INA

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INA War Memorial at Singapore

Indian National Army (आजाद हिन्द फौज) was an armed force formed by Indian nationalists in 1942 in Southeast Asia during World War II. Its aim was to secure Indian independence from British rule. It formed an alliance with Imperial Japan in the latter's campaign in the Southeast Asian theatre of WWII.

Introduction

The army was first formed in 1942 under General Mohan Singh, by Indian PoWs of the British-Indian Army captured by Japan in the Malayan campaign and at Singapore.[1] This first INA collapsed and was disbanded in December that year after differences between the INA leadership and the Japanese military over its role in Japan's war in Asia.[2] It was revived under the leadership of Subhash Chandra Bose after his arrival in Southeast Asia in 1943. The army was declared to be the army of Bose's Arzi Hukumat-e-Azad Hind (the Provisional Government of Free India).[3] Under Bose's leadership, the INA drew ex-prisoners and thousands of civilian volunteers from the Indian expatriate population in Malaya (present-day Malaysia) and Burma.[4]This second INA fought along with the Imperial Japanese Army against the British and Commonwealth forces in the campaigns in Burma, in Imphal and at Kohima, and later against the successful Burma Campaign of the Allies.[5][6]

After the INA's initial formation in 1942, there was concern in the British-Indian Army that further Indian troops would defect. This led to a reporting ban and a propaganda campaign called "Jiffs" to preserve the loyalty of the sepoys.[7] Historians like Peter W. Fay who have written about the army, however, consider the INA not to have had significant influence on the war.[8] The end of the war saw a large number of the troops repatriated to India where some faced trials for treason. These trials became a galvanising point in the Indian Independence movement.[9] The Bombay mutiny in the Royal Indian Navy and other mutinies in 1946 are thought to have been caused by the nationalist feelings that were caused by the INA trials.[10] Historians like Sumit Sarkar, Peter Cohen, Fay and others suggest that these events played a crucial role in hastening the end of British rule.[11] A number of people associated with the INA during the war later went on to hold important roles in public life in India as well as in other countries in Southeast Asia, most notably Lakshmi Sehgal in India, and John Thivy and Janaki Athinahappan in Malaya.[12]

List of INA Heroes

Here is the partial list of I N A Heroes

आजाद हिन्द सरकार की स्थापना

आजाद हिन्द सरकार की स्थापना

29 अक्तूबर/स्थापना-दिवस: आजाद हिन्द सरकार की स्थापना - भारत की स्वाधीनता में सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिन्द फौज’ की बड़ी निर्णायक भूमिका है; पर इसकी स्थापना से पहले भारत के ही एक अंग रहे अफगानिस्तान में भी ‘आजाद हिन्द सरकार’ की स्थापना हुई थी। आजाद हिंद सरकार से भी पहले एक और सरकार बनाई गई थी जिसमें राजा महेंद्र प्रताप सिंह राष्ट्रपति एवं बरकतउल्ला खां प्रधानमंत्री बने थे, इन्हीं बरकतउल्ला खां के नाम पर भोपाल यूनिवर्सिटी का नामकरण किया गया है। भोपाल सन 1949 में भारत गणराज्य में शामिल हुआ था जिसके लिए माननीय शंकर दयाल शर्मा, उद्धव दास मेहता, बालकृष्ण गुप्ता आदि ने कड़ा संघर्ष किया था, शंकरदयाल शर्मा भोपाल स्टेट के प्रथम मुख्यमंत्री बने जो कालपर्यंत भारत देश के राष्ट्रपति भी बने।

जहां अनेक क्रांतिकारी देश के अंदर संघर्ष कर रहे थे, वहां विदेश में रहकर उन्हें शस्त्र, धन एवं उन देशों का समर्थन दिलाने में भी अनेक लोग लगे थे। कुछ देशों से ब्रिटेन की सन्धि थी कि वे अपनी भूमि का उपयोग इसके लिए नहीं होने देंगे; पर जहां ऐसी सन्धि नहीं थी, वहां क्रांतिकारी सक्रिय थे।

उन दिनों राजा महेन्द्र प्रताप जर्मनी में रहकर जर्मन सरकार का समर्थन पाने का प्रयास कर रहे थे। वे एक दल अफगानिस्तान भी ले जाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने मोहम्मद बरकतुल्ला को भी बर्लिन बुला लिया। मो. बरकतुल्ला इससे पूर्व जापान में सक्रिय थे; पर जापान से अंग्रेजों की सन्धि होने के कारण वे अपने एक साथी भगवान सिंह के साथ सेनफ्रांसिस्को आ गये थे।

1943 में आजाद हिन्द फौज के द्वारा आजाद हिन्द सरकार का गठन किया गया था जिसे 13 देशों ने मान्यता दी थी। सुभाष चन्द्र बोस पहले प्रधानमंत्री थे। आजाद हिन्द सरकार का स्वतः का बैंक, सरकार की करेन्सी, डाक टिकट इत्यादि थे। आजाद हिन्द सरकार से संबंधित कुछ अभिलेख यहाँ गॅलरी में दिये जा रहे हैं।

आजाद हिन्द सरकार से संबंधित कुछ अभिलेख

Recent News Clippings regarding INA

आजाद हिन्द फौज की स्थापना

देश की आजादी के लिए दूसरा मोर्चा आजाद हिन्द फौज:

दलीप सिंह अहलावत[14] ने लिखा है: देश से बाहर जाकर आजाद हिन्द फौज की स्थापना करने वाले क्रमशः इस प्रकार थे -

  1. ठेनुआं जाट गोत्र के स्वतन्त्रता सेनानी राजा महेन्द्रप्रताप
  2. सिंधु गोत्र के जाट सरदार अजीतसिंह
  3. देशभक्त रासबिहारी बोस।
  4. जाट सिख कैप्टन मोहनसिंह
  5. महान् क्रान्तिकारी देशभक्त नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

इस अध्याय के यहां तक के वृत्तान्त में आधार पुस्तकें - हरियाणा का इतिहास भाग 3 लेखक के० सी० यादव; स्वाधीनता संग्राम और हरियाणा, लेखक देवीशंकर प्रभाकर;

भारत का इतिहास, हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड, भिवानी; जगदेवसिंह सिद्धान्ती अभिनन्दन ग्रन्थ, लेखक रघुवीरसिंह शास्त्री; सुधारक बलिदान विशेषांक, लेखक आचार्य भगवानदेव; जाटों का उत्कर्ष, लेखक योगेन्द्रपाल शास्त्री; भारत का इतिहास, Paper B.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-846


राजा महेन्द्रप्रताप

1. स्वतन्त्रता सेनानी राजा महेन्द्रप्रताप - राजा महेन्द्रप्रताप अपने राज्य के आनन्द को छोड़कर अपने देश की आजादी के लिए विदेशों में 32 वर्ष प्रयत्न करते रहे। प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान वे 10 फरवरी 1915 को मोहम्मद पीर का नाम धारण किए स्विटजरलैण्ड से बर्लिन आये थे। जर्मनी की मदद से भारत की आजादी के आन्दोलन को प्रगति देने के लिए यहां पहुंचे थे। जर्मनी के अधिपति विल्हैल्म द्वितीय ने उनका स्वागत किया। ठीक दो महीने बाद आप अफगानिस्तान पहुंचे। आपने 2 अक्तूबर 1915 को जर्मनी के कैसर का व्यक्तिगत पत्र अफ़ग़ानिस्तान के शाह अमीर हबीबुल्ला को दिया। काबुल में 1 दिसम्बर, 1915 को ‘भारत की स्वतन्त्र सरकार’ की घोषणा कर दी जिसके वे स्वयं राष्ट्रपति और बर्कतुल्लाह प्रधानमन्त्री तथा उबैदुल्ला अन्तर्देशीय मन्त्री बने। इस स्वतन्त्र भारत की प्रथम सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह के साथ सन्धि की।

प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की विजय के कारण अफ़ग़ानिस्तान सरकार ने उन्हें काबुल से हटाकर मजारे शरीफ भेज दिया जहां से वे रूस, तुर्की गये परन्तु उन सरकारों ने मदद नहीं की। इस महेन्द्रप्रताप सरकार को जर्मनी में बसे भारतीय परिवारों का पूरा और सक्रिय सहयोग प्राप्त था। जिसमें सरोजिनी नायडू के भाई क्रान्तिकारी वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय, पत्रकार राकन पिल्ले और अतिवादी लाला हरदयाल भी शामिल थे। 12 मार्च 1918 में पीटर्सबर्ग में जब रूस की प्रथम क्रान्ति का वार्षिक उत्सव मनाया था, उसमें राजा साहब विशिष्ठ अतिथि थे। राजा महेन्द्रप्रताप के ओजस्वी भाषण ने लोगों को प्रभावित ही नहीं किया बल्कि क्रांतिकारी आंदोलन को एक नया रूप दिया। “भारत-रूस-जर्मनी संघ” की स्थापना हुई। सन् 1918 में बर्लिन की महती जनसभा में भाषण देने के लिए वे भारत की निष्काषित सरकार के राष्ट्रपति की पोशाक पहनकर मंच पर प्रकट हुए थे। वे जगमगाता साफा बांधे हुए थे और अपनी पताका जिस पर लाल गरुड़ का चिह्न अंकित था, लिए हुए थे। सच तो यह है कि सारे यूरोप भर में उनका रोमानी व्यक्तित्व जाना माना था। रूस के जार से लेकर लेनिन तक उनका परिचय था। राजा साहब जहां भी गये, वहां भारत की आजादी के ही प्रयत्न करते रहे। उनका उद्देश्य था कि शस्त्र के बल पर भारत को आजाद कराया जाये, फिर संसार के सब देशों की मिली-जुली एक ही सरकार स्थापित की जाये जिस से धार्मिक भेदभाव एवं आपसी युद्ध सदा के लिए समाप्त हो जायें। इस कार्य के लिए उन्होंने देश के भीतर तथा बाहर भारतीय सैनिकों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह करने के प्रयत्न किए और विदेशों से सहायता मांगी।

