Scythia

From Jatland Wiki
Jump to: navigation, search
Achaemenid empire at its greatest extent
Map showing Scythia

Scythia (Hindi: सीथिया, Persian: اسکیت ها or سکا ها‎), (/ˈsiθiə/; Ancient Greek: Σκυθική) was a multinational region of Central Eurasia in the classical era, encompassing parts of Pontic steppe, Central Asia, and Eastern Europe.

Ancient Greeks gave the name Scythia (or Great Scythia) to all the lands north-east of Europe and the northern coast of the Black Sea.

Location

Its location and extent varied over time but usually extended farther to the west than is indicated on the map opposite.[1]

The region known to classical authors as Scythia included:

सीथिया देश

दलीप सिंह अहलावत[4] लिखते हैं:

सीथिया देश - “यह देश (देन्यूब नदी) से लेकर ठीक दक्षिणी रूस के पार तक, कैस्पियन सागर के पूर्व में अमू दरिया एवं सिर दरिया की घाटी तक, पामीर पहाड़ियों की शृंखला तक तथा तारिम नदी की घाटी तक फैला हुआ था। शकवंशीय जाटों ने आर्यावर्त से बाहर जाकर शक देश आबाद किया जो कि उनके नाम पर शकावस्था कहलाया, जिसका अपभ्रंश नाम सीथिया पड़ गया।”

मध्य एशिया - सीथिया देश की सीमा के भीतर ही मध्य एशिया या तुर्किस्तान देश की स्थिति है। चीन देश के पश्चिम, ईरान तथा अफगानिस्तान के उत्तरपूर्व, तिब्बत के उत्तर और एशियाई रूस के दक्षिण में जो विशाल खण्ड है, उसे मध्य एशिया या तुर्किस्तान कहते हैं। चन्द्रवंशज सम्राट् ययाति के पुत्र तुर्वसु के नाम पर इस देश का नाम तुर्वसस्थान-तुर्कस्थान-तुर्किस्तान पड़ा,


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-332


तुर्की भी इसी नाम पर है। (देखो तृतीय अध्याय, शक एवं तंवर-तोमर जाटवंश)

सीथिया तथा मध्य एशिया

दलीप सिंह अहलावत[5] ने लिखा है....

सीथिया देश - पिछले पृष्ठों पर लिख दिया है कि “यह देश (देन्यूब नदी) से लेकर ठीक दक्षिणी रूस के पार तक, कैस्पियन सागर के पूर्व में अमू दरिया एवं सिर दरिया की घाटी तक, पामीर पहाड़ियों की शृंखला तक तथा तारिम नदी की घाटी तक फैला हुआ था। शकवंशीय जाटों ने आर्यावर्त से बाहर जाकर शक देश आबाद किया जो कि उनके नाम पर शकावस्था कहलाया, जिसका अपभ्रंश नाम सीथिया पड़ गया।”

मध्य एशिया - सीथिया देश की सीमा के भीतर ही मध्य एशिया या तुर्किस्तान देश की स्थिति है। चीन देश के पश्चिम, ईरान तथा अफगानिस्तान के उत्तरपूर्व, तिब्बत के उत्तर और एशियाई रूस के दक्षिण में जो विशाल खण्ड है, उसे मध्य एशिया या तुर्किस्तान कहते हैं। चन्द्रवंशज सम्राट् ययाति के पुत्र तुर्वसु के नाम पर इस देश का नाम तुर्वसस्थान-तुर्कस्थान-तुर्किस्तान पड़ा,


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-332


तुर्की भी इसी नाम पर है। (देखो तृतीय अध्याय, शक एवं तंवर-तोमर जाटवंश)

पाठकों की जानकारी के लिए, विदेशों में जाट राज्य सम्बन्धित कुछ विशेष बातें जो कि पण्डित कालीचरण शर्मा की लिखित “आर्यों का प्राचीन गौरव” नामक पुस्तक के आधार पर हैं -

1. कैस्पियन सागर - दुष्यन्तपुत्र भरत, जिसकी माता शकुन्तला ने उसका पालन-पोषण कश्यप ऋषि के आश्रम पर किया था और कश्यप जी का आश्रम कैस्पियन सागर और काले सागर के मध्य कौकेशश (कॉकेशश या काफ पर्वत) के निकट ऐलबुर्ज पर्वत पर था, जहां से कि फरात नदी निकलती है। कैस्पियन सागर के किनारे कश्यप महर्षि का आश्रम था इसलिए वहां के निवासी आज पर्यन्त कैस्पियन रेश के कहलाते हैं। कैस्पियन को बहर-ए-खिजर भी कहते हैं। खिजर अपभ्रंश है केसर का। तात्पर्य है केसर के रंग वाले समुद्र से (पृ० 29-31)।

जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, पृ० 90-91 पर लेखक बी० एस० दहिया ने लिखा है कि –

“जब कश्यप गोत्र के जाटों का शासन इस क्षेत्र पर हुआ तब उनके नाम पर यह सागर, ‘कैस्पियन सागर’ कहलाया। इसके पश्चात् जब वरिक (वाह्लीक) जाटों की शक्ति वहां पर हुई, तब इसका नाम ‘हिरकानिया सागर’ पड़ा। वरिक को ईरानी भाषा में वरकन-वर्क तथा यूनानी भाषा में हिरकान कहा गया है। जब वहां पर दहिया जाटों का शासन हुआ, तब इसको ‘दहाय सागर’ कहा गया। गिल जाटों का वहां शासन होने पर यह ‘गिलन सागर’ कहा गया। गिल को फारस वालों ने गिलन तथा यूनानियों ने गिलन्ज-गेलन्ज लिखा है। बाद में जब खजर (गूजर जाटवंश) की शक्ति उस क्षेत्र पर हुई, तब यह ‘बहर-अल-खजर’ कहलाया जिसका अर्थ है खजरों का सागर (History of Persia, P. syke, Vol. 1, P. 26)।”

पण्डित कालीचरण शर्मा ने तुर्की एवं यूनान के विषय में लिखा है –

2. यूरोपियन टर्की - इसको ‘सल्तनत आटोमेन ऐम्पायर’ कहते हैं। (देखो दी हिस्टोरिकल लीजेन्ड्स आफ पर्शिया बाई जोन विलसन डी, डी, ऐम, आर, ए, ऐस)। आटोमेन यौगिक शब्द है ओटो + मेन का। ओटो अपभ्रंश है यदु का। मेन अपभ्रंश है मनु का। तात्पर्य है यदुवंशियों से। इस साम्राज्य की राजधानी कुन्सतुनतुनिया को यदुवंशी बादशाह कोन्स्टेनटाइन ने आबाद किया था। कोन्स्टेनटाइन अपभ्रंश है कंसतनतनियां का। कंसतन = कंस का लड़का। तनियां = कंसतन की लड़की, अर्थात् कंस के लड़के की लड़की के वंश में। इसीलिए इस वंश की पदवी ‘अफरासिआब जाह’ कहलाती है। अफरासिआब अपभ्रंश है अप्रिय श्याम का। तात्पर्य है श्री कृष्णचन्द्र जी से शत्रुता रखने वाले कंस के वंश के यदुवंशी। (पृ० 10-11)

यह पहले लिखा जा चुका है कि सम्राट् ययातिपुत्र यदु से यादववंश प्रचलित हुआ जो कि जाटवंश है। देखो तृतीय अध्याय, यादववंश प्रकरण)।

3. ग्रीस (यूनान) - सल्तनत यूनान को ग्रीस कहते हैं। ग्रीस अपभ्रंश है गौरेश का। गोर = गौरे, ईश = स्वामी अर्थात् यूरोप निवासी गोरे आदमियों का देश। इसीलिए महाभारत आदि में गौराण्ड करके पुकारा गया है। यूनान में जो सबसे पहला राजा हुआ उसका नाम माइनस् था। माइनस् अपभ्रंश है मनु का। मनु सबसे प्रथम श्रेणी का फिलोस्फर (योगी), लेजिस्लेटर (कानूदां) और चक्रवर्ती महाराजा हुआ है। (पृ० 11)


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-333


4. ताशकन्दी - ताशकन्दी के रहने वाले ताशकन्दी कहलाते हैं। ताशकन्दी अपभ्रंश है तक्षखण्डा का। तात्पर्य है भरत जी के ज्येष्ठपुत्र तक्ष के उत्तराधिकारियों से। तक्ष की राजधानी तक्षशिला थी। पेशावर के निवासी पेशावरी कहलाते हैं। पेशावर अपभ्रंश है पुष्कलावरी का। तात्पर्य है भरत जी के द्वितीय पुत्र पुष्कल के उत्तराधिकारियों से। पुष्कल की राजधानी पुष्कलावती थी जिसको अब पेशावर कहते हैं जो कि अपभ्रंश है पुष्कलावत का। (देखो वा० रा० उत्तरकाण्ड, सर्ग 101)। इससे सिद्ध हुआ है कि तक्ष के पुत्र ताशकन्दी और पुष्कल के पुत्र पेशावरी कहलाते हैं (पृ० 16-17)।

5. मुग़ल - मंगोलिया के रहने वाले मुगल कहलाते हैं। मुगल को अरबी में माहकुल कहते हैं और माहकुल को फारसी में चन्द्रकुल कहते हैं। माह = चन्द्र और कुल = खानदान। तात्पर्य है चन्द्रवंशियों से। मुगलों के आदिपुरुष को चगटाई, दी चंगेजखां कहते हैं। चगटाई अपभ्रंश है चकीटो का।

तात्पर्य है श्रीकृष्ण जी के उत्तराधिकारी महाराज बलन्द के पौत्र चकीटो से (टॉड राजस्थान)। महाराज बलन्द, जो कि शालिवाहनपुर रहा करते थे, वे गजनी देश का राज्य अपने पौत्र चकीटो के अधीन छोड़ आये। चकीटो ने म्लेच्छ कौम के लोगों को अपनी सेना में भरती कर लिया तथा उनको सेना के तमाम बड़े-बड़े पदों पर नियुक्त कर दिया। उन्होंने चकीटो को तज़वीज़ पेश की कि अगर आप अपने पुरुषाओं के धर्म को त्याग देवें तो आपको बल्ख-बुखारा का मालिक बना दिया जाएगा, जहां पर उषबेक जाति आबाद है, जिसके बादशाह के पास एक लड़की के सिवाय कोई औलाद नहीं है। चकीटो ने यह सुझाव मानकर बादशाह की उस लड़की के साथ विवाह कर लिया और बल्ख-बुखारे का बादशाह बन गया तथा 28,000 घोड़ों का सरदार हो गया। चकीटो बलिखशान के फाटक से हिन्दुस्तान के मुंहड़े तक सबका बादशाह था और उसी से चकीटो मुग़ल के फ़िर्के की उत्पत्ति है। (ऐनल्स आफ जैसलमेर अध्याय 1 पृष्ठ 1061)। (पृ० 18-19)

(जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, पृ० 118 पर बी० एस० दहिया ने भी op, cit, p.248 के हवाले से, ऊपर वाले लेख के समान ही लिखा है। आगे लिखा है कि तुर्क और तातार, ये तुर और तातरान जाटवंशज थे जिन्होंने छठी सदी ईस्वी तथा उससे भी बाद में अमू दरिया (मध्य एशिया) घाटी में राज्य किया (पृ 119)।

ऊपर वाले उदाहरणों से यह बात साफ है कि मुगल, यदुवंशज श्रीकृष्ण जी के वंशज हैं, जो कि जाट थे।

6. समरक़न्द - समरक़न्द के निवासी समरक़न्दी कहलाते हैं। समरक़न्दी अपभ्रंश है सम्बरखण्डी का। तात्पर्य है महाराणी उषा के पिता सम्बासुर के उत्तराधिकारियों से। इसीलिए समरक़न्द के नजदीक खीवा और बुखारा के बीच रहने वाले लोग उषबेक कहलाते हैं। उषबेक अपभ्रंश है उषबेंक का। तात्पर्य है श्रीमती महाराणी उषा के पितृवंशियों से (टॉड राजस्थान) (पृ० 20)। जिस स्थान पर श्रीकृष्ण जी का सम्बरासुर से युद्ध हुआ था, समरकन्द कहलाता है।

यह वही सम्बरासुर है जिसकी राजकन्या उषा का श्रीकृष्णपुत्र अनिरुद्ध के साथ स्वयंवर हुआ था। वह स्थान जहां पर सम्बरासुर की माता ‘कोटरा’ रहती थी, ‘कोक़न्द’ कहलाता है, जो कि


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-334


अपभ्रंश और लघुरूप है ‘कोटरा खण्ड’ का (देखो श्रीमद् भागवत)। वह स्थान जहां पर असुर लोगों ने पहली आबादी स्वीकार की थी, ‘निशांपुर’ कहलाता है जो कि अपभ्रंश है ‘निशापुर’ का। जैसे - निशाचर या असुरों का देश। (पृ० 44-45)।

7. ईरान (फारस) - ईरान को ‘सिकन्दर नामा अंग्रेजी’ में एरियाना करके माना गया है। एरियाना अपभ्रंश है आर्याना का। आर्यान् बहुवचन है आर्य का अर्थात् आर्यों के रहने का देश। तात्पर्य है आर्यावर्त के पश्चिमी भाग से। इसलिए अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान और ईरान की उग्रभूमि को प्लेटो ऑफ एरियान कहा जाता है (पृ० 21)।

ईरान को फारस भी कहते हैं। फारस अपभ्रंश और लघुरूप है भारतवर्ष का। त और ब का लोप हो गया। ईरान के रहने वाले ईरानी कहलाते हैं। ईरानी गुणवाचक है एरियान् का। तात्पर्य है आर्यान् से। फारस के रहने वाले फारसी तथा पारसी कहलाते हैं। फारस तथा पारसी अपभ्रंश और लघुरूप है भारतवासी का। त और व का लोप हो गया है। संस्कृत का ‘भ’ अपभ्रंश होकर फारसी में ‘फ’ हो जाता है। जैसे गृभिः से गिर्फ़्त (दी फौनटेन हैड आफ़ रिलीजन बाई बाबू गंगाप्रसाद एम० ए० एम० आर० ए० एस० पृ० 88 व 89)।

आर्य शब्द जिन्दावस्था (पारसियों की धार्मिक पुस्तक) में अनेक स्थानों में आया है। इससे सिद्ध हुआ कि पारसी अपने को स्वयं आर्यजाति से मानते हैं। (पृ० 22-23)

ईरानियों के दो खानदान प्रसिद्ध हैं। 1. खानदान पेशदादा 2. खानदान सासानियां। पेशदादा यौगिक शब्द है पेश + दाद का। पेश = आगे, दाद = इन्साफ़। अर्थात् न्याय प्रणाली (मानव धर्मशास्त्र) को सबसे पहले चलानेवाला खानदान, तात्पर्य है सूर्यवंशियों से। (देखो दी पारसी रिलीजन जिन्दावस्था बाई जौन विल्सन डी० डी० म० आर० ए० एस०)।

