Udaipur

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Map of Udaipur District‎

Udaipur (उदयपुर) is a city and district in Rajasthan.

Variants

  • Gihlot (गिहलौट) - ancient name of Udaipur.
  • Gihalauta गिहलौट (उदयपुर, राज.) (AS, p.289)

Location

Udaipur is located in the southernmost part of Rajasthan, near the Gujarat border. It is surrounded by Aravali Range, which separates it from Thar Desert. It is around 655 km from Delhi and approximately 800 km from Mumbai, placed almost in the middle of two major Indian metro cities. Besides, connectivity with Gujarat ports provide Udaipur a strategic geographical advantage. Udaipur is well connected with nearby cities and states by means of road, rail and air transportation facilities. Udaipur is located at 24.525049°N 73.677116°E.

Tahsils in Udaipur District

Pichhola Lake-Udaipur

History

It was the historic capital of the kingdom of Mewar. It was founded in 1559 by Maharana Udai Singh II of the Sisodia clan of Rajput,[1] when he shifted his capital from the city of Chittorgarh to Udaipur after Chittorgarh was besieged by Akbar. It remained as the capital city till 1818 when it became a British princely state,[2] and thereafter the Mewar province became a part of Rajasthan when India gained independence in 1947.[3]

Pre-Historic Era: The Ahar River bank was inhabited by men in about 2000 B.C. There are footprints of two different civilizations, which provides claims about earliest inhabitants of the Ahar culture: the Bhil/Bheels, the indigenous tribes originated at this place, and are still residing in the area in large numbers.

The Establishment of Udaipur as a city: Udaipur was founded in 1559,[4] by Maharana Udai Singh II[5] in the fertile circular Girwa Valley to the southwest of Nagda, on the Banas River. The city was established as the new capital of the Mewar kingdom. This area already had a thriving trading town, Ayad, which had served as capital of Mewar in the 10th through 12th centuries.[6] The Girwa region was thus already well known to Chittaud rulers who moved to it whenever the vulnerable tableland Chittaurgarh was threatened with enemy attacks. Maharana Udai Singh II, in the wake of 16th century emergence of artillery warfare, decided during his exile at Kumbhalgarh to move his capital to a more secure location. Ayad was flood-prone, hence he chose the ridge east of Pichola Lake to start his new capital city, where he came upon a hermit while hunting in the foothills of the Aravalli Range. The hermit blessed the king and guided him to build a palace on the spot, assuring him it would be well protected. Udai Singh II consequently established a residence on the site. In November 1567, the Mughal emperor Akbar laid siege to the venerated fort of Chittor. To protect Udaipur from External attacks, Maharana Udai Singh built a six kilometre long city wall, with seven gates,[7] namely Surajpole, Chandpole, Udiapole, Hathipole, Ambapole, Brahmpole and so on. The area within these walls and gates is still known as the old city or the walled city.

As the Mughal empire weakened, the Sisodia rulers, reasserted their independence and recaptured most of Mewar except for Chittor. Udaipur remained the capital of the state, which became a princely state of British India in 1818. Being a mountainous region and unsuitable for heavily armoured Mughal horses, Udaipur remained safe from Mughal influence despite much pressure.

उदयपुर

विजयेन्द्र कुमार माथुर[8] ने लेख किया है ...उदयपुर (AS, p.96) मेवाड़ के महाराणा प्रताप के पिता सूर्यवंशी नरेश महाराणा उदयसिंह के द्वारा 16वीं शती में बसाया गया था। मेवाड़ की प्राचीन राजधानी चित्तौड़गढ़ थी। मेवाड़ के नरेशों ने मुग़लों का आधिपत्य कभी स्वीकार नहीं किया था। महाराणा राजसिंह जो औरंगज़ेब से निरन्तर युद्ध करते रहे थे, महाराणा प्रताप के पश्चात् मेवाड़ के राणाओं में सर्वप्रमुख माने जाते हैं। उदयपुर के पहले ही चित्तौड़ का नाम भारतीय शौर्य के इतिहास में अमर हो चुका था। उदयपुर में पिछोला झील में बने राजप्रासाद तथा सहेलियों का बाग़ नामक स्थान उल्लेखनीय हैं।

