Bidar

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Bidar (बिडार)[1]/(बिड़ार)[2] Biddar (बिड्डार) Vidar (बिडार) Vidar (विदार) Gotra Jats are found in Madhya Pradesh.

Origin

Bhim Singh Dahiya explains that this gotra gets name from ancient tribe Vidarbha (विदर्भ).[3]

History

Bhim Singh Dahiya explains that this gotra gets name from ancient tribe Vidarbha. According to him, In Mahabharata we find Vidarbhas, mentioned with the northern people, named Rishikas, Kaks, Tangana, Uttaras, etc.[4] Now what are these "Vidarbha" people of Nagpur area doing in the north? Are they really the Vidarbhas? It is possible that they are the Bhinders, a Jat clan, and their name Bidar/Binderis Sanskritised into Vidar (bha).[5]

H.A. Rose[6] writes that the Customary Law of Sialkot District (Voliune XIV) p, 3, gives the Biddar in the list of Awan sub-clans.

Villages founded by Bidar clan

कैथल का भाई खानदान:बिड़ार-वंशी जाट

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि जिस समय सिख-धर्म के प्रवर्तक गुरुनानक (1469 – 1539) इस संसार से विदा हो गए तो उनके बाद अंगदजी गुरु हुए। अंगदजी के पश्चात् अमरदास और फिर रामदास गुरु की श्रेष्ठ पदवी से विभूषित हुए। जिस समय गुरु रामदास जी को गद्दी दी गई थी, उस समय गद्दी देते हुए अमरदासजी ने रामदासजी से एक कार्य करने के लिए कहा था। वह कार्य यह था कि तुंग, सुल्तान पिंड और गुमटाला नामक गांवों के बीच में कई कोस का एक जंगल था। उस जंगल में एक बहुत पुराना तालाब था किन्तु वह मिट्टी से भरा हुआ था। गुरुजी उसे खुदवाकर फिर से जलाशय बनाना चाहते थे। गुरु अमरदासजी रामदासजी को लेकर उस स्थान पर पहुंचे भी। चूंकि वह जगह जाटों की सम्मिलित भूमि थी, इसलिए गुरुजी ने आस-पास के मुख्य-मुख्य जाटों को बुलवाकर उस भूमि को मांगा। जाटों ने जब सुना कि गुरुजी इस स्थान पर निरन्तर पानी रखने वाला तालाब खुदवाना चाहते हैं तो उन्होंने वह जमीन गुरुजी को दे दी। जगह मिलने पर आषाढ़ संवत् 1929 (? 1629) वि० को उस स्थान पर गुरु रामदासजी के हाथ से एक नगर और सरोवर की बुनियाद डलवाई।

उस समय गुरु लोगों की कोई भारी शक्ति न थी। वे अपने उपदेशों से अपना सम्प्रदाय बढ़ाया करते थे। रामदासजी के भी आस-पास अनेक हिन्दू और विशेषतया जाट शिष्य हो गए। इन्हें जाट शिष्यों में एक भाई भगतू थे। यह बिड़ार-वंशी जाट थे। इनके पिता का नाम ओम् था। भगतूजी इतने ईश्वर-भक्त और गुरु-भक्त थे कि लोग उनके असली नाम को भूल गए और वे भगतू के नाम से ही मशहूर हो गए। रामदासजी इस चिन्ता में थे कि तालाब किस भांति खुदे। उनके पास कोई साधन न था। ओम् गुरुजी की इस चिन्ता से दुःखी हुए, किन्तु वह भी कोई वैभव सम्पन्न व्यक्ति न थे। हां, उनके पास साहस था इसलिए वह स्वयं


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-510


तालाब खोदने में लग गए। और भी कुछ मनुष्य तालाब की खुदाई करते थे किन्तु वे मजदूरी लेते थे। ओम् धार्मिक कृत्य समझकर खोदते थे। गुरु रामदासजी ओम् की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए और आशीर्वाद दिया कि तेरा पुत्र बड़ा प्रतापी होगा। दैवयोग से बात ऐसी ही हुई। ओम् के सुपुत्र भगतू के नाम से आज सारा पंजाब परिचित है।

गुरु रामदासजी की मृत्यु के पश्चात् गुरु अर्जुन गद्दी पर विराजे। भगतू ने सिख धर्म की और गुरुजी की बहुत सेवाएं कीं। समस्त सिख भगतू को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं।

भगतू के सम्बन्ध में एक बड़ी विचित्र बात कही जाती है। गुरु हरिराम ने इनसे कहा कि तुम मेरे ही सामने शरीर छोड़ दो। भगतू ने यह बात मान ली और करतारपुर में जो कि इलाका जालन्धर में है, पृथ्वी में समा गया। कुछ काल बाद गुरु हरीराम उधर से फिर गुजरे। भगतू की समाधि के पास आकर कहने लगे कि ऐ सिख वीर भगतू! हमें दर्शन दे। भगतू गुरु की इस बात को सुनकर समाधि में से जिन्दा निकल आए। गुरुजी से वार्तालाप करने के बाद फिर समाधि में समा गए। गुरु ने आशीर्वाद दिया कि तुम्हारी संतान के लोग वैभवशाली और राजा होंगे।