1925 ई० में राजा साहब कैलीफोर्निया अमेरिका में आए और वहां के भारतीयों की मदद से जापान चले गये। वहां उन्होंने एक नई संस्था कायम की जिसका नाम “आजाद हिन्द संघ” था। राजा साहब स्वयं उसके प्रधान बने और रासबिहारी बोस उपप्रधान बने। बाबू आनन्दमोहन सहाय उसके महामन्त्री थे। जापान से वे चीन तथा उत्तरी तिब्बत भी गये।

द्वितीय महायुद्ध के अन्त में जापान की हार के समय वे जापान में ही थे। इस युद्ध के दौरान राजा साहब ने भारतीय सेना के युद्ध बन्दियों की एक ‘आजाद हिन्द सेना’ की स्थापना की थी, जो बीच में शिथिल हो जाने पर कैप्टन मोहनसिंह और फिर नेताजी सुभाष ने पुनर्गठित की। 1946 में आप भारत लौट आए। [[रहबरे-आजम स्मारिका 1985-86, पृ० 43-45, प्रकाशक - दीनबन्धु चौधरी सर छोटूराम मिशन, खेड़ी जट (रोहतक)। (अधिक जानकारी के लिए देखो, नवम अध्याय, स्वतन्त्रता सेनानी राजा महेन्द्रप्रताप प्रकरण)।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-847


सरदार अजीतसिंह

2. सरदार अजीतसिंह - प्रथम विश्व महायुद्ध के समय सरदार अजीतसिंह ने इटली में आजाद हिन्द सरकार की स्थापना ‘आजाद हिन्द लश्कर’ के नाम से की थी। इस दिशा में इटली में ही जाट बाबा लाभसिंह और इकबाल शैदाई के प्रयत्न प्रशंसनीय हैं। (नेताजी सुभाष दर्शन - श्रीकृष्ण ‘सरल’, पृष्ठ 124)। (अधिक जानकारी के लिए देखो, दशम अध्याय, सरदार अजीतसिंह प्रकरण)।

3. रासबिहारी बोस के विषय में जानकारी, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के प्रसंग में लिखी जायेगी।

4. कैप्टन मोहनसिंह के विषय में जानकारी, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के प्रसंग में लिखी जायेगी।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

5. महान् क्रान्तिकारी देशभक्त नेताजी सुभाषचन्द्र बोस - नेताजी के विषय में संक्षिप्त वर्णन किया जाएगा, केवल अधिकतम आवश्यक घटनाओं की जानकारी दी जाएगी। इनके विषय में सारे संसार के मनुष्य भली-भांति परिचित हैं। विद्रोही सुभाष का विद्रोही गुरु देशबन्धु चितरंजनदास था और उनकी पत्नी श्रीमती वासन्ती देवी ने सुभाष को प्रभावित किया। पहली जेल 26 जनवरी 1925 से 15 मई 1927 तक बर्मा की मांडले में काटी। सन् 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष चुने गये। 19, 20, 21 फरवरी 1938 का यह कांग्रेस का 51वां अधिवेशन था। 10-12 मार्च 1939 को कांग्रेस के 52वें अधिवेशन में त्रिपुरा (जबलपुर) में आप फिर कांग्रेस अध्यक्ष चुने गये। 29 अप्रैल 1939 को आपने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर, 3 मई, 1939 को कलकत्ता में ‘फारवर्ड ब्लाक’ की स्थापना की घोषणा कर दी। आपके आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानन्द जी थे। भारत छोड़ने से पहले आपने वीर सावरकर से मिलकर महत्त्वपूर्ण बातों पर वाद-विवाद किया था। जेल से मुक्त करने के बाद अंग्रेज सरकार ने आपको कलकत्ता में उनके तीन मंजिले भवन में नजरबन्द कर दिया, जिसको 62 सरकारी पहरेदार दिन-रात घेरे रहते थे। सबको चकमा देकर, 1941 ई० में 16 जनवरी की रात के 12 बजे सुभाष मौलवी के रूप में, उस भवन से निकल गये और काबुल पहुंच गये। वहां पर भगतराम (जिसने अपना नाम रहमत खान रख लिया था) और उसके मित्र उत्तमचन्द मलहोत्रा ने आपकी काफी सहायता की। आप इटली के दूतावास की सहायता से रूस पहुंचे। सुभाष 28 मार्च, 1941 को मास्को से वायुयान द्वारा बर्लिन के लिए रवाना हुए और 3 अप्रैल को वहां पहुंच गये। आपकी मुलाकात हर हिटलर से हुई, जिसके दफ्तर में आप बड़ी निडरता से गये। इस ऐतिहासिक पुरुष का स्वागत करते हुए हर हिटलर ने अपनी भाषा में कहा -

“मैं फाइज इण्डीशेफूहरर का जर्मनी में स्वागत करता हूं और श्रीमान् के बर्लिन में सुरक्षित पहुंचने पर हार्दिक बधाई देता हूं।” जर्मन भाषा के ‘फाइज इण्डीशेफूहरर’ का अर्थ होता है ‘आजाद हिन्द के नेता’। तभी से बोस नेताजी के नाम से पुकारे जाने लगे। जर्मनी में जो ‘आजाद हिन्द संघ’ का संविधान बना था उसमें भी यही प्रावधान रखा गया था कि श्री बोस को नेताजी कहकर पुकारा जाए और पारस्परिक अभिवादन के लिए ‘जय हिन्द’ का प्रयोग हो। आजाद हिन्द का राजचिह्न भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का तिरंगा झण्डा था। चरखे के स्थान पर छलांग मारते हुए शेर का चित्र था। यह इस भावना के साथ किया गया था कि अपने देश की आजादी दान या भीख के रूप में नहीं लेंगे बल्कि शेर की तरह झपटकर आजाद हिन्द फौज के बल से ब्रिटिश शासन पर झपटेंगे और अपनी आजादी शत्रु से छीनकर लेंगे। द्वितीय महायुद्ध में जर्मनी ने जो भारतीय सैनिक बन्दी बनाये थे उनका नेताजी ने आजाद हिन्द संघ बनाया जो ‘आजाद हिन्द सरकार’ के समान ही था। इसके संचालक एवं सेनापति स्वयं नेताजी थे। आजाद हिन्द फौज के लिए तमगों


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-848


और उपाधियों की भी व्यवस्था की गई थी। ‘वीर-ए-हिन्द’ और ‘शेर-ए-हिन्द’ की उपाधियां दी जाती थीं। कभी-कभी जर्मन सरकार भी भारतीय सैनिकों को ‘आयरन क्रास’ देकर सम्मानित करती थी। ‘वीर-ए-हिन्द’ की उपाधि तीन सैनिकों को मिली थी - 1. जाट पदमसिंह 2. इशाक 3. अल्लावर खां। भारत आजाद होने पर जो नेताजी के नाम पर डाक टिकट वहां जारी होनी थी वह पहले ही जर्मनी में तैयार कर ली गई थी।

जर्मन सेना के साथ मिलकर नेताजी की आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेज सेनाओं के विरुद्ध कई स्थानों पर युद्ध किए। जर्मनी में रहते हुए नेताजी ने फिलिस्तीन के क्रान्तिकारी नेता मुफ्ती-ए-आजम, हाजी अमीर उलहुसनी (यरुशलम) और इराक के क्रान्तिकारी नेता रशीद अली गिलानी से मेलजोल किया। नेताजी का लक्ष्य शस्त्र बल पर भारत को आजाद कराना था।

जब नेताजी सन् 1941 में जर्मनी पहुंचे थे तो उन्होंने वहां एक आस्ट्रिया की राजधानी वियेना की रहने वाली सुन्दरी एवं गुणवान लड़की कुमारी एमिली शैंकल (Emilie Schenkl) के साथ हिन्दू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह कर लिया। जर्मनी की अदालत में शादी की रजिस्ट्री कराई गई। उनके यहां अनीता बोस नामक पुत्री ने जन्म लिया। उधर पूर्व में जापान की सहायता से सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज की स्थापना दिसम्बर 1941 में हो चुकी थी जिसका संचालन कैप्टन मोहनसिंह कर रहे थे। यह कार्य मन्द पड़ने के कारण श्री रासबिहारी बोस ने जापान सरकार द्वारा नेताजी को जर्मनी से जापान बुलाया। नेताजी ने वहां जाना स्वीकार कर लिया और जाने से पहले वहां के ‘आजाद हिन्द संघ’ का संचालन एक योग्य कमांडर श्री एन० जी० गनपुले (N.G. Ganpuley) को नियुक्त कर दिया। जर्मनी से जाते समय नेताजी यह व्यवस्था कर गये थे कि आजाद हिन्द फौज को जर्मनी से हटाकर हालैण्ड स्थानान्तरित कर दिया जाए। 5 महीने तक हालैण्ड में तटरक्षा के प्रशिक्षण के बाद आज़ाद हिन्द फौज को फ्रांस के तट पर भेजा गया। अटलांटिक तट की रक्षा किलेबन्दी का निरीक्षण जब जर्मनी के फील्ड मार्शल रोमेल ने किया तो उन्होंने भारतीय आजाद फौजियों की बड़ी प्रशंसा की और उनमें इस प्रकार की भावना भर देने का श्रेय नेताजी को दिया। फ्रांस की भूमि से हमारी आजाद हिन्द फौज को इटली के मोर्चों पर भेजा गया। वहां उनका ब्रिटिश भारतीय सेनाओं के साथ प्रचारात्मक युद्ध हुआ। काफी पर्चे तोपों द्वारा दाग कर या वायुयानों से ब्रिटेन की ओर से लड़ने वाली भारतीय सेना पर फैंके गए। आज़ाद हिन्द फौज की ओर से इन पर्चों पर लिखा गया था कि “भारतीय भाइयो, हमारे शत्रु अंग्रेज हैं, न कि जर्मनी आदि। इन अंग्रेजों को मारकर अपने देश भारत को आजाद कराओ। आप हमसे युद्ध क्यों कर रहे हो, हम तो आपके भाई हैं। अच्छा तो यह होगा कि आप भी अंग्रेजों का साथ छोड़कर हमारी आज़ाद हिन्द फौज में सम्मिलित हो जाओ।” इसका प्रभाव यह हुआ कि बहुत बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक अंग्रेज सेना से टूटकर आजाद हिन्द फौज में मिल गये। दूसरे भारतीय सैनिकों को जब भी ठीक अवसर मिला तो उन्होंने गोरी सेना पर गोलाबारी की। इसके उदाहरण अगले प्रकरण में लिखे जायेंगे।

