसाईं। यहां पर ये लोग कक्कर और काकराण नाम से आज भी प्रसिद्ध हैं। यहीं से जाकर इस वंश के जाट मेरठ कमिश्नरी, बिजनौर जिला और अम्बाला में जगाधरी के पास बस गए, जहां पर आज भी विद्यमान हैं। जगाधरी के निकट अरनावली गांव के काकराण जाट बड़े प्रसिद्ध हैं।

काकराण वंश की भूतपूर्व किला साहनपुर नामक रियासत जिला बिजनौर में थी। इस रियासत के काकराणा जाटों ने सम्राट् अकबर की सेना में भरती होकर युद्धों में बड़ी वीरता दिखाई और अपनी ‘राणा’ उपाधि का यथार्थ प्रमाण देकर मुगल सेना को चकित कर दिया। इनका वर्णन आईने-अकबरी में है। साहनपुर रियासत में काकराणा वंश के चौदह महारथी (वीर योद्धा) थे जिनके नाम से इस वंश की शाखा चौदहराणा भी है जो पर्वों के अवसर पर साहनपुर स्टेट में मूर्ति बनाकर पूजे जाते हैं1। चौदहराणा जाट मेरठ में ककोर कलां, सबगा और बिजनौर में सिसौना चन्दूपुरा गांव में बसे हुए हैं। जिला रोहतक में इनका पाकसमा गांव है। साहनपुर रियासत में काकराणा जाटवंश के राज्य का पूरा वर्णन उत्तरप्रदेश में जाटवीरों का राज्य के अध्याय में किया जायेगा। काकराणावंशी काकज़ई काबुल कन्धार में पठानों का एक बड़ा


1. भारत में जाट राज्य उर्दू पृ० 187, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-229


दल है। कैलाशपुर जि० सहारनपुर के पठान भी काकजई हैं। राजपूत स्टेट बस्तर काकतीय है। अलीगढ़ जिले की इगलास तहसील के लगसमा क्षेत्र में ठकुरेले-काकराणों के 52 गांव जाटों के हैं जिनमें गौण्डा, डिगसारी, रजावल, कैमथल, कूंजीनगला, गडाखेड़ा, मातीवसी, तलेसरा, मल्हू, जथोली, पीपली, बजयगढ, देवनगला, सहरी, कारीकर आदि बड़े गांव हैं। इन 52 गांवों में से 100 गांव और बस गए हैं। इस क्षेत्र को लगसमा भी कहते हैं। यहां अगस्मादेवी का मन्दिर भी है।

काकराणा जाटों में के मेरठ में मसूरी, बणा, राफण, पहाड़पुर;

मुजफ्फरनगर में फईमपुर, राजपुर, तिलौरा, मीरापुर, दलपत, ककरौली गांव हैं।

महाराजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में कक (जाटवंश) वंशज राजा तथा इस वंश के बहुत से लोग आये और उन्होंने तोखी लम्बी तलवारें, फरसे, सहस्रों रत्न और दूर तक जाने वाले बड़े-बड़े हाथी भेंट किए। (महाभारत सभा पर्व अध्याय 51वां, श्लोक 26-31)।

दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र को बताया कि कुक्कुर (काकुस्थ जाटवंश) उत्तम कुल के श्रेष्ठ एवं शस्त्रधारी क्षत्रिय राजकुमार ने अजातशत्रु युधिष्ठिर को बहुत धन अर्पित किया। (महाभारत सभापर्व, 52वां अध्याय, श्लोक 13-17)।

काकराणवंश के शाखा गोत्र - 1. चौदहराणा 2. ठकुरेले

श्री रामचन्द्र जी महाराज जाट थे

प्रमाण - सूर्यवंशी वैवस्वतमनु का पुत्र इक्ष्वाकु था जो कि वैवस्वतमनु द्वारा बसाई भारत की प्रथम नगरी अयोध्या का शासक हुआ था। इक्ष्वाकु के विकुक्षी नामक पुत्र से पुरञ्जय हुआ जिसने देवासुर युद्ध में असुरों को जीत लिया, जिससे वह ‘काकुस्थ’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसके इस नाम से सूर्यवंशी क्षत्रियों का एक समुदाय काकुस्थ, काकवंश प्रचलित हुआ जो कि जाटवंश है। भाषा भेद से यह काकुस्थ जाटवंश काक, काकतीय, कक्क, कुक, कुकर, कुक्कुर, कक और काकराणा कहलाता है जो आज इस गोत्र के जाट भिन्न-भिन्न प्रांतों में विद्यमान हैं। जाटों के अलावा यह गोत्र किसी दूसरी जाति में नहीं है, यदि कोई मिल भी जाए तो वह जाटों में से निकली जाति है। इसी परम्परा में बहुत युगों के पश्चात् महाराज दशरथ का राजा रघु हुआ जो कि बड़ा प्रतापी सम्राट् था जिसके नाम पर इस काकुस्थवंश का एक समुदाय रघुवंशी प्रचलित हुआ जो कि जाट वंश है। (काकुस्थ या काकवंश का वर्णन पिछले पृष्ठों पर देखो)।

रघुवंशी जाट जो बाद में रघुवंशी सिकरवार कहलाये। इस गोत्र के जाटों की बहुत बड़ी संख्या आज भी अनेक स्थानों पर आबाद है। (इसका वर्णन देखो एकादश अध्याय में)।

  • 1. राजा दशरथ एवं उनके पुत्र श्री रामचन्द्र जी इसी काकुस्थ और रघुवंश के जाट थे। वाल्मीकीय रामायण में इसके अनेक उदाहरण हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं -
(1) विश्वामित्र राजा दशरथ को कहते हैं - ककुत्स्थनन्दन! यदि वशिष्ठ आदि आपके सभी

1. यह कैलाशपुर रियासत, जो जिला सहारनपुर में थी, के पठान काकज़ई हैं जो कि सिन्ध और बिलोचिस्तान से यहां आये थे।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-230


मन्त्री आपको अनुमति दें तो आप श्रीराम को मेरे साथ विदा कर दीजिए। (बालकाण्डे एकोनविंशः सर्गः श्लोक 16)।
(2) आगे-आगे विश्वामित्र, उनके पीछे काकपक्षधारी महायशस्वी श्रीराम तथा उसके पीछे सुमित्राकुमार लक्षमण जा रहे थे। (बालकाण्डे द्वाविंशः सर्गः श्लोक 6)।
(3) विश्वामित्र श्रीराम से कहते हैं - ककुत्स्थनन्दन! मैंने तुम्हें इन दोनों विद्याओं को देने का विचार किया है। (बालकाण्डे द्वाविंशः सर्गः श्लोक 20)।
(4) रघुनन्दन ! तुम गौओं और ब्राह्मणों का हित करने के लिए दुष्ट पराक्रमवाली इस परम भयंकर दुराचारिणी यक्षी (ताटका) का वध कर डालो। (बालकाण्डे पंचविंशः सर्गः श्लोक 15)।
(5) कबन्ध नामक राक्षस ने बतलाया - रघुनन्दन ! आप धर्मपरायण संन्यासिनी शबरी के घर जाइये (बालकाण्डे प्रथमः सर्गः श्लोक 56)।

इसी प्रकार श्री रामचन्द्र जी को रघुनन्दन, रघुकुल, काकुत्स्थकुलभूषण, रघुवंशी अनेक स्थानों पर इस वाल्मीकीय रामायण में लिखा हुआ है जो कि इनके जाट होने के ठोस प्रमाण हैं।

  • 2. मर्यादापुरुषोत्तम रामचन्द्र के ज्येष्ठपुत्र लव से सूर्यवंशी लाम्बा जाटवंश का प्रचलन हुआ। (अधिक जानकारी के लिए देखो, तृतीय अध्याय, लाम्बा सूर्यवंशी-लववंशी प्रकरण)। यह भी श्री रामचन्द्र जी व लव के जाट होने का प्रमाण है।
  • 3. मासिक पत्र हरयाणा जाट सभा समाचार व सुझाव, मुख्य कार्यालय 6-B जाट धर्मशाला हिसार 10 दिसम्बर 1987 के पृष्ठ 1 पर लेख है - भगवान् राम जाट थे। मध्यप्रदेश जाट सभा के चौधरी रामलाल जी डोगोवार निवासी ग्राम व डाकघर हरवार मन्दसौर (म० प्र०) का पत्र इस कार्यालय में प्राप्त हुआ है कि आपने लिखा है भगवान् श्रीराम व भगवान् श्रीकृष्ण जाट क्षत्रिय थे। ये राजपूत नहीं थे। राजपूत जाति का प्रादुर्भाव तो सातवीं शताब्दी से होता है एवं वह सोलहवीं शताब्दी के आसपास बोलचाल में आई। इसे आपने इतिहास के प्रमाणों द्वारा प्रमाणित भी किया है।
  • 4. श्री रामचन्द्र जी के दूसरे पुत्र कुश से कुश जाटवंश प्रचलित हुआ। कुश को दक्षिण-कौशल का राजा बनाया गया। उसने विन्ध्याचल पर्वत पर कुशवती (कुशस्थली) नगर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया। (वा० रा० उत्तरकाण्ड, सर्ग 107)| श्रीकृष्ण जी ने मथुरा को छोड़कर कुशस्थली को अपनी राजधानी बनाया और उसका नाम द्वारका रखा।

यह हमने प्रथम अध्याय में सूर्यवंशी राजाओं की वंशावली में लिख दिया है कि महाराज कुश के वंशज राजा बृहद्वल महाभारत युद्ध में लड़ते हुए अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु द्वारा मारे गये थे। बृहद्वल अयोध्या का प्रसिद्ध राजा था। सूर्यवंशज कुशगोत्र के जाटों का अयोध्यापुरी में बृहद्वल से प्रसेनजित् तक 27 राजाओं का शासन 3100 ई० पू० से 500 ई० पू० तक (2600 वर्ष) रहा। कुछ समय बाद प्रसेनजित् ने अयोध्यापुरी राजधानी को छोड़कर इसे 58 मील उत्तर में श्रावस्ती नगरी


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-231


को अपनी राजधानी बना लिया। वहां पर इसके समेत 5 कुशवंशज जाट राजाओं ने राज्य किया जिनमें अन्तिम सुमित्र था। इन जाट राजाओं का वहां पर लगभग 150 वर्ष राज्य 500 ई० पूर्व से 350 ई० पू० तक रहा। आज भी कुशवंशज के जाट बड़ी संख्या में विद्यमान हैं। (अधिक जानकारी के लिए देखो, पंचम अध्याय, सूर्यवंशीय कुशवंश जाट राज्य)।

इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि श्री रामचन्द्र जी महाराज जाट थे।

गौरवंश

4. गौरवंश -

यह वंश गौर, गौरेह, गुरु आदि नामों से प्रसिद्ध है। कर्नल जेम्स टॉड, गौरीशंकर हरीचन्द ओझा आदि इतिहासकारों ने यह कल्पना की थी कि इस वंश का नाम गुरु अथवा गौर वर्ण के कारण पड़ा था। परन्तु विशाल प्राचीन साहित्य की गहरी खोज से इस गौरवंश के प्रचलित होने की सत्यता का पता चला है जो कि निम्न प्रकार से है - सृष्टि के आरम्भ में सतयुग में सूर्यवंशज वैवस्वत मनु की परम्परा में ब्रह्मा की 22वीं पीढ़ी में युवनाश्व नामक राजा हुए थे। उनका विवाह चन्द्रवंशी राजा मतिनार की कन्या गौरी से हुआ था। इससे सम्राट् मांधता उत्पन्न हुए। ‘गौरी कन्या च विख्याता मांधातुर्जननी शुभा’ वायु पुराण 99-130 इसका प्रमाण है। ‘गौरी’ माता के कारण ही मांधाता की उपाधि ‘गौर’ हुई। मांधाता के ही वंशधर गौर नाम से लोकप्रसिद्ध हुए। पं० भगवद्दत्त बी० ए० ने भी अपने लिखित ‘भारतवर्ष’ का इतिहास पृ० 756 पर इसकी पुष्टि की है।

मांधाता की ठीक बारहवीं पीढ़ी में सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र हुए। मांधाता न केवल सम्राट् ही थे अपितु वे अपनी विशाल विजय-यात्राओं से ‘त्रैलोक्यविजयी’ (वायुपुराण 88-67); ‘सार्वभौम चक्रवर्ती’ (गोपथब्राह्मण 1-2-10); दिग्विजयी सम्राट् (बुद्ध चरित 10-13) के पद पर प्रतिष्ठित हुए। वायु पुराण 88-68, विष्णु पुराण 4-1-65, महाभारत द्रोणपर्व 6-2-11 में समान रूप से लिखा है कि उदयगिरि से अस्ताचल तक सारी भूमि सम्राट् मांधाता के राज्य में थी1। इनकी राजधानी अयोध्या में थी। भारतवर्ष में इनसे बड़ा चक्रवर्ती सम्राट् कोई दूसरा नहीं हुआ। पं० भगवद्दत्त बी० ए० कृत ‘भारतवर्ष का इतिहास’ पृ० 69 पर लिखा है कि -

“गौर सम्राट् मांधाता के कई पुत्रों में से एक अम्बरीष थे जिससे उसका पुत्र युवनाश्व हुआ। युवनाश्व का पुत्र हारीत हुआ जो कि एक महान् ऋषि कहलाया। इस हारीत ऋषि के वंशज क्षत्रिय से ब्राह्मण हो गए जिनका गोत्र ‘अंगिरस’ प्रचलित हुआ। आगे इनकी संतति गौड़ ब्राह्मण कहलाने लगी।”

सारांश यह है कि गौर सम्राट् मांधाता से ‘गौरवंश’ प्रचलित हुआ। उनके प्रपौत्र क्षत्रिय हारीत के वंशज गौड़ ब्राह्मण हैं। सम्राट् मांधाता के क्षत्रियवंशज गण का नाम ‘गौरवंश’ प्रचलित हुआ जो कि जाट वंश (गोत्र) है। इनका भारतवर्ष में बहुत बड़ा राज्य वैभवशाली रहा। सभी इतिहासज्ञ इस वंश की महत्ता को एक मत से स्वीकार करते हैं। इस वंश के राज्य सम्मान को देखते हुए ही कर्नल जेम्स टॉड साहब ने इसे 36 राजवंशों में गिना है। गौरवंश के जाटों का राज्य वैदिककाल से ही रहा है। महाभारत के लेख अनुसार इन गौर जाटों के नाम से जम्बूखण्ड के एक द्वीप में मनःशिला (मैनशिल) का एक बहुत बड़ा पर्वत है जो गौर नाम


1. विष्णु पुराण, चतुर्थ अंश, अध्याय 2 के श्लोक 65 में लिखा है - सूर्योदय के स्थान से सूर्यास्त के स्थान पर्यन्त सभी क्षेत्र युवनाश्वपुत्र मांधाता के अधीन थे। इसी अध्याय के श्लोक 62 के अनुसार - मांधाता सात द्वीप वाली सम्पूर्ण पृथ्वी का चक्रवर्ती राजा हुआ।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-232


से विख्यात है1। वहां पर इनका राज्य होने का यह प्रमाण है। अंग्रेज इतिहासकार पटोलेमी (Ptolemy) तथा यूनानी लेखक स्ट्रैबो (Strabo) ने लिखा है कि तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व गौर वंशज जाटों का राज्य गौरूया नामक देश पर था। वहां के एक नगर का नाम गौराया था। यह देश पामीर पठार की घाटी में मध्य एशिया में बादाखशन और खोटा के बीच में था। ड्ब्ल्यू-डब्ल्यू तारन (W.W. Tarn) के लेख अनुसार दूसरी शताब्दी ई० पूर्व यह गौरूया देश सम्राट् मेंनन्दर के साम्राज्य का एक भाग था2। वहां से अपने पैतृक देश भारतवर्ष में आने पर इन गौर वंश के जाटों ने अपने मध्य एशिया में गौराया नगर के नाम पर दूसरा गौराया नगर बसाया जो कि जी० टी० रोड पर लुधियाना और जालन्धर के बीच में है। आज भी इस वंश के जाट यहां पर बसे हुए हैं। मुस्लिम धर्म के प्रचलित होने से पहले गौरवंशी जाट राजा सुभागसेन का अफगानिस्तान पर शासन था। मुस्लिम बादशाहों ने इनसे अफगानिस्तान जीत लिया। आज भीजाबलिस्तान में गौरजई पठान बड़ी संख्या में हैं। भारत पर आक्रमण करने वाला मोहम्मद गौरी इसी गौर वंश का वीर व्यक्ति था। गौरवंश बलोचों की भी एक खाप (संघ) है परन्तु उनको असली बलोच नहीं माना जाता। बीकानेर राज्य में भगौर इन गौर जाटों की राजधानी रही। बलवंश के जाटों ने इनका राज्य जीत लिया। इसके पश्चात् गौर जाटों का राज्य अजमेर के चारों ओर पर्वतीय क्षेत्र पर रहा। इस राज्य को चौहान राजपूतों ने जीत लिया। वर्तमान अजमेर, उदयपुर, जयपुर, ब्यावर, किशनगढ पंजाब और उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में इस गौर जाटवंश के लोग बड़ी संख्या में बसे हुए हैं।

गौरवंशी जाट बूंदी और सिरोही राज्य की प्राचीन भूमि पर शासक थे। इन पर चौहान राजपूतों ने विजय प्राप्त की थी। भादों गौर राजाओं ने जिला हिसार में भादरा पर राज्य किया। मालवा और भिण्ड से गौरवंशी जाट नरेशों के शिलालेख मिले हैं। इनका वहां शासन होने के ये प्रमाण हैं। राजस्थान में होने वाली खुदाइयों में इस वंश के शिलालेख, सिक्के और ताम्रपत्र मिलते हैं। किन्तु स्थान स्थान पर इनके टूटे-फूटे होने के कारण पढ़े जाने में असुविधाएं हुई हैं। नागरी प्रचारिणी पत्रिका 13वें भाग के प्रथम अंक में प्रसिद्ध इतिहासज्ञ गौरीशंकर हीराचन्द ओझा जी ने उदयपुर के छोटी सादड़ी गांव से दो मील दूर पहाड़ में भंमर माता के मन्दिर में अंकित एक शिलालेख का उल्लेख किया है - “547 संवत् की माघसुदी दशमी के शुभ दिन राज्यवर्द्धन के पौत्र प्रथगुप्त गौरवंशी नरेश के द्वारा अपने माता-पिता की पुण्यस्मृति में इस मन्दिर का निर्माण कराया गया।” बौद्धधर्म की समाप्ति पर इस क्षत्रिय गौरवंश की अनेक वीरगाथाएं हैं। बहुत से गौरवंशी लोग मुसलमान हो गए। वे गांधार देश में आज भी अपने नाम के साथ गौरी लगाते हैं। राजपूतों में उदयपुर राज्य के एकलिंग मन्दिर प्रशस्ति में अंकित कु० बादल गौरवंशी था। मुगलों से सम्मान पाने का इच्छुक अपनी तलवार से अपने बहनोई वीर अमरसिंह राठौर का वध करने वाला राजपूत अर्जुन गौर इसी कुल का कलंक था। बृज के गौर केवल करेवा करने के कारण ही


1. महाभारत भीष्मपर्व 12वां अध्याय श्लोक 4.
2. Jats - The Ancient Rulers by B.S. Dahiya, P. 256. The Greeks in Bactria and India, P. 236.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-233


राजपूतों में सम्मानित नहीं माने जाते जबकि वे शुद्ध आर्य पद्धति का पालन करते हैं। इटावा और शाहजहांपुर जिलों के गौर, राजपूतों में बड़ा प्रतिष्ठित स्थान रखते हैं। गौर जाट क्षत्रियों की बहुत बड़ी संख्या पंजाब में है। जिला जालन्धर में गुड़ा गांव के गौरवंशी जाट राजा बुधसिंह के पुत्र राजा भागमल मुगल साम्राज्य की ओर से इटावा फरूखाबाद, इलाहाबाद का सूबेदार बना और फफूंद में रहते हुए बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त की। आपने फफूंद में एक किला बनवाया और लखनऊ नवाब की ओर से 27 गांव कानपुर, इटावा में प्राप्त किए। इन गांवों में ही एक गांव बिठूर गंगा किनारे पर है। यही ब्रह्मावर्त के तीर्थ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां निवास करते हुए आप ने फफूँद में एक मकबरा बनवाया। उस किले पर लिखा है कि “1288 हिज़री (सन् 1870) में इल्मास अली खां के कहने से राजा भागमल गौर जाट ने यह मकबरा बनवाया।” यहां हिन्दू-मुसलमान समान रूप से चादर चढ़ाते हैं। राजा गौर भागमल ने प्रजा के लिए सैंकड़ों कुएं, औरैय्या में एक विशाल मन्दिर, मकनपुर एवं बिठूर में भी दरगाहें बनवाईं। सन् 1857 ई० के स्वतन्त्रता संग्राम के संचालक नेता नाना साहब पेशवा ने महाराष्ट्र से आकर राजा भागमल के अतिथि रूप में बिठूर में निवास किया था। इस दृष्टिकोण से बिठूर को और भी विशेष महत्त्व प्राप्त हो गया। इस भूतपूर्व गौरवंशी जाट रियासत के अतिरिक्त गौर जाट जिला भिवानी में बामला माड़ौधी गांव, जिला जालन्धर में बुढा गौराया, जिला सहारनपुर में बरमपुर, जिला मुजफ्फरनगर में कंजरहेड़ी, माज्जू, बुलन्दशहर में अहमदानगर, जिला बिजनौर में पुट्टी, सीकरी, रघुनाथपुर और जिला मेरठ में पैगा एवं उजैड़ा गांव में निवास करते हैं। बिजनौर में नगीना, राजा भागमल की रियासत के रूप में थी। नगीना में गौर जाटों के किले पर ही नगीना का थाना बना हुआ है।

गौरवंश के शाखा गोत्र - 1. गुलिया-गुलैय्या-गुल्या 2. तातराणा

सूर्यवंशी बल-बालान-बालियान जाटवंश

कुछ इतिहासकार इस वंश का आदिप्रवर्तक चन्द्रवंशी सम्राट् ययाति के पुत्र अनु की परम्परा में बलि को मानते हैं। महाभारत आदिपर्व, 66वें अध्याय में लिखा है कि ब्रह्मा जी के पुत्र दक्ष प्रजापति की 13 कन्याओं का विवाह सूर्यवंशी कश्यप महर्षि के साथ हुआ। उनमें से एक का नाम दिति था जिससे एक पुत्र हिरण्यकशिपु हुआ जिसका पुत्र प्रह्लाद था। प्रह्लाद का पुत्र विरोचन था जिसका पुत्र बलि हुआ1। बहुत से इतिहासकारों के लेख अनुसार यह माना गया है कि इस बल वंश के आदिप्रवर्तक सूर्यवंशी विरोचनपुत्रशिरोमणि प्रतापी राजा बलि ही थे। कर्नल टॉड ने इस वंश को भी 36 राजवंशों में गिना है। यह बलवंश जाटवंश है। इस बलवंश के सम्राटों की प्राचीन राजधानी के विषय में ठीक निर्णय नहीं हुआ है। अयोध्या, प्रयाग और मुलतान में से कोई एक इनकी राजधानी थी।

527 से 814 संवत् (सन् 470 से 757 ई०) तक इस बलवंश का शासन गुजरात में माही नदी और नर्मदा तक, मालवा का पश्चिमी भाग, भड़ौच कच्छ सौराष्ट्र, काठियावाड़ पर रहा। वहां पर राज्य की स्थापना करने वाला भटार्क नामक वीर महापुरुष था। यह संवत् 512 से 524 (सन् 455 से 467 ई०) तक सम्राट् स्कन्दगुप्त का मुख्या सेनापति था। किन्तु संवत् 526 (सन् 469 ई०) में


1. जाट वीरों का इतिहास प्रथम अध्याय, दक्ष की पुत्री दिति की वंशावली देखो।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-234


गुप्त राज्य के अस्त होने पर भटार्क ने अपने वंश के नाम पर कच्छ काठियावाड़ में बलभीपुर राज्य की स्थापना की। इस नगर का दूसरा नाम बला भी था। “कार्पस इन्स्कृशन्स इन्डिकेर” 3/169 के उल्लेखानुसार विक्रमी 559 के लिखे हुए ‘मालिया’ से मिले एक शिलालेख द्वारा यह प्रमाणित हुआ है कि भटार्क के चार पुत्रों धरसेन, ध्रुवसेन, द्रोणसिंह और धरपट में से प्रत्येक ने बला नगर की स्थिति को क्रमशः राज्यसत्ता पाने पर अधिकाधिक सुदृढ़ किया। इन चारों ने महासामन्त - महाप्रतिहार - महादण्डनायक - महाकार्ताकृतिक महाराज की उपाधि धारण की थी। ह्युनसांग ने लिखा है कि -

भटार्क के चारों पुत्रों के शासनकाल के पश्चात् क्रमशः गुहसेन, धरसेन द्वितीय, शिलादित्य, खरग्रह, धरसेन तृतीय, ध्रुवसेन द्वितीय राजा हुए। कन्नौज के वैस1 सम्राट् हर्षवर्द्धन ने अपनी पुत्री का विवाह ध्रुवसेन द्वितीय से किया था। इस ध्रुवसेन द्वितीय के पुत्र धरसेन चतुर्थ ने भड़ोंच को बला राज्य में मिलाया। इस सम्राट् ने परमेश्वर चक्रवर्ती उपाधि भी धारण की। इसके ही आश्रित महाकवि भट्टी ने भट्टीमहाकाव्य की रचना की। इस बला राज्य को बल्लभी अथवा गुजरात राज्य कहा गया है जिसका शासक ध्रुवसेन द्वितीय था।”

