Chaudhary Gulla Ram

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चौधरी गुल्लाराम जी
चौधरी गुल्लाराम जी

Chaudhary Gulla Ram (Benda) (1883 - 1968) was a Social worker, a reformer, freedom fighter and educationist from Ratkudia village in Rajasthan [1] He was born on vikram samvat 1940 ashvin krishna 14 (30 september 1883) in the family of Chaudhary Gena Ram ji Benda and Smt. Lali Bai in village Ratkudia, tehsil Bhopalgarh in Jodhpur district in Rajasthan.

Contents

चौधरी गुल्लाराम जी का बचपन

चौधरी गुल्लाराम जी का जन्म जोधपुर जिले की तह्सील भोपालगढ़ के गाँव रतकुड़िया में विक्रम संवत आश्विन कृष्णा १४ (३० सितम्बर १८८३) को एक साधारण बेन्दा गोत्र के जाट किसान परिवार में हुआ. आपके पिताजी का नाम श्री गेनाराम जी बेन्दा और माताजी का नाम श्रीमती लालीबाई था. [2]सात भाई बहिनों में आपका पांचवां स्थान था. आपका बचपन ग्रामीण परम्परा के अनुसार गायें चराते हुए गाँव में ही बीता. आपकी पढ़ने की बहुत इच्छा थी परन्तु गायें चराने के लिए कोई दूसरी व्यवस्था न होने और गाँव में कोई स्कूल न होने के कारण औपचारिक शिक्षा न ग्रहण कर पाए. परन्तु कृषि कार्य से जब भी समय मिलता गाँव के गुरूजी के पास जाकर बैठ जाते और थोड़े समय में अक्षर ज्ञान और गिनती सीख ली. १८ वर्ष की आयु में खांगटा गाँव के चौधरी श्री अमरारामजी गोदारा की पुत्री इंदिराबाई से आपका विवाह संपन्न हुआ. [3] [4]

शासकीय सेवा

१९०० में चौधरी गुल्लाराम जी पढने की इच्छा तथा नौकरी की तलास में जोधपुर आए. जोधपुर रेलवे स्टेशन के मैनेजर टॉड ने आपको गैंगमेन के पद पर काम लगाया. आप दिन में काम करते और रात को पढ़ते थे. बीमार पड़ने के कारण रेलवे का काम छुट गया. फ़िर आप आबू चले गए जहाँ पर श्रमिकों को पानी पिलाने का काम किया. साथ ही हिन्दी और गुजराती तथा अंगरेजी का ज्ञान प्राप्त किया. एक दिन आपको अंगरेजी बोलता देखकर आबू हाई अकूल के प्रिंसिपल वी. अच. स्केल्टन ने १ अक्टूबर १९०१ चौधरी गुल्लाराम जी को डेरी के काम में लगा दिया. आपकी योग्यता तथा मेहनत से प्रभावित होकर चौधरी गुल्लाराम जी को डेरी सहायक तथा बादमें डेरी प्रबंधक नियुक्त किया. ७ अप्रेल १९०४ तक आपने डेरी का काम संभाला. परन्तु अंग्रेज अधिकारी की रंगभेद नीति के कारण काम छोड़कर जोधपुर आ गए. यहाँ पर रेलवे के इन्जीनियरिंग विभाग में मेट की नौकरी कर ली. मि. स्केल्टन को जब गलती का अहसास हुआ तो पुनः आबू बुलाया और १९०९ में पुनः डेरी का मनेजर बना दिया. १९१२ में स्केल्टन के विदेश जाने पर डेरी बंद कर दी और आपको जोधपुर भेज दिया जहाँ पर सार्वजनिक निर्माण विभाग में नक्शा बनाने और भूमी का सर्वे करने का काम दिया. काम में कुशल होने से आपको १ मार्च १९१४ को ओवरसियर बना दिया तथा आबू, जस्वन्तपुर, सांचौर, भीनमाल आदि के भवनों की देख रेख का जिम्मा आपको सौंपा. आपका मुख्यालय आबू था जहाँ १९२४ तक आप रहे इसके बाद स्थानांतरण पिचिकिया बाँध पर कर दिया. बेडा ठाकुर पृथ्वी सिंह की मांग पर आपको १ जनवरी १९२४ को बेडा ठिकाने का मुख्य कामदार बना दिया. १९२६ में जोधपुर सरकार ने नीलगिरी उटकमंड में एक विशाल भवन ख़रीदा जिस के देख रेख के लिए आपको ७ मार्च १९२७ को प्रबंधक नियुक्त किया. १९४८ तक आप वहीं सेवा करते रहे और वहीं से सम्मान पूर्वक राजकीय सेवा से अवकाश ग्रहण किया.[5]