सासानियां अपभ्रंश है शशिनियां का। शशिनियां गुणवाचक है शशि का। शशि = चन्द्रमा। तात्पर्य है चन्द्रवंशियों से। (पृ० 23-24)

8. एशिया माइनर (लघु एशिया) - एशिया माइनर और यूरोपियन टर्की के राज खानदान को ओटोमेन कहते हैं।

ओटोमेन अपभ्रंश है यदुमनु का। तात्पर्य है यदुवंशियों से। (देखो दी पारसी रिलीजन जिन्दावस्था बाई जौन विल्सन डी० डी० ऐम० आर० ए० एस० पृ० 581)

खानदान ‘ओटोमेन’ जो इस समय कुस्तुनतनियां में राज कर रहा है। इसलिए एशिया माइनर वाले अपने को ‘जुडाह’ से मानते हैं। जुडाह अपभ्रंश है यदु का। (देखो दी पारसी रिलीजन जिन्दावस्था बाई जौन विल्सन डी० डी० एम० आर० ए० एस० पृ० 564)

जुडाहवंशीय ‘जुड्डास’ कहलाते हैं। उनको मुसलमान ‘यहूदी’ और यूरोपियन ‘ज्यूज’ कहते हैं। (देखो दी फौनटेन हेड ऑफ रिलीजन बाई गंगाप्रसाद वर्मा एम० ए० एम० आर० ए० एस०)। यहूदियों की तरह ईसाई लोग भी तौरेत को ईश्वरीय आज्ञा मानते हैं।

श्रीकृष्ण जी के उत्तराधिकारी एशिया माईनर में ‘सेमी’ तथा सेमीटिक्स कहलाते हैं। इन्हीं को मुसलमान ‘सामी’ कहते हैं। सामी अपभ्रंश है साम्बु का। तात्पर्य है श्रीकृष्ण जी के पुत्र


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-335


साम्बुवंशियों से (देखो टॉड राजस्थान)। श्रीकृष्ण जी की सातवीं पटरानी का नाम जाम्बुवन्ती था, जिसका ज्येष्ठ पुत्र साम्बु कहलाया। उसने सिन्ध नदी के दोनों ओर के देशों में अधिकार प्राप्त किया और खानदान ‘सीना-साम’ कायम किया, जिससे ‘जरेजा’ वंश की उत्पत्ति हुई। जरेजावंश के कविराजाओं का कथन है कि उनके पूर्व पुरुष शाम या सीरिया से आये थे। (ऐनल्स ऑफ जैसलमेर पृ० 1054) (पृ० 24-26)

एशिया माइनर के देशों में रहने वाले लोगों को मीडीज भी कहते हैं। मीडीज़ अपभ्रंश है मधु का। तात्पर्य है मधुवंशियों से (देखो टॉड राजस्थान अंग्रेजी)। मीडीज़ सम्राट् ययाति की सन्तान हैं (देखो श्रीमद्भागवत, पृ० 44)। आगे श्रीमद्भागवत, अध्याय 23, पृ० 70, श्लोक 28-29 में लिखा है कि यद्यपि वृष्णि और यदु के कारण से मधु का वंश माधव, वृष्णि और यादव इन तीन नामों को प्राप्त हुआ था, परन्तु वृष्णि ही इस वंश में श्रेष्ठ था (ये तीनों जाटगोत्र हैं)। ऊपरलिखित उदाहरणों से प्रमाणित हो जाता है कि एशिया माइनर के सब देश यदुवंशज, श्रीकृष्णवंशज या जाटवंशज हैं।

9. प्राचीन आर्यावर्त के भाग - इस समय प्राचीन आर्यावर्त के दो भाग हैं।

एक - वैदिक धर्मावलम्बी, संस्कृत भाषा के जाननेवाले आर्यजनों का देश ब्रह्मपुत्र से लेकर सिन्धु नदी तक।

दूसरा - अवैदिक धर्मावलम्बी, अपभ्रंश भाषाओं के जानने वाले आर्यजनों का देश सिन्धु नदी से लेकर यूफ्रीट्स (फ्राद) और टिग्रिस (दजला) नदियों तक।

अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान, मध्य एशिया, ईरान और एशिया माइनर कोई पृथक् देश नहीं थे वरन् आर्यावर्त के प्रान्त मात्र थे। (पृ० 33)

10. अरमेनियां - वह स्थान जो असुरों के महान् बल का अड्डा था, अरमेनियां कहलाता है। अरमेनियां अपभ्रंश है अरि-महान् का। अरि = शत्रु, महान् = बलवान्।

11. ऐज़रबैजान - अरमेनियां के दक्षिण जहां पर देवासुर संग्राम हुआ था, ऐज़रबैजान कहलाता है। जो कि अपभ्रंश है असुरभंजन का (देखो हिस्टोरिकल लीजेन्ड्स आफ़ पर्शिया बाई जौन विल्सन डी० डी० एम० आर० ए० एस० अंग्रेजी (पृष्ठ 578)। क्योमर्ष ने साम्राज्य ईरान की स्थापना की और उसकी राजधानी प्रान्त ऐज़रबैजान नियत की। पहाड़ और जंगलों के रहने वाले जिंनों (असुरों) ने इन शुभकार्यों में बाधा डाली तथा देव और जिंनों का युद्ध आरम्भ हो गया। शाहनामा ईरान पृ० 4-5 पर इस युद्ध को “जंगवा लश्करे देवासार” लिखा है, जो कि अपभ्रंश है देवासुर का। वाल्मीकि रामायण, सर्ग 47, पृ० 112 पर इस युद्ध को देवासुर संग्राम लिखा है। उस समय विष्णु जी के प्रतिकूल जो असुर खड़ा हुआ उसी को ही विष्णु जी ने वैष्णवी चक्र से चूर्ण कर डाला॥43॥ इस प्रकार अदिति के वीर पुत्र अगणित दैत्य इस देवासुर संग्राम में मारे गये॥44॥

12. जियोर्जिया (Georgia) - अरमेनियां में जहां पर देवता अर्थात् आर्यों को पूर्ण विजय प्राप्त हुई थी ‘जियोर्जिया’ कहलाता है, जो कि अपभ्रंश है ‘जब आर्य’ का।

13. इराक़ -ऐजरबैजान के दक्षिण में, जहां पर श्री नारायण जी का हिरण्याक्ष से युद्ध हुआ था,


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-336


इराक़ कहलाता है जो कि अपभ्रंश है ‘हिरण्याक्ष’ का।

14. परथिया - ईरान का हरा-भरा देश ‘परथिया’ कहलाता है, जो कि अपभ्रंश है पृथा का। महाराणी कुन्ती के तीन नाम प्रसिद्ध थे - मायके का नाम ‘पृथा’, पांचाल देश के राजा कौन्त की पोष्य-पुत्री होने से ‘कुन्ती’ और देवहूती मंत्र जानने से ‘देवहूती’। इसीलिए ईरानी लोग पृथा की जन्मभूमि अर्थात् मायके को ‘परथिया’ और देवहूत को ‘हुमा’ कहते हैं, जो कि अपभ्रंश और लघुरूप है ‘देवहूती’ का (देखो हिस्टोरिकल लीजेन्ड्स आफ़ पर्शिया बाई जौन विल्सन डी० डी० एम० आर० ए० एस०)।

हूमा, एक नाम है जिससे अभिप्राय है स्वर्ग में रहनेवाली चिड़िया। देवहूती जिसका अर्थ है देवताओं का आवाहन करने वाली। दोनों का तात्पर्य एक ही है।

इसी परथिया देश में सूर्यकुमार कर्ण की उत्पत्ति हुई थी। इसीलिए जिस नदी में कर्ण का प्रवाह किया गया था आज भी वह नदी ‘करन’ कहलाती है जो कि ईरान की खाड़ी में गिरती है। ‘करन’ अपभ्रंश है कर्ण का। (पृ० 34-36)।

ईरानी लोग कर्ण को ‘दारा’ तथा ‘दराव’ कहते हैं। दारा अपभ्रंश है ‘द्यौरा’ का और दाराब अपभ्रंश है ‘द्यौरवि’ का। द्यौ = सूर्य, रवि रविनन्दन। तात्पर्य है सूर्यकुमार कर्ण से। दाराब या दारा जिसको यूनानी ‘दी बास्टर्ड’ कहते हैं अर्थात् जो कवारेपन में उत्पन्न हुआ हो और जिसके पिता का पता न हो। जिस नगर को महाराणी कुन्ती अर्थात् हूमा ने श्री कृष्णचन्द्र व बलराम जी के नाम से बसाया था उसको सामराम कहते हैं, जो कि अपभ्रंश है ‘श्यामराम’ का (देखो हिस्टोरिकल लीजेन्ड्स आफ़ पर्शिया बाई जौन विल्सन डी० डी० एम० आर० ए० एस० (पृष्ठ 583-584)।

15. बल्ख - कर्दम प्रजापति के बड़े पुत्र जिनका नाम ‘इल’ था, की पहली राजधानी ‘बल्ख’ थी जो कि अपभ्रंश है वाह्लीक का। ‘इल’ धर्मात्मा सम्राट् का शासन वाह्लीक देश पर था (वा० रा० उ० का० सर्ग 90)। यह वही बल्ख है जहां पर व्यास ऋषि ने गश्ताश्य शाह के अभिवादन पर उसके मन्त्री ज़र्दश्न अर्थात् ज़ौरेस्टर की वेदान्त में परीक्षा ली थी। (देखो दी फौंटेन हैड आफ़ रिलीजन बाई बाबू गंगाप्रसाद)।

नोट - वाह्लीक (बल्ख) देश - वरिक वाहिक-वाह्लीक गोत्र के जाटों के नाम पर इस देश का नाम वाह्लीक पड़ा।

16. अफ़गानिस्तान - यह अपभ्रंश है अपगानस्थान का। अप = बुरा, गान = गाना, स्थान = देश। अर्थात् बुरे गायकों का देश। इसीलिए इस देश को फ़ारसी लुग़ात में गिरिया व जारी करने वालों का देश कहा है। वास्तव में यह देश गान्धर्व देश था, जिसका अर्थ है गानविद्या को धारण करने वालों का देश। यह सर्वगत ब्रह्म के जानने वाले, सामवेद के गाने वालों का देश था जिसको अब ‘कन्धार’ कहते हैं जो कि अपभ्रंश है ‘गान्धार’ का। यह वही देश है जिसके राजा की राजकन्या श्रीमती महाराणी गान्धारी महाराज धृतराष्ट्र से ब्याही थी। (वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड सर्ग 100 में भी गन्धर्व देश का नाम है)। (पृ० 39)।

17. ग़ज़नी - अफ़गानिस्तान की प्राचीन राजधानी ग़ज़नी है जो कि अपभ्रंश है गजनी का।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-337


इस नगर को श्रीकृष्ण जी के वंशज राजा गज ने बनवाया था (टॉड राजस्थान)। जब राजा गज की यादव सेना का युद्ध असुरों की सेना से हो रहा था और असुर सेना अपना बल बढ़ा रही थी तो इस दशा में एक किला बनाने की आवश्यकता पड़ी। तब राजा गज ने अपने मंत्रियों की सलाह से उत्तरी पहाड़ों के मध्य एक किला बनवाया तथा उसका नाम गजनी रखा। संवत् धर्मराज (युधिष्ठिर) 3008, रोहिणी नक्षत्र, वसन्त ऋतु, वैसाख बदी तीज, रविवार को राजा गज, गजनी के सिंहासन पर आसीन हुआ और यदुवंशियों के नाम को कायम रखा। (टॉड राजस्थान, पृष्ठ 1057, 1059) (पृ० 40)।

नोट - 1. आज युधिष्ठिरी संवत् 5088 है जो कि ईस्वी सन् से 3100 वर्ष पहले चालू हुआ था तथा राजा गज, गजनी के राजसिंहासन पर ईस्वी सन् से 1020 वर्ष पहले आसीन हुआ था। 2. श्रीकृष्ण जी के वंशज राजा गज एवं उसके वीर सैनिक जाट थे।

18. हिन्दूकुश - तृतीय अध्याय, रामायणकाल में ऋषिक-तुषार जाटवंश के प्रकरण में यह लिख दिया गया है कि इस पर्वत का नाम महाभारतकाल में तुषारगिरि था जो कि इस क्षेत्र पर तुषार गोत्र के जाटों का शासन होने से उनके नाम पर ‘तुषारगिरि’ कहा गया। बाद में मुसलमानों के समय में इस पर्वत का नाम हिन्दुकुश पड़ गया, जिसका ब्यौरा निम्नलिखित है -

हिन्दुकुश अपभ्रंश है इन्दुकुश का। इन्दु चन्द्रमा और कुश = मारना, अर्थात् जहां पर चन्द्रवंशीय श्रीकृष्ण जी के वंशज महाराज सुबाहु, रिझ, गज, शालिवाहन और बलंद ने मुसलमानों से भीषण युद्ध किये थे, इसीलिए उस देश के पहाड़ों की पंक्ति को इन्दुकुश या हिन्दुकुश कहते हैं (टॉड राजस्थान, पृ० 41)। इन युद्धों का वर्णन इसी अध्याय में उचित स्थान पर किया जायेगा।

19. क्रौंचवन - करांची अपभ्रंश है क्रौंच का। क्रौंच देश यदुवंशियों की मौरुसी सल्तनत है। वा० रा० उत्तरकाण्ड सर्ग 59, श्लोक 20 में लिखा है कि “राजकुल से बहिष्कृत यदु ने नगर में तथा दुर्गम कौंचवन में सहस्रों यातुधानों को जन्म दिया।” (पृ० 42)

पूर्वकाल में राजपूताना से लेकर मराको तक (सुआहारः अर्थात् छुहारे के जंगल) और उसकी शाखाओं में जितने देश विस्तृत हैं वे सब वेरान थे तथा क्रौंचवन के नाम से प्रसिद्ध थे। सम्राट् ययाति ने अपने पुत्र यदु को क्रौंच का वन दिया था। जंगल के साफ और आबाद होने पर इस वन का नाम मरुस्थली पड़ा। ‘मराको’ अपभ्रंश है ‘मरु’ का, तात्पर्य है मरुदेश से।

राजपूताना, अफ़गानिस्तान, बलूचिस्तान, ईरान, अरब, मिश्र, लीबिया, अल्जीरिया और मराको आदि देशों की मरुभूमियां प्रसिद्ध ही हैं। अतः राजपूताना से लेकर मराको तक जितने देश (सहारा के जंगल) तथा उसकी शाखाओं में आबाद हैं, उन सबको मरुस्थली कहते हैं (टॉड राजस्थान)।

मरुस्थली के राजा नाभा के पुत्र पृथबाहु ने भी श्रीकृष्ण जी के राजचिन्ह विश्वकर्मा के बनाए हुए शाही छत्र के सहित धारण किए। इसीलिए दजला व फ्रात नदियों के मध्य देश को जुडिया कहते हैं, जो कि अपभ्रंश है ‘जदु’ का। तात्पर्य उस देश से है जिसको यदुवंशियों के आदि पुरुष ‘यदु’ ने आवर्त्त किया था (देखो दी प्रोफेसिज़ रस्पेक्टिंग क्राइस्ट विद देअर फुलफिलमेंट बाई जौन विल्सन डी० डी० एम० आर० ए० एस० पृष्ठ 556। यदु से यादव जाटवंश चला।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-338