इस तरह यहां की आजाद हिन्द फौज की बड़ी संख्या हो गई थी। याद रहे कि इनमें जाट सैनिक बहुत थे।

जब नेताजी जर्मनी से चले तब उनकी पुत्री अनीता बोस केवल दो महीने की थी। 8 फरवरी


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-849


1943 को नेताजी ने जर्मनी की कील बन्दरगाह से एक जर्मन पनडुब्बी (Submarine) द्वारा अपनी यात्रा आरम्भ की। उनके साथी आबिद हसन इस पनडुब्बी में जापान तक आए थे। पनडुब्बी के कप्तान और चालकों को सख्त हिदायत दी गई थी कि लम्बी एवं खतरनाक समुद्री यात्रा में नेताजी सुरक्षित रहें।

नेताजी को लिये हुए जर्मन पनडुब्बी ग्रेट ब्रिटेन के समुद्र के तट का चक्कर लगाकर और अफ्रीका के समुद्र में से निकलकर गुडहोप अन्तरीप होती हुई दक्षिण मदगास्कर से लगभग 400 मील किसी स्थान पर 28 अप्रैल 1943 ई० को पहुंची। निश्चित योजना के अनुसार जापानी पनडुब्बी भी वहां पहुंच गई। नेताजी एवं उनके साथी उस जापानी पनडुब्बी में बड़ी कठिनाई से जाकर बैठ गये और टोकियो पहुंच गये।

टोकियो में प्रधानमन्त्री जनरल तोजो ने नेताजी का स्वागत किया।

श्री तोजो ने कहा कि “अब एशिया, एशिया निवासियों का है।”

नेताजी ने कहा कि “हमने किसी भी कीमत पर भारत को आज़ाद कराना है।”

आकाशवाणी टोकियो से 21 जून 1943 को नेताजी ने अपना पहला भाषण प्रसारित करते हुए कहा - “हमारी आजादी के लिए किसी समझौते की गुंजाइश नहीं है। जो लोग वास्तव में आजादी चाहते हैं, उन्हें इसके लिए लड़ना चाहिए और अपने खून से उसकी कीमत चुकानी चाहिए। हमें चाहिए कि हम अडिग विश्वास के साथ लड़ाई तब तक चालू रखें जब तक अंग्रेजी साम्राज्यवाद का नाश न हो जाए और उसकी राख में से एक स्वाधीन राष्ट्र का उदय न हो जाए। इस संघर्ष में पीछे हटने या लड़खड़ाने का प्रश्न ही नहीं उठता। हम आगे ही बढ़ते जायें जब तक विजय प्राप्त न हो जाये और आजादी की मंजिल न मिल जाए।”

जनरल मोहनसिंह: यह पहले लिख दिया गया है कि देशभक्त क्रांतिकारी श्री रासबिहारी बोस भारतवर्ष से विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ जहाज द्वारा जून 1915 में जापान पहुंच गये थे। वहां एक जापानी महिला से विवाह करके जापान देश की नागरिकता प्राप्त कर ली थी।

कैप्टन मोहनसिंह

जब इंग्लैंड और जापान के बीच 8 दिसम्बर 1941 को युद्ध छिड़ गया तो श्री रासबिहारी बोस ने भारत की आज़ादी के लिए “आज़ाद हिन्द संघ” की स्थापना की। वे स्वयं इसके अध्यक्ष बने थे। इस युद्ध में सिक्ख जाट कैप्टन मोहनसिंह अपनी 14वीं पंजाब रेजीमेन्ट की प्रथम बटालियन के साथ मलाया पहुंचे। वहां इनकी बटालियन जापानियों के साथ युद्ध में छिन्न-भिन्न हो गई और बन्दी बना लिये गये। बैंकाक के ज्ञानी प्रीतमसिंह ने इनकी भेंट जापानी मेजर फूजीवारा से करा दी। उसने इनको जापानी सेनापति से मिलाया। I.N.A. (आज़ाद हिन्द फौज) के निर्माण की बातें हुईं। कैप्टन मोहनसिंह ने कुछ शर्तें रखीं जो स्वीकार की गईं। इस तरह रासबिहारी बोस तथा अन्य प्रवासी भारतीयों के प्रयत्न से दिसम्बर 1941 में आजाद हिन्द फौज का निर्माण हो गया और कैप्टन मोहनसिंह को जनरल-आफिसर-कमांडिंग नियुक्त किया गया। दफ्तर सिंगापुर रहा। युद्ध परिषद् का गठन किया गया। कैप्टन मोहनसिंह को जनरल के पद पर पदोन्नत किया गया।


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-850


जनरल मोहनसिंह के कहने के अनुसार उसकी आज़ाद हिन्द फौज की संख्या 20,000 सैनिकों की थी, जिनमें तीसरे हिस्से के सिक्ख सैनिक थे।1 (यानी 6666 सिख सैनिक)।

यहां पर एक बात समझ लेने की है कि भारतीय सेना में जितनी भी सिक्ख बटालियनें हैं, उन में लगभग सभी सिक्ख जाट हैं। इनके अतिरिक्त जनरल मोहनसिंह की आज़ाद हिन्द फौज में हिन्दू जाट भी लगभग सिक्ख सैनिकों जितने ही थे। सो स्पष्ट है कि इस सेना में जाटों की संख्या आधी अवश्य थी।

जापान सरकार ने जनरल मोहनसिंह के साथ आज़ाद हिन्द फौज के संचालन के लिए जो शर्तें स्वीकार की थीं, उनको जापान सरकार ने ठीक तरह से नहीं निभाया जिससे आज़ाद हिन्द फौज की गति मन्द पड़ गई और एक तरह से ठप्प पड़ गई। इसी कारण श्री रासबिहारी बोस ने नेताजी को योग्य समझकर जर्मनी से जापान बुलाया था।

2 जुलाई, 1943 को सिंगापुर की भूमि पर भारत की मुक्तिवाहिनी आज़ाद हिन्द फौज ने नेताजी का स्वागत किया। उनके साथ मेजर जनरल जगन्नाथ राव भोंसले और महान् क्रांतिकारी श्री रासबिहारी बोस भी थे। रासबिहारी बोस ने वहां ‘इण्डियन इण्डिपेंडेंस लीग’ और ‘इण्डियन नेशनल एसोसिएशन’ नाम के संगठनों की स्थापना की थी। बाद में ‘इण्डियन इण्डिपेंडेंस लीग’ ने ही आजाद हिन्द संघ का रूप धारण कर लिया। इस संघ के अध्यक्ष रासबिहारी बोस स्वयं ही थे। इस संघ की शाखायें मलाया, फिलीपीन्स, थाईलैंड, डच ईस्ट-इण्डीज, फ्रैंच इण्डोचीन, शंघाई, बर्मा, कोरिया और मंचूरिया में भी स्थापित की गईं थीं।

सिंगापुर में श्री रासबिहारी बोस ने घोषणा की - “मैं अपने पद का त्याग करता हूं और देश सेवक सुभाषचन्द्र बोस को पूर्व एशिया के ‘आजाद हिन्द संघ’ के अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित करता हूं। आज से ये आपके सभापति हैं, आपके नेता हैं।”

4 जुलाई, 1943 को नेताजी ने अध्यक्ष-पद सम्भाल लिया और कहा -

“हम लोग अपनी आज़ादी की कीमत अपने खून से चुकायेंगे और ऐसा करके हम राष्ट्रीय एकता की आधारशिला रखेंगे। यदि हम अपने बलिदानों और खून से आज़ादी अर्जित करेंगे तो हम उसकी रक्षा भी कर सकेंगे।” उनका निश्चय था कि वे देश के लिए जीयेंगे और देश के लिए मरेंगे।

5 जुलाई, 1943 को नेताजी ने आज़ाद हिन्द फौज का निरीक्षण किया और घोषणा की - “भारत को आज़ाद कराने वाली फौज खड़ी हो गई है।”

6 जुलाई 1943 को जापान के प्रधानमन्त्री जनरल हिदैकी तोजो सिंगापुर पहुंचे। उनके सम्मान में आज़ाद हिन्द फौज की परेड आयोजित की गई।

9 जुलाई 1943 को सिंगापुर के नगर भवन के सामने एक विशाल सभा हुई। लगभग 60 हजार फौजी और नागरिक इसमें सम्मिलित हुए। इनमें 25000 महिलायें थीं।

इस विशाल सभा को नेताजी ने अपने प्रभावशाली भाषण में कहा कि “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा। चलो दिल्ली।” उन्होंने यह भी कहा कि अभी से आप एक हो। अपनी जाति-पाति को भूल जाओ। तुम सब हिन्दुस्तानी हो और हिन्दुस्तानी तुम्हारी जाति एवं धर्म है।


1. Amritsar Mrs. Gandhi's Last Battle, P. 34. Mark Tully and Satish Jacob.


जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-851


पारस्परिक अभिवादन के लिए ‘जय हिन्द’ का प्रयोग करो। उसी दिन से अनेक धर्मों के भारतीय सैनिकों का खान-पान एक हो गया और ‘जय हिन्द’ का प्रयोग आरम्भ हो गया। आज़ाद हिन्द फौज का रणघोष (Battle Cry) “भारत माता की जय, नेताजी की जय” बन गया। नेताजी एवं भारतवर्ष से आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक इतने प्रभावित हो गये कि युद्ध में या बीमारी से मरने वाले सैनिक अपने साथियों को यही कहते थे कि नेताजी को मेरा ‘जय हिन्द’ का संदेश पहुंचा देना। इसके अतिरिक्त वे अपने परिवार तथा रिश्तेदारों को भी भूल गये थे।