उदयपुर परिचय

उदयपुर शहर, दक्षिणी राजस्थान राज्य, पश्चिमोत्तर भारत में, अरावली पर्वतश्रेणी पर स्थित है। बंबई (अब मुम्बई) से 697 मील उत्तर उदयपुर-चित्तौर रेलवे के अंतिम छोर के पास स्थित उदयपुर नगर मेवाड़ के गर्वीले राज्य की राजधानी है। नगर समुद्रतल से लगभग दो हज़ार फुट ऊँची पहाड़ी पर प्रतिष्ठित है एवं जंगलों द्वारा घिरा है। प्राचीन नगर प्राचीर द्वारा आबद्ध है जिसके चतुर्दिक्‌ रक्षा के लिए खाई खुदी है। पहाड़ी के ऊर्ध्व शिखर पर नाना प्रकार के प्रस्तरों से निर्मित महाराणा का प्रासाद, युवराज गृह, सरदार भवन एवं जगन्नाथ मंदिर दर्शनीय हैं। इनका प्रतिबिंब पचोला झील में पड़ता है। झील के मध्य में यज्ञ मंदिर एवं जलवास नामक दो जलप्रासाद हैं।

स्थापना: महाराणा उदयसिंह ने सन् 1559 ई. में उदयपुर नगर की स्थापना की। लगातार मुग़लों के आक्रमणों से सुरक्षित स्थान पर राजधानी स्थानान्तरित किये जाने की योजना से इस नगर की स्थापना हुई। उदयपुर शहर राजस्थान प्रान्त का एक नगर है। यहाँ का क़िला अन्य इतिहास को समेटे हुये है। इसके संस्थापक बप्पा रावल थे, जो कि सिसोदिया राजवंश के थे। आठवीं शताब्दी में सिसोदिया राजपूतों ने उदयपुर (मेवाड़) रियासत की स्थापना की थी।

उदयपुर के महाराणा का दरबार: उदयपुर को सूर्योदय का शहर कहा जाता है, जिसको 1568 में महाराणा उदयसिंह द्वारा चित्तौड़गढ़ विजय के बाद उदयपुर रियासत की राजधानी बनाया गया था। प्राचीर से घिरा हुआ उदयपुर शहर एक पर्वतश्रेणी पर स्थित है, जिसके शीर्ष पर महाराणा जी का महल है, जो सन् 1570 ई. में बनना आरंभ हुआ था। उदयपुर के पश्चिम में पिछोला झील है, जिस पर दो छोटे द्वीप और संगमरमर से बने महल हैं, इनमें से एक में मुग़ल शहंशाह शाहजहाँ (शासनकाल 1628-58 ई.) ने तख़्त पर बैठने से पहले अपने पिता जहाँगीर से विद्रोह करके शरण ली थी।

सन 1572 ई. में महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र प्रताप का राज्याभिषेक हुआ था। उन दिनों एक मात्र यही ऐसे शासक थे जिन्होंने मुग़लों की अधीनता नहीं स्वीकारी थी। महाराणा प्रताप एवं मुग़ल सम्राट अकबर के बीच हुआ हल्‍दीघाटी का घमासान युद्ध मातृभूमि की रक्षा के लिए इतिहास प्रसिद्ध है। यह युद्ध किसी धर्म, जाति अथवा साम्राज्य विस्तार की भावना से नहीं, बल्कि स्वाभिमान एवं मातृभूमि के गौरव की रक्षा के लिए ही हुआ।


मौर्य वंश के राजा मानसिंह ने उदयपुर के महाराजाओं के पूर्वज बप्पा रावल को जो उनका भांजा था, यह क़िला सौंप दिया। यहीं बप्पा रावल ने मेवाड़ के नरेशों की राजधानी बनाई, जो 16वीं शती में उदयपुर के बसने तक इसी रूप में रही। आठवीं शताब्दी में सिसोदिया राजपूतों ने उदयपुर (मेवाड़) रियासत की स्थापना की थी। बाद में इस वंश ने मुस्लिम आक्रमणों का लंबे समय तक प्रतिरोध किया। 18वीं शताब्दी में इस राज्य को आतंरिक फूट व मराठों के आक्रमणों का सामना करना पड़ा और 1818 ई. में यह ब्रिटिश प्रभुता के अधीन हो गया था। 1948 ई. में राजस्थान राज्य में इसका विलीन हो गया।

