Himmata Ram Bhambhu

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Author:Laxman Burdak IFS (R)
Himmata Ram Bhambhu
Himmata Ram Bhambhu with President of India

Himmata Ram Bhambhu is a social worker, nature lover, conservationist and environmentalist from Nagaur district in Rajasthan. He has been awarded with Padmashri on Republic-day 26 January 2020 by the President of India. He may be contacted at Phone No:01582-243490, Mobile No. 9414241601

Early life

He was born at village Sukhwasi in Nagaur district, Rajasthan on 14.2.1956. His father's name is Shri Chatara Ram Bhambhu and mother Smt Madi Devi Godara from village Gudha Bhagwandas (Nagaur, Rajasthan). He did his Primary education from school in his own village Sukhwasi in Nagaur district. He passed 6th standard from middle school Gogelao but could not continue his education due to adverse family conditions.

Achievements in Brief

He has been involved in Planting and preserving trees and motivating people for nature conservation in forest deficit districts like Nagaur, Jodhpur, Jaisalmer, Barmer, Sikar, Ajmer etc. since last 25 years. He is associated with Mahavir International Sansthan Nagaur for Green India Mission since 2013.[1]

He has developed a unique integrated agro-forestry plantation and biodiversity conservation centre. The green patch he has created at village Harima in Nagaur in an area of 6 ha has become unique rehabilitation center for Peacocks, Chinkaras and other various rare wild birds and animals. His efforts have been widely appreciated and he has been awarded with many awards. He has been associated with People for Animals programe run by Menka Gandhi. He was awarded by UNESCO in 1999 for environment protection. He was an instrument in getting declared Gogelao and Rotoo as conservation reserves. He is an awardee of Rajasthan State Amrita Devi Vishnoi award for 2003. He has been appointed as honorary Wild Life Warden from 2000-2016 by the State Government. He is an awardee of Rajiv Gandhi Environment Protection Award-2014. He has been awarded with Padmashri for his social service on Republic-day 26 January 2020 by the President of India.

हिम्मताराम भांभू का जीवन परिचय

हिम्मताराम भांभू की दादी द्वारा वर्ष 1975 में लगवाया गया पीपल का पेड़ जिसने उनके जीवन की दिशा मोड़ी और उन्होने अपना जीवन पेड़ों और जीव-जंतुओं के लिए समर्पित कर दिया

जन्म: हिम्मताराम भांभू का जन्म राजस्थान के नागौर जिले में स्थित गाँव सुखवासी में दिनांक 14.2.1956 को हुआ। इनके पिता का नाम श्री चरतराम भांभू तथा माता का नाम श्रीमति माड़ी देवी था जो गुढ़ा भगवनदास गाँव के गोदारा परिवार से थी।

शिक्षा: हिम्मताराम ने बचपन में खेती किसानी की तमाम कठिनाइयों से निबटने के स्थानीय उपायों को देखते हुये गोगेलाव गाँव की स्कूल में छठी तक पढ़ाई की। उसके बाद स्कूल छोड़ना पड़ा और गायें चराने की ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ी।

व्यक्तित्व: भांभू जी का व्यक्तित्व सम्पूर्ण मानव मात्र के लिए प्रेरक है। भांभूजी ने यह सिद्ध कर दिया है कि इच्छा शक्ति हो तो कोई काम मुश्किल नहीं होता। हिम्मताराम भाम्भू के सरल प्रतीत होने वाले व्यक्तित्व में विराट जटिलताएँ कई बार अंजान व्यक्ति को चकरा देती हैं। ... दाद देनी पड़ेगी कि नितांत सूखे जलवायु में धरती की कोख से निकले खारे जल में अपनी मेहनत का पसीना मिलाकर हजारों-लाखों नन्हें पौधों को बेटे की तरह दुलारा-पाला-पौसा, ताकि वे वृक्ष बड़े होकर लाखों मूक पशु-पक्षियों और सभ्य इन्सानों को और अधिक उन्नत जीवन जीने के लिए मूल संसाधन देते रहें।

कुशल मिस्त्री: हिम्मताराम ने खेती के मशीनीकरण के प्रारम्भिक दौर में स्थानीय ट्रैक्टर मालिकों को समय-समय पर जरूरत अनुसार पुर्जे खोलने एवं मरम्मत में सहायता देकर अपना व्यावहारिक ज्ञान बढ़ा लिया। इससे हिम्मताराम को आस-पास के इलाके में कुशल मिस्त्री के रूप में पहचान मिली। हिम्मताराम ने वर्ष 1976 में नागौर में रहना शुरू किया और यहाँ ट्रैक्टर पार्ट्स की दुकान खोली। अपनी सरल सादगीभरी दिनचर्या और व्यवहार कुशलता के जरिये हिम्मताराम ने नागौर जिले के ट्रैक्टर चलाने वाले किसानों से अंतरंग मित्रता स्थापित की। इन संपर्कों के माध्यम से हिम्मताराम ने पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया।

पर्यावरण संरक्षण को समर्पित: हिम्मताराम वर्ष 1986 में जापान सरकार की सहायता से संचालित परियोजना के अंतर्गत वनविभाग से जुड़ गए। तबसे उनका जीवन पूर्ण रूप से वन और पर्यावरण संरक्षण को समर्पित रहा है।

स्वयं सेवी संस्थाओं से जुड़ाव: वे नागौर जिले में 25 स्वयं सेवी संस्थाओं से जुड़े हुए हैं. श्री भांभू द्वारा ग्राम मांझवास में संत सिरोमणी भक्त फूलाबाई की जीवित समाधि पर संवत 2040 में मंदिर बनाकर, हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि मनाकर समाज में श्रद्धाभाव का संदेश पहुंचाया है.

पर्यावरण संरक्षण को समर्पित

हिम्मता राम भांभू ने 1975 से लेकर आज तक लगातार वन, वन्य जीव, पर्यावरण, वृक्षारोपण आदि कार्यों में अपना जीवन समर्पित कर दिया है. आपने राजस्थान भर में जगह-जगह घूम-घूम कर वृक्षारोपण करवाकर लगभग 5 लाख से भी ज्यादा पौधे लगा चुके हैं जिसमें से 3.5 लाख से ज्यादा पौधे आज पेड़ बन चुके हैं. आपने नागौर, बीकानेर, बाड़मेर, जैसलमेर, सीकर आदि जिलों में वृक्षारोपण कर पौधे लगाए हैं. नागौर जिले में जिला हेडक्वार्टर सहित पूरे नागौर जिले में आज 3 लाख पौधे पेड़ बन चुके हैं. इतना ही नहीं उन्होंने खुद की निजी भूमि नागौर से 12 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे-65 पर 6 हेक्टर में हरिमा गांव के पास 11,000 पौधे लगाकर पेड़ बना दिए. यहाँ कतार बंद पौधे जैसे खेजड़ी, रोहिडा, बेर, सेव बेर, अनार, जाल, कुमठा, सरेस, करंज, नीम, मेहंदी और करौंदा आदि के पेड़ हैं. इनमें तीन सौ से ज्यादा राष्ट्रीय पक्षी मोर, हजारों की संख्या में अन्य पक्षी और रेंगने वाले वाले जानवर यथा सांप, गोह, गोपट, नेवले, गिरगिट आदि अनेकों जीव-जन्तु इस वृक्षारोपण में विचरण करने लगे हैं.

इन कार्यों की प्रेरणा इनकी दादी नैनी देवी से मिली. 1975 में इनकी स्वर्गीय दादी नैनी देवी ने इनके पुश्तैनी गांव सुखवासी में एक पीपल का पौधा इनके हाथ से लगवाकर कहा था कि हिम्मताराम रूंख पनपावन सै मोटो दूजो कीं पून कोनी हुवे. तुम तो जाओ, हजारों पेड़ लगाओ, पेड़ों की रक्षा करो, मूक पशु पक्षियों की सेवा करो. अपनी दादी से यह प्रेरणा लेकर इन्होंने लाखों पेड़ लगवाए और उन्हें बड़े किए. हजारों की तादाद में वन्यजीवों की जान बचाई और उनकी सुरक्षा व संरक्षण किया. उनके साथ अत्याचार करने वाले शिकारियों के खिलाफ अपने खर्चे से जंग लड़ कर उन्हें न्याय दिलवाया.