12 जुलाई 1943 को सिंगापुर में आजाद हिन्द संघ के महिला विभाग की स्थापना की गई। इसका नाम रानी झांसी रेजीमेंट रखा गया। 22 अक्तूबर, 1943 को कर्नल लक्ष्मी स्वामीनाथन को इस रानी झांसी रेजीमेंट की कमांडर नियुक्त कर दिया गया।

26 सितम्बर, 1943 को नेताजी अपने फौजी अधिकारियों के साथ बर्मा गये और उन्होंने रंगून में स्थित भारत के अन्तिम मुग़ल सम्राट् बहादुरशाह जफर की समाधि पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। फूल चढ़ाकर नेताजी ने कहा - “हम आपका बदला चुकायेंगे। हम भूले नहीं हैं दिल्ली के वे लाल दिन।” नेताजी ने सम्राट् की समाधि की अच्छी तरह मरम्मत भी कराई।

अन्तरिम आज़ाद हिन्द सरकार की स्थापना: 21.10.1943

21 अक्तूबर, 1943 को सिंगापुर में नेताजी ने भारत की अस्थायी आज़ाद हिन्द सरकार (Interim Government) की स्थापना कर दी। नेताजी ने इस अन्तरिम सरकार के राष्ट्राध्यक्ष और प्रधानमन्त्री पद की शपथ ग्रहण की। श्री रासबिहारी बोस ने कहा - “आज मेरा दूसरा भाई बोस, उम्र में मुझसे छोटा, पर हौंसले में मुझ से आगे, मसीहा बनकर इन्सानियत पर लगे घावों को आजादी के फाहे (मरहम पट्टी) से ठीक करने आया है। हम 30 लाख नंगे भूखे प्रवासी भारत की आज़ादी के पैगम्बर का स्वागत करते हैं।” नेताजी ने अन्तरिम आज़ाद हिन्द सरकार और आज़ाद हिन्द फौज का संगठन किया तथा अपने मन्त्रिमण्डल का निर्माण करके विभागों का वितरण कर दिया। सेना के विभागों के कमांडर भी नियुक्त कर दिये। ब्यौरा इस प्रकार है -

अन्तरिम आज़ाद हिन्द सरकार

आजाद हिन्द फौज - 1. प्रथम डिविजन 2. द्वितीय डिविजन 3. तृतीय डिविजन 4. कमांड ट्रुप्स 5. आफीसर ट्रेनिंग स्कूल 6. रानी झांसी रेजीमेंट 7. बाल सेना ।

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस - 1. राष्ट्राध्यक्ष एवं प्रधानमंत्री, 2. आजाद हिन्द फौज के सुप्रीम कमांडर 3. अध्यक्ष ।

विभाग - 1. मन्त्रालय 2. युद्ध 3. वित्त 4. राजस्व 5. वैदेशिक 6. जनशक्ति 7. विधान 8. प्रचार-प्रसार 9. नारी कल्याण*

* नारी कल्याण विभाग लैफ्टिनेन्ट कर्नल डा० लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपा गया।


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क्षेत्रीय शाखायें - 1. थाईलैंड 2. इण्डोचीन 3. चीन 4. मंचूरिया 5. जावा 6. सुमात्रा 7. बोर्नियो 8. फिलिपीन्स 9. जापान ।

समाचार पत्र, सं सूचनायें, आकाशवाणी केन्द्र - 1. रंगून 2. बैंकाक 3. सिंगापुर 4. साईगोन 5. टोकियो। आजाद हिन्द संघ के 24 विभाग थे जैसे जांच, जासूसी, सूचनाएं, शिक्षा, श्रम, निर्माण, नेताजी कोष समिति आदि-आदि।

कुछ ही दिनों में जापान, जर्मनी, इटली, बर्मा, थाईलैंड, राष्ट्रवादी चीन, फिलिपीन्स, मंचूरिया आदि देशों ने आज़ाद हिन्द सरकार को मान्यता दे दी।

24 अक्तूबर 1943 रात्रि के 12 बजकर 5 मिनट पर सिंगापुर रेडियो से ब्रिटेन और अमेरिका के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी गई। आज़ाद हिन्द फौज के सभी सैनिकों और सरकार के सभी मन्त्रियों ने इस घोषणा का स्वागत किया। युद्ध की घोषणा का निर्णय उनके मंत्रिमंडल की प्रथम बैठक में सर्वसम्मति से लिया गया था।

यह सूचना बिजली की तरह सभी देशों में फैल गई। इससे अंग्रेज व अमेरिका घबरा गये परन्तु भारतीय जनता तथा अंग्रेजी भारतीय सेनाओं में अंग्रेजों के विरुद्ध घृणा और देश को आज़ाद कराने की भावना जोर पकड़ गई।

नेताजी ने बालकों का दल मेजर जनरल लोकनाथन के नेतृत्व में युद्ध प्रशिक्षण के लिए टोकियो भेजा था। इस दल ने बड़े साहस के साथ जल सेना और वायु सेना आदि का प्रशिक्षण प्राप्त किया था। 5 और 6 नवम्बर 1943 को बृहत्तर एशिया सम्मेलन में नेताजी एशिया के सभी राजनीतिज्ञों पर छा गये थे। इस सम्मेलन में नेताजी के 30 मिनट के दिए गए भाषण से सब बड़े प्रभावित हुए। वहां सभी मान गये कि आज के युग में नेताजी के तुल्य, बुद्धिमान्, राजनीतिज्ञ, साहसी वीर, निडर योद्धा, कुशल कार्यकर्त्ता, दूरदर्शी, दूसरा कोई मनुष्य नहीं है।

नेताजी के भाषण के समाप्त होते ही, प्रधानमन्त्री तोजो एकदम खड़े हो गये और जापान सरकार की ओर से उन्होंने अण्डमान और निकोबार द्वीप समूह, आज़ाद हिन्द सरकार को सौंप देने की घोषणा कर दी। यह सुनकर सभी को हर्ष हुआ। जनरल तोजो ने जब यह कहा कि भारत शीघ्र ही स्वाधीन होगा और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस स्वतन्त्र भारत के सर्वेसर्वा होंगे, तो नेताजी ने कहा कि “मि० तोजो! आपको यह नहीं कहना चाहिए कि मैं स्वाधीन भारत का सर्वेसर्वा बनूंगा। जब भारत आज़ाद हो जाएगा तो इसका निर्णय तो भारतवासी ही करेंगे कि स्वाधीन भारत में मेरी स्थिति क्या होगी।”

इस सम्मेलन के पश्चात् नेताजी को, जापान के धर्मगुरु, सम्राट् हिरोहितो से मिलाने राजमहल में ले गये। यह सम्मान जापान के इतिहास में इने-गिने लोगों (very vew people) को मिला है। जापान के सम्राट् ने नेताजी को एक तलवार भेंट में दी।

आज़ाद हिन्द फौज की संख्या 60,0001 सैनिकों की थी जो कि ब्रिटिश सेना में भारतीय सैनिक


1. हरयाणा का इतिहास, पृ० 192, लेखक के. सी. यादव; नेताजी सुभाष दर्शन, पृ० 187, लेखक श्रीकृष्ण ‘सरल’।


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सिंगापुर, मलाया, बर्मा आदि में जापान ने बन्दी बना लिये थे। नेताजी की इस आज़ाद हिन्द फौज में आधे से भी कुछ अधिक संख्या जाट सैनिकों की थी1 जिनमें हिन्दू जाट अधिक एवं सिक्ख जाट भी शामिल थे। स्थान के अभाव के कारण यह लिखना कठिन है कि इस आज़ाद हिन्द फौज में किस-किस जाट एवं सिक्ख जाट यूनिटों के सैनिक थे। वैसे भी यह बात किसी भी भारतीय सैनिक तथा भारतीय जनता से छिपी हुई नहीं है। इसमें तो कोई सन्देह है ही नहीं कि इस आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक, किसानों के बेटे एवं युद्धवीर (लड़ाका) जाति के वीर थे जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अंग्रेजों से युद्ध करके अपने खून की बलि दी।

रानी झांसी रेजीमेन्ट इन सैनिकों के अलावा थी, जो प्रवासी महिलाओं ने अपनी इच्छा से सेना में भरती होकर बनाई थी। इस रानी झांसी रेजीमेन्ट में जाट गोत्री युवतियों की बड़ी संख्या थी। यह पहले अध्याय में लिखा गया है कि भारतवर्ष से आर्य एवं क्षत्रिय जाट पूर्व एशिया देशों में भी जाकर आबाद हुए। इनमें आज भी जाट गोत्र के लोगों की बड़ी संख्या है। हो सकता है कि ये लोग आज इस बात को भूल गये हैं, यह एक खोज का विषय है कि इन देशों में आज जाटों की कितनी संख्या है।

आजाद हिन्द फौज युद्ध मोर्चों पर

नेताजी ने अपनी आज़ाद हिन्द फौज को अंग्रेजों से युद्ध करने के लिए भारत की पूर्वी सीमा की ओर, अलग-अलग मार्गों से कूच करने का आदेश दिया।

29 दिसम्बर 1943 को स्वयं नेताजी अपने कुछ सैनिकों के साथ अण्डमान द्वीप समूह के मुख्यालय पोर्ट ब्लेयर पहुंचे और अपनी मातृभूमि को बड़े प्रेम से देखा। इस द्वीप समूह को सबसे पहले आज़ाद होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यहां पहुंचने पर जापान के एडमिरल ने नेताजी का अभिवादन किया और उनको अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह के शासन की बागडोर सौंप दी। नेताजी ने उसी दिन पोर्ट ब्लेयर के मुख्यालय पर अपने करकमलों से राष्ट्रीय तिरंगा झण्डा फहराया। नेताजी ने अण्डमान द्वीप समूह का नाम शहीद द्वीप रखा और निकोबार का नाम स्वराज्य द्वीप रखा। 30 दिसम्बर 1943 को पोर्ट ब्लेयर के जिमखाना मैदान में नेताजी ने वहां की जनता को भाषण दिया। यह मैदान नेताजी मैदान कहा जाता है।

