Jayal

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Location of Jayal in Nagaur district

Jayal (जायल) is a city, tehsil and Sub-division in Nagaur district in Rajasthan.

Origin

Jaya Naga - Jayal probably gets name from Jaya Naga.

Udyoga Parva/Mahabharata Book V Chapter 101 mentions that the city of Bhogavati is ruled over by Vasuki, the king of the Nagas. Nagavanshi King Jaya (जय) is mentioned in verse Mahabharata (V.101.16).

Shalya Parva, Mahabharata/Book IX Chapter 44 mentions the ceremony for investing Kartikeya with the status of generalissimo and the various Kings who joined it. Jaya is mentioned in Mahabharata (IX.44.48). [1]

Location

Jayal is 44.9 km distance from its District Main City Nagaur and 165 km distance from its State Main City Jaipur. Nearby villages with distance are Rajod (5 k.m.), Chhajoli (7.3 k.m.), Dharna (7.9 k.m.), Khinyala (8.1 k.m.), Sandeela (9.4 k.m.). Near By towns are Marwar Mundwa (40.8 k.m.).

History

Jayal was centre of Khichi Chauhans. Tejaji's ancestors were Khichi, who came from Khilchipur and ruled for about 1000 years. Manakrao (Khinchwal) is considered to be the epi-person of Khichi Chauhans. Manakrao was son of Asaraja (1110-1122 AD) of Nadol. [2]

Manakrao came to Jayal in 1111 AD. [3]


The genealogy of Khichis is maintained by Ram Singh Khichi of Jayal, bard of Khichis. Here is the family tree of Khichis as per records of Ram Singh Khichi:[4]

1. [[Manak Rao, 2. Ajay Rao, 3. Chandra Rao, 4. Lakhan Rao, 5. Govind Rao, 6. Ramdev Rao, 7. Maan Rao 8. Gundal Rao, 9. Someshwar Rao, 10. Lakhan Rao, 11. Lal Singh Rao, 12. Laxmi Chand Rao 13. Bhom Chand Rao, 14. Benn Rao, 15. Jodhraj

Gundal Rao was contemporary of Prithvi Raj Chauhan. [5]

Tejaji's ancestors were Nagavanshi descendant of Shvetanaga, who had five kingdoms in Central India, namely - 1. Khilchipur, 2. Raghaugarh, 3. Dharnawad, 4. Garhkila (Kilkila), and 5. Khairagarh

In Jayal Udayaraja developed differences with Kala clan people which led to a war in which Kala Jats of Jayal were defeated. But left Jayal and settled at Dholi Deh. Udayaraja occupied Kharnal from Khoja-Khokhar people and made his capital in V.S. 1021 (964 AD). Earlier name of Kharnal was Karnal but linguistic difference changed it to Kharnal. These facts are recorded in the Bahi of Bhairu Ram Bhat of Degana (Badwa of Dhaulya clan). [6]

Kala Jats had 27 villages around Jayal. Kalas were descendant of Kalanaga/Asitanaga. They were settled in Jayal since ancient times. They were known as Kalas of Jayal. [7]

तेजाजी के पूर्वज और जायल

संत श्री कान्हाराम[8] ने लिखा है कि.... [पृष्ठ-62] : रामायण काल में तेजाजी के पूर्वज मध्यभारत के खिलचीपुर के क्षेत्र में रहते थे। कहते हैं कि जब राम वनवास पर थे तब लक्ष्मण ने तेजाजी के पूर्वजों के खेत से तिल खाये थे। बाद में राजनैतिक कारणों से तेजाजी के पूर्वज खिलचीपुर छोडकर पहले गोहद आए वहाँ से धौलपुर आए थे। तेजाजी के वंश में सातवीं पीढ़ी में तथा तेजाजी से पहले 15वीं पीढ़ी में धवल पाल हुये थे। उन्हीं के नाम पर धौलिया गोत्र चला। श्वेतनाग ही धोलानाग थे। धोलपुर में भाईयों की आपसी लड़ाई के कारण धोलपुर छोडकर नागाणा के जायल क्षेत्र में आ बसे।