हिम्मताराम भांभू की उपलब्धियां

हिम्मताराम भांभू वर्ष 1986 में जापान सरकार की सहायता से संचालित परियोजना के अंतर्गत वनविभाग से जुड़ गए. तबसे उनका जीवन पूर्ण रूप से वन और पर्यावरण संरक्षण को समर्पित रहा है. वर्ष 1986 से 2019 आपके द्वारा पर्यावरण संरक्षण, वन्य जीव संरक्षण, वृक्षारोपण, जल संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण, जैविक खेती, पशुपालन, नशा मुक्ति, समाज सेवा आदि के किए गए उल्लेखनीय कार्यों का विवरण नीचे दिया गया है.

1. नागौर जिले में 1986 से 2019 तक साढे तीन लाख पौधे लगाकर ग्रामीण क्षेत्रों में निजी स्तर पर पेड़ बन गए हैं.

2. नागौर जिले में निजी भूमि 6 हेक्टर क्षेत्र में 1999 से लेकर 2017 तक 11000 पौधे लगाकर पर्यावरण प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किया है जो भारत सरकार के नेशनल चैनल दूरदर्शन केंद्र पर संपूर्ण विवरण 2015 में आधा घंटा तक प्रसारण हुआ है व राज्य स्तर पर राजस्थान दूरदर्शन पर तीन बार कार्यक्रम का प्रसारण हो चुका है.

3. वन्य जीवों के शिकारियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए 28 मुकदमे दर्ज करवाए जिनमें से 16 मुकदमों में शिकारियों को सलाखों के पीछे जाना पड़ा. ये मुकदमे इन्होंने अपने खर्चे से लड़े. इसमें सरकार का कोई सहयोग नहीं लिया गया.

4. आपके द्वारा 4328 स्थानों पर वन महोत्सव के कार्यक्रम आयोजित करवाये गए जिसमें जन-जन में पर्यावरण के प्रति जागृति पैदा कर लोगों को निशुल्क पौधे वितरण किए गए.

5. नागौर जिले में आमजन के सहयोग से 5792 पर्यावरण संगोष्ठियों के आयोजन करवाये गए तथा अपने खर्चे पर पर्यावरण व वन्य जीव संरक्षण के लिए जन-जन में जागृति पैदा की.

6. राज्य स्तर पर 118 विशाल पर्यावरण चेतना सम्मेलन आयोजित करवाए गए. जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, सीकर, बीकानेर आदि जगहों पर पर्यावरण शिविरों में भाग लिया व पर्यावरण को बचाने के लिए राजस्थान भर में पैदल यात्रा में भाग लेकर आमजन में जागृति पैदा की.

7. वर्ष 2000 से 2016 तक राज्य सरकार द्वारा आपको जिला नागौर के लिए मानद वन्यजीव प्रतिपालक की नियुक्ति दी गई. इस अवधि में सैकड़ों जगह वन्यजीवों के शिकारियों को पुलिस व वन विभाग का सहयोग लेकर शिकारियों को पकड़वाया व उन्हें कानूनी दंड दिलाया गया

8. पर्यावरण संरक्षण के प्रचार-प्रसार कार्य के अंतर्गत 7 फोल्डर, 5 पुस्तकें, अनेकों कविताएं आदि का प्रकाशन करवा कर निशुल्क जन-जन में जागृति उत्पन्न करने के लिए वितरण करवाए गए.

9. नागौर से 12 किलोमीटर दूर स्थित पर्यावरण प्रशिक्षण केंद्र में हजारों पक्षियों व 300 से ज्यादा राष्ट्रीय पक्षी मोरों को हर रोज 20 किलो चुग्गा डाला जाता है और 300 से ज्यादा पानी के परिंडे लगाकर इन पक्षियों के के पीने के लिए भरे जाते हैं जो कि वन्यजीव और पक्षियों के प्रेमियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं.

10. घायल वन्यजीवों को बचाने के प्रयासों के अंतर्गत 2270 घायल चिंकारा, हिरण, कृष्ण मृग आदि वन्य जीवों को इलाज करवा कर स्वछंद विचरण करने के लिए छोड़ा गया.

11. 2866 घायल राष्ट्रीय पक्षी मोर का इलाज करवा कर जंगल में छोड़ा गया.

12. पशु क्रूरता के प्रकरणों में 8 मुकदमे दर्ज करवाकर पशुओं को छुड़ाया गया व अपराधियों को पुलिस के हवाले कर कानूनी सजा दिलाई गई.

13. पुलिस थाना पांचौड़ी क्षेत्र में 1999 में 19 मोरों का सामूहिक शिकार हुआ था जिसके बारे में पुलिस को सूचित किया गया परंतु पुलिस ने शिकारियों को बचाया और उन मोरों को जमींदोज कर दिया. आपने ग्रामीणों को साथ लेकर संघर्ष किया और 27 दिन बाद जमींदोज मोरों को बाहर निकलवाकर संबंधित थानेदार को लाइन हाजिर करवाया गया और 5 शिकारियों को जेल भिजवाया गया.

14. पानी बचाने के लिए भारत सरकार के जलग्रहण कार्यक्रम के अंतर्गत सक्रीय भागीदारी करते हुये ग्राम सुखवासी व ग्राम माँझवास में 110 पानी के टाँके बनवाए और दोनों जगह तालाबों को बंधवाकर हजारों लीटर पानी संचित किया जा रहा है.

15. प्रतिवर्ष दीपावली के मौके पर स्कूलों में जाकर पर्यावरण संगोष्ठियां आयोजित कर वर्ष 2000 -2018 तक 2,66,000 स्कूली बच्चों को पटाखे नहीं जलाने की प्रतिज्ञा दिलवाई गई व पटाखों से होने वाले नुकसान की जानकारी बच्चों को दी गई.

16. नागौर जिले में नशा मुक्ति आंदोलन के अंतर्गत धार्मिक सम्मेलन आयोजित कराये और 1672 नशेड़ियों को नशा छुड़ाया गया.

17. जुलाई 2015 में महावीर इंटरनेशनल संस्था का सहयोग लेकर संपूर्ण नागौर जिले के तहसील स्तर पर उपचारित राज्य वृक्ष खेजड़ी के 2.5 लाख बीज किसानों व ग्रामीणों को निशुल्क वितरण करवाए गए जिनका मूल्यांकन करने पर 82,366 खेजड़ी के पौधे पेड़ बनने की राह पर हैं.

18. संस्था महावीर इंटरनेशनल द्वारा 2015 में इनको महावीर इंटरनेशनल ग्रीन इंडिया प्रोजेक्ट का संयोजक नियुक्त किया जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू हॉस्पिटल व महिला महाविद्यालय में 2000 पौधे लगाकर बड़े किए गए जो आज बड़े-बड़े पेड़ बन गए हैं.

19. इन कार्यों के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न अखबारों ने सूचनायें छापी. 1986 से आज तक विभिन्न अखबारों यथा राजस्थान पत्रिका, नवज्योति, दैनिक भास्कर, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान टाइम्स, डीएनए आदि अखबारों की 14 हजार से ज्यादा कतरनें इनके पास मौजूद हैं.

20. राष्ट्रीय स्तर की 25 से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में इनके द्वारा किए गए कार्यों के लेख प्रकाशित हुए हैं जिसमें शरद कृषि, कृषि गोल्ड लाइन, सेवा सौरभ, सीमावर्ती, गुड-फ्राइडे, इंडिया-टुडे, जागती जोत, हलधर टाइम्स, फार्म एंड फ़ूड, सूचना व जनसंपर्क निदेशालय की सुजस, मोतीड़ा री लुंब, फूलां जीवनी, वन विभाग की वानिकी पुस्तक, अमर उजाला आदि मैगजीनों में लेख प्रकाशित हुए हैं.

21. वर्ष 1995 से 2018 तक इनकी संस्था द्वारा पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, वन्य जीव संरक्षण, नशा मुक्ति, जैविक खेती, पशुपालन, लेखक, पत्रकार, शिक्षक व समाज सेवा आदि कार्यों को लेकर 2276 लोगों को उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मानित किया जा चुका है.

22. नागौर में पेंशनर समाज के सहयोग से शहर के पास स्टेडियम में 200 पौधे लगाकर सुरक्षा व संरक्षण किया जो पेड़ अभी मौजूद हैं.

23 नागौर हवाई पट्टी के पास सहस्त्र वन में 1100 पौधे लगाकर उनका संरक्षण किया गया जो आज पेड़ बन गए हैं..

