Bhanwari Kaur

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Author:Laxman Burdak, IFS (Retd.)

Shaheed Bhanwari Kaur

Bhanwari Kaur (भंवरी कौर) was sister of Gokula (गोकुला) or Gokul Singh (गोकुल सिंह) who was a Jat chieftain of village Sinsini/tilpat near Mathura in Uttar Pradesh, India.

This article based on grass root informations collected by Jat Samaj monthly magazine[1] proves that this fact is wrong that the members of family of Gokula were converted to Islam.

The first serious outbreak of anti-imperial reaction took place among the Jats of Mathura district, where the imperial faujdar 'Abdun-Nabi', had oppressed them greatly. In 1669 the sturdy Jat peasantry rose under a leader, Gokula, Zamindar of Tilpat, killed the faujdar, and kept the whole district in disorder for a year, till they were suppressed by a strong imperial force under Hasan Ali Khan, the new faujdar of Mathura. Gokula was put to death.[2] The Indian historians, based on facts provided by Muslim sources, write that after the death of Gokula members of his family were converted to Islam. [3]

In early 1669 Aurangzeb appointed a strong follower of Islam Abdunnabi as Faujdar of Mathura to curb the Hindus of this area. Abdunnabi established a cantonment near Gokul Singh and conducted all his operations from there. Gokula organized the farmers not to give taxes to the Mughals. The Mughal soldiers retaliated, beginning the struggle of the farmers. Meanwhile Aurangzeb issued orders on 9 April,1669 to abolish the temples of Hindus. As a result large number of Hindu temples and ancient heritages of the period of Kushans were damaged. [4]During month of May, 1669 the faujdar Abdunnabi seized village Sihora. Gokula was there and there was a fight in which Abdunnabi was killed. Gokula and his fellow farmers moved further, attacked and destroyed Sadabad cantonment. Sadullakhan had founded Sadabad during the period of Shahjahan. This incidence inspired the depressed Hindus to fight against atrocities of the Mughal rulers. [5]The fights continued for five months. [6]

The rebels gathered at the village of Sahora (about 6 miles from Mathura). Abdun Nabi, the faujdar of Mathura, attacked them. At first he appeared to be gaining ground, but in the middle of the fighting he was killed on 12 may, 1669 (21st Zil-Hijja, 1079 A.H.) [7], [8], [9], [10]


Overjoyed at this success, Gokula ravaged the paragana and town of Sadabad (24 miles from Mathura) in the Daob. [11], [12], [13] The turbulence spread to Agra District also whereto Radandaz Khan was sent (13th May – 22nd Zil-Hijja) with a force to put down the rebels. Aurangazeb appointed Saf Shikan Khan as the new faujdar of Mathura. [14], [15] As arms failed to prevail, diplomacy was resorted to.

After defeat in Sadabad and Sihora the new faujdar Saf Shikan Khan started campaign to take revenge with Gokula. He had learnt that on the occasion of haryali teej festival, the young girls gather to celebrate it with malhar songs and swings in entire Brij region. The young sister of Gokula, Bhanwar Kaur, also joined the festival at a garden out side Tilpat on haryali teej in shravan month in year 1669.[16]

The new faujdar Saf Shikan Khan and his soldiers seized the place of celebration of haryali teej by the young girls and started misbehaving with them. Bhanwar Kaur along with her friends counter acted by attacking with ropes of swings and gofans. They could manage to get felled one of the soldiers from his horse and with sword obtained from him killed the soldier. This technique worked and the girls could kill more soldiers this way. Saf Shikan Khan at first got frightened but attacked Bhanwar Kaur. Bhanwar Kaur could defend the attack and wounded the horse of Saf Shikan Khan which left the field along with Saf Shikan Khan. Rest of the soldiers also ran away. the girls could kill 17 soldiers in the fight. Mean while a shot from a soldier who was running away killed the brave girl Bhanwar Kaur. Total 11 girls were killed in the war with Mugal soldiers. [17]

बृज बाला शहीद भंवरी कौर

बृज बाला शहीद भंवरी कौर अमर शहीद गोकुल सिंह की बहिन थी. सामान्यतया यह प्रचार इतिहास में किया गया है कि गोकुलसिंह की बहिन ओर रिश्तेदारों को मुसलमान बना लिया गया था. यह तथ्य ग़लत है जो इस लेख से स्थापित होता है. यह खोजपूर्ण लेख आगरा से प्रकाशित पत्रिका जाट समाज के अगस्त 1995 में छपे लेख [18]पर आधारित है.

