Samprati Maurya

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Genealogy of Mauryas

Samprati Maurya (224BC-215BC)(सम्प्रति मौर्य) was king of the Mauryan Empire from 224-215 BCE. He was the successor of Dasarath Maurya. Jaina records mention him as an ardent follower of Jainism.

Patron of Jainism

Samparti Maurya son of Dasarath Maurya and grandson of Asoka was a great patron of Jainism, who, according to Jinaprabhasuri ruled at Patliputra as ‘’lord of Bharata with its three continents, and was the great Arhanta to establish Viharas for Sramanas even in non-Aryan countries.” The dominions of Samprati probably also included Avanti and Western India.[1]

Nadlai Inscription of 1629 AD

नाडलाई शिलालेख 1629 ई.

डॉ. गोपीनाथ [2] लिखते हैं कि यह शिलालेख आदिनाथ मंदिर की मूर्ति पर 6 पंक्तियों का है. इसका समय वि.सं. 1686 वैशाख शुक्ला 8 शनिवार है और महाराणा जगतसिंह के काल का है. इस लेख में तपागच्छ के आचार्य हरिविजय, विजयसेन और विजयदेव सूरि का उल्लेख है.

लेख का मूल इस प्रकार है -

1. संवत 1686 वर्षे वैशाख मासे शुक्ल पक्षे शति पुष्प योगे अष्टमी दिवसे महाराणा श्री जगत सिंहजी विजय राज्ये जहांगीरी महातपा
2. विरुद धारक भट्टारक श्री विजयदेवसूरीश्वरोपदेशकारित प्राक्प्रशस्ति पट्टिका ज्ञातराज श्री सम्प्रति निर्म्मापित श्री जेरपाल पर्वतस्य
3. जीर्ण्ण प्रासादोद्धारेण श्री नडलाई वास्तव्य समस्त संघेन स्वश्रेयसे श्री श्री आदिनाथबिंबं कारितं प्रतिष्ठितं च पादशाह श्री मदकब्बर
4. शाह प्रदत्त जगत् गुरु विरुद धारक तपागच्छाधिराज भट्टारक श्री 5 हीरविजयसूरीश्वर पट्टप्रभाकर भ. श्री विजयसेन सूरीश्व
5. र पट्टालंकर भट्टारक श्री विजयदेवसूरिभि: स्वपद प्रतिष्ठिताचार्य श्री विजय सिंह सूरि प्रमुख परिवार परिवृतै: श्री नडुलाई मंडन श्री
6. जेरवल पर्वतस्य प्रासाद मूलनायक श्री आदिनाथ बिंबं ||श्री||

Ghanghani Inscription of Samprati Maurya

Ghanghani is a village in tahsil Bhopalgarh of Jodhpur district in Rajasthan. It is situated near Asarnada railway station on Bikaner-Jodhpur line. There is an ancient Jaina Temple. According to Jaina poet Samayasundara the ancient sculptures bear Inscription of Samprati Maurya, Dasarath Maurya's son and granson of Ashoka Maurya. This indicates that he built a grand Padmaprabhu Jinalaya temple.[3]

References

  1. (ed.) R.C. Majumdar, The Age of Imperial Unity, pp.89-90
  2. डॉ. गोपीनाथ शर्मा: राजस्थान के इतिहास के स्त्रोत, 1983, पृ. 180
  3. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.311

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