Jat Itihas (Utpatti Aur Gaurav Khand)/Parishisht

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जाट इतिहास (उत्पत्ति और गौरव खंड), 1937, लेखक: ठाकुर देशराज

परिशिष्ट 1-4

परिशिष्ट प्रकरण-1:रस्म-रिवाज स्वभाव और चरित्र संबंधी कुछ विशेषताएं

परिशिष्ट प्रकरण-1: रस्म-रिवाज स्वभाव और चरित्र

इतिहास नहीं लिखाये: अपनी कीर्ति और प्रभावोत्पादक बातों से गाथाओं से चिरजीवित रखने की प्रवृत्ति की ओर से उदासीन और विरोधियों के आक्षेपों से लापरवाह रहने वाली इस जाट जाति के संबंध में यह ख्याल करना कि इसकी कोई प्रशंसा करने वाला भी मिल सकेगा असंभव सी बात दिखाई देती है। 'मथुरा मेमोयर्स' के लेखक ग्राऊज साहब को तो इस बात पर झुंझलाहट भी आई थी कि जाटों ने अपनी कीर्ति को अमर बनाए रखने के लिए इतिहास क्यों नहीं लिखाये। वे पुराने आर्यों की भांति किसी के द्वारा इस संबंध की चर्चा करने पर कहते थे, "हमारा चरित्रवान बनना ही इतिहास है"। वास्तव में यदि वे राजपूतों की तरह चारण और भाट रखते तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की क्षत्रिय जातियों में उनका इतिहास सबसे बड़ा होता और अब भी कोई जाटों के इतिहास की खोज का कार्य आरंभ कर दे तो उसे इस प्रकार की अभूतपूर्व सामग्री प्राप्त होगी जो भारतीय इतिहास में आश्चर्य की चीज समझी जाएगी। अस्तु!

देशी-विदेशी इतिहासकारों के मत

[पृ.158]: यहां हम कुछ थोड़े से देशी-विदेशी इतिहासकारों के मत जाटों के स्वभाव और चरित्र के संबंध में उद्धृत करते हैं।

"जाट नामक जाति में कुछ बातें अभी तक प्राचीन चंद्रवंशी क्षत्रियों अर्थात कौरव पांडव से टक्कर खाती हैं। .....(धर्म इतिहास रहस्य)

"जाट और लुहानों ने अपनी (क्षत्रियोचित) के लड़ाकू प्रवृत्ति को अब तक कायम रखा है! हालांकि कट्टर हिंदुत्व ने उन्हें गिराने की भरपूर कोशिश की है।" ......(हिस्ट्री ऑफ मिडीवल हिन्दू इंडिया)

"रक्त में जाट परिवर्तन किए राजपूत से न अधिक है और न कम किंतु अदल-बदल है। राजपूत अगर प्राचीन धर्म का पालन करे तो जाट हो सकता है। .....(मि. आर्जिलेथम का एथनोलोजी ऑफ इंडिया)

"जाटों में योग्यता की बनिस्पत चालाकी और धूर्तता बहुत ही कम होती है। कहा जाता है कि वे स्वामी भक्त और साहसी होते हैं। अपने रीति रस्मों पर दृढ़ता से चलने वाले होते हैं। उनका शरीर स्फूर्तिवान और सुगठित होता है। .....(डॉक्टर विररेटन साहब)

"जाटों में आज भी एक अल्हड़पन से युक्त वीरता और भोलेपन से मिश्रित उद्दंडता विद्यमान है। उन्हें प्रेम से वश में लाना जितना सरल है आंखें दिखाकर दबाना उतना ही कठिन


[पृ.159]: है। सामाजिक तथा धार्मिक दृष्टि से वे अन्य हिंदुओं की अपेक्षा अधिक स्वाधीन हैं और सदा रहे हैं। लड़ना उनका पेशा है। मनमानी करने में और अपनी आन की खातिर में अपना घर बिगाड़ देना या जान को खतरे में डाल देना जाट की विशेषता है।".... (मुगल साम्राज्य का क्षय और उसके कारण)

"शाकद्वीप और स्कंदनाभ के जाट योद्धाओं के मरने पर उनके प्यारे घोड़े भी उन्हीं के साथ दफना दिए जाते थे।" ....(हेरोडोटस)