इसके बाद ध्रुवसेन तृतीय, खरग्रह द्वितीय, शिलादित्य तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, सप्तम शिलादित्य क्रमशः राज्याधिकारी हुए। इन अन्तिम राजाओं के अनेक उल्लेख निम्न प्रकार से मिलते हैं - शिलालेखों, ताम्रपत्रों की प्रतिलिपियां एपिग्राफिका इण्डिका जिल्द 4 पृ० 76, इण्डियन एन्टिक्वेरी जिल्द 7-11-5-17, वीनर जीट्स काफ्ट जिल्द 1 पृ० 253, लिस्ट आफ इन्सक्रिपशन्स आफ नार्दन इण्डिया नं० 492-493, गुप्त इन्सक्रिपशन्स पृ० 173 आदि में उल्लिखित है। इनके आधार पर यह निश्चयात्मक रूप से कहा जा सकता है कि ये सम्राट् शैवधर्मानुयायी थे क्योंकि इनके ताम्रपत्रों और सिक्कों पर बैल की मुहर, नन्दी और शिवलिंग की मूर्तियां अंकित हैं। कुछ राजाओं की विशेष रुचि बौद्धधर्म की ओर भी हुई थी। इस वंश ने कला-कौशल और विद्या में विशेष उन्नति की थी। चीनी यात्री इत्सिंग ने लिखा है कि “इस समय भारत में नालन्दा और बल्लभी दो ही विद्या के घर समझे जाते हैं।” दूसरे चीनी यात्री ह्यूनसांग ने बलवंश की इस राजधानी को 6000 बौद्ध भिक्षुओं का आश्रय स्थान तथा धन और विद्या का घर लिखा है।

विक्रमी संवत् 814, हिजरी सं० 175 (सन् 757 ई०) में सिन्ध के अरब शासक हशाब-इब्न-अलतधलवी के सेनापति अवरुबिन जमाल मे गुजरात काठियावाड़ पर चढ़ाई करके बला (बल्लभी) के इस बलवंश के राज्य को समाप्त कर दिया।

मुहणोंत नैणसी भाट के लेखानुसार यहां से निकलकर इस वंश से ही गुहिलवंश प्रवर्तक गुहदत्त उत्पन्न हुए। टॉड ने भी इसी मत की पुष्टि करते हुए ‘शत्रुञ्जय महात्म्य’ नामक जैन ग्रन्थ के आधार पर विजोल्या नामक स्थान के एक चट्टान पर खुदे हुए एक लेख को उद्धृत किया है। प्रतोल्यां बलभ्यां च येन विश्रामितं यशः - अर्थात् मेवाड़ के गुहिल वंशियों ने बल्लभी पर भी यश स्थापित किया।

उदयपुराधीश राजा राजसिंह के ‘चरित्र राजविलास’ ग्रन्थ के प्रारम्भ में ही लिखा है कि “पश्चिम


1. यह वैस जाट गोत्र है। सम्राट् हर्षवर्द्धन वैस या वसाति गोत्र का जाट था। वैश्य दूसरा शब्द है जो एक वर्ण का नाम है तथा वैश्य बनिया (महाजन) को भी कहते हैं।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-235


दिशा प्रसिद्ध देश सोरठधरदीपत नगर बाल्लिका नाथ जंग करि आसुर जीपत।”

सोरठ से पराजित बल्ल लोगों के नाथ के लिए गौरीशंकर हीराचंद ओझा मेवाड़ इतिहास पृ० 18 पर इसी राजविलास का उल्लेख करते हैं कि बल्लभी क्षेत्र के राजा का रघुवंशी पुत्र गुहादित्य बाप्पा रावल मेवाड़ में आया। उसने अपने नाना राजा मान मौर्य जो कि चित्तौड़ का शासक था, को मारके चित्तौड़ का राज्य हस्तगत कर लिया। नैणसी भाट के लेख अनुसार - “मौरी दल मारेव राजरायांकुर लीधौ।” ‘राजप्रशस्ति महाकाव्य’ सर्ग 3 में भी लिखा है -

ततः स निर्जित्य नृपं तु मौरी, जातीयभूपं मनुराजसंज्ञम् ।
गृहीतवांश्चित्रितचित्रकूटं, चक्रेऽत्र राज्यं नृपचक्रवर्ती ॥

इस प्रकार बल वंश की ही शाखा गुहिल सिसौदिया सिद्ध होती है - स्थान-परिवर्तन से इस प्रकार नाम भी परिवर्तित हुआ।

बलवंश का मूलस्थान पंजाब ही था। यहीं से धारणवंशी (जाट गोत्र) गुप्त सम्राटों का सेनापति भटार्क पहले बिहार मगध और बाद में वल्लभी पर अपनी सत्ता स्थिर कर सका। किन्तु वह पद्धति एकतन्त्री थी। पंजाब में इस बलवंश के शेष वंशधर प्रजातन्त्री रूप से अपनी आदि भूमि पंजाब में ही भूमि के अधिपति रहे। इनका पंजाब में यह बल जनपद मुगलकाल में बहावलपुर के अन्तर्गत देवागढ़ उपनाम देवरावर किले के अधिपति देवराज भट्टी यादव द्वारा समाप्त कर दिया गया। किन्तु ‘जनरल रायल एशियाटिक सोसायटी’ सन् 1894 पृ० 6 के अनुसार -

येन सीमाकृता नित्यास्त्रवलीबल्लदेशयो: ।
भट्टिकं देवराजं यो बल्लमण्डलपालकम् ॥

काकराणवंशी राजा शिलुक ने बल्लमण्डल के पालक देवराज भट्टी को मारकर त्रवणी और बल्ल देश तक अपनी सीमा स्थिर की1। तदनन्तर कुछ बलवंशी सीमाप्रान्त की ओर सिंध में और कुछ ऊंचे स्थान पर आबाद हो गये। जहां वे बलोच नाम से प्रसिद्ध होकर इस्लाम धर्म के अनुयायी हो गये। वैदिक सम्पत्ति पृ० 416, लेखक स० पं० रघुनंदन शर्मा साहित्यभूषण ने लिखा है कि “बलोचिस्तान भी बलोच्च्स्तान शब्द का अपभ्रंश है। इसमे कलात नामक नगर अब तक विद्यमान है। यह कलात तब का है, जब किरातनामी पतित आर्यक्षत्रिय यहां आकर बसे थे। ये क्षत्रिय होने से ही बल में उच्च स्थान प्राप्त कर सके थे2।”

इस बलवंश (गोत्र) के जाट सिक्ख अमृतसर, जालन्धर, गुरदासपुर, कपूरथला, लुधियाना जिलों में बड़ी संख्या में बसे हुए हैं। बल गोत्र के हिन्दू जाट अम्बाला, करनाल, हिसार और मुरादाबाद जिलों में अच्छी संख्या में हैं। उत्तरप्रदेश में मुजफ्फरनगर एक ऐसा जिला है जहां आज भी बलवंशी हिन्दू जाट बालियान नाम से एक विशाल जनपद के रूप में बसे हुए हैं। इन लोगों के 50 वर्गमील उपजाऊ भूमि पर 84 विशाल गांव हैं जिनमें इनकी बहुत सम्पन्न स्थिति है। काली नदी के दाएं-बाएं 20 मील तक यात्रा करने पर विशाल अट्टालिकाएँ नजर आती हैं जो इनके वैभव का परिचय देती हुई इनके गांव का बोध कराती हैं।


1. देखो तृतीय अध्याय, काकुस्थ या काकवंश प्रकरण।
2. सूर्यवंशी बल-बालान-बालियान जाटवंश, जाटों का उत्कर्ष पृ० 313-316, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-236


उत्तरप्रदेश में बालियान खाप के छोटे-बड़े लगभग 100 गांव हैं। इस खाप का सबसे बड़ा गांव सिसौली है। दूसरा प्रसिद्ध गांव शोरम है जहां सर्वखाप पंचायत का मुख्य कार्यालय पुराने समय से चला आ रहा है। इसी सर्वखाप पंचायत के सम्बन्ध में पुराने हस्तलिखित ऐतिहासिक कागजात चौ० कबूलसिंह मन्त्री (वजीर) सर्वखाप पंचायत के घर में आज भी सुरक्षित रक्खे हुए हैं। मैंने (लेखक) भी चौ० कबूलसिंह मन्त्री के घर कई दिन तक ठहर कर इनकी सहायता से इन कागजात के जाटों के विषय में आवश्यक ऐतिहासिक घटनायें लिखी हैं जिनका उल्लेख उचित स्थान पर किया जायेगा। इस बलवंश के अति प्रसिद्ध वीर योद्धा ढलैत की हरयाणा में कहावत “वह कौन सा ढलैत है”, “जैसा तू ढलैत है, सब जानते हैं”, “देख लेंगे तेरे ढलैत ने” सैंकड़ों वर्षों से प्रचलित है। उसी वीर योद्धा का संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है -

बलगोत्री जाट ढमलचन्द उपनाम ढलैत वीर योद्धा -

वीर ढमलचन्द का जन्म संवत् 1550 (सन् 1493 ई०) में ग्राम सिसौली जिला मुजफ्फरनगर में हुआ था। इसके पिता का नाम चौ० मेहरचन्द तथा माता का नाम श्यामो देवी था जो कि दहिया जाट गोत्र की थी। इस वीर का वजन 52 धड़ी (6½ मन) था। यह जंगली भैंसे के सींगों को पकड़ कर उसे चक्कर कटा देता था। इसके कोई बहिन नहीं थी। अतः इसने जसवन्तनगर के हरिराम ब्राह्मण की पुत्री हरकौर को अपनी धर्मबहिन बनाया। हरकौर के कोई भाई नहीं था सो उसने इसको धर्मभाई बना लिया। हरकौर ने ही ढमलचन्द का उपनाम ढलैत रख लिया।

ढलैत की शक्ति व योग्यता को जानकर रीवा के राजा वीरसिंह बघेला ने इसको अपनी सेना में भरती कर लिया और 200 घुड़सवारों और 300 पैदल सैनिकों का सरदार बना दिया। एक बार राजा वीरसिंह ढलैत को साथ लेकर किसी जंगल में से जा रहे थे। वहां पर एक शेर ने राजा पर अकस्मात् आक्रमण करके, उसके घोड़े को एक ही थाप में मार दिया। राजा पर वार करने से पहले ही ढलैत ने शेर की थाप को अपनी ढाल पर रोक लिया और अपनी 15 सेर वजन की तलवार से एक ही वार में शेर के दो टुकड़े कर दिये। इससे प्रसन्न होकर राजा ने ढलैत को 2000 सवारों का मनसबदार नियुक्त कर दिया। इसके पश्चात् ढलैत ने अपने पुराने साथियों कीर्तिमल और भीमपाल उपकरण को महाराज की सेना में ऊँचे पदों पर लगवा दिया। राजा वीरसिंह का एक राजपूत भीमपाल नामक 7 गांव का जागीरदार था। उसकी पुत्री राजकली थी। यह 28 धड़ी वजन के पत्थर के मुदगर को दोनों हाथों से कई-कई बार ऊपर-नीचे कर देती थी। एक बार राजा वीरसिंह बघेला अपने साथ ढलैत वीर योद्धा को लेकर जागीरदार भीमपाल के निवास-स्थान पर आये थे। वहां पर मल्लों की युद्धकला का प्रदर्शन हुआ। राजकली भी प्रदर्शन देख रही थी। महाराजा की आज्ञा से ढलैत ने राजकली के उस 28 धड़ी के मुदगर को कभी दायें हाथ और कभी बायें हाथ से ऊपर नीचे और चारों ओर घुमाकर भूमि पर दूर फेंक दिया। तीन बार ऊपर फेंककर अपने कन्धों पर रोककर नीचे गिरा दिया। इससे भी भारी मुदगरों को उठाने की कला दिखलाकर दर्शकों को चकित कर दिया। उसी अवसर पर एक मरखना हाथी बिगड़कर इस प्रदर्शन स्थल पर आ गया। उसे देखकर लोग भागने लगे। इतने में ढलैत ने बड़ी तेजी से आगे बढ़कर 19 धड़ी की मोगरी उस हाथी के माथे पर जोर से मारी जिसके लगते ही हाथी पीछे को भाग गया। इस अद्भुत मल्ल युद्ध की कला को देखकर उपस्थित जनसमूह ने जोर-जोर से जयकारे लगाये “हरयाणा के मल्ल


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-237


ढलैत की जय हो।” उसी समय उस राजपूत लड़की राजकली ने ढलैत को मन से अपना पति मान लिया और उससे स्वयंवर विवाह कर लिया।

ढलैत की धर्मबहिन ब्राह्मण लड़की हरकौर का विवाह पण्डित प्रेमनाथ के पुत्र देवव्रत के साथ हुआ। देवव्रत हरद्वार में अध्यापक थे और वहां के निकट गांव बाहपुर जाट के निवासी थे। एक दिन हरकौर अपने देवर जयभगवान के साथ बहली में बैठकर अपने गांव जसवन्तनगर से अपनी ससुराल जा रही थी। रास्ते के जंगल में हैदरगढ़ के नवाब के बेटे हसनखां ने अपने शस्त्रधारियों सहित बहली पर आक्रमण कर दिया और हरकौर को हैदरगढ़ के किले में ले गया। यह घटना संवत् 1580 (सन् 1523 ई०) की है। उस समय इब्राहीम लोधी दिल्ली का बादशाह था।

हसनरज़ाखान हरकौर से निकाह (विवाह) करने के प्रयत्न करता रहा। परन्तु वह इन्कार करती रही। हरकौर ने अपनी अंगरक्षक एक मुस्लिम फकीरनी के माध्यम से उसके पोते रमजान को पत्र देकर अपने धर्मभाई ढलैत के पास भेजा। रमजान ने यह पत्र ढलैत को मथुरा के राजा के कैम्प में दिया। ढलैत ने अपनी धर्म-बहिन हरकौर के सतीत्व को बचाने के लिये राजा वीरसिंह से आज्ञा लेकर अपने साथ कीर्तिमल, भीमपाल उपकरण तथा 200 घुड़सवार लिए और हैदरगढ को चल दिया। इनके साथ राजकली भी ऊँटनी पर सवार होकर चली। वहां पहुंचकर इन वीर योद्धाओं ने हैदरगढ़ किले को घेर लिया और बड़ी युक्ति से धावा करके नवाब के हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। राजकली ने हसनरजा के उन 5 सैनिकों का अपनी तलवार से सिर उतार दिया जो कि हरकौर को जबरदस्ती ले जाकर हसनरजाखान के साथ निकाह करवाना चाहते थे।

वीर योद्धा ढलैत ने अपनी तलवार से हसनरज़ाखान का सिर काट दिया। इस तरह से ढलैत ने अपनी धर्म-बहिन हरकौर के प्राण एवं सम्मान को बचा लिया। ढलैत की वीरता तथा हरकौर के सतीत्व की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। यह है ढलैत की वीरगाथा।

ढलैत की पत्नी राजकली की 48 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई। इसके पश्चात् वीर ढलैत साथु बन गया। एक बार ढलैत अपनी धर्मबहिन हरकौर, मित्र कीर्तिमल एवं भीमपाल उपकरण के साथ शुक्रताल (जि० मुजफ्फरनगर) गंगा के तट पर स्नान करने गया। ये सब तीन दिन तक साधु सन्तों से धर्मकथा सुनते रहे। चौथे दिन ढलैत योद्धा का अकसमात् देहान्त हो गया। उसका दाह संस्कार वहीं गंगा तट पर किया गया। सतीदेवी हरकौर को अपने धर्म-भाई ढलैत की मृत्यु का भारी आघात पहुंचा। वह ढलैत की चिता के पास बैठकर “मेरा भाई ढलैत, मेरा भाई ढलैत” कहने लगी और तीन घण्टे पश्चात् अपने प्राण त्याग दिये1। यह है भाई-बहिन के सच्चे प्यार का उदाहरण।

बलवंश के शाखा गोत्र - 1. गुहिल-गहलोत गुहिलोत-गोहिल-गेलोत (सब एक हैं) 2. मुण्डतोड़ गहलावत 3. सिसौदिया 4. राणा 5. रावल

नागवंश

यह एक सुप्रसिद्ध वंश है जो सूर्यवंश एवं चन्द्रवंश की तरह ही अनेक क्षत्रिय आर्यों के वंशों का समूह है। ऐतिहासिकों का मत है कि ये क्षत्रिय अपनी ‘नाग’ चिन्हित ध्वजा के


1. इतिहास सर्वखाप पंचायत पृ० 182-213, लेखक चौ० कबूलसिंह मन्त्री सर्वखाप पंचायत।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-238


कारण ही नाग नाम से प्रसिद्ध हुए। यह यक्ष, गंधर्व और देवताओं की कोटि का सुसंस्कृत वंश था। इस नागवंश की उत्पत्ति के विषय में भिन्न-भिन्न विचार निम्न प्रकार से हैं -

  1. आयु (चन्द्रवंशी सम्राट्) की नवीं पीढी में एलरवा के दो पुत्र काइयान और नगस थे। इसी नगस से नागवंश की उत्पत्ति प्रतीत होती है (वैदिक सम्पत्ति पृ० 426, लेखक स० पं० रघुनन्दन शर्मा साहित्यभूषण)।
  2. प्रजापति दक्ष की कन्याओं सुरसा और कद्रु ने नाग एवं पन्नग जाति के पुत्रों को उत्पन्न किया। दक्षपुत्री विनता के दो ही पुत्र विख्यात हैं - 1. गरुड़ 2. अरुण। दक्ष की पुत्री विनता एवं कद्रु सूर्यवंशी कश्यप की पत्नियां थीं। (महाभारत आदिपर्व, अध्याय 66, श्लोक 69-70)।
  3. मनुष्यों की एक जाति ‘नाग’ जाति थी। किसी काल में इनका निवास सिन्धु के पाताल (जहां सिंधु नद समुद्र में गिरता है) और दूसरे रसातल अमेरिका आदि में थे। पाण्डव भीम की नागों ने रक्षा की थी। जनमेजय ने नागों के विरुद्ध युद्ध किया था। दक्ष की कन्याओं में एक सुरसा थी। उसके पुत्र नाग थे। मध्य एशिया में शकों के साथ एक न्यूरिअन (Neurian) जाति रहती थी। उस पर कभी नागों ने आक्रमण किया था। इस विषय में हैरोडोटस लिखता है कि डेरिअस - दारुवाह (Darius) के आक्रमण से एक पीढ़ी पहले नागों ने न्यूरिअन जाति पर आक्रमण किया। नन्दलाल दे इतिहासज्ञ के अनुसार नागों के नामों पर अनेक हूण जातियों के नाम पड़े हैं। (भारतवर्ष का बृहद् इतिहास प्रथम भाग पृ० 244-245, लेखक पं० भगवद्दत्त बी० ए०)।
  4. आदि सृष्टि अर्थात् वैदिक काल के आरम्भ में ही इस नागवंश की उत्पत्ति हो गई थी। ये लोग सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी दोनों वंशों के हैं। इनका निवास और राज्य अमेरिका में भी वैदिक काल में था। इस विषय में महाभारत उद्योगपर्व के लेख निम्न प्रकार से हैं -

मातलि महाराज इन्द्र का सखा, सारथि, मित्र मन्त्री था। उसकी एक सुन्दरी कन्या गुणकेशी नाम की थी। मातलि अपनी इस पुत्री के लिए वर की खोज में नारद जी को साथ लेकर पाताल लोक (अमेरिका) पहुंच गये। नारद जी कहते हैं कि मातले! यह नागलोक है। यहां नागराज ऐरावत, वामन, कुमुद और अञ्जन नामक श्रेष्ठ गज सुप्रतीक के वंश में उत्पन्न हुए हैं (म० उ० अध्याय 99, श्लोक 15)।

नारद जी आगे कहते हैं कि मातले! यह नागलोक के नागराज वासुकि द्वारा सुरक्षित उनकी भोगवती नामक पुरी है। देवराज इन्द्र की सर्वश्रेष्ठ नगरी अमरावती की तरह ही यह भी सुख-समृद्धि से सम्पन्न है। नागलोक में सुरसा के पुत्र नागगण शोकसंताप से रहित होकर निवास करते हैं। बहुत से नाग कश्यप के वंशज हैं (म० उ० अध्याय 103, श्लोक 1-4)

नारद उवाच - मातले! यह नागराज सुमुख है, जो ऐरावत के कुल में उत्पन्न हुआ है। यह आर्यक का पौत्र और वामन का दौहित्र है। इसके पिता नागराज चिकुर थे जिन्हें थोड़े ही दिन पहले गरुड़ ने मार दिया था। (म० उ० अध्याय 103, श्लोक 23-25)।

मातलि के कहने पर आर्यक ने अपने पौत्र सुमुख को नारद व मातलि के साथ इन्द्र के पास भेज


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-239


दिया। वहां भगवान विष्णु भी थे। वहां पर सुमुख का विवाह गुणकेशी के साथ हो गया। विष्णु व इन्द्र ने उनको वर देकर विदा किया। सुमुख विवाह करके इच्छानुसार अपने घर चला गया। (म० उ० अध्याय 103, श्लोक 22, 23-29)।

रामायणकाल में भी इस नागवंश की बड़ी प्रसिद्धि थी। इस काल में इस विशाल नागवंश का संगठन कई छोटे-छोटे प्रसिद्ध जाट राजवंशों के द्वारा हुआ जिनमें वैसाति या वैस, तक्षक, काला (कालीधामन), पौनिया (पूनिया), औलक, कलकल, भारशिव (भराईच) आदि हैं। ये जाटवंश नागवंश की शाखा के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनमें से पौनियावंश का वर्णन इसी तीसरे अध्याय के पिछले पृष्ठों पर लिख दिया गया है, शेष वंशों का वर्णन उचित स्थान पर लिखा जायेगा।

रावण की दिग्विजय के अवसर पर कई देशों को विजय करके रावण अपने साथ मारीच आदि राक्षसों को पुष्पक विमान पर बैठाकर, रसातल में जाने की इच्छा से दैत्यों और नागों से सेवित तथा वरुण के द्वारा सुरक्षित जलनिधि समुद्र में प्रविष्ट हुआ॥4॥ (वा० रा० उत्तरकाण्ड, सर्ग 23वां, श्लोक 4)।

स तु भोगवतीं गत्वा पुरीं वासुकिपालिताम्।
कृत्वा नागान् वशे हृष्टौ ययौ मणिमयीं पुरीम्॥5॥
(वा० रा० उत्तरकाण्ड, सर्ग 23वां, श्लोक 5)

अर्थात् - नागराज वासुकि द्वारा भोगवतीपुरी में प्रवेश करके रावण ने नागों को अपने वश में कर लिया और वहां से हर्षपूर्वक मणिमयी पुरी को प्रस्थान किया॥5॥

नोट - यह मणिमयीपुरी आज का मणिपुर राज्य है।

वा० रा० अयोध्या काण्ड, पचासवां सर्ग, श्लोक 14 -

देवदानव गन्धर्वैः किनरैरुपशोभिताम्।
नागगन्धर्वपत्नीभिः सेवितां सततं शिवाम्॥14॥

देवता, दानव, गन्धर्व और किन्नर उस शिव के स्वरूप जैसी गंगा की शोभा बढ़ाते हैं। नागों और गन्धर्वों की पत्नियां उसके जल का सदा सेवन करती हैं॥14॥

वा० रा० किष्किन्धा काण्ड इकतालीसवां सर्ग - सीताजी की खोज के लिए सुग्रीव ने वानरों को दक्षिण दिशा को भेजा तथा उनको आदेश दिया कि बड़े-बड़े नागों से सेवित रमणीय नर्मदा नदी, सुरम्य गोदावरी, महानदी, कृष्णवेणी तथा बड़े-बड़े नागों से सेवित महाभागा वरदा आदि नदियों के तटों पर और मेखल (मेकल), उत्कल और दशार्ण देश के नागों में तथा आव्रवन्ती और अवनीपुरी में भी सब जगह सीताजी की खोज करो॥8-9॥

और इसी इकतालीसवें सर्ग, श्लोक 39 में लिखा है -

सर्पराजो महाप्राज्ञो यस्यां वसति वासुकिः।
निर्याय मार्गितव्या च सा च भोगवती पुरी॥39॥

अर्थात् - उस भोगवती पुरी में महाविद्वान् सर्पराज (नागराज) वासुकि निवास करते हैं (ये योगशक्ति से अनेक रूप धारण करके दोनों भोगवती पुरियों में एक साथ रह सकते हैं)। तुम विशेष रूप से उस भोगवती* पुरी में प्रवेश करके वहां सीताजी की खोज करो॥39॥


  • यह पाताल (अमेरिका) की भोगवती पुरी से भिन्न है।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-240


रामायणकाल में नागवंश की भारतवर्ष में बड़ी शक्ति थी। पुराणों की कथा अनुसार सम्पूर्ण क्षत्रियों को परास्त करने वाले परशुराम को इन अपराजित नागवंशियों से संधि करनी पड़ी थी और ब्राह्मणों को आज्ञा दी गई थी कि तुम नागों का आदर करो।

महाभारतकाल में भी नागवंशियों का पाताललोक (अमेरिका) के अतिरिक्त भारतवर्ष के अनेक स्थानों पर अधिकार था। महाभारत आदिपर्व में इन नाग क्षत्रियों का पाण्डवों के साथ युद्ध का वर्णन है। कौरवों की ओर से पाण्डवों को राजधानी बनाने के लिए खाण्डव वन मिल गया, जहां पर नागवंश की प्रसिद्ध शाखा तक्षक जाति (जाट) के राजा का अधिकार था। इन नाग लोगों ने श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का बड़ी वीरता से सामना किया। अर्जुन ने इस वन के चारों ओर आग लगा दी। जब खाण्डव वन जलाया जा रहा था, उस समय महाबली नागराज तक्षक कुरुक्षेत्र चला गया था। परन्तु उसका बलवान् पुत्र अश्वसेन वहीं रह गया था जो आग से बच गया था। अर्जुन इस वन को जलाने में कामयाब हुआ1। तक्षकराज यहां से पराजित होकर अपने वंशजों के साथ, तक्षशिला को राजधानी बनाकर वहां बस गया। वा० रा० उत्तरकाण्ड, सर्ग 101 में लिखा है कि “भरत ने गन्धर्वों को जीतकर गन्धर्वदेश में तक्षशिला नामक नगरी बसाकर अपने पुत्र तक्ष को वहां का राजा बनाया।”