औरंगजेब की धर्मान्धता पूर्ण नीति

सर यदुनाथ सरकार लिखते हैं - "मुसलमानों की धर्मान्धता पूर्ण नीति के फलस्वरूप मथुरा की पवित्र भूमि पर सदैव ही विशेष आघात होते रहे हैं. दिल्ली से आगरा जाने वाले राजमार्ग पर स्थित होने के कारण, मथुरा की ओर सदैव विशेष ध्यान आकर्षित होता रहा है. वहां के हिन्दुओं को दबाने के लिए औरंगजेब ने अब्दुन्नवी नामक एक कट्टर मुसलमान को मथुरा का फौजदार नियुक्त किया. [19] सन १६७८ के प्रारम्भ में अब्दुन्नवी के सैनिकों का एक दस्ता मथुरा जनपद में चारों ओर लगान वसूली करने निकला. अब्दुन्नवी ने पिछले ही वर्ष, गोकुलसिंह के पास एक नई छावनी स्थापित की थी. सभी कार्यवाही का सदर मुकाम यही था. गोकुलसिंह के आह्वान पर किसानों ने लगान देने से इनकार कर दिया. मुग़ल सैनिकों ने लूटमार से लेकर किसानों के ढोर-डंगर तक खोलने शुरू कर दिए. बस संघर्ष शुरू हो गया. [20]

तभी औरंगजेब का नया फरमान ९ अप्रेल १६६९ आया - "काफ़िरों के मदरसे और मन्दिर गिरा दिए जाएं". फलत: ब्रज क्षेत्र के कई अति प्राचीन मंदिरों और मठों का विनाश कर दिया गया. कुषाण और गुप्त कालीन निधि, इतिहास की अमूल्य धरोहर, तोड़-फोड़, मुंड विहीन, अंग विहीन कर हजारों की संख्या में सर्वत्र छितरा दी गयी. सम्पूर्ण ब्रजमंडल में मुगलिया घुड़सवार और गिद्ध चील उड़ते दिखाई देते थे . और दिखाई देते थे धुंए के बादल और लपलपाती ज्वालायें- उनमें से निकलते हुए साही घुडसवार. [21]

अत्याचारी फौजदार अब्दुन्नवी का अन्त

मई का महिना आ गया और आ गया अत्याचारी फौजदार का अंत भी. अब्दुन्नवी ने सिहोरा नामक गाँव को जा घेरा. गोकुलसिंह भी पास में ही थे. अब्दुन्नवी के सामने जा पहुंचे. मुग़लों पर दुतरफा मार पड़ी. फौजदार गोली प्रहार से मारा गया. बचे खुचे मुग़ल भाग गए. गोकुलसिंह आगे बढ़े और सादाबाद की छावनी को लूटकर आग लगा दी. इसका धुआँ और लपटें इतनी ऊँची उठ गयी कि आगरा और दिल्ली के महलों में झट से दिखाई दे गईं. दिखाई भी क्यों नही देतीं. साम्राज्य के वजीर सादुल्ला खान (शाहजहाँ कालीन) की छावनी का नामोनिशान मिट गया था. मथुरा ही नही, आगरा जिले में से भी शाही झंडे के निशाँ उड़कर आगरा शहर और किले में ढेर हो गए थे. निराश और मृतप्राय हिन्दुओं में जीवन का संचार हुआ. उन्हें दिखाई दिया कि अपराजय मुग़ल-शक्ति के विष-दंत तोड़े जा सकते हैं. उन्हें दिखाई दिया अपनी भावी आशाओं का रखवाला-एक पुनर्स्थापक गोकुलसिंह. [22]

सादाबाद और सिहोरा की हार से बौखलाए सल्तनत का निशाना तिलपत और गोकुला बन गए. अब प्रतिदिन गोकुला से इस अपमान की भरपाई करने की तरकीबें सोचते रहता. तभी मथुरा के तत्कालीन सूबेदार सफ शिखन खान को सूचना मिली कि हरयाली तीजों के त्यौहार पर पूरे बृज प्रदेश में गाँव-गाँव नव वधुएँ, युवतियां, गीत, मल्हार गाने, झूला झूलने एकत्रित होती हैं. गोकुला की बहिन भंवर कौर भी ख़ुद हूर की परी थी, इस मौके पर जरुर आएगी. इसलिए गोकुला से बदला लेने और उसकी बढ़ती प्रसिद्धि को रोकने का इससे अच्छा मौका नहीं मिलेगा.