"किसी प्रदेश को जीत लेने के बाद जाट लोग विजयोत्सव मनाते थे और इसमें शस्त्र की पूजा करते थे।" ....(टसीटस)

"जाट सच्चे भारत पुत्र हैं जिन्होंने मालवा और राजपूताना को पंजाब से जाने के पहले अपने पुरुषों का घर बतलाया था। वे खेती करने और तलवार चलाने में एक बराबर दिलचस्पी रखते हैं और यहां तक उन्नति की है कि मेहनत और हिम्मत में हिंदुस्तान की कोई अन्य कौम इनके बराबर नहीं है। डील-डौल में वे राजपूतों और खत्रियों से समानता रखते हैं और भारत के पुराने आर्यों से बहुत मिलते जुलते हैं। इनका कद अधिकतर लंबा होता है। रंग सफेद आंखें काली मुंह पर बाल अधिक सर लंबा और नाक नुकीली होती है।.... पंजाब की तमाम क़ौमों से यह कौम बहुत उतावल और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता चाहने वाली होती है।....एक जाट करता वही है जिसे वह ठीक समझता है। वह स्वतंत्र और खुद पसंद है।


[पृ.160]: जाटों की समस्त उपजातियां बराबर हैं। बगैर किसी भेदभाव के अपने बड़े भाई की विधवा से शादी कर लेते हैं जो कि उनके असली क्षत्रिय कहानी का सबूत है। यह प्रथा वैदिक काल की तीन बड़ी बड़ी जातियों में प्रचलित थी।

सुल्तान महमूद गजनवी या नादिर शाह या अहमद शाह अब्दाली किसी के साथ उनके किए गए संघर्ष की ओर नजर डालिए। हर एक से और हर जमाने में उनके चरित्र का पता चलता है। बड़े-बड़े विजेता की दिल दहला देने वाली तारीफ सुनकर उससे न डरना और बाद में हो जाने वाले नुकसान का ख्याल नहीं कर के भागते हुए दुश्मन को खदेड़ते चले जाना, लड़ाई में शत्रु से घिर जाने पर पूर्ण धैर्य धारण करना और अद्वितीय गंभीर साहस का परिचय देना, युद्ध क्षेत्र में हार जाने पर आने वाली अतितियों का तनिक भी ख्याल न रखना और अपने दुश्मन की निर्णय तलवार के सिखाए हुए सबकों को बहुत जल्दी भूल जाना आदि बातें जाटों के चरित्र का मुख्य अंग हैं।"..... (प्रोफेसर कालिका रंजन कानूनगो)

"जाट भारतीय राष्ट्र की रीढ़ हैं। भारत मां को इस साहसी वीर जाति से बहुत बड़ी आशाएं हैं।.... (पंडित मदनमोहन मालवीय "पुष्कर का भाषण")

"एक शब्द में इतना कह देना जरूरी है कि पंजाब में खालसा राज्य स्थापित करके सीमा प्रांत की तमाम पठान


[पृ.161]: जातियों को अपने काबू में करना और अफगानिस्तान के पठानों को कई दफे हरा देना जो कि हिंदू जाति के इतिहास में एक अचंभा समझा जाता है। जाट जाति के वीरों का ही काम था। मैं यह कहना चाहता हूं कि इस देश में क्षत्रीय के कर्तव्य को जाटों ने यदि राजपूतों से बढ़कर नहीं तो कम भी पालन नहीं किया है।.... (भाई परमानंद तारीख पंजाब)

"जितनी बार भी मैंने भारत पर हमला किया, पंजाब के दुर्दांत जाटों ने हमारी फौज का मुकाबला किया। लड़ाई के समय हर बार वे निडर दिखाई दिए।..... (अहमद शाह अब्दाली)

"जाट सच्चे क्षत्रिय हैं। हमने जर्मन महासमर के समय उनकी वीरता को देख लिया है। वह मैदान में मरना जानते हैं। अंग्रेज सरकार की ओर से उनकी पलटन को रॉयल का खिताब मिला था। मैं यह भी कहता हूं कि जाट बहादुर के साथ ही सच्चे और ईमानदार भी होते हैं। वह दगा नहीं करते मैंने स्वयं कुछ जाटों को परखा है।..... (एफ़एस यंग आईजी पुलिस जयपुर)