24. स्थानीय ग्रामोत्थान विद्यापीठ संस्थान में 2000 पौधे लगाकर संरक्षण किया जो पेड़ बन चुके हैं.

25. दरगाह रोड पर 750 पौधे लगवाने में सहयोग किया था परंतु नगर परिषद के अधीन होने के कारण बिना पानी के पौधे जल रहे हैं इनको बचाने के लिए सैकड़ों बार जिला प्रशासन व नगर परिषद से पानी पिलाने की व संरक्षण करने की मांग की जा चुकी है.

26. नागौर कब्रिस्तान व श्मशान भूमि व प्रताप सागर की पाल व डेह रोड कब्रिस्तान के आगे कई जगह सैकड़ों पौधे लगाकर बड़े किए जा चुके हैं. इन कार्यों में व्यक्तिगत स्तर पर हाजिर होकर वृक्षारोपण व वन महोत्सव में भाग लिया. दो मॉडल स्कूल नागौर व मूंडवा में वृक्षारोपण करवाया. जिले में प्रत्येक पंचायत समिति स्तर पर पौधे वितरण कर वन महोत्सव मनाए गए.

27. 1990 से आज तक शिकार की घटनाये जिले में कई बार होती रही जिनमें तुरंत ही सूचना मिलने पर मौके पर जाकर ग्रामीणों व पुलिस और वन विभाग का सहयोग कर अपराधियों को दंड दिलाया गया.

28. मेड़ता में राव दूदा पार्क के लिए मौके पर जाकर वृक्षारोपण किया. रियां बड़ी में मस्जिद में जाकर पौधारोपण किया जो आज पेड़ बन चुके हैं

29. नागौर जिले में ऐसा कोई गांव नहीं बचा जहां इनके द्वारा पौधारोपण नहीं किया है. सरकारी स्कूलों, पंचायत भवन, ग्रामीण किसानों, भवनों, तालाबों, गोचर, अंगोर, श्मशान भूमि, कब्रिस्तान या निजी स्कूलों में जगह-जगह जाकर पौधारोपण किया गया और निशुल्क पौधे वन विभाग के सहयोग से वितरण करवाए गए.

30. देश की सीमा पर जाकर जैसलमेर में सैनिकों के साथ 10,000 पौधे लगाए गए जो आज पेड़ बन गए हैं.

32. वे नागौर जिले में 25 स्वयं सेवी संस्थाओं से जुड़े हुए हैं. श्री भांभू द्वारा ग्राम मांझवास में संत सिरोमणी भक्त फूलाबाई की जीवित समाधि पर संवत 2040 में मंदिर बनाकर, हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि मनाकर समाज में श्रद्धाभाव का संदेश पहुंचाया है.

प्रोत्साहन और उत्साह-वर्धन

  • इनके कार्यों को देखते हुए वन विभाग के कई निवेशकों, वन और पर्यावरण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव, द्वारा राजस्थान सरकार के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक द्वारा राज्य में 20 से ज्यादा विश्वविद्यालय के कुलपतियों, भारतीय मौसम विभाग के पूर्व डीजीपी-संयुक्त राष्ट्र कृषि मौसम विभाग के उपाध्यक्ष-राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एवं विश्वबैंक सलाहकार डॉ. लक्ष्मण सिंह राठौड़, सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मास्टर भंवरलाल, जयपुर घराने की महारानी पद्मिनी देवी, पूर्व सांसद रामसिंह कस्वा, पूर्व वन एवं पर्यावरण मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर, पूर्व सहकारिता मंत्री अजयसिंह किलक, पूर्व सार्वजनिक निर्माण मंत्री यूनुस खान, पूर्व प्रतिपक्ष के नेता एवं बीकानेर सांसद रामेश्वर डूडी, पूर्व वन मंत्री रामलाल जाट, डेगाना के पूर्व विधायक रिछपालसिंह मिर्धा द्वारा एवं राज्य के 50 से ज्यादा विधायकों द्वारा इनके कार्यों को सराहा व उत्साह वर्धन किया.
  • पूर्व मंत्री बृजकिशोर शर्मा, योग गुरु बाबा रामदेव, पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय नाथूराम मिर्धा, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व केंद्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गांधी, राजस्थान 'पीपल फॉर एनिमल्स' प्रभारी बाबूलाल जाजू भीलवाड़ा, पूर्व केंद्रीय ऊर्जा मंत्री कल्याणसिंह कालवी, पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पूर्व सांसद नागौर स्वर्गीय भंवरसिंह डांगावास, पूर्व सांसद स्वर्गीय राम रघुनाथ चौधरी, पूर्व मंत्री हरेंद्र मिर्धा, पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा, बाड़मेर पूर्व सांसद कर्नल सोनाराम, पूर्व मंत्री परसराम मोरदिया, पूर्व ऊर्जा मंत्री जितेंद्र सिंह, राज्य धरोहर संरक्षण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत, ऊर्जा मंत्री बीडी कल्ला, पूर्व विधायक रामदेव चौधरी, पूर्व विधायक स्वर्गीय मोहनलाल बारूपाल, पूर्व विधायक स्वर्गीय उदय सिंह राठौड़, जायल विधायक मंजू मेघवाल, जायल विधायक मंजू बाघमार, अनेक साधु-संतों, पूर्व विधायक हबीबुर्रहमान, पूर्व मुख्य सचिव एम एल मेहता, अतिरिक्त मुख्य सचिव, मणिपुर के सेवानिवृत डीजीपी के. राम बागड़िया, राजस्थान लोकसेवा आयोग सदस्य डॉ. कालूराम बागड़िया, श्री संस्थान जयपुर के सुरेन्द्र सिंह लखावत, भारतीय पुलिस सेवा के डी जी, आई जी, ए डी जी स्तर के 1990 से आए हुए सैकड़ों अधिकारियों, समस्त जिला कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों के साथ पौधारोपण किया. उन्होंने इनके कार्यों को सराहा और उत्साह वर्धन किया.
  • पूर्व विधायक रूपाराम डूडी, विधायक महेंद्र चौधरी, पूर्व विधायक श्री राम भींचर, पूर्व विधायक सुखराम नेतड़िया, पूर्व विधायक रामचंद्र जारोड़ा, गोगेलाव विवेक टेक्नो स्कूल की प्रधानाचार्या श्रीमती प्रीति ढल एवं संचालक श्री डूंगरराम खिलेरी, जिला रायफल्स शूटिंग के सचिव मदनलाल मिर्धा, जिले के प्रधानों, प्रमुखों, सरपंचों व अनेक समाजसेवी संगठनो, कॉलेजों के प्राचार्यों, साधु-संतों, 1990 से लेकर आज तक जिले में आए हुए उप वन संरक्षकों, सहायक वन संरक्षकों, रेंजरों, विश्नोई समाज के वन्यजीव प्रेमियों, पत्रकारों, नेशनल चैनल DD1, राजस्थान दूरदर्शन केंद्र व नागौर आकाशवाणी केंद्र, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, नवज्योति आदि सभी ने इनके कार्यों को सराहा, उत्साह वर्धन किया और पूर्ण सहयोग किया.
  • महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय चिकित्सा स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल, केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल, नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल, राजसमन्द सांसद दिव्याकुमारी, राष्ट्रीय संत ईश्वर सेवा सम्मान के अध्यक्ष कपिल खन्ना, राष्ट्रीय सेवा भारती के पदाधिकारियों, वर्तमान वनमंत्री सुखराम विश्नोई और वर्तमान कलेक्टर नागौर दिनेशकुमार यादव ने इनके कार्यों को सराहा और उत्साह वर्धन किया.

