Punyajani

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Punyajani (पुण्यजनी), meaning: meritorious, the wife of Nagavanshi Manibhadra who was an attendant of Shiva. He was ruler of Dwarka in Saurashtra, Gujarat. The descendants of Punyajani were defeated by Rukmi son of Bhismaka.

Variants

पुण्यजनी

शिव पुराण के अनुसार इसका एक प्रसिद्ध नाम दारुका वन (Mbt:V.82.22) था , जहाँ नागों का निवास था। आर्यों ने उन्हें वर्णाश्रम-धर्म का अनुयायी बनाया और नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना की। ब्रह्माण्डपुराण (3.7.100) के अनुसार कश्यप का पुत्र यक्ष (गुह्यक) था, जिसे पञ्चचूड़ा क्रतुस्थला नाम की अप्सरा से रजतनाथ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और उनके मणिवर तथा मणिभद्र नाम के दो पुत्र हुए। इनमें मणिभद्र का विवाह पुण्यजनी नाम की कन्या से हुआ। इस पुण्यजनी की संतानें पुण्यजनी कहलाई। इनका कुछ दिनों तक इस क्षेत्र पर अधिपत्य रहा और कालांतर में भीस्मक के पुत्र रुक्मी ने इन्हें पराजित कर भगाया था । तभी द्वारका उजड़ गयी थी और इसी उजड़ी हुई द्वारका को कृष्ण ने फिर से बसाया था. सम्भवतः इसी कारण महाभारत में द्वारका के 'पुनर्निवेशनम्' शब्द का प्रयोग किया है।[1]

पुण्यजन

विजयेन्द्र कुमार माथुर[2] लिखते हैं कि कुशस्थली द्वारका का ही प्राचीन नाम है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण इसका नाम कुशस्थली नाम पड़ा। पीछे त्रिविक्रम भगवान् कुश नामक दानव का वध भी यहीं किया था। त्रिविक्रम का मंदिर भी द्वारका में रणछोड़ जी के मंदिर के पास है। ऐसा जान पड़ता है कि महाराज रैवतक (बलराम की पत्नी रेवती के पिता) ने प्रथम बार, समुद्र में से कुछ भूमि बाहर निकलकर यह नगरी बसाई थी। हरिवंश पुराण (1.1.4) के अनुसार कुशस्थली उस प्रदेश का नाम था जहाँ यादवों ने द्वारका बसाई थी। विष्णु पुराण के अनुसार, आनर्तस्यापि रेवतनामा पुत्रोजज्ञे योऽसावानर्त विषयं बुभुजे पुरीं च कुशस्थली मध्युवास अर्थात आनर्त के रेवत नामक पुत्र हुआ जिसने कुशस्थली नामक पुरी में रहकर आनर्त विषय पर राज्य किया। एक प्राचीन किंवदंती में द्वारका का सम्बन्ध पुण्यजनों से बताया गया है। ये पुण्यजन वैदिक पाणिक या पणि हो सकते हैं। अनेक विद्वानों का मत है कि ये प्राचीन ग्रीस के फिनिशियनों का ही भारतीय नाम है। ये अपने को कुश की सन्तान मानते थे। (वेडल: मेकर्स ऑफ़ सिविलाइजेशन पृ.80) हमारा मत है कि ये पूनिया जाट ही थे।

External links

References

  1. दिव्य द्वारका, प्रकाशक: दण्डी स्वामी श्री सदानन्द सरस्वती जी, सचिव श्रीद्वारकाधीश संस्कृत अकेडमी एण्ड इंडोलॉजिकल रिसर्च द्वारका गुजरात, 2013, पृ.16
  2. Aitihasik Sthanavali,p. 272

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