परिशिष्ट प्रकरण-2: गौरवपूर्ण गाथाएं

1. राजा शिव

1. राजा शिव - पेशावर से उत्तर उद्यान में इनका राज्य था। यह शिव जाति के प्रजातंत्र के अध्यक्ष थे। हिंदू पुराणों में इनके संबंध में कथा है कि यम और इंद्र इनके दान की प्रशंसा सुनकर इनके पास जांचने के लिए कबूतर और बाज बन कर गए थे। कबूतर झपटकर महाराज की गोद में बैठ गया। बाज ने कहा महाराज यह तो मेरा आहार है। या तो इसे छोड़ो या अपने शरीर से इस के बराबर काटकर गोस्त दो। महाराज ने कहा यह तो मेरा शरणागत है। मेरे शरीर का मांस ले लो। तराजू के एक पलड़े में कबूतर को बैठा दिया गया। राजा ने सारे शरीर का मांस चढ़ा दिया फिर भी कबूतर के बराबर न हुआ। तब राजा स्वयं एक पलड़े में बैठ गए। इस पर इंद्र ने स्वयं प्रकट होकर राजा को स्वस्थ कर दिया बौद्ध ग्रंथों में भी इन महाराज के दान की बड़ी प्रशंसा की गई है।

2. वोडेन - यह उद्धव वंशी जाट थे। इनके नायकत्व में ईसा से 500 वर्ष पूर्व है जाटों ने ईरान के असीरिया से उठकर स्केंडिनेविया में प्रवेश किया था। स्कंदनाभ के धर्म ग्रंथ एड्डा में इनका नाम ओडिन लिखा हुआ है। जाटों से पहले के वहां के


[पृ.163]: निवासी मृतक लोगों को जलाते नहीं थे किंतु गाड़ देते थे। बोधेन ने उन लोगों को शिक्षा देकर जलाने की प्रणाली जारी करा दी थी। बोधेन की सेना में एक बलदार नाम का सरदार था वह लड़ाई में काम आ गया। बलदार की स्त्री का नाम नन्ना देवी था। वह अपने पति के साथ सती हो गई थी।

3. तोमऋषि - यह आक्सस नदी के दक्षिणी हिस्से पर राज्य करते थे। ईसा से 600 वर्ष पहले भारत के प्रसिद्ध राजा साइरस ने खुरासान के पूर्वी हिस्से पर इनकी लड़ाई हुई थी। जिसमें सायरस को मुंह की खानी पड़ी और फिर वह वापस लौट गया तोमऋषि की राजधानी भी उद्यान थी। इससे मालूम होता है यह भी शिव गोत्री थे।

4. चंद्रापीड - यह पंजाब के मालवा देश के पड़ोसी चोलिस्तान के क्षेत्र के लोगों में पैदा हुए थे। संस्कृत के प्रसिद्ध ग्रंथ कादंबरी में इनका विस्तृत वर्णन दिया हुआ है। इनका विवाह उद्यान के शिव लोगों में ही हुआ था।

5. एलऋषि - इन्हें यूनानी लेखकों ने एलरिक लिखा है। उन्होंने ईस्वी सन 400 के आसपास ज्ञात (गाथ) लोगों के एक बड़े समूह के साथ कुस्तुनतुनिया पर चढ़ाई की थी किंतु परकोटे की सुदृढ़ दीवारों से इनका वश नहीं चला। अतः मिलन पर चढ़ाई की किंतु यहां वंडाल लोग रोम के बादशाह की मदद पर खड़े हो गए। इसलिए इस युद्ध में एलरिक की हार हुई किंतु एलरिक हताश होने वाले योद्धाओं में न था। उसने 408