मेवाड़ राजस्थान के दक्षिण मध्य में एक रियासत थी। मेवाड़ को उदयपुर राज्य के नाम से भी जाना जाता था। इसमें आधुनिक भारत के उदयपुर, भीलवाड़ा, राजसमंद, तथा चित्तौडगढ़ ज़िले थे। सैकड़ों सालों तक यहाँ राजपूतों का शासन रहा और इस पर गहलौत तथा सिसोदिया राजाओं ने 1200 साल तक राज किया था। अलाउद्दीन ख़िलजी ने 1303 ई. में मेवाड़ के गहलौत राजवंश के शासक रतनसिंह को पराजित कर मेवाड़ को दिल्ली सल्तनत में मिलाया। गहलौत वंश की एक शाखा 'सिसोदिया वंश' के हम्मीरदेव ने मुहम्मद तुग़लक के समय में चित्तौड़ को जीत कर पूरे मेवाड़ को स्वतंत्र करा लिया। 1378 ई. में हम्मीदेव की मृत्यु के बाद उसका पुत्र क्षेत्रसिंह (1378 -1405 ई.) मेवाड़ की गद्दी पर बैठा। क्षेत्रसिंह के बाद उसका पुत्र लक्खासिंह 1405 ई. में सिंहासन पर बैठा। लक्खासिंह की मृत्यु के बाद 1418 ई. में इसका पुत्र मोकल राजा हुआ। मोकल ने कविराज बानी विलास और योगेश्वर नामक विद्वानों को आश्रय दिया। उसके शासनकाल में माना, फन्ना और विशाल नामक प्रसिद्ध शिल्पकार आश्रय पाये हुये थे। मोकल ने अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया तथा एकलिंग मंदिर के चारों तरफ परकोटे का भी निर्माण कराया। उसकी गुजरात शासक के विरुद्ध किये गये अभियान के समय हत्या कर दी गयी। 1431 ई. में उसकी मृत्यु के बाद राणा कुम्भा मेवाड़ के राज सिंहासन पर बैठे। अम्बाजी नाम के एक मराठा सरदार ने अकेले ही मेवाड़ से क़रीब दो करोड़ रुपये वसूले थे।

संदर्भ: भारतकोश-उदयपुर

गिहलौट

विजयेन्द्र कुमार माथुर[9] ने लेख किया है ...[p.289]: गिहलौट मध्यकाल में चित्तौड़ के निकट अरावली पर्वत की घाटी में बसा हुआ एक अति प्राचीन स्थान है, जो बाद में उदयपुर कहलाया। मेवाड़ की प्राचीन जनश्रुतियों के अनुसार मेवाड़-नरेशों के पूर्वज बप्पारावल ने चित्तौड़ को विजय करने से पहले इसी स्थान के निकट कुछ समय तक अज्ञातवास किया था. गहलोत राजपूतों का आदि निवास-स्थान भी यहीं था. इस स्थान का नामकरण गुहिल जाति के यहाँ मूलरूप से निवास करने के कारण हुआ था। बप्पा का संबंध बचपन में इन्हीं लोगों से रहा था (गुहिल=गुह).

सन 1567 ई. में जब अकबर ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, तो महाराणा उदयसिंह राजधानी छोड़कर गिहलौट में जाकर रहे थे। उन्होंने प्रारम्भ में यहाँ एक [p.290]: पहाड़ी पर सुन्दर प्रासाद का निर्माण करवाया था। धीरे-धीरे यहाँ कई महल बनवाये तथा यहाँ पर निवासियों की संख्या भी बढ़ने लगी। जल्दी ही इस जंगली गाँव ने एक सुन्दर नगर कारूप धारण कर लिया। इसी का नाम कुछ समय पश्चात् उदयसिंह के नाम पर उदयपुर हुआ और उदयसिंह ने मेवाड़ राज्य की राजधानी चित्तौड़ से हटा कर इस नये नगर में बनायी गयी।

Notable persons

  • Hari Singh Udaipur (चौधरी हरिसिंह उदयपुर) from Udaipur, Rajasthan, was a social worker and freedom fighter in Udaipur, Rajasthan. [10]
  • Alka Sirohi - Social Welfare Officer Social Welfare Service , Home District : Udaipur, Date of Birth : 27-November-1970, F-426, Gandhi Nagar Govt. Quarters, Gandhinagar,Jaipur, Phone Number : 0141-2226637, Mob: 9414241699
  • Devi Singh Choudhary (Beda) - Research Officer (VRS Optee) Irrigation, Date of Birth : 26-May-1950, Permanent Address : 60, Panna Dhai Marg,Jatwadi Pulia,Udaipur - 313001, Present Address : 248, Panchsheel Vatika, Vishwakarma Nagar I, Maharani Farm, Durgapura, JAIPUR-18, Mob: 9414471039

External links

Gallery

References

  1. UDAIPUR: Since 1553 CE!-Its Founding & a Concise Photo Fact-File. Ranawat, P. S., 2014.
  2. "History of Udaipur". udaipur.rajasthan.gov.in.
  3. "Udaipur History". udaipur.org.uk.
  4. UDAIPUR: Since 1553 CE!-Its Founding & a Concise Photo Fact-File. Ranawat, P. S., 2014
  5. "Udaipur City Introduction". themaharajaexpress.org.
  6. "Udaipur History". udaipur.rajasthan.gov.in
  7. Jain, Manishika. GIS and Remote Sensing Techniques (2009 ed.). Examrace.com, 2009. p. 36.
  8. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.96
  9. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.289
  10. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.549-550

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