जैसस, जुडिया के बैथेलियम में उत्पन्न हुआ था। इस देश को सीरिया या शाम भी कहते हैं। सीरिया अपभ्रंश है श्री का, शाम अपभ्रंश है श्याम का, तात्पर्य सेनीटोरियम् (श्री कृष्ण जी से) है इसीलिए एशिया माइनर व शमूल सीरिया या शाम, अरब और टर्की का साम्राज्य आज तक ‘आटोमेन ऐम्पायर’ कहलाता है। ‘आटोमेन’ अपभ्रंश है ‘यदुमनु’ का। तात्पर्य साम्राज्य यदुवंशियों से है (देखो “दी हिस्टोरिकल लीजेन्ड्स आफ़ पर्शिया बाई जौन विल्सन डी० डी० एस० आर० ए० एस० पृष्ठ 581)। खानदान आटोमेन, जो इस समय कुस्तुनतुनिया में राज्य करता है, इसकी तसदीक टॉड राजस्थान से भी होती है (देखो ऐनल्स ऑफ जैसलमेर पृ० 1054)।

जरेजा वंशावली में लिखा है कि उनके पुरुषा शाम या सीरिया से आये थे। सीरिया की प्राचीन राजधानी बेबीलोन मानी जाती है, जो कि अपभ्रंश है बाहुबलान् का। बाहुबलान् बहुवचन है बाहुबल का। यह नगर श्रीकृष्ण जी के उत्तराधिकारी महाराज बाहुबल का आवर्त्त कराया मालूम देता है। (देखो टॉड राजस्थान ऐनल्स ऑफ जैसलमेर पृष्ठ 1055)।

नाभा के पुत्र, मरुस्थली के राजा पृथबाहु ने श्रीकृष्ण जी के राजचिह्न विश्वकर्मा के बनाए हुए राजसी छत्र के सहित धारण किए। पृथबाहु के पुत्र का नाम बाहुबल था। ‘बाहुल मंडप’ अपभ्रंश है “बाहुबल मंडप” का। तात्पर्य महाराज बाहुबल के सभा स्थान से है (पृ० 43-44)।

ऊपरलिखित प्रमाणों से सिद्ध हुआ कि पूर्व में ब्रह्मपुत्र से लेकर पश्चिम में यूफ्रेट्स (फ्रात) और टाईग्रिस (दजला) नदियों तक, उत्तर में हिमालय पर्वत की माला, समरकन्द, कोकन्द, निशांपुर, कैस्पियन और कॉकेशस, दक्षिण में समुद्र पर्यन्त आर्यजन निवास करते थे। इन सीमाओं के अन्तर्गत जितने देश हैं वे आर्यावर्त कहलाते थे। इसलिए ईरान, अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान, एशिया माइनर, पाकिस्तान, बांग्लादेश और वर्तमान भारतवर्ष के जितने प्रदेश हैं वे सब आर्यावर्त के प्रांत मात्र हैं।

20. यूरोप देश - इस देश को प्राचीनकाल में कारुपथ तथा अङ्गदियापुरी कहते थे, जिसको श्रीमान् महाराज रामचन्द्र जी के आज्ञानुसार लक्ष्मण जी ने एक वर्ष यूरोप में रहकर अपने ज्येष्ठ पुत्र अंगद के लिए आबाद किया था1 जो कि द्वापर में हरिवर्ष तथा अंगदेश और अब हंगरी आदि नामों से प्रसिद्ध है। अंगदियापुरी के दक्षिणी भाग में रूम सागर और अटलांटिक सागर के किनारे-किनारे अफ्रीका निवासी हब्शी आदि राक्षस जातियों के आक्रमण रोकने के लिए लक्ष्मण जी ने वीर सैनिकों की छावनियां आवर्त्त कीं। जिसको अब ऑस्ट्रिया कहते हैं। उत्तरी भाग में ब्रह्मपुरी बसाई जिसको अब जर्मनी कहते हैं। दोनों भागों के मध्य लक्ष्मण जी ने अपना हैडक्वार्टर बनाया जिसको अब लक्षमबर्ग कहते हैं। उसी के पास श्री रामचन्द्र जी के खानदानी नाम नारायण से नारायण मंडी आबाद हुई जिसको अब नॉरमण्डी कहते हैं। नॉरमण्डी के निकट एक दूसरे से मिले हुए द्वीप अंगलेशी नाम से आवर्त्त हुए जिसको पहले ऐंग्लेसी कहते थे और अब इंग्लैण्ड कहते हैं।

द्वापर के अन्त में अंगदियापुरी देश, अंगदेश के नाम से प्रसिद्ध हुआ, जिसका राज्य सम्राट् दुर्योधन ने अपने मित्र राजा कर्ण को दे दिया था। करीब-करीब यूरोप के समस्त देशों का राज्य


1. लक्षमण जी अंगदियापुरी में एक वर्ष तक रहे, अंगद का वहां राज्य दृढ़ होने पर, अयोध्या को चले आये (वा० रा० उत्तरकाण्ड, सर्ग 102, श्लोक 2 से 11 तक)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-339


शासन आज तक महात्मा अंगद के उत्तराधिकारी अंगवंशीय तथा अंगलेशों के हाथ में है, जो कि ऐंग्लो, एंग्लोसेक्शन, ऐंग्लेसी, इंगलिश, इंगेरियन्स आदि नामों से प्रसिद्ध है और जर्मनी में आज तक संस्कृत भाषा का आदर तथा वेदों के स्वाध्याय का प्रचार है। (पृ० 1-3)।

यूरोप अपभ्रंश है युवरोप का। युव-युवराज, रोप-आरोप किया हुआ। तात्पर्य है उस देश से, जो लक्ष्मण जी के ज्येष्ठपुत्र अङ्गद के लिए आवर्त्त किया गया था। यूरोप के निवासी यूरोपियन्स कहलाते हैं। यूरोपियन्स बहुवचन है यूरोपियन का। यूरोपियन विशेषण है यूरोपी का। यूरोपी अपभ्रंश है युवरोपी का। तात्पर्य है उन लोगों से जो यूरोप देश में युवराज अङ्गद के साथ भेजे और बसाए गये थे। (पृ० 4)

कारुपथ यौगिक शब्द है कारु + पथ का। कारु = कारो, पथ = रास्ता। तात्पर्य है उस देश से जो भूमध्य रेखा से बहुत दूर कार्पेथियन पर्वत (Carpathian Mts.) के चारों ओर ऑस्ट्रिया, हंगरी, जर्मनी, इंग्लैण्ड, लक्षमबर्ग, नॉरमण्डी आदि नामों से फैला हुआ है। जैसे एशिया में हिमालय पर्वतमाला है, इसी तरह यूरोप में कार्पेथियन पर्वतमाला है।

इससे सिद्ध हुआ कि श्री रामचन्द्र जी के समय तक वीरान यूरोप देश कारुपथ देश कहलाता था। उसके आबाद करने पर युवरोप, अङ्गदियापुरी तथा अङ्गदेश के नाम से प्रसिद्ध हुआ और ग्रेट ब्रिटेन, आयरलैण्ड, ऑस्ट्रिया, हंगरी, जर्मनी, लक्षमबर्ग, नॉरमण्डी, फ्रांस, बेल्जियम, हालैण्ड, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, इटली, पोलैंड आदि अङ्गदियापुरी के प्रान्तमात्र महात्मा अङ्गद के क्षेत्र शासन के आधारी किये गये थे। (पृ० 4-5)

नोट - महाभारतकाल में यूरोप को ‘हरिवर्ष’ कहते हैं। हरि कहते हैं बन्दर को। उस देश में अब भी रक्तमुख अर्थात् वानर के समान भूरे नेत्र वाले होते हैं। ‘यूरोप’ को संस्कृत में ‘हरिवर्ष’ कहते थे। (सत्यार्थप्रकाश दशम समुल्लास पृ० 173)

वैदिक संस्कृत भाषा का संसार की अन्य भाषाओं से सम्बन्ध -

अरबी, फारसी व अंग्रेजी भाषाओं के अक्षर और आर्यभाषा के अक्षर एक ही हैं। इनका उच्चारण भी एक ही है। अन्तर केवल इतना है कि आर्यभाषा के अक्षर शुद्ध, सरल और पूर्ण लिखे जाते हैं। अन्य भाषाओं के अक्षर कहीं सीधे, कहीं उल्टे, कहीं करवट से, कहीं लेटे हुए, कहीं बैठे हुए, कहीं विशेषता के साथ और कहीं न्यूनता के साथ खींचे जाते हैं। आर्यभाषा के अक्षरों का उच्चारण शुद्ध और सरल, ठीक वही होता है जिसके लिए उनका प्रयोग होता है। अन्य भाषाओं के अक्षरों का उच्चारण कहीं विशेष अक्षरों और कहीं विशेष मात्राओं के साथ किया जाता है जिनके उच्चारण की वहां नितान्त आवश्यकता नहीं है। इसी तरह से पारसियों की भाषा ‘जिन्द’ भी संस्कृत भाषा की अपभ्रंश है। (देखो दी फौनटेन हैड आफ़ रिलीजन बाई बाबू गंगाप्रसाद एम० ए० एम० आर० ए० एस०, एम० आर० ए० सी० पृष्ठ 76 से 78 तक)।

प्रोफेसर मैक्समूलर साहब कहते हैं कि “आर्य जाति का व्याख्यान वेदों और जिन्दवस्था (पारसियों की धार्मिक पुस्तक) में है। संस्कृत मिलान खाती है जिन्द से।” (पृ० 50-51)

जिन्द भाषा में असंख्य शब्द संस्कृत भाषा के हैं। इससे सिद्ध हुआ कि जिन्द भाषा कोई स्वतन्त्र


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-340


भाषा नहीं है वरन् वैदिक संस्कृत भाषा का अपभ्रंश है। संस्कृत भाषा संसार की अन्य सब भाषाओं की जननी है।

इन सब बातों से सिद्ध होता है कि सारे संसार को सभ्यता, विज्ञान व संस्कृति आर्यों ने प्रदान की और सारे संसार को बसाने वाले और मनुष्यमात्र की उत्पत्ति आर्यों की नस्ल से है। पाठक इस थोड़े से लेख से ही सब कुछ ज्ञात कर सकते हैं (पृ० 54-55)।

जाटों के नाम पर देश, नगर, पर्वत, नदियों आदि के कुछ नाम पिछले पृष्ठों पर लिखे जा चुके हैं और शेष अगले पृष्ठों पर उचित स्थान पर लिखे जायेंगे।

सीथिया तथा मध्य एशिया में महाभारतकाल में जाटवंश

शक, बर्बर, शिवि, पह्लव, चोल, कम्बोज, वाह्लीक, पाण्ड्य, ऋषिक, तुषार, कुण्डू, नागवंश, कालखण्डे, कंग, दरद आदि (महाभारत, भीष्मपर्व, सभापर्व, आदिपर्व, वनपर्व, उद्योगपर्व)। इन सब जाट गोत्रों के वहां पर राज्य स्थापित थे। (तृतीय अध्याय में इन गोत्रों के प्रकरण को देखो)।

इनके अतिरिक्त - सिहाग, हेर, भुल्लर, दहिया लोगों के निकट सिर दरिया के पूर्व में थे तथा तुर्किस्तानईरान में भी थे। मौर्य-मौर जाटों का राज्य खोतनतुर्किस्तान के क्षेत्रों पर था तथा यूनान, यूरोप व इंग्लैंड में भी इनका निवास था।

नव-नौवर जाटों ने महाभारत युद्ध के बाद खोतन प्रदेश पर शासन किया।

शिवि - इन लोगों का राज्य पेशावर के उत्तर में उद्यान नामक प्रदेश पर था।

यौधेय - इन लोगों का एक दल भारतवर्ष से हिमालय को पार करके अमू दरिया को पार करता हुआ कैस्पियन सागर तक पहुंच गया। वहां पर ये लोग ढेदहाये कहे गये।

दहिया - ये लोग महाभारत युद्ध के बाद ईरान, कैस्पियन सागर तक पहुंच गये थे। इन क्षेत्रों पर इन लोगों का शासन रहा है।

जाखड़ - ये लोग मध्य एशिया के बल्ख क्षेत्र में आबाद थे।

पूनिया - इन लोगों का स्वतन्त्र राज्य काला सागर के निकट लघु एशिया में था। ये लोग अमू दरिया के निकट क्षेत्र में भी रहे हैं। पूनियातोखर जाट छठी शताब्दी ई० पू० यूरोप में भी थे।

गौरवंशज जाट - इन लोगों का राज्य मध्य एशिया में गौरूया नामक प्रदेश पर था।

नागवंशज जाट - मध्य एशिया में शकवंशज जाटों के साथ एक न्यूरिअन जाति रहती थी, जिस पर नाग जाटों ने आक्रमण किया था।

कलकल - इन लोगों का राज्य मध्य एशिया के ‘वाकाटक’ प्रदेश पर रहा था। (अधिक जानकारी के लिये, तृतीय अध्याय में इन गोत्रों के प्रकरण में देखो)।

इनके अतिरिक्त “सीथिया और मध्य एशिया” में जिन जाट गोत्रों के निवास, शक्ति तथा शासन थे, वे बी० एस० दहिया द्वारा लिखित पुस्तक (जाट्स दी ऐनशन्ट् रूलर्ज के आधार पर निम्नलिखित हैं -


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-341


1. कुरु-कौरव 2. तोमर-तंवर 3. तुर 4. तातरान 5. मान 6. वेन 7. ओझलान 8. कश्यप 9. कसवां 10. कुशान 11. पहलवी 12. सांधराण 13. औधराण 14. हंस 15. डबास 16. चहल 17. सिकरवार 18. छीना 19. गिल 20. गूजर 21. जोहल 22. छिकारा 23. लाम्बा 24. घणगस 25. नोहवार 26. पुरु-पौरव 27. अहलावत 28. कटारिया 29. खटकर 30. राठी 31. सिन्धु 32. चालूक्य 33. गुलिया 34. कुंतल-खूँटेल 35. खासा 36. तांगल 37. उतार 38. स्यौराण-सौराण 39. मिर्धा-मिरदा 40. वाराइस-वराइच 41. शिशि 42. डागर

ऊपर लिखित इन सब जाट गोत्रों का वर्णन इसी प्रकरण में उचित स्थान पर किया जायेगा।

जिस तरह से भारतवर्ष में गंगा व यमुना नदियों के मैदानों से लेकर सिन्ध नदी तथा उसकी पांच सहायक नदियों के मध्य भूभाग तक पूरे उत्तरी भारत की विशाल एवं उपजाऊ भूमि पर जाटों की घनी संख्या तथा शासन, आदिसृष्टि से रहता आया है, ठीक इसी तरह से सीथियामध्य एशिया में भी डेन्यूब नदी तथा नीस्टर नदी के मध्य के उपजाऊ भूभाग से लेकर पूर्व में तारिम नदी की घाटी तक इस विशाल भूखण्ड पर जाटों की घनी आबादी तथा शासन आदिसृष्टि से रहता आया है।