इस पराजय के कारण ही नागवंशी तक्षकों ने दुर्योधन की ओर होकर पाण्डवों के विपक्ष में युद्ध किया। इसके पश्चात् तक्षकों ने अर्जुनपौत्र परीक्षित का उसी के महल में वध कर दिया। तब परीक्षित के पुत्र जनमेजय ने तक्षशिला पर आक्रमण कर तक्षकों को काफी हानि तो पहुंचाई किन्तु उनको पूरी तरह से नष्ट न कर सका। (महाभारत आदिपर्व अध्याय 226वां)

“हार्मसवर्थ हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड” नामक पुस्तक के आधार पर “नामवीर आदि जन्म भूमि” बंगला पुस्तक से यह सिद्ध हुआ है कि अमेरिका में कई जातियों में अभी तक नागपूजा जारी है। पौराणिक युग से प्रचलित ‘नागपंचमी’ उतनी ही सुप्रसिद्ध हो गई जितनी कि रामनवमी और कृष्ण जन्माष्टमी हैं।

पाण्डव चन्द्रवंशी अपने को नाग लोगों से बड़ा मानकर उनकी लड़कियों को तो ब्याह लेते थे परन्तु उनको अपनी लड़कियां नहीं देते थे। इसका प्रमाण यह है कि श्रीकृष्ण महाराज की आठ रानियों में से तीन नागवंश की थीं। ययातिपुत्र यदु की महारानी नागवंश की थी। अर्जुन ने नागवंश के कौरव्य की पुत्री नागिन उलूपी से गन्धर्व विवाह करके उससे बड़ा शक्तिशाली ‘इरावान’ नामक पुत्र उत्पन्न किया (महाभारत आदिपर्व, अध्याय 95)। आस्तीक ऋषि की माता नागवंशज थी। वायु पुराण 99/36 के अनुसार नागवंशज नवनाग आदि सात राजाओं ने पद्मावती, कान्तिपुरी, और मथुरा पर शासन किया। कुषाणशक्ति के अस्त और गुप्तों के उदय से पूर्व नागशक्ति शैव धर्मानुयायी रूप से पुनः उदित हुई। इस समय ये लोग शिवजी का अलंकार नाग (सांप) अपने गले में लिपटाकर रखने लगे थे। इन नवोदित नागवंशियों ने शिवलिंग को स्कन्ध पर धारण कर शिवपूजा की एक नई परम्परा स्थापित की थी। अतः इनका नाम भारशिव प्रसिद्ध हो गया। इस नाम को स्पष्ट करनेवाला एक लेख बालाघाट में मिला है। इसका उल्लेख ‘एपिग्राफिका


1. महाभारत आदिपर्व, अध्याय 226वां।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-241


इण्डिया’ भाग 1 पृष्ठ 269 तथा ‘फ्लीट गुप्त इन्स्क्रिप्शन्स’ 245 में इस प्रकार किया है -

“शिवलिंग का भार ढोने से जिन्होंने शिव को भलीभांति सन्तुष्ट कर लिया था, जिन्होंने अपने पराक्रम से प्राप्त की हुई भागीरथी गंगा के पवित्र जल से राज्याभिषेक कराया और जिन्होंने दश अश्वमेध यज्ञ करके अवभृथ स्नान किया था, इस प्रकार उन ‘भारशिव’ महाराजाओं का राजवंश प्रारम्भ हुआ।”

भारत कलाभवन काशी में एक पुरानी मनुष्य की मूर्ति भी रक्खी है जिसके कन्धे पर शिवलिंग है। इन्होंने देशभर में स्थान-स्थान पर अपने केन्द्र स्थापित करके दश अश्वमेध यज्ञ किए, जिनकी स्मृति में काशी में दशाश्वमेध घाट का निर्माण कराया। ‘अश्वमेधयाजी’ ‘परमविजयी’ पद प्राप्त करके भी वैदिक प्रथा के अनुसार दूसरे राज्यों को नष्ट नहीं किया परन्तु उनसे टैक्स (कर) लिया।

इण्डियन एंटीक्वेरी जिल्द 14, पृ० 45 पर लिखा है कि शेरगढ़ (कोटा राज्य) के द्वार पर नागवंशज राजाओं का शिलालेख, 15 जनवरी 791 ई० का खुदवाया हुआ मिला है जिसने उस स्थान पर विन्दुनाग, पद्मनाम, सर्वनाग, देवदत्त नामक चार नाग नरेशों का शासन होना सिद्ध होता है।

इन नागवंशी जाटों का राज्य कान्तिपुर, मथुरा, पद्मावती, कौशाम्बी, अहिक्षतपुर, नागपुर, चम्पावती (भागलपुर), बुन्देलखण्ड तथा मध्यप्रान्त पश्चिमी मालवा, नागौर (जोधपुर) पर रहा। इनके अतिरिक्त शेरगढ़ कोटा राज्य की प्राचीन भूमि पर, मध्यप्रदेश में चुटिया, नागपुर, खैरागढ़, चक्रकोटय एवं कवर्धा में भी इस वंश का राज्य था। महाविद्वान् महाराजा भोज परमार (जाट) की माता शशिप्रभा नागवंश की कन्या थी। राजस्थानी महासन्त वीरवर तेजा जी (धौल्या गोत्री जाट) का अपनी बहादुर पत्नी बोदल समेत एक बालू नामक नागवंशी वीर से युद्ध करते हुए ही प्राणान्त हुआ था। वहीं पर वीर तेजा जी की समाधि बनी हुई है। आज भी राजस्थान में इस वंश के जाटों की संख्या अधिक है। उत्तरप्रदेश जि० बदायूं में रम्पुरिया, खुदागंज, धर्मपुर, जि० बुलन्दशहर के अहार गांव में नागवंशी जाट हैं। यह ‘अहार’ वही प्राचीन गांव है जहां कि दुर्योधन द्वारा विष खिलाकर अचेत भीमसेन को गंगा में फेंक दिया गया था, जिसे नागवंशियों ने बचा लिया था।

उपर्युक्त को पढकर पाठकों को समझ लेना चाहिए कि नागवंशी सर्प इत्यादि जन्तु नहीं हैं बल्कि वास्तव में ये मनुष्य हैं। नाग जाटवीर आर्यों का वह वंश है जो अपने तीव्र विष जैसे क्रोध, तेज, पराक्रम, प्रताप, सौन्दर्य, विद्या और वैभव के कारण भारतवर्ष के क्षत्रिय इतिहास में सुप्रसिद्ध रहा है।

नागवंश के शाखागोत्र - 1. वसाति या वैस 2. तक्षक 3. औलक 4. कलकल 5. काला/ कालीधामन/ कालखण्डे 6. मीठा 7. भारशिव 8. भराईच

रामायणकाल में जाटवंश तथा उनका राज्य

पिछले पृष्ठों पर वैदिककालीन जाटवंशों के निर्माण एवं राज्य का वर्णन किया गया है। उनके अतिरिक्त रामायणकाल में जाटों के वंश तथा उनके राज्य का संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है।

वाल्मीकीय रामायण में लिखित जाटवंश - पह्लव, शक, बर्बर जातियों (जाटवंश) ने वसिष्ठ ऋषि की ओर से विश्वामित्र की सेना के साथ घोर युद्ध किया (वा० रा० बालकाण्ड सर्ग 54)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-242


सुग्रीव ने वानरों को सीताजी की खोज के लिए जिन-जिन देशों में भेजा उनमें से केवल जाट जनपदों के नाम, जो जाटवंशों के नाम पर थे तथा वहां जाटवंशज राजा थे (वा० रा० किष्किंधाकाण्ड सर्ग 40-43) निम्न प्रकार हैं - 1. विदेह 2. मालव (मल्ल) 3. मगध 4. पुण्ड्र 5. दशार्ण 6. विदर्भ 7. ऋषिक 8. वंग 9. मत्स्य 10. आन्ध्र 11. पुण्ड्र (यह दक्षिण में दूसरा है) 12. चोल 13. पाण्ड्य 14. नाग 15. भोगवतीपुरी (जिसका नाग राजा वासुकि जो वसाति या वैस गोत्र का जाट थी) 16. बाह्लीक 17. कुरु 18. सूरसेन 19. मद्र 20. शक 21. दरद 22. सिन्धु

इनके अतिरिक्त रामायणकालीन जाट राज्य ये हैं - पांचाल, वृष्णि, भोज, क्षुद्रक (जाट इतिहास पृ० 24 लेखक ठा० देशराज)। जाट गोत्र लाम्बा लववंशी भी इसी काल में प्रचलित हुआ।

रामायणकाल में कई छोटे-छोटे प्रसिद्ध जाटवंश थे। जैसे वसाति या वैस, तक्षक, काला (कालाधामन), पोनिया (पूनिया), औलक, कलकल आदि। इनका संघ नागवंश कहलाया जिससे नागवंश की शक्ति अधिक हो गई। ये वंश इस नागवंश की शाखा कहलाये। मोहिल या माहला वंश भी इसी काल का है।

ऊपरलिखित में से आन्ध्र, नाग, मद्र और पूनिया जाटवंशों का वर्णन पिछले पृष्ठों पर कर दिया गया है। शेष वंशों का वर्णन निम्नलिखित है -

वसाति या वैस (नागवंश)

1. वसाति या वैस (नागवंश) -

पिछले पृष्ठों पर नागवंश के प्रकरण में लिख दिया गया है कि भोगवतीपुरी का शासक नागराज वासुकि नामक सम्राट् था। यह वसाति या वैस गोत्र का था जो कि जाट गोत्र है। इस वंश का राज्य वसाति जनपद पर भी था जो रामायणकाल में पूरी शक्ति पर था। इस वंश का वैभव महाभारतकाल में और भी चमका। द्रोण पर्व में कई स्थानों पर वसाति क्षत्रियों का वर्णन है जिस से यह प्रमाणित है कि ये भी महाभारत युद्ध में सम्मिलित हुये थे1। कुछ लेखकों को वसाति के अपभ्रंश शब्द वैस से वैश्य (बनिया) का भ्रम हो गया है। कनिंघम और मिश्रबन्धु द्वारा ऐसे लेखकों का खण्डन किया गया है। (जाटों का उत्कर्ष पृ० 319, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री, जाट इतिहास उर्दू पृ० 355, लेखक ठा० संसारसिंह)। राहुल सांकृत्यायन ने अपनी पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा’ पृ० 243 पर लिखा है कि “हर्षवर्धन का वंश वैस है जो कि क्षत्रिय वंश है। यह वंश वैश्य बनिया नहीं।”

पाठकों को ज्ञात होना चाहिए कि वैश्य (बनिया-महाजन) समाज में वैस नामक कोई गोत्र नहीं है। होशियारपुर (पंजाब) के समीप श्रीमालपुर प्राचीन काल से वसाति क्षत्रियों का निवास स्थान है। यहां का पुष्पपति नामक पुरुष अपने कुछ साथियों सहित श्रीमालपुर से चलकर कुरुक्षेत्र में आया और यहां श्रीकण्ठ (थानेश्वर बसाकर इसके चारों ओर के प्रदेश का राजा बन गया। यह शैव धर्म का कट्टर अनुयायी था। इसका पुत्र नरवर्द्धन 505 ई० में सिंहासन पर बैठा। इस के पुत्र राज्यवर्द्धन और आदित्यवर्द्धन पहले गुप्तों के सामन्त (जागीरदार) थे और बाद में थानेश्वर के महाराजा हुए। आदित्यवर्द्धन की महारानी महासेनगुप्ता नामक गुप्तवंश की कन्या थी। इससे


1. वसाति क्षत्रिय महाभारत युद्ध में कौरवों की तरफ से लड़े थे। (द्रोण पर्व व भीष्म पर्व 51वां अध्याय)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-243


पुत्र प्रभाकरवर्द्धन की उत्पत्ति हुई। ए० स्मिथ के लेख अनुसार प्रभाकरवर्द्धन की यह माता गुप्तवंश (धारण जाट गोत्र) की थी जिसने अपने पुत्र में उच्चाकांक्षाएं उत्पन्न कीं और उनकी पूर्ति में यथाशक्ति सहायता दी।

पुष्पभूति वंश का पहला महान् शासक प्रभाकरवर्द्धन था। राज्यकवि बाणभट्ट की प्रांजल भाषा में यह प्रभाकरवर्द्धन - “हूणरूपी हरिण के लिए सिंह, सिंधुदेश के राजा के लिए ज्वर, गुर्जरों की नींद नष्ट करने वाला, गांधारराजा रूपी हाथी के लिए कूट हस्तिज्वर, लाटों (गुजरात) की चतुरता को हरण करने वाला और मालव देश की लता रूपी लक्ष्मी के लिए कुठार (फरसा) था।” उसने हूणों को पराजित किया तथा सिंधु, उत्तरी गुजरात आदि को अपने अधीन किया। यह होते हुए भी उसने उन विजित राज्यों को छीना नहीं।

प्रभाकरवर्द्धन की रानी यशोमती से राज्यवर्द्धन का जन्म हुआ। उसके चार वर्ष बाद पुत्री राजश्री और उसके दो वर्ष बाद 4 जून 590 ई० को हर्षवर्द्धन का शुभ जन्म हुआ। राज्यश्री का विवाह मौखरीवंशी1 (जाट गोत्र) कन्नौज नरेश ग्रहवर्मा के साथ हुआ था। किन्तु मालवा और मध्य बंगाल के गुप्त शासकों ने ग्रहवर्मा को मारकर राज्यश्री को कन्नौज में ही बन्दी बना दिया। इनमें मालवा का गुप्तवंश का राजा देवगुप्त था और मध्य बंगाल का गुप्तवंश का राजा शशांक था जो दोनों ही धारण2 गोत्री जाट शासक थे। थानेश्वर में यह सूचना उस समय मिली जबकि सम्राट् प्रभाकरवर्द्धन की मृत्यु सन् 605 ई० में हुई थी, जिस के कारण शोक की घटाएं छाई हुईं थीं। इसके बाद उसके बड़े पुत्र राज्यवर्द्धन ने राजगद्दी सम्भाली। उसने 10 हजार सेना के साथ मालवा पर आक्रमण करके देवगुप्त का वध कर दिया। फिर वहां से बंगाल पर आक्रमण करने के लिए वहां पहुंच गया। परन्तु मध्यबंगाल में गौड़ जनपद के गुप्तवंशी (धारण जाट गोत्र) राजा शशांक ने अपनी पुत्री के साथ राज्यवर्द्धन का विवाह कर देने का वचन देकर विश्वास प्राप्त कर लिया और अपने महलों में बुलाकर राज्यवर्द्धन का वध कर दिया।

हर्षवर्धन (606 ई० से 647 ई० तक)

यह राज्यवर्द्धन की मृत्यु के पश्चात् 606 ई० में विद्वानों के कहने पर 16 वर्ष की आयु में राजसिंहासन पर बैठा। यह बड़ा वीर योद्धा एवं साहसी था। इस समय उसके सामने सबसे बड़ी समस्या अपने बहिन राज्यश्री को मुक्त कराने तथा शशांक से अपने भाई की मृत्यु का बदला लेना था। इसके लिए वह एक विशाल सेना लेकर चल पड़ा। उसे ज्ञात हुआ कि राज्यश्री शत्रुओं के चंगुल से मुक्त होकर विन्ध्या के वनों में चली गई है। सौभाग्य से उसे राज्यश्री मिल गयी जो उस समय चिता में सती होने की तैयारी कर रही थी। हर्षवर्धन उसे घर ले आया। ग्रहवर्मन का कोई उत्तराधिकारी न होने के कारण हर्ष ने कन्नौज के राज्य को अपने राज्य में मिला लिया और इसको अपनी राजधानी बनाया।

हर्ष की विजय -

ह्यूनसांग के वृत्तान्त तथा बाण के हर्षचरित से उसके निम्नलिखित युद्धों एवं विजयों का ब्यौरा मिलता है -


1, 2. जाट इतिहास उर्दू पृ० 356 लेखक ठा० संसारसिंह।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-244


  1. बंगाल के राजा शशांक को युद्ध में हराया और उसके प्रदेश को अपने राज्य में मिला लिया।
  2. पांच प्रदेशों की विजय - 606 ई० से 612 ई० तक हर्ष ने पंजाब, कन्नौज, बंगाल, बिहार और उड़ीसा को युद्ध करके जीत लिया। इन विजयों से इसका राज्य लगभग समस्त उत्तरी भारत में विस्तृत हो गया।
  3. बल्लभी अथवा गुजरात की विजय - हर्ष के समय ध्रुवसेन द्वितीय (बालान गोत्र का जाट) बल्लभी अथवा गुजरात का राजा था। हर्ष ने उस पर आक्रमण करके उसको पराजित किया परन्तु अन्त में दोनों में मैत्री-सम्बन्ध स्थापित हो गये। हर्ष ने प्रसन्न होकर अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया।
  4. पुलकेशिन द्वितीय (अहलावत जाट) से युद्ध - ह्यूनसांग लिखता है कि “हर्ष ने एक शक्तिशाली विशाल सेना सहित इस सम्राट् के विरुद्ध चढाई की परन्तु पुलकेशिन ने नर्वदा तट पर हर्ष को बुरी तरह पराजित किया। यह हर्ष के जीवन की पहली तथा अन्तिम पराजय थी। उसके साम्राज्य की दक्षिणी सीमा नर्वदा नदी तक ही सीमित रह गई। इस शानदार विजय से पुलकेशिन द्वितीय की प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई और उसने ‘परमेश्वर’ की उपाधि धारण की। यह युद्ध 620 ई० में हुआ था।”

हर्ष ने सिंध, कश्मीर, नेपाल, कामरूप (असम) और गंजम प्रदेशों को जीत लिया था। इन विजयों के फलस्वरूप सारा उत्तरी भारत हिमालय से लेकर दक्षिण में नर्वदा नदी तक तथा पूर्व में असम से लेकर पश्चिम में सिंध, पंजाब एवं बल्लभी अथवा गुजरात तक हर्ष के अधीन आ गये। उसके साम्राज्य में बंगाल, बिहार, उड़ीसा, मालवा, बल्लभी, कन्नौज, थानेश्वर और पूर्वी पंजाब के प्रदेश शामिल थे। राहुल सांकृत्यायन अपनी पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा’ पृ० 242-43 पर लिखते हैं कि “सम्राट् हर्षवर्धन की एक महाश्वेता नामक रानी पारसीक (फारस-ईरान) के बादशाह नौशेखाँ की पोती थी और दूसरी कादम्बरी नामक रानी सौराष्ट्र की थी।”

हर्ष एक सफल विजेता ही नहीं बल्कि एक राजनीतिज्ञ भी था। उसने चीन तथा फारस से राजनीतिक सम्बन्ध स्थापित कर रखे थे। हर्ष एक महान् साम्राज्य-निर्माता, महान् विद्वान् व साहित्यकार था। इसकी तुलना अशोक, समुद्रगुप्त तथा अकबर जैसे महान् शासकों से की जाती है। हर्षवर्धन की इस महत्ता का कारण केवल उसके महान् कार्य ही नहीं हैं वरन् उसका उच्च तथा श्रेष्ठ चरित्र भी है। हर्ष आरम्भ में शिव का उपासक था और बाद में बौद्ध धर्म का अनुयायी बन गया था। इसकी कन्नौज की सभा एवं प्रयाग की सभा बड़ी प्रसिद्ध है। हर्ष हर पांचवें वर्ष प्रयाग अथवा इलाहाबाद में एक सभा का आयोजन करता था। सन् 643 ई० में बुलाई गई सभा में ह्यूनसांग ने भी भाग लिया था। इस सभा में पांच लाख लोगों तथा 20 राजाओं ने भाग लिया। इस सभा में जैन, बौद्ध और ब्राह्मण तथा सभी सम्प्रदायों को दान दिया गया। यह सभा 75 दिन तक चलती रही। इस अवसर पर हर्ष ने पांच वर्षों में एकत्रित किया सारा धन दान में दे दिया, यहां तक कि उसके पास अपने वस्त्र भी न रहे। उसने अपनी बहिन राज्यश्री से एक पुराना वस्त्र लेकर पहना। चीनी यात्री ह्यूनसांग 15 वर्ष तक भारतवर्ष में रहा। वह 8 वर्ष हर्ष के साथ रहा। उसकी


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-245


पुस्तक सि-यू-की हर्ष के राज्यकाल को जानने का एक अमूल्य स्रोत है।

हर्षवर्धन ने विशाल हरयाणा सर्वखाप पंचायत की स्थापना की। इसका वर्णन उचित स्थान पर किया जायेगा। इसके लेख प्रमाण चौ० कबूलसिंह मन्त्री सर्वखाप पंचायत गांव शोरम जि० मुजफ्फरनगर के घर में हैं। सन् 647 ई० में इस प्रतापी सम्राट हर्षवर्धन का निस्सन्तान स्वर्गवास हो गया और उसका साम्राज्य विनष्ट हो गया।

इनसे मिलने के लिये आने वाला वंगहुएंत्से के नेतृत्व में चीनी राजदूतदल मार्ग में ही था कि उत्तराधिकारी विहीन वैस साम्राज्य पर ब्राह्मण सेनापति अर्जुन ने अधिकार करने के लिए प्रयत्न प्रारम्भ कर दिया किन्तु वंगहुएंत्से ने तिब्बत की सहायता से अर्जुन को बन्दी बनाकर चीन भेज दिया।

सम्राट् हर्षवर्धन के वंशधरों की सत्ता कन्नौज से समाप्त होने के पश्चात् डूंडिया खेड़ा में स्थिर हुई। वहां प्रजातन्त्री रूप से इनकी स्थिति सन् 1857 ई० तक सुदृढ़ रही। दशवीं शताब्दी में अवध में सत्ताप्राप्त वैस लोगों ने अपने आप को राजपूत घोषित कर दिया। इन लोगों से अवध का रायबरेली जिला भरा हुआ है। जनपद के रूप में इनका वह प्रदेश वैसवाड़ा के नाम पर प्रसिद्ध है। वैस वंशियों की सुप्रसिद्ध रियासत डूंडिया खेड़ा को अंग्रेजों ने इनकी स्वातन्त्र्यप्रियता से क्रुद्ध होकर ध्वस्त करा दिया था। इसके बाद वैसवंश का महान् पुरुष सर राजा रामपालसिंह कुर्री सुदौली नरेश था। कुर्री सुदौली के अतिरिक्त फर्रूखाबाद के 80 गांव, जि० सीतापुर, लखनऊ, बांदा, फतेहपुर, बदायूँ, बुलन्दशहर, हरदोई और मुरादाबाद के कई-कई गांव राजपूत वैसों के हैं। पंजाब में वैसों की संख्या अवध से भी अधिक है जो कि सिक्खधर्मी हैं। श्रीमालपुर जो हर्ष के पूर्वजों का निवासस्थान है और उसके समीप 12 बड़े गांव जाटसिक्ख वैसों के हैं। जालन्धर, होशियारपुर, लुधियाना जिलों में जाटसिक्ख वैसों के कई गांव हैं। फगवाड़ा से 7 मील दूर वैसला गांव से हरयाणा और यू० पी० के वैस जाटों का निकास माना जाता है। लुधियाना की समराला तहसील मुसकाबाद, टपरिया, गुड़गांव में दयालपुर, हिसार में खेहर, लाथल, मेरठ में बहलोलपुर, विगास, गुवांदा और बुलन्दशहर में सलेमपुर गांव वैस जाटों के हैं। यह सलेमपुर गांव सलीम (जहांगीर) की ओर से इस वंश को दिया गया था। फलतः 1857 ई० में इस गांव के वैसवंशज जाटों ने सम्राट् बहादुरशाह के समर्थन में अंग्रेजों के विरुद्ध भारी युद्ध किया। अंग्रेजों ने इस गांव की रियासत को तोपों से ध्वस्त करा दिया। बिहार के आरा जिले के विशनपुरा के वैस प्रान्तभर में प्रसिद्धि प्राप्त हैं। छपरा में भी कुछ गांव वैस राजपूतों के हैं।

तक्षक नाग

2. तक्षक नाग -

यह नागवंश के वर्णन में लिख दिया गया है कि तक्षक जाटों ने कई अन्य जाटवंशों के साथ मिलकर एक नागवंश नामक संघ बनाया। तक्षक लोग नागवंश की शाखा हैं। ले० रामसरूप जून, जाट इतिहास अंग्रेजी पृ० 104 पर लिखते हैं कि “तक्षक लोग चन्द्रवंशी हैं। सम्राट् ययाति के पुत्र अनु की दशवीं पीढी में प्रतापी सम्राट् शिवि हुए। शिवि की 29वीं पीढी में राजा सतौति के एक पुत्र का नाम तक्षक था। तक्षक की प्रसिद्धि के कारण उनके नाम से तक्षक वंश चला।” पाण्डवों के खाण्डव वन को जलाकर इन्द्रप्रस्थ अपनी राजधानी बनाने से पहले वहां पर तक्षक राजाओं का राज्य था। तक्षक जाटों ने अर्जुन एवं श्रीकृष्ण के विरुद्ध भयंकर युद्ध किया। अन्त में ये लोग हार गये और तक्षक राजा सहित तक्षशिला में जाकर आबाद हो गये।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-246