पुरस्कार और सम्मान

महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा समाज सेवा के लिए पद्मश्री पुरस्कार-2020 प्रदान किया गया
राजीव गांधी पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार-2014 प्राप्त करते हुये हिम्मताराम भांभू
  • विगत 40 वर्षों में इनका जीवन पर्यावरण संरक्षण, वन्य जीव संरक्षण, वृक्षारोपण आदि के लिए पुरस्कार दिया है. इनको राजस्थान सरकार का अमृता देवी विश्नोई पुरस्कार 2003 में दिया गया है. इनके अलावा राज्य स्तर पर सर्वोत्तम वन प्रहरी पुरस्कार, वृक्ष वर्धक पुरस्कार, वृक्ष मित्र पुरस्कार, वन विस्तारक पुरस्कार राज्य सरकार वन विभाग द्वारा दिये गये हैं.
  • राज्य स्तरीय हलधर टाइम्स, कृषि गोल्ड लाइन, अंबेडकर फैलोशिप, दलित साहित्य अकादमी, कृषि विभाग, पशुपालन विभाग, दो बार जिला प्रशासन जिला कलेक्टर द्वारा, दो बार जिला उपखंड अधिकारी द्वारा, अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा द्वारा, तत्कालीन केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री श्रीमती मेनका गांधी द्वारा पीपल फॉर एनिमल का सर्वोच्च पुरस्कार दिया गया है. जिलेभर की सैकड़ों स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा प्रशंसा पत्र व पुरस्कार दिये गए हैं.
  • 1993 - वनविस्तारक पुरस्कार , नागौर वनविभाग की ओर से
  • 1997 - राष्ट्रीय पर्व पर नागौर जिला कलक्टर द्वारा सम्मान
  • 1997 - केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री एवं 'पीपल फॉर एनिमल्स' की राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती मेनका गांधी द्वारा सम्मान
  • 1998 - वनविभाग द्वारा जिलास्तर पर 'वृक्ष वर्द्धक पुरस्कार'
  • 1999 - मुख्य वनसंरक्षक जोधपुर द्वारा संभाग स्तर पर सम्मान
  • 1999 - राज्यस्तरीय प्रश्नोतारी परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर सीकर में वनमंत्री द्वारा सम्मान
  • 1999 - सेठ वल्लभ रामदेव पित्ती द्वारा पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार
  • 1999 - महामहिम राज्यपाल अंशुमान सिंह द्वारा राजयसतार पर सर्वोत्तम वन प्रहरी पुरस्कार
  • 2000: हिम्मताराम भांभू को 2000-2016 तक राज्य सरकार ने मानद वन्य जीव प्रतिपालक की उपाधि से नवाजा
  • 2001 - वन्यजीव प्रतिपालकों की तीन दिवसीय बैठक में सहभागिता पर वनमंत्री द्वारा प्रमाण-पत्र
  • 2001 - यूनेस्को फेडरेशन राजस्थान द्वारा पर्यावरण रत्न पुरस्कार, पूर्व मुख्य सचिव एएम एल मेहता द्वारा अजमेर में दिया गया
  • 2002 - अखिल भारतीय विषनोई महासभा, मुकाम, बीकानेर द्वारा सम्मान
  • 2003 - वनमंत्री लक्ष्मी नारायण दवे द्वारा राज्यस्तरीय अमृतदेवी विषनोई पुरस्कार
  • 2005 - शुष्क वन अनुसंधान जोधपुर द्वारा पुरस्कार
  • 2005 - राजस्थान पत्रिका द्वारा कर्णधार सम्मान.
  • 2007 - ग्रीन ओलम्पियाड अवार्ड नई दिल्ली में
  • 2007 - पशुपालन विभाग की ओर से सम्मान
  • 2008: वीर अमर सिंह राठौड़ संस्थान नागौर द्वारा वीर अमरसिंह राठौड़ की जयंती पर पर्यावरण संरक्षण का पुरस्कार-2008 दिया गया.
  • 2010 - 'हलधर टाइम्स' द्वारा 'कल्याण सहाय शर्मा स्मृति श्रेष्ठ कृषक पुरस्कार - हलधर रत्न' मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा
  • 2011 - मारवाड़ मुस्लिम एजूकेशनल एंड वेल्फेयर सोसायटी एवं सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन यूनानी मेडिसिन, नई दिल्ली द्वारा प्रगतिशील किसान सम्मान समारोह में 'प्रथम कृषि वानिकी सम्मान' जस्टिस एच आर पँवार द्वारा
  • 2011 - कृषि विभाग राजस्थान द्वारा अग्रणी नवाचारी किसानों के सम्मान समारोह में कृषि मंत्री हरजी राम बुरड़क द्वारा सम्मान
  • 2012 - दैनिक भास्कर जयपुर द्वारा ग्रीन आइडल अवार्ड
  • 2013 - पत्रिका ग्रुप के प्रधान गुलाब कोठारी द्वारा पर्यावरण संवर्द्धन पुरस्कार
  • 2013 - आध्यात्मिक क्षेत्र पर्यावरण संस्थान जोधपुर द्वारा वृक्षबंधु पुरस्कार
  • 2015 - 23 मार्च 2015 को राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमति वसुंधरा राजे द्वारा राजीव गांधी पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार - 2014 प्रदान किया गया. पुरस्कार स्वरूप उनको दो लाख रुपये और रजत कमल ट्राफी भेंट की गई. समारोह में मुख्यमंत्री के साथ राज्य के वन और पर्यावरण मंत्री राजकुमार रणवा भी थे.
  • 2015 - राजस्थान दिवस समारोह के अवसर पर अजमेर संभाग का पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार संभागीय आयुक्त धर्मेंद्र भटनागर और शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी द्वारा दिया गया.
  • 2016 - में राष्ट्रीय स्तर के वीर दुर्गादास राठौड़ पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार मारवाड़ म्यूजियम ट्रस्ट जोधपुर द्वारा महाराजा गज सिंह एवं केंद्रीय कानून मंत्री पी.पी. चौधरी द्वारा दिया गया.
  • 2019 - ग्रीन वारियर अवार्ड
  • 2019 - संत ईश्वर सम्मान 2019 : रु. 1,00,000/-
  • 2019 - जायल विधायक मंजू देवी मेघवाल के जन्मदिन पर धन्ना भगत सम्मान पुरस्कार स्वरूप ₹5000 मानपत्र वह प्रशंसा पत्र दिया गया.
  • 2020: महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा 26.1.2020 को इनकी समाज सेवा के लिए पद्मश्री पुरस्कार प्रदान किया गया.
  • भारत सरकार की शुष्क अनुसंधान संस्थान “आफरी” जोधपुर द्वारा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने पर दो बार प्रशंसा पत्र व स्मृति चिन्ह देकर सम्मान किया गया.
  • कबीर आश्रम बड़ी खाटू द्वारा दो बार पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने पर प्रशंसा पत्र व स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया.
  • पीपल फॉर एनिमल की ओर से पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने पर तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जसवंत सिंह बिश्नोई द्वारा भीलवाड़ा में पुरस्कार दिया गया.
  • पुरस्कारों की लाइन में 100 से ज्यादा प्रशंसा पत्र व स्मृति चिन्ह विभिन्न जिलों की स्वयंसेवी संस्थानों द्वारा पर्यावरण संरक्षण, वन्य जीव संरक्षण, नशा मुक्ति, वृक्षारोपण आदि कार्यों के लिए उल्लेखनीय योगदान देने पर सम्मानित किया गया.
  • जिला प्रशासन वन विभाग, पशुपालन विभाग और अनेक स्वयं सेवी संस्थाओं से प्रशंसापत्र प्राप्त हो चुके हैं।

हिम्मताराम भांभू पर पुस्तक

हिम्मताराम भांभू पर पुस्तक

हिम्मत के धनी ... हिम्मताराम - यह शीर्षक है श्री हिम्मताराम भांभू पर श्री मोईनूद्दीन चिश्ती द्वारा लिखी गई पुस्तक का. लेखक एवं संपादक: मोईनूद्दीन चिश्ती, RBS मंजिल, 532, संजय सी कालोनी, प्रतापनगर, जोधपुर 342004 (राज), Email: chishty.moin@gmail.com, rbsmoin@gmail.com, सह-संपादक: राकेश रामावत, प्रथम संस्करण: जुलाई 2015, प्रकाशक: प्रज्ञा प्रकाशन

नागौर जिले के प्रतिष्ठित किसान, पर्यावरणविद्, 'पीपल फॉर एनिमल्स' संस्था के जिलाध्यक्ष और समाज सेवी श्री हिम्मताराम भांभू के जीवन आदर्शों एवं उनके अमूल्य कार्यों को संकलित कर लेखन-सम्पादन करने की महती ज़िम्मेदारी का कार्य सुप्रसिद्ध एवं अनुभवी लेखक श्री मोईनूद्दीन चिश्ती द्वारा इस पुस्तक में किया गया है।

‘हिम्मत के धनी ... हिम्मताराम’ पुस्तक लोकार्पण में प्रकाश जवाडेकर, सीआर चौधरी

इनके जीवन पर ख्वाजा गरीब नवाज अजमेर के वंशज मोइनुद्दीन चिश्ती द्वारा लिखित ‘हिम्मत के धनी ... हिम्मताराम’ पुस्तक का विमोचन 2016 में संसद भवन के सेंट्रल हाल में नागौर सांसद सी.आर. चौधरी व सैकड़ों वन्य जीव और पर्यावरण प्रेमियों की उपस्थिति में राजस्थान के 10-12 सांसदों सहित केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर द्वारा किया गया. यह पुस्तक पढ़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व केंद्रीय मंत्री सी.आर. चौधरी और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की.