प्राचीनकाल से आज काल तक ऐसा कोई समय नहीं है कि देश-विदेशों में विशेषकर उत्तरी भारत एवं सीथिया तथा मध्य एशियामध्य-पूर्व में जाटों का निवास, शक्ति तथा शासन न रहा हो। इसके विषय में तृतीय अध्याय, वैदिक, रामायण तथा महाभारतकाल के प्रकरण में और इसी अध्याय के पिछले पृष्ठों पर काफी प्रकाश डाला गया है।

अब महाभारतकाल के पश्चात् सीथिया तथा मध्य एशिया में जाटों के निवास तथा राज्य के विषय में कुछ उदाहरण लिखे जाते हैं।

‘रेसिज ऑफ मेनकाइण्ड’ पुस्तक, लेखक कलविन केफर्ट के अनुसार -

“आर्यशाखायें जिनको नॉरडिक कहा गया, ने 7700 ई० पू० में तिएनशान पर्वतमाला को पार करके उत्तरी क्षेत्र के देशों में अपना निवास स्थान बना लिया। बाद में ज्ञात हुआ कि ये लोग गेटी (जाट) हैं जो कि वहां हजारों वर्ष तक रहे। इनके देश की सीमा, पश्चिमी तुर्किस्तान के पर्वतीय क्षेत्र, काशगर तक, तिएनशान पर्वतमाला से बाल्खस झील तक, रूस के किर्गीज़ प्रान्त (जो कि पश्चिमी तुर्किस्तान के दक्षिणी भाग में है) जिसमें सात नदियां हैं, सिर दरिया का ऊपरी भाग, इस्सीक झील, चू नदी एवं इली नदी के बीच का क्षेत्र, ये सब शामिल थे। आर्य नस्ल की इस महान् नॉरडिक शाखा के पूर्वपुरुष जाट लोग ही थे (पृ० 228-229)।”
“लगभग 4300 ई० पू० में ये जाट लोग उत्तर की ओर बढ़कर पश्चिम में किर्गिज के मैदानों (रूस में , पश्चिमी तुर्किस्तान का उत्तर भाग) में और यूराल पर्वत तथा Caspian Sea|कैस्पियन सागर]] तक फैल गये। अन्त में ये लोग पांच भागों में अलग-अलग हो गये जिनके नाम ये हैं - 1. शिवि 2. घुमण 3. गेटा (जाट जिन्होंने अपना नाम जाट ही रहने दिया) 4. Massagetae (मस्सागेटे महान् जाट संघ) 5. शक।” ये सब जाट गोत्र हैं (पृ० 232)। आगे यही लेखक लिखता है कि शिवि लोग 2300 ई० पू० में अलग हो गये जबकि घुमण 1700 ई० पू० में और गेटे या जाट 1000 ई० पू० में अलग हुए। शक तथा महान् जाट संघ वहीं पर रहे, जब तक कि वे कुषाण,

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-342


तुखारी और श्वेत हूणों के नाम पर फैले।” ये सब जाट थे जैसा कि पिछले पृष्ठों में लिख दिया है।

कलविन केफर्ट ने आगे लिखा है कि “इन्हीं जाटों का एक संघ मांडा कहलाया (पृ० 209)। जाटों ने अपने राजा तानौसिस के नेतृत्व में लगभग 1323-1290 ईस्वी पूर्व मिश्रियों को पराजित किया और वहां से वापिस आकर पश्चिमी एशिया का बहुत सा क्षेत्र जीत लिया। इस क्षेत्र को अपने मित्र मांडा लोगों के राजा सोर्नुस के अधीन करके अपना सहायक बना लिया।” (पृ० 275)

2200 वर्ष ई० पू० में मौर्य-मौर जाटों ने लेस्सरज़ब क्षेत्र तथा अरारट पर्वत (तुर्की में) से मिश्र के राजवंश के ग्यारहवें राजा पर आक्रमण किया। इन मौर जाटों की भूमि, “ज्याती या जाटों की भूमि” कहलाती थी। मौर्य जाटों का राज्य तुर्किस्तान के अन्य क्षेत्रों, खोतन प्रदेश तथा कश्मीर में भी था। (जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज लेखक बी० एस० दहिया, पृ० IX, 144, 160), Elliot and Downson. OP. cit. Vol. I)।

जब सेल्यूकस भारतवर्ष से अपने देश यूनान को वापिस गया तो अपने साथ पंजाब के जाटों को सेना में भर्ती करके ले गया। यूनान में इन जाट सैनिकों ने एक बस्ती बसाई जिसका नाम ‘मौर्या’ रखा और एक टापू का नाम ‘जटोती’ रखा। उस समय जटोती पर मौर्य जाट सेना ने शासन किया (देखो, तृतीय अध्याय, मौर्य-मोर प्रकरण)।

पी० साइकेस (P. Sykes) ने लिखा है कि 2600 ईस्वी पूर्व में जाटों का राज्य लेस्सरज़न के पूर्व में स्थापित था। इन लोगों ने सुमेर, असीरिया, बेबीलोनिया और इलम के राज्यों को अपने अधीन कर लिया था और इन सब राज्यों के राजाधिराज बन गये थे। 2500 ई० पू० में इन जाटों का सम्राट् त्रीकन था जिसका राज्य पश्चिमी एशिया पर था। (P. Sykes The History of Persia, Vol 1)

कुरुवंश - कुरु जाटों का राज्य उत्तरी कुरु (साइबेरिया में) देश पर था। कुर नदी काकेशस (कॉफ) पर्वत से निकलकर रूस के प्रान्त ऐज़रबैजान में से बहती हुई पूर्व की ओर कैस्पियन सागर में गिरती है। यह कुर नदी कुरु जाटों के नाम पर कहलाती है। इराक के उत्तर-पश्चिम में कुरुपीडियन या कुरु जाटों का देश कहलाता है जो कि ठीक ऐसा ही है जैसा कि हरयाणा में कुरुक्षेत्र कुरु जाटों की भूमि है।

मद्रवंश - इस वैदिककालीन चन्द्रवंशीय मद्र जाटवंश का राज्य उत्तर मद्र एवं दक्षिण मद्र पर था। दक्षिण मद्र पंजाब में तथा उत्तर मद्र कैस्पियन सागर तथा काला सागर के क्षेत्र में था। महाभारत युद्ध में इनकी सेना उत्तर मद्र से भी आई थी। इनका सम्राट् शल्य था जिसकी बहिन माद्री नकुल व सहदेव की माता थी। (देखो तृतीय अध्याय, मद्रवंश)। महाभारत युद्ध के पश्चात् भी इस वंश की शक्ति उत्तर मद्र में रही। इस मद्र राज्य के अन्तर्गत वाह्लीक राज्य था, जिसका स्वयं का अलग राज्य था।

वाह्लीक-वर्क-वरिक - यह चन्द्रवंशीय जाट राज्य प्राचीन काल से है। इस वंश के लोगों के नाम पर वाह्लीक देश की स्थापना हुई। इसको बाद में बल्ख, बैक्ट्रिया और बाख्त्री नाम से भी कहा जाता है। (देखो तृतीय अध्याय, वाह्लीक-वरिक प्रकरण)।

इन वरिक लोगों का राज्य 2600 ई० पू० में सुमेरिया में था। इनके नाम पर इनका यह देश वर्क देश कहलाता था। इनके साथ में गुटियम देश (जाटों का देश) था, जिनका राज्य


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-343


पश्चिमी एशिया पर था जैसा कि पिछले पृष्ठ पर लिखा गया है। इस देश के अन्तिम सम्राट् त्रीगन को 2200 ईस्वी पूर्व में वर्क देश के राजा उतु-खेगल विर्क ने पराजित किया था1। वोल्गा नदी, जो उत्तर की ओर से आकर कैस्पियन सागर में गिरती है, विर्क या वर्क जाटों के नाम से है। (Political and Social Movements in Ancient Punjab, by Buddha Prakash, P. 102)।

रॉलिनसन ने ‘हैरोडोट्स का इतिहास’ नामक पुस्तक में लिखा है कि “इन विर्क लोगों का मध्य एशिया में ‘वर्कानिक’ नामक देश (रूस के याकुट्स्क प्रान्त में) सन् 1300 ई० में भी था। ये लोग अपने नेता मेगापानुस के नेतृत्व में थ्रमौपिलाय (Thermopylae) (यूनान में) के युद्ध में लड़े थे। इस युद्ध के पश्चात् इस नेता को बैबिलोनिया का राज्यपाल नियुक्त कर दिया गया।” (जिल्द 4, पृष्ठ 163)।

विर्क लोगों का देश विरकानिया (यूनानी भाषा में हिरकानिया) कहलाता था जिसकी स्थिति पर्थिया के उत्तर तथा कैस्पियन सागर के पूर्व में थी। वहां पर इनके नाम पर हिरकानिया पर्वत भी था। जब इन लोगों की शक्ति कैस्पियन सागर क्षेत्र पर हुई तब वह सागर ‘हिरकानिया सागर’ कहलाया2

फारस के जाट सम्राट् डेरियस (Darius) ने लगभग 521 ई० पू० से 515 ई० पू० में विर्क, कांग तथा अन्य साम्राज्यों और सीथियन जाटों के कालासागर के क्षेत्र में राज्य पर आक्रमण किए। परन्तु सिन्ध से लेकर कालासागर तक के जाटों को अपने अधीन नहीं कर सका3। इसका वर्णन आगे पृष्ठों पर मांडा साम्राज्य के प्रकरण में किया जाएगा।

दहिया - चीनी इतिहासकारों के अनुसार 2600 ई० पू० में दहिया जाटों का शासन कैस्पियन सागर के क्षेत्र पर था। ये लोग वहां से अमू दरिया तथा ईरान के उत्तरी भाग तक फैल गये। इन लोगों का 331 ई० पू० में सिकन्दर से युद्ध अरबेला (अमू दरिया के उत्तर में) के स्थान पर हुआ। इन लोगों के नाम पर इनका देश दहिस्तान कहलाया। अट्रेक नदी के उत्तर में अखल की उपजाऊ भूमि में इनके नाम से एक ‘दहिस्तान’ जिला भी है (फारस का इतिहास, जिल्द 1, पृ० 307)। जब दहिया लोगों की शक्ति कैस्पियन सागर क्षेत्र पर हुई तब वह इनके नाम पर ‘दधि या दहाय सागर’ कहलाया (वायु पुराण 49-75)।

500 ई० पू० का एक नक्शा जो कि डी० पी० सिंहल ने अपनी लिखित पुस्तक ‘इण्डिया एण्ड वर्ल्ड सिविलाईज़ेशन’ के पृ० 417 पर दिया है। इसके अनुसार शक लोगों को सिकन्दरिया (बल्ख के उत्तर में) के ऊपर तथा सौग्डियाना के उत्तर में और अरल सागर एवं मस्सागेटाई के पूर्व में दिखलाया है। अरल सागर तथा कैस्पियन सागर के मध्य में दहिया लोगों को और सीथियन जाटों को काला सागर के पश्चिम में डेन्यूब नदी पर और उत्तर में डॉन नदी पर दिखलाया गया।

जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज पुस्तक में लेखक बी० एस० दहिया ने 800 ई० पू० मध्य


1. राजा उतु-खेगल विर्क ने अपने देश में चन्द्रमा एवं सूर्य देवता के अनेक मन्दिर बनवाये थे।
2. जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज, पृ० 90 लेखक बी० एस० दहिया।
3. जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज, पृ० 157-158 लेखक बी० एस० दहिया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-344


एशिया में जातियों व नगरों का एक नक्शा प्रस्तुत किया है। उसके अनुसार शक लोग अरब सागर के उत्तर में, कांग अमू दरिया के पश्चिम में, दहिया अमू दरिया व कैस्पियन सागर के मध्य में, विर्क दहिया से दक्षिण तथा अमू दरिया से पूर्व में और कैस्पियन सागर के उत्तर में, मान कैस्पियन सागर के दक्षिण में और वेन लोगों को कैस्पियन सागर के पश्चिम तथा कुर नदी के दक्षिण व वेन झील (तुर्की में) के उत्तर व पूर्व क्षेत्र में दिखलाया है। बैंस लोग वेन के पूर्व में तथा नारा जाट वेन के दक्षिण में शासक थे।

सम्राट् साईरस ने 529 ई० पू० मस्सागेटाई राज्य की महाराणी तोमिरिस पर आक्रमण किया, उस युद्ध में महाराणी की सेना में दहिया वीर सैनिक भी थे। अन्त में साईरस मारा गया, उस समय वह दहिया जाटों से लड़ रहा था (P. Sykes, OP. cit, P. 153)।

कर्नल जेम्स टॉड ने लिखा है कि ईसा से हजारों वर्ष पहले दहिया महाजाति दल सिर दरिया के पूर्व में आबाद था। इनके निकट क्षेत्र में हेर, भुल्लर और सिहाग जाटवंश बसे हुए थे। इन लोगों का राज्य ईरान तथा अरमानिया में भी रहा (अधिक जानकारी के लिए देखो, तृतीय अध्याय दहिया प्रकरण)। ईरान में दहिया लोगों का शासन 256 ई० पू० से सन् 224 A.D. तक 480 वर्ष रहा।

वेन वंश - 1000 ई० पू० वेन जाटों का राज्य वेन झील (तुर्की में) के क्षेत्र पर था। इस वेन वंश के सम्राटों की पदवी ‘राजाओं के राजा’ तथा ‘संसार के राजा’ की थी। इसके अतिरिक्त इनको ‘बैंस लोगों तथा नारा लोगों का राजा’ भी कहा गया है। इससे ज्ञात हो जाता है कि वेनसाम्राज्य में बैंस एवं नारा जाट भी शामिल थे। इन वेन लोगों ने मान तथा दहिया लोगों को भी अपने अधीन किया। ‘केम्ब्रीज एन्शन्ट हिस्ट्री’ के अनुसार मान जाटों की निवासभूमि का नाम मन्नाई था जिसकी स्थिति अर्मिया झील के दक्षिण में थी, वहां इनका शासन था।

इस वेन वंश का राजा चक्रवर्ती वेन/बेन (चकवा बेन) बहुत प्रसिद्ध था जिसका भारत में पंजाब से लेकर बंगाल तक शासन था। आर्मीनिया के वेन शासक सूर्यदेव के पुजारी थे। इसी तरह मान तथा मांडा जाट शासक भी सूर्य को पूजते थे। (जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, पृ० XI, 64, लेखक बी० एस० दहिया)।

मान वंश - मार्कण्डेय पुराण में मान वंश का देश उत्तर दिशा में लिखा है। 800 ई० पू० में इनका राज्य कैस्पियन सागर के दक्षिण में था जो मन्नाई राज्य कहलाता था जो कि आज अर्मेनिया (अरी-मान) नाम से है। देखो तृतीय अध्याय, मान प्रकरण)।

