Bathot

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Location of Bathoth near Patoda in Sikar district

Bathot or Bathoth (बठोठ) is a village in Laxmangarh tesil of Sikar district in Rajasthan.

Location

It is situated on Sikar to Salasar Balaji Road at a distance of about 20 km in west direction of Sikar city. It is famous for the birthplace of revolutionary freedom fighter Lothoo Nitharwal. He was born in 1804 in a Hindu Jat family of Nitharwal gotra in town Ringas of Shekhawati region in Rajasthan, but migrated to Bathot village.

Jat Gotras

There are about 1000 families dwelling in Bathot out of which 600 families are of Jats. There are about 15 gotras of Jats but biggest of them are Kalwaniya, Nitharwal, Khichar, and Khyalia etc. The others castes in the village are Vaishyas, Rajputs, Balais, Brahmans and Bhopas etc.

History

BathotPatoda was thikana of Sikar Rao Raja Shiv Singh. Shiv Singh’s younger son Kirti Singh was killed in Kasli war. The wife of Kirti Singh was expelled from house. She departed for his father’s house in Churu. One Dhaka Jat of village Bhuma in Laxmangarh tehsil asked her grievances while she was passing through Bhuma village. He arranged her stay at his own house and went to Jaipur to appeal for her grievance. The Jaipur Maharaja on his appeal directed Rao Raja of Sikar Shiv Singh to give the jagir of village Bathot to wife of Kirti Singh. The descendants of Kirti Singh were the Jagirdar of Bathot.

Lothoo Nitharwal came to Bathot

The story of Lothoo’s migration to Bathot is very interesting. One-day son of Thakur of Ringas, popularly called kunwar, was going on horse. He saw Lothoo passing by his horse but not saluting the kunwar. This irked the kunwar who climbed down the horse and started abusing Lothoo and even slapped Lothoo. Lothoo in turn without showing any anger picked the kunwar by hand, slapped him and threw him in air. The kunwar died on the spot. Lothoo told this incidence to his parents. The incidence had sent alarms amongst the Jagirdars. The parents of Lothoo thought it better to move from Ringas somewhere else to avoid any confrontation. Lothoo’s sister was married in village Bathot in a Kalwania family. So Lothoo along with his parents migrated from Ringas to village Bathot and started living with their relatives. The Ringas thakur did not dare to come to Bathot and penalize Lothoo.

Dungar Singh and Jawahar Singh

Dungar Singh was on the post of Risaldar in the horse-army of “Shekhawati Brigade”. He was a poerful chieftain and had a good influence amongst the soldiers. He develpoped differences with the British officer and left the post of Risaldar and came to Bathot in 1834. Jawahar Singh was a cousin brother of Dungar Singh. Jawahar Singh was adopted as son by Thakur of Patoda and made the chieftain of Patoda. Dungar Singh and Jawahar Singh were the targets of British government.

Bathot became centre of revolution

The atrocities of British company had enhanced and Bathot was sacked by them which led to rebellion by the people of Bathot. Dungar Singh and Jawahar Singh agreed to start a movement against the foreign rule. Both the sardars were aware of the influence and power of Lothoo. So they invited Lothoo in the Bathot fort and asked his cooperation in revolt against British Raj. Lothoo agreed upon the proposal and all decided to see the British out of India.


The small fortress of Bathot became the center of revolutionaries under the leadership of Lothoo Nitharwal. Bathot was always at target of British forces. Dungar Singh, Jawahar Singh, Karna Meena were other important freedom fighters with Lothoo Nitharwal.

There is a samadhi of freedom fighter - Lothoo Nitharwal at village Bathot. The people of Shekhawati region come here and worship him as a folk-deity. The samadhi of such a hero of freedom movement is uncared and badly damaged at present.

सीकर में जागीरी दमन

ठाकुर देशराज[1] ने लिखा है .... जनवरी 1934 के बसंती दिनों में सीकर यज्ञ तो हो गया किंतु इससे वहां के अधिकारियों के क्रोध का पारा और भी बढ़ गया। यज्ञ होने से पहले और यज्ञ के दिनों में ठाकुर देशराज और उनके साथी यह भांप चुके थे कि यज्ञ के समाप्त होते ही सीकर ठिकाना दमन पर उतरेगा। इसलिए उन्होंने यज्ञ समाप्त होने से एक दिन पहले ही सीकर जाट किसान पंचायत का संगठन कर दिया और चौधरी देवासिह बोचल्या को मंत्री बना कर सीकर में दृढ़ता से काम करने का चार्ज दे दिया।

उन दिनों सीकर पुलिस का इंचार्ज मलिक मोहम्मद नाम का एक बाहरी मुसलमान था। वह जाटों का हृदय से विरोधी था। एक महीना भी नहीं बीतने ने दिया कि बकाया लगान का इल्जाम लगाकर चौधरी गौरू सिंह जी कटराथल को गिरफ्तार कर लिया गया। आप उस समय सीकरवाटी जाट किसान पंचायत के उप मंत्री थे और यज्ञ के मंत्री श्री चंद्रभान जी को भी गिरफ्तार कर लिया। स्कूल का मकान तोड़ फोड़ डाला और मास्टर जी को हथकड़ी डाल कर ले जाया गया।

उसी समय ठाकुर देशराज जी सीकर आए और लोगों को बधाला की ढाणी में इकट्ठा करके उनसे ‘सर्वस्व स्वाहा हो जाने पर भी हिम्मत नहीं हारेंगे’ की शपथ ली। एक डेपुटेशन