हिम्मताराम पर 'नागौर जिले के हिम्मताराम ने खारे पानी में दस हजार पेड़ों के बीच ली सवाई उपज' शीर्षक से राष्ट्रीय स्तर की पत्रिका 'शरद कृषि' के नवंबर 2010 के अंक में पृष्ठ 31-32 पर लेखक और संपादक का लेख छपा था। हिम्मताराम के अद्भुत और अनूठे कार्यों को देखकर उनके जीवन वृत पर आधारित लेखक की यह सातवीं किताब है।

इस पुस्तक में श्री भांभू के आदर्शों एवं कार्यों का सरल, सुपाठ्य एवं तार्किक प्रस्तुतीकरण लेखक द्वारा किया गया है। लेखक ने अपनी पैनी दृष्टि से श्री भांभू के हर पल को उजागार करने का सफल एवं सटीक प्रयास किया है। इस पुस्तक से आने वाली पीढ़ियों को वन संरक्षण, वन्य प्राणी संरक्षण और पर्यावरण संतुलन कायम करने की प्रेरणा मिलेगी। पुस्तक पढ़ने पर ज्ञात होता है कि भांभूजी बातों में कम और काम में ज्यादा विश्वास करते हैं।अपना पैसा खर्च करके वृक्ष लगाना, वन्य जीवों की रक्षा करना, वृक्ष काटने वालों के खिलाफ मुकदमें कायम करना आदि कार्य साधारण व्यक्ति के वश की बात नहीं है। पुस्तक में हिम्मता राम भांभू द्वारा की जा रही समस्त गतिविधियों का सचित्र वर्णन दिया गया है।

'खेजड़ी बचाओ अभियान' अध्याय में हिम्मताराम ने खेजड़ी को मरुस्थल की जीवनरेखा माना है और इसे किसान की जीवनधारा कहा गया है। हिम्मताराम का खेजड़ी को विलुप्त होने से बचाने का प्रयास न केवल सराहनीय है बल्कि मरुस्थल की आर्थिक दशा सुधारने के लिए अनिवार्य है। मरुस्थल में खेजड़ी ने ही मानव की भूख छप्पनिया अकाल (1899-1900) में शांत की थी - खेजड़या खोखाल्यां, थारौ एक-एक पान अमोल। मानव भूखां पेट भरै, छोड्डा थारा छोल॥

'सरकारी अनुदान से सदैव किया परहेज' में यह सपष्ट किया गया है कि हिम्मताराम ने क्यों सरकारी अनुदान का लेना उचित नहीं समझा। वे सरकारी अनुदान को एक प्रकार का नशा मानते हैं। यह स्वावलंबी भावना को कमजोर करता है। हिम्मताराम का मानना है कि शासकीय व्यवस्था में अनुदान सही और पात्र व्यक्ति को नहीं मिलपाता है जिससे इन योजनाओं का हस्र बुरा ही होता है। एक राजस्थानी कहावत के माध्यम से हिम्मताराम सरकारी मजबूरी का बयान करते हैं - बहुवां कनै चोर मरावे, चोर बहुवां रा भाई। इस अध्याय में कृषि-वानिकी का अर्थशास्त्र भी समझाया गया है जो साधारण किसानों के लिए बहुत उपयोगी है।

'जलग्रहण विकास में रही सहभागिता' में बताया गया है कि भारत सरकार की जलग्रहण विकास योजना में नागौर जिला प्रशासन ने इस कार्य हेतु हिम्मता राम को सर्वाधिक उपयुक्त व्यक्ति मानते हुये दो परियोजनाओं मांझवास और सुखवासी में इनकी सहायता ली। हिम्मताराम ने बिना सरकारी अनुदान के ही अपने खेत को एक आदर्श जलग्रहण विकास का प्रतीक बनाया।

'मारवाड़ फिलाटेलिक सोसाइटी ' जोधपुर के संस्थापक अध्यक्ष जगत किशोर परिहार द्वारा उपलब्ध कराये गए पर्यावरण एवं वन्य जीवों से जुड़े देश-विदेश के संग्रहणीय दुर्लभ डाक-टिकट भी इस पुस्तक में प्रकाशित किए गए हैं।

'विजिटर्स बुक से' अध्याय के अंतर्गत विभिन्न आगंतुकों की हिम्मतराम के कार्यों और गतिविधियों पर की गई टिप्पणियाँ अत्यंत रोचक और उपयोगी हैं।

भांभू जी का व्यक्तित्व सम्पूर्ण मानव मात्र के लिए प्रेरक है। भांभूजी ने यह सिद्ध कर दिया है कि इच्छा शक्ति हो तो कोई काम मुश्किल नहीं होता। भांभूजी ने हरित राजस्थान के अंतर्गत मारवाड़ के स्कूलों, कालेजों व सार्वजनिक स्थलों में वृक्ष लगाने में सहयोग किया। आपके ही प्रयास से गोगेलावरोटू क्षेत्र कंजर्वेशन रिजर्व घोषित हो पाये। भांभूजी ने पर्यावरण संरक्षण के लिए चेतना रेलियाँ, संगोष्ठियाँ आयोजित कर तथा लाखों की संख्या में इस विषयक फोल्डर वितरित कर अद्भुत कार्य किया है। ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरणीय असंतुलन के इस युग में भांभूजी जैसी सोच और कार्य करने वाले व्यक्तित्वों की महती आवश्यकता है।

श्री भांभूजी द्वारा बच्चों में पर्यावरण के प्रति प्रेम की अलख जगाना सराहनीय कार्य है। उनका जीवन निस्संदेह जनसामान्य के लिए प्रेरणादाई परिचय है। उनको रजीव गांधी पर्यावरण पुरस्कार-2014 से सम्मानित कर सरकार ने भी समाज के प्रति अपना दायित्व पूर्ण किया है। पुस्तक में 'स्मृतियों के गवाह' के अंतर्गत सचित्र विवरण इसे संग्रहणीय बनाता है। लेखक ने उन आत्मीय सहयोगियों का विवरण और सूची भी पुस्तक में दी है जिनका योगदान हिम्मता राम के कार्यों को आगे बढ़ाने में रहा है।

पुस्तक की विषय सूची इस प्रकार है -

  • मेरे जीवन में रचे बसे भांभूजी:मोईनूद्दीन चिश्ती...3
  • हिम्मत की डगर पर हिम्मताराम:राकेश रामावत ...5
  • संदेश:सी आर चौधरी, अशोक गहलोत, लक्ष्मण सिंह राठौड़, के आर बगड़िया,महाराजा गजसिंह, कर्नल ए के गहलोत, राधेश्याम शर्मा, एल एन हर्ष, एन वी पाटिल, के राम, फ़ारूख अफरीदी, ए के पुरोहित, मोहम्मद अतीक,अरुण कुमार, बाबूलाल जाजू, अजयवर्धन आचार्य, श्यामसुंदर पालीवाल, प्रलयंकर जोशी, प्रसन्नपुरी गोस्वामी, श्यामलाल हर्ष, ज्ञानचंद मकवाना, संत माधवदास रामस्नेही, अनिल बांठिया ...6
  • सार्वजनिक जीवन की डगर पर...29
  • बचपन से अब तक सिर्फ पौधे ही पौधे...34
  • हरिमा... अर्थात् 'पर्यावरण की गरिमा'...39
  • खेजड़ी बचाओ अभियान... 44
  • सरकारी अनुदान से सदैव किया परहेज... 47
  • पशुओं के प्रति करुणा भावना में अव्वल... 51
  • मानद वन्य जीव प्रतिपालक के रूप में सराहनीए सेवाएं... 54
  • शिकारियों के भी शिकारी रहे... 58
  • राष्ट्रीय पक्षी मोर की रक्षा में रही विशेष रुचि...62
  • नशामुक्ति अभियान के अनूठे नायक भी...67
  • पटाखा प्रतिबंध की पावन पहल...70
  • जलग्रहण विकास में रही सहभागिता...72
  • अध्यात्म प्रेमी कृषक... 73
  • साहित्य प्रेमी भी हैं...75
  • सहयोगियों से मिली भरपूर आत्मीयता... 78
  • आत्मीय सहयोगियों की सूची...80
  • स्मृतियों के गवाह...81
  • विजिटर्स बुक से...98
  • साधना से उपजा सम्मान...103