[पृष्ठ-63]: तेजाजी के छठी पीढ़ी पहले के पूर्वज उदयराज का जायलों (काला जाट) के साथ युद्ध हो गया, जिसमें उदयराज की जीत तथा जायलों की हार हुई। युद्ध से उपजे इस बैर के कारण जायल वाले आज भी तेजाजी के प्रति दुर्भावना रखते हैं। फिर वे जायल से जोधपुर-नागौर की सीमा स्थित धौली डेह (करणु के पास) में जाकर बस गए। धौलिया गोत्र के कारण उस डेह (पानी का आश्रय) का नाम धौली डेह पड़ा। यह घटना विक्रम संवत 1021 (964 ई.) के पहले की है। विक्रम संवत 1021 (964 ई.) में उदयराज ने खरनाल पर अधिकार कर लिया और इसे अपनी राजधानी बनाया। 24 गांवों के खरनाल गणराज्य का क्षेत्रफल काफी विस्तृत था। तब खरनाल का नाम करनाल था, जो उच्चारण भेद के कारण खरनाल हो गया। उपर्युक्त मध्य भारत खिलचीपुर, गोहाद, धौलपुर, नागाणा, जायल, धौली डेह, खरनाल आदि से संबन्धित सम्पूर्ण तथ्य प्राचीन इतिहास में विद्यमान होने के साथ ही डेगाना निवासी धौलिया गोत्र के बही-भाट श्री भैरूराम भाट की पौथी में भी लिखे हुये हैं।


संत श्री कान्हाराम[9] ने लिखा है कि....[पृष्ठ-111]: नागौर नागों की मूल राजधानी रही है। प्राचीन काल में यहाँ पानी की झील थी। जिसमें नागवंशियों का जलमहल था। पहले शिशुनाग (शेषनाग) और बाद में वासुकि नाग यहाँ राजा था। शिशुनाग जलमहल में निवास करता था। ईसा की चौथी शताब्दी में यहाँ नागों द्वारा दुर्ग का निर्माण किया गया था। इस दुर्ग का नाम नागदुर्ग। कालांतर में नागदुर्ग शब्द ही नागौर बना।

मध्यकाल में नागौर के चारों ओर तीन सौ से चार सौ किमी के क्षेत्र में नाग गणों के गणराज्य फैले हुये थे। नाग+गण = नागाणा । इस क्षेत्र को नागाणा बोला गया। इन गण राज्यों में 99 प्रतिशत नागवंश से निकली जाट शाखा के थे। आज नागौर के चारों और 400-500 किमी तक फैली जाट जाति अकारण नहीं है। इसका ठोस कारण प्राचीन गणराज्य है।

नागौर कई बार बसा और उजड़ा, उजड़ने के कारण इसका नाम नागपट्टन भी पड़ा। नागौर किले का माही दरवाजा भी नागवंशी परंपरा का उदाहरण है। इसके प्रस्तर खंडों पर नाग-छत्र बना हुआ है। नागौर का एक नाम अहिछत्रपुर भी है जिसका उल्लेख महाभारत में है। महाभारत युद्ध में अहिछत्रपुर के राजाओं ने भी भाग लिया था। अहिछत्रपुर का अर्थ है 'नागों की छत्रछाया में बसा हुआ पुर (नगर)'। यहाँ नागौर की धरती पर नाग वंश की जाट शाखा के राव पदवी धारी जाटों ने 200 वर्ष तक राज किया था।


[पृष्ठ-128]: तेजाजी के पूर्वज धौलिया गोत्र के जाट नागवंश की चौहान शाखा (खांप) की उपशाखा खींची नख से संबन्धित थे। खींची चौहान की उपशाखा है। इनके गणराज्य जायल क्षेत्र के अंतर्गत तेजाजी के पूर्वजों का गणराज्य खरनाल आता था। तेजाजी के पूर्वज श्वेतनाग शाखा के जाट थे। चौहान उनका दल था। खींची उनकी नख थी। जाट उनका वंश था।