आजादी के पूर्व मारवाड़ में किसानों की हालत

जिस समय चौधरी गुल्लाराम जी का जन्म हुआ, उस समय मारवाड़ में किसानों की हालत बडी दयनीय थी। मारवाड़ का ८३ प्रतिशत इलाका जागीरदारों के अधिकार में था इन जागीरदारों में छोटे-बडे सभी तरह के जागीदार थे। छोटे जागीरदार के पास एक गांव था तो बडे जागीरदार के पास बारह से पचास तक के गांवो के अधिकारी थें और उन्हें प्रशासन, राजस्व व न्यायिक सभी तरह के अधिकार प्राप्त थे। ये जागीरदार किसानों से न केवल मनमाना लगान (पैदावार का आधा भग) वसूल करते थे बल्कि विभिन्न नामों से अनेक लागबाग[6] व बेगार भी वसूल करते थें किसानों का भूमि पर कोई अधिकार नहीं था और जागीरदार जब चाहे किसान को जोतने के लिए दे देता थां किसान अपने बच्चों के लिए खेतों से पूंख (कच्चे अनाज की बालियां) हेतु दो-चार सीटियां (बालियां) तक नहीं तोड सकता था। जबकि इसके विपरीत जागीरदार के घोडे उन खेतों में खुले चरते और खेती को उजाडते रहते थे और किसान उन्हें खेतों में से नहीं हटा सकते थे। इसके अलावा जागीरदार अपने हासिल (भूराजस्व) की वसूली व देखरेख के लिए एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जो ‘कण्वारिया‘ कहलाता था, रखता था। यह कणवारिया फसल पकने के दिनों में किसानों की स्त्रियों को खतों से घर लौटते समय तलाशी लेता था या फिर किसानों के घरों की तलाशी लिया करता था कि कोई किसान खेत से सीटियां तोडकर तो नहीं लाया है। यदि नया अनाज घर पर मिल जाता था तो उसे शारीरिक और आर्थिक दण्ड दोनों दिया जाता था।

लगान के अलावा जागीरदारों ने किसान का शोषण करने के लिए अनेक प्रकार की लागें (अन्य घर) लगा रखी थी जो विभिन्न नामों से वसूल की जाती थी, जैसे मलबा लाग, धुंआ लाग आदि-आदि इसके अलावा बैठ-बेगार का बोझ तो किसानों पर जागीरदार की आरे से इतना भारी था कि किसान उसके दबाव से सदैव ही छोडकर जागीरदार की बेगार करने के लिए जाना पडता था। स्वयं किसान को ही नहीं, उनकी स्त्रियों को भी बेगार देनी पडती थी। उनको जागीरदारों के घर के लिए आटा पीसना पडता था। उनके मकानों को लीपना-पोतना पडता था और भी घर के अन्य कार्य जब चाहे तब करने पडते थे। उनका इंकार करने का अधिकार नहीं था और न ही उनमे इतना साहस ही था। इनती सेवा करने पर भी उनको अपमानित किया जाता था। स्त्रियां सोने-चांदी के आभूषण नहीं पहन सकती थी। जागीरदार के गढ के समाने से वे जूते पहनकर नहीं निकल सकती थी। उन्हें अपने जूते उतारकर हाथों में लेने पडते थे। किसान घोडों पर नहीं बैठ सकते थे। उन्हे जागीरदार के सामने खाट पर बैठने का अधिकार नहीं था। वे हथियार लेकर नहीं चल सकते थें किसान के घर में पक्की चीज खुरल एव घट्टी दो ही होती थी। पक्का माकन बना ही नहीं सकते थे। पक्के मकान तो सिर्फ जागीरदार के कोट या महल ही थे। गांव की शोषित आबादी कच्चे मकानों या झोंपडयों में ही रहती थी। किसानों को शिक्षा का अधिकार नहीं था। जागीरदार लोग उन्हें परम्परागत धंधे करने पर ही बाध्य करते थे। कुल मिलाकर किसान की आर्थिक व सामाजिक स्थिति बहुत दयनीय थी । जी जान से परिश्रम करने के बाद भी किसान दरिद्र ही बना रहता था क्योंकि उसकी कमाई का अधिकांश भाग जागीरदार और उसके कर्मचारियों के घरों में चला जाता था। ऐसी स्थिती में चौधरी भींया राम सिहाग ने मारवाड के किसानों की दशा सुधारने का बीडा उठाया।