[पृ 229]: जयपुर भेजने का तय किया गया। 50 आदमियों का एक पैदल डेपुटेशन जयपुर रवाना हुआ। जिसका नेतृत्व करने के लिए अजमेर के मास्टर भजनलाल जी और भरतपुर के रतन सिंह जी पहुंच गए। यह डेपुटेशन जयपुर में 4 दिन रहा। पहले 2 दिन तक पुलिस ने ही उसे महाराजा तो क्या सर बीचम, वाइस प्रेसिडेंट जयपुर स्टेट कौंसिल से भी नहीं मिलने दिया। तीसरे दिन डेपुटेशन के सदस्य वाइस प्रेसिडेंट के बंगले तक तो पहुंचे किंतु उस दिन कोई बातें न करके दूसरे दिन 11 बजे डेपुटेशन के 2 सदस्यों को अपनी बातें पेश करने की इजाजत दी।

अपनी मांगों का पत्रक पेश करके जत्था लौट आया। कोई तसल्ली बख्स जवाब उन्हें नहीं मिला।

तारीख 5 मार्च को मास्टर चंद्रभान जी के मामले में जो कि दफा 12-अ ताजिराते हिंद के मातहत चल रहा था सफाई के बयान देने के बाद कुंवर पृथ्वी सिंह, चौधरी हरी सिंह बुरड़क और चौधरी तेज सिंह बुरड़क और बिरदा राम जी बुरड़क अपने घरों को लौटे। उनकी गिरफ्तारी के कारण वारंट जारी कर दिये गए।

और इससे पहले ही 20 जनों को गिरफ्तार करके ठोक दिया गया चौधरी ईश्वर सिंह ने काठ में देने का विरोध किया तो उन्हें उल्टा डालकर काठ में दे दिया गया और उस समय तक उसी प्रकार काठ में रखा जब कि कष्ट की परेशानी से बुखार आ गया (अर्जुन 1 मार्च 1934)।

उन दिनों वास्तव में विचार शक्ति को सीकर के अधिकारियों ने ताक पर रख दिया था वरना क्या वजह थी कि बाजार में सौदा खरीदते हुए पुरानी के चौधरी मुकुंद सिंह को फतेहपुर का तहसीलदार गिरफ्तार करा लेता और फिर जब


[पृ 230]: उसका भतीजा आया तो उसे भी पिटवाया गया।

इन गिरफ्तारियों और मारपीट से जाटों में घबराहट और कुछ करने की भावना पैदा हो रही थी। अप्रैल के मध्य तक और भी गिरफ्तारियां हुई। 27 अप्रैल 1934 के विश्वामित्र के संवाद के अनुसार आकवा ग्राम में चंद्र जी, गणपत सिंह, जीवनराम और राधा मल को बिना वारंटी ही गिरफ्तार किया गया। धिरकाबास में 8 आदमी पकड़े गए और कटराथल में जहा कि जाट स्त्री कान्फ्रेंस होने वाली थी दफा 144 लगा दी गई।

ठिकाना जहां गिरफ्तारी पर उतर आया था वहां उसके पिट्ठू जाटों के जनेऊ तोड़ने की वारदातें कर रहे थे। इस पर जाटों में बाहर और भीतर काफी जोश फैल रहा था। तमाम सीकर के लोगों ने 7 अप्रैल 1934 को कटराथल में इकट्ठे होकर इन घटनाओं पर काफी रोष जाहिर किया और सीकर के जुडिशल अफसर के इन आरोपों का भी खंडन किया कि जाट लगान बंदी कर रहे हैं। जनेऊ तोड़ने की ज्यादा घटनाएं दुजोद, बठोठ, फतेहपुर, बीबीपुर और पाटोदा आदि स्थानों और ठिकानों में हुई। कुंवर चांद करण जी शारदा और कुछ गुमनाम लेखक ने सीकर के राव राजा का पक्ष ले कर यह कहना आरंभ किया कि सीकर के जाट आर्य समाजी नहीं है। इन बातों का जवाब भी मीटिंगों और लेखों द्वारा मुंहतोड़ रूप में जाट नेताओं ने दिया।

लेकिन दमन दिन-प्रतिदिन तीव्र होता जा रहा था जैसा कि प्रेस को दिए गए उस समय के इन समाचारों से विदित होता है।

लोठू निठारवाल स्मारक बठोठ

Statue of Lothu Nitharwal at Bathot

स्वर्गीय मनसुख रणवां ने गाँव बठोठ में राजस्थान के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी लोठू निठारवाल की यादगार में एक स्मारक जन सहयोग से बनाने का अभियान शुरू किया था जो उनके असामयिक निधन से अधूरा रह गया था । स्थानीय लोगों की मदद से इस स्मारक का काम पूरा हुआ । 15 जून 2013 को इस स्थल पर हजारों की संख्या में जाट भाई इकट्ठे हुए और 20 लाख की लागत से लोठू जाट की मूर्ती स्थापित की।

Notable persons from the village

See also

External links

References

Further reading

  • Mansukh Ranwa ‘Manu’ (2001): Amar Shaheed Lothoo Jat, J C Ranwa Prakashan, Sikar, Phone 01572-240746 Mob-09413134209
  • Phad : Lothoo Jat (Chetan – Banarasi, Bhopas)
  • Sahi Ram: Ek adhuri kranti (Hindi)

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