[पृ.164]: ई. में दुबारा चढ़ाई की। बादशाह ने कुछ वायदे उससे ऐसे किए जिससे एलरिक ने घेरा उठा लिया। किंतु तीसरी बार एलरिक को बादशाह की बेईमानी के कारण इटली पर चढ़ाई की। दुर्भाग्य से बीमारी के फैलने के कारण एलरिक का देहांत हो गया। तब अतुलपाश जिससे कि यूनानियों ने अटाल्फ़स लिखा है ने ज्ञात (गाथ) एक लोगों की कमान संभाली। बहादुर जाट इस वीरता से अबकी बार लड़े की बादशाह को उनसे संधि करनी पड़ी। इस संधि के अनुसार रोम के बादशाह अतुलपास को अपनी लड़की व्याह दी।

6. देवऋषि* - इनको यूनानियों ने थिओडेरिक नाम से याद किया है। इन्होंने 489 ईसवी में इटली के तत्कालीन बादशाह है ओडोवकर पर चढ़ाई की थी। 4 वर्ष तक लड़ाई चलती रही। अंत में बादशाह ने आधा राज्य जाटों को बांट दिया। थोड़े दिन बाद देवऋषि ने बादशाह को मरवा कर सारे इटली पर कब्जा कर लिया। इटली का बादशाह होते ही देवऋषि ने प्रजा सुधार के कार्य आरंभ कर दिए। बाग-बगीचे सड़क और नहर में नगरों की मरम्मत कराई। रोमन लोगों को ऊंची ऊंची नौकरियां दी। उनके राज्य से रोम की जनता इतनी खुश हुई कि यह कहती थी कि यह लोग पहले से ही क्यों न आ गए। 33 वर्ष के राज्यकाल में


* याद रहे कि इन लोगों के नामांकन में ऋषि शब्द रहने के कारण एशिया में यह लोग ऋषिक कहलाने लग गए थे।


[पृ.165]: देव ऋषि ने रोम को कुबेरपुरी बना दिया था। इतने अच्छे बहादुर और उदार राजा की 526 ई. में मृत्यु हो गई।

7. कनिष्क

मथुरा में कनिष्क की मूर्ति

7. कनिष्क - यह कुषाण वंशी जाट थे। ईसा की पहली शताब्दी में इनका राज्य पेशावर में था इनके राज्य का विस्तार उत्तरी पश्चिमी भारत में विंध्याचल तक था। उद्यान, कंधार, तक्षशिला, सीतामढ़ी आदि अनेक नगर उनके राज्य के प्रसिद्ध नगर थे। कश्मीर में उन्होंने अनेक बौद्ध मठ और स्तूप बनवाए थे। उन्होंने चीनी, तुर्किस्तान, कासगर, यारकस्न्द और खुतन प्रदेशों को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया था। मिस्टर स्मिथ ने लिखा है कि कनिष्क के अधीनस्थ महाराष्ट्र में क्षहरात, नहपान और उज्जैन में चिस्टान क्षत्रप अर्थात वायसराय थे। बौद्ध लोग कनिष्क को दूसरा अशोक कहकर याद करते थे। कनिष्क को 'महाराज राजाधिराज देवपुत्र' की उपाधि थी। सिक्कों पर शिवजी का चित्र रहता था। महाराज कनिष्क सिकंदर की भांति महत्वाकांक्षी थे

8. शालेन्द्र - यह पंजाब के स्यालकोट में राज करते थे। इनका राज्य उत्तर पश्चिम में तक्षशिला तक और दक्षिण में मालवा तक फैला हुआ था। कर्नल टाड को इनकी प्रशंसा की एक लिपि मिली थी।

सोंधनी, मंदसौर स्थित यशोधर्मन का विजय स्तम्भ

9. शालिवाहन - ये भी साकला नगरीस्यालकोट में राज्य करते थे। भाटी लोग इन्हीं के संतान के हैं।


[पृ.166]

10. हर्ष - इन्होंने कुरुक्षेत्र के थानेश्वर को अपनी राजधानी बनाया था। यह बौद्ध धर्म के अंतिम जाट सम्राट थे। इनके खानदान के वैसोरा जाट हैं। मौखरी जाटों से इनकी घनिष्ठ मैत्री थी।