भंवर कौर का मुग़ल सैनिकों से मुकाबला

पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अंसार १६६९ के श्रावण मास की हरयाली तीज के दिन शिखन खां ने घुड़सवारों तथा अंगरक्षकों के साथ तिलपत से बाहर गाँव के पास बाग़ को घेर लिया.

भंवर कौर अपनी पूर्ण यौवनावस्था में थी, दायित्व और वीरत्व के संस्कार उसे विरासत में मिले थे. अपने आकर्षक व्यक्तित्व के कारण वह अन्य सहेलियों से सर्वोपरि लग रही थी. गाँव से बाहर बाग़ में झूले पड़े हुए थे और मीठी सुरीली आवाज में सखियाँ मल्हार गाने लगी. वे झोटा दे रही थी और मस्ती में ठिठोली और अठखेलियाँ कर रही थी.

शिखन खान, कल्पना और वासना से बेहद पीड़ित हो रहा था. वह बेकाबू मन को न रोक सका और अनायास ही लड़कियों के झुंड के पास पहुँचा. उसके साथियों ने लड़कियों पर झपट्टा मरकर उन्हें हतास करना चाह परन्तु वीर बालाएँ इन अजूबे वेशधारियों से न तो भयभीत हुई और न भागी. शिखन खान ने जैसे ही भंवर कौर की और कुदृष्टि से हाथ बढ़ाना चाहा तो उस बृज बाला ने कहा - "ठहर जा, गीदड़, कुत्ते, हरामी, तेरी शामत तुझे यहाँ ले आई है. मेरी और हाथ बढ़ने का मतलब बर्रों के छाते में हाथ डालना होगा".

भंवर कौर की दहाड़ से शिखन खां बेहयाई से हंसा और कहा कि "ऐ जाने मन, तू जितनी ऊपर से सुंदर दिखती है उतनी ही अन्दर से गर्म मिजाज मालूम पड़ती है. तू यहाँ इन गवारों के बीच रहने लायक नही है तुझे तो महलों में होना चाहिए".

"बेहूदे, बदतमीज़ तेरी बहन बेटी नहीं है क्या? यदि तेरी बहन बेटी है तो उसे ले आ उसे मैं अपनी भाभी रानी बना लूंगी."

भंवर कौर की गर्जना से शिखन खां और चिढ़ गया. वह आगे कुछ कर पाता इससे पहले ही भंवर कौर ने झूला उतारकर उसकी रस्सी में पटली बाँध कर गोफन की तरह घुमाते हुए शिखन खां की और फेंकी जो कि उसके सर में लगी- इसके लगते ही वह बुरी तरह हड़बड़ा गया.

उसने अपनी अन्य सखियों को इन घुड़सवारों से मुकाबला करने को ललकारा. भंवर कौर और सखियाँ आनन-फानन में पटली और झूले वाली रस्सियों से सुसज्जित हो गयी. मुग़ल सैनिक इन वीरांगनाओं के निश्चय को नहीं जान पाए. भंवर कौर ने दाहिने हाथ से रस्सी घुमाकर एक सैनिक के गले पर फैंक दी. रस्सी गले के चारों और लिपट गयी. भंवर कौर ने जोर से झटका मारा और सैनिक घोड़े से नीचे धड़ाम से आ गिरा. भंवर कौर की दूसरी सखी ने पटली से वार किया. सिपाही अर्धम्रत निढाल हो गया. भंवर कौर ने बिजली जैसी चपलता से सैनिक की तलवार अपने काबू में की और एक ही वार से मुग़ल सैनिक का धड़ और सिर अलग हो गए. यही क्रम चलता रहा. इस तरह कई सिपाही मौत के शिकार हुई. वीरांगनाओं का यह रणचातुर्य देख शिखन खां पहले तो दहल गया किंतु अविलम्ब क्रोधित हो भंवर कौर की और झपटा. भंवर कौर पहले से तैयार थी. शिफन खां ने तलवार से वार किया. भंवर कौर ने पटली आगे कर उसे ढाल का काम लिया. वार बेकार हो गया. भंवर कौर ने विद्युत-वेग से पलट कर वार किया. चालाक शिखन खां स्वयं तो बच गया किंतु उसका घोडा घायल हो गया.

