Gokul Mathura

From Jatland Wiki
(Redirected from Gokula)
Jump to navigation Jump to search
Author:Laxman Burdak, IFS (R)

Mathura district map

Gokul (गोकुल) is a historic and religious town in the Mathura district of the Indian state of Uttar Pradesh. Lord Krishna is said to have spent his childhood in Gokul.

Origin

Variants

Location

It is located 15 kms south-east of Mathura. The town has an average elevation of 163 metres (535 ft). It is a suburb of the inland town of Mahavan on the bank of the Yamuna.[1]

Jat clans

History

This is the town where infant Lord Krishna was brought up in secrecy by his foster mother Yashoda. Situated on the banks of the Yamuna, Gokul is frequented by pilgrims, especially during Janmashtami and Annakut festival. The place is also associated with Saint Vallabhacharyaji who lived here. Some important spots are:

Shri Thakurani Ghat: It is a popular Ghat where Shri Vallabhacharya received Darshan of Shri Yamuna Maharani. Thus, this place seeks special reverence from the followers of Lord Vishnu especially those from the Vallabha sect.

Nanda Bhavan: The divine Architect Vishwakarma had built Nanda Bhavan 5000 years ago. Located on a hill, it was the house of Nanda, foster father of Lord Krishna. In this house, young Krishna and his brother Balarama were brought up while his birth parents were imprisoned by King Kamsa in Vrindavan.

Raman Reti: Raman Reti is believed to be the sand in which Lord Krishna played as a child. In more recent times, about 200 years ago, the famous Saint, Swami Gyandasji did a severe penance at Raman Reti for 12 years. Pleased with his devotion, The Lord appeared before him and today you can find a Ramanbihariji Mandir at that spot. Today devotees roll over the sand here and seek the blessings of Lord Krishna.

Rangbihariji Temple: The main idol of Rangbiharji temple is the exact image of Lord Krishna described by Swami Gyandas ji as he was the one who had the opportunity to see the divine.

In Mahabharata

Gokula (गॊकुल) in Mahabharata (VIII.4.38)

Karna Parva/Mahabharata Book VIII Chapter 4 mentions the warriors who are dead in Mahabharata War amongst the Kurus and the Pandavas after ten days. Gokula (गॊकुल) warriors are mentioned in Mahabharata (VIII.4.38). [2]....Those other heroes also, (the Narayana Gopas) who live and grew in Gokula, who were exceedingly wrathful in battle, and who never retreated from the field have been slain by Savyasachi.Many thousands of Srenis, as also the samsaptakas, approaching Arjuna, have all repaired to the abode of Yama.

गोकुल (मथुरा)

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है ...गोकुल जिला मथुरा (AS, p.297): मथुरा के सामने यमुना के दूसरे तट पर बसा हुआ है. वसुदेव ने कृष्ण को, मथुरा में उनके जन्म के तुरंत पश्चात, कंस से उनके रक्षा करने के लिए, गोकुल में नंद-यशोदा के घर पहुँचा दिया था. गोकुल में कृष्ण का प्रारंभिक बालपन बीता. तत्पश्चात कंस के उत्पातों से बचने के लिए नंद उनको लेकर वृंदावन में जाकर बस गए.

गोकुल का प्राचीन संस्कृत साहित्य में अनेक स्थानों पर वर्णन है. हरिवंश पुराण में श्री कृष्ण की कथा में इसका उल्लेख है. श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में गोकुल का अनेकों बार नंद के ग्राम के रूप में उल्लेख है-- 'करौ वैवार्षिको दत्तो राज्ञे दृष्ट्वा वयम् च व:, नेह स्थेयं बहुतिथं सन्त्युत्पाताश्च गोकुले. इति नंदादयो गोपा: प्रोक्तास्ते शौरिणा ययु:, अनोभिरनडुद्युक्तैस्तमनुज्ञाप्य गोकुलम्' 10.6.31-32.

विष्णु पुराण में भी कृष्ण के बचपन के निवास स्थान के रूप में गोकुल का वर्णन है-- 'विवेश गोकुलं गोपीनेत्रपानैक भाजनम्'-- 5, 16, 28. 'अक्रूरोगोकुलं प्राप्त: किंचित् सूर्ये विराजति' 5, 17, 18.