शक वंश - पिछले पृष्ठों पर लिखा गया है कि शक जाटों के नाम पर सीथिया देश नाम पड़ा। सीथिया विशाल देश की सीमा इसी अध्याय के आरम्भ में लिखी गई है।

महाभारत युद्ध के बाद इन लोगों का राज्य पिछले पृष्ठ पर दो नक्शों का हवाला देकर सीथिया तथा मध्य एशिया में लिखा गया है।

इतिहासकारों की यह समान राय है कि इण्डो-ईरानियन शक और यूरोपियन सीथियनज़ एक ही थे। उच्चकोटि के यूनानी इतिहासकारों ने शक लोगों को सकाई और सकाय लिखा है।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-345


लेखक पटोलेमी ने इन लोगों को भारत में आने के बाद इण्डो-सीथियन लिखा है।

सीथिया एक प्राचीन देश था जो कि कैस्पियन सागर और अमू दरिया एवं सिर दरिया की घाटी से लेकर डेन्यूब व डॉन नदियों के मध्यवर्ती देशों तक फैला हुआ था। सीथियन मध्य एशिया और उत्तरी यूरोप की उन जातियों का नाम था जिन्होंने सदा अपनी पड़ौसी जातियों पर आक्रमण किए (हिस्टोरियनज़ हिस्ट्री ऑफ दी वर्ल्ड, वाल्यूम II, P. 400)

इन सीथियन (शक) लोगों ने यूनान पर आक्रमण किया और एथन्स पर अधिकार कर लिया। इन लोगों के विषय में इतिहासकार होमर और हेसीउड ने भी लिखा है कि वे लोग दूध पीने वाले थे तथा युद्ध इनका व्यवसाय था। यूनानी प्रसिद्ध इतिहासज्ञ थूसीडाईड्स ने इन सीथियन जाटों के विषय में लिखा है कि “एशिया अथवा यूरोप में कोई भी जाति (राष्ट्र) नहीं थी जो सीथियन जाटों के मुकाबले में खड़ी रह सके।” (अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस पृ० 47 लेखक उजागरसिंह माहिल)

थूसीडाईड्स लिखता है कि “इनकी संख्या इतनी अधिक थी तथा वे बहुत ही भयानक थे कि यदि जब भी वे संयुक्त हो जाते थे तब उनको कोई भी नहीं रोक सका।” इसी प्रकार से यूनान के प्रसिद्ध इतिहासज्ञ हैरोडोटस, जिसको इतिहास का पिता कहा गया है, तथा अन्य इतिहासकारों के कथन अनुसार “जाटों में जब भी एकता हुई तब संसार की कोई भी जाति बहादुरी में इनका मुकाबला नहीं कर सकी।” इतिहासज्ञ डीउडोरुस (Diodorus) लिखता है कि “मस्सागेटाई लोग सीथियनज़ के ही वंशज थे। सीथियन/शक लोग काला सागर के पश्चिम से लेकर अरल सागर के पूर्व तक फैले हुए थे। थ्रेश देश में जो कि सीथिया देश का एक प्रान्त था (आज का बुल्गारिया), वहां पर गेटे (जाटों) का शासन था।” हैरोडोटस लिखता है कि थ्रेस की जातियों में जाट लोग सबसे अधिक बहादुर तथा ईमानदार थे। वे गाने-बजाने के प्रेमी थे। वे अन्य जातियों में सबसे श्रेष्ठ एवं न्यायकारी थे1

बी० एस० अग्रवाल ने “इण्डिया अज़् नोन् टु पाणिनि पृ० 68-69” पुस्तक का हवाला देकर लिखा है कि “बहुत से शक कबीले (जातियां) आज भी जाटों में पाये जाते हैं। शक लोग पाणिनि ऋषि के समय से पहले भारतवर्ष में आये और इनकी दूसरी लहर दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व में भारत में आई और इसके पश्चात् कुषाण लोग आये। मध्य एशिया के शक लोगों ने वापी या रहट (Stepped Well) तथा अरघट्टा (Persian wheel) का निर्माण किया। स्थानों या नगरों के नाम जिनके अन्त में कन्द लगता है वे सब शक लोगों ने आरम्भ किए जैसे - समरकन्द, ताशकन्द, यारकन्द आदि।” (H.W. Bailey, ASLCA, Transaction of Philological Society, 1945, PP 22, 33)

रूस निवासियों का भारतीय जाटों से सम्बन्ध

रूसी लोगों की अनेक जातियों के नाम भारतीय जाटों से मिलते हैं जैसे रूस के आंतस (Antas) भारतीय आंतल (Antals) तथा रूस के वैन (Ven), भारतीय बैनीवाल-वैन (Benhwal-Venwal) आदि। रूस की बड़ी आबादी के लोग स्लाव (Sláv) कहलाते हैं। यह स्लाव शब्द


1. जाट्स दी ऐनशन्ट् रूलर्ज पृ० 2, 26, 27, 302 लेखक बी० एस० दहिया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-346


सकलाव से निकला है जो कि भारतीय पुराणों में सकरवाक लिखा है और भारतीय जाटों का गोत्र सकरवार/सिकरवार है (मध्य एशिया का इतिहास, हिन्दी खण्ड 2, पृ० 563), लेखक राहुल सांकृत्यायन1सिकरवार, शक जाट थे जिनका मध्य एशिया में सोगदियाना प्रदेश पर शासन छठी शताब्दी ईस्वी पूर्व में था तथा जिनके राज्य में बुखारा, समरकन्द, ताशकन्द आदि नगर थे। (American Journal of Semetic Languages and Literature, 1940, P. 354)2

भारतीय, मध्यएशिया तथा यूरोप के जाटों की पहिचान एवं समानता के लिए क्रिमिया (Crimea) एवं पश्चिमी रूस के अन्य स्थानों से की गई खुदाइयों से प्राप्त वस्तुओं के प्रमाण -

सन् 1971 ई० में रूस के यूक्राइन (Ukraine) प्रान्त में टोवस्टा (Tovsta) नामक स्थान से खुदाई करते समय शक लोगों की बहुत सी वस्तुएं मिली हैं। इनमें से एक सोने का बना हुआ छाती का कवच है जिसका भार 2½ पौंड का है। इस कवच पर 44 गायों एवं घोड़ियों की मूर्तियां हैं। इसके मध्य में दो शक हैं जिनके सिर पर जटाजूट बाल तथा लम्बी दाढ़ी है। यूक्राइन में सोलोखा (Solokha) नामक स्थान पर 400 ई० पू० का एक स्वर्ण का पीने का बर्तन तथा दूसरा पीने का प्याला मिले हैं। इस पर एक शक शिकारी, घोड़े पर सवार, अपने भाले से शेर को मारते हुए की मूर्ति अंकित है। एक सोने का कंघा भी मिला है। एक सोने या चांदी का ठोस हँसला (कंठा या गुलिबंद) मिला है जिसको शक स्त्रियां बड़े चाव से पहनती थीं जिसका प्रयोग भारतवर्ष की जाट जाति में आज भी होता है। इस कारण से, दृढ़ विश्वास के साथ हम कह सकते हैं कि रूस निवासी स्लाव लोग, तथा उत्तरी यूरोपियन लोग जाट जाति से सम्बन्धित हैं3। यह पिछले पृष्ठों पर लिख दिया गया है कि शक जाट हैं और उनके नाम पर सीथिया देश नाम पड़ा। शक-सीथियनज़, इण्डो-सीथियनज़, यूरोपियन-सीथियनज़ सब एक ही नाम हैं जो कि सब जाट हैं।

नोट - ड्यूक आलेग नॉरमन जाट ने आधुनिक रूस की नींव डाली। यह इसी अध्याय के अगले पृष्ठों पर लिखा जाएगा।

पश्चिमी रूस का एक बहुत बड़ा प्रान्त यूक्राइन है जहां पर स्लाव जाटों की बड़ी संख्या है। वहां पर स्त्री-पुरुषों की शक्ल-सूरत, कद, चाल-ढाल, रंग-रूप, पहनावा हरयाणा प्रान्त के जाट स्त्री-पुरुषों से मिलता-जुलता है। इन स्लाव जाटों का देश चेकोस्लोवाकिया है। यह देश सेरब + स्लाव (Serb + Slav) दो जातियों के मिलाप से चेको + स्लोवाकिया (Czecho+Slovakia) चेकोस्लोवाकिया कहलाया। इस देश के साथ लगने वाले पोलैण्ड, आस्ट्रिया, हंगरी, रूमानिया, युगोस्लाविया आदि देशों में भी स्लाव जाट बड़ी संख्या में बसे हुए हैं।

इतिहासकार एच० जी० वेल्ज ने अपनी पुस्तक “दी ऑउटलाइन ऑफ हिस्ट्री” के अध्याय 32, पृ० 635 पर लिखा है कि “जब हम दक्षिणी रूस क्षेत्रों की वर्तमान जनसंख्या के विषय में सोचते हैं तो हमें नॉरमन लोगों का बाल्टिक तथा काला सागर के बीच आवागमन भी याद रखना होगा। और यह भी याद रखना होगा कि वहां स्लावोनिक (Slavonik) जनसंख्या काफी थी जो कि सीथियन तथा सरमाटियन्ज (Sarmatians) के वंशज एवं उत्तराधिकारी थे तथा वे इन अशान्त, कानूनरहित किन्तु उपजाऊ क्षेत्रों में पहले ही आबाद हो गये थे। ये सब जातियां परस्पर घुलमिल


1, 2, 3. जाट्स दी ऐनशन्ट् रूलर्ज लेखक बी० एस० दहिया पृ० क्रमशः 61, 372, 61, 62.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-347


गईं तथा एक-दूसरे के प्रभाव में आ गईं। स्लावोनिक भाषाओं की, सिवाय हंगरी में, सम्पूर्ण सफलता से प्रतीत होता है कि स्लाव (Slav) लोगों की ही जनसंख्या अत्यधिक थी।” डेन, विकिंग्ज़, नॉरमन, ऐंगल्स, सैक्सन्स और गोथ ये सब सीथियन जाटों में से ही थे तथा उन्हीं के वंशज थे1

नोट - इनके जाट होने के प्रमाण इसी चतुर्थ अध्याय में यूरोप तथा अफ्रीका में जाटों का शासन, प्रकरण में लिखे जायेंगे।

मध्यएशिया का इतिहास हिन्दी, खण्ड 2, पृ० 565 पर लेखक राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि “प्राचीन समय के शक, रूस के स्लाव लोगों के रूप में फिर से प्रकट हुए हैं, जो आज भी विद्यमान हैं। पश्चिमी शक लोग बहुत देशों में प्रवेश कर गये और भारतवर्ष में ब्राह्मण, गूजर, जाट, राजपूत आदि हिन्दू जाति में लीन हो गये। रूसी भाषा संस्कृत भाषा से मिलती जुलती है। इसका कारण यह है कि रूसवाले लोग, शक लोगों के वंशज हैं और शक लोग आर्य ही हैं जो प्राचीन समय से भारतवर्ष व ईरान में आबाद हैं। बहुत शताब्दियों के बीतने के पश्चात् काफी शक लोग फिर से अपने देश भारत में आये2। शक लोग क्षत्रिय आर्य जाट भी हैं तथा आज शक गोत्र के जाट बड़ी संख्या में विद्यमान हैं। (अधिक जानकारी के लिए देखो तृतीय अध्याय, शक प्रकरण)।

“इण्डिया एण्ड रस्सिया, लिंगुइस्टिक एण्ड कल्चरल अफीनिटी” लेखक डब्ल्यू० आर० ऋषि के अनुसार भारतीयों एवं भारतीय जाटों के रूस निवासियों से सम्बन्ध निम्न प्रकार से हैं -

आर्यों और पूर्वी स्लाव लोगों की भाषा, धर्म तथा धार्मिक त्यौहारों की समानता में विचित्र सम्बन्ध रहे हैं। यह सम्बन्ध मात्र दैवयोग या संयोग से नहीं हो सकते। यह दृढ़ कथन या यथार्थता है कि किसी समय संस्कृत भाषा बोलने वाले और रूसी भाषी लोग अवश्य साथ रहे हैं। रूस के इतिहास के अनुसार रूस के प्रथम निवासी काला सागर के उत्तर में पोनटिक मैदानों (Pontic steppes) में थे जो कि समेरियन्स (Cimmerians) कहलाते थे। ये समेरियन्स, आर्य लोग ही थे जिसके ठोस प्रमाण हैं। ईस्वी पूर्व 11वीं - 8वीं शताब्दियों में इन समेरियन्स के स्थान पर सीथियन या शक लोग आ गए थे। इन शक लोगों ने वहां पर उच्चकोटि की एवं प्राचीन संस्कृति उत्पन्न की जिसका पूर्वी और मध्य यूरोप की जनता पर गहरा प्रभाव पड़ा। इन सीथियन्स या शक लोगों का योगदान रूस के इतिहास पर इतना महान् एवं प्रभावशाली है कि यह सारा समय रूस के इतिहास में “सीथियन विशिष्ट युग” कहलाता है। यूनानी इतिहासकार हैरोडोटस ने सीथिया की सीमा डेन्यूब (Danube) नदी से डॉन (Don) नदी तक जिसमें क्राइमियन के मैदान (Crimean steppes) शामिल हैं, लिखी है। परन्तु प्रसिद्ध भारतीय विद्वान् राहुल सांकृत्यायन ने रूसी वैज्ञानिकों द्वारा हाल में की गई खुदाइयों से प्राप्त प्राचीनकालीन रूसी वस्तुओं का अध्ययन करके लिखा है कि सीथियन या शक लोगों का निवास एवं अस्तित्व कार्पेथियन पर्वतमाला (Carpathian Mountains) से गोबी मरुस्थल (Gobi Desert) तक 2000 ई० पू० से सिकन्दर


1. अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 70 ।
2. जाट्स दी ऐनशन्ट् रूलर्ज पृ० 62 लेखक बी० एस० दहिया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-348


महान् के समय तक (चौथी शताब्दी ई० पू०) था। यह देश शकद्वीप या शकटापू कहलाता था (पृ० 140-141)।

स्लाव और सरमाटियन्ज जातियों के अतिरिक्त पहली-तीसरी शताब्दियों में गोथ (जाट) नीपर नदी (Dnieper) के मैदानों में आबाद हो गये थे। आरम्भ में ये लोग स्केण्डेनेविया में रहे। ये लोग 3-2 शताब्दी ई० पू० में वॉल्टिक सागर के दक्षिणी तट तक फैल गए। ईसा की तीसरी शताब्दी तक गोथ जाति (जाटों) ने डेन्यूब नदी के निचले तथा नीपर नदी के बहुत बडे़ भाग पर अपना अधिकार कर लिया था। ये लोग पूर्व में डॉन नदी और दक्षिण में काला सागर तक पहुंच गए। (पृ० 115)