पुस्तक से कुछ उद्धरण

Text
धरती को शृंगार कराते हिम्मत जी
जीवन का आधार बनाते हिम्मत जी
मोर, कबूतर, हिरण, फाख्ता, चिंकारा
सब जीवों के प्राण बचाते हिम्मत जी
सुबह से लेकर देर रात तक कुदरत का
हंस के हरदम भार उठाते हिम्मत जी
अपने धन से पौधे बंटवाकर देखो
हरियाली की शान बढ़ाते हिम्मत जी
सौ नावों की करके सवारी ऐ 'फानी'
सबकी नैय्या पार कराते हिम्मत जी
फानी जोधपुरी[2]

पुस्तक की ऊपर दी गई विषय सूची हिम्मता राम भाम्भू के कार्यों का एक दृष्टि में विहंगम अवलोकन कराती है जिसे पढ़कर स्वमेव पुस्तक पढ़ने की इच्छा जागृत होती है। छात्रों, किसानों, वन एवं पर्यावरण संरक्षण से संबन्धित व्यक्तियों के लिए यह एक उपयोगी और संग्रहणीय पुस्तक है। पुस्तक से कुछ उद्धरण नीचे दिये गए हैं:

हिम्मताराम भाम्भू के सरल प्रतीत होने वाले व्यक्तित्व में विराट जटिलताएँ कई बार अंजान व्यक्ति को चकरा देती हैं। ... दाद देनी पड़ेगी कि नितांत सूखे जलवायु में धरती की कोख से निकले खारे जल में अपनी मेहनत का पसीना मिलाकर हजारों-लाखों नन्हें पौधों को बेटे की तरह दुलारा-पाला-पौसा, ताकि वे वृक्ष बड़े होकर लाखों मूक पशु-पक्षियों और सभ्य इन्सानों को और अधिक उन्नत जीवन जीने के लिए मूल संसाधन देते रहें। (राकेश रामावत: हिम्मत की डगर पर हिम्मताराम, पृ.5)

अपने पैतृक गाँव 'सुखवासी' के नामकरण के बारे में हिम्मता राम मारवाड़ राजघराने की ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि पर प्रकाश डालते हैं - जोधपुर महाराजा बखतसिंह ने बीकानेर यात्रा के दौरान मार्ग में रात्री विश्राम हेतु जो स्थान चुना, वहाँ सिर्फ दो ही घर थे। श्री दरबार को पीठ दर्द की तकलीफ थी, लेकिन यहाँ उनको सुकून का अनुभव हुआ। तब उन्होने तत्कालीन राजस्व नक्शों में से चारों पड़ौसी गांवों की 4999 बीघा जमीन निकाल कर नए गाँव का सीमा निर्धारण किया और नाम रखा 'सुखवासी'। (सार्वजनिक जीवन की डगर पर,पृ.29)

हिम्मताराम ने बचपन में खेती किसानी की तमाम कठिनाइयों से निबटने के स्थानीय उपायों को देखते हुये गोगेलाव गाँव की स्कूल में छठी तक पढ़ाई की। उसके बाद स्कूल छोड़ना पड़ा और गायें चराने की ज़िम्मेदारी संभालनी पड़ी। हिम्मताराम ने खेती के मशीनीकरण के प्रारम्भिक दौर में स्थानीय ट्रैक्टर मालिकों को समय-समय पर जरूरत अनुसार पुर्जे खोलने एवं मरम्मत में सहायता देकर अपना व्यावहारिक ज्ञान बढ़ा लिया। इससे हिम्मताराम को आस-पास के इलाके में कुशल मिस्त्री के रूप में पहचान मिली। हिम्मताराम ने वर्ष 1976 में नागौर में रहना शुरू किया और यहाँ ट्रैक्टर पार्ट्स की दुकान खोली। अपनी सरल सादगीभरी दिनचर्या और व्यवहार कुशलता के जरिये हिम्मताराम ने नागौर जिले के ट्रैक्टर चलाने वाले किसानों से अंतरंग मित्रता स्थापित की। इन संपर्कों के माध्यम से हिम्मताराम ने पौधारोपण और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया। हिम्मताराम वर्ष 1986 में जापान सरकार की सहायता से संचालित परियोजना के अंतर्गत वनविभाग से जुड़ गए। उन्होने वनविभाग के ट्रकों मैं पौधे भरकर गाँव-ढाणियों में निशुल्क पौधे बांटने का बीड़ा उठाया। हिम्मताराम ने सार्वजनिक जीवन में अत्यंत स्वच्छ छवि वाले लोकसेवक की ख्याति अर्जित की। उनके पर्यावरण के प्रति समर्पण को देखते हुये युनेस्को के प्रदेश संयोजक बाबूलाल जाजू ने हिम्मताराम को युनेस्को पर्यावरण प्रकोष्ठ का जिला संयोजक मनोनीत किया। (सार्वजनिक जीवन की डगर पर,पृ.30-33)

पिछले पचास-पचपन सालों से पौधे लगाते रहने के दौरान हिम्मताराम ने कई स्थानीय प्रजातियों पर प्रयोग कर उनके संबंध में व्यावहारिक ज्ञान हासिल किया। उन्हें ज्ञात हुआ कि नए रोपित पौधों में शीशम की मृत्यु दर बहुत ज्यादा है और उनका पुनरुद्धार अथवा रिपलेसमेंट भी बहुत कठिन है। इस भूभाग में स्थानीय पौधे नीम, पीपल, बड़, खेजड़ी और रोहिड़ा आदि पनप सकते हैं लेकिन शीशम या गुलमोहर में शूला रोग ज्यादा लगने की समस्या है। सरकारी भूमि पर पौधे लगाना और वितरण करना हिम्मताराम का शौक नहीं है। वह एक आदर्श किसान और वृक्षप्रेमी के रूप में अपने निजी खेतों में सफल पर्यावरण प्रेमी नजर आते हैं। (बचपन से अब तक सिर्फ पौधे ही पौधे, पृ.37)

पर्यावरण प्रशिक्षण केंद्र हरिमा

पर्यावरण प्रशिक्षण केंद्र हरिमा

नागौर से 12 किमी दूर सरासनी ग्राम पंचायत के हरिमा गाँव में हिम्मताराम भाम्भू की निजी तपोभूमि के रूप में पर्यावरण प्रशिक्षण केंद्र विकसित हो चुका है। इसके बारे में थोड़ा विस्तार से जानना आवश्यक है।

हिम्मताराम बचपन से ही धार्मिक भक्ति-भावना से ओतप्रोत थे। उन्होने मूल पुस्तैनी गाँव सुखवासी की पैतृक भूमि के अलावा नागौर के नजदीक हरिमा गाँव को अपने पर्यावरण संरक्षण अभियान की केंद्र-स्थली के रूप में चुना। वर्ष 1998 में हिम्मताराम ने 6 हेक्टर कृषि भूमि हरिमा गाँव में खरीदी। पहले इस खेत की बाड़ लगाई, फिर तारबंदी कराई और नलकूप खुदवाया। नलकूप में 260 फीट गहराई पर खारा पानी निकला। शुरुआती दिनों में गाँव के लोग हिम्मताराम के खेत में पारंपरिक बाजरा, मोठ, तिल, ज्वार आदि की फसलों के बजाय कतारों में पौधे रोपते देख हँसते थे परंतु हिम्मताराम ने धैर्य नहीं खोया। बाद के वर्षों में भी कतारबद्ध पेड़ों के बीच की समतल भूमि पर जुताई, बुआई, बिजाई, निराई आदि कार्यों में अधिक खर्च होता था जिसका घाटा उसे उठाना पड़ा।