11. यशोधर्म - यह मंदसौर में राज्य करते थे। वहां पर इनका स्तूप है। इनके पिता का नाम विष्णुवर्धन था। इनका राज्य मंदसौर से लगाकर बयाना तक था। बयाना में भी एक लाट है वह महाराजा विष्णुवर्धन की स्थापना की हुई है। यह वरिक गोत्र के जाट थे। महाराजा यशोधर्मन ने प्रबल आक्रांता हूणों को कई बार खदेड़ा था और अपनी जिंदगी में उन्हें कश्मीर से नीचे नहीं उतरने दिया। अजय जर्टो हूणान इनकी लड़ाइयों के कारण प्रसिद्ध हुआ था। लोग इन्हें दूसरा विक्रमादित्य समझते थे।

12. महाराजा रणजीतसिंह

महाराजा रणजीतसिंह

12. महाराजा रणजीतसिंह - यह शशि खानदान के सिख जाट थे। सन 1830 ई. तक सारे पंजाब पर इन्होंने कब्जा कर लिया था। इन्हें पंजाब केसरी के नाम से याद किया जाता है। वास्तव में यह भारत के नेपोलियन थे। यदि भारत में अंग्रेज़ नहीं आए होते तो सारे भारत और अफगानिस्तान पर इनकी विजय पताका लहराई होती।

सन 1835 ई. में फ्रांस के बादशाह की ओर से तौहफ़े आए थे। इसी वर्ष जर्मनी से हांगवर्गर, अमेरिका से हारेंस, नेपाल से राजदूत किशनचंद और तिब्बत नरेश के


[पृ.167]: लघु भ्राता भीमकाल महाराज से मुलाकात करने के लिए आए थे। इससे उनके प्रताप का परिचय सहज ही मिल जाता है। उनके यहां की प्रसिद्ध वस्तुओं में कोहिनूर हीरा, लीली घोड़ी और जमजमा तोप सबसे बेशकीमती थे। कहा जाता है कि इरान का बादशाह घोड़ी के पहले मालिक यार मोहम्मद को 50 हजार नगद और 25 हजार की जागीर देना चाहता था। इनके अलावा |औरंगजेब और अहमद शाह बादशाहों के सिरपेंचों के हीरे भी उनके यहां थे।

उनके राज्य का भूमि कर (केवल छोटांश और दशांश से वसूल किया हुआ) जागीरों समेत ढाई करोड़ से ऊपर था। इसके अलावा 44 लाख प्रति वर्ष नमक करसे और एक करोड़ शालों के ठेके से आमदनी होती थी। सिक्का उनका अपना चलता था जिस पर 'तलवार का आदर' लिखा रहता था।

उनकी राजसभा का नाम गुरुमता यह उनका मंत्रिमंडल था। महाराज के पास जागीरदारों समेत 82 हजार से ऊपर सेना थी।

महाराज रणजीत सिंह नमूने के योद्धा विजेता और शासक थे। यह उन्हीं का बल था कि लगभग 800 वर्ष से चली आई पंजाब की मुसलमान सल्तनत को जड़ से उखाड़ कर फेंक दिया। और जिन पठानों का भारत पर लगातार विजय पाने से सिर आसमान पर चढ़ गया था, उन्हीं पठानों से भेंट, खिराज और नजराने लिए तथा उन्हीं की आबादी डेरागाजीखां, जमरूद,


तेजाजी (29.1.1074 - 28.8.1103)
महात्मा निश्चलदास जी (1791-1863)

[पृ.168]: और यूसुफजई में उन्हें परास्त करके अपनी हुकुमत कायम की। कश्मीर, कंधार, पेशावर और सतलज के बीच का कुल उनके राज्य में शामिल था। वास्तव में वे अपने समय के सर्वोच्च मुल्क शासक और यौद्धा थे।

13. तेजाजी ग्यारवीं शताब्दी में ये महापुरुष मारवाड़ के खरनाल मोजे में पैदा हुए थे। इनका सारा समय परोपकार में अराजक मीणा जाति को दबाने में व्यतीत हुआ था। परोपकार ही में नाग द्वारा उनकी मृत्यु हुई थी। यह धौल्या गोत्र के जाट थे। राजपूताना की जोधपुर, जयपुर, किशनगढ़ और कोटा आदि में इनकी सभी जातियां बड़ी श्रद्धा के साथ पूजा करती हैं। भादवा बदी दशमी को अनेकों स्थानों पर तेजाजी के नाम पर मेले लगते हैं। सारांश यह है कि राजपूताना में इनको शिव गणेश की भांति देवता समझा जाता है।

