Ayu

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Genealogy of Ila
Ancestry of Rishi Atri
Pururava Ancestry as per Bhagavata Purana

Ayu (आयु) was a Chandravanshi king. He was eldest son of Pururava and father of Nahusha.

Pururava (पुरूरवा) was the first king of the Aila dynasty or the Somavamsha.

Ancestry of Ayu

AtriChandramaBudhaPururavaAyuNahushaYayati

Ayu had four sons namely, Nahusha, Vriddhasharma, Rajinrambha, and Anena. [1]

Jat Gotras from Ayu

Ajra (अजरा) gotra of Jats get its name from King named Ayu in Kuruvansha. [2]

Ayu Vansha

  • Pururava's son was Ayu (36,000 yrs) - he was a devotee of Vishnu. Ayu had 4 sons
  1. Kshatravriddha
  2. Raji Rambha
  3. Anena
  4. Nahush

Ayu Line 1 - Kshatravriddh Vansha

  1. Kashya
  2. Kusha
  3. Grihatsmada

Pururva - Ayu - Kshatravriddh - Kashya Vansa

Pururva - Ayu - Kshatravriddh - Kush Vansha

Pururva - Ayu - Kshatravriddh - Grihatsmad Vansh

खांडवप्रस्थ

विजयेन्द्र कुमार माथुर[3] ने लेख किया है कि....खांडवप्रस्थ (AS, p.255) हस्तिनापुर के पास एक प्राचीन नगर था जहां महाभारतकाल से पूर्व पुरुरवा, आयु, नहुष तथा ययाति की राजधानी थी. कुरु की यह प्राचीन राजधानी बुधपुत्र के लोभ के कारण मुनियों द्वारा नष्ट कर दी गई. युधिष्ठिर को, जब प्रारंभ में, द्यूत-क्रीडा से पूर्व, आधा राज्य मिला तो धृतराष्ट्र ने पांडवों से खांडवप्रस्थ में अपनी राजधानी बनाने तथा फिर से उस प्राचीन नगर को बसाने के लिए कहा था. (महाभारत आदि पर्व, 206 दक्षिणात्य पाठ) तत्पश्चात पांडवों ने खांडवप्रस्थ पहुंच कर उस प्राचीन नगर के स्थान पर एक घोर वन देखा. (आदि पर्व: 206, 26-27). खांडवप्रस्थ के स्थान पर ही इंद्रप्रस्थ नामक नया नगर बसाया गया जो भावी दिल्ली का केंद्र बना. खांडवप्रस्थ के निकट ही खांडववन स्थित था जिसे श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अग्निदेव की प्रेरणा से भस्म कर दिया. खांडवप्रस्थ का उल्लेख अन्यत्र भी है. पंचविंशब्राह्मण 25,3,6 में राजा अभिप्रतारिन् के पुरोहित द्दति खांडवप्रस्थ में किए गए यज्ञ का उल्लेख है. अभिप्रतारिन् जनमेजय का वंशज था. जैसा पूर्व उद्धरणों से स्पष्ट है, खांडवप्रस्थ पांडवों के पुराने किले के निकट बसा हुआ था. (दे. इंद्रप्रस्थ, हस्तिनापुर)

References

  1. (Mahabharata (I.70.23), (1.75),
  2. Dr Mahendra Singh Arya, Dharmpal Singh Dudee, Kishan Singh Faujdar & Vijendra Singh Narwar: Ādhunik Jat Itihas (The modern history of Jats), Agra 1998,p. 219
  3. Aitihasik Sthanavali by Vijayendra Kumar Mathur, p.255

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