इसी द्वेष-भाव के कारण तक्षक सेना दुर्योधन की ओर से पाण्डवों के विरुद्ध महाभारत युद्ध में लड़ी थी। तक्षकों ने अर्जुनपौत्र परीक्षित का उसी के महलों में वध किया। उसके पुत्र जनमेजय ने तक्षशिला पर आक्रमण किया। किन्तु जन्मेजय ने ऋषि आस्तीक के परामर्श से तक्षकराज को क्षमा कर दिया1। यही तक्षकवंश शनैः शनैः भाषाभेद से टांक, ताखा, टक, तक्खर, तोकस, तक्क के नाम पर लोकप्रसिद्ध हुआ। कश्मीरी कवि कल्हण ने टक्कराज्य का उल्लेख करते हुए उसे गुर्जर देश का भाग लिखा है। ये लोग प्रसिद्ध बलशाली थे। सारा पंजाब इनके प्रताप से दग्ध था। चीना नदी के समीपवर्ती इनके राज्य को इनके राजा अलखान ने विवश होकर सन् 883 से 901 ई० के बीच विर्कवंशी जाट लोगों को दे दिया था। इसके पूर्व सिकन्दर अपने साथ तक्षशिला से तक्षक वैद्य ले गया था। ह्यूनसांग ने टक्क लोगों के राज्य तक्षशिला के विद्या वैभव की प्रशंसा करते हुए वहां के निवासियों को चतुर और गर्म प्रकृति वाला लिखा है। टॉड साहब ने 14वीं 15वीं शताब्दी में यमुना के किनारे काठानगर में तक्षकों की सत्ता लिखी है। ‘मदन पारिजात’ ने इस स्थान के रत्नपाल, वरहप, हरिश्चन्द्र, साधारण, सहस्रपाल, मदनपाल नामक नरेश लिखे हैं। इस राजा मदनपाल ने आयुर्वेद के सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘मदनपालनिघण्टु’ की रचना की। टॉड ने तक्षकवंश की गणना 36 राजकुलों में की है और चित्तौड़ एवं असीरगढ़ का शासक तथा एशिया के ऊंचे प्रदेशों में बसने वाला और सुप्रसिद्ध वीर लिखा है।

टोंक रियासत पर तक्षक जाटों का राज्य था। इससे 5 मील उत्तर में पहाड़ के नीचे एक गांव पिराणा है। उसमें इन जाटों का एक प्रजातंत्री ढ़ंग का राज्य था (जाटवीर वर्ष 8, अंक 42, लेखक रिछपालसिंह)। ये लोग अपने प्रदेश से गुजरने वाले व्यापारियों से टैक्स वसूल करते थे। एक बार उधर से बादशाह जहांगीर की बेगमें गुजरीं। पिराणा के सरदारों ने उनसे टैक्स लेकर जाने दिया। ज्ञात होने पर बादशाह ने अपने सेनापति मलूकखां को बदला लेने के लिए भेजा। जाटों के पराक्रम को सुनकर वह पिराणा के निकट के गांव शेरपुर में ठहर गया। पिराणा के जाटों के डूम (डोम) ने लोभ में आकर मलूकखां को बताया कि “भादों बदी 12 को बच्छवारस का मेला (उत्सव) होगा। उस दिन सब नर-नारी निरस्त्र और निर्भय होकर झूलते हैं।” इस उत्सव के दिन मलूकखां ने बच्छवारस को घेर लिया। पिराणा के जाटवीरों के सरदार जीवनसिंह और रायमल ने निरस्त्र होते हुए भी पचासों शत्रुओं के सिर तोड़ डाले। ये दोनों वीर लड़ाई में काम आए। इस युद्ध में लड़ती हुई कुछ स्त्रियां भी मारी गई थीं। इस तरह यह जाटों का प्रजातन्त्री राज्य नष्ट हो गया। (जाट इतिहास पृ० 600-601, लेखक ठा० देशराज), जाटों का उत्कर्ष, पृ० 326-327, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री

तक्षक जाटों के हरयाणा में सोनीपत में 12 गांव हैं जिनमें राठधाना, बयांपुर, हरसाना, लिबासपुर, कालुपुर, लोलहड़ा, जटहेड़ा आदि प्रमुख हैं| देहली के तक्षक जाट टोकस कहलाते हैं जो कि खाण्डवदाह से बचकर यहीं पर बस गए थे। इनके मुनीरका मोहम्मदपुर, हुमायूंपुर, हौजखास आदि विशेष सम्पन्न गांव हैं। जि० बीकानेर में 15 गांव टांक जाटों के हैं। जिला भिवानी में दादरी तहसील में भागी गांव तक्षक जाटों का है।

ये लोग पंजाब के जालन्धर जिले के कई गांवों में हैं जो सिक्खधर्मी हैं। पाकिस्तान में ये लोग


1. महाभारत आदिपर्व अध्याय 226वां।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-247


मुसलमान हैं। (जाटों का उत्कर्ष पृ० 326-327, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री)।

3. काला-कालीधामन-कालखण्डे-कालीरामण (नागवंशी) -

यह गोत्र नागवंश की एक प्रसिद्ध शाखा है। मथुरा के समीप यमुना के किनारे इस वंश का राजा राज्य करता था। कालीदेह नाम का इनका किला था जो खण्डहर की शक्ल में आज भी मौजूद है। श्रीकृष्ण महाराज द्वारा किया गया कालीयदमन इसी वंश के प्रचण्ड पुरुषों का ही दमन था1। उन्होंने बृज से इस वंश का शासन समाप्त कर दिया था। पंजाब में इस वंश की छोटी रियासतें सिंहपुरा एवम भग्गोवाल थीं। इस वंश को भाषा-स्थानभेद से उक्त नामों के अतिरिक्त कालीरावण, कालीरावत, कालू भी कहते हैं। वास्तव में गोत्र एक ही है।

इस वंश के जाटों के गांव निम्न प्रकार से हैं - गोवर्द्धन के पास हकीमपुर आदि 20 गांव, बुलन्दशहर में 4 गांव, मेरठ में 2 गांव, मुजफ्फरनगर में 6 गांव, मुरादाबाद में लोदीपुर, रोहतक में जसराना (आधा), डहरमुहाना, महावड़, अहेरी, अछेज आदि 10 गांव, हिसार में सबसे बड़ी सिसाय गांव (आधा), पंजाब में जि० गुरदासपुर में कालू जाटों के 50 गांव हैं।

4. औलक -

यह जाटवंश नागवंश की शाखा है। द्वापर युग में उलूक नामक जनपद का शासक इस वंश का उलूक राजा था। सभापर्व 27-11 तथा 27-58 महाभारत के इन श्लोकों से उलूक नरेश का महाराज युधिष्ठिर की सभा में आना प्रमाणित होता है। उलूक देशवासियों की ‘औलिक’ नाम से प्रसिद्धि हुई। परम्परागत श्रुति और विद्वानों ने इनकी गणना नागवंश में की है। पंजाब ही इनकी बहुलता का स्थान है। यहां इन लोगों की जनसंख्या 1941 ई० में इस प्रकार थी – लाहौर 1251, सियालकोट 332, गुजरांवाला 561, अमृतसर 6582, गुरदासपुर 1028, मलेरकोटला 669, लुधियाना 792, Firozpurफिरोजपुर 1540, पटियाला 2742, नाभा 1100, इस वंश के सभी जाट सिक्ख थे। अब ये सब पंजाब में हैं। हिन्दू जाटों को औलक या औरे भी कहा जाता है। यू० पी० में भी ये लोग बसे हैं। जि० अम्बाला में भी इस जाटवंश के कई गांव हैं।

5. कलकल -

यह जाटवंश भी नागवंश की शाखा है। यह प्राचीन वंश है। इस वंश का राज्य मध्य एशिया के वाकाटक (Vakataka) प्रदेश पर रहा। इस वंश के सम्राट् परवरसेन प्रथम (Pravarasena I) ने बुन्देलखण्ड से लेकर दक्षिण में हैदराबाद तक राज्य किया। विष्णु पुराना अंग्रेजी पृ० 382 लेखक विल्सन लिखता है कि “भविष्य में होने वाले पौरव (जाट) वंश के 11 राजाओं का शासन 300 वर्ष रहकर समाप्त हो जायेगा तब किलकिल यवन राज्य करेंगे जिनका सम्राट् विन्ध्यशक्ति नामक होगा। इस वंश के 10 राजा 106 वर्ष राज्य करेंगे।” यह किलकिल जाटवंश है और इनका सम्राट् विंध्यशक्ति भी जाट था। इसका प्रमाण यह है कि इस वंश के विवाह शादी के सम्बन्ध जाट धारण गोत्र के गुप्तों और भारशिव एवं टांक/तक्षक जाटों के साथ रहे। (बी० एस० दहिया, जाट्स दी एन्शन्ट रूलर्ज, पृ० 284)।

“ततः किलकिलेभ्यश्च बिन्ध्यशक्तिर्भविष्यति” वायु पुराण 258, ब्रह्माण्ड पुराण 178 के


1. पाण्डवों की दिग्विजय में अर्जुन ने उत्तर दिशा के अनेक देशों के साथ कालकूट (कालखण्डे) देश को भी जीत लिया था (महाभारत सभापर्व, अध्याय 26)। यह कालकूट देश चीनी तुर्किस्तान में था जिस पर कालखण्डे गोत्र के जाटों का राज्य था।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-248


अनुसार वह राजा विंध्यशक्ति जो किलकिल के नाम से प्रसिद्ध था, किलकिला नदी के किनारे प्रतिष्ठित थी। यह नदी पन्ना नगर से नागौद जाते हुए लगभग 4 मील पर है। इनका शासनकाल ईस्वी पूर्व 248 वर्ष माना गया है। बुन्देलखण्ड पर इनका एकछत्र राज्य था। इस वंश की जि० मेरठ में यादनगर एक अच्छी रियासत थी। यहां के जाट अपने वंश किलकिल को कलकल बोलते हैं। अलीपुर, उपैड़ा, लुकलाड़ा में भी इसी वंश के जाट हैं। यह वंश केवल जाटों में ही है1। हरयाणा में दादरी तहसील में इमलोटा गांव कलकलवंशी जाटों का है। यह कलकलवंश चन्द्रवंशी है।

लाम्बा सूर्यवंशी - लववंशी

6. लाम्बा सूर्यवंशी - लववंशी -

मर्यादा पुरुषोत्तम रामचन्द्र जी के ज्येष्ठपुत्र लव से इस वंश का प्रचलन माना जाता है। वायु पुराण 88-200 श्लोक उत्तरकोसले राज्यं लवस्य च महात्मनः। श्रावस्ती लोकविख्याता के अनुसार इसकी राजधानी श्रावस्ती कही गई है। इसी लव के द्वारा लवपुर (लाहौर) और लम्पाक जनपद की स्थापना हुई। इसी वंश (सूर्यवंशी) के राजा वृहदबल को द्रोणपर्व 40-22 के अनुसार महाभारत युद्ध में अभिमन्यु ने मारा था। इस वंश का एक समूह व्यापारप्रवीण होकर खत्री नाम से पंजाब के व्यवसायी दल में सम्मिलित हो गया। वैसे जाटों में ही इनकी बहुसंख्या है। ये जाटलोग लाम्बा के नाम पर जाने जाते हैं। इन लाम्बावंशी जाटों की बहुत संख्या राजगढ़ (बीकानेर) के आस-पास और कुछ गांव जयपुर में हैं। इनके अतिरिक्त लाम्बावंशी जाटों के गांव - मुजफ्फरनगर में कबीर का नंगला, बिजनौर में बिसाठ, रतनपुर, हीमपुर, बाभड़पुर, शेरकोट, बदायूं में बंगला, अगौल, सूनियांखेड़ा और हिसार में दौलतपुर, राजस्थान में चिड़ावा के निकट गोठड़ा, रोहतक जिला में धारोली, जि० भिवानी तहसील बवानीखेड़ा में अलखपुरा और जिला महेन्द्रगढ़ में बारड़ा (डालनवास) गांव लाम्बा जाटों के हैं। पलवल के पास अमरपुर गांव भी लाम्बा जाटों का है। दिल्ली प्रान्त में गांव कुतुबगढ़ लाम्बा जाटों का है।

अलखपुर गांव के दानवीर सेठ सर छाजूराम लाम्बा जाट थे जिनकी जीवनी का वर्णन अन्तिम अध्याय में किया जायेगा। बारड़ा (डालनवास) गांव के सूबेदार रिछपालराम लाम्बा ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय महान् शूरवीरता प्रदर्शित करते हुए वीरगति प्राप्त की। इनकी वीरता से प्रसन्न होकर ब्रिटिश सरकार ने इनको विक्टोरिया क्रास (वीरता का सर्वोच्च पद) प्रदान किया। इसका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है -

सूबेदार रिछपालराम विक्टोरिया क्रास (मरणोपरान्त) -

आपका जन्म 26 अगस्त 1899 ई० को जि० महेन्द्रगढ़ (हरयाणा) के गांव बारड़ा (डालनवास) में हुआ। आपके पिता चौ० मोहरसिंह थे। आप 26 अगस्त 1920 ई० को सेना की राजपूताना राईफल नामक पलटन में भरती हुये। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय आप अपनी पलटन के साथ लीबिया पहुंच गये। उस समय आपका पद सूबेदार था। लीबिया में तोब्रुक क्षेत्र के केरेन (Keren) मोर्चे पर जर्मन शत्रु सेना का भारी जमाव था। 7 फरवरी 1941 ई० को आपकी कम्पनी को इस केरेन के मोर्चे पर आक्रमण करने का आदेश मिला। आपने अपनी कम्पनी सहित 7 फरवरी की रात को शत्रु पर आक्रमण कर दिया। आप उस समय अपनी कम्पनी के कमाण्डर थे और सबसे आगेवाली


1. जाटों का उत्कर्ष पृ० 330, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-249


प्लाटून के साथ चल रहे थे। शत्रु की भारी गोलीबारी की परवाह न करते हुए आपने प्लाटून सहित शत्रु के एक मोर्चे पर धावा कर दिया और हाथों-हाथ संगीन की लड़ाई करके वह मोर्चा जीत लिया। शेष कम्पनी एवं पलटन से अलग-थलग होते हुए भी आपने उसी रात को शत्रु के किए गए छः धावों को असफल कर दिया। आपके जवानों की गोलियां समाप्त हो चुकीं थीं और वे शत्रु के घेरे में आ चुके थे। आपने अपने सैनिकों को उत्साहित किया जिससे वे शत्रु का घेरा तोड़कर पीछे पलटन में आ गये।

12 फरवरी 1941 ई० को सूबेदार रिछपाल ने अपनी कम्पनी सहित शत्रु के उसी मोर्चे पर फिर आक्रमण कर दिया। इन पर शत्रु का भारी एवं कारगर गोलाबारूद गिरने लगा। आप अपनी कम्पनी के सैनिकों को उत्साहित करते हुए निडरता से आगे बढ़ते गये। जब आप शत्रु के मोर्चे के निकट पहुंचे, तब शत्रु के गोले से आपका दाहिना पग उड़ गया। इसके अतिरिक्त कई गोलियां और भी लगीं। अन्त में वे वीरगति को प्राप्त हुए। रणभूमि में घायल पड़े हुए भी यह वीर योद्धा अपने घावों की तनिक भी परवाह न करते हुए अपने सैनिकों को शत्रु पर टूट पड़ने का उत्साह देता रहा। उसके अन्तिम शब्द थे कि “हम शत्रु का मोर्चा अवश्य लेंगे।”

इस प्रचण्ड वीरता के लिये ब्रिटिश सरकार की ओर से वायसराज लार्ड लिंलिथगो ने अपने हाथों से स्वर्गीय सूबेदार रिछपालराम की धर्मपत्नी श्रीमती जानकीबाई जी को वीरता का सर्वोच्च पदक विक्टोरिया क्रास प्रदान किया। उस समय बारड़ा गांव पटियाला रियासत में था। महाराजा पटियाला ने भी इस वीर योद्धा के पुत्र को 500 बीघा भूमि इनाम में दी। इस वीर योद्धा पर न केवल जाट जाति को ही, बल्कि भारतीय सेना एवं सब भारतवासियों को भी गर्व है।

मोहिल-महला-माहिल

7. मोहिल-महला-माहिल -

यह चन्द्रवंशी जाटवंश है जिसका प्राचीनकाल से शासन रहा है। रामायणकाल में इनका जनपद पाया जाता है। महाभारत भीष्मपर्व 9-48 के अनुसार माही और नर्मदा नदियों के बीच इनका जनपद था। यह जनपद गुजरात एवं मालवा की प्राचीन भूमि पर था। पं० भगवद्दत्त बी०ए० ने अपने ‘भारतवर्ष का इतिहास’ में इनके इस जनपद को इन्हीं दोनों नदियों के बीच का क्षेत्र लिखा है। टॉड और स्मिथ ने इस जनपद को सुजानगढ़ बीकानेर की प्राचीन भूमि पर अवस्थित लिखा है। जैमिनीय ब्राह्मण 1-151, बृहद्दवेता 5-62, ऋक्सर्वानुक्रमणी 5-61 के अनुसार अर्चनाना, तरन्त पुरुमीढ़ नामक तीन मन्त्रद्रष्टा-तत्त्वज्ञ कर्मकाण्डी माहेय ऋषियों का वर्णन मिलता है।

इस जाटवंश ने बीकानेर राज्य स्थापना से पूर्व छापर में जो बीकानेर से 70 मील पूर्व में है और सुजानगढ़ के उत्तर में द्रोणपुर में अपनी राजधानियां स्थापित कीं। इनकी ‘राणा’ पदवी थी। छापर नामक झील भी मोहिलों के राज्य में थी जहां काफी नमक बनता है। कर्नल जेम्स टॉड ने अपने इतिहास के पृ० 1126 खण्ड 2 में लिखा है कि “मोहिल वंश का 140 गांवों1 पर शासन था।


1. 140 गांवों के जिले (परगने) - छापर (मोहिलों की राजधानी), हीरासर, गोपालपुर, चारवास, सोंदा, बीदासर. लाडनू, मलसीसर, खरबूजाराकोट आदि। जोधा जी के पुत्र बीदा (बीका का भाई) ने मोहिलों पर आक्रमण किया और उनके राज्य को जीत लिया। मोहिल लोग बहुत प्राचीनकाल से अपने राज्य में रहा करते थे। पृ० 1123.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-250


मोहिलों के अधीश्वर की यह भूमि माहिलवाटी कहलाती थी।” जोधपुर के इतिहास के अनुसार राव जोधा जी राठौर ने माहिलवाटी पर आक्रमण कर दिया। राणा अजीत माहिल और राणा बछुराज माहिल और उनके 145 साथी इस युद्ध में मारे गये। राव जोधा जी राठौर की विजय हुई। उसी समय मोहिल फतेहपुर, झुंझुनू, भटनेर और मेवाड़ की ओर चले गये। नरवद माहिल ने दिल्ली के बादशाह बहलोल लोधी से मदद मांगी। उधर जोधा जी के भाई कांधल के पुत्र बाघा के समर्थन का आश्वासन प्राप्त होने पर दिल्ली के बादशाह ने हिसार के सूबेदार सारंगखां को आदेश दिया कि वह माहिलों की मदद में द्रोणपुर पर आक्रमण कर दे। जोधपुर इतिहास के अनुसार कांधलपुत्र बाघा सभी गुप्त भेद जोधा जी को भेजता रहा। युद्ध होने पर 555 पठानों सहित सारंगखां परास्त हुआ और जोधा जी विजयी बने। कर्नल टॉड के अनुसार जोधा के पुत्र बीदा ने मोहिलवाटी पर विजय प्राप्त की। राव बीदा के पुत्र तेजसिंह ने इस विजय की स्मृतिस्वरूप बीदासर नामक नवीन राठौर राजधानी स्थापित की। तदन्तर यह ‘मोहिलवाटी’ ‘बीदावाटी’ के नाम से प्रसिद्ध की गई। इस प्रदेश पर बीदावत राजपूतों का पूर्ण अधिकार हो गया। राजपूतों ने इस प्राचीनकालीन मोहिलवंश को अल्पकालीन चौहानवंश की शाखा लिखने का प्रयत्न किया1। किन्तु इस वंश के जाट इस पराजय से बीकानेर को ही छोड़ गये। कुछ राजपूत भी बन गये। माहिलों की उरियल (वर्तमान उरई-जालौन) नामक रियासत बुन्देलखण्ड में थी। आल्हा काव्य के चरितनायक आल्हा, उदल, मलखान की विजयगाथाओं से महलाभूपत के कारनामे उल्लेखनीय हैं। बिल्कुल झूठ को सत्य में और सत्य को असत्य में परिणत करने की कला में ये परम प्रवीण थे। (जाट इतिहास उत्पत्ति और गौरव खण्ड पृ० 105 पर लेखक ठा० देशराज ने मलखान को वत्स गोत्र का जाट लिखा है)।

इस माहिल वंश के जाट राणा वैरसल के वंशज मेवाड़ में बस गये तथा शेष माहिल लोग पंजाब, हरयाणा, बृज, रुहेलखण्ड के विभिन्न जिलों में आबाद हो गये। 1941 ई० की मतगणना के अनुसार ये लोग फिरोजपुर में 1045, अमृतसर में 2555, जालंधर में 1575, जींद में 4175, पटियाला में 795 सिख जाट माहिल थे। शेखावाटी में पईवा, मेरठ में रसूलपुर, दबथला, बड़ला, मथुरा में छाता, बुलन्दशहर में चिट्ठा, हिसार में डाबड़ा, मिलकपुर, सौराया, खेड़ी, लाधड़ी, अलीगढ़ में भोजपुर, जहांगीराबाद गांव माहिल जाटों के हैं।

भाषाभेद से इस वंश को कई नामों से पुकारा जाता है जैसे पंजाब में माहे-माहि-माहिय और बृज से मध्यप्रदेश तक महला-मोहले तथा हरयाणा, यू० पी० में माहिल मोहिल कहा जाता है। इस वंश की शाखा 1. गोधारा (गोदारा) 2. महनार्या

8. मॉगध-मागठ-मगध -

यह चन्द्रवंशी जाटवंश प्राचीनकाल से ही प्रसिद्ध है। इस वंश का प्रचलन मगध नामक जनपद के कारण हुआ। जाट इतिहास पृ० 25 पर ठा० देशराज ने लिखा है कि “मगध प्रदेश की राजधानी राजगृह तथा गिरिवृज थी। इस राज्य की नींव डालने वाला वसु


1. जाटों का उत्कर्ष, 337-338 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री; जाट इतिहास उर्दू पृ० 378-380, लेखक ठा० संसारसिंह।

नोट - बहलोल लोधी का शासन सन् 1451-1489 ई० तक् रहा। बीका ने बीकानेर नामक अपनी राजधानी की नींव सन् 1489 ई० में डाली।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-251


का पुत्र वृहदश्व था (महाभारत आदि पर्व)। हमारे ख्याल से चन्द्रवंशियों का यह समूह ईरान से आकर यहां आबाद हुआ था। क्योंकि ईरान में क्षत्रिय की संज्ञा मगध थी। इसलिए मगध क्षत्रियों के नाम पर ही यह देश मगध कहलाया।” आगे पृ० 30 पर इसी लेखक ने लिखा है कि बौद्धकाल के समय भारत में सोलह महाजनपद (राज्य) थे। जिनमें से मगध राज्य आज के बिहार में था जिसकी राजधानी राजगृह (राजगिरि) थी। बाद में पाटलीपुत्र (पटना) हो गई थी। यह राज्य पूर्व में चम्पा नदी, पश्चिम में सोन नदी, उत्तर में गंगा नदी, दक्षिण में विन्ध्याचल तक फैला हुआ था।

रामायणकाल में इस वंश का राज्य पूरी शक्ति पर था जिसके प्रमाण रामायण में निम्नलिखित हैं।

(1)
मगधाधिपतिं शूरं सर्वशास्त्रविशारदम्।
प्राप्तिज्ञं परमोदारं सत्कृतं पुरुषर्षभम्॥
(वा० रा० बालकाण्ड सर्ग 13वां, श्लोक 26वां)
अर्थात् - मगध देश के राजा प्राप्तिज्ञ को, जो शूरवीर, सम्पूर्ण शास्त्रों का विद्वान्, परम उदार तथा पुरुषों में श्रेष्ठ है, स्वयं जाकर सत्कारपूर्वक बुला ले आओ॥26॥ (यह आदेश सुग्रीव अपनी वानर सेना को देता है)।
(2)
वा० रा० किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 40वां, श्लोक 22 में लिखा है - मागधांश्च महाग्रामान् - सुग्रीव ने वानरसेना को सीता जी की खोज के लिए मगधदेश के बड़े-बड़े ग्रामों में छानबीन करने का आदेश दिया।

महाभारतकाल में मगध नरेश वृहद्रथ दो अक्षौहिणी सेना रखता था1। इसकी दो पत्नियां थीं जो कि काशीराज की जुड़वां पैदा होने वाली पुत्रियां थीं। इसी राजा वृहद्रथ के जरासन्ध नामक पुत्र हुआ (महाभारत सभापर्व)। जरासन्ध अपने समय का सर्वाधिक प्रतापी नरेश था। इसने महाभारतकालीन 101 क्षत्रिय कुलों में से 86 को युद्ध में जीत लिया था। इसी के आतंक से विरत रहने के लिए श्रीकृष्ण जी ने बृज को छोड़ दिया और द्वारका में अपनी राजधानी बनाई। इसीलिए उनका नाम रणछोड़ पड़ा था। कंस, शिशुपाल, कारूप, सौभ, दन्त्रवक्त्र आदि राजागण जरासन्ध के सहायक एवं इनके अत्यन्त प्रभाव में थे। महाभारत सभापर्व 25-26 के लेखानुसार राजसूय यज्ञ करने से पूर्व श्रीकृष्ण व भीम दोनों जरासन्ध के पास पहुंचे। वहां भीम ने जरासन्ध के साथ मल्लयुद्ध करके उसको मार दिया। श्रीकृष्ण जी ने उसके पुत्र सहदेव को मगध का राजा बना दिया।

भगवान् बुद्ध के समय मगधवंश का राजा बिम्बसार इस मगध राज्य का शासक था। “डफ की क्रौनोलोजी” पृ० 5 में लेखक दुल्व ने लिखा है कि “इस बिम्बसार ने मगध कुल का अत्यन्त वैभव बढ़ाया और कुमारावस्था में अंग देश के नागराज से उसकी राजधानी चम्पा छीन ली।” बिम्बसार महात्मा बुद्ध से 5 वर्ष छोटा था। अतः इस राजा का जन्म 561 ई० पूर्व हुआ था। जैनधर्मप्रवर्तक महावीर स्वामी से इसकी मैत्री थी। ‘मंजु श्री मूलकल्प’ के लेखक ने लिखा है कि


1. महाभारत युद्ध में मगध नरेश कौरवों की ओर से होकर पाण्डवों के विरुद्ध लड़ा था। (भीष्मपर्व 51वां, 87वां अध्याय)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-252