गोकुल के मथुरा के सन्निकट बसा होने के कारण इसका इतिहास बहुत कुछ मथुरा के इतिहास से श्रंखलाबद्ध रहा है (देखें:मथुरा), किंतु फिर भी इतिहास की लंबी अवधि में गोकुल का पृथक रूप से नाम का उल्लेख या निर्देश भी कभी-कभी मिलता है. कहा जाता है कि क्लिसोबोरा नामक जिस स्थान का वर्णन मेगस्थनीज ने किया है वह कृष्णपुर या केशवपुर का ही ग्रीक रूपांतर है और यह शायद गोकुल का भी अभिधान हो.

गुप्तकाल में मथुरा की भांति गोकुल में भी बौद्ध धर्म का काफी प्रभाव था. चीनी यात्री फाह्यान (लगभग 400 ई.) ने लिखा है कि यूना (-यमुना) नदी के दोनों ओर 20 संघाराम हैं जिनमें 300 भिक्षु निवास करते हैं. युवानच्वाङ्ग ने सातवीं सदी में मथुरा का वर्णन किया है और उसने वहां के निवासियों को विद्या प्रेमी और कोमल स्वभाव का बताया है. गोकुल का अलग से उल्लेख उसने नहीं किया है किंतु उसके मथुरा के वर्णन से जान पड़ता है की गोकुल में भी इस समय बौद्ध धर्म का जोर रहा होगा. फिर भी गुप्त काल में हिंदू धर्म का पुनरुत्थान प्रारंभ हो गया था और धीरे-धीरे मथुरा गोकुल आदि नवीन हिंदू धर्म के प्रभावशाली केंद्र बनते जा रहे थे.

1017 ई. में जब महमूद गजनवी ने मथुरा पर आक्रमण किया, गोकुल भी मथुरा

[p.298]: की ही भांति वैष्णवतीर्थ था किन्तु शायद यहां बड़े विशाल मंदिर न होने के कारण वह आक्रमणकारी की दृष्टि से बाहर रहा और उसके बर्बर कृत्यों का शिकार होने से बच गया. सिकंदर लोदी के समय में मथुरा में होने वाले घोर विध्वंस के समय भी गोकुल शायद अपनी अप्रसिद्धि के कारण ही बचा रहा. औरंगजेब के जमाने में भी जब मथुरा के शासक अब्दुल नबी ने यहां के प्रसिद्ध मंदिर को तोड़ा तो गोकुल उसकी वक्र दृष्टि से बचा रहा. 1757 ई. में अहमद शाह अब्दाली ने मथुरा पर आक्रमण किया और महावन में अपना शिविर बनाया. उसका विचार गोकुल को भी विध्वस्त करने का था किंतु वहां के 4 सहस्त्र नागा, आक्रांता अब्दाली की सेना से सामना करने को निकल पड़े. उन्होंने बड़ी वीरता से अब्दाली के दो हजार सैनिकों को यमपुर भेजदिया यद्यपि स्वयं भी उनके अनेक व्यक्ति आहत हुये. उनकी वीरता के कारण ही गोकुल अब्दाली की भयंकर आग से बच गया यद्यपि इस बर्बर अफगान आक्रांता ने मथुरा और वृंदावन को लूटकर भस्मसात् कर दिया और हजारों निर्दोष व्यक्तियों को तलवार के घाट उतार दिया. 1786 ई. से 1803 ई. तक गोकुल और मथुरा पर मराठों का अधिकार रहा और तत्पश्चात अंग्रेजों का. यह काल अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण था और इन स्थानों का प्राचीन गौरव पुनः एक बार भारतीय जनता के हृदयों में जागृत हुआ.

वर्तमान गोकुल में यद्यपि अनेक स्थान कृष्ण के बालपन से संबंधित हैं किंतु यहां कोई भव्य या अधिक प्राचीन मंदिर नहीं है. वास्तव में मथुरा और वृंदावन के मंदिरों के विशाल वैभव और सौंदर्य के सामने आज का गोकुल ग्रामीण और फीका जँचता है. शायद यही स्थिति इसकी प्राचीन इतिहास के पूरे दौर में रही है. क़ृष्ण के समय में भी तो गोकुल छोटी-सी ग्रामीण बस्ती ही थी.

External links

References

  1. http://uptourism.gov.in/post/gokul
  2. गॊकुले नित्यसंवृथ्धा युथ्धे परमकॊविथाः, शरेणयॊ बहुसाहस्राः संशप्तक गणाश च ये (VIII.4.38)
  3. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.297-298