बाग़ के मध्य घमासान होने लगा. वीरांगनाओं ने अबतक कई घुड़सवारों को रस्सी से निचे गिराया और मौत के घाट उतार दिया. खिसियाए सैनिक इन अबलाओं पर करारे प्रहार करने लगे. वीरांगनाएं भी कट-कट कर धरासाई होने लगी. चतुर भंवर कौर ने शिखन खां के घायल घोडे पर एक और वार किया. घोडा चित्कार कर उठा और घायल घोड़ा शिखन खां को लेकर भाग खड़ा हुआ. शिखन खां को भागते देख अन्य सैनिकों के पैर भी उखड गए. भागते सैनिकों पर उत्साहित वीरांगनाओं ने तेज और लंबे प्रहार किए. किसी कवि ने ठीक ही कहा है:

अबलाएं करती थी संगर , वे बनी सिंहनी क्षत्राणी
केवल श्रृंगार नहीं सूझा, तलवार धार में था पानी
कितने ही यवनों को काटा,
जैसे हो फसल को काट रहीं
रणचंडी बनकर देखो वे
अरि रक्त को चाट रहीं [23]

भंवर कौर ने भागते हुई दो सैनिकों को धराशाई कर दिया. भंवर कौर अतिउत्साह में थी. अपनी सुरक्षा का ध्यान कम हो गया. तभी एक भागते सैनिक ने बंदूक दागी जो भंवर कौर का सीना चीरती हुई पार कर गयी. बृज वीरांगना भंवर कौर शहीद हो गयी.

इस लड़ाई में 17 मुग़ल सैनिक मारे गए. भंवर कौर सहित 11 बहनें शहीद हुई. गढ़ी तिलपत में समाचार पहुँचा और गाँववासी बाग़ में पहुँच गए. बाग में आतताई मुग़ल सैनिकों और वीरांगनाओं की लाशें छितरी पड़ी थी. हरयाली तीज का त्यौहार शोक में बदल गया. दिवंगत वीरांगनाओं का दाह संस्कार सामूहिक रूप से बाग़ के मध्य में कर दिया गया. प्रति वर्ष हरयाली तीज पर इन शहीद वीरांगनाओं की स्मृति में शहीद मेला लगाने का गाँव-गाँव में निश्चय हुआ. यह परम्परा आज भी बृज क्षेत्र के गांवों में चल रही है.

See also

सन्दर्भ

  1. Jat Samaj monthly magazine, Agra, August 1995
  2. R.C. Majumdar, H.C. Raychaudhari, Kalikinkar Datta: An Advanced History of India, 2006, p.490
  3. R.C. Majumdar, H.C. Raychaudhari, Kalikinkar Datta: An Advanced History of India, 2006, p.490
  4. Narendra Singh Verma: Virvar Amar Jyoti Gokul Singh (Hindi), Sankalp Prakashan, Agra, 1986, p. 33
  5. Narendra Singh Verma: Virvar Amar Jyoti Gokul Singh (Hindi), Sankalp Prakashan, Agra, 1986, p. 34
  6. Narendra Singh Verma: Virvar Amar Jyoti Gokul Singh (Hindi), Sankalp Prakashan, Agra, 1986, p. 35
  7. Maasir, p. 83
  8. Roznamcha also known as Ibratnama by Muhammad (R.S.L. Ms p. 133
  9. Kamwar (pers. Ms.), II, p. 163
  10. Maasir-ul-Umra, I, p. 437, 618
  11. Maasir, p.93
  12. Maasir-ul-Umra, I, p. 437, 618
  13. Fatuhat, 9pers. Ms.) 53a
  14. Maasir, p.83, 84
  15. Maasir-ul-Umra, I, p. 618, II, p. 673
  16. Jat Samaj, Agra, August 1995, p. 21
  17. Jat Samaj, Agra, August 1995, p. 22
  18. प्रतापसिंह फौजदार :बृज बाला शहीद भंवरी कौर, जाट समाज, आगरा, अगस्त १९९५ पेज 20-23
  19. नरेन्द्र सिंह वर्मा - वीरवर अमर ज्योति गोकुल सिंह, संकल्प प्रकाशन, आगरा, 1986, पृष्ट 33
  20. नरेन्द्र सिंह वर्मा - वीरवर अमर ज्योति गोकुल सिंह, संकल्प प्रकाशन, आगरा, 1986, पृष्ट 33
  21. नरेन्द्र सिंह वर्मा - वीरवर अमर ज्योति गोकुल सिंह, संकल्प प्रकाशन, आगरा, 1986, पृष्ट 34
  22. नरेन्द्र सिंह वर्मा - वीरवर अमर ज्योति गोकुल सिंह, संकल्प प्रकाशन, आगरा, 1986, पृष्ट 34
  23. डॉ धर्मचन्द्र विद्यालंकार

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