इस द्वीप समूह पर नेताजी का शासन होने पर उनकी अंतरिम आज़ाद हिन्द सरकार अब वास्तव में एक राष्ट्रीय सरकार बन गई क्योंकि यह द्वीप भारत देश का ही भाग था। नेताजी अण्डमान के आज़ाद हिन्द संघ के अध्यक्ष श्री रामकृष्ण से मिले और वहां श्री दुर्गाप्रसाद से भी मिले। नेताजी ने अपने मन्त्री-मण्डल के एक सदस्य मेजर-जनरल लोकनाथन को अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह का गवर्नर नियुक्त कर दिया।

7 जनवरी 1944 को नेताजी अपने मन्त्री-मण्डल सहित बर्मा की राजधानी रंगून पहुंचे। वहां विमान-स्थल पर नेताजी का स्वागत बर्मा के राष्ट्रपति डॉ० बा० मॉ (Dr. Ba. Maw) ने अपने पूरे मन्त्री-मण्डल के साथ किया। नेताजी ने इस बार रंगून में आज़ाद हिन्द सरकार, आज़ाद हिन्द संघ और आज़ाद हिन्द फौज के मुख्यालय स्थापित किए।


1. सुधारक बलिदान विशेषांक, पृ० 336, लेखक श्री भगवान्देव आचार्य, आज़ाद हिन्द फौज के भूतपूर्व सैनिकों की जुबानी।


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आजाद हिन्द फौज ने बर्मा भूमि को ब्रिटिश सरकार पर झपटकर आक्रमण करने का केन्द्र बनाया। इस युद्ध के दौरान नेताजी आवश्यकता के अनुसार हवाई जहाज से भी अनेक स्थानों पर जाते रहते थे। युद्ध जोरों पर था।

6 जुलाई, 1944 को नेताजी ने सिंगापुर के आजाद हिन्द रेडियो से महात्मा गांधी के नाम एक भाषण प्रसारित करते हुये कहा था - “हे राष्ट्रपिता! आजादी के इस पावन युद्ध में हम आपके आशीर्वाद की आकांक्षा करते हैं।” बापू महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (‘Father of Nation)’ सबसे पहले नेताजी ने 6 जुलाई, 1944 को कहा। उसी दिन से वे राष्ट्रपिता कहे जाने लगे।


आजाद हिन्द फौज के जाट सैनिकों की वीरता

4 फरवरी 1944 को अराकान (बर्मा में, मणिपुर की सीमा के साथ) के मोर्चे पर स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया, जिसमें आजाद हिन्द फौज का पलड़ा भारी रहा। वहां से अंग्रेज सेना को पीछे धकेल दिया गया। 18 मार्च 1944 को ‘आजाद हिन्द फौज’ ने पहली बार सीमा पार कर भारत भूमि पर कदम रखा। मोर्चे के समीप अपने मुख्यालय पर नेताजी ‘रानी झांसी रेज़ीमेण्ट’ की एक पूर्ण प्रशिक्षित टुकड़ी भी ले गए थे। इस टुकड़ी ने सप्लाई, जनशक्ति, राजस्व, बैंकिंग, चिकित्सा आदि कई विभाग सम्भाल लिए। इम्फाल के मैदानों में और कोहिमा के निकट आठ मोर्चों पर आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों से लोहा लिया।

1. कैप्टन सूरजमल जाटमणिपुर की धरती पर सबसे पहले राष्ट्रीय तिरंगा झण्डा फहराने वाले हरयाणा के कैप्टन सूरजमल थे जिन्होंने अपनी कम्पनी के साथ भारतीय सीमा में प्रवेश किया था और अंग्रेज सेना से युद्ध करके भारत भूमि के कुछ भाग को स्वाधीन करवाया था।

मोडक विजय - आजाद हिन्द फौज ने भारत भूमि में प्रवेश करके कई अंग्रेज चौकियों पर अधिकार कर लिया। एक महत्त्वपूर्ण चौकी ‘मोडक’ (कलेदन घाटी में) पर कैप्टन सूरजमल का कब्जा हो गया। अंग्रेजी सेना ने इस क्षेत्र को वापिस लेने के लिए इतने जोरदार हमले किये कि जापानी सेना को वहां से हटना पड़ा और उसने आजाद हिन्द फौज को भी ऐसा ही परामर्श दिया। कैप्टन सूरजमल ने पीछे हटने से इन्कार कर दिया। जापानी वहां अपने कुछ सैनिक दल कैप्टन सूरजमल की कमांड में छोड़ गये। जापानी इतिहास में यह पहला अवसर था जब किसी विदेशी अफसर ने इनकी कमांड सम्भाली हो। कैप्टन सूरजमल और उनके बहादुर सैनिकों ने मई से सितम्बर 1944 तक अपनी जान पर खेलकर सम्पूर्ण मोडक क्षेत्र की रक्षा की। इस बीच अंग्रेज सेना ने उन पर कई भयंकर आक्रमण किए पर हर बार मुंह की खानी पड़ी।

2. सेकिण्ड लेफ्टिनेण्ट अमरसिंह जाट - आप अब्बा चौकी की रक्षा कर रहे थे। इनके पास केवल 20 सैनिक थे। एक दिन अंग्रेजी सेना के 150 सैनिकों ने इस पर जबरदस्त आक्रमण कर दिया और भारी तोपों से गोले बरसाए। जब शत्रु सैनिक मोर्चे के निकट आए तो I.N.A. के जवान उन पर शेर की तरह झपट पड़े। शत्रु भारी संख्या में लाशें छोड़कर भाग गया। शत्रु ने दूसरा आक्रमण उससे भी जोरदार कर दिया। इस बार भी भारी हानि उठाकर शत्रु को पीठ दिखानी पड़ी। सायंकाल शत्रु ने सबसे भयंकर तीसरी बार धावा किया। भारी तोपों से


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गोलाबारी की। शत्रु यह समझकर कि I.N.A. के सभी जवान मर गए होंगे, मोर्चों के निकट पहुंच गए। तब I.N.A. के जवानों ने मोर्चों से बाहर कूदकर शत्रु पर जोरदार आक्रमण कर दिया जिसमें शत्रु लाशें छोड़कर भाग गया। इस तरह से शत्रु के तीनों आक्रमण विफल कर दिए गए। कैप्टन सूरजमल को जब यह सूचना मिली तो वह अपने साथ 50 जवान लेकर शत्रु के मोर्चों के निकट पहुंच गये और ‘जय हिन्द’ - ‘नेताजी की जय’ के गगनभेदी नारे लगाते हुए अंग्रेजी सेना पर टूट पड़े। इस आश्चर्यजनक आक्रमण से शत्रु घबराकर इधर-उधर भाग गये। उनके काफी जवान मारे गये और काफी सामान समेत मोर्चा कैप्टन सूरजमल के हाथ आया। कैप्टन सूरजमल का इतना आतंक छा गया कि बहुत दिन तक अंग्रेज सेना का I.N.A. पर धावा करने का साहस न रहा।

कर्नल पी० एस० रतूरी ने कैप्टन सूरजमल और सैकिण्ड लैफ्टिनेण्ट अमर को बधाई संदेश भेजा। नेताजी ने कर्नल रतूरी और कैप्टन सूरजमल को ‘सरदार-ए-जंग’ की उपाधि दी।

3. लेफ्टिनेण्ट मनसुखलाल जाट की वीरता - आजाद हिन्द फौज के नं० 1 डिविजन के तीन ब्रिगेड - सुभाष, गांधी और आजाद ब्रिगेड इम्फाल के मोर्चों पर लगे हुए थे। मेजर जनरल शाहनवाज खान नं० 1 डिविजन की कमांड कर रहे थे। बाद में नं० 2 डिविजन के कमांडर भी रहे। कर्नल गुलजारा सिंह सिक्ख जाट इस इम्फाल युद्ध में आजाद ब्रिगेड की कमांड कर रहे थे। इस आजाद हिन्द फौज के डिविजन ने इम्फाल को चारों ओर से घेर लिया था। इस घेरे में ब्रिटिश सेना का एक डिविजन एक महीने से भी अधिक समय तक घिरा रहा था। कर्नल इनायत जान कियानी (Col. I.J. Kiani) गांधी ब्रिगेड के कमांडर थे। इस गांधी ब्रिगेड ने अंग्रेज सेना को बुरी तरह से हराया था। अंग्रेजों को इस हार का कांटा खटक रहा था। एक दिन अंग्रेज सेना ने गांधी ब्रिगेड पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेज सेना के 3,000 और I.N.A. के केवल 600 सैनिक थे। अंग्रेज सेना ने I.N.A. के इन सैनिकों को घेर लिया, जिनके साथ ब्रिगेड कमांडर कर्नल आई० जे० कियानी भी थे, वे भी घेरे में आ गए। कप्तान राव की कम्पनी तो पूरी तरह घिर गई थी। कर्नल कियानी ने लेफ्टिनेण्ट मनसुखलाल को आदेश दिया कि पास की एक पहाड़ी को शत्रु से छीनकर उस पर कब्जा करो। यह आदेश मिलते ही मनसुखलाल ने अपनी प्लाटून के केवल 30 जवानों के साथ पहाड़ी पर चढ़ना शुरु कर दिया। जब उनकी प्लाटून पहाड़ी की चोटी के निकट पहुंची तो शत्रु ने उन पर फायर खोल दिया। वे भी फायर करते हुए चोटी की तरफ बढ़े। उनमें से कुछ वीरगति को प्राप्त हुए। स्वयं ले० मनसुखलाल को 13 गोलियां लगीं। काफी खून निकल गया और वे गिर पड़े। यह देखकर उनके सैनिक उनको सम्भालने के लिए उनकी तरफ बढ़े। उनको देखकर वीर मनसुखलाल गरज पड़े - “मेरी चिन्ता छोड़ो और लपक कर पहाड़ी की चोटी पर कब्जा करो। मैं न बच सका तो क्या! पहाड़ी पर कब्जा होने से पूरा ब्रिगेड बच जाएगा।” यह सुनकर जवानों का मनोबल बढ़ गया। वे जोश से आगे बढ़े। ले० मनसुखलाल हौंसला देते हुए घिसट-घिसट कर साथ हो लिए। जवानों ने ‘जय हिन्द’ और ‘नेताजी की जय’ के रणघोष के साथ शत्रु को अपनी संगीनों से मारना शुरु कर दिया। शत्रु पीठ दिखाकर भाग खड़ा हुआ। पहाड़ी पर मनसुखलाल के सैनिकों का कब्जा हो गया, जिससे शेष साथियों की रक्षा के लिए एक अच्छा स्थान मिल गया। शत्रु का घेरा तोड़ा गया, उसके 250 गोरे सैनिक मारे गए और बाकी भाग गये।