पूर्वी स्लाव लोगों को हूणों ने उत्तर-पूर्व की ओर धकेल दिया। इनमें से कुछ नीपर नदी के मैदानों में बस गए जो पोलियन कहलाए। (Poliane-Pole का अर्थ मैदान)। इनका दूसरा भाग जंगलों में आबाद होने के कारण द्रेवलियन कहलाया (Drevliane-derevo का अर्थ वृक्ष)। स्लाव लोगों का एक भाग इलमेन झील (ILMEN LAKE) के निकट आबाद हो गया और अपने स्लाव नाम से स्लोवेनज़ (Slovenes) कहलाते रहे। इन स्लाव (जाट) लोगों ने वहां पर नोवगोरॉड (Novgorod) नामक नगर का निर्माण किया। शेष स्लाव लोग जो उत्तर में बस गये वे सेवेरियन (Severiane) कहलाए। ये सब स्लाव लोग सीथियन्ज या शक लोगों के वंशज थे तथा एक-दूसरे की पहचान करना बहुत मुश्किल एवं असम्भव था। “सीथियन युग” में जंगलों से भरे हुए मैदानों में खेतीहर लोगों का पद (जिसमें स्लाव लोगों के पूर्वज भी शामिल थे) “सीथियन हलजोता” कहा गया। (पृ० 143) पूर्वी स्लाव लोगों का धर्म और आर्यों का धर्म समान थे। पूर्वी स्लावों ने अपना यह धर्म सन् 988 ईस्वी तक बराबर कायम रखा। तब उनके नेता स्लाव कनयजः वलाडीमीर स्वीटोस्लाविच (Slav knyaz Vladimir Sviatoslavich) ने ईसाई मत स्वीकार कर लिया। उसने अपने आश्रित प्रजा पर ईसाई पादरियों के उपदेश अनुसार स्लाव लोगों के देवताओं की तमाम मूर्तियां नष्ट कर दी गईं और उनके मन्दिरों के स्थान पर चर्च स्थापित कर दिए गए। इस तरह से पूर्वी स्लाव लोगों की ईश्वरपूजा रीति बदल गई और उनकी भाषा भी बदल गई।

रूस में और भारतवर्ष में रहने वाले सीथियनज़ या शकों का सन् 528 ई० तक घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है जब तक कि शक राजा मिहिरकुल को जाट सम्राट् यशोधर्मा वरिक ने हराया। रूस निवासियों एवं भारतीयों की भाषा संस्कृत थी तथा संस्कृति भी एक रही थी। भौगोलिक स्थिति के कारण रूस एवं भारतीयों की संस्कृति एवं संस्कृत भाषा बदल गई। परन्तु इन दोनों देशों के निवासियों की भाषा एवं संस्कृति का मूल सम्बन्ध आज भी जीवित है। (पृ० 144)

हमने द्वितीय अध्याय में प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया है कि जाट आर्य हैं तथा क्षत्रिय वर्ण के हैं और तृतीय अध्याय, शक प्रकरण में लिखा गया है कि शक या सीथियन जाट हैं। सारांश यह है कि रूस के स्लाव निवासी जो कि बड़ी संख्या में रूस के तथा यूरोप के अनेक प्रान्तों एवं देशों में आबाद हैं, वे सब जाट हैं। इनके अतिरिक्त इन महाद्वीपों में भिन्न-भिन्न जाट गोत्रों के लोगों की बड़ी संख्या है। यद्यपि वे कम ही जानते हैं कि हम जाट हैं। (लेखक)


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-349


मध्य एशिया (रूस) में बोले जाने वाले जाटगोत्रों के कुछ नाम निम्न प्रकार से हैं1 -

रूसी नाम जाटगोत्र रूसी नाम जाटगोत्र
1. Avar Abara अबारा 13. Kirkin Kalkil कलकल
2. Allan Ailavat अहलावत 14. Kang Kang कांग
3. Anta Antal आंतल 15. Kula Kular कूलर
4. असि Asiag असियाग 16. Hiung-nu Henga हैंगा
5. Bogda Bogdavat बोगदावत 17. Noyan Nain नैन
6. Balgari Bal-Ballan बालान 18. Shor Shoran सौराण-श्यौराण
7. Balkar Balhara बल्हारा 19. Timir Tomar तोमर-तंवर
8. Ven Benival बैनीवाल-बैन 20. Wark Virk विर्क-वरिक
9. Chol Chahl चहल 21. Saraut Sahravat सहरावत
10. Chimir Cheema चीमा 22. Jubolo Johl जोहल
11. Daghe-Dahi Dahiya दहिया 23. Gilli Gill गिल
12. Dashvhar Daswal देशवाल 24. Dol Dhul ढुल-ढिल्लूं

मध्य एशिया (उज्बेक व आसपास) में वर्तमान में पाए जाने वाले कुछ जाटगोत्र निम्नलिखित हैं2 -

रूस में वर्तमान नाम जाटगोत्र
Karabura Bura बूरा
Tatar Tatran तातराण
Jani Janwar जनवार
Simarchim Sihmar शीहमार
Arbat Arab अरब
Gedoi-Gada Gathwal गठवाल
Bagurlu Bagarwa बागरवाल

शिवि वंश - आरम्भकाल में इन लोगों का राज्य उद्यान प्रदेश पर था। यह आजकल मस्सागेटाई नाम से प्रसिद्ध है जो कि कैस्पियन सागर के पश्चिमी किनारों पर वह प्रदेश है जिसको अरेकिसज एवं उसकी सहायक नदी कुर सींचती है। यह सीथिया देश का ही एक प्रान्त था। यहां पर जाटों की बड़ी शक्ति रहती आई है। शिवि लोगों का एक दल यूरोप की ओर बढ़ गया और स्केण्डेनेविया में पहुंच गया। दूसरा दल भारत से ईरान पहुंचा जहां इनका शासन शाकद्वीप (जो ईरान के उत्तर में है) पर था। इन लोगों ने एक शिवस्थान नामक नगर बसाया जो आज


1, 2. मध्य एशिया का इतिहास खण्ड 2, पृ० 514-517 लेखक राहुल सांकृत्यायन Soviet Union A Geographical Survey and Kushan Inscriptions.
1, 2. जाट्स दी ऐनशन्ट् रूलर्ज, पृ० 319-330, लेखक बी० एस० दहिया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-350


सीस्तान कहलाता है1। सीस्तान ईरान के पूर्व प्रदेश में तथा अफगानिस्तान के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।

शिवि गोत्र के तोमऋषि नामक राजा अमू दरिया के दक्षिणी क्षेत्र पर राज्य करते थे। इनकी राजधानी उद्यान थी। छठी शताब्दी ई० पू० में इनका युद्ध फारस के प्रसिद्ध सम्राट साईरस से, खुरासान के पूर्वी क्षेत्र पर हुआ था जिसमें साईरस को मुंह की खानी पड़ी और वह वापिस लौट गया। (जाट इतिहास उत्पत्ति और गौरव खण्ड), (पृ० 162-163, ले० ठा० देशराज)। (देखो तृतीय अध्याय, शिवि वंश प्रकरण)।

कंग/कांग वंश - 700 ई० पू० में इन जाटों का राज्य बल्ख पर था। चीनी इतिहासकारों ने इनको किअंगनू लिखा है। राहुल सांकृत्यायन ने लिखा है कि “कांग लोग मस्सागेटाई की शाखा हैं जिसका अर्थ है महान् जाट। मध्य एशिया में इन कांग लोगों ने 700 ई० पू० में नहरों का निर्माण किया। ये नहरें पांचवीं शताब्दी ईस्वी में रेत से भर गईं थीं। ये नहरें आज रूस के किजीलकुत प्रान्त की मरुभूमि में विद्यमान हैं।”

जाटों की बनवाई हुई ये नहरें अब रूस सरकार द्वारा खुदवाई जा रही हैं। कांग लोगों के अनेक नगर खोदे गए हैं जिनमें इनके राजाओं के सिक्के, मूर्तियां और कांग भाषा के शिलालेख मिले हैं। ये वस्तुएं तोपरक काला में मिली हैं। op. cit. p. 162 and Archaelogy in USSR).

वीर कांग जाटों को सम्राट साईरस अपने अधीन न कर सका। इससे इनकी वीरता का पता लग जाता है। (जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज पृ० 75-76, 131, लेखक बी० एस० दहिया)। (अधिक जानकारी के लिए देखो तृतीय अध्याय, कांग-कंग प्रकरण)।

तोमर/तंवर और हंस वंश - ये दोनों जाटवंश मध्य एशिया में नलीनी नदी के तट पर राज्य व निवास करते थे। इन लोगों के साथ ही पौर, कुण्डमान और शिवि जाटों को भी लिखा है। (देखो तृतीय अध्याय, तोमर/तंवर वंश प्रकरण)।

पूनिया - यूनानी इतिहासकार हैरोडोटस का हवाला देकर बी० एस० दहिया ने पृ० 90, 267 पर लिखा है कि 600 ई० पू० में पूनिया जाटों की एक स्वतन्त्र रियासत लघु एशिया में कालासागर के निकट थी। इनको वहां से सम्राट् दारा ने अमू दरिया के निकट बैक्ट्रिया क्षेत्र में भेज दिया। पूनिया और तोखर गोत्र के जाट छठी शताब्दी ई० पू० यूरोप में थे। (देखो, तृतीय अध्याय पूनिया वंश प्रकरण)।

डागर - इतिहासकार प्लीनी ने लिखा है कि ये डागर जाट लोग मध्य एशिया में थे। वहां से 200 ई० पूर्व में यूची (जाटों) के झुण्ड के साथ पश्चिम की ओर चले गये।

पह्लव पार्थियन - पह्लव गोत्र के जाटों ने अपने राजा अर्सकस (Arsaces) के नेतृत्व में पार्थिया राज्य स्थापित किया। यह पार्थिया देश बैक्ट्रिया के पश्चिम और कैस्पियन सागर के दक्षिण-पूर्व में था। इन लोगों ने अपना राज्य कैस्पियन सागर तक बढ़ाया। पह्लव लोगों ने 256 ई०


1. जाट इतिहास अंग्रेजी अनुवाद पृ० 36, 101 लेखक रामसरूप जून ने लिखा है कि 2000 ई० पू० शिवि गोत्र के जाटों ने ईरान में सीस्तान प्रान्त पर राज्य स्थापित किया। चीनी यात्री फाह्यान व ह्यूनत्सांग ने भी ईरान को शिवि देश कहा है।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-351


पू० से सन् 224 ईस्वी तक अर्थात् 480 वर्ष तक ईरान पर शासन किया। (जाट्स दी ऐन्शन्ट रूलर्ज, पृ० X, 77, लेखक बी० एस० दहिया)।

पह्लव लोगों के विषय में सत्यकेतु विद्यालंकार ने पृ० 57 पर लिखा है कि “प्राचीन भारतीय ग्रन्थों में प्रार्थिया को ‘पह्लव’ कहा गया है, और पुराणों में शक और पह्लव साथ-साथ आते हैं। 25 ई० पू० में कुषाण वीर राजा कुजुलकफस कदफिसस ने पार्थियन लोगों के शासन का अन्त कर दिया।” यही लेखक पृ० 53 पर लिखते हैं कि “सैल्युकस द्वारा स्थापित सीरियन साम्राज्य जब दुर्बल हो गया तब वहां के निवासियों ने विद्रोह कर दिया और 248 ई० पू० स्वतन्त्र पार्थियन राज्य की स्थापना कर ली। पार्थियन विद्रोह के नेता अरसक और तिरिदात नाम के दो भाई थे। उन्होंने धीरे-धीरे पार्थियन राज्य की शक्ति को बहुत बढ़ा लिया और शीघ्र ही ईरान का सम्पूर्ण प्रदेश उनकी अधीनता में आ गया। 223 ई० पू० सीरिया के राजसिंहासन पर राजा एष्टियोकस तृतीय आरूढ़ हुआ। उसने पार्थिया पर आक्रमण कर दिया परन्तु असफल रहा और पार्थिया के राजा से सन्धि कर ली।” आगे पृ० 10 पर लिखते हैं कि “छठी शताब्दी ई० पू० में ईरान के हखामनी (जाट) सम्राटों ने सुग्ध देश को अपने अधीन कर लिया। बाद में ग्रीक, शक और पार्थियन (पह्लव) लोगों ने काम्बोज़, वाह्लीक और सुग्ध पर शासन किया।” (मध्य एशिया तथा चीन में भारतीय संस्कृति, लेखक सत्यकेतु विद्यालंकार)।

कश्यप वंश - इस वंश के जाटों का शासन प्राचीनकाल में कैस्पियन सागर पर था जिसका नाम इनके नाम पर कैस्पियन पड़ा।

दरद-दराळ - इनका राज्य मध्य एशिया में था। ये अफ़गानिस्तान के शासक रहे। इनके पड़ौसी चीन, चोल, तुषार तथा वाह्लीक लोग थे।

कालखण्डे-कालीधामन - इनका राज्य चीनी तुर्किस्तान (सिंगकियांग) में कालकूट (कालखण्डे) देश पर था जो कि इनके नाम पर पड़ा था।

कुन्दा-कुण्डू - इस वंश का राज्य तारिम (सीता) नदी के तट पर था। इनके नाम पर पामीर पठार पर कुण्डू नगर है। इनके निकट डांढा (ढांडा) जाट भी थे।

गिल वंश - इनके नाम पर गिलगित नगर व पर्वत है। इनकी शक्ति कैस्पियन सागर पर होने से उसका नाम गिलन सागर कहलाया।

कुन्तल-खूंटेल - इनका शासन मध्य एशिया में रहा।

नोट - ऊपर लिखित इन वंशो को देखो तृतीय अध्याय, इनके प्रकरण में)।

इनके अतिरिक्त यूरोप, अफ्रीका, मध्यपूर्व के प्रकरण में अन्य जाटवंश लिखे जायेंगे।

चहल - इस जाटवंश का राज्य दहिस्तान देश (कैस्पियन सागर) के क्षेत्र पर था। इनको सन् 440 ई० में यज़देगिर्द तृतीय (Yazdegird III) ने युद्ध करके इसी क्षेत्र में हराया। जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, पृ० 36, लेखक बी० एस० दहिया)।

चहल गोत्र के जाटों की आबादी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और हरयाणा के कई जिलों में है। पंजाब में ये लोग सिक्खधर्मी हैं। विदेशों में भी मुसलमान व ईसाई तथा अन्य धर्मी चहल जाट पाए जाते हैं।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-352


जाट महारानी तोमरिस का सम्राट् साईरस से युद्ध

फ़ारस एवं मांडा देश के सम्राट् साईरस ने बल्ख तथा कैस्पियन सागर पर शासक जाटों से युद्ध किये, परन्तु वह दोनों जगह असफल रहा। बल्ख पर कांग जाटों का शासन था और मस्सागेटाई पर दहिया जाटों का शासन था। ये दोनों स्वतन्त्र राज्य रहे।