जायल के खींची राज्य की स्थापना करने वाले माणकराव (खिंचलवाल) की आठवीं पीढ़ी में गून्दलराव हुआ था। खींची चौहनों की एक शाखा है। सांभर के चौहान शासक सिंहराज के अनुज लक्ष्मण ने 960 ई. में नाडोल राज्य की स्थापना की थी। लक्ष्मण के वंशज आसराज (1110-1122 ई) के पुत्र माणकराव, खींची शाखा का प्रवर्तक था। वह 1111 ई. में जायल आया था।

खींची शाखा की वंशावली जायल के राम सिंह खींची के पास उपलब्ध है। रामसिंह जायल से पूर्व दिशा में एक ढाणी में रहते हैं। तेजाजी के इतिहास के शोध के दौरान जायल के सहदेव बासट जाट के साथ लेखक उनसे मिले थे।


संत श्री कान्हाराम[10] ने लिखा है कि.... जायल खींचियों का मूल केंद्र है। उन्होने यहाँ 1000 वर्ष तक राज किया। नाडोल के चौहान शासक आसराज (1110-1122 ई.) के पुत्र माणक राव (खींचवाल) खींची शाखा के प्रवर्तक माने जाते हैं। तेजाजी के विषय में जिस गून्दल राव एवं खाटू की सोहबदे जोहियानी की कहानी नैणसी री ख्यात के हवाले से तकरीबन 200 वर्ष बाद में पैदा हुआ था।


[पृष्ठ-158]: जायल के रामसिंह खींची के पास उपलब्ध खींचियों की वंशावली के अनुसार उनकी पीढ़ियों का क्रम इस प्रकार है- 1. माणकराव, 2. अजयराव, 3. चन्द्र राव, 4. लाखणराव, 5. गोविंदराव, 6. रामदेव राव, 7. मानराव 8. गून्दलराव, 9. सोमेश्वर राव, 10. लाखन राव, 11. लालसिंह राव, 12. लक्ष्मी चंद राव 13. भोम चंद राव, 14. बेंण राव, 15. जोधराज

गून्दल राव पृथ्वी राज के समकालीन थे।

यहाँ जायल क्षेत्र में काला गोत्री जाटों के 27 खेड़ा (गाँव) थे। यह कालानाग वंश के असित नाग के वंशज थे। यह काला जयलों के नाम से भी पुकारे जाते थे। यह प्राचीन काल से यहाँ बसे हुये थे।

तेजाजी के पूर्वज राजनैतिक कारणों से मध्य भारत (मालवा) के खिलचिपुर से आकर यहाँ जायल के थली इलाके के खारिया खाबड़ के पास बस गए थे। तेजाजी के पूर्वज भी नागवंश की श्वेतनाग शाखा के वंशज थे। मध्य भारत में इनके कुल पाँच राज्य थे- 1. खिलचिपुर, 2. राघौगढ़, 3. धारणावद, 4. गढ़किला और 5. खेरागढ़

राजनैतिक कारणों से इन धौलियों से पहले बसे कालाओं के एक कबीले के साथ तेजाजी के पूर्वजों का झगड़ा हो गया। इसमें जीत धौलिया जाटों की हुई। किन्तु यहाँ के मूल निवासी काला (जायलों) से खटपट जारी रही। इस कारण तेजाजी के पूर्वजों ने जायल क्षेत्र छोड़ दिया और दक्षिण पश्चिम ओसियां क्षेत्र व नागौर की सीमा क्षेत्र के धोली डेह (करनू) में आ बसे। यह क्षेत्र भी इनको रास नहीं आया। अतः तेजाजी के पूर्वज उदय राज (विक्रम संवत 1021) ने खरनाल के खोजा तथा खोखर से यह इलाका छीनकर अपना गणराज्य कायम किया तथा खरनाल को अपनी राजधानी बनाया। पहले इस जगह का नाम करनाल था। यह तेजाजी के वंशजों के बही भाट भैरू राम डेगाना की बही में लिखा है।