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4. कर्नल मलिक (जाट गठवाला गोत्र) - आजाद हिन्द फौज ने अंग्रेजों से विष्णुपुर क्षेत्र छीन कर मुक्त करा लिया था। कर्नल मलिक को इस विष्णुपुर क्षेत्र का गवर्नर (शासक) नियुक्त किया गया था। विष्णुपुर - टिड्डिम से उत्तर को सड़क विष्णुपुर जाती है। फिर इससे थोड़ा आगे उत्तर में इम्फाल है और उससे उत्तर में कोहिमा है।

भारत भूमि के पूर्वी सीमा के प्रान्त मणिपुर (इम्फाल) तथा नागालैंड (कोहिमा) क्षेत्रों में आजाद हिंद फौज ने अंग्रेज सेना को हराकर अनेक स्थानों पर अपना अधिकार कर लिया था। इस से अंग्रेजों का साहस टूट गया तथा उनके मन में हार के विचार उत्पन्न होने लगे। अंग्रेज सेना के भारतीय सैनिकों में अंग्रेजों को मारकर भारत को आजाद कराने की भावना उत्पन्न हुई और वे उचित समय आने का अवसर देखने लगे। इन सीमाओं पर अंग्रेज सेना की कई भारतीय सैनिक यूनिटें आजाद हिन्द फौज में जा मिलीं। भारतीय जनता का मनोबल बहुत बढ़ गया था। प्रत्येक नागरिक को यह उमंग हो गई थी कि हमारा राज्य बहुत जल्दी ही आयेगा। अतः भारत के जनता अंग्रेजों के विरुद्ध बड़े साहस से स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए जुट गई। परन्तु भाग्य ने पल्टा खाया। आजाद हिन्द फौज आगे को बढ़ती जा रही थी। इसके इम्फाल विजय में कुछ ही घण्टे की देरी थी कि इम्फाल से तीन मील दूर प्रगति रुक गई। भारी वर्षा के कारण आजाद हिंद फौज की बर्मा से स्पलाई-व्यवस्था बिगड़ गई, जबकि ब्रिटिश फौज को हवाई जहाजों से कुमुक और रसद पहुंचाई जा रही थी। यह स्थिति देख नेताजी ने अपनी फौज को पीछे हटने का हुक्म दिया ताकि इम्फाल पर अगले हमले की तैयारी की जा सके। फिर भी स्थिति नहीं सुधरी तो अंग्रेजों के लिए रंगून की ओर बढ़ने की राह खुल गई। बर्मा की भूमि में बढ़ती हुई ब्रिटिश सेनाओं का आजाद हिन्द फौज ने बड़ी वीरता से मुकाबिला किया। इनमें इरावदी (इर्रावड्डी) संग्राम अतिप्रसिद्ध है।

5. कैप्टन चन्द्रभान जाट का आतंक - सन् 1945, फरवरी 13 और 14 की रात को अंग्रेजी सेना ने इरावदी नदी को पार करने का प्रयत्न किया। INA पर तोपों से भारी गोलाबारी की और मोटर-बोटों द्वारा इरावदी नदी पार करने का प्रयत्न किया। सबसे अधिक भयंकर लड़ाई पागन मोर्चे पर हुई। वहां कैप्टन चन्द्रभान ने बहुत अच्छी स्थिति पर अपनी मशीनगनें जमा रखी थीं। अंग्रेजी सेना लंकाशायर (इंगलैण्ड) के टॉमी लोगों की थी। कैप्टन चन्द्रभान ने टॉमी लोगों की सेना के मोटर-बोटों को इरावदी नदी में अपने निकट आने दिया। ठीक मार में आने पर अचानक मशीनगनों का फायर खोल दिया। नावों में बैठे टॉमी सैनिक होलों की तरह भून दिये। शत्रु सेना से भरी हुई 20 नावें तो इरावदी नदी में डूब गईं। कुछ नावों ने भागकर प्राण बचाये, परन्तु अधिकतर मारे गये। फरवरी 14 की सुबह अंग्रेज सेना ने अपनी पिटाई का बदला लेने के लिए वायुसेना से I.N.A. पर भारी बम्ब वर्षा की तथा तोपों के गोले भी बरसाए। आजाद हिन्द फौज के वीरों ने अपने मोर्चों से रायफलों से गोलियां चलाकर कुछ ब्रिटिश वायुयान मार गिराये। लज्जित हुई शत्रु सेना ने I.N.A. को छोड़कर जापानी सेना पर हमला बोल दिया और उससे एक चौकी छीनकर वहां अपना अड्डा जमा लिया। इसके सहारे बहुत बड़ी संख्या में शत्रु सेना ने इरावदी नदी पार कर ली।

कैप्टन चन्द्रभान नेहरू ब्रिगेड की नं० 9 बटालियन के कमाण्डर थे।

6. कर्नल गुरुबख्शसिंह ढिल्लों सिख जाट - आप नेहरू ब्रिगेड की कमाण्ड कर रहे थे। आपकी


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सेना ने इरावदी नदी पर शत्रु सेना से कई मुठभेड़ें कीं। उनसे शत्रु सेना को हार खाकर पीछे हटना पड़ा था।

7. लेफ्टिनेण्ट हरीराम जाट - आप नेहरू ब्रिगेड की नं० 7 बटालियन के कमाण्डर थे। कर्नल ढ़िल्लों ने आपकी बटालियन को न्यांगू पर तैनात किया था जहां पर आपने शत्रु सेना को मारकर पीछे धकेल दिया था।

8. मेजर टीकाराम जाट - आप गुरिल्ला रेजीमेंट के कमांडर रहे और शत्रु के मोर्चों पर आपने महत्त्वपूर्ण सफलतायें प्राप्त कीं।

9. मेजर खजानसिंह जाट - मेजर खजानसिंह बर्मा मोर्चे पर ट्रांसपोर्ट कम्पनी की कमांड संभाल रहे थे। उन्होंने एक ब्रिटिश फौजी अधिकारी को गिरफ्तार किया, जो उस समय का विख्यात गुरिल्ला था। उस ब्रिटिश गुरिल्ला का नाम था “कैप्टन ब्राउन”। ब्राउन के पकड़े जाने से उस मोर्चे पर ब्रिटिश आर्मी को काफी हानि उठानी पड़ी। मेजर खजानसिंह की इस महत्त्वपूर्ण सफलता पर नेताजी ने उन्हें ‘सरदारे जंग’ की पदवी से अलंकृत किया।

10. कैप्टन रणपतसिंह जाट - आपने शत्रु से बड़े साहस व वीरता से युद्ध किया और रणक्षेत्र में ही वीरगति पा गये थे। आपको ‘शेरे जंग’ की पदवी से अलंकृत किया गया था।

11. लांसनायक मोलड़सिंह जाट - आप शत्रु से वीरता से युद्ध लड़ते-लड़ते शहीद हो गये थे। आपको ‘शहीदे भारत’ के सर्वोच्च पदक से अलंकृत किया गया था।

12. कर्नल गुलजारासिंह सिक्ख जाट - नं० 1 डिविजन के आजाद ब्रिगेड की कमांड इम्फाल युद्ध में कर रहे थे और बर्मा में लौट आने तक इसी के कमांडर रहे।

13. मेजर मेहरचन्द जाट - आप आजाद ब्रिगेड में गुरिल्ला बटालियन के इन्चार्ज थे।

14. लेफ्टिनेण्ट कर्नल रणसिंह जाट - आप सुभाष ब्रिगेड की एक बटालियन की कमांड कर रहे थे और सैनिक अभियान में आपने महत्त्वपूर्ण काम किया था।

15. लेफ्टिनेण्ट कर्नल रामस्वरूप जाट - आप इन्टेलीजैंस के इन्चार्ज थे। आपने अराकान के मोर्चों पर महत्त्वपूर्ण सफलतायें प्राप्त की थीं।

16. कर्नल दिलसुख मान जाट - हरयाणा के सबसे वरिष्ठ सैनिक अधिकारी थे, जिनको आजाद हिन्द फौज में ‘डिप्टी कवार्टर मास्टर जनरल’ के महत्त्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया गया था।

17. मेजर अमीरसिंह जाट - आप पहले मिलिट्री स्टोर्ज़ के इन्चार्ज रहे और बाद में उन्हें पैराशूट बटालियन का कमांडर नियुक्त किया गया।

18. कैप्टन महताबसिंह जाट - आप पहले असिस्टैंट डायरेक्टर सप्लाइज और ट्रांसपोर्ट रहे तथा बाद में उन्हें स्टाफ कैप्टन नियुक्त किया गया।

19. कैप्टन प्रीतसिंह जाट - आप इन्टैलीजैंस ग्रुप में महत्त्वपूर्ण सेवा करते रहे। एक दिन जब वह पनडुब्बी द्वारा भारत की ओर आ रहे थे तो विस्फोट हो जाने के कारण उनका चेहरा बुरी तरह झुलस गया। इसके बाद उन्हें आई० एन० ए० अकादमी में नियुक्त कर दिया गया।