शिक्षा प्रचार

चौधरी गुल्लाराम जी ने मारवाड़ के किसानों की हालत सुधारने का बीडा उठाया. निमंत्रण मिलने पर आप चौधरी मूल चंद सियाग नागौर के साथ २७ मार्च १९२१ को संगरिया जाट स्कूल के वार्षिक जलसे में पहुंचे, जिसका सभापतित्व करने रोहतक से सर छोटूरामजी पधारे थे. समय लेकर आप दोनों अलग से सर छोटूरामजी से मिले और मारवाड़ के जाट किसानों की समस्या के समाधान और उनकी जागृति तथा उत्थान के लिए परामर्श किया. उन्होंने सलाह दी कि वे राजनैतिक और सामाजिक उत्थान से पहले किसानों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार को अपनी प्रतामिकता बनायें और शासन सत्ता के विरोध में अपनी शक्ति का अपव्यय न करें. इसलिए यह तय किया गया की सबसे पहले मारवाड़ के किसानों को शिक्षित किया जाए.[7] [8]

चौधरी गुल्लारामजी एक निश्चित विचार लेकर संगरिया से लौटे. रास्ता बनाने के लिए आपने सर्वप्रथम चौधरी सर छोटूरामजी को १९२१ की गर्मियों में अपने गाँव रतकुड़िया आमंत्रित किया. एक बड़ा जुलूस गाँव में होकर निकाला गया. सभा हुई जिसमें सर छोटूरामजी ने शिक्षा तथा संगठन पर भाषण दिया. इस तरह वातावरण अनुकूल बनाकर चौधरी गुल्लारामजी ने १ जुलाई १९२१ को गाँव के पास उम्मेद स्टेशन पर एक पाठशाला स्थापित कर मास्टर नैनसिंह को बच्चों को पढाने का कार्य सौंपा. १९२४ तक यह पाठशाला रही जिसका समस्त व्यय आपने वहन किया, परन्तु किसी का सहयोग न मिलने तथा जातीय भाई अशिक्षित होने के कारण इस स्कूल का फायदा नहीं उठा सके और यह पाठशाला बंद हो गयी. [9] [10]

चौधरी गुल्लारामजी ने हार नहीं मानी. अक्टूबर १९२५ में कार्तिक पूर्णिमा को अखिल भारतीय जाट महासभा का एक अधिवेसन पुष्कर में हुआ था उसमें मारवाड़ के जाटों में जाने वालों में चौधरी गुल्लाराम, चौधरी मूलचंद जी सियाग, मास्टर धारासिंह, चौधरी रामदान जी, भींया राम सिहाग आदि पधारे थे. इस जलसे की अध्यक्षता भरतपुर के तत्कालीन महाराजा श्री किशनसिंह जी ने की. इस समारोह में उत्तर प्रदेश, पंजाब, दिल्ली के अलावा राजस्थान के हर कोने से जाट सम्मिलित हुए थे. इन सभी ने पुष्कर में अन्य जाटों को देखा तो अपनी दशा सुधारने का हौसला लेकर वापिस लौटे. उनका विचार बना की मारवाड़ में जाटों के पिछड़ने का कारण केवल शिक्षा का आभाव है.[11][12]

"जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर" की स्थापना

कुछ समय बाद चौधरी गुल्लारामजी के रातानाडा स्थित मकान पर चौधरी मूलचंद सिहाग नागौर, चौधरी भिंयारामजी सिहाग परबतसर, चौधरी गंगारामजी खिलेरी नागौर, बाबू दूधारामजी और मास्टर धारा सिंह की एक मीटिंग हुई. यह तय किया गया कि किसानों से विद्या प्रसार के लिए अनुरोध किया जाए. तदनुसार २ मार्च १९२७ को ७० जाट सज्जनों की एक बैठक श्री राधाकिसन जी मिर्धा की अध्यक्षता में हुई. इस बैठक में चौधरी गुल्लारामजी ने जाटों की उन्नति का मूलमंत्र दिया कि - "पढो और पढाओ" . साथ ही एक जाट संस्था खोलने के लिए धन की अपील की गयी. यह तय किया गया कि बच्चों को निजी स्कूल खोल कर उनमें भेजने के बजाय सरकारी स्कूलों में भेजा जाय पर उनके लिए ज्यादा से ज्यादा होस्टल खोले जावें. चौधरी गुल्लारामजी ने इस मीटिंग में अपना रातानाडा स्थित मकान एक वर्ष के लिए छात्रावास हेतु देने, बिजली, पानी, रसोइए का एक वर्ष का खर्च उठाने का वायदा किया. इस तरह ४ अप्रेल १९२७ को चौधरी गुल्लारामजी के मकान में "जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर" की स्थापना की । [13] [14]

१९३० तक जब जोधपुर के छात्रावास का काम ठीक ढंग से जम गया और जोधपुर सरकार से अनुदान मिलने लग गया तब चौधरी मूलचंद जी, बल्देवराम जी मिर्धा, भींया राम सियाग, गंगाराम जी खिलेरी, धारासिंह एवं अन्य स्थानिय लोगों के सहयोग से बकता सागर तालाब पर २१ अगस्त १९३० को नए छात्रावास की नींव नागौर में डाली । बाद में चौधरी रामदानजी के सहयोग से बाडमेर में व १९३५ में चौधरी पूसरामजी पूलोता, डांगावास के महाराजजी कमेडिया, प्रभुजी घतेला, तथा बिर्धरामजी मेहरिया के सहयोग से मेड़ता में छात्रावास स्थापित किया गया. [15] [16] [17] [18]

आपने जाट नेताओं के सहयोग से अनेक छात्रावास खुलवाए । बाडमेर में १९३४ में चौधरी रामदानजी डऊकिया की मदद से छात्रावास की आधरसिला राखी । १९३५ में मेड़ता छात्रवास खोला । आपने जाट नेताओं के सहयोग से जो छात्रावास खोले उनमें प्रमुख हैं:- सूबेदार पन्नारामजी ढ़ीन्गसरा व किसनाराम जी रोज छोटी खाटू के सहयोग से डीडवाना में, इश्वर रामजी महाराजपुरा के सहयोग से मारोठ में, भींयाराम जी सीहाग के सहयोग से परबतसर में, हेतरामजी के सहयोग से खींवसर में छात्रावास खुलवाए । इन छात्रावासों के अलावा पीपाड़, कुचेरा, लाडनुं, रोल, जायल, अलाय, बीलाडा, रतकुडि़या, आदि स्थानों पर भी छात्रावासों की एक श्रंखला खड़ी कर दी । इस प्रकार मारवाड़ के जाट नेताओं जिसमें चौधरी बल्देवराम मिर्धा, चौधरी गुल्लारामजी, चौधरी मूलचंदजी, चौधरी भींयारामजी, चौधरी रामदानजी बाडमेर आदि प्रमुख थे, ने मारवाड़ में छात्रावासों की एक श्रंखला स्थापित करदी तथा इनके सुचारू संचालन हेतु एक शीर्ष संस्था "किसान शिक्षण संस्थान जोधपुर" स्थापित कर जोधपुर सरकार से मान्यता ले ली, जिसे सरकार से छात्रावासों के संचालन हेतु आर्थिक सहायता प्राप्त होने लगी. [19] [20]इस शिक्षा प्रचार में मारवाड़ के जाटों ने अपने पैरों पर खड़ा होने में राजस्थान के तमाम जाटों को पीछे छोड़ दिया ।[21]

चौधरी गुल्लारामजी जहाँ अपनी सारी शक्ती छात्रावासों में लगाते थे, वहीं होनहार व मेधावी गरीब छात्रों को अपनी जेब से आर्थिक सहायता भी देते थे. कुछ बच्चों को तो उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए भी आर्थिक मदद की. जिन छात्रों को आपने विशेष सहायता दी उनमें प्रमुख हैं गुरुदयालसिंह, रामदयालसिंह, मुन्शीसिंह, ओमप्रकाश जाट, जालूराम प्रजापत आदि. [22][23]

मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा के संस्थापक

सन् १९३७ में चटालिया गांव के जागीरदार ने जाटों की ८ ढाणियों पर हमला कर लूटा और अमानुषिक व्यवहार किया । चौधरी साहब को इससे बड़ी पीड़ा हुई और उन्होंने तय किया की जाटों की रक्षा तथा उनकी आवाज बुलंद करने के लिए एक प्रभावसाली संगठन आवश्यक है । अतः जोधपुर राज्य के किसानों के हित के लिए २२ अगस्त १९३८ को तेजा दशमी के दिन परबतसर के पशु मेले के अवसर पर "मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा" नामक संस्था की स्थापना की । चौधरी मूलचंद इस सभा के प्रधानमंत्री बने, चौधरी गुल्लाराम जी रतकुडिया इसके अध्यक्ष नियुक्त हुए और भींया राम सिहाग कोषाध्यक्ष चुने गए । इस सभा का उद्देश्य जहाँ किसानों में में फ़ैली कुरीतियों को मिटाना था, वहीं जागीरदारों के अत्याचारों से किसानों की रक्षा करना भी था. उन दिनों जगह-जगह सम्मेलन आयोजित किए गए, जिनमें कुरीतियों को छोड़ने के प्रस्ताव पास किए गए. छात्रावासों के चंदे हेतु प्रति हल एक रूपया व विवाह के अवसर पर तीन से ग्यारह रुपये तक लिए जाने तय किए.[24] इन उपदेशकों में ठाकुर हुकुमसिंह व भोलासिंह, उपदेशक, अखिल भारतीय जाट महासभा, हीरा सिंह पहाड़सर, पंडित दत्तुराम बहादरा, चौधरी गणपतराम , चौधरी जीवनराम , चौधरी मोहरसिंह आदि प्रमुख थे. [25]इस प्रकार मारवाड़ के किसानों में कुरीतियों के निवारण में चौधरी गुल्लाराम जी अग्रणी व्यक्ती थे. [26]

मारवाड़ किसान सभा की स्थापना

किसानों की प्रगती को देखकर मारवाड़ के जागीरदार बोखला गए । उन्होंने किसानों का शोषण बढ़ा दिया और उनके हमले भी तेज हो गए । जाट नेता अब यह सोचने को मजबूर हुए की उनका एक राजनैतिक संगठन होना चाहिए । सब किसान नेता २२ जून १९४१ को जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर में इकट्ठे हुए जिसमें तय किया गया कि २७ जून १९४१ को सुमेर स्कूल जोधपुर में मारवाड़ के किसानों की एक सभा बुलाई जाए और उसमें एक संगठन बनाया जाए । तदानुसार उस दिनांक को मारवाड़ किसान सभा की स्थापना की घोषणा की गयी और मंगल सिंह कच्छवाहा को अध्यक्ष तथा बालकिशन को मंत्री नियुक्त किया गया. [27]