14. महात्मा निश्चलदास जी - पिछले समय में यह एक प्रसिद्ध साध हुए हैं। यह वेदांती थे। शास्त्रार्थों की इन्होंने धूम मचा दी थी। उनका लिखा हुआ विचारचंद्रिका ग्रंथ वेदांत का अपूर्वग्रंथ समझा जाता है। बूंदी के महाराज ने उनकी विद्वता की प्रशंसा सुनकर बूंदी बुलाया और वहां दादूपंथ के पंडितों से शास्त्रार्थ कराया। जिसमें ये विजयी हुए। अपने समय के ऐसे प्रकांड विद्वान थे कि लोग उन्हें बृहस्पति का अवतार समझते थे।

15. जुझार सिंह - नेहरा वंश में आप पैदा हुए थे। आप समस्त राजपूताने में जाट राज्य कायम करने के इच्छुक थे। झुंझुनू आप की राजधानी थी।

16. महाराजा सूरजमल

महाराजा सूरजमल (1707-1763)

16. महाराजा सूरजमल - उनकी आंखों से तेज टपकता था। राजनीतिक योग्यता, सूक्ष्म दृष्टि तथा निश्चल बुद्धिमता उनमें एक बड़े अंश में विद्यमान थी। इमादुस्सादत ने उनके संबंध में लिखा है "यद्यपि वह कृषक जैसा पहनावा पहनता और अपनी ब्रज भाषा ही बोलता था परंतु वास्तव में वह जाट जाति का प्लेटो था। चतुराई, बुद्धिमता और लगान तथा अन्य माल के महकमे के कार्यों की जानकारी में आशिफजाह निजाम के सिवा भारत के प्रसिद्ध पुरुषों में और कोई उस की बराबरी नहीं कर सकता था। जोश, साहस, चतुराई और अटूट दृढ़ता तथा अजय और न दबने वाला स्वभाव आदि सभी अपनी जाति के अच्छे-अच्छे गुण सूरजमल में पाए जाते थे।"

उन्हें मुगल मराठा और राजपूत सभी से लड़ना पड़ा था। सभी युद्धों में वे विजई हुए। एक मुसलमान यात्री ने उनके संबंध में कहा था, सूरजमल वास्तव में हिंदुस्तान का आखिरी सम्राट है। इसमें कोई संदेह भी नहीं। उनके पास उस समय के तमाम शासकों से बड़ा राज्य था। जिस समय उनका स्वर्गवास हुआ था उस समय उनके राज्य की लंबाई 200 मील और चौड़ाई 150 मील थी। आगरा, इटावा, मैनपुरी, एटा, अलीगढ़,


[पृ.170]: हाथरस, फरूखनगर, रोहतक, रेवाड़ी, गुड़गांव, मथुरा और अलवर उनके राज्य के मातहत और अंतर्गत थे। फादर वेंडिल ने उनके राज्य वैभव के बारे में इस प्रकार लिखा है:- "खजाने और माल के विषय में जो कि सूरजमल ने अपने वारिस के लिए छोड़ा है भिन्न-भिन्न मत हैं कुछ इसे 9 करोड़ और दूसरे कुछ कम बताते हैं। मैंने इसका पता लगाया है। उसका (महाराज सूरजमल का) खर्च 65 लाख से अधिक और 60 लाख से कम न था। और उसके राज्य की आमदनी 1 करोड़ 75 लाख से कम नहीं थी। उसकी सेना में 5000 घोड़े, 60 हाथी, 15000 सवर, 25000 से अधिक पैदल, 300 से अधिक तौपें, और काफी बारूद खाना तथा युद्ध की सामग्री थी।" 1763 में उनका देहांत हो गया।