भगतू का खानदान भाई के नाम से भी मशहूर है। इसका कारण यह बताया जाता है कि गुरु अर्जुन ने भगतू की भक्ति से प्रसन्न होकर भाई की उपाधि दी। भगतू के दो बेटे हुए - संतदास और गोरा

संतदास, जिसका कि दूसरा नाम जीवनसिंह भी था, की औलाद के लोग भटिण्डा की ओर चले गये और वहां जाकर उन्होंने राज्य स्थापित कर लिया।

गोरा की संतान के लोगों ने कैथल और दूनोली के परगने को अपने कब्जे में कर लिया और राजा बन बैठे।

गोरा के महासिंह, किशनसिंह, माईदास और दयालसिंह नाम के चार पुत्र हुए। जिसमें किशनसिंह, महासिंह की संतान के लोग भटिंडा की ओर चले गए और माईदास निःसन्तान मर गए।

भाई दयालसिंह के छः पुत्र हुए। उनके सुक्खासिंह, धनसिंह, गुरुदाससिंह, देसूसिंह, बुद्धासिंह और बख्तसिंह नाम रखे गये थे।

सुक्खासिंह के दो पुत्र हुए - विसावासिंह और गुरुदत्तसिंह।

उनसे छोटे भाई धनसिंह के कर्मसिंह और चड़तसिंह नामक पुत्र हुए।

लालसिंह और सुजानसिंह नाम के दो पुत्र देसूसिंह के हुए।

बुद्धासिंह के कोई संतान न थी। बख्तसिंह के दालसिंह नाम का एक ही पुत्र हुआ।

कैथल पर अधिकार देसूसिंह की संतान का था। लालसिंह उनका बड़ा पुत्र कैथल का राजा था। उसके राज्य की आमदनी चार लाख थी।

सुक्खासिंह के पुत्र विसावासिंह के पास भी बीस गांव थे।

लालसिंह के दो पुत्र हुए - उदैसिंह और प्रतापसिंह। दोनों ही निःसन्तान मर गये। लालसिंह की मृत्यु संवत् 1901 विक्रमी अर्थात् 1846 ई० में हो गई। इस समय तक महाराज रणजीतसिंह पंजाब


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज, पृष्ठान्त-511


केसरी का स्वर्गवास हो चुका था और लाहौर की गद्दी पर नाटक हो रहा था।

उदैसिंह के पश्चात् उसकी रानी महताबकुंवरि राज्य की मालिक बनीं। वह बड़ी वीर प्रकृति की थी और अंग्रेजों से भी लड़ बैठी। अंग्रेजों की शक्ति के मुकाबले में बेचारी क्या कर सकती थी, हार निश्चित थी। सेना तितर-बितर हो गई। फिर भी आपके दिल में आशा था, अतः आप मैदान से निकल भागीं। सेना इकट्ठी करने लगी। किन्तु अंग्रेजी सेना ने आपको पकड़ लिया। उसका कैथल राज्य जब्त कर लिया गया।

उदैसिंह ने भाई विसावासिंह को गोद लिया पुत्र बना लिया था। सरकार ने उसको चौबीस हजार सालाना का इलाका दे दिया और रानी महताबकुंवरि की बीस हजार वार्षिक की पेन्शन कर दी। इसी बीस हजार में से उदैसिंह के भानजे चूहड़सिंह को भी रानी साहिबा को देना पड़ता था। पोदा नाम के गांव में आपके रहने के लिए स्थान नियुक्त हुआ। इस स्थान पर उदैसिंह जी की बनाई एक कोठी थी जिसमें पत्थर का बहुत ही अच्छा काम किया गया था। पीछे से यह स्थान अंग्रेजी इलाके में मिला लिया गया। विसावासिंह और उसके पुत्र अरनोली में रहने लगे। संगतसिंह और उनकी संतान के लोग इलाका सिद्धूवाल के अधिकारी रहे।

Distribution in Madhya Pradesh

Villages in Narsinghpur district

Bidar Village in Dhaulpur district

Bidar (बिडार) is a village in Rajakhera tahsil in Dhaulpur district in Rajasthan.

Notable persons

  • Tika Ram Thakur (Bidar) - Narsinghpur, Mob:9926984643, 9826525166[7]

History

External links

References

  1. O.S.Tugania:Jat Samuday ke Pramukh Adhar Bindu, p.52, s.n. 1781
  2. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Parishisht-I, s.n. ब-136
  3. Jats the Ancient Rulers (A clan study)/Jat Clan in India, pp.235-236
  4. हृषीविदर्भाः कान्तीकास तङ्गणाः परतङ्गणाः । उत्तराश चापरे मलेच्छा जना भरतसत्तम (VI.10.63)
  5. Jats the Ancient Rulers (A clan study)/Jat Clan in India, pp.235-236
  6. A glossary of the Tribes and Castes of the Punjab and North-West Frontier Province By H.A. Rose Vol II/A,pp.27
  7. Jat Vaibhav Smarika Khategaon, 2010, p. 150

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