जलग्रहण विकास

खारे पानी में पेड़ लगाना या खेती करना संभव नहीं था। इसलिए हिम्मताराम ने उपलब्ध पानी के साथ ही और विकल्प की तलास शुरू की। यहीं से उनके मन में जलग्रहण विकास योजना लागू करने का विचार आया। वरसात के दिनों में पड़ौसी लोग अतिरिक्त पानी को फालतू बहने देते थे । हिम्मताराम ने उस अतिरिक्त पानी को अपने खेत में रोकना शुरू किया। पानी के दीर्घकालीन ठहराव से बरसाती फसलें गल जाती जिसका घाटा उसे प्रारम्भ में झेलना पड़ा। लेकिन अतिरिक्त पानी आखिर तो जमीन में ही जा रहा था। इससे खेत में कतारबद्ध पौधे लगाने में फायदा मिला। फसल भले ही गली पर वह हरी खाद का फायदा दे गई। जमीन में अब नमी बनी रहने से केंचुये पनपने लगे और इससे भूमि की गुणवत्ता में सुधार हुआ। पौधे बढ़कर पेड़ के रूप में बनने लगे। हरिमा गाँव के अन्य 30 नलकूप जहां सूखे पड़े हैं वहीं हिम्मताराम के प्रयासों से खारे पानी के बावजूद उपलब्ध बरसाती पानी के बूंद-बूंद के सदुपयोग से सूखे हरिमा गाँव में ही अपने खेत में वृक्षाच्छादित हरा आवरण खड़ा करने के भागीरथी प्रयास में सफल हुये। अब न केवल वृक्ष आवरण तैयार हो गया है बल्कि बम्पर फसल भी ली जा सकती है। पेड़ों द्वारा आच्छादित भूमि के अतिरिक्त पड़ी आस-पास की भूमि पर पहले से अधिक फसल का उत्पादन होता है। यहाँ जल स्तर भी ऊपर आ गया है। पर्यावरण प्रशिक्षण केंद्र हरिमा को अब कृषि-वानिकी के एक सफल मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। आसपास के सरकारी और निजी स्कूलों के छात्र यहाँ प्रेक्टिकल ट्रेनिंग के लिए आते हैं। करीब 5 हजार से अधिक किसान भाई भी यहाँ भ्रमण करके सीख चुके हैं।

पर्यावरण प्रदर्शनी-स्थल

पर्यावरण प्रशिक्षण केंद्र हरिमा में आगंतुकों में पर्यावरण के प्रति चेतना जागृत करने के लिए एक प्रदर्शनी-स्थल भी बना रखा है। प्रवेश द्वार के पास ही वर्ष 1730 में जोधपुर रियासत के खेजड़ली गाँव में खेजड़ी पेड़ों के कटाई के विरोध में अमृतदेवी विश्नोई सहित 363 पर्यावरण शहीदों को समर्पित जीवंत तस्वीर लगाई गई हैं। दीवार के जोड़ों पर राजस्थान के वन्य जीवों के रंगीन चित्र भी लगाए गए हैं। (हरिमा... अर्थात् 'पर्यावरण की गरिमा', पृ.39-43)

महामहिम राष्ट्रपति ने बुलावा भेजा

हिम्मताराम भांभू को महामहिम राष्ट्रपति के द्वारा चर्चा दिनांक 3.1.2020 के बाद सराहा और धन्यवाद दिया

पर्यावरण प्रेम ने नागौर के हिम्मताराम भांभू को इतनी शोहरत दिला दी कि खुद महामहिम राष्ट्रपति ने उनके पास बुलावा भेजा. राष्ट्रपति ने उनसे न केवल मुलाकात की बल्कि उनके काम को सराहा भी और भविष्य की चिंताओं पर चर्चा भी की.

नागौर के रहने वाले पर्यावरण प्रेमी हिम्मताराम भांभू ने कभी यह नहीं सोचा था कि उनकी जिंदगी में कभी ऐसा भी पल आएगा कि खुद भारत के प्रथम नागरिक उनको मिलने को बुलाएंगे. महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात कर लौटे भांभू राष्ट्रपति महोदय से मुलाकात के बाद से गदगद हैं.

19 साल की उम्र में उनकी दादी ने सबसे पहले उनके हाथ से एक पीपल का पौधा लगवाया था. उसके बाद पर्यावरण के प्रति उनका प्रेम इतना प्रगाढ़ हो गया कि वो अब तक साढ़े पांच लाख से ज्यादा पौधे लगा चुके हैं, जिनमें से साढ़े तीन लाख से ज्यादा पौधे अब पेड़ बन चुके हैं और यह क्रम लगातार जारी है.

महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पास उनकी जानकारी कैसे पहुंची यह तो भांभू नहीं जानते लेकिन उनका कहना है कि यह मूक प्राणियों और पर्यावरण की सेवा का ही नतीजा है कि राष्ट्रपति ने उनको बुलाया.

भांभू के अनुसार राष्ट्रपति ने उनके सात 'ज' की थ्योरी जानी और साथ ही पर्यावरण संरक्षण के लिए किस प्रकार से प्रयास किए जा सकते हैं, विषय पर मूल रूप से चर्चा की साथ ही गोपालन को मनरेगा से जोड़ने की बात पर भी चर्चा की.

हिम्मताराम भांभू इस उम्र में भी पूरी तरह से पर्यावरण के लिए दृढ़ संकल्पित हैं और उन्होंने महामहिम राष्ट्रपति से यह वादा किया है कि अगर सब कुछ सही रहा तो आने वाले 1 दशक में वो दो लाख पौधे और लगाएंगे. जरूरत इस बात की है कि सरकार भी उनके इस पर्यावरण रक्षा के प्रण में उनका साथ दे.

संदर्भ: हनुमान तंवर, नागौर, जी-न्यूज राजस्थान 7.1.2020

महामहिम राष्ट्रपति से चर्चा 3.1.2020

नागौर से पर्यावरण प्रेमी हिम्मताराम भांभू राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के साथ चर्चा करते हुये
राष्ट्रपति भवन दिल्ली में हिम्मताराम भांभू

नागौर से पर्यावरण प्रेमी हिम्मताराम भांभू की नई दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के आमंत्रण पर शुक्रवार दिनांक 3 जनवरी 2020 को उनसे मुलाकात हुई. इस मुलाक़ात के दौरान हिम्मताराम भांभू ने महामहिम राष्ट्रपति को कई अहम सुझाव दिए. राष्ट्रपति भवन में देश भर से उनके बुलावे पर आये प्रमुख लोगों के साथ चाय पर चर्चा करते हुए हिम्मताराम भांभू ने सुझाव दिया कि पृथ्वी पर मनुष्य के स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु जीवन में पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण और वन्य प्राणी संरक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने राष्ट्रपति को देश में घटती पानी की मात्रा, घटते वन्य क्षेत्र व वन्य-जीव आदि के कारणों के बारे में सुझाव दिये. उन्होंने इस मौके पर खेजड़ली बलिदान का जिक्र करते हुए कहा कि 290 साल पहले पेड़ों के लिए जान देने वाले 363 लोगों के बलिदान से भी अवगत कराया.

पद्मश्री सम्मान - 2020

हिम्मताराम भांभू द्वारा तैयार जंगल का दृश्य

हिम्मताराम भांभू द्वारा पर्यावरण संरक्षण, वन्य जीव संरक्षण, वृक्षारोपण, जल संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण, जैविक खेती, पशुपालन, नशा मुक्ति, दलित उद्धार आदि के संबंध में किए गए समाज सेवा के उल्लेखनीय कार्यों के लिए महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा गणतन्त्र दिवस 26 जनवरी 2020 पर पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.

राजस्थान के ट्री-मैन हिम्मताराम की मेहनत और हिम्मत को मिला है पद्मश्री सम्मान: राजस्थान के नागौर जिले के रहने वाले हिम्मताराम भांभू 1975 से अब तक साढ़े पांच लाख पौधे रोप चुके हैं। यही नहीं, इनमें से साढ़े तीन लाख पेड़ बन चुके हैं। इसमें छह एकड़ में 11 हजार वृक्षों वाला एक जंगल भी शामिल है। पर्यावरण को समर्पित इस अहम योगदान के लिए उन्हें हाल ही में 26 जनवरी 2020 को भारत के राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया।

पर्यावरण के प्रति प्रेम उन्हें संस्कारों के रूप में मिला। नागौर जिले के सुखवासी गांव के रहने वाले हिम्मताराम जब 18 साल के थे तो उनकी दादी ने उनसे पीपल का एक पौधा लगवाया था और इस पौधे का पूरा ध्यान रखने के लिए कहा था। उस दिन दादी से मिली प्रेरणा का नतीजा यह है कि 1975 से अब तक हिम्मताराम राजस्थान के कोने-कोने में करीब साढ़े पांच लाख पौधे रोप चुके हैं।