मस्सागेटाई जाटों का एक छोटा तथा शक्तिशाली राज्य था जो कि सीथिया देश का ही एक प्रान्त था। इसका प्राचीन नाम उद्यान था। इस प्रान्त का शासक अरमोघ था जिसकी महारानी तोमरिस थी। राजा अरमोघ की मृत्यु हो जाने पर शासन की बागडोर महारानी तोमरिस ने सम्भाली। अब साईरस ने उचित अवसर समझकर अपने दूत द्वारा तोमरिस को उसके साथ विवाह करने का प्रस्ताव भेजा। महारानी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए उत्तर दिया कि “मैं जाट क्षत्रियाणी हूं, अपना धर्म नहीं छोड़ सकती तथा अपने देश को तुम्हारे अधीन नहीं करूंगी।” यह उत्तर मिलने पर साईरस ने 529 ई० पू० में भारी सेना के साथ तोमरिस के राज्य पर आक्रमण कर दिया। उसकी सेनायें अरेक्सिज (Araxes) नदी पर पहुंच गईं जहां उन्होंने नावों का पुल बांधा। यह सूचना मिलने पर तोमिरस ने साईरस को निम्नलिखित संदेश भेजा -

“फारस एवं मांडा देश के प्रधान, इस युद्ध का परिणाम अनिश्चित है। हम आप को आपका वर्तमान इरादा छोड़ने की सलाह देते हैं। आप अपने ही साम्राज्य में सन्तुष्ट रहिए और हमें हमारा शासन करने दीजिए। लेकिन आप इस कल्याणकारी शान्तिप्रिय सलाह को नहीं मानेंगे। अतः आप फिर भी मस्सागेटाई से युद्ध करने के लिये व्याकुल ही हो तो पुल बनाने का कार्य छोड़ दो। हम अपने राज्य में तीन दिन चलकर पीछे हट जाते हैं और आप आराम से नदी पार करके हमारे देश में आगे बढ़ जाइये या यदि आप अपने ही क्षेत्र में हमारे से भिड़ना चाहते हो तो आप पीछे हट जाइये, हम आगे बढ़ आयेंगे।” (P. Syke. OP. Cit)।

साईरस ने अपने सभासद क्रेसस की सलाह से मस्सागेटाई राज्य में आगे बढ़ना स्वीकार किया और यह सूचना तोमरिस को भेज दी गई। महारानी ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की तथा वह पीछे हट गई। परन्तु साईरस ने युद्ध विद्या का प्रयोग इस तरह से किया - साईरस ने शराब तथा अच्छा स्वादिष्ट भोजन एक कैम्प में रखवा दिया और वहां पर सेना की एक दुर्बल टुकड़ी छोड़ दी। और शेष शक्तिशाली सेना को नदी की ओर पीछे हटा दिया।

साईरस का लक्ष्य यह था कि मेरी इस दुर्बल सेना टुकड़ी को जाट सैनिक हरा देंगे और शराब व भोजन पर टूट पड़ेंगे। तब उन पर मेरी शक्तिशाली सेना आक्रमण कर देगी। साईरस का यह उपाय सफल रहा। तोमरिस की जाट सेना ने आक्रमण करके उस दुर्बल सैनिक टुकड़ी को मौत के घाट उतार दिया। उन्होंने वहां पर रखी शराब व भोजन का सेवन किया और शराब में धुत होकर वे सब सो गये। उस अवस्था में पर्शियन सेना ने उन पर आक्रमण कर दिया। मस्सागेटाई सैनिक कुछ तो मारे गये और शेष को कैदी बना लिया। इनमें तोमरिस का पुत्र स्परगेपिसिज (Spargpises) भी पकड़ा गया, जो कि शराब के नशे में चूर था। जब वह होश में आया तो उसने आत्महत्या कर ली।

ज्योंही तोमरिस को अपनी पराजय की सूचना मिली, उसने साईरस को दूसरा ऐतिहासिक


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-353


संदेश भेजा जो कि निम्नलिखित है -

“साईरस, तुम खून बहाने के लिये इच्छुक हो किन्तु अपनी वर्तमान सफलता पर अधिक गर्व न करो। जब तुम स्वयं शराब के नशे में चूर होते हो तो क्या-क्या मूर्खतायें तुम नहीं करते हो? तुम्हारे शरीर में यह प्रवेश करके तुम्हारी भाषा को भी अधिक अपमानजनक बना देती है। इस विष के कारण तुमने मेरे पुत्र को जीत लिया है, अपनी चतुराई अथवा वीरता से नहीं। मैं दोबारा तुम्हें यह सुझाव देने का साहस रखती हूं। शायद, इसे मानने में तुम अवश्य ही रुचि लोगे। मेरे पुत्र को स्वतन्त्र कर दो तथा मस्सागेटाई के तीसरे भाग को कब्जा कर तुमने हमको अपमानित किया है। इससे ही सन्तुष्ट रहिये तथा इन क्षेत्रों से बिना चोट खाये दूर जाईये। यदि तुम इस से दूर नहीं हटोगे तो मैं मस्सागेटाइयों के महान् देवता सूर्य की सौगन्ध खाती हूं कि जैसे तुम खून के लालची हो, मैं तुमको तुम्हारा ही खून पिला दूंगी।”

महारानी के इस संदेश का साईरस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। निराश होकर महारानी ने अपनी सारी सेनायें एकत्रित कर लीं। फिर जो युद्ध हुआ वह बहुत भयंकर था। दोनों ओर वीर जाट थे जो अन्तिम समय तक लड़े। हैरोडोटस लिखता है कि “प्राचीन काल से लड़ी गई सभी लड़ाइयों से यह युद्ध अधिक खूनखराबे वाला था।” तोमरिस की मस्सागेटाई सेना ने 529 ई० पूर्व इस युद्ध में विजय प्राप्त की। इस युद्ध में साईरस मारा गया। तोमरिस महारानी ने युद्ध के मैदान से साईरस के मृत शरीर की खोज करवा कर प्राप्त कर लिया और महारानी ने उसका सिर काटकर उस को एक खून के भरे बर्तन में डालकर कहा - “मेरी प्रतिज्ञा के अनुसार तुम अपना ही खून पीओ।”

महारानी तोमरिस इस युद्ध में स्वयं आगे की सेना के साथ होकर लड़ी थी। महान् जाटों (मस्सागेटाई) के हाथों अजेय महान् सम्राट् साईरस की यह प्रथम तथा करारी हार और उसकी समाप्ति हुई। सोग्डियाना के जाटों ने भी ऐसी ही करारी हार विश्वविजेता सम्राट् सिकन्दर को भी दी थी, जिसका वर्णन अगले पृष्ठों पर किया जायेगा।

परिणामस्वरूप मांडा एवं फारस साम्राज्य की उत्तरी सीमा अरेक्सिज नदी तक निश्चित हो गई और जाट महारानी अपने ही राज्य की सीमाओं के भीतर ही पूर्णतः सन्तुष्ट रही। जाट महारानी का महत्त्व बहुत बढ़ गया था, क्योंकि उसने एक महान् विजय प्राप्त की तथा उसने भागते हुए शत्रु का पीछा अपने राज्य क्षेत्र में भी नहीं किया और शत्रु के क्षेत्र को अपने अधीन नहीं किया1

नोट - साईरस की सेना प्रधान रूप से जाट सेना ही थी जिसके सेनापति भी जाट थे। इसका वर्णन मध्यपूर्व के प्रकरण में किया जायेगा।

तोमरिस जाट महारानी की धार्मिकता, सहनशीलता, देशभक्ति और वीरता अद्वितीय थी। ऐसे उदाहरण संसार के स्त्री इतिहास में बिरले ही मिलते हैं।

(जाट्स दी ऐनशन्ट रूलर्ज, पृ० 136, 137 पर बी० एस० दहिया ने लिखा है कि बेरोस्सुज


1. अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 37-41, लेखक उजागरसिंह माहिल, जाट्स दी ऐनशन्ट् रूलर्ज, पृ० 131-133 लेखक बी० एस० दहिया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-354


के अनुसार जब साईरस की मृत्यु हुई तब वह दहिया जाटों के साथ युद्ध कर रहा था। कुछ अन्य इतिहासकार लिखते हैं कि वह डेबीसज या डबास जाटों के साथ लड़ रहा था। गान्धार देश के भारतीय सैनिक दहिया डबास की ओर होकर लड़ रहे थे। भारतीय सैनिक के तीर से साईरस की मृत्यु हुई।

जाट सेना का मिश्र पर आक्रमण

साईरस की मृत्यु होने पर उसका पुत्र कैम्बाईसिज़ फारस की राजगद्दी पर बैठा। उसने अपनी जाटसेना के साथ 525 ई० पू० में मिश्र पर आक्रमण कर दिया। डेल्टा (नील नदी) में जाटसेना का मिश्र की सेना से रक्तपातपूर्ण युद्ध हुआ। हैरोडोटस ने लिखा है कि “मैंने इस युद्ध के 50-60 वर्ष पश्चात् इस रणक्षेत्र में काम आये सैनिकों की हड्डियां तथा खोपड़ियां स्वयं देखी थीं। इस युद्ध के बाद कैम्बाईसिज़ की सेना ने मेमफिस तथा अधिकतम मिश्र को अपने अधिकार में ले लिया।” सूसा की ओर लौटते समय कैम्बाईसिज़ की मृत्यु एक दुर्घटना के कारण हुये घाव से सीरिया में हो गई।

साईरस के मुख्य सलाहकार हरपेगस जाट का पुत्र डेरियस ( Darius) 521 ई० पू० में कम्बाईसिज का उत्तराधिकारी बना।1

डेरियस का सीथिया तथा थ्रेश राज्य के शासक जाटों से युद्ध -

डेरियस जाट सम्राट् ने अपनी जाटसेना के बल से अपने मांडा राज्य को दूर-दूर तक एशिया के अनेक देशों को जीतकर विस्तृत किया। अब उसने यूरोप की ओर चढ़ाई की।

वह अपनी सेना को थ्रेश (बुल्गारिया) देश की ओर ले गया। फिर उसने डेन्यूब नदी को पार करके सीथियन जाटों पर आक्रमण कर दिया जो कि इससे भी अधिक वीर एवं युद्धविद्या में निपुण थे। सीथियन जाटसेना डेरियस को फुसलाने हेतु पीछे को हट गई। डेरियस ने सीथिया के राजा को यह सन्देश भेजा - “सीथिया देश के राजा, आप मेरे से दूर क्यों भाग रहे हो? यदि आप मेरे तुल्य हो तो ठहरो और युद्ध करो। यदि नहीं हो तो भागने की आवश्यकता नहीं, आप मुझे अपनी भूमि एवं जल सौंप दो और आत्मसमर्पण कर दो, जिसकी शर्तें सन्धि द्वारा तय की जा सकती हैं।” इस सन्देश का उत्तर सीथियन राजा ने डेरियस को भेजा, जो कि आदर्शभूत जाट उत्तर है। सन्देश में कहा गया कि “फारस के सम्राट्, मैं सूर्य भगवान् के अलावा अन्य किसी से नहीं डरता। मैं भागता नहीं हूं तथा भूमि और पानी आपको नहीं दूंगा। यद्यपि मैं आपको बड़े योग्य उपहार भेजता हूं।” उसने अपने दूत द्वारा एक पक्षी, एक चूहा, एक मेंढक और पांच तीर उपहार के तौर पर भेज दिये। डेरियस ने अनुमान लगाया कि चूहा भूमि को सूचित करता है तथा मेंढक पानी को। तदनुसार सीथियन ने हम को भूमि एवं पानी देना स्वीकार कर लिया है और आत्मसमर्पण कर रहे हैं। परन्तु डेरियस का ससुर जो कि एक चतुर सेनापति था, ने उसको इस उपहार का सत्य अर्थ इस तरह से बताया - “सिवाय इसके कि तुम पक्षी बनकर आकाश में उड़ जाओ या चूहे बनकर भूमि के भीतर चले जाओ या मेंढक बनकर पानी में चले जाओ, तुम में से एक भी जीवित वापिस नहीं जा सकता, हमारे तीर तुम्हारे हृदयों को छेद देंगे।” डेरियस यह समझकर कि मेरी सेना सीथियन सेना के फन्दे में फंसने वाली है, जान बचाकर डेन्यूब नदी को पार कर गया। अन्त में


1. अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 41, लेखक उजागरसिंह माहिल।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-355


वह सूसा को चला गया और एक सेना अपने वीर जनरल मेगाबाज़स (Megabazus) के नेतृत्व में देश में छोड़ गया। थ्रेस के जाटों ने इस जनरल को अपने अधीन कर लिया। इस तरह से थ्रेस के जाट तथा डैन्यूब नदी के प्रदेशों के शासक सीथियन जाट और अमू दरिया के उत्तर में शासक कांग जाट स्वतन्त्र रहे1

सीथियन तथा मध्य एशिया के जाटों की विशेषतायें

दलीप सिंह अहलावत[6] ने लिखा है.... इतिहास के अनुसार वीरता में जाट अद्वितीय हैं। एशिया में केवल यही जाति थी जिसने सिकन्दर महान् को हराया था। प्राचीनकाल में एक जाट योद्धा जिसने कभी अपने शत्रु की हत्या न की हो, उसे चिह्न के तौर पर अपने गले में एक रस्सी बांधनी पड़ती थी। प्राचीन यूनानी इतिहासज्ञ थूसीडाईड्स ने सीथियन जाटों की वीरता के विषय में लिखा है कि - “यदि जाटों में एकता हो जाए तो संसार में कोई भी राष्ट्र (जाति) उनके विरुद्ध खड़ा नहीं रह सकता।” इतिहास साक्षी है कि जब भी जाटों में एकता हुई उन्होंने तभी चमत्कार कर दिखाये।

हैरोडोटस के अनुसार “थ्रेश देश की जातियों में जाट सबसे वीर एवं न्यायप्रिय थे। वे संगीत के प्रेमी थे। वे तम्बू लगाने में निपुण थे। थ्रेश के जाट इतने शक्तिशाली थे कि सिकन्दर ने एशिया पर आक्रमण करने से पहले इनसे युद्ध करना पड़ा। परिणामस्वरूप जाटों ने यूनान पर आक्रमण किया तथा एथेन्स पर अधिकार कर लिया।” आगे यही लेखक लिखते हैं कि “प्रत्येक जाट लड़ाका एवं अच्छा धनुर्धर था। वे शत्रु के आक्रमण की पहुंच से दूर निवास करते थे। काला सागर के चारों ओर रहने वाली जातियों में केवल सीथियन जाट ही बुद्धिमान् थे तथा अन्य सब मूर्ख थे।”

प्राचीन इतिहासज्ञ पोम्पोनियस मेला ने सीथियन जाटों के विषय में लिखा है कि -

“ये ऊंची भूमि पर रहते हैं, कठोर जीवन व्यतीत करते हैं और इनके देश में खेती-बाड़ी कम होती है। ये युद्ध तथा मारकाट से प्यार करते हैं। जो कोई सबसे अधिक शत्रुओं को मारता है उसको सबसे अधिक प्रसन्न व्यक्ति माना जाता है। परन्तु जिसने कोई भी शत्रु न मारा हो उसको सबसे अधिक धिक्कारा जाता है। जिस दिन वे मारकाट नहीं करते हैं तो स्वयं घाव बनाकर अपने खून को एक बर्तन में डाल लेते हैं और इस खून को इसलिए पीते हैं कि वे अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने के लिए कटिबद्ध हैं। इनकी दावत के समय मुख्य बात यह सूचना लेने की होती है कि किसने कितने शत्रु मारे। सबसे अधिक संहार करने वाले को पीने के लिए दो प्याले दिये जाते हैं जो कि सबसे बड़ा सम्मान है। वे अपने शत्रुओं की खोपड़ियों के प्याले बनाते हैं।”