तेजाजी के पूर्वजों की लड़ाई में काला लोगों की बड़ी संख्या में हानि हुई थी। इस कारण इन दोनों गोत्रों में पीढ़ी दर पीढ़ी दुश्मनी कायम हो गई। इस दुश्मनी के परिणाम स्वरूप जायलों (कालों) ने तेजाजी के इतिहास को बिगाड़ने के लिए जायल के खींची से संबन्धित ऊल-जलूल कहानियाँ गढ़कर प्रचारित करा दी । जिस गून्दल राव खींची के संबंध में यह कहानी गढ़ी गई उनसे संबन्धित तथ्य तथा समय तेजाजी के समय एवं तथ्यों का ऐतिहासिक दृष्टि से ऊपर बताए अनुसार मेल नहीं बैठता है।

बाद में 1350 ई. एवं 1450 ई. में बिड़ियासर जाटों के साथ भी कालों का युद्ध हुआ था। जिसमें कालों के 27 खेड़ा (गाँव) उजाड़ गए। यह युद्ध खियाला गाँव के पास हुआ था।


[पृष्ठ-159]: यहाँ पर इस युद्ध में शहीद हुये बीड़ियासारों के भी देवले मौजूद हैं। कंवरसीजी के तालाब के पास कंवरसीजी बीड़ियासर का देवला मौजूद है। इस देवले पर विक्रम संवत 1350 खुदा हुआ है। अब यहाँ मंदिर बना दिया है। तेजाजी के एक पूर्वज का नाम भी कंवरसी (कामराज) था।

जायल के पुरातात्वुक अवशेष

सीकर में स्थित जिला संग्रहालय के विविध प्रतिमा दीर्घा में खरसाडू से प्राप्त 10 वी शदी की लघु आकार की मूर्तियाँ, सुदरासन से प्राप्त 9 वीं शदी की विराट प्रस्तर प्रतिमाएं, गौराऊ से प्राप्त ऋषभनाथ, पार्श्वनाथ, आदिनाथ व पद्मप्रभु की जैन धातु प्रतिमाएं, जायल से प्राप्त पार्श्वनाथ तथा रघुनाथगढ़ से प्राप्त महिषासुरमर्दिनी प्रतिमाएं हैं. ग्राम गुरारा, तहसील श्रीमाधोपुर, जिला सीकर से 600 ई.पू.- 200 ई.पू. के पंचमार्क सिक्के चित्र प्रदर्शित हैं.

Population

Population of Jayal
1. Total 224,944
2. Male 114,881
3. Female 110,063

Monuments

Dadhimati Temple - Also known as Goth-Manglod temple; 40 km away from Nagaur; the oldest temple of the district constructed during the Gupta Dynasty (4th Century); Kul Devi of Dadhich Brahimins.