हिम्मताराम ने नागौर के नजदीक हरिमा गांव में छह एकड़ जमीन खरीदी और उस पर 11 हजार पौधे रोपकर एक समृद्ध जंगल तैयार कर दिया। यहां 300 मोर और पशु-पक्षी प्राकृतिक वातावरण में रहते हैं। जागरण समूह के प्रकाशन नईदुनिया से बातचीत में हिम्मताराम ने कहा, इंसान की जिंदगी अधिक से अधिक 100 वर्ष होती है, लेकिन पेड़ सैकड़ों साल तक रहते हैं। बस इसी सोच और दादी से मिली प्रेरणा ने मुझे यह काम करने के लिए प्रेरित किया। मुझे इस बात का संतोष है कि मैंने जो कुछ किया, उससे आज सैकड़ों पशु-पक्षियों को रहने के लिए प्राकृतिक वातावरण मिल पाया और मैं पर्यावरण को बचाए रखने में भी एक छोटा सा योगदान दे पाया।

69 साल के हिम्मताराम भांभू का गृह जिला नागौर रेगिस्तानी इलाके की शुरुआत का जिला माना जाता है। अधिकांश इलाके में पानी खारा है। खुद हिम्मताराम जब जंगल बसा रहे थे और इसके लिए नलकूप खुदवाया तो 250 फीट की गहराई पर खारा पानी आ गया। हिम्मताराम ने इस खारे पानी का इस्तेमाल तो किया ही साथ ही बारिश के पानी को खेत में रोककर जमीन में नमी पैदा की और इससे पेड़ उगाए। आज उनका उगाया-बसाया जंगल पर्यावरण का अध्ययन करने वाले छात्रों के लिए एक संस्थान की तरह है। हिम्मताराम कहते हैं कि खारे पानी में भी पौधे पनप सकते हैं। यह हमने यहां किया है। इस जंगल में हर तरह के पेड़ हैं।

हिम्मताराम बताते हैं कि उन्होंने जो कुछ भी किया अपनी पूंजी और पुरस्कारों के रूप में प्राप्त धनराशि से किया। कहते हैं, वन विभाग से पौधे खरीदकर लोगों को देता था और उनसे संपर्क में रहता था। जो पौधे लगाए गए, उनकी वृद्धि के बारे में पूछता रहता था, इसीलिए पौधे पेड़ बन पाए। पर्यावरण के साथ ही पशु-पक्षियों से भी प्रेम बढ़ा। वे मेनका गांधी की संस्था पीपल फॉर एनिमल से भी जुड़े हैं और अब तक 13 शिकारियों को जेल पहुंचा चुके हैं। उनके काम को राज्य और केंद्र सरकार ही नहीं विभिन्न संस्थाओं ने भी सराहा है।

संदर्भ: दैनिक जागरण,6.2.2020

मीडिया में हिम्मता राम भांभू

वृक्ष होते हैं धरती का श्रृंगार : भांभू:

खेजड़ी (शमी वृक्ष)

डेगाना पंचायत समिति में महावीर इंटरनेशनल संस्थान नागौर की ओर से खेजड़ी के बीज वितरण किए गए। मुख्य अतिथि वन्यजीव प्रतिपालक एवं वन एवं वन्यजीव सुरक्षा समिति जिलाध्यक्ष हिम्मता राम भांभू ने कहा कि महावीर इंटरनेशनल संस्थान नागौर की ओर से जिले में दो लाख खेजड़ी के कल्पवृक्ष के पौधों का निशुल्क बीज वितरण करने का कदम उठाया है। उन्होंने कहा कि पेड़ मानव मित्र होते हैं। पौधों से मनुष्य को शुद्ध हवा मिलती हैं। महावीर इंटरनेशनल संस्थान नागौर के अध्यक्ष रिखबचंद नाहटा ने कहा कि वृक्ष के बिना मानव का जीवन किसी भी काम का नहीं है, मानव को हर जरूरत में पेड़ की आवश्यकता होती है। कार्यक्रम में सहायक अभियंता महावीर बांगड़ा, विमल चंद नाहटा, नरेन्द्र सुखलेचा, सुभाष कोठारी, पर्यावरण प्रेमी व गोसेवा संघ के परमा राम कड़वा, पंचायत प्रसार अधिकारी भरत सिंह यादव, एईएन सुनील कुमार जैन ने विचार व्यक्त किए। पर्यावरण के प्रति जागरूकता व प्रचार-प्रसार के लिए प्रचार सामग्री का वितरण किया गया। इस मौके पर इड़वा सरपंच शिवप्रताप सिंह, पूनास सरपंच छैलू सिंह पूनास, युवा कांग्रेस ब्लॉक अध्यक्ष बंशी लाल चोयल, पूर्व सरपंच छोटू सिंह झगड़वास, लंगोड़ सरपंच मूल सिंह, मदनलाल मातवा, कैलाश खत्री, अलतवा सरपंच मोहन राम विश्नोई आदि उपस्थित थे।[3]

पौधे लगाकर दिया पर्यावरण संरक्षण संवर्धन का संदेश:

बरगद का पेड़

जिलेके पर्यावरण प्रेमी पिपुल फॉर एनीमल्स के जिला अध्यक्ष हिम्मता राम भांभू ने रविन्द्र नाथ टैगोर सीनियर सेकंडरी स्कूल में पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया। भांभू ने कहा कि मनुष्य ने अपने स्वार्थ के लिए धरती को खोखला कर दिया है। पर्यावरण के साथ की गई इस छेड़छाड़ का खामियाजा आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा।

पर्यावरण की रक्षा के लिए हर व्यक्ति को आगे आकर कार्य करना होगा। इस अवसर पर विद्यालय परिसर में नीम के 80 पौधे लगाए गए। भांभू ने राजेन्द्र भींचर को पिपुल फॉर एनीमल्स का तहसील अध्यक्ष नियुक्त किया है। इस अवसर पर दीपपुरा के पूर्व सरपंच भंवरा राम कड़वा, ईश्वर राम किलका, ज्ञाना राम रणवां, श्रवण राम खाण्डोटिया, रामेश्वर अंवला, हीरा राम जाखड़, दाना राम राठी, संस्था निदेशक अर्जुन राम कड़वा, सह निदेशक जगदीश कड़वा आदि मौजूद थे।[4]

मौलासर|स्थानीयदेवा की ढाणी स्थित राजकीय प्राथमिक विद्यालय में सोमवार को वन विभाग द्वारा वन महोत्सव मनाया गया जिसके तहत जिला अध्यक्ष पीपुल फॉर एनीमल एवं जिला वन एवं वन्य जीव सुरक्षा समिति नागौर के हिम्मतराम भांभू की अगुवाई में नीम, सीरस आदि के पौधे लगाए गए। इस दौरान पर्यावरण प्रेमी शिवराम बलारा, वन विभाग के वनरक्षक रतनाराम, पुरखाराम, प्रधानाध्यापक नरपत सिंह, मोहम्मद फारूख, हीराराम, मानाराम, भंवरलाल महला आदि मौजूद थे। [5]

पर्यावरण प्रेमी 100 गांवों में बांटेंगे पीपल और वट के पौधे:

पीपल वृक्ष

पीपुल फॉर एनीमल्स संस्था अब प्रत्येक गांव में एक पीपल और एक वट वृक्ष के साथ ट्री गार्ड देगी। इन पौधों की जिम्मेदारी गांव के ही एक व्यक्ति को सौंपी जाएगी। पर्यावरण प्रेमी हिम्मता राम भांभू ने बताया कि एक वट वृक्ष की उम्र एक हजार वर्ष होती है। वहीं पीपल की उम्र भी इससे ज्यादा होती है। दोनों पेड़ 24 घंटे ऑक्सीजन देते हैं। प्रत्येक गांव में एक पीपल तो एक वट वृक्ष के पौधे बांटे जाएंगे। जो व्यक्ति तीन वर्ष तक इनकी जिम्मेदारी संभालेगा, उन्हें यह फ्री में दिए जाएंगे। पौधे को सात फीट तक बड़ा करने पर पर्यावरण सम्मेलन में व्यक्ति को एक हजार रुपए, प्रशंसा पत्र दिया जाएगा। पर्यावरण जागृति के लिए संस्था पंचायत समिति स्तर पर संगोष्ठी भी करेगी। [6]

मीडिया में हिम्मताराम भांभू की गैलरी

हिम्मताराम भांभू पर लेख

हिम्मताराम भांभू की चित्र गैलरी

बाहरी कड़ियाँ

संदर्भ


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