इसके पुत्र अजातशत्रु ने इसका वध कर दिया। यह अजातशत्रु महात्मा बुद्ध के प्रतिद्वन्द्वी देवराज का मित्र था। परन्तु बाद में भगवान् बुद्ध का श्रद्धालु बन गया था। इस अजातशत्रु ने क्षत्रिय विरोधी परशुराम का बदला लेने के लिये उन सहस्रों ब्राह्मणों को अपनी तलवार से मौत के घाट उतार दिया जो ईश्वर के नाम पर उपयोगी पशुओं का वध करके यज्ञ में डालते थे और स्वयं खाते थे। यह प्रसिद्ध ब्राह्मणविरोधी हुआ। ‘मंजु श्री मूलकल्प’ के आधार पर अजातशत्रु के समय अंग, वंग, कलिंग, वैशाली, काशी और उत्तर में हिमालय तक मगधवंश का राज्य हो गया था। इसकी राजधानी गिरिवृज थी जिसके अवशेष पटना के समीप खुदाइयों में मिल रहे हैं। पटना में भी इसने एक किला बनवाया। इसी के समय बौद्ध ग्रन्थ लिपिबद्ध हुए और एक बौद्ध सभा का आयोजन किया गया। ‘एपिग्राफिका इण्डिया’ और ‘अन्धकार युगीन भारत’ के लेखक ने शक्तिवर्मन, चन्द्रवर्मन एवं उसके पुत्र विजयनन्दिवर्मन नामक नरेशों की मगधवंशी परम्परा का कलिंग पर भी पृथक् राजा रहना माना है। मगध राज्य पर अधिकार रखने वाले क्षत्रिय ही मागध या मागठ कहलाये1

वर्तमान काल में भी इस वंश के जाट सिक्ख जि० लुधियाना में एक ही जगह 22 गांवों में निवास करते हैं जिनमें बड़े-बड़े गांव रामगढ़, रायपुर, छिन्दड़, कटाणी कलांकटाणी खुर्द, कटाणा, बग्गोवाल, जटाणा, लल्लकलां, थाल, कोटसराय आदि हैं जो एक जत्थे में ग्रेवालों के गांवों के साथ बसे हुए हैं। ये लोग अपने आप को मांगठ कहते हैं। जि० पटियाला में जर्ग, मुरथला, रुड़की जुलाजन, दीवा आदि बड़े गांव मागध या मांगठ जाटों के हैं। मुरादाबाद के पास कुन्दनपुर व अमरोहा में भी मागध क्षत्रिय जाट निवास करते हैं2

9. दरद या दराळ -

यह चन्द्रवंशी जाट गोत्र है जो सम्राट् ययातिपुत्र द्रुह्यु के वंश की परम्परा में प्रचलित हुआ था। अष्टाध्यायी की काशिकावृत्ति 4/3/83 ‘दारदी सिन्धु’ से विद्वानों ने अनुमान किया है कि सिन्धु नदी का उत्पत्ति स्थान प्राचीन दरद देश है। यवन विद्वान् टालमी का भी यही मत है। यादववीरों की दिग्विजय के समय श्रीकृष्ण जी ने और राजसूय यज्ञ के लिए अर्जुन ने वाह्लिकों के बाद दरद क्षत्रियों को जीतकर उनसे कर (टैक्स) लिया था। (महाभारत सभापर्व, अध्याय 26वां)। उस समय यह दरदवंश अफगानिस्तान का शासक था और चीना, तुषार, वाह्लिकों (तीनों जाटवंश) का पड़ौसी था। आज भी दरदवंश के नाम पर गिलगित क्षेत्र में दरदिस्तान नाम का स्थान है। महाभारत भीष्मपर्व अध्याय 51वां तथा 117वां के अनुसार दरद क्षत्रियों ने कौरवों की ओर होकर पाण्डवों के विरुद्ध युद्ध किया था। ब्राह्मण प्रभुत्व के स्थापित होने पर महाभारत के पश्चात् ये दरद क्षत्रिय भी उन वंशों में थे जिन्हें ब्राह्मणों की दिमागी दासता के विरोधस्वरूप क्षत्रियत्व से बहिष्कृत3 होना पड़ा था। (जाटों का उत्कर्ष पृ० 310-311, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री) उस काल में ये दरद क्षत्रिय आज ‘दरदिस्तान’ में बसे हुए हैं। इनका रूप रंग और स्वभाव आज भी आर्य श्रेणी के क्षत्रियों के समान है। बौद्धकाल के पश्चात् ये सब मुसलमान बन गए। उसी समय इस्लाम की प्रथम क्रान्ति से बचकर काफी दरद लोग कश्मीर में जाकर बस गये। वहां ये लोग ब्राह्मणों में


1, 2. जाटों का उत्कर्ष पृ० 293-294, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।
3. देखो द्वितीय अध्याय, जाट क्षत्रिय वर्ण के हैं, प्रकरण।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-253


सम्मिलित होकर आज दर नाम से प्रसिद्ध हैं। पश्चिमोत्तर भारत से जब ये क्षत्रिय हरयाणा में आकर बसे तो दरद से दराळ कहलाने लगे। यहां टीकरी कलां दिल्ली के दराळ आज भी प्रसिद्ध हैं। दिल्ली में दरद या दराळ के गांव लीलवाल, झाडौदा (½), हिरण कूदना (½) हैं। पंजाब में दरद सिक्ख जाट बड़ी संख्या में हैं।

10. मल्ल या मालव -

यह चन्द्रवंशी जाट गोत्र है। रामायणकाल में इस वंश का शक्तिशाली राज्य था। सुग्रीव ने वानर सेना को सीता जी की खोज के लिये पूर्व दिशा में जाने का आदेश दिया। उसने इस दिशा के ब्रह्ममाल, विदेह, मालव, काशी, कोसल, मगध आदि देशों में भी छानबीन करने को कहा। (वा० रा० किष्किन्धाकाण्ड सर्ग 40, श्लोक 22वां) भरत जी लक्षमणपुत्र चन्द्रकेतु के साथ मल्ल देश में गए और वहां चन्द्रकेतु के लिए सुन्दर नगरी ‘चन्द्रकान्ता’ नामक बसाई जो कि उसने अपनी राजधानी बनाई। (वा० रा० उत्तरकाण्ड, 102वां सर्ग) इससे ज्ञात होता है कि उस समय मालव वंश का राज्य आज के उत्तरप्रदेश के पूर्वी भाग पर था। महाभारत काल में भी इनका राज्य उन्नति के पथ पर था। महाभारत सभापर्व 51वें अध्याय में लिखा है कि मालवों ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में असंख्य रत्न, हीरे, मोती, आभूषण भेंट दिये। इससे इनके वैभवशाली होने का अनुमान लगता है। मालव क्षत्रिय महाभारत युद्ध में पाण्डवों एवं कौरवों दोनों की ओर से लड़े थे। इसके प्रमाण निम्न प्रकार हैं - महाभारत भीष्मपर्व 51वां, 87वां, 106वां के अनुसार मालव क्षत्रिय कौरवों की ओर से पाण्डवों के विरुद्ध लड़े। इससे ज्ञात होता है कि मालव (मल्ल) वंशियों के दो अलग-अलग राज्य थे। पाण्डवों की दिग्विजय में भीमसेन ने पूर्व दिशा में उत्तर कोसल देश को जीतकर मल्लराष्ट्र के अधिपति पार्थिव को अपने अधीन कर लिया। इसके पश्चात् बहुत देशों को जीतकर दक्षिण मल्लदेश को जीत लिया। (सभापर्व, अध्याय 30वां)। कर्णपर्व में मालवों को मद्रक, क्षुद्रक, द्रविड़, यौधेय, ललित्थ आदि क्षत्रियों का साथी बतलाया है। उन दिनों इनके प्रतीच्य (वर्तमान मध्यभारत) और उदीच्य (वर्तमान पंजाबी मालवा) नामक दो राज्य थे। इन दोनों देशों के मालवों ने महाभारत युद्ध में भाग लिया। (जाटों का उत्कर्ष पृ० 311, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।)

पाणिनि ऋषि ने इन लोगों को आयुधजीवी क्षत्रिय लिखा है। बौद्ध काल में मालवों (मल्ल लोगों) का राज्य चार स्थानों पर था। उनके नाम हैं - पावा, कुशीनारा, काशी और मुलतान। जयपुर में नागदा नामक स्थान से मिले सिक्कों से राजस्थान में भी इनका राज्य रहना प्रमाणित हुआ है। अन्यत्र भी प्राप्त सिक्कों का समय 205 से 150 ई० पूर्व माना जाता है। उन पर मालवगणस्य जय लिखा मिलता है। सिकन्दर के समय मुलतान में ये लोग विशेष शक्तिसम्पन्न थे। मालव क्षत्रियों ने सिकन्दर की सेना का वीरता से सामना किया और यूनानी सेना के दांत खट्टे कर दिये। सिकन्दर बड़ी कठिनाई से आगे बढ़ सका। उस समय मालव लोगों के पास 90,000 पैदल सैनिक, 10,000 घुड़सवार और 900 हाथी थे। मैगस्थनीज ने इनको ‘मल्लोई’ लिखा है और इनका मालवा मध्यभारत पर राज्य होना लिखा है। मालव लोगों के


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-254


नाम पर ही उस प्रदेश का नाम मालवा पड़ा था1। वहां पर आज भी मालव गोत्र के जाटों की बड़ी संख्या है। सिकन्दर के समय पंजाब में भी इनकी अधिकता हो चुकी थी। इन मालवों के कारण ही भटिण्डा, फरीदकोट, फिरोजपुर, लुधियाना के बीच का क्षेत्र (प्रदेश) ‘मालवा’ कहलाने लगा। इस प्रदेश के लगभग सभी मालव गोत्र के लोग सिक्खधर्मी हैं। ये लोग बड़े बहादुर, लम्बे कद के, सुन्दर रूप वाले तथा खुशहाल किसान हैं। सियालकोट, मुलतान, झंग आदि जिलों में मालव जाट मुसलमान हैं। मल्ल लोगों का अस्तित्व इस समय ब्राह्मणों और जाटों में पाया जाता है। ‘कात्यायन’ ने शब्दों के जातिवाची रूप बनाने के जो नियम दिये हैं, उनके अनुसार ब्राह्मणों में ये मालवी और क्षत्रिय जाटों में माली कहलाते हैं, जो कि मालव शब्द से बने हैं। पंजाब और सिंध की भांति मालवा प्रदेश को भी जाटों की निवासभूमि एवं साम्राज्य होने का सौभाग्य प्राप्त है। (जाट इतिहास पृ० 702, लेखक ठा० देशराज)। महात्मा बुद्ध के स्वर्गीय (487 ई० पू०) होने पर कुशिनारा (जि० गोरखपुर) के मल्ल लोगों ने उनके शव को किसी दूसरे को नहीं लेने दिया। अन्त में समझौता होने पर दाहसंस्कार के बाद उनके अस्थि-समूह के आठ भाग करके मल्ल, मगध, लिच्छवि, मौर्य ये चारों जाट वंश, तथा बुली, कोली*, शाक्य* और वेथद्वीप के ब्राह्मणों में बांट दिये। उन लोगों ने अस्थियों पर स्तूप बनवा दिये (जाट इतिहास पृ० 32-33, लेखक ठाकुर देशराज।) मध्यप्रदेश में मालवा भी इन्हीं के नाम पर है।

मालव वंश के शाखा गोत्र - 1. सिद्धू 2. बराड़

11. क्षुद्रक या शूद्रक -

यह सूर्यवंशी जाटवंश है जो प्राचीन काल से है। ये मल्ल लोगों के पड़ौसी थे और एक समय इन्होंने सम्मिलित रूप से शासन किया था। मनु की 114वीं पीढी में महाराज क्षुद्रक हुये हैं। इनके वंशज प्रजातन्त्री शासक थे। इसी कारण पौराणिकों ने इनकी प्रशंसा नहीं लिखी है। महाभारत भीष्मपर्व 51वें अध्याय के अनुसार क्षुद्रक क्षत्रिय भी दरद, शक, मालव योद्धाओं की भांति दुर्योधन की ओर से इस युद्ध में लड़े थे। ये क्षुद्रक ही आगे चलकर शूद्रक कहलाये। कादम्बरी की कहा इस वंश के एक शासक चन्द्रापीड के सम्बन्ध में तैयार हुई थी। चीनी यात्री फ़ाह्यान के समय (405 ई० से 411 ई० तक) में क्षुद्रक लोगों का एक खानदान सिन्ध में भी राज्य करता था। ऐरावती (सतलुज) नदी पर स्थित हड़प्पा नगर क्षुद्रकों का एक पुराना नगर प्रतीत होता है। सतलुज से रावी नदी के आस-पास तक क्षुद्रक देश था। सिकन्दर की सेना का क्षुद्रक जाटों ने बड़ी वीरता से मुकाबला किया।

12. मत्स्य -

यह जनपद अति प्राचीनकाल से विद्यमान था। इस जनपद के उत्तर में दशार्ण, दक्षिण में पांचाल, नवराष्ट्र (नौवार), मल्ल (मालव) आदि और शाल्व, शूरसेनों से घिरा हुआ था। सुग्रीव वानरों को सीता जी की खोज के लिये दक्षिण दिशा के देशों में अन्य देशों के साथ मत्स्य देश में जाने का भी आदेश देता है (वा० रा० किष्कन्धाकाण्ड, 41वां सर्ग)। पाण्डवों की दिग्विजय में सहदेव ने दक्षिण दिशा में सबसे पहले शूरसेनियों को जीतकर फिर मत्स्यराज विराट को अपने अधीन कर लिया (महाभारत सभापर्व, 31वां अध्याय)। महाभारत विराट पर्व के लेख अनुसार


1. ठा० देशराज जाट इतिहास पृ० 702, इस मालवा नाम से पहले इस प्रदेश का नाम अवन्ति था।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-255


भरतपुर, अलवर, जयपुर की भूमि पर मत्स्य जनपद बसा हुआ था। इसकी राजधानी विराट या वैराट नगर थी, जो जयपुर से 40 मील उत्तर की ओर अभी भी स्थित है। यहां का नरेश महाभारत युद्ध के समय वृद्ध था। इसने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सुवर्णमालाओं से विभूषित 2000 मतवाले हाथी उपहार के रूप में दिये थे (महाभारत सभापर्व, 52वां अध्याय; श्लोक 26वां)। यह विराट नरेश वृद्ध होते हुए भी महाभारत युद्ध में पाण्डवों की ओर होकर लड़ा था (महाभारत भीष्मपर्व 52वां अध्याय)। यह विराट नरेश अत्यन्त शूरवीर योद्धा था। इसी के नाम पर महाभारत का एक अध्याय ‘विराट पर्व’ विख्यात है।

इस विराट नरेश की महारानी सुदेष्णा, कीचक की बहिन थी। इसी मत्स्यराज विराट के यहां अज्ञातवास के दिनों पांचों पाण्डव द्रौपदी सहित गुप्तवेश में आकर रहे थे। इसी नरेश की कन्या उत्तरा का विवाह अर्जुनपुत्र अभिमन्यु से हुआ था। इन्हीं दोनों का पुत्र परीक्षित हस्तिनापुर राज्य का उत्तराधिकारी बना था। राजा विराट का भाई शतानीक था। विराट के दो पुत्र उत्तर और श्वेत नामक थे। महाभारत युद्ध में मद्रराज शल्य ने उत्तर को और भीष्म ने श्वेत को मार था। बौद्धकाल के 16 महाजनपदों में से एक मत्स्य जनपद भी था। इस गणराज्य की ध्वजा का चिह्न मछली था।

15 अगस्त सन् 1947 ई० को भारतवर्ष स्वतन्त्र होने पर भारत सरकार ने राजपूताना की रियासतों में से अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली को मिलाकर ‘मत्स्य संघ’ बनाया और शेष रियासतों को मिलाकर ‘राजस्थान’ बनाया। जून 1949 ई० में मत्स्य संघ की चारों रियासतें भी राजस्थान में मिला दी गयीं।

इस मत्स्यवंश की सत्ता जाटों में पाई जाती है। भरतपुर राज्य की ओर से मत्स्यवंशज जाट धीरज माथुर एवं नत्था माथुर को दिल्ली के पास कराला, पंसाली, पूंठ खुर्द, किराड़ी, हस्तसार नामक पांच गांव का शासक बनाकर कचहरी करने के लिए नियत किया था। इस कचहरी के खण्डहर अभी तक कराला में पड़े हुए हैं। इस गांव से ही ककाना गांव (गोहाना के पास) जाकर बसा। इसके अतिरिक्त मत्स्य-मत्सर या माछर जाट बिजनौर के पुट्ठा और उमरपुर गांवों में निवास करते हैं। राजस्थान के जिला सीकर में खेतड़ी गांव मत्स्य या माछर गोत्र के जाटों का है।

13. वृष्णि -

यह चन्द्रवंशी जाट गोत्र है। इस वंश का प्रचलन प्राचीनकाल से है। चन्द्रवंशी सम्राट् ययाति के पुत्र यदु की 19वीं पीढी में महाराजा मदु हुए। उसके 100 पुत्रों में सबसे बड़ा वृष्णि था। उसी के नाम पर यह ‘वृष्णि’ वंश प्रसिद्ध हुआ (विष्णु पुराण चतुर्थ अंश अध्याह 11, श्लोक 25)। रामायणकाल में भी इस वंश का जनपद था। महाभारतकाल में इसका वर्णन निम्नलिखित है -

जाट इतिहास के लेखक ठा० देशराज लिखते हैं कि -

“श्रीकृष्ण जी नारद को बताते हुए कहते हैं - अन्धक और वृष्णि लोग वास्तव में महाभाग, बलवान् और पराक्रमी हैं। ये लोग सदा राजनैतिक (उत्थान) बल से सम्पन्न रहते हैं (पृ० 102 पर महाभारत का निर्देश)। व्रज में वृष्णि लोगों का एक छोटा राज्य था। इस वृष्णिराज्य के अधिपति श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव थे। मथुरा के पास कंस ने नवराष्ट्र, गोपराष्ट्र आदि प्रजातन्त्रों को नष्ट करके साम्राज्य की नींव डाली। वसुदेव को कैद में डाल दिया था। कृष्ण जी ने बृज के वृष्णि, अन्धक, नव, गोप लोगों का संगठन बनाकर

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-256


कंस को मार दिया। जरासंध के आतंक से तंग आकर कृष्ण जी ने वृज छोड़ दी और यहां से अपने साथ वृष्णि, अन्धक, शूर, माधव लोगों को ले जाकर द्वारिका पहुंच गया। वहां जाकर यदुवंशज अंधक वृष्णि दोनों को मिलाकर एक राजनैतिक ज्ञाति नाम का संघ बनाया जो कि प्रजातन्त्री था। ज्ञाति संघ के सदस्यों को ज्ञात कहा जाता था। संस्कृत ज्ञात का प्राकृत जात अथवा जाट बनता है। ज्ञात राज्य जिसकी कृष्ण जी ने नींव डाली, उसमें पहले दो वंश (जाटों के) अन्धक, वृष्णि शामिल हुए, फिर यादव वंशज प्रायः सारा समूह शूर, दशार्ण, भोज, कुन्तिभोज, काम्भोज (सब जाट गोत्र) आदि जातिराष्ट्र के रूप में परिणत हो गये। इस तरह से यह महान् जाट संघ कायम हुआ।” (अधिक जानकारी के लिए देखो, द्वितीय अध्याय, जाटवीरों की उत्पत्ति प्रकरण)।

इस जाति (जाट) संघ ने बड़ी संख्या में महाभारत युद्ध में भाग लिया था। यह वृष्णि गोत्र आज भी जाटों में विद्यमान है।

नोट -

  1. पाण्डवों के वनवास के समय उनसे मिलने के लिए भोज, वृष्णि, अन्धक वंशों के लोग काम्यक वन में गये थे। (वनपर्व)
  2. युधिष्ठिर के दो वंशों के लोग कर (टैक्स) नहीं देते थे। सम्बन्ध के कारण पांचालवंश और मित्रता के कारण वृष्णि और अन्धक। (महाभारत सभापर्व, 49वां अध्याय)
  3. श्रीकृष्ण जी भी वृष्णिवंशज थे। इनको महाभारत में कई स्थानों पर वृष्णिवंशी श्रीकृष्ण लिखा है (द्रोणपर्व अध्याय 127, श्लोक 21-22; द्रोणपर्व अध्याय 156, श्लोक 4; कर्णपर्व अध्याय 17, श्लोक 23; कर्णपर्व अध्याय 79, श्लोक 48)। श्रीकृष्ण जाट थे। इसके प्रमाण यादववंश प्रकरण में दिये हैं।

14. शूरसेन-शूर -

यह चन्द्रवंशी जाट गोत्र है जो कि रामायणकाल से ही सुप्रसिद्ध रहा है। सुग्रीव ने सीता जी की खोज के लिए वानर सेना को उत्तर दिशा के शूरसेन, भरत (इन्द्रप्रस्थ क्षेत्र), कुरु आदि देशों में जाने का आदेश दिया (वा० रा० किष्किन्धाकाण्ड सर्ग 43)। शत्रुघ्न ने मधुपुत्र लवणासुर को मारकर मथुरा नगर बसाया। उसके पुत्र सुबाहु व शूरसेन ने मथुरा पर राज्य किया। शत्रुघ्न ने शूरसेन जनपद व उसकी राजधानी मधुरापुरी (मथुरा) को पूर्णरूप से बसाया। (वा० रा० उत्तरकाण्ड सर्ग 70, 108)।

महाभारतकाल में इनके वृज में दो राज्य थे। ये लोग कृष्ण जी के बनाए हुए ज्ञाति संघ में मिल गये थे। इन लोगों ने महाभारत युद्ध में भाग लिया था। महाभारत के बाद इनके दो दल हो गये थे। एक दल की राजधानी मथुरा थी। कुछ दिन बाद इन लोगों ने डीग के पास सिनसिनी (पहला नाम शूरसेनी) गांव को अपनी राजधानी बनाया। इन लोगों में से विजयदेव ने बयाना को अपनी राजधानी बनाया। इनका दूसरा सम्प्रदाय सोरों और बटेश्वर के बीच में आबाद था। शूरसेन जाटों का प्रभाव व सभ्यता यहां तक बढ़ी-चढ़ी थी कि उत्तरी भारत में बोली जाने वाली भाषा ही उनके नाम से शूरसेनी कहलाती थी। शूरसेनी भाषा इटावा से लेकर मन्दसौर तक और पलवल से रतलाम तक बोली जाने वाली भाषा है। (जाट इतिहास पृ० 132, लेखक ठा० देशराज)

बौद्धकाल के समय भारतवर्ष में 16 महाजनपद (राज्य) थे जिनमें एक शूरसेन राज्य भी था। इन शूर जाटों ने मुगलों से लोहा लिया। वीर योद्धा गोकुला का जन्म इसी सिनसिनी गांव में हुआ था जिसने औरंगजेब के साथ बड़ी वीरता व साहस से युद्ध किये और अन्त में पकड़े जाने


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-257


पर मुसलमान बनना अस्वीकार करके शहीद हो गया। भरतपुर नरेशों का गोत्र शूरसेन था जो बाद में सिनसिनी या सिनसिनवार कहलाया। इन सब बातों का वर्णन भरतपुर राज्य अध्याय में विस्तार से किया जायेगा।

आज भी शूरसेन-सिनसिनवार गोत्र के जाट वृज तथा यू पी० में बड़ी संख्या में हैं।

15. दशार्ण-दसपुरिया -

यह जाटवंश प्राचीन समय से है। इस वंश का देश व राज्य रामायणकाल में भी था। सुग्रीव ने सीता जी की खोज के लिए वारों को दक्षिण दिशा में दशार्ण, विदर्भ आदि देशों में जाने का आदेश दिया (वा० रा० किष्किन्धाकाण्ड सर्ग 41वां)। महाभारतकाल में भी इनका राज्य था। इसके प्रमाण निम्न प्रकार से हैं -

पाण्डवों की दिग्विजय के अवसर पर पूर्व दिशा में भीमसेन ने विदेह को जीतकर दशार्ण देश को जीत लिया (महाभारत सभापर्व 29वां अध्याय)। नकुल ने पश्चिम दिशा के देशों में दशार्ण को जीत लिया (महाभारत सभापर्व 32वां अध्याय)। इससे ज्ञात होता है कि इन लोगों के दो जनपद अलग-अलग थे। विराटपर्व में लिखा है कि मत्स्य जनपद के उत्तर में दशार्ण देश था। दशार्ण नरेश ने राजसूय यज्ञ में युधिष्ठिर को उपहार दिये (महाभारत सभापर्व 51वां अध्याय)।

महाभारत युद्ध में दशार्ण वीर योद्धा पाण्डवों की ओर से (भीष्मपर्व अध्याय 49वां) और कौरवों की ओर होकर (भीष्मपर्व अध्याय 51वां) लड़े थे। इससे मालूम होता है कि इनके अलग-अलग दो राज्य तथा दल थे। ‘दशार्ण’ लोग मन्दसौर और उज्जैन के आस-पास रहते थे। असल में दस कुलों (वंशों) ने मिलकर जो जातिराष्ट्र स्थापित किया था उसकी राजधानी दसपुर अथवा मन्दसौर थी। जाटों में आजकल ये दसपुरिया और दशाह कहलाते हैं। मन्दसौर का प्रसिद्ध जाट राजा यशोधर्मा इन्हीं दस वंशों में से विर्क गोत्र का था। (इसका वर्णन मालवा में जाट राज्य अध्याह में किया जायेगा)। (जाट इतिहास उत्पत्ति और गौरव खण्ड पृ० 99 लेखक ठा० देशराज)।

इस वंश के जाट मध्यप्रदेश एवं यू० पी० में बसे हुए हैं।

16. भोज या कुन्तिभोज -

यह चन्द्रवंशी जाटवंश रामायणकाल से पहले का प्रचलित है। महाभारत आदिपर्व अध्याय 85वां, श्लोक 34वां के अनुसार चन्द्रवंशी सम्राट् ययाति के पुत्र द्रुह्यु के पुत्र भोज नाम से प्रसिद्ध हुए। यह राजवंश महाभारतकाल में उच्चतम स्थिति का माना जाता था। इस नाम का जनपद महाभारत सभापर्व के अनुसार चर्मण्वती (चम्बल) के किनारे पर था। इसकी सीमाएं बरार-विदर्भ (मध्यप्रदेश) से मिलती थीं। महाभारत वनपर्व के अनुसार भोज क्षत्रिय यादव, पाण्डवों से मिलने काम्यक वन में गये। ये लोग महाभारत युद्ध में कौरवों की तरफ होकर लड़े थे। (कर्णपर्व)

