Keken

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Kekan (केकन) Kaikan (केकन) is a gotra of Jats.[1]

Origin

It derives name from the ancestor Kekan or Kilat (किलात). [2]

History

The Jats were in independent possession of country of Kaikan. Country of Kaikan is supposed to be in south-eastern Afghanistan.[3], which was conquered from them by the Arab general Amran Bin Musa in the reign of the Khalif Al-Mutasim-bi-llah, -A.D. 833-81. [4],[5]

Kaikan province

Kikan (कीकान) Kaikan (केकन) was a province in Sind. Kikania is the name of a mountain. When the Arab invaders first time came to Kaikan mountains, the Jats repelled them. K.R.Kanungo[6] writes that when Muhammad bin Qasim invaded Sind, Kaikan country was in independent possession of Jats. The country of Kaikan was supposed to be in south-eastern Afghanistan [7], which was conquered from Jats by the Arab general Amran Bin Musa in the reign of the Khalifa Al-Mutasim-bi-llah, (833-881 AD)[8]. During the same reign another expedition was sent against the Jats who had seized upon the roads of Hajar (?)...and spread terror over the roads and planted posts in all directions towards the desert. They were overcome after a bloody conflict of twenty five days. 27000 of them were led in captivity to grace the triumph of victor. It was a custom among these people to blow their horns when Marshalled for battle.[9], [10],[11]

केकान : ठाकुर देशराज

ठाकुर देशराज[12] ने लिखा है.... कैक - मद्रों की भांति ही यह भी शिवि जाटों की एक शाखा में से बताए जाते हैं। सन् 833 में अरब के सरदार अमरानवीन ने इन लोगों को जीत लिया और यह राज्य सदा के लिए नष्ट कर दिया। यह अफगानिस्तान के दक्षिण पूर्व में केकान पहाड़ के आसपास के प्रदेश के अधिपति थे।

कैकान

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि यह एक प्रदेश का नाम है। कीकानियां नाम का एक पहाड़ भी है। जिस समय कीकान पहाड़ में पहले पहल अरब विजेता आए थे तो जाटों ने उन्हें मारकर भगा दिया था। ‘हिस्ट्री आफ जाटस्’ में श्री कालिकारंजन कानूनगो ने कैकान प्रदेश के जाटों का वर्णन इस प्रकार किया है -

“कैकान का देश, जो कि अफगानिस्तान के दक्षिण-पूर्व में अनुमान किया जाता है, अरब के सेनापति अमरानवीन मूसा ने बाद में उनसे सन् 833 ई. के लगभग छीन लिया था। उन्हीं दिनों में जाटों पर जिन्होंने कि हजारा की सड़क पर अपना अधिकार जमा लिया था और रेगिस्तान की तरफ खम्बे गाड़कर सबके दिल दहला दिए थे, दूसरा हमला किया गया। पच्चीस दिन के खून-खच्चर के बाद वे जीत लिए गए और सत्ताईस हजार की संख्या में कैद कर लिए गए। इन लोगों में लड़ाई के समय तुरई बजाने का रिवाज था।”

कहा जाता है कि सिन्ध में सातवीं शताब्दी तक जाटों का राज रहा था। चच ने उन्हें सामाजिक स्थिति से बहुत कुछ गिरा दिया। नये शासक मुहम्मद बिन कासिम ने भी उनके साथ कोई अच्छा व्यवहार नहीं किया। ब्राह्मण वजीर ने तो मुहम्मद कासिम को बताया था कि जाट, राजाओं के विरुद्ध विद्रोह करने में प्रवीण हैं। वे कभी भी आपका साथ नहीं दे सकते।

मौलाना सुलेमान नदबी ने अपने ‘अरब भारत के संबंध’ नामक व्याख्यान में लिखा है -


1. सिन्ध का इतिहास, पृ. 30


जाट इतिहास:ठाकुर देशराज,पृष्ठान्त-702


“सिन्धु में काका नाम का एक व्यक्ति प्रसिद्ध, बुद्धिमान और राजनीतिज्ञ था। जाट रईस लोग उसके पास जाकर उससे सलाह करते हैं कि क्या मुसलमानों की सेना पर छापा मारा जाए? वह उत्तर में कहता है - यदि तुम ऐसा कर सको तो अच्छा है। पर सुनो हमारे पंडितों और योगियों ने मंत्र देखकर भविष्यवाणी की है कि इस देश को एक दिन मुसलमान जीत लेंगे। जाट लोग उसकी बात नहीं मानते और हानि उठाते हैं।... इसके बाद काका मुहम्मद बिन कासिम के पास जाता है और जाटों के विचार से सूचित करता है।

यद्यपि उस समय ब्राह्मण राजाओं के साथ जाटों का संघर्ष था, फिर भी वे अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए मुहम्मद कासिम के विरुद्ध यद्ध छेड़ते हैं। यदि काका भी जो कि चन्ना वंश का राजपूत था, जाटों के साथ शामिल हो जाता तो अरब से आए मुसलमानों के सिन्ध में पैर न जमते।

Jat Monuments

Notable persons

  • Nikhil Kinha

External links

References

  1. डॉ पेमाराम:राजस्थान के जाटों का इतिहास, 2010, पृ.297
  2. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihasa (The modern history of Jats), Agra 1998, p. 232
  3. Elliot,i. 383)
  4. (Elliot, i. 448)
  5. History of the Jats:Dr Kanungo/Origin and Early History,p. 17
  6. K.R.Qanungo, History of the Jats, Ed. dr Vir Singh, 2003, p.17
  7. Elliot, I, 383
  8. Elliot, I, 448
  9. Elliot, II, 247
  10. Thakur Deshraj, Jat Itihas (Hindi), Maharaja Suraj Mal Smarak Shiksha Sansthan, Delhi, 1934, 2nd edition 1992 page 702.
  11. Sindh Ka itihas, p.30
  12. Thakur Deshraj: Jat Itihas (Utpatti Aur Gaurav Khand)/Shashtham Parichhed, p.125

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