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20. कैप्टन कन्हैया सिंह, 21. कैप्टन गणेशीलाल, 22. कैप्टन जीतराम, 23. मेजर बलवन्तसिंह - सब जाट - ये चारों अफसर हरयाणा निवासी थे। इन्होंने भारतीय नागरिकों को प्रशिक्षण देने में बहुत महत्त्वपूर्ण काम किया।

24. मेजर संगारासिंह, 25. लेफ्टिनेन्ट अजायबसिंह दोनों सिक्ख जाट - ये दोनों कई मोर्चों पर शत्रु से बड़ी वीरता से लड़े।

26. लेफ्टिनेण्ट रणजोधसिंह सिक्ख जाट - आपने बड़ी वीरता से शत्रु का मुकाबिला करके क्लंक-क्लंक चौकी की रक्षा की थी।

27. कैप्टन गुरबख्शसिंह सिक्ख जाट - आप आजाद ब्रिगेड की एक बटालियन में थे। आपने इम्फाल युद्ध में बड़ी वीरता दिखाई थी।

28. लेफ्टिनेन्ट ज्ञानसिंह जाट - आपने 17 मार्च, 1945 को बर्मा में टॉगजिन के युद्ध में शत्रु से बड़ी वीरता से लड़ते-लड़ते कुर्बानी दी थी।

29. कैप्टन बागरी जाट - आपने 30 मार्च, 1945 को बर्मा में इरावदी नदी क्षेत्र में शत्रु से बड़ी वीरता से युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए।

27. कैप्टन अमरीक सिंह सिक्ख जाट - आपने अपने सैनिकों के साथ शत्रु से युद्ध करके क्लंक-क्लंक चौकी पर कब्जा कर लिया, परन्तु वहीं पर अमर शहीद हुए।

यदि आज़ाद हिन्द फौज के इतिहास की गहराई से खोज की जाये तो बड़ी संख्या में जाट सैनिकों के युद्धों में वीरता के कारनामे मिलेंगे। खेद है इस विषय में अधिक सामग्री प्राप्त न हो सकी। आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों ने वीरता के कार्य करके नेताजी द्वारा जितने तमगे एवं उपाधियां प्राप्त कीं उनमें से आधी से अधिक जाटवीर सैनिकों ने प्राप्त कीं।

आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों की देशभक्ति, देश को आज़ाद कराने की सत्य लगन, युद्ध में साहस, वीरता एवं कुर्बानी देने आदि के उदाहरण अद्वितीय थे जो उस समय अन्य किसी भी देश के सैनिक उनके तुल्य नहीं थे। इसका श्रेय नेताजी को जाता है।

आजाद हिन्द फौज की रंगून से वापसी

दुर्भाग्य से युद्ध का पासा पलट गया। जापानी सेना ने बर्मा छोड़ने का निश्चय कर लिया था। अब नेताजी का रंगून में रहना खतरे से खाली नहीं था। सैनिक मलेरिया और पेचिस से पीड़ित और फटेहाल थे। स्थानीय नागरिकों की भारी सेवायें भी मिलनी बन्द हो गईं।

इन हालात में आज़ाद हिन्द मन्त्रिमंडल ने निर्णय लिया कि आज़ाद हिन्द सरकार और सेना के मुख्यालय रंगून से हटाए जायें। आजाद हिन्द फौज ने हथियार नहीं डाले, पर उसे स्वयं लड़ाई बन्द करनी पड़ी। नेताजी ने रंगून छोड़ने से पहले रानी झांसी रेजीमेंट की उन लड़कियों को अपने घरों पर पहुंचाया जो बर्मा और आस-पास के देशों की थीं। नेताजी ने मेजर-जनरल लोकनाथन को अपने प्रशासनिक अधिकार देकर रंगून में छोड़ा। उनकी कमांड में वहां I.N.A. ने 5000 सैनिक व अफसर छोड़े। इस दल ने भारत के प्रवासियों और बर्मा के नागरिकों की डाकुओं से रक्षा की। बर्मा छोड़ने से पहले 24 अप्रैल, 1945 को नेताजी ने एक संदेश प्रसारित कर बर्मा की सरकार एवं जनता को सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। आपने अपनी सेना को संदेश प्रसारित किया कि वे जन्मजात आशावादी हैं और भारत की आजादी के लिए वे जीवनभर लड़ेंगे। उसी दिन


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नेताजी रानी झांसी रेजीमेन्ट की लड़कियों तथा अपने शेष सैनिकों को लेकर रंगून से बैंकाक के लिए लारियों में चले। कुछ ही दूर चलने पर लारियां दलदल में धंस गईं। शेष सारा रास्ता पैदल चल कर पार करना पड़ा। रास्ते में शत्रु की बमवर्षा और भोजन न मिलने से काफी कष्ट उठाने पड़े। निरन्तर 3 हफ्तों की पदयात्रा के बाद आप अपने साथियों समेत सकुशल बैंकाक पहुंच गए। नेताजी जो सेना रंगून में छोड़ आए थे, वे गिरफ्तार कर लिए गए थे। जनरल शाहनवाज, कर्नल ढिल्लों, कर्नल प्रेमकुमार सहगल, कर्नल लक्ष्मी स्वामीनाथन, जनरल जगन्नाथ राव भोंसले आदि अंग्रेजों द्वारा बन्दी बना लिए गए थे। बाल सेना के बालवीरों ने अंग्रेजी सेना को बहुत तंग किया। अनेक बालवीरों ने अपनी कुर्बानी देकर शत्रु के टैंक तोड़े थे। रानी झांसी रेजीमेण्ट को किसी युद्ध में लड़ने का अवसर न मिल सका।

नेताजी को यह स्पष्ट हो चुका था कि जापान अधिक दिन तक युद्ध में नहीं टिक सकता। उधर यूरोप के मोर्चों पर जर्मनी की पराजय हो चुकी थी। भारत की आजादी के लिए नया आधार खोजने के लिए नेताजी रूस जाना चाहते थे परन्तु जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जनरल कोइसो और उनकी सरकार ने सहयोग देने से साफ इन्कार कर दिया। नेताजी ने 4 जुलाई 1943 को I.N.A. की स्थापना सिंगापुर में की थी तथा 4 जुलाई 1945 को वे सिंगापुर में पहुंच गए। नेताजी ने 8 जुलाई 1945 को आजाद हिन्द फौज के वीर शहीदों की याद में सिंगापुर के समुद्र तट पर अपने करकमलों द्वारा “शहीद स्मारक” का शिलान्यास किया। यह कर्नल स्ट्रेसी और कैप्टन मलिक ने बहुत जल्दी तैयार करवा दिया। जब अंग्रेजों ने सिंगापुर पर अधिकार कर लिया तो उन जालिम व अन्यायियों ने उस “शहीद स्मारक” को बरबाद कर दिया।

द्वितीय विश्व युद्ध का अन्त बड़े नाटकीय ढंग से हुआ। अमेरिका ने जापान के शहर हिरोशिमा पर 6 अगस्त, 1945 को अणु बम पटक दिया और दूसरा 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर डाल दिया। लाखों लोगों की मृत्यु हो गई और भारी हानि हुई। जापान ने अगले दिन हथियार डाल दिये।

यह घटना सुनकर नेताजी ने कहा था कि “मैं हार मानने वाला नहीं हूं। आजाद हिन्द फौज हार मानने वाली नहीं है।” उन्होंने भयानक आपत्ति को हंसी में उड़ा दिया।

नेताजी ने सिंगापुर से रानी झांसी रेजीमेण्ट की शेष लड़कियों को उनके घरों को भेज दिया।

नेताजी की अन्तिम यात्रा

नेताजी की अन्तिम यात्रा - नेताजी अपने कुछ चुने हुए साथियों के साथ सिंगापुर से 16 अगस्त 1945 को प्रातः 10 बजे वायुयान द्वारा प्रस्थान हुए और उसी दिन 3 बजे बैंकाक पहुंच गए। 17 अगस्त को प्रातः 8 बजे नेताजी का वायुयान बैंकाक से सैगोन के लिए उड़ा और उसी दिन सैगोन पहुंच गया। सैगोन से नेताजी एवं कर्नल हबीबुर्रहमान एक जापानी फौजी बमवर्षक विमान द्वारा 17 अगस्त 1945 को सायं 5-15 पर बैठकर चले और उसी संध्या को टूरेन (इण्डोचीन) पहुंच गए। वहां रात्री को विश्राम किया। 18 अगस्त को नेताजी का विमान टूरेन से उड़ा और अपराह्ण में ताईहोकू (फॉर्मोसा) में उतरा। थोड़ी देर में उनका विमान ताईहोकू से उड़ा और कुछ ही मिनट पश्चात् वह विमान-स्थल से बाहरी भाग पर गिर पड़ा। नेताजी और हबीब दोनों ही घायल हो गये। जनरल शीदी की मृत्यु घटनास्थल पर ही हो गई।

नेताजी और हबीब को तुरन्त अस्पताल पहुंचाया गया परन्तु नेताजी का स्वर्गवास हो गया


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और कर्नल हबीब बच गये। इस तरह से नेताजी की मृत्यु 18 अगस्त 1945 को रात्रि के 9 बजे फार्मोसा द्वीप के ताईहोकू स्थान पर वायुयान दुर्घटना द्वारा हो गई।

अंग्रेजों का दुर्व्यवहार तथा उनकी प्रतिक्रिया

आई० एन० ए० के बन्दी सैनिकों के साथ अंग्रेजों का दुर्व्यवहार तथा उनकी प्रतिक्रिया: देशभक्त मेजर जयपालसिंह मलिक कृत इतिहास के पन्नों से -