महाराजा जवाहरसिंह

17. महाराजा जवाहरसिंह - महाराज सूर्यमल जहां ठंडी आग थे महाराजा जवाहरसिंह गरम आग थे। सारे भारत में जाट राज्य कायम करने के इच्छुक थे। इसीलिए उन्होंने बृजेंद्र की बजाए भारतेंद्र की उपाधि धारण की थी। जाति गौरव उनमें कूट कूट कर भरा हुआ था। जयपुर पर चढ़ाई के समय किसी ने उनसे कहा कि महाराज वे तो भी रामचंद्र जी के वंशज हैं जिन्होंने समुद्र का पुल बांधा था। इस पर उन्होंने कहा मैं भी तो उन कृष्ण का वंशज हूं जिन्होंने पहाड़ को अंगुली पर उठा लिया था। यदि गृहकलह न उठ खड़ा होता तो आप राज्य की और भी वृद्धि कर जाते। फिर भी आप


[पृ.171] दिल्ली विजय करके राजपूताना में एक रिकॉर्ड कायम कर गए हैं क्योंकि दिल्ली के शासकों ने हमेशा राजपूतना की रियासतों को लूटा तथा उनकी लड़कियां ली थी किंतु आपने दिल्ली को ध्वंस कर दिया और वहां से उनकी सुंदर वस्तुओं को भरतपुर ले आए थे। जो भरतपुर के दुर्ग की शोभा बढ़ा रही हैं। आप की सेना के सरदार बलराम कई मुगल वंश संभूत बेगमों को ले आए थे। ब्रज में एक कहावत है कि "पाले पड़ी बलराम के ठाड़े मटर चबाय"। यह वैसी ही बात है जैसे कि "तीन बेर खाती वे, बीन बेर खाती हैं।" टूक में है।

खेमकरण

18. खेमकरण - यह सुग्रीवगढ़ (सोगर) के अधिपति थे। इनका राज्य सोगर से लगाकर सीकरी तक फैला हुआ था। जिस समय चूड़ामणि जी थून में राज्य करते थे उस समय वह सीकरी को दबाए बैठे थे। सोगर में एक कच्ची गढ़ी बना रखी थी। शरीर के मजबूत और शक्तिमान प्रथम दर्जे के थे। एक बार आगरा में मुगल सूबेदार के सामने आपने एक साथ दो शेरों को केवल कटार से मार दिया था। कहा जाता है कि एक बार आप को राजा चूड़ामणि ने एक रुपया पोटुए से मसल कर दिया कि देखो तो यह तो घिसा हुआ है। वास्तव में पोटुए की रगड़ से उसके अक्षर उखड़ गए थे। खेमकरन ने उससे लेकर पोटुए और अंगुलियों के बीच में दबोच कर लौटाते हुए कहा अजी , यह तो मुड़ा हुआ भी है। खेद है इस वीर का अडिंग के सरदार फोन्दासिंह ने भोजन में विष खिला कर इस संसार से नाम मिटा दिया।

परिशिष्ट प्रकरण-3: जाट पताका गान एवं जाट पताका चित्र

[पृ.172]:
जाट पताका चित्र [पृ.173]

विजयी ध्वजा बसन्ती धारे।

हरें जाति के हम दुख सारे॥

देश देश में यह लहराई। गगनांचल में नित फहराई।

ओज, शौर्य लखि अरि उर हारे। विजयी.॥

नार्वे, स्वीडन, जर्मन, तासी*। अरु जटलैंड, असी के वासी।

रहे उपासक इसके सारे। विजयी.॥

बाना, अरल, कास्पियन तट पर। कुभा, हिरात, सिंधुनद तट पर।

रहे गूंज यस-गान हमारे। विजयी.॥

मल्ल, शिबोई जगत निराले। नव, यौधेय, मौर्य, पुरू, हाले।

अहो ! अंश "परिहार" हमारे। विजयी.॥

यह जय-ध्वजा कनिष्क उड़ाई। कृषी सदृश अरि-अनी गिराई।

बजे जीत के सदा नागारे। विजयी.॥

पूजनीय 'रणजीत', 'जवाहर'। 'सूर्यमल', 'गोकुला' उजागर।

रहे इसी के सदा सहारे। विजयी.॥

मातेश्वरी शक्ति! पुनि बल दे। फूट, अविद्या सत्वर दल दे।

फेर फिरें वे दिवस हमारे। विजयी.॥

एक कोटि सुत मिल हंस-हंसकर। हो बलिदान ओज उर भर-भर।

सहें न जग अपमान करारे। विजयी.॥

आओ युवा, वृद्ध, शिशु आओ। माता, भगिनि, पुत्रियो आओ।

इसकी शान बढ़ाओ सारे। विजयी.॥

--रामबाबूसिंह परिहार


* तासी = ताशकंद, असी = असीरिया, असीगढ़ नोट - पताका के नीचे शुम्र को शुभ्र पढना चाहिए।