मारवाड़ किशान सभा का प्रथम अधिवेशन २७-२८ जून १९४१ को जोधपुर में आयोजित किया गया । मारवाड़ किसान सभा ने अनेक बुलेटिन जारी कर अत्याधिक लगान तथा लागबाग समाप्त करने की मांग की । मारवाड़ किसान सभा का दूसरा अधिवेशन २५-२६ अप्रेल १९४३ को सर छोटू राम की अध्यक्षता में जोधपुर में आयोजित किया गया । इस सम्मेलन में जोधपर के महाराजा भी उपस्थित हुए । वास्तव में यह सम्मेलन मारवाड़ के किसान जागृति के इतिहास में एक एतिहासिक घटना थी । इस अधिवेशन में किसान सभा द्वारा निवेदन करने पर जोधपुर महाराज ने मारवाड़ के जागीरी क्षेत्रों में भूमि बंदोबस्त शु्रू करवाने की घोषणा की । [28] मारवाड़ किसान सभा जाटों के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि थी । [29] मारवाड़ के जागीरदारों ने इस घोषणा का कड़ा विरोध किया. अपनी विभिन्न सभाओं में भूमि बंदोबस्त का सामुहिक विरोध करने हेतु सेटलमेंट के कर्मचारियों के साथ सहयोग न करने का निश्चय किया तथा भूमि नापने की सर्वे झंडियों को अनेक गावों से हटा दिया. सरकार ने इसपर जागीरदारों को कड़ी चेतावनी दी तथा बोरावड व खींवसर ठाकुर के ख़िलाफ़ कार्यवाही की. परिणामस्वरुप सेटलमेंट कार्य का विरोध तो बंद हो गया, परन्तु जागीरदारों ने अब किसानों को आतंकित करना शुरू कर दिया. जगह जगह किसानों पर हमले किए गए. लाटा न लाटना, पशुओं को नीलाम करना, नई-नई लागें लगाना, झूठे मुकदमें बनाना, खेती करने से रोकना, चोरियाँ करवाना आदि रोजमर्रा के कार्य हो गए. किसानों द्वारा विरोध करने पर जागीरदारों ने अपने गुंडों व अजेंटों से उनके मकानों व खेतों को जला दिया गया, कईयों की सम्पति नष्ट कर दी, कईयों के अंगभंग व हत्याओं जैसे काण्ड भी हुए, जिसमें १३ मार्च १९४७ का डाबाड़ा कांड प्रमुख है. इसमें ६ आदमी मारे गए और अनेकों घायल हुए. [30]बाद में तो जागीरदारों द्वारा सरंक्सित कुख्यात डाकुओं की गोलियों से अनेक किसान शहीद हुए जिसमें ३१ अक्टूबर १९५१ को दीवाली के रामसामा के दिन मल्लार-भुन्दाना में १६ निरपराध किसानों को दिन दहाड़े गोलियों से भुनाने तथा पचासों को घायल करने की घटना विशेष उल्लेखनीय है. [31]इस तरह जोधपुर राज्य के किसानों को सबसे अधिक बलिदान देने पड़े, जहाँ सामंतवाद अपने खुले बर्बर रूप में प्रकट हुआ. उस समय चौधरी बलदेव राम मिर्धा और चौधरी गुल्लारम जी को ही श्रेय था की आप दोनों ने किसानों को जागीरदारों से सीधे टकराने से रोका और उनसे सब भाँती शान्ति से काम लेने की अपील की. इसका नतीजा यह हुआ की मारवाड़ के किसान सब प्रकार की तकलीफों के बावजूद शांत बने रहे और व्यर्थ के खून-खराबे से बच सके. मारवाड़ के किसानों के मध्य बलदेव राम मिर्धा के बाद आपका ही दूसरा स्थान था. [32][33]

रतकुड़िया स्कूल की स्थापना

१९४८ में सरकारी सेवा से अवकाश लेने के बाद चौधरी गुल्लाराम जी पूर्ण रूप से शिक्षा को समर्पित हो गए. आपने गाँव रतकुड़िया में १९५६ में निर्विरोध सरपंच बनाने के बाद एक शिक्षण संस्था स्तापित की. १९५७ में इस संस्था को उच्च प्राथमिक, १९६० में माध्यमिक व १९६२ में इसे उच्च माध्यमिक विद्यालय में क्रमोन्नत करवाया. १९६३ में इसमें गणित व १९६४ में जीव विज्ञान की कक्षा खुलवा कर तो आपने ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए सुनहरे अवसरों के द्वार खोल दिए. आपने रात-दिन परिश्रम कर न केवल इस स्कूल के लिए विशाल भवन बनवाया बल्कि एक विशाल छात्रावास व अध्यापकों के लिए उन्नीस निःशुल्क आवास स्थापित कराये. १९५६ से लेकर १९६८ तक चौधरी गुल्लाराम जी ने इस विद्यालय के लिए घोर परिश्रम किया और अन्तिम समय तक इसकी उन्नति में लगे रहे. आपके प्रयास से ही इस स्कूल का उस समय पूरे राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में एक विशिष्ठ स्थान बन गया और यह विज्ञान के उन्नत शिक्षा केन्द्रों में गिना जाने लगा था, जहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने यहाँ आने लगे थे. [34]इसके बारे में कहा गया है -

रतकुड़िया कुण जानतो, साधारण सो गाँव ।
गुल्लाराम परकट कियो, मारवाड़ में नांव ।।
धन्य धन्य तुम धन्य हो, चौधरी गुल्लाराम ।
रतकुड़िया निर्मित कियो, विद्यालय शुभ धाम ।। [35][36]