सन् 1943-44 में कैप्टन (उस समय) जयपालसिंह अपनी एयर सप्लाई यूनिट के साथ बर्मा में काम कर रहे थे। 6 महीने के भीतर आप के यूनिट को त्रिपुरा, चटगांव, जोरहाट और मणिपुर के इलाकों में जाना पड़ा था। यहां लड़ाई में फंसे ब्रिटिश डिवीजनों तथा जापान एवं आई० एन० ए० से इम्फाल में घिरे अपने सैनिकों को रसद गिरानी पड़ती थी। उन दिनों कोहिमा को जापानी ले चुके थे। मणिपुर के इलाके पर हमला प्रारम्भ कर दिया था और नागा-हिल्स में भयंकर युद्ध हो रहा था। आई० एन० एम० भी जापानियों के साथ मिलकर लड़ रहे थे। अंग्रेज आई० एन० ए० को जिफ्स के नाम से पुकारते थे और भारतीय सैनिकों तथा अफसरों को इनके बारे में कुछ भी नहीं बताया जाता था क्योंकि भारतीयों को यह बात बताने में अंग्रेज डरते थे। लेकिन जिफ्स के बारे में जयपालसिंह अस्वस्थ होते हुए भी दीमापुर गये और वहां पर एक देशभक्त अफसर कैप्टन खन्ना से मिले। कैप्टन खन्ना ने कैप्टन जयपालसिंह को बताया - “नेताजी की आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक इन मोर्चों पर हैं। परन्तु यह खबर पूरी तरह गुप्त रखी जा रही है। किसी को बन्दी नहीं बनाया जा रहा है। 33वीं कोर के कमांडर ने फील्ड कमांडरों को आदेश दे रखा है कि जापानी मोर्चों पर लड़ रहे भारतीय फौजी जब पकड़े जायें तो उन्हें गोली मार दी जाए। हजारों को गोली मार दी गई है।”

इस घटना ने कै० जयपालसिंह को अधिक क्षुब्ध किया। वह चाहते थे कि उनके साथ, अंग्रेज युद्धबन्दियों की तरह आचरण करें। वे सब सैनिक वर्दी में लड़ रहे थे और यह उनका हक था। लेकिन अंग्रेज कौम ने कभी किसी के हक तथा अधिकार की रक्षा कब की थी?

अंग्रेजों की इस बेईमानी के प्रति मेजर जयपालसिंह के मन में गहरा रोष पैदा होता जा रहा था। मेजर जयपालसिंह को यह सब पता लगने के बाद उनकी टुकड़ी ने छिपकर वे रेडियो प्रसारण सुनने शुरु कर दिए जिन पर अंग्रेजों ने सख्त पाबन्दी लगा रखी थी और यह खबर कि आज़ाद हिन्द फौज मोर्चों पर लड़ रही है, उन पर्चों के जरिये फैलाई जाने लगी जिन्हें ब्रिटिश भारतीय सेना के देशभक्त अफसर और जवान आपस में गुप्त रूप से बांटा करते थे। मेजर जयपालसिंह की सिगनल कोर की टुकड़ियों का यह नियमित काम हो गया था कि वे शीनान (1) रेडियो और आज़ाद हिन्द फौज के अन्य बेतार केन्द्रों की खबरें सुनें और भारतीय सेनाओं में उसे प्रचारित करें। उन्होंने सेना की देशभक्त टोलियों को यह गुप्त संदेश पहुंचा दिया था कि सुभाषचन्द्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज अंग्रेजों से इक्के-दुक्की टुकड़ियों में नहीं बल्कि, पूरी सेना के रूप में जूझ रही है। यह जानकर भारतीय सैनिकों को बड़ी खुशी हुई और अंग्रेजों के प्रति घृणा पैदा हो गई थी।

एक दिन (1944-1945) मेजर जयपाल अराकान पहाड़ियों पर रसद गिराने की मुहिम पर जाते समय पटंगा (चटगांव) पहुंचे। वहां आप ने देखा कि एक सी०-47 जहाज भारतीय सैनिकों से भरा ठीक उसी समय वहां उतरा था। ये सब आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक थे। उनकी सैनिक वर्दियां उतरवा ली गईं थीं और उन्हें जबरन नागरिक लिबास पहनाया गया था। अंग्रेज यह भेद खुलने


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नहीं देना चाहते थे कि बर्मा में बाकायद एक भारतीय फौज ने उनका विरोध किया था। लड़ाई के मोर्चों पर लकड़े गये इन भारतीय सैनिकों को जापानियों के साथ सहयोग करने वाले जासूस, गैर फौजी भारतीय बताया जा रहा था। अंग्रेजों की दृष्टि में ये ‘गद्दार’ थे। इन लोगों को पिंजरे-नुमा झोंपड़ों में बन्द कर दिया गया था। जयपालसिंह ने देखा कि अमेरिकी सिपाही उन पर पहरा दे रहा था। उनसे बातें करके आप बंदियों के पास पहुंचे। उनसे बातें करने पर मालूम हुआ कि वे आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक थे, जिनको इम्फाल से बन्दी बनाकर लाया गया था। इनमें हरयाणा के लोग भी थे। उनमें 4/19 हैदराबाद रेजिमेन्ट के जवान भी थे। रोहतक जिले का एक जाट नेकीराम भी इनमें था। उन्होंने बताया कि आज़ाद हिन्द फौज की कमान नेताजी के हाथ में है। उन्होंने शाहनवाज, कियानी तथा अन्य नेताओं का भी जिक्र किया। यह भी बताया कि हमारे हथियार और वर्दियां छीन की गयीं, हम सैनिक हैं। मेजर जयपालसिंह के अनुसार अमेरिकी और अंग्रेज सैनिकों ने भारत में विशेषतः मणिपुर और वर्तमान नागालैंड में, स्त्रियों पर बुरे अनाचार किये थे1

लाल किले में आजाद हिन्द फौज पर इतिहास प्रसिद्ध मुकद्दमा

लाल किले में आजाद हिन्द फौज पर इतिहास प्रसिद्ध मुकद्दमा: आजाद हिन्द फौज चाहे अपने ‘चलो दिल्ली’ के महामंत्र को साकार नहीं कर पाई परन्तु जो उद्घोष भारत की सीमाओं पर आई० एन० ए० के सैनिकों ने दिया, वह राष्ट्र की वाणी बनकर विराट् रूप हो गया। 10 अगस्त 1945 को जापान ने हथियार डाल दिये। आज़ाद हिन्द फौज के अफसरों व जवानों को हजारों की संख्या में बन्दी बना लिया गया। उस वक्त भी अंग्रेजों ने आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों को युद्धबन्दी नहीं माना। यह सुनकर सम्पूर्ण राष्ट्र एक आवाज में बोला “देश इन वीर सैनिकों का पक्ष लेगा, इनका बाल बांका नहीं होने देगा।” और हुआ भी ऐसा ही। श्री भोला भाई देसाई के नेतृत्व में राष्ट्र के शीर्षस्थ वकील सैनिकों के पक्ष में खड़े थे। राष्ट्रनायक श्री जवाहरलाल नेहरू स्वयं एक वकील के रूप में देशभक्त सैनिकों के पक्ष में सैनिक अदालत में आ खड़े हुए थे। पूरे विश्व का ध्यान फिर एक बार भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन पर केन्द्रित हुआ। राष्ट्र के नेताओं ने समस्त संसार के स्वाधीनता प्रेमियों की सहानुभूति और सदभावना प्राप्त की। उधर आजाद हिन्द फौज के वीर सैनिक जिन्होंने जीवन और मृत्यु का खेल खेला था, अपने राष्ट्रनेताओं का ऐसा जोरदार समर्थन पाकर बड़े प्रसन्न थे। सैनिकों की रिहाई हुई। पूरा राष्ट्र हर्ष और उल्लास से भाव विभोर हो उठा। आज़ाद हिन्द सैनिक अपने घरों को लौटे। वे चुपचाप नहीं बैठे। देखते-देखते वही सैनिक राष्ट्रभक्ति के संदेशवाहक बने। हरयाणा के सैनिक बहुत बड़ी संख्या में आजाद हिन्द फौज से आए थे। अतः हरयाणा के गांव-गांव, खेत-खलिहान ‘जय हिन्द’ के नारों से गूंज उठे। हरयाणा में देशभक्ति क्रान्ति जोर पकड़ गई। (स्वाधीनता संग्राम और हरयाणा, पृ० 272-273, लेखक देवीशंकर प्रभाकर)।

आजाद हिन्द फौज के सैनिकों की रिहाई के दो मुख्य कारण ये थे -

  • (1) आजाद हिन्द सरकार 8 देशों से मान्यता प्राप्त सरकार थी जिसकी यह सेना थी।

1. गौरव गाथा (तृतीय पुष्प), लेखक डॉ नत्थनसिंह (बड़ौत), मेजर जयपालसिंह प्रकरण, पृ० 122-123; दैनिक ट्रिब्यून, बुधवार, 19 अगस्त 1987, आजाद हिन्द फौज पर अंग्रेजों के जुल्मों की कहानी।


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  • (2) आजाद हिन्द फौज का अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वे अंग्रेजों को मारने के अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। साथ ही भारतीय सेना की कई यूनिटों में अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह हो चुके थे, जिनका वर्णन अगले पृष्ठों पर लिखा जाएगा। अंग्रेज समझ गये थे कि यह ‘1857’ नहीं है, अब की बार एक को भी जीवित नहीं छोड़ेंगे। इस दबाव से चुपचाप राज्य सौंपकर चलते बने।

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References

  1. Lebra, Joyce C. (2008), Indian National Army and Japan, Institute of South-East Asian Studies, ISBN 978-981-230-806-1
  2. Lebra 2008, p. 99
  3. Fay, Peter W. (1993), The Forgotten Army: India's Armed Struggle for Independence, 1942–1945, University of Michigan Press, ISBN 0-472-08342-2,p.212-213
  4. Lebra 2008, p. xv
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  12. Lebra 2008, p. 107
  13. Thakur Deshraj:Jat Jan Sewak, 1949, p.141
  14. Jat History Dalip Singh Ahlawat/Chapter X,pp.846-863

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