महर्षि वेदव्यास ने महाभारत ग्रन्थ में कुन्ति, भोज, भोजक, अपरकुन्ति नामक चार जनपद लिखे हैं। इन भोजक क्षत्रियों का राजा पुरुजित था। इसके पिता ने पृथा नामक शूर कन्या को गोद लिया था। वही पृथा बाद में कुन्तीभोजकवंश पुत्री के नाम पर ‘कुन्ती’ कहलाई जो कि युधिष्ठिर, भीमसेनअर्जुन की माता थी। इस प्रकार पुरुजित पाण्डवों का मामा था। इसके दो भाई शतानीक और श्येनजित थे।

बौद्धकाल में चर्मण्वती (चम्बल) नदी के किनारे (धौलपुर, ग्वालियर का भाग) कुन्तिभोज


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-258


क्षत्रियों का राज्य था। (जाट इतिहास पृ० 25, लेखक ठा० देशराज)। यह वंश केवल जाटों में ही है। गूजर, मराठा, राजपूत आदि जातियों में इस वंश की सत्ता नहीं है। भोज गोत्र के जाट ग्वालियर एवं बिजनौर जिलों में बसे हुए हैं।

17. पांचाल -

यह चन्द्रवंशी जाटगोत्र है जो कि प्राचीनकाल से प्रचलित है। ठा० देशराज जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खण्ड) पृ० 98 पर लिखते हैं कि “प्राचीन समय में पांचाल देश का राजा फूलसिंह था। निषध देश के राजा नल के पिता वीरसेन से इसी राजा फूलसिंह ने इस बात पर युद्ध किया था कि गंगा मेरे राज्य में से होकर बहती है। तुमने हमारे घाट पर हमसे पहले स्नान कैसे कर लिया। राजा वीरसेन व उसकी रानी बहुत दिनों तक फूलसिंह की कैद में रहे थे।” महाभारतकाल में पांचाल लोगों की बड़ी प्रतिष्ठा थी। अर्जुनपत्नी द्रौपदी इन्हीं पांचालों में पैदा हुई थी। पाण्डवों की दिग्विजय के समय भीमसेन पूर्व की ओर कई देशों को विजय करता हुआ पांचालों की महानगरी अहिच्छत्रा (बरेली) में पहुंचा। वहां उसने पांचाल वीरों को समझा-बुझाकर अपने वश में कर लिया (महाभारत सभापर्व, 29वां अध्याय)। महाभारत युद्ध में पांचालवीरों ने पाण्डवों की ओर होकर कौरव सेना से युद्ध करके उसे भयभीत किया था। (महाभारत भीष्मपर्व, 59वां अध्याय)।

महाभारत युद्ध में पंचालों का राजा द्रुपद व उसकी सेना पाण्डवों की ओर से लड़े थे। द्रुपद का पुत्र प्रचण्ड वीर योद्धा धृष्टद्युम्न पाण्डव सेना का, 18 दिन के युद्ध में अन्त तक सेनापति रहा था। महाभारतकाल में पांचाल राज्य की सीमा गंगा के उत्तर और यमुना के दक्षिण तक फैली हुई थी। माकन्दी और काम्पिल्य इस राज्य के मुख्य नगर थे। बौद्धकाल में पांचालों के दो दल हो गये थे - उत्तरी पांचाल और दक्षिणी पांचाल। दक्षिणी लोगों की राजधानी कन्नौज थी और उत्तरी लोगों की काम्पिल्य थी जो कासगंज और अलीगढ़ के बीच है।

वाह्लीक-वाहिक-वरिक

18. वाह्लीक-वाहिक 19. वरिक -

यह चन्द्रवंशी जाटवंश प्राचीन काल से है। रामायणकाल में इस वंश के देश व राज्य का वर्णन मिलता है। सीता जी की खोज के लिए सुग्रीव ने वानरसेना को पश्चिम दिशा में वाह्लीक देश में भी जाने का आदेश दिया था (वा० रा० किष्किन्धाकाण्ड, 42वां सर्ग)। ठा० देशराज ने जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खण्ड) पृ० 111 पर लिखा है कि “महाभारत के अनुसार ये वाह्लीक लोग शान्तनु के भाई वाह्लीक की संतान हैं।” परन्तु यह वाह्लीक वंश तो रामायणकाल में अपने देश वाह्लीक पर राज्य कर रहा था। हमारा यह मत है कि चन्द्रवंशी सम्राट् शान्तनु के भाई राजा वाह्लीक के नाम पर चन्द्रवंशी क्षत्रिय आर्यों का एक संघ बना और वह वाह्लीक वंश कहलाया जो कि प्राचीन वाह्लीक वंश के साथ मिल गया। इस कारण महाभारतकाल में इस वंश की शक्ति बढ़ गई थी। महाभारत के अनुसार वाहिक या वरिक जनपद मद्रराज्य के अन्तर्गत था। वाहिक वंश का राज्य अलग था। परन्तु मद्रराज शल्य इनसे छठा भाग ‘कर’ (टैक्स) लेता था। इस वाहिक जनपद की परिधि वर्तमान शेखूपुरा, लायलपुर, गुजरांवाला (सब पाकिस्तान में) मानी जाती है। ‘आराट’ नामक दुर्ग इसके राज्य का केन्द्र था। कर्णपर्व 27-54 के अनुसार कारस्कर, महिषक, करम्भ, कटकालिक, कर्कर और वारिक नामक प्रसिद्ध नगर इस जनपद में थे। इस जनपद का शासक चन्द्रवंशी वरिकवर्द्धन था। उसी के नाम पर यह वाहिकवंश, वरिक भी कहलाने लगा। इस राजा के अधीन 12 सुदृढ़ दुर्ग थे जिनका उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी,


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-259


महाभाष्य और काशिकावृत्ति में इस प्रकार किया है - आरान, कास्तीर, दासरूप (मन्दसौर), शाकल (सियालकोट), सौसुक, पातानप्रस्थ, नंदिपुर, कौक्कुण्डीवा, मोला, देवदत्त, कर्कर और वरिकगढ़। यह प्राचीन वरिकगढ़ वर्तमान शेखूपुरा ही माना गया है। (जाटों का उत्कर्ष पृ० 306, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री; जाट इतिहास उर्दू पृ० 420, लेखक ठा० संसारसिंह)।

युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में वाह्लीक नरेश ने बहुत धन भेंट किया (सभापर्व, 52वां अध्याय) और युधिष्ठिर के अभिषेक के लिए वाह्लीक नरेश सुवर्ण से सजाया हुआ रथ ले गया (सभापर्व 53वां अध्याय)। महाभारत युद्ध में वाह्लीक वीरों ने पाण्डवों व कौरवों दोनों की ओर युद्ध किया।

वाह्लीक पाण्डवों की ओर होकर लड़े (भीष्मपर्व 49वां अध्याय श्लोक 52-53)| और वाह्लीक नरेश तथा अन्य देशों के नरेशगण ने अर्जुन पर धावा किया (भीष्मपर्व 117वां अध्याय, श्लोक 32-34)। इसी तरह द्रोणपर्व के अनुसार अभिमन्यु के व्यूह में प्रवेश के समय वाह्लीक वीर दुर्योधन की ओर थे। सम्भवतः इस वाह्लीकवंश के दो जनपद हों या ये लोग इस युद्ध में दो भागों में बंटकर दोनों ओर से लड़े हों। कर्नल टॉड ने लिखा है कि “जैसलमेर के इतिहास से पता चलता है कि हिन्दू जाति के वाह्लीक खानदान ने महाभारत के पश्चात् खुरासान में राज्य किया।”

ग्यारहवीं शताब्दी में भरतपुर के बयाना शहर से तीन मील पर महाराजा विजयपाल ने विजय मन्द्रिगढ नामक किला बनवाया था। उस भूमि पर प्राचीनकाल से ही एक यज्ञस्तम्भ विद्यमान था जिसका नाम वरिक विष्णुवर्धन विजयस्तम्भ है। उस पर लिखा है कि “व्याघ्ररात के प्रपौत्र, यशोरात्र के पौत्र और यशोवर्द्धन मे पुत्र वरिक राजा विष्णुवर्द्धन ने पुण्डरीक (शुभ) यज्ञ की याद में यह यज्ञस्तम्भ विक्रम संवत् 528 फाल्गुन बदी 5 को स्थापित किया।”

महाराज विष्णुवर्धन वरिकवंश (गोत्र) के जाट थे। बयाना में जो उनका विजयस्तम्भ है उस पर उनका पुत्र वरिकविष्णुवर्धन लिखा हुआ है। (व्रजेन्द्र वंश भास्कर में बयाना के वर्णन के हवाले से, जाट इतिहास पृ० 703 लेखक ठा० देशराज)। सी० वी० वैद्य ने महाराज विष्णुवर्धन के सम्बन्ध में अपनी पुस्तक “हिन्दू मिडीवल इण्डिया” में लिखा है कि -

“गोलायो या पश्चिमी मालवा का राज्य मन्दसौर के शिलालेख वाले यशोधर्मन व विष्णुवर्धन के अधिकार में था। यशोधर्मन की महान् वीरता का काम यह था कि उसने मिहिरकुल हूण को जीत लिया था। चन्द्र के व्याकरण के अनुसार अजयज्जर्टो हूणान् जाटों ने हूणों को जीत लिया था। इस वाक्य का प्रयोग यशोधर्मन के लिए किया है जो कि पंजाब का जर्ट या जाट था। पंजाब से जाट लोग हूणों के धावों से बचने के लिए मालवा में जा बसे। यशोधर्मन के आधिपत्य में सन् 528 ई० में इन जाटों ने हूणों को पूर्ण रूप से हरा दिया जो कि उनकी मातृभूमि पंजाब पर अत्याचार कर रहे थे।”

इस वंश के जाट नरेशों का शासनकाल सन् 340 ई० से आरम्भ हुआ और लगभग 540 ई० में समाप्त हो गया। जिस समय उज्जैन में गुप्त राजाओं का शासन था, उसी समय मन्दसौर में इनका भी राज्य था। इनमें से एक दो नरेश तो गुप्तों के मांडलिक भी रहे। इस राजवंश की सूची निम्न प्रकार है -

इस वंश का पहला शासक नरेन्द्र राजा जयवर्मा मन्दसौर में शासन करता था। इसका पुत्र


1. जाटों का उत्कर्ष पृ० 306 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-260


‘पृथ्वीपति’ सिंहवर्मा, समुद्रगुप्त (सन् 335-376 ई० तक) का समकालीन था। सिंहवर्मा के दो पुत्र हुए - चन्द्रवर्मा और नरवर्मा। चन्द्रवर्मा ने मालवा से हटकर पुष्कर (जि० अजमेर) में राज्य स्थापित किया और नरवर्मा मालवा का राजा बना। ये स्वतन्त्र नरेश थे। नरवर्मा का पुत्र विश्ववर्मा था जिसके दो पुत्र बंधुवर्मा और भीमवर्मा थे। उज्जैन में गुप्त राजाओं (धारणगोत्री जाट) की शक्ति से डरकर नरवर्मा ने सम्राट् कुमारगुप्त (सन् 414-455 ई० तक) की और भीमवर्मा ने सम्राट् कुमारगुप्त के पुत्र सम्राट् स्कन्दगुप्त (सन् 455-467 ई० तक) की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी थी।

बन्धुवर्मा जो कि सम्राट् स्कन्धगुप्त का समकालीन था, यशोधर्मा की हूण विजय से लगभग 80-90 वर्ष पहले मालवा के पश्चिमी हिस्से अर्थात् मन्दसौर का शासक था। मन्दसौर में उसके समय के एक शिलालेख पर लिखा है कि बन्धुवर्मा ने मन्दसौर में रेशम के कारीगरों के बनवाये हुए एक सूर्यमन्दिर की संवत् 530 (सन् 473 ई०) में मरम्मत कराई थी। अर्थात् बन्धुवर्मा दशपुर (मन्दसौर) में सन् 473 ई० तक मौजूद था। (जाट इतिहास पृ० 705-706, ले० ठा० देशराज)।

विष्णुवर्धन जिसने बयाना में संवत् 528 (सन् 471 ई०) में विजयस्तम्भ खड़ा किया था, बन्धुवर्मा के पश्चात् मन्दसौर का शासक हुआ। इससे ज्ञात होता है कि मन्दसौर से बयाना तक के प्रान्त उसके अधिकार में थे। बन्धुवर्मा से मिले हुए राज्य को थोड़े ही समय में विष्णुवर्धन व उसके पुत्र यशोधर्मा ने इतना विस्तृत कर दिया था जिसके कारण विष्णुवर्धन ने महाराजाधिराज और यशोधर्मा ने सम्राट् व विक्रमादित्य की पदवी धारण की थी। (काशी नागरीप्रचारिणी पत्रिका, भाग 12, अंक 3, पृ० 342)।

यशोधर्मा - यह अपने पिता विष्णुवर्धन की मृत्यु के पश्चात् मालवा का सम्राट् बना। इसके समय में हूणों का सम्राट् मिहिरकुल सिंध, पंजाब राजस्थान का शासक था जिसकी राजधानी सियालकोट थी। मिहिरकुल के अत्याचारों से भारतवासी कांप गये थे। इसने मालवा पर आक्रमण कर दिया। सम्राट् वीर योद्धा यशोधर्मा ने सन् 528 ई० में मिहिरकुल से टक्कर ली और उसको बुरी तरह हराया।

सम्राट् यशोधर्मा ने मिहिरकुल को कैद कर लिया था परन्तु बाद में उनको छोड़ दिया गया1। मि० एलन लिखते हैं कि बालादित्य ने तो केवल मगध की रक्षा की, परन्तु अन्त में यशोधर्मा ने ही मिहिरकुल को पूर्णतया परास्त करके कैद कर लिया। “अर्ली हिस्ट्री ऑफ इण्डिया” के पृ० 318-319 में मि० विन्सेन्ट स्मिथ ने भी इस बात का समर्थन किया है कि यशोधर्मा ने मिहिरकुल को कैद कर लिया था। इस युद्ध के समय यशोधर्मा की अध्यक्षता में उज्जैन का धारणगोत्री जाट राजा बालादित्य एवं मगध का राजा भी शरीक हुए थे। (जाट इतिहास पृ० 708, लेखक ठा० देशराज)। इनके अतिरिक्त हरयाणा सर्वखाप पंचायत की ओर से काफी धनराशि और कई हजार वीर योद्धा यशोधर्मा की मदद में भेजे गये थे। (जाट इतिहास पृ० 5, लेखक ले० रामसरूप जून; हरयाणा सर्वखाप पंचायत के रिकार्ड से, जो चौ० कबूलसिंह मन्त्री सर्वखाप पंचायत के घर शोरम जि०


1. हिन्दुस्तान की तारीख उर्दू पृ० 316; जाट इतिहास पृ० 708, लेखक ठा० देशराज।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-261


मुजफ्फरनगर में है)। इस युद्ध में यशोधर्मा ने मिहिरकुल की सेना शक्ति को ऐसा कुचल दिया कि मिहिरकुल कश्मीर में जाकर रुका। यशोधर्मा के समय के तीन शिलालेख मालव संवत् 589 (सन् 532 ई०) के लिखे हुए मन्दसौर में पाये गये हैं1। इनके लेख निम्न प्रकार से हैं –

  1. “प्रबल पराक्रमी गुप्त राजाओं ने भी जिन प्रदेशों को नहीं भोगा था और न अतिबली हूण राजाओं की ही आज्ञाओं का जहां तक प्रवेश हुआ था, ऐसे प्रदेशों पर भी वरिकवंशी महाराज यशोधर्मा का राज्य है।”
  2. “पूर्व में ब्रह्मपुत्र से लेकर पश्चिम में समुद्र तक और उत्तर में हिमालय से दक्षिण में महेन्द्र पर्वत तक के सामन्त मुकुट मणियों से सुशोभित अपने सिर को सम्राट् यशोधर्मा के चरणों में नवाते हैं।”
  3. अर्थात् यशोधर्मा के चरणकमलों में हूणों के प्रतापी सरदार मिहिरकुल को भी झुकना पड़ा।

इस प्रकार के शिलालेखों के आधार पर सम्राट् यशोधर्मा ने विक्रमादित्य की उपाधि भी धारण की थी2। इसका उल्लेख कल्हण की राजतरंगिणी में भी मिलता है। कल्हण ने इसी सम्राट् के अधीन महाकवि कालिदास का होना लिखा है। यह भी मत है कि इसी सम्राट् यशोधर्मा ने मालव संवत् को विक्रम संवत् के नाम पर प्रचलित किया। कल्हण ने तीन कालिदासों का वर्णन किया है। यह कालिदास जिसने कि ‘रघुवंश’ और ‘ज्योतिरविदाभरण’ आदि ग्रन्थ लिखे हैं, महाराज यशोधर्मा की सभा का एक रत्न था। रघुवंश में राजा रघु की दिग्विजय के वर्णन को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि महाराज यशोधर्मा ने किस भांति से किन-किन देशों को विजय किया था। कालिदास ने महाराज यशोधर्मा की ही विजय को रघु-दिग्विजय का रूप दिया है। इस सम्राट् का राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में ट्रावनकोर तक फैल गया था। मगध का राजा इसका मित्र बन गया था। (जाट इतिहास पृ० 708-709, लेखक ठा० देशराज)

महाराज यशोधर्मा के पुत्र शिलादित्य उपनाम हर्ष ने मालवा का राज्य सम्भाला परन्तु वह जल्दी ही पराजित होकर कश्मीर भाग गया। (सी० वी० वैद्य, हिन्दू मिडीवल इण्डिया)। सन् 540 ई० के लगभग कश्मीर के राज प्रवरसेन ने इसको फिर से राजा बना दिया। (जाट इतिहास पृ० 709, ठा० देशराज)। ध्यान रहे कि यह हर्ष (वरिक जाट) सम्राट् हर्षवर्धन (वैस जाट) से पृथक् व्यक्ति था। मालवा से वरिकवंशी जाट राज्य लगभग 540 ई० में समाप्त हो गया। इसके बाद मालवा में वरिकवंशी जाटों के पास कोई बड़ा राज्य न रहा। फिर भी वे जहां-तहां कई-कई गांव के छोटे-छोटे जनपदों के अधीश्वर बहुत समय तक बने रहे थे। मुसलमानी सल्तनत के भारत में आने के समय तक इन्होंने मालवा में पंचायती और भौमियाचारे के ढंगों से राज-सुख भोगा था। गुरु गोविन्दसिंह जी जब 1706 में मालवा के दीना गांव में ठहरे थे, तब तक मालवा का कुछ भाग वरिकवंशी जाटों द्वारा शासित होना ‘इतिहास गुरुखालसा’ में लिखा है। वहां पर चौ० लखमीर ने गुरु गोविन्दसिंह जी को अपने गढ़ में ठहराया था। आज उस स्थान पर लोहगढ़ नाम का गुरुद्वारा है। (इतिहास गुरु खालसा साधु गुरु गोविन्तसिंह द्वारा लिखित)। वहां के लोगों ने


1. मन्दसौर से 3 मील दूर लाल पत्थर की दो साठ-साठ फुट ऊंची और बीस-बीस फुट मोटी (गोल) लाटें आज भी पड़ी हुई हैं जिन पर उपर्युक्त लेख लिखे हुये हैं।
2. भारत के प्राचीन राज्य वंश भाग 2.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-262


आप को बहुत अस्त्र शस्त्र और धन दिया जिससे गुरु जी के पास शाही ठाठ हो गये थे।

इस वरिकवंश के लोग वैदिकधर्मी थे। इनकी संख्या पंजाब में बहुत है। वहां पर ये लोग सिख धर्मी हैं और जाति से वरिक जाट हैं। पंजाब में इस वंश की दो मिस्लें थीं। कपूरसिंह वरिक जाट ने रियासत कपूरथला की स्थापना की थी। मनौली, झुनगा, भरतगढ़, धनौरी और कण्डौला नामक रियासतें (बाद में जागीरें) भी इसी वंश की थीं। यू० पी० में वरिक का अपभ्रंश बूरे के नाम पर वे क्षत्रिय प्रसिद्ध हुए जो पंजाब से पूर्व की ओर बढे। बुलन्दशहर जिले में इन्होंने बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की। यहां सैदपुर, सेहरा, सीही, बनबोई, भिरावठी, पाली, भमरौली, पसौली, बरकातपुर, फतहपुर, तेजगढ़ी, लाठौर, घंसूपुर, परतापुर, रमपुरा, नगला और मदारीपुर आदि गांव वरिक जाटों के हैं। इनके पूर्वज भटिण्डा से हिसार आये और फिर हिसार के दो गांव गुराना और भदौड़ से इधर आये। इस वंश के लोगों ने सर्वप्रथम लखावटी कालेज प्रारम्भ करके हिन्दू जाटों में शिक्षा के प्रति भारी प्रेम उत्पन्न किया। इस वंश के लोग पाकिस्तान के शेखूपुरा में बड़ी संख्या में और उसके चारों ओर बसे हुए हैं जो मुसलमान जाट हैं। जिस तरह वरिक का अपभ्रंश बूरे (बूरा) है वैसे ही इन लोगों को कई स्थानों पर विर्क, वृक, वरक कहा जाता है।

वरिकवंश का शाखागोत्र - 1. बूरे या बूरा

20. शक 21. बर्बर 22. पल्हव जाट वंश -

वैदिक सम्पत्ति पृ० 424 पर पुराणों के संकेत से स० पं० रघुनंदन शर्मा साहित्यभूषण ने लिखा है - अर्थात् वैवस्वतमनु के इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्ट, शर्याति, करुष, पृषध्र, दिष्ट, प्राशु, नृग, नरिष्यन्त दस पुत्र हुए। (विष्णु पुराण, चतुर्थ अंश, अध्याय 1 श्लोक 7) हरिवंश अध्याय 10, श्लोक 28 में लिखा है कि नरिष्यन्त के पुत्रों का ही नाम शक है। इन शकों को राजा सगर ने ‘अर्धमुण्डान् शकान्’ अर्थात् आधा सिर मुंडवाकर निकाल दिया। यह घटना इस कारण हुई कि सम्राट् सगर ने अपने पिता बाहु के युद्ध में हार जाने का बदला शत्रुओं को हराकर इस तरह से लिया कि उसने यवनों के शीश मुंडवाये, शकों के आधे सिरों को मुंडवाया, पारदों को लम्बे बाल वाला बनाया, पह्लवों की मूंछ दाढ़े रखवाई तथा वषट्कार आदि से वंचित कर दिया। ब्राह्मणों ने भी इनका परित्याग कर दिया, इसलिए ये सब म्लेच्छ कहे गये (विष्णु पुराण चतुर्थ अंश, अध्याय 3, श्लोक 47-48)। शक लोग सीथिया (शकावस्था का अपभ्रंश) में जाकर बस गये। इसलिये इनके आर्य होने में कोई सन्देह नहीं है।1 (वैदिक सम्पत्ति पृ० 424)

आर्य क्षत्रियों को ब्राह्मणों के दास न होने के कारण म्लेच्छ, शूद्र, व्रात्य करार दिया गया। इसकी अधिक जानकारी के लिये देखो द्वितीय अध्याय, जाट क्षत्रिय वर्ण के हैं, प्रकरण।

रामायण काल में भी उपर लिखित जाटवंशों का राज्य व देश थे। इनका वर्णन इस प्रकार है - पह्लव, शक, बर्बर योद्धाओं ने वसिष्ठ ऋषि की ओर से विश्वामित्र की शक्तिशाली सेना के साथ युद्ध करके उसे हरा दिया। (वा० रा० बालकाण्ड 54-55वां सर्ग)। सीता जी की खोज के लिये सुग्रीव ने वानर सेना को उत्तर दिशा में अन्य देशों के साथ शकों के देश में भी जाने का


1. शक लोगों ने आर्यावर्त से बाहिर जाकर शक देश बसाया, जोकि उनके नाम पर शकावस्था कहलाया, जिसका अपभ्रंश नाम सीथिया पड़ गया (वैदिक सम्पत्ति, पृ० 424, लेखक पं० रघुनंदन शर्मा)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-263


आदेश दिया (वा० रा० किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 43वां)। महाभारत काल में इन जाट वंशों का वर्णन निम्न प्रकार से है - पाण्डवों की दिग्विजय के समय भीमसेन ने पूर्व दिशा की ओर अनेक देशों को जीतकर शकों और बर्बरों को छल से पराजित किया (सभापर्व 30वां अध्याय)। नकुल ने पश्चिम दिशा में जाकर बर्बर, पह्लव और शकों को जीतकर उन से रत्नों की भेंट ली (सभापर्व, 32वां अध्याय)। महाराजा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में शक, बर्बर लोगों ने सहस्रों गधे और शक लोगों ने तलवारें, फरसे और सहस्रों रत्न भेंट दिये (सभापर्व, 51वां अध्याय, श्लोक 23-25)। पह्लव और शक ये उत्तम कुल में उत्पन्न श्रेष्ठ एवं शस्त्रधारी क्षत्रिय राजकुमारों ने बहुत धन अर्पित किया (सभापर्व, 52वां अध्याय)। महाभारत युद्ध में शक, पह्लव, बर्बर कौरवों की ओर होकर लड़े (भीष्मपर्व 19वां अध्याय श्लोक 13, और द्रोणपर्व)।