आपके पुत्रों में श्री रामनारायण जी चौधरी व श्री हरीसिंह्जी राजस्थान सरकार में चीफ इंजीनियर, सिंचाई विभाग से सेवानिवृत हुए जबकि चौधरी गोवर्धनसिंह् जी राजस्थान में जाट जाति के पहले आई ए एस आफिसर बनने का गौरव प्राप्त किया और राजस्थान सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए भी किसानों व जाट जाति के उन्नति के लिए काम करते रहे. [37]

स्वर्गवास

इस महान शिक्षा प्रेमी, किसानों के हितेषी नेता और साहसी समाज सुधारक चौधरी गुल्लारामजी का १२ अक्टूबर १९६८ को स्वर्गवास हो गया. चौधरी साहब के स्वर्गवास के बाद आपके परिवार ने इस संस्था को राजस्थान सरकार को समर्पित कर दिया और सरकार द्वारा आपके नाम पर इस विद्यालय का नाम "चौधरी गुल्लाराम राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय रतकुड़िया" रखा गया है.[38]

लेखक: Laxman Burdak लक्ष्मण बुरड़क

यह भी देखें

सन्दर्भ

  1. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modernhistory of Jats), Agra 1998, p. 340-342
  2. पंडित लक्ष्मीनारायण बुद्धिसागर शास्त्री: चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, १९६८, पेज 3
  3. पंडित लक्ष्मीनारायण बुद्धिसागर शास्त्री: चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, १९६८, पेज 4-5
  4. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 102
  5. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 103
  6. लागबाग के अंतर्गत विभिन्न प्रकार के कर सम्मिलित हैं. किसान की पैदावार का आधा भाग लगान के रूप में लिया जाता था. लगान के अलावा किसान पर अन्य लागें भी लगा रखी थी जैसे मलबा लाग, धुआं लाग, आंगा लाग, कांसा लाग, नाता लाग, हल लाग आदि
  7. आचार्य गोपालप्रसाद कौशिक, चौधरी मूलचंद जी अभिनन्दन ग्रन्थ, १९७६, पेज ११२-113
  8. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 105
  9. रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 1
  10. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 105
  11. डॉ पेमाराम, मारवाड़ में किसान जागृति के कर्णधार जाट, राष्ट्रिय सेमिनार, "लाइफ एंड हिस्ट्री आफ जट्स" , दिल्ली 1998
  12. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 105
  13. रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 2
  14. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 106
  15. श्री बल्देवराम मिर्धा, पृ 30
  16. आचार्य गोपालप्रसाद कौशिक, चौधरी मूलचंद जी अभिनन्दन ग्रन्थ, १९७६, पेज 149
  17. रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 3
  18. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 107
  19. रिपोर्ट श्री जाट बोर्डिंग हाउस जोधपुर शुरू से ३० जून १९३६ तक, पेज 38
  20. जोधपुर एडमिनिस्ट्रेशन रिपोर्ट, 1939, पेज 45
  21. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 107
  22. पंडित लक्ष्मीनारायण बुद्धिसागर शास्त्री: चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, १९६८, पेज 130,140,152
  23. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 108
  24. आचार्य गोपालप्रसाद कौशिक, चौधरी मूलचंद जी अभिनन्दन ग्रन्थ, 1976, पेज 120-121
  25. मारवाड़ जाट कृषक सुधारक सभा की त्रिवार्षिक रिपोर्ट . पेज 6
  26. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 108-109
  27. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 109
  28. Dr Pema Ram:Agrarian Movement in Rajasthan, p. 230-232
  29. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 110
  30. Dr Pema Ram:Agrarian Movement in Rajasthan, p. 236-237
  31. रघुवीरसिन्ह्जी यशोराज शास्त्री: श्री बलदेव राम मिर्धा , पेज 84
  32. ठाकुर देशराज: मारवाड़ का जाट इतिहास, पेज 202
  33. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 110-111
  34. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 111
  35. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 111
  36. पंडित लक्ष्मीनारायण बुद्धिसागर शास्त्री: चौधरी गुल्लारामजी स्मृति ग्रन्थ, १९६८, पेज 90
  37. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 112
  38. डॉ पेमाराम व डॉ विक्रमादित्य चौधरी: जाटों की गौरवगाथा, जोधपुर, 2004, पेज 113



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