Education

Schools near Jayal

  1. GGUPS, Jayal.
  2. GUPS ADARSH, Jalniyasar.
  3. GPS, Rajod.

Jat gotras in Jayal

Villages in Jayal tahsil

Aheerpura (अहीरपुरा), Ajabpura (अजबपुरा), Akora (आकोड़ा), Ambali (अंबाली), Anwaliyasar (आंवलियासर), Arsinga (अडसिंगा), Arwar (अड़वड़), Bagrasar (बागरासर), Balaji Nagar (बालाजी नगर), Barnel (बरनेल), Barsoona (बरसुना), Batwari (बटवाडी), Berasar (बेरासर), Bhawla (भावला), Bhiniyad (भिनीयाद), Bhiniyad Chak-1(A) (भिनीयाद चक -एक (अ)), Bodind Kalan (बोडिंद कलां), Bodind Khurd (बोडिंद खुर्द), Borwa (बोड़वा), Boseri (बोसेरी), Bugarda (बुगरड़ा), Burdi (बुरडी), Chawad (चवाद), Chawali (चावली), Chhajoli (छाजोली), Chhapra (छापरा/छापड़ा), Chhawata Kalan (छावटा कलां), Chhawata Khurd (छावटा खुर्द), Danta (दांता), Deediya Kalan (डिडिया कलां), Deediya Khurd (डीडिया खुर्द), Deh (डेह), Dehroli (डेहरोली) , Dhanani (धाननी), Dharna (धारणा), Dhatiyad (धाटीयाद), Dheejpura (धीजपुरा), Dhehari (ढेहरी), Dodoo (डोडू), Dotina (दोतीणा), Dugastau (दुगस्ताऊ), Dugoli (दूगोली), Ewad (ऐवाद), Firozpura (फिरोजपुरा), Gadriya (गडरिया), Geloli (गेलोली), Gorau (गोराउ), Gotardi (गोटरड़ी), Goth (गोठ), Gugriyali (गुगरियाली), Gujariyawas (गुजरियावास), Gumanpura (गुमानपुरा), Gurharohili (गुढ़ा रोहिली), Hirasani (हीरासनी), Igyar (इग्यार), Jakhan (जाखन), Jalniyasar (जालनियासर), Janewa (जानेवा) (East), Janewa (जानेवा) (West), Janwas (जानवास), Jayal (जायल), Jhalalar (झलालड़), Jhareli (झाड़ेली), Jhunjhala (झुंझाला), Jocheena (जोचीणा), Jyani (ज्याणी), Kachras (कचरास), Kalvi (कालवी), Kameriya (कमेड़िया), Kangsiya (कांगसिया), Kasari (कसारी), Kashipura (काशीपुरा), Kasnau (कसनाऊ), Kathoti (कठौती), Khabariyana (खाबडियाना), Khanpura Manjra (खानपुरा मांजरा), Khicharon Ka Bas Boseri (खीचड़ो का बास), Khanwar (खंवर), Khara Manjra (खारा मांजरा), Khari Jodha, (खारी जोधा) Khatoo Kalan (खाटू कलां), Khera Narnoliya (खेड़ा नारनोलिया), Kheraheerawas (खेड़ा हीरावास), Kherat (खेराट), Kherwar (खेरवाड़), Khetolaw (खेतोलाव), Khinyala (खियांला), Khinyawas (खींयावास), Kishanpura (किशनपुरा), Kunwar Khera, (कुंवर खेड़ा) Kusiya (कुशिया), Lunsara (लूणसरा), Manglod (मांगलोद), Matasukh (मातासुख), Meetha Manjra (मीठा मांजरा), Merwas (मेरवास), Moti Nagar (मोतीनगर), Mundi (मुंडी), Mundiyau (मुंदियाऊ), Naradhana (नराधना), Neem Nagar (नीमनगर), Nimbora (निंबोड़ा), Nokha Jodha (नोखा जोधा), Nooriyas (नूरियास), Nosariya (नोसरिया), Pannapura (पन्नापुरा), Pateli (पातेली/पादेली), Peendiya (पींडिया), Phardod (फरड़ोद), Piriyara (पीडीयारा), Rajod (राजोद), Rampura A(रामपुरा अ), Rampura B (रामपुरा ब), Ramsar (रामसर), Ratanga (रातंगा), Rohina (रोहिणा), Rol (रोल), Rooniya (रूणिया), Roopathal (रूपाथल), Rotoo (रोटू), Sandeela (सांडिला), Sedau (सेडाऊ), Shivnagar (शिवनगर), Silariya (सिलारिया), Somana (सोमणा), Soneli (सोनेली), Surpaliya (सुरपालिया), Suwadiya (सुवादिया), Talniyau (टालनियाऊ), Tangla (टांगला), Tangli (टांगली), Tanwara (तंवरा), Tarnau (तरनाऊ), Tatarwa (टाटरवा), Tatarwi (टाटरवी), Tejasar (तेजासर), Ubasi (उबासी), Unchaira (ऊंचाइडा),

Notable persons

  • सहदेव बासट - तेजाजी के इतिहास के शोध के दौरान जायल के सहदेव बासट जाट ने लेखक संत श्री कान्हाराम का सहयोग किया।

External links

References

  1. जयं महाजयं चैव नागौ जवलनसूनवे, परथथौ पुरुषव्याघ्र वासुकिः पन्नगेश्वरः Mahabharata (IX.44.48)
  2. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p.157
  3. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p.128
  4. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p.158
  5. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p.158
  6. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p.63,158
  7. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. p.158
  8. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.62-63
  9. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.111, 128
  10. Sant Kanha Ram: Shri Veer Tejaji Ka Itihas Evam Jiwan Charitra (Shodh Granth), Published by Veer Tejaji Shodh Sansthan Sursura, Ajmer, 2015. pp.157-159

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