Nishchal Das

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Swami Nishchal Das (1791-1863)

Saint Nishchal Das (1791-1863) was born in village Kirohli District Rohtak in a prominent family of Dahiya Gotra in year 1791.

Interest in learning Sanskrit

He was a promising boy and as he grew up his interest in learning Sanskrit, developed and he proceeded to Kashi for Sanskrit learning. But according to the rules of Dharam Shashtra in those days, non-Brahmins were not allowed admission in the Sanskrit Vidayala. The young boy disguised himself as a Brahmin's son and got admission for learning Sanskrit there. He declared his name as Nishchal Das.

Curse by Guru

The Guru was kind enough to this boy due to his brilliancy, as he was the best student in his class. When Nishchal Das completed his studies, he went to his 'Guru' to say 'Good Bye' and for his blessings. At the time of his farewell the Guru asked him to marry his daughter. Nishchal Das showed his reluctance on the plea that he considered the Guru's daughter equivalent to his sister. The 'Guru' was not convinced. At last Nishchal Das had to reveal that he was a JAT by caste and not the son of Brahmin. The Guru remarked in anger, "The sin of educating a JAT lies on my head". He further cursed Nishchal Das; "May thou suffer incurable fever for ever".

A Remarkable Saint and philosopher

Nishchal Das became a remarkable Saint and exposed the wrong dogmas of Puranic Mat. He wrote a new philosophy book 'BICHAR SAGAR' which is considered as a comprehensive book on Vedic literature. On this account Sant Nishchal Das is counted amongst fore-ranking philosophers. The granthas written by him are:

  • Vriti Prabhakara (वृत्ति प्रभाकर)
  • Vichara Sagara (विचार सागर)
  • Yukti Prakasha (युक्ति प्रकाश)
  • Tatva Siddhanta (तत्त्व सिद्धांत)

महात्मा निश्चलदास जी का जीवन परिचय

ठाकुर देशराज जाट इतिहास में लिखते हैं कि महात्मा निश्चलदास जी महात्मा तो थे ही, साथ ही वह संस्कृत के ऊंचे विद्वान भी थे। वह वे वेदान्ती थे, वेदान्त पर की उनकी टीका बहुत प्रसिद्व है। कहा जाता है - जब संस्कृत पढ़ने के लिए वे काशी जा पहुंचे तो उन्हें बड़ी कठिनाई उठानी पड़ी। वहां ब्राह्मणों के लिए शिक्षा सम्बन्धी विशेष सुविधाएं हैं। निश्चलदासजी का दृढ़ निश्चय था कि वे संस्कृत पढ़ें। आखिर उन्हें अपने को जाट के बजाय ब्राह्मण बताना पड़ा। उन्होंने काशी में सारे शास्त्रों का अध्ययन किया। जब संस्कृत के प्रकांड पडित हो गए, तब आपने राजस्थान में अपने सिद्धान्तों


1.मुरक्क-ए-अलवर पृ. 67।


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-612


का प्रचार करना आरम्भ किया। दादू पंथ का राजस्थान में विशेष जोर है। बूंदी के महाराज रामसिंहजी ने महात्मा निश्चलदासजी को अपने यहां बुलाकर अपने यहां के विद्वानों से शास्त्रार्थ कराया। निश्चलदासजी की विजय हुई। बूंदी दरबार में दिन में भी दादू संतों के कहने से मशालें जला करती थीं। महात्मा निश्चलदासजी ने उस पाखंड को हटवाया। निश्चलदासजी के विचारों का लोगों पर इतना जबरदस्त असर पड़ा कि आर्य-समाज के उपदेशकों को उनके प्रभाव के घटाने के लिए ‘निश्चलदास की मति जो बौरानी’ आदि बेढंगी, कविता की रचना करनी पड़ी। उनके समकालीन लोग उन्हें संस्कृत का बृहस्पति कहा करते थे।


ठाकुर देशराज [1] ने लिखा है ...महात्मा निश्चलदास जी - पिछले समय में यह एक प्रसिद्ध साध हुए हैं। यह वेदांती थे। शास्त्रार्थों की इन्होंने धूम मचा दी थी। उनका लिखा हुआ विचारचंद्रिका ग्रंथ वेदांत का अपूर्वग्रंथ समझा जाता है। बूंदी के महाराज ने उनकी विद्वता की प्रशंसा सुनकर बूंदी बुलाया और वहां दादूपंथ के पंडितों से शास्त्रार्थ कराया। जिसमें ये विजयी हुए। अपने समय के ऐसे प्रकांड विद्वान थे कि लोग उन्हें बृहस्पति का अवतार समझते थे।

Also see

Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter III (Page 215-216)

References


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