नोट - महाभारत भीष्मपर्व के लेख अनुसार “भीमसेन ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार युद्धक्षेत्र में दुःशासन को पछाड़कर उसका वह हाथ धड़ से अलग कर दिया जिससे उसने द्रौपदी के केश पकड़कर भरी सभा में अपमानित किया था तथा उसके खून को भी पी लिया।”

शत्रु के प्रति जाटों की यह धारणा परम्परागत है।


1. अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 42, लेखक उजागरसिंह माहिल, एवं जाट्स दी ऐनशन्ट् रूलर्ज, पृ० 134, लेखक बी० एस० दहिया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-356


होजीअड के लेख अनुसार, “थ्रेश देश के जाट दूध पीने वाले, घोड़ियों को दुहने वाले तथा चौपहिया गाड़ियों में रहने वाले थे। जिस किसी ने शत्रु नहीं मारा हो उसको वार्षिक दावत से वंचित रखा जाता था।”

इतिहासज्ञ थूसीडाईड्स ने थ्रेश देश के जाटों के विषय में लिखा है कि - “वे इतने अधिकसंख्यक तथा भयंकर थे कि यदि वे संगठित हो जाते थे तो कोई भी अन्य जाति उनके सामने खड़ी नहीं रह सकती थी, वे किसी से भी रुकने वाले नहीं थे। बुद्धिमत्ता के हिसाब से वे दूसरी जातियों से भिन्न थे।”

इतिहासज्ञ जस्टिन ने सीथियन जाटों के विषय में लिखा है कि “वे सोना और चांदी से घृणा करते थे तथा इनको प्राप्त करने हेतु उन्होंने अपने पड़ौसियों पर आक्रमण नहीं किए। उन्होंने पर्थिया तथा बैक्ट्रिया साम्राज्यों की नींव रखी। निरन्तर युद्धों तथा कठोर परिश्रम से वे भयंकर तथा बहुत शक्तिशाली बने1।”

सीथियन जाटों का मिश्रसेना से युद्ध

जस्टिन के लेख अनुसार – मिश्र का राजा वेक्सोरिस प्रथम राजा था जिसने सीथियन जाटों से युद्ध किया। उसने पहले तो अपने राजदूत को सीथियनों के पास इसलिए भेजा कि वे किस शर्त पर हथियार डालने को तैयार हैं। इस सन्देश का सीथियन्ज ने दूत को निम्नलिखित उत्तर दिया -

“तुम्हारा स्वामी जो कि बहुत धनवान् लोगों का अध्यक्ष है, निःसन्देह गरीब लोगों पर छापा मारने के लिए गुमराह किया गया है। उसको अपने घर ही रहना उचित है। युद्ध में संकट बहुत हैं। विजय का महत्त्व तुम्हारे लिए बिल्कुल नहीं है किन्तु हानि अटल है। इसलिए हम उस समय तक ठहरेंगे जब तक कि राजा हमारे पास पहुंच जाये। क्योंकि राजा के पास हमारे लूटने के लिए पर्याप्त धन है, इसलिए उस धन को अपने लाभ के लिए छीनने की शीघ्रता करेंगे।”

जब मिश्र के राजा को अपने संदेशवाहक से यह सूचना मिली कि सीथियन जाट उसकी ओर तीव्र गति से बढ़ रहे हैं तो उसने अपनी सेना तथा सभी भण्डार छोड़ दिये और अपने देश को भाग गया। जाटों ने प्रत्येक वस्तु पर अपना अधिकार कर लिया किन्तु अनुल्लंघनीय दलदल के कारण वे मिश्र में प्रवेश न कर सके। लौटने पर उन्होंने एशिया पर विजय पाई और कर लगाये जो 1500 वर्ष तक जारी रहे। केवल असीरिया के राजा ‘नीनस’ ने यह कर देना बन्द किया था।

कुप्पाडोसिया के युद्ध में जब सारे सीथियन पुरुष मारे गये तब इनकी स्त्रियों ने हथियार उठाए थे और युद्ध किया था। घटनाक्रम से उन औरतों को ‘एमेजन’ कहा जाता था। ऐण्टीओपे तथा ओरिथिया नामक दो एमेजन रानियां थीं। अन्तिम एमेजन रानी का नाम मिनिथिया था2

मकदूनिया (Macedonia) देश के शासकों से जाटों का युद्ध

5वीं शताब्दी ईस्वी पूर्व में जाटों ने मकदूनिया के राजा परडीकास द्वितीय पर आक्रमण


1. अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 15-18, लेखक उजागरसिंह माहिल।
2. अनटिक्विटी ऑफ जाट रेस, पृ० 18-19, लेखक उजागरसिंह माहिल।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-357


करनेवाले आडराईसो के राजा सीतलक्स की सहायता के लिए एक घुड़सवार सैनिक दस्ता भेजा था। इन दोनों देशों में संघर्ष तब तक जारी रहा जब तक कि मकदूनिया के राजा फिलिप द्वितीय ने 342 ई० पू० में आडराईसो को विजय करके उनसे कर लेना आरम्भ किया। अब जाटों ने फिलिप से मेल कर लिया। जाटों के राजा गोथलस ने फिलिप को सिपाही भेजने आरम्भ कर दिए और अपनी पुत्री का विवाह फिलिप से कर दिया। थ्रेस (बुलगारिया) की सीमा के साथ दक्षिण में मकदूनिया है जो कि यूनान का उत्तरी भाग है। गोथलस, ईपीरस (यूनान का पश्चिमी भाग) का जाट राजा था। फिलिप की सेना में भी बहुत जाट सैनिक थे और उनके पुत्र सिकन्दर की विशाल सेना में इन जाटों की बड़ी संख्या थी। यूनानी विद्वान् फर्ग्यूसन का कहना है कि “मकदूनिया वाले यूनानियों तथा थ्रेस के जाटों की सन्तान हैं। सिकन्दर महान् ने भी स्वीकार किया था कि मेरी रगों में जाट खून बह रहा है। वह कहता था कि सिकन्दर महान् की माता ओलाइम्पीअस (Olympias) ईपीरस (Epirus) देश के जाट राजा की पुत्री थी जो कि वहां की जाट रानियों की औलाद थी। ओलाइम्पीअस का स्वभाव एवं आदतें बिल्कुल थ्रेश की जाट स्त्रियों जैसी थीं।”

मकदूनिया के साथ जाटों के युद्धों का काफी वर्णन मिलता है।

326 ई० पू० में जोपाईरिअन ने जाटों के देश पर आक्रमण किया जिसमें उसको करारी हार मिली। 292 ई० पू० में लाईसिमेशस ने जाटों पर आक्रमण किया और बस्सारबिया के युद्ध के मैदान तक बढ़ आया। जाटों ने उसके वापिस लौटने के रास्ते को घेर लिया। उसने लाचार होकर हथियार डालने पड़े। जाट सेना ने उस राजा को फांसी देने की मांग की किन्तु जाट राजा ड्रोमीचेइटस ने उसे बिना कोई चोट के उदारता से छोड़ दिया। एक बार फिलिप ने डैन्यूब नदी के सीथियन जाटों पर आक्रमण करके उनके काफी घोड़े तथा अन्य पशु छीन लिए। फिलिप के लौटते समय जाटों ने उस पर जवाबी हमला कर दिया और उससे लूटा हुआ माल छुड़वा लिया। फिलिप को गहरी चोट लगी और बड़ी मुश्किल से अपनी सेना को हेइमस दर्रे से अपने देश में वापिस ले गया1

Scythian tribes

The Scythians – the Greeks' name for this nomadic people – inhabited Scythia from at least the 11th century BC to the 2nd century AD.[7]

Many different groupings of Scythian tribes include the following:

Origin of Scythian

James Todd[9] writes that the origin of the Scythic nations, as related by Diodorus; . when it will be observed the same legends were known to him which have been handed down by the Puranas and Abulghazi.

The Scythians had their first abodes on the Araxes. The Arvarma of the Puranas ; the Jaxartes or Sihun. The Puranas thus describe Sakadwipa or Scythia. Diodorus (Mb. ii.) makes the Hemodus the boundary between Saka-Scythia and India Proper. Their origin was from a virgin born of the earth[10] of the shape of a woman from the waist upwards, and below a serpent (symbol of Budha or Mercury) ; that Jupiter had a son by her, named Scythes," whose name the nation adopted. Scythes had two sons, Palas and Napas (qu. the Nagas, or Snake race, of the Tatar genealogy ?), who were celebrated for their great actions, and who divided the countries ; and the nations were called after them, the Palians (qu. Pali ?)[11] and Napians. They led their forces as far as the Nile on Egypt, and subdued many nations. They enlarged the empire of the Scythians as far as the Eastern ocean,


[p. 71]: and to the Caspian and lake Moeotis. The nation had many kings, from whom the Sacans (Sakae), the Massagetae ( Getae or Jats), the Ari-aspians (Aswas of Aria), and many other races. They overran Assyria and Media . [12] [59], overturning the empire, and transplanting the inhabitants to the Araxes under the name of Sauro-Matians. [13]

As the Sakae, Getae, Aswa, and Takshak are names which have crept in amongst our thirty-six royal races, common with others also to early civilization in Europe, let us seek further ancient authority on the original abodes.

Strabo [14] says : " All the tribes east of the Caspian are called Scythic. The Dahae next the sea, the Massagetae (great Gete) and Sakae more eastward ; but every tribe has a particular name. All are nomadic : but of these nomads the best -known are the Asii, [15] the Pasiani, Tochari, Sacarauli, who took Bactria from the Greeks. The Sakae (' races ') have made in Asia irruptions similar to those of the Cimmerians ; thus they have been seen to possess themselves of Bactria, and the best district of Armenia, called after them Sakasenae." .


[p.72]:

shall not now stop to inquire, limiting our hypothesis to the fact of invasions, and adducing some evidence of such being simultaneous with migrations of the same bands into Europe. Hence the inference of a common origin between the Rajput and early races of Europe ; to support which, a similar mythology, martial manners and poetry, language, and even music and architectural ornaments, may be adduced.

Herodotus (iv. 12) says : " The Cimmerians, expelled by the Massagetae, migrated to the Crimea." Here were the Thyssagetae, or western Getae [the lesser Getae, Herodotus iv..22]; and thence both the Getae and Cimbri found their way to the Baltic. Rubruquis the Jesuit, describing the monuments of the Comani in the Dasht-i Kipchak, whence these tribes, says : " Their monuments and circles of stones are like our Celtic or Druidical remains " (Bell's Collection). The Khuman are a branch of the Kathi tribe of Saurashtra, whose paliyas, or funeral monumental pillars, are seen in groups at every town and village. The Chatti were one of the early German tribes. [Needless to say, the German Chatti had no connexion with the Kathi of Gujarat.]

First migrations of the Indo-Scythic Getae, Takshak, and Asii, into India

James Todd[16] writes that Of the first migrations of the Indu-Scythic Getae, Takshak, and Asii, into India, that of Sheshnag (Takshak), from Sheshnagdes (Tocharistan ?) or Sheshnag, six centuries, by calculation, before Christ, is the first noticed by the Puranas About this period a grand irruption of the same races conquered Asia Minor, and [60] eventually Scandinavia ; and not long after the Asii and Tochari overturned the Greek kingdom of Bactria, the Romans felt the power of the Asi, the Chatti, and Cimbri, from the Baltic shore.

Asi was the term applied to the Getes, Yeuts, or Juts, when they invaded Scandinavia and founded Yeutland or Jutland (see ' Edda,’ Mallet's Introduction).

If we can show the Germans to have been originally Scythae or Goths (Getes or Jits), a wide field of curiosity and inquiry is open to the origin of government, manners, etc. ; all the antiquities of Europe will assume a new appearance, and, instead of being traced to the bands of Germany, as Montesquieu and the greatest writers have hitherto done, may be followed through long descriptions of the manners of the Scythians, etc., as given by Herodotus. Scandinavia was occupied by the Scythae five hundred years before Christ. These Scythians worshipped Mercury (Budha), Woden or Odin, and believed themselves his progeny. The Gothic mythology, by parallel, might be shown


[p. 73]:

to be Grecian, whose gods were the progeny of Coelus and Terra (Budha and Ella). Dryads, satyrs, fairies, and all the Greek and Roman superstition, may be found in the Scandinavian creed. The Goths consulted the heart of victims, had oracles, had sibyls, had a Venus in Freya, and Parcae in the Valkyrie."

External links

References

  1. Giovanni Boccaccio’s Famous Women translated by Virginia Brown 2001, p. 25; Cambridge and London, Harvard University Press; ISBN 0-674-01130-9
  2. Sinor, Denis (1990). The Cambridge History of Early Inner Asia, Volume 1. Cambridge University. ISBN 0521243041.
  3. Harry Thurston Peck, Harpers Dictionary of Classical Antiquities (1898) Oceanus Sarmaticus
  4. जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठ.332-333
  5. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV,p.332-356
  6. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter IV,p.356-357
  7. Lessman, Thomas. "World History Maps". 2004. Thomas Lessman.
  8. [1]
  9. James Todd Annals/Chapter 6 Genealogical history of the Rajput tribes subsequent to Vikramaditya, Vol I, pp.70-71
  10. Ila, the mother of the Lunar race, is the earth personified. Ertha of the Saxons ; e'pa of the Greeks ; ard in Hebrew [?].
  11. The Pali character yet exists, and appears the same as ancient fragments of the Buddha inscriptions in my possession : many letters assimilate with the Coptic.</
  12. The three great branches of the Indu (Lunar) Aswa bore the epithet of Midia (pronounced Mede), viz. Urumidha, Ajamidha, and Dvimidha. Qu. The Aswa invaders of Assyria and Media, the sons of Bajaswa, expressly stated to have multiplied in the countries west of the Indus, emigrating from their paternal seats in Panchalaka ? (Midha means ' pouring out seed, prolific,' and has no connexion with Mede, the Madai of Genesis X. 2 ; the Assyrian Mada.]
  13. Sun-worshippers, the Suryavansa.
  14. Strabo lib. xi. p. 511.
  15. The Asii and Tochari, the Aswa and Takshak, or Turushka races, of the Puranas, of Sakadwipa [?]. " C'est vraisemblablement d'apres le nom de Tachari, que M. D'Anville aura cru devoir placer les tribus ainsi de-nommees dans le territoire qui s'appelle aujourdhui Tokarist'hpon, situe, dit ce grand geographe, entre les montagnes et le Gihon ou Amou " (Note 3, hv. xi. p. 254, Strabon).
  16. James Todd Annals/Chapter 6 Genealogical history of the Rajput tribes subsequent to Vikramaditya, Vol I, pp.72