पह्लव (पल्लव) जाटों ने छठी सदी के मध्य से आठवीं सदी के मध्य तक दक्षिण भारत में शासन किया। इसका वर्णन “भारतवर्ष में जाटवीरों का दक्षिण में राज्य” अध्याय में किया जायेगा। पाठक समझ गये होंगे कि शक, बर्बर, पह्लव जाट गोत्र हैं जो क्षत्रिय आर्य हैं और भारतवर्ष के ही आदिवासी हैं। महाभारत के पश्चात् बौद्ध-काल के अन्तिम समय और गुप्त राजाओं के शासन काल में जिन शक, कुषाण, हूण आदि जातियों ने भारतवर्ष पर आक्रमण किये वे विदेशी कबीले थे। उनसे जाटों के निकास का कोई सम्बन्ध नहीं है। आज भी शक, बर्बर, पह्लव (पल्लव) गोत्र के जाट कई स्थानों पर बसे हुए हैं। हां शक (सीथियन), कुषाण और श्वेत हूण लोग स्वयं जाट थे परन्तु इन से अन्य जाट गोत्रों की उत्पत्ति नहीं हुई। चतुर्थ अध्याय में इनका वर्णन किया जायेगा।

23. विदेह 24. पुण्ड्र (पुण्ड्रक-पौण्ड्र) 25. पाण्ड्य 26. चोल 27. वंग 28. कुरु (कौरम) 29. विदर्भ जाटराज्य (वंश) -

विदर्भ देश पर यदुवंशी शशिबिन्दु का राज्य रहा। यह चक्रवर्ती सम्राट् था जो यदु के पुत्र करोक्षत्री की शाखा में यदु से सातवीं पीढ़ी में हुआ (देखो वंशावली)। इन वंशों तथा प्रदेशों का उल्लेख रामायण एवं महाभारत में है जो निम्न प्रकार से है -

सुग्रीव ने वानर सेना को सीता जी की खोज के लिये ऊपर लिखित देशों में भी जाने का आदेश दिया।

  • पूर्व दिशा में - विदेह ([[Kishkindha Kanda Sarga 40|वा० रा० किष्किन्धा काण्ड सर्ग 40)।
  • दक्षिण दिशा में - विदर्भ, वंग, पुण्ड्र, चोल और पाण्ड्यवंशी राजाओं का नगर (तंजौर)। (सर्ग 41)।
  • उत्तर दिशा में - दक्षिणी कुरुदेश (कुरुक्षेत्र के आस-पास) और उत्तरी कुरु (आज के साइबेरिया में)। (सर्ग 43)

महाभारत सभापर्व पाण्डवों की दिग्विजय - उत्तर दिशा में अर्जुन ने अनेक देशों के साथ चोल देश (अध्याय 27) और उत्तर कुरुदेशों (अध्याय 28) को भी जीत लिया। पूर्व में भीमसेन ने विदेह (मिथिला) (अध्याय 29) और पांडर-पुण्ड्रक तथा वंग देशों को जीत लिया (अध्याय 30)। दक्षिण दिशा में सहदेव ने पाण्ड्य नरेश को जीत लिया। (अध्याय 31)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-264


युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में राजागण द्रव्य लाये - महाभारत सभापर्व - इस अवसर पर पाण्ड्य नरेश ने चन्दन के छियानवें भार और उतने ही शंख भेंट किये। चोल देश के नरेश ने असंख्य चन्दन, अगुरु, मोती व रत्न भेंट दिये। (51वां अध्याय)।

वंग और पुण्ड्रक नरेशों ने बहुत धन अर्पित किया (52वां अध्याय)।

महाभारत भीष्मपर्व अध्याय 50 के अनुसार पौण्ड्र, चोल, पाण्ड्य, पुण्ड्र वीर योद्धाओं ने दुर्योधन की ओर होकर महाभारत युद्ध में भाग लिया और कर्णपर्व के अनुसार वंग एवं पुण्ड्र वीर सेनायें भी दुर्योधन की तरफ होकर इस युद्ध में लड़ीं।

कुरुवंश - चन्द्रवंश में सम्राट् हस्ति हुये जिसने हस्तिनापुर नगर बसाया। हस्ति से पांचवीं पीढ़ी में कुरु हुये। चन्द्रवंशी सम्राट् कुरु की प्रसिद्धि के कारण इनके नाम से इनका वंश कुरु या कौरववंश कहलाया। सम्राट् कुरु ने धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र स्थापित किया। (विष्णु पुराण चतुर्थ अंश, अध्याय 19)। यह दक्षिणी कुरुदेश कहा गया। उत्तरी कुरुदेश (आज के साइबेरिया में) इसी के नाम पर था। महाभारत काल में कुरु लोग हस्तिनापुर में राज्य करते थे।

बौद्धकाल में कुरुवंशी राजाओं की राजधानी इन्द्रप्रस्थ ही थी। हस्तिनापुर, मेरठ, दिल्ली प्रदेश पर कुरुवंश का ही शासन था। (जाटों का उत्कर्ष पृ० 54, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री)।

आज भी इस वंश के बहुत जाट हैं जिनका गोत्र कुरु-कुरुवंशी-कौरव है।

चन्द्रवंशी सम्राट् ययाति के पुत्र अनु की 13वीं पीढ़ी में राजा बलि हुये। बलि की रानी के उदर में दीर्घतमा मुनि ने गर्भ स्थापित किया जिससे अंग, वंग, कलिंग, सुह्म, पौण्ड्र नामक पांच पुत्र उत्पन्न हुये। उनके नाम पर पांच देशों का नाम पड़ा। (विष्णु पुराण चतुर्थ अंश, अध्याय 18)। परन्तु ‘जाट इतिहास’ लेखक श्रीनिवासाचार्य महाराज ने पृ० 26 पर लिखा है कि दीर्घतमा अनु का प्रपौत्र था जिसके पुत्र अंग, [Vanga|वंग]], कलिंग, [Suhya|सुह्म]], पुण्ड्र और आन्ध्र थे। इनके नाम पर देशों का नाम पड़ा। आन्ध्र वंग और पुण्ड्र के नाम से जाटवंश आन्ध्र, वंग, पुण्ड्र प्रचलित हुये।

चोलवंश - चोल एक प्राचीन वंश है। महाभारत, मेगस्थनीज के वृत्तान्त, अशोक के शिलालेखों तथा अन्य ग्रन्थों में इनका उल्लेख मिलता है। दक्षिण भारत में इनके राज्य में तमिलनाडु और मैसूर का अधिकांश प्रदेश शामिल था। आठवीं शताब्दी में पाण्ड्य वंश की शक्ति और नौवीं शताब्दी में पल्लवों (दोनों जाटवंश) की शक्ति क्षीण होने के कारण चोलशक्ति का उत्थान हुआ। (भारत का इतिहास पृ० 103 - हरयाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी)।

पाण्ड्य - यह भी एक प्राचीन वंश है जिसका महाभारत, मैगस्थनीज के वृत्तान्त और अशोक के शिलालेखों तथा अन्य ग्रन्थों में, उल्लेख मिलता है। इनका राज्य दक्षिण भारत में आज के केरल प्रान्त क्षेत्र पर था। चोल, पांड्य आदि राज्यवंशों का वर्णन “दक्षिण भारत में जाटवीरों का राज्य” अध्याय में लिखा जायेगा। आज भी विदेह, पुण्ड्र, पाण्ड्य, चोल, वंग गोत्र के जाट कई स्थानों पर बसे हुये हैं।

सिन्धु

30. सिन्धु -

यह जाटों का प्रसिद्ध, गौरवशाली और प्राचीनकाल से प्रचलित गोत्र है। इस वंश का शासन सिन्धु देश पर था। रामायण में भी इनका वर्णन है। सुग्रीव ने सीता जी की खोज के लिए वानरसेना को अपने श्वशुर ‘सुषेण’ के नेतृत्व में पश्चिम दिशा को भेजा और सिन्धु


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-265


देश में जाने का भी आदेश दिया (वा० रा० किष्किन्धा काण्ड, 42वां सर्ग)। सिन्ध मजम्मल-उल-तवारीख वाक़ातए पंज हजारी साला में लिखा है कि दुर्योधन से 5000 वर्ष पहले सिन्ध देश पर मेद1 जाटों का राज्य उन्नति के पथ पर था। जाट इतिहास अंग्रेजी अनुवाद पृ० 6 लेखक रामसरूप जून ने इसी लेख के आधार पर यही लिखा है। परन्तु वैदिक काल से ही इस देश पर जाटों का राज्य रहा है। (देखो इसी पुस्तक का तृतीय अध्याय, वैदिककाल में जाटवंशों का राज्य)।

द्वापर में सिन्धु नामक विशाल जनपद था जिस पर इसी नाम का वैभवशाली सिन्धु राजवंश राज्य करता था। इस वंश के अधीन दस राष्ट्र थे। “सिन्धु राष्ट्रमुखानीह दश राष्ट्राणि यानीह” (कर्ण पर्व 2-23)। उस समय जयद्रथ नामक राजा इस प्रदेश पर कठोरतापूर्वक शासन करता था। महाभारत “सिन्धु-सौवीरभर्तारं दर्पपूर्णं मनस्विनम्” (सभपर्व 22-9), “पतिः सौवीरसिन्धूनां दुष्टभावो जयद्रथः” (वनपर्व 268-8), “जयद्रथो नाम यदि श्रुतस्ते सौवीरराजः सुभग स एव” (वनपर्व 266-12) आदि स्थलों पर जयद्रथ को सिन्धु सौवीर आदि जनपदों का नरेश लिखा है। कई ऐतिहासिकों ने उपरोक्त दस राष्ट्रों की कल्पना करते हुए शिवि, वसाति, काकुस्थ, सौवीर,2 (चारों जाटवंश) आदि वंशों को भी सिन्धु राज्य के अन्तर्गत होना माना है। इस विशाल सिन्धु राज्य का प्रबन्ध राजसभा, न्यायसभा और धर्मसभा के अधीन था। इसी कारण जयद्रथ अपने समय का उत्कृष्ट प्रबन्धक था। इसी योग्यता से प्रभावित होकर राजा दुर्योधन ने अपनी बहिन दुःशला का विवाह जयद्रथ से करके सिन्धुओं को अपना मित्र बना लिया था।

युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर सिन्धु नरेश ने सुवर्णमालाओं से अलंकृत पच्चीस हजार सिन्धुदेशीय घोड़े उपहार में दिये थे। (सभापर्व, 51वां अध्याय)। महाभारत युद्ध में एक अक्षौहिणी सेना लेकर जयद्रथ दुर्योधन की ओर से लड़ा था। यह सबको विदित है कि अर्जुन ने सूर्यास्त होते-होते जयद्रथ का वध कर दिया था।

सिन्धु राज्य की ध्वजा वराह (सूअर) चिह्न वाली थी (द्रोणपर्व 43-3)। यही ध्वजा प्रायः पश्चिम के सभी आर्य जनपदों की मानी गई। जयद्रथ के मरने के बाद उसका पुत्र सुरथ सिंधु देश का राजा हुआ। महाभारत युद्ध के पश्चात् सम्राट् युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया। उस अवसर पर अर्जुन सिन्धु देश में पहुंचा। अर्जुन के वहां पहुंचने की सूचना सुनकर ही सिन्धुराज सुरथ की हृदय गति के रुक जाने से मृत्यु हो गई।

अश्वमेध यज्ञ की स्मृति (यादगार) में अर्जुन ने मोहन (कृष्ण) और युधरो (युधिष्ठिर) के नाम पर मोहनजोदारो-मोहनजोदड़ो नामक नगर बसाया3। (जाटों का उत्कर्ष पृ० 296, लेखक योगेन्द्रपाल


1. अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस पृ० 6 पर लेखक उजागरसिंह माहिल ने ठोस प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया है कि ‘मेद’ शब्द गलत है, इसके स्थान पर मांडा (गोत्र) जाट पढ़ो।
2. जाट्स दी एन्शनट् रूलर्ज में बी० एस० दहिया ने पृ० 20 पर सौवीर को सोहल सिद्ध करके सोहल जाट गोत्र लिखा है।
3. जाट इतिहास पृ० 693, लेखक ठा० देशराज ने लिखा है कि जयद्रथ के बाद सिन्धुदेश के एक बड़े प्रदेश पर श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के पक्ष के लोगों ने अपना अधिकार जमा लिया और ज्ञातिराज्य की नींव डाली। जहां उनकी राजधानी थी वह (मोहन + युधिष्ठिर के नाम) मोहन + युधरा कहलाती थी जो कालान्तर में मोहनजुधारो अथवा मोहनजोदारो के नाम से प्रसिद्ध हुई। सिन्धुवंश शिववंश का ही एक अंग है।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-266


शास्त्री)। इस समय से पहले भी सिन्धु देश में जाटों का प्रजातन्त्री शासन था। सिन्धु देश का साहित्य इसका साक्षी है। ‘बंगला विश्वकोष’ जिल्द 7 पृष्ठ 6 पर लिखा है कि “प्राचीनकाल में सिन्धु देश में जाटों का गणराज्य था और सिन्धु देश की जाट स्त्रियां अपने सौन्दर्य और सतीत्व के लिए सर्वत्र प्रसिद्ध हैं।”

महाभारत के बाद सिन्धु देश में विद्यमान सिन्धुवंश के जाटों ने महात्मा बुद्ध से प्रभावित होकर तथा मौर्य, कुषाण एवं धारण गोत्री गुप्त सम्राटों (तीनों जाटवंश) के प्रताप से सामूहिक रूप से बौद्ध-धर्म स्वीकार कर लिया और देर तक इसी धर्म में रहने से आने वाले नवीन ब्राह्मण धर्म की ओर अकस्मात् प्रवृत्त नहीं हुए। नवीन ब्राह्मण धर्म जब पश्चिम में फैला तो ये सिन्धु जाट, सिक्ख या मुसलमान हो गए। इसका विशेष कारण सिन्ध में ब्राह्मणों द्वारा जाटों पर किए गए अत्याचार थे। इसी कारण नवीन हिन्दू धर्म की ओर झुकने में अपना अपमान समझते थे। (जाटों का उत्कर्ष पृ० 296 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री)। एक चच ब्राह्मण को सिन्धु राजा साहसीराय1 द्वितीय ने अपने दरबार में रख लिया। इस राजा की रानी सुहानदी से चच ने अनुचित सम्बन्ध स्थापित कर लिया और नमकहरामी करके रानी की मदद से राज्य को हड़प लिया। साहसीराय के मरने पर चच ने उस रानी से विवाह कर लिया। इस चच राजा ने सिन्धप्रदेश पर 40 वर्ष राज्य किया। यह जाटों का इतना कट्टर एवं निर्दयी शत्रु था कि इसने उनकी आर्थिक, सामाजिक तथा मानसिक दशा को कुचल डाला। (जाट इतिहास पृ० 14-15,लेखक कालिकारंजन कानूनगो; जाट इतिहास पृ० 697 लेखक ठा० देशराज; जाट्स दी एनशन्ट रूलर्ज पृ० 213 लेखक बी० एस० दहिया)। अधिक वर्णन महाभारतकाल के बाद सिन्ध में जाट राज्य के अध्याय में लिखा जाएगा।

बन्दा बैरागी के नेतृत्व के पश्चात् जब पंजाब में उच्चाकांक्षी वंशों ने 12 मिसलें (रियासतें) बनाकर प्रान्त से मुगल शासन समाप्त करके सिक्ख शक्ति स्थिर की तो सिन्धु वंश ने कन्हैया और सिंहपुरिया आदि कई मिसलों में प्रमुख भाग लेकर राज्यसत्ता प्राप्त कर ली। कर्नल जेम्स टॉड ने इन सिन्धु जाटों की प्राचीन प्रतिष्ठा एवं राज्यगौरव का ध्यान रखते हुए सिंधुवंश को 36 राजवंशों में गिनाया है। राजस्थान के 36 राजकुलों की सूची में टॉड समेत 6 लेखकों की सूची हैं। चन्द्रबरदाई ने भी अपनी सूची में सिन्धु वंश को राजकुलों में लिखा है।

लाहौर, लायलपुर, शेखूपुरा जिलों में सिन्धु जाटों की बहुत उन्नत स्थिति थी। स्वतन्त्रप्रियता इस वंश की विशेषता है। शान्तिकाल में क्रान्ति की प्रतीक्षा करते हुए उत्तम कृषि करना और क्रान्ति में अग्रगण्य भाग लेते हुए प्रमुखता प्राप्त कर लेना सिन्धु जाटों की अपनी विशेषता है। समस्त पंजाब में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध सर्वप्रथम क्रान्ति करने वाले सरदार अजीतसिंह सिंधु थे जिन्होंने देशहित के लिए विदेशों में रहकर घोर कष्ट सहना स्वीकार किया। इन्हीं के भाई देशभक्त सरदार किशनसिंह के पुत्र अमरशहीद सरदार भगतसिंह के कारण भारतीय क्रान्ति का इतिहास अत्युज्जवल है। सिन्धु वंश के नायक रूप में इस वीर को स्मरण किया जाएगा। इस प्रकार सिंधुवंश जाटों में अत्यन्त प्रतिष्ठाप्राप्त राजवंश है। अमरशहीद भगतसिंह सिंधु पर ने केवल जाटों को ही, परन्तु समस्त भारतवासियों को गर्व है। आपका जीवन चरित्र दशम अध्याय में लिखा जाएगा।


1. ‘राय’ मौर्य (मौर) जाटवंश की शाखा है। इसका वर्णन, मौर्य (मौर) जाटों का भारतवर्ष में राज्य प्रकरण में किया जाएगा।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-267


भारत की स्वतन्त्रता से पूर्व सिन्धु जाटों की रियासतें (जागीरें) कलसिया, फतेहगढ़, सिरानवाली, बड़ाला, भड़वाल, ठोठर, पधाना, चुनिया, भड़न, कालयावाला, मौकल आदि थीं। इस जाटवंश की अधिक संख्या सिक्खों में है। किन्तु इस वंश के हिन्दू जाट भी हैं। ये जि० मेरठ, मुरादाबाद, हिसार और रोहतक में बसे हैं। जि० मेरठ में अक्खापुर गांव सिन्धु जाटों का है। जि० हिसार में खांडा-खेड़ी, जि० रोहतक में खेड़ी साधनौनोंद गांव सिन्धु जाटों के हैं। कई स्थानों पर यह गोत्र सिन्धड़ भी कहा जाता है। जि० करनाल में इस गोत्र के जाटों के गांव खेड़ी मानसिंह, गगसीना, जुल्लापुर हैं।

सिन्धुवंश के जाटों की अतिप्रसिद्ध घटनाओं का संक्षिप्त ब्यौरा -

  • 1. ईसा से 600 वर्ष पूर्व महान् सम्राट् साइरस ने बेबिलोनिया के लोगों से युद्ध करना पड़ा था। साइरस ने सिन्धु जाटों के सम्राट् सिन्धुराज से इस युद्ध के लिए सहायता प्राप्त की। सिन्धु सेना की सहायता से साइरस की विजय हो गई। कर्नल टॉड ने इस समय की जाट जाति के वैभव के लिए निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग किया है - “साइरस के समय में ईसा से 600 वर्ष पहले इस महान् जेटिक (जाट) जाति के राजकीय प्रभाव की यदि हम परीक्षा करें तो यह बात हमारी समझ में आ जाती है कि तैमूर की उन्नत दशा में भी इन जाटों का पराक्रम ह्रास (कम, नीचे) नहीं हुआ था।”
  • 2. जिस समय सिकन्दर ईरान पर आक्रमण करने के लिए बढ़ रहा था, उस समय वहां के शासक शैलाक्ष (सेल्यूकस) ने सिन्धु देश के राजा सिन्धुसेन जो कि सिन्धु जाटों के गणतंत्र अध्यक्ष थे, से सहायता मांगी। महाराजा ने तीर-कमान और बर्छे धारण करने वाले सिन्धु जाट सैनिकों को उसकी सहायता के लिए ईरान भेज दिया। हेरोडोटस ने इस लड़ाई के सम्बन्ध में लिखा है कि “सिकन्दर की सेना के जिस भाग पर जेटा (जाट) लोग धावा बोलते थे, वही भाग कमजोर पड़ जाता था। ये योद्धा रथों में बैठकर तीर-कमानों से लड़ते थे। सिकन्दर को स्वयं इनके मुकाबले के लिए सामने आना पड़ा था।” इसी समय बलोचिस्तान में राजा चित्रवर्मा राज्य करता था जिसकी राजधानी कलात थी। (जाट इतिहास पृ० 695-696, लेखक ठा० देशराज)।
  • 3. जाटवीरों द्वारा महान् सम्राट् अकबर के आदेश को ठुकरा देने का अद्वितीय उदाहरण - सिन्धुवंशी जाट चंगा ने लाहौर से 15 मील दूर पधान नामक गांव बसाया था। फिरोजपुर जिले में दोलाकांगड़ा नामक गांव में धारीवाल जाटगोत्र का चौधरी मीरमत्ता रहता था। उसकी पुत्री धर्मकौर बड़ी बलवान एवं बहुत सुन्दर थी। एक बार सम्राट् अकबर दौरे पर उस मीरमत्ता के गांव के समीप से जा रहा था। उसने देखा कि मीरमत्ता की इस सुन्दर पुत्री ने पानी का घड़ा सिर पर रखे हुए अपने भागते हुए शक्तिमान् बछड़े को उसके रस्से पर पैर रखकर उस समय तक रोके रखा जब तक कि उसके वीरमत्ता ने आकर उस रस्से को न पकड़ लिया। अकबर यह दृश्य देखकर चकित रह गया। सम्राट् अकबर इस लड़की के बल एवं सुन्दरता को देखकर मोहित हो गया और चौधरी मीरमत्ता को उसकी इस पुत्री का अपने साथ विवाह करने का आदेश दे दिया। मीरमत्ता ने जाट बिरादरी से सलाह लेने का समय मांग लिया। सर लिपैन ने लिखा है कि “मीरमत्ता धारीवाल जाट ने 35 जाटवंशों (खापों) की पंचायत एकत्रित की जिसके अध्यक्ष जाट चंगा चौधरी थे। पंचायत ने

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-268


सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया कि अकबर बादशाह को लड़की नहीं दी जायेगी। यह प्रस्ताव लेकर चौधरी चंगा और मीरमत्ता अकबर के दरबार में पहुंचे। सिन्धु जाट चंगा ने निडरता व साहस से अकबर को पंचायत का निर्णय सुनाया कि जाट आप को लड़की नहीं देंगे। इस अद्वितीय उदाहरण तथा चंगी की निडरता से प्रभावित होकर अकबर बादशाह ने चंगा जाट को ‘चौधरी’ का खिताब (उपाधि) दे दिया और आपसी मेलजोल स्थापित किया।” चंगा के पुत्र को भी यह उपाधि रही। परन्तु चंगा के पौत्र देवीदास से हत्या के अपराध में जहांगीर बादशाह ने यह उपाधि छीन ली1। जिस सम्राट् अकबर के सामने सिर झुकाकर राजस्थान के बड़े-बड़े कई राजपूत राजाओं ने अपनी पुत्रियों का डोला उसको दे दिया, साधारण ग्रामीण जाटों ने उसके जाटलड़की के साथ विवाह करने के आदेश को ठुकरा दिया। यह है जाटवीरों की अद्वितीय विशेषता। इतिहास में कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिलेता कि जाटों व जाट शासकों ने अपनी पुत्रियों का विवाह किसी मुसलमान बादशाह या मुस्लिम व ईसाईधर्मी लोगों के साथ किया हो। मुसलमान बादशाहों के जाटों की सर्वखाप पंचायत के सामने झुकने के अनेक उदाहरण हैं, जो उचित स्थान पर लिखे जायेंगे।

ऋषिक-तुषार-मलिक

31. ऋषिक-तुषार-मलिक -

ऋषिकतुषार चन्द्रवंशी जाटवंश प्राचीनकाल से प्रचलित हैं। बौद्धकाल में इनका संगठन गठवाला कहलाने लगा और मलिक की उपाधि मिलने से गठवाला मलिक कहे जाने लगे। लल्ल ऋषि इनका नेता तथा संगठन करने वाला था। इसी कारण उनका नाम भी साथ लगाया जाता है - जैसे लल्ल, ऋषिक-तुषार मलिक अथवा लल्ल गठवाला मलिक।

रामायण में ऋषिकों के देश का वर्णन है। सीताजी की खोज के लिए सुग्रीव ने वानरसेना को ऋषिक देश में भी जाने का आदेश दिया। (वा० रा० किष्किन्धाकाण्ड सर्ग 41)।

ऋषिकतुषार वंश महाभारतकाल में अपने पूरे वैभव पर थे। ‘शकास्तुषाराः कंकाश्च’ (सभापर्व 51-31), वायुपुराण 47-44, मत्स्यपुराण 121-45-46, श्लोकों के आधार पर यह सिद्ध हुआ है कि चक्षु या वक्षु नदी जिसे आजकल अमू दरिया (Oxus River) कहते हैं, जो पामीर पठार से निकल कर उत्तर पश्चिम की ओर अरल सागर में गिरती है, यह तुषार आदि देशों में से ही बहती थी। यह तुषारों का देश गिलगित तक था। महाभारत, हर्षचरित पृ० 767 और काव्यमीमांसा आदि ग्रंथों में तुषारगिरि नामक पर्वत का वर्णन है जो कि बाद में हिन्दूकुश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तुषारगिरि नाम तुषार जाटों के नाम पर पड़ा। (महाभारत भीष्मपर्व, 9वां अध्याय) भारतवर्ष के जनपदों (देशों) की सूची में ऋषिक देश भी है। पाण्डवों की दिग्विजय के समय अर्जुन ने उत्तर दिशा के देशों के साथ ऋषिक देश को भी जीत लिया2 (सभापर्व 27वां अध्याय)। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में तुषार नरेश ने तलवारें, फरसे व सहस्रों रत्न भेंट किये (सभापर्व 51वां अध्याय)। परन्तु महाभारत युद्ध में तुषार सेना कौरवों की तरफ होकर लड़ी (सभापर्व 75वां अध्याय)।


1. भारत में जाट राज्य पृ० 309, उर्दू लेखक डा० योगेन्द्रपाल शास्त्री।
2. ऋषिक देश के राजा ऋषिराज ने अर्जुन से भयंकर युद्ध किया, किन्तु हारकर अर्जुन को हरे रंग के 8 घोड़े भेंट में दिये।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-269