परिशिष्ट प्रकरण-4: कृतज्ञता प्रकाशन

[पृ.174]:
1

अपने कुछ अभिन्न मित्रों के उत्साह से सन् 1934 ई. में मैंने बड़े साइज के लगभग 800 पृष्ठों का जाट इतिहास जाट जगत की सेवा में छपा कर पेश किया था। स्वर्गीय बाबू भैरोसिंहजी, कुंवर पन्नेसिंहजी और चौधरी लादूरामजी जाखड़ ने जिस प्रकार मुझे इतिहास लिखने के लिए उत्साहित किया था उससे भी अधिक साहस के साथ सरदार हरलालसिंह जी, कुंवर नेतरामजी, कुंवर भूरसिंहजी, कुंवर पृथ्वीसिंहजी, ठाकुर देवासिंहजी, ठाकुर रामसिंहजी, चौधरी चिमनारामजी, चौधरी घासीरामजी, चौधरी पोकररामजी, चौधरी हरिश्चंद्रजी ढाका, चौधरी लादूरामजी किसारी और चौधरी होतीलालजी वर्मा ने जाट इतिहास को छपाने में दिल खोलकर जहां स्वयं सहायता दी वह दूसरों से भी दिलाई। पंडित ताड़केश्वर जी ने जो इतिहास में कापी रफ करने और मैटर जुटाने में सहायता की थी वह भूलने की बात नहीं। अनेक लोग जाट इतिहास को पढ़कर मेरे पास प्रशंसा पत्र भेजा करते हैं। किंतु मैं तो यही समझता हूं कि उस इतिहास को प्रकाशित कराने का सारा श्रेय तो जयपुर और बीकानेर के उदार मना जाट सरदारों को ही है जिन्होंने सहायता देकर उसे छपाया। हालांकि सहायता के बदले में उनके फोटो इतिहास में प्रकाशित किए गए थे फिर भी उनकी कृपाओं से मैं पूरी उऋण नहीं हो गया हूं।

जाट इतिहास के छप जाने के बाद उन्हें खपवाने में कुंवर हुक्मसिंहजी, सर छोटूरामजी, ठाकुर झुम्मनसिंहजी, कुंवर रतनसिंहजी, चौधरी रिछपालसिंहजी, मास्टर भजनलालजी, कुंवर सुवालालजी, कुंवर रामकरणजी, राय साहब हरिरामसिंहजी, मास्टर शेरसिंहजी, जमादार सेडूरामजी, मेजर शिवजीरामजी


[पृ.175]:
2

बाई चिरंजीव देवीजी, चौधरी मूलचंदजी, चौधरी शिवकरणजी, कुंवर भगवानसिंह जी, चौधरी उदमीरामजी, मास्टर कुलभूषणजी और वकील शादीरामजी साहब ने जो सहायता मुझे दी है उसके लिए मैं आजीवन कृतज्ञ रहूंगा। इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए मैं सबसे अधिक कृतज्ञ स्वामी केशवानंदजी महाराज और मास्टर तेजरामजी अबोहर वालों का हूं जिन्होंने इधर के अपने परिचित जनों से इसकी छपाई के लिए सहायता दिलाई है। जिन उदार सज्जनों ने इस पुस्तक के छपाने के लिए सहायता दी है उनकी सूची इस प्रकार है:

इनके अलावा जिन अन्य महाशयों के चित्र प्रकाशित किए जा रहे हैं उन से सहायता की रकम कुछ प्राप्त हो गई है, शेष हो जाएगी ऐसी आशा है। उपरोक्त रकम व सूची में से भी कुछ रुपया मिलना शेष है जो शायद ही प्राप्त होने से बाकी रहेगा।


परिशिष्ट प्रकरण समाप्त

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