महाभारत के पश्चात् चीनी इतिहासों में तुषारों और उनके पड़ौसी ऋषिकों को यूची या यूहेचि लिखा पाया गया है। इसका कारण सम्भवतः यह था कि ऋषिक तुषार दोनों वंशों ने सम्मिलित शक्ति से बल्ख से थियान्शान पर्वत, खोतन, कपिशा और तक्षशिला तक राज्यविस्तार कर लिया था। यह समय 175 ईस्वी पूर्व से 100 ईस्वी पूर्व तक का माना गया है। पं० जयचन्द्र विद्यालंकार ने अपनी पुस्तक ‘इतिहास प्रवेश’ के प्रथम भाग में पृ० 112-113 पर जो नक्शा दिया है, तदनुसार “ऋषिक तुषार तक्षशिला से शाकल (सियालकोट), मथुरा, अयोध्या और पटना तक राज्य विस्तार करने वाली जाति (जाट) सिद्ध होती है।” इस मत के अनुसार प्राचीन काम्बोज देश हजारों वर्षों तक तुषार देश या तुखारिस्तान कहलाता रहा। जिस समय भारतवर्ष में सम्राट् अशोक (273 से 236 ई० पूर्व) का राज्य था उस समय चीन के ठीक उत्तर में इर्तिश नदी और आमूर नदी के बीच हूण लोग रहते थे। इन हूणों के आक्रमणों से तंग आकर तत्कालीन चीन सम्राट् ने अपने देश की उत्तरी सीमा पर एक विशाल और विस्तृत दीवार बनवाई थी जो कि आज ‘चीन की दीवार’ के नाम से संसार के सात आश्चर्यजनक निर्माणों में से एक है। तब हूणों ने उस तरफ से हटकर ऋषिक तुषारों पर आक्रमण करने आरम्भ कर दिए। यह समय ईस्वी पूर्व 175-165 के मध्य का था। उधर हूणों ने चीन के पश्चिमी भाग पर चढाइयां प्रारम्भ कर दीं। हूणों को रोकने के लिए चीन के सम्राट् ने ऋषिक तुषारों की सहायता चाही। यह सन्देश लेकर चीन का प्रथम राजदूत ‘चांगकिएन’ चीन से चल पड़ा। परन्तु ऋषिक-तुषारों से मिलने से पहले ही मार्ग में हूणों द्वारा पकड़ा गया और बन्दी बनाया गया। 10 वर्ष हूणों के बन्दीगृह में रहने के बाद यह दूत ऋषिक-तुषारों के दल में पहुंच ही गया जो उस समय चीन के कानसू और काम्बोज के मध्य तारीम नदी के किनारे रहते थे। यह तारीम नदी आज के चीन के प्रान्त सिनकियांग (Sinkiang) में पश्चिम से पूर्व की ओर बहती है। चीन के इस सन्देश के मिलने पर ऋषिक तुषारों ने हूणों पर बहुत प्रबल आक्रमण किया और ईस्वी 127 से 119 तक के मध्य में हूणों को परास्त करके मंगोलिया को भगा दिया। इस प्रकार चीन-भारत की मैत्री का यही अवसर प्रथम माना जाता है। ऋषिक-तुषारों की इस प्राचीन आवास भूमि का नाम ‘उपरला हिन्द’ (Upper India) प्रसिद्ध है। उन दिनों इस समूह का धर्म बौद्ध और जीवन युद्धमय था। इन्हीं का प्रमुख पुरुषा ऋषिक-वंशज लल्ल ऋषि था। (जाटों का उत्कर्ष पृ० 332 लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री)।

तुषारों के विषय में यूनानी प्रसिद्ध इतिहासकार स्ट्रैबो (Strabo) के लेख अनुसार बी० एस० दहिया ने जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज पृ० 273 पर लिखा है कि तुषार लोगों ने बैक्ट्रिया (Bactria) प्रदेश पर से यूनानियों के राज्य को नष्ट कर दिया और उनको वहां से बाहर भगा दिया। ये अति प्रसिद्ध थे।

ले० रामसरूप जून ने जाट इतिहास अंग्रेजी पृ० 170 पर लिखा है कि “तुषारों का राज्य गजनी एवं सियालकोट दोनों पर था और इनके बीच का क्षेत्र तुषारस्थान कहलाता था।” यही लेखक जाट इतिहास हिन्दी पृ० 81 पर लिखते हैं कि “कठ और मलिक गणराज्यों ने पंजाब में सिकन्दर की सेना से युद्ध किया था।” परन्तु उस समय इन लोगों की पदवी ‘मलिक’ की नहीं थी जो कि उस आक्रमण के बाद इनको मिली। सम्भवतः ऋषिक-तुषारों ने सिकन्दर से युद्ध किया हो। इन चन्द्रवंशज ऋषिक-तुषार जाटवंशों का नाम गठवाला और मलिक पदवी कैसे मिली इसका


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-270


वर्णन निम्न प्रकार से है -

लल्ल गठवाला मलिक

हरयाणा सर्वखाप पंचायत के भाट हरिराम, गांव करवाड़ा जिला मुजफ्फरनगर की पोथी वंशावली के लेखानुसार संक्षिप्त वर्णन -

चन्द्रवंशी ऋषिक तुषारों के गणराज्य थे। इसी ऋषिकवंश में महात्मा लल्ल का जन्म हुआ था। यह प्रचण्ड विद्वान्, शूरवीर, बाल-ब्रह्मचारी और एक महान् सन्त था। यह ऋषिक-तुषारों का महान् पुरुष था1। यह बौद्धधर्म को मानने वाला था।

सम्राट् कनिष्क (ईस्वी 120 से ई० 162) कुषाण गोत्र का जाट महाराजा था जिसके राज्य में उत्तरप्रदेश, पंजाब, सिन्ध, कश्मीर, अफगानिस्तान, खोतान, हरात, यारकन्द और बल्ख आदि शामिल थे। यह सम्राट् बौद्ध धर्म के मानने वाला था। इसकी राजधानी पेशावर थी। इसने बौद्धों की चौथी सभा का आयोजन कश्मीर में कुण्डल वन के स्थान पर किया। इस सम्मेलन में देश-विदेशों से 500 बौद्ध साधु तथा अन्यधर्मी 500 पण्डित आये थे और बड़ी संख्या में जनता ने भाग लिया। इस सम्मेलन के सभापति विश्वमित्र तथा उपसभापति अश्वघोष साधु बनाये गये। महात्मा लल्ल भी इस सम्मेलन में धर्मसेवा करते रहे थे। इस अवसर पर लल्ल ऋषि को ‘संगठितवाला साधु’ की उपाधि देकर सम्मानित किया गया। इस लल्ल ऋषि ने ऋषिक-तुषारों का एक मजबूत संगठन बनाया जो लल्ल ऋषि की उपाधि संगठित के नाम से एक गठन या गठवाला संघ कहलाने लगा। अपने महान् नेता लल्ल के नाम से यह जाटों का गण लल्ल गठवाला कहा जाने लगा। यह नाम सम्राट् कनिष्क के शासनकाल के समय पड़ा था। सम्राट् कनिष्क महात्मा लल्ल को अपना कुलगुरु (खानदान का गुरु) मानते थे। महाराज कनिष्क ने महात्मा लल्ल के नेतृत्व में इस लल्ल गठवाला संघ को गजानन्दी या गढ़गजनी नगरी का राज्य सौंप दिया। यहां पर मुसलमानों के आक्रमण होने तक लल्ल गठवालों का शासन रहा।

इस तरह से अफगानिस्तान के इस प्रान्त (क्षेत्र) पर लल्ल राज्य की स्थापना हुई जो कि जाट राज्य था (लेखक)।

जाट इतिहास पृ० 717 पर ठा० देशराज ने लिखा है कि “गठवालों का जनतन्त्र राज्य गजनी के आसपास था। मलिक या मालिक इनकी उपाधि है जो इनको उस समय मिली थी जबकि ये अफगानिस्तान में रहते थे। इस्लामी आक्रमण के समय इन्होंने उस देश को छोड़ दिया था।” ठा० देशराज के इस मत से मैं (लेखक) सहमत हूँ। क्योंकि मुसलमानों से पहले अफगानिस्तान में कई छोटे-छोटे राज्य स्थापित थे जिनमें गठवाला वंश सबसे शक्तिशाली था। इन लोगों का दबदबा और प्रभाव दूसरे राज्यों पर था जिसके कारण इन्होंने गठवालों को मालिक मान लिया और मलिक उपाधि दी। इस तरह ये लोग लल्ल गठवाला मलिक कहलाने लगे।

इस लल्लवंश के दो भाग हो गये थे। एक का नाम सोमवाल पड़ा और दूसरा लल्ल गठवाला ही रहा। प्रतापगढ़ का राजा सोमवाल गठवाला हुआ है। सोमवाल गठवालों के 45 गांव हैं जिनमें से 24 गांव जि० सहारनपुरमुजफ्फरनगर में और 21 गांव जिला मेरठ में हैं। इनके अतिरिक्त कुछ गांव जि० हरदोई में भी हैं। (हरिराम भाट की पोथी)।


1. जाटों का उत्कर्ष पृ० 332 पर योगेन्द्रपाल शास्त्री ने लिखा है “लल्ल ऋषि का वंश ऋषिक था जो ऋषिक-तुषार दोनों ही इसको अपना महान् पुरुष मानते थे।”


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-271


उमैया (उमैयाद) वंश के मुसलमान बादशाहों (खलीफा) की उपाधि मलिक थी। इनकी राजधानी दमिश्क शहर में थी। अब्दुल अब्बास के नाम से प्रचलित अब्बासीवंश के बादशाहों ने संवत् 806 (749 ई०) में उमैयादवंश के खलीफा को हराकर राज्य ले लिया और दमिश्क शहर को आग लगाकर जला दिया। इन अब्बासी बादशाहों ने बग़दाद को अपनी राजधानी बनाया। इस वंश का राज्य 749 ई० से 1256 ई० तक रहा। जिसके अन्तिम खलीफा को चंगेज खां के पौत्र हलाकूखां ने युद्ध में मार दिया तथा बगदाद पर अधिकार कर लिया। इस तरह से खलीफा पद का अन्त हो गया। इस अब्बासी वंश का प्रसिद्ध बादशाह खलीफा हारुंरशीद संवत् 830 (773 ई०) में बगदाद का शासक था। उसका बेटा मामूरशीद संवत् 853 (796 ई०) में बगदाद का बादशाह बना। वह सं० 828 ई० में मर गया। उसके शासनकाल में अब्बासी मुसलमानों ने गजनी शहर पर आक्रमण करके उसे जीत लिया जिसकी राजधानी गज़नी थी (हरिराम भाट की पोथी)। इस प्रसिद्ध लल्ल गठवाला मलिकवंश का गजनी राजधानी पर शासन ईस्वी दूसरी सदी के प्रारम्भ से नवमी सदी के प्रारम्भ तक लगभग 700 वर्ष रहा।

गजनी पर मुसलमानों का अधिकार हो जाने से जो लल्ल गठवाले वहां रह गये वे मुसलमान बन गये और शेष गजनी छोड़कर सरगोधाभटिण्डा होते हुए हांसी (जि० हिसार) पहुंच गये और वहां पर हांसी के आस-पास अपना पंचायती राज्य स्थापित करके रहने लगे (हरिराम भाट की पोथी)।

जाटों का उत्कर्ष पृ० 332-333 पर योगेन्द्रपाल शास्त्री ने लिखा है कि -

“ऋषिक-तुषारों का दल जब जेहलम और चनाब के द्वाबे में आकर बसा तो इधर तुषार भाषा भेद से त्रिशर और शर के शब्दार्थ वाण होने से ये लोग तिवाण और तिवाणा कहलाने लगे। बौद्ध-धर्म के पतनकाल में भी बाद तक ये बौद्ध ही रहे और इस्लाम आने पर संघ रूप से मुसलमान बन गये। तुषारों का एक दल उपरोक्त द्वाबे के शाहपुर आदि स्थानों पर न बसकर सीधा इन्द्रप्रस्थ की ओर आ गया यहां इन्होंने विजय करके एक गांव बसाया जो आज विजवासन नाम से प्रसिद्ध है। यह हुमायूँनामे में लिखित है। यहां आज भी तुषार जाट बसे हैं। ये लोग यहीं से मेरठ में मवाना के समीप मारगपुर, तिगरी, खालतपुर, पिलौना और बिजनौर के छितावर गांवों में जाकर बस गये। हिन्दुओं में तिवाणा अभी भी जाटों में ही है। किन्तु इस वंश का वैभव मुसलमानों में ही देखा जा सकता है। इनके मलिक खिजरहयात खां तिवाणा को सम्मिलित पंजाब के प्रधानमंत्री पद की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। इनके शाहपुर जिले में सभी तिवाणा मुसलमान सम्पन्नता की दृष्टि से अत्यन्त वैभव प्राप्त हैं। ऋषिकों का दल तुषारों की तरह इस्लाम की ओर नहीं झुका यद्यपि मुग़लकाल में इन दोनों को ही मलिक की उपाधि दी गई थी। पश्चिमोत्तर भारत में जब इस्लाम फैलने लगा तब सामूहिक रूप से संगठित होकर ऋषिकों का यह दल झंग, मुलतान, बहावलपुर और भटिण्डा होते हुए हिसार में हांसी के पास देपाल (दीपालपुर) नामक स्थान पर अधिकार करके बस गया। इनके संगठन की श्रेष्ठता के कारण यह वंश संगठनवाला से गठवाला प्रसिद्ध हुआ।”

योगेन्द्रपाल शास्त्री जी का यह मत है कि मुस्लिमकाल में ऋषिकों का दल संगठनवाला से


1. जाटों का उत्कर्ष पृ० 332 पर योगेन्द्रपाल शास्त्री ने लिखा है “लल्ल ऋषि का वंश ऋषिक था जो ऋषिक-तुषार दोनों ही इसको अपना महान् पुरुष मानते थे।”


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-272


गठवाला हांसी क्षेत्र में प्रचलित हुआ और मुगलकाल में ऋषिक और तुषार दोनों को मलिक की उपाधि दी गई थी, कोई विशेष प्रमाणित बात नहीं है जितना कि हरिराम भाट की पोथी का लेख है। इसी पोथी के लेख का समर्थन ले० रामसरूप जून ने अपने जाट इतिहास पृ० 81 पर इस तरह किया है -

तुषारों के सेनापति की पदवी लल्ल थी। इनका मित्र ऋषिक दल था। इनकी राजधानी गजनी थी। इनकी पदवी लल्ल-मलिक थी। मलिक गठवालों का राजा सभागसैन गजनी से निकाला जाने के पश्चात् ये लोग मुलतान, पंजाब में सतलुज नदी के क्षेत्र; भावलपुर में रहकर हांसी (हरयाणा) के पास दीपालपुर में आकर बस गये और उस नगर को अपनी राजधानी बनाया। कुतुबुद्दीन ऐबक ने इनको वहां से निकाल दिया। तब मलिक दल रोहतकमुजफ्फरनगर जिलों में आ बसा।”

ठा० देशराज के लेख अनुसार, जैसा कि पिछले पृष्ठ पर लिख दिया है, गठवालों को मलिक की पदवी अफगानिस्तान में मिली थी। हमारा विचार भी यही है कि सम्राट् कनिष्क के शासनकाल के समय ईसा की दूसरी सदी में लल्ल ऋषि ने तुषार-ऋषिकों का संगठन किया जो गठवाल कहलाया और लल्ल ऋषि के नाम पर लल्ल गठवाला कहलाये। गजनी का राज्य मिलने पर इनकी पदवी ‘मलिक’ हुई। इन मलिक गठवालों को मुगल बादशाहों ने नहीं, किन्तु इब्राहीम लोधी ने भी इनको मालिक या मलिक मान लिया जो कि इनकी प्राचीन पदवी थी। इसका वर्णन अगले पृष्ठों पर किया जायेगा। (लेखक)

“वाकए राजपूताना” के लेख अनुसार ये गठवाला मलिक हांसी के पास दीपालपुर राजधानी पर बहुत समय तक राज्य करते रहे। इनके यहां पर प्रजातन्त्र राज्य की पुष्टि अनेक इतिहासज्ञ करते हैं। सन् 1192 ई० में मोहम्मद गौरी ने दिल्ली के सम्राट् पृथ्वीराज चौहान को तराइन के स्थान पर युद्ध में हरा दिया और दिल्ली पर अधिकार कर लिया। मोहम्मद गौरी ने अपने सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक को दिल्ली का शासन सौंप दिया और स्वयं गजनी लौट आया। इस समय दीपालपुर पर गठवालों का नेता जाटवान मलिक था। हरिराम भाट की पोथी में इस जाटवान को गठवाला मलिक लिखा है।

जाटवान -

जाट इतिहास पृ० 714-715 पर ठा० देशराज ने जाटवान के विषय में लिखा है कि “यह रोहतक के जाटों का एक प्रसिद्ध नेता था। कुतुबुद्दीन ऐबक के विरुद्ध जाटों ने विद्रोह कर दिया। क्योंकि ये पृथ्वीराज के समय अपने देश के स्वयं शासक थे और पृथ्वीराज को नाममात्र का राजा मानते थे। जाटों ने एकत्र होकर मुसलमानों के सेनापति को हांसी में घेर लिया। वे उसे भगाकर अपने स्वतन्त्र राज्य की राजधानी हांसी को बनाना चाहते थे। इस खबर को सुन कर कुतुबुद्दीन सेना लेकर रातों-रात सफर करके अपने सेनापति की सहायता के लिए हांसी पहुंच गया। जाटों की सेना के अध्यक्ष जाटवान ने शत्रु के दोनों दलों को ललकारा। ‘तुमुल समीर’ के लेखक ने लिखा है कि दोनों ओर से घमासान युद्ध हुआ। पृथ्वी खून से रंग गई। बड़े जोर के हमले होते थे। जाट थोड़े थे फिर भी वे खूब लड़े। कुतुबुद्दीन स्वयं घबरा गया। जाटवान ने उसको निकट आकर नीचे उतरकर लड़ने को ललकारा। किन्तु कुतुबुद्दीन ने इस बात को स्वीकार न किया। जाटवान ने अपने चुने हुए बीस साथियों के साथ शत्रुओं के गोल में घुसकर उन्हें तितर-बितर करने की चेष्टा की। कहा जाता है जीत मुसलमानों की रही। किन्तु उनकी हानि इतनी हुई कि वे


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-273


रोहतक के जाटों का दमन करने के लिए जल्दी ही सिर न उठा सके।” (जाट इतिहास पृ० 16-17 पर लेखक कालिका रंजन कानूनगो ने भी ऐसा ही लिखा है)।

हरिराम भाट की पोथी अनुसार लल्ल गठवालों ने जाटवान मलिक के नेतृत्व में मुसलमानों पर धावा किया। यह भयंकर युद्ध तीन दिन और तीन रात चला जिसमें जाटवान शहीद हुआ। जाट इतिहास पृ० 16-17 लेखक कालिकारंजन कानूनगो के अनुसार हरयाणा के जाटों ने एक योग्य नेता जाटवान के नेतृत्व में इस युद्ध में भाग लिया।

जाटवान के बलिदान होने पर लल्ल गठवालों ने हांसी को छोड़ दिया और दूसरे स्थान पर आकर गोहाना के पास आहुलाना (हलाना), छिछड़ाना आदि गांव बसाये। वीर जाटवान के बेटे हुलेराम ने संवत् 1264 (सन् 1207 ई०) में ये गांव बसाये। (हरिराम भाट की पोथी)।

आज लल्ल गठवाला मलिकों के 42 गांव जि० रोहतक-सोनीपत में, जि० मुजफ्फरनगर में 52 गांव, जि० जीन्द में 12 गांव, जि० हिसार में 7, जि० मेरठ में 3 गांव हैं। यू० पी० के कई जिलों में मलिकों के बहुत गांव हैं।

यह पिछले पृष्ठों पर लिख दिया है कि इन लल्ल गठवाला मलिकों के रक्तभाई सोमवाल गठवालों के 45 गांव उत्तरप्रदेश के कई जिलों में हैं। पाकिस्तान में मुसलमान जाट मलिकों की बड़ी संख्या है। जिला रोहतक में मलिकों के गांव मोखरा (आधा) (सिक्ख जाटों में भी मलिकों की संख्या है।) गांधरा, कहरावर, Karorकारोर]], अटाल और डाबोदा खुर्द है। जि० सोनीपत की गोहाना व सोनीपत तहसीलों में गठवाला मलिकों के मुख्य-मुख्य गांव ये हैं -

आहुलाना, छिछड़ाना, मदीना, रूखी, खानपुर, गामड़ी, जसराना, बीधल, भैंसवाल, रिबड़ाण, माहरा (ठसका), दोदवा, सर्गथल, मिर्जापुर खेड़ी, ईसापुर खेड़ी, बिलबिलान, आंवली, रिवाड़ा आदि गांव तहसील गोहाना में हैं। पिनाना, तिहाड़, सालारपुर माजरा, महमूदपुर माजरा, तेवड़ी, सरढाना, पुगथला, भटाना, माहरा, डबरपुर, भगान, पीपली खेड़ा, तुराली आदि गांव तहसील सोनीपत में हैं।

जि० करनाल में उग्राखेड़ी, सींख, पाथरी, रिसालू, निम्बली, कुटानी, राजाखेड़ी, बुवाना लाखू आदि 20 गांव, जि० हिसार में उमरा सुलतान आदि 7 गांव मलिकों के हैं। यहीं से जाकर पीलीभीत में ऐमी, बरेली में सलथा, तिलमाची, दौलतपुर, टाण्डा आदि गांव बसे। ये अपने जड़िया नामक पूर्वज से जड़िया मलिक कहलाते हैं। बिजनौर में गाजीपुर, सुन्दरपुर, रावणपुर, धौकलपुर, मीरपुर, रैंहटी, मुरादाबाद में लोदीपुर, मेरठ में हिसावदा, कसरैली, पसवाड़ा आदि गांव गठवाला मलिकों के हैं। जि० रोहतक के कहरावर गांव के चौ० फूलसिंह मलिक ने यहां से जाकर जि० मेरठ में यह हिसावदा गांव बसाया था।

ऋषिक तुषारवंश के शाखा गोत्र - 1. गठवाला-मलिक 2. सोमवाल 3. जड़िया

लल्ल गठवाला मलिक वंश सौन्दर्य और शारीरिक गठन व सामाजिक संगठन की दृष्टि से प्राचीन आर्यों के सच्चे स्मारक हैं। आजकल ये लोग गोहाना और सोनीपत तहसीलों में संघ रूप से बसे हुए हैं। प्राचीन जनपदों के सुन्दर उदाहरणस्वरूप इस वंश के इन गांवों के बीच अन्य


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-274


किसी वंश का कोई गांव नहीं है। ये लोग पहले ही आर्य (श्रेष्ठ) विचारों के थे। किन्तु ऋषि दयानन्द के आह्वान पर सभी संघ रूप से आर्यसमाजी भी हो गए। इसी वंश में सोनीपत तहसील के माहरा गांव में भक्त फूलसिंह नामक एक परम सन्त उत्पन्न हुए जिन के प्रभाव और परिश्रम से इधर गुरुकुल शिक्षाप्रणाली के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ। भक्त फूलसिंह ने 23 मार्च 1920 ई० में गुरुकुल भैंसवाल और सन् 1936 ई० में कन्या गुरुकुल खानपुर की स्थापना की जिस का संचालन आप की पुत्री श्रीमती सुभाषिणी देवी कर रही है। इन गुरुकुल संस्थाओं ने ग्रामीण जनता को सत्शिक्षा की ओर प्रवृत्त किया। भक्त फूलसिंह जी की जीवनी विस्तार से अन्तिम पृष्ठों पर लिखी जायेगी।

गठवाला मलिक वंश में चौ० गिरधरसिंह मलिक थे जो सारे गठवालों में दादा के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनका निर्णय सारी खाप को सर्वमान्य था। इनके पुत्र जमुनासिंह मलिक थे जिन की आज्ञाओं का पालन यमुना नदी पार तक पूज्यभावों से किया जाता था। चौ० जमुनासिंह मलिक दादा के पुत्र चौ० घासीराम मलिक एम०एल०सी० थे। आप को ब्रिटिश शासनकाल में राज्य और प्रजा दोनों में महान् आदर प्राप्त हुआ। सरकार की ओर से आप को राव बहादुर की पदवी दी गई। आप भी सब मलिकों के 'दादा' कहे जाते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य जाट व दूसरी जाति के लोग इनको दादा घासीराम कहकर पुकारते थे। दादा घासीराम मलिक के पुत्र मातूराम भी मलिकों के 'दादा' कहे जाते थे। आज आप के पुत्र चौ० भल्लेराम मलिकों 'दादा' कहे जाते हैं। दीपालपुर से आकर रोहतक-सोनीपत में मलिकों ने जब से निवास किया, तब से आहुलाना गांव गठवाला मलिकों की खाप का प्रधान गांव रहता आया है और आज भी है। उपर्युक्त 'दादा' कहे जाने वाले महान् पुरुष इसी गांव के निवासी थे।

ट्राइब्स एण्ड कास्ट्स आफ दी नार्थ वेस्टर्न प्राविन्सेज एण्ड अवध के लेखक मि० डब्ल्यू क्रुक साहब ने लिखा है कि “मलिक गठवालों का मुख्य स्थान आहुलाना था। इनके पड़ौसी राजपूतों से निरन्तर युद्ध होते रहे जिनमें ये सफल हुये। इसलिये अन्य जाटों ने इनको ‘प्रधान’ मान लिया। दिल्ली के बादशाह ने मंदहार (मिडाण) राजपूतों को दबाने के लिये इनको सहायतार्थ बुलाया था। विजयी होने पर इन्हें मलिक की उपाधि दी गई। एक बार धोखे से मन्दहारों ने उन्हें बुलाकर बारूद से उड़ा दिया। बचे हुए ये लोग हांसी के पास दीपालपुर चले गये और उसको अपनी राजधानी बनाया।” (जाट इतिहास पृ० 717 पर ठा० देशराज ने क्रुक साहब का हवाला दिया है)।