Jaton Ki Prashasanik Vyavastha Aur Khap

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Jaton Ki Prashasanik Vyavastha Aur Khap
जाटों की प्रशासनिक व्यवस्था और खाप
Article by Author: Krishna Chander Dahiya
Krishna Chander Dahiya

Abstract: This article in Hindi deals with Khap system of social administration and organization in the republics of Northwestern states like Haryana, Delhi, Rajasthan and Uttar Pradesh in India since ancient times.

गण या संघ

एकाधीन जनपद वे थे जिसमें राजा व मंत्री परिषद की शासन संस्था का विकास हो गया था. दूसरे गण या संघ कहलाते थे. पाणिनि ने 2.1.59 पर इसके कई भेद लिखे हैं. [1]

गण या संघ का प्रतिनिधित्व का आधार कुलों का संगठन था. उसे राजा कहा जाता था. (सभा पर्व 14/2)

पाणिनि ने यौधेयों को संघ कहा है परन्तु यौधेयों ने अपने सिक्कों पर गण लिखा है.[2]

गण शासन का आधार कुल थे. … कौटिल्य ने भी संघों का आधार कुल माना है. [3]

सिंधु नदी पर बसी महाबली जातियां ग्रामणीय कहलाती थी. (सभा पर्व 32/1)

क्योंकि अकबर के समय हरयाणा और उत्तर प्रदेश में खाप प्रशासनिक व्यवस्था थी और आज भी ये शब्द व सामजिक ढांचे के रूप में यह व्यवस्था इन क्षेत्रों में है तो इसका कारण क्या है ?

हम पाते हैं कि इस क्षेत्र में यौधेय गण या संघ काफी लम्बे वक्त रहा.

यौधेय व मालवा बड़े गण संघ थे. [4]

यौद्धेय, औदुम्बर, अम्बष्ट गणसंघ कण्व व शुंग काल में भी थे.

नोट - स्पस्ट है कि ये गणसंघ कण्व व शुंग की सामंतवादी व्यवस्था में थे. उससे पहले मौर्य काल में स्वायत संघ थे. स्पस्ट है यूनानियों ने यौद्धेय पर हमला नहीं किया और ना ही पर्शियन सम्राट दारा ने हमला किया। इसका अर्थ है यौद्धेय गणसंघ बौद्धकाल व उससे पहले का था. पाणिनि इसलिए वर्णन करता है. गुप्तकाल के राजा समुद्रगुप्त की सीमा में मालवा-अर्जुनायन व यौद्धेय गण कबिले भी थे. [5]

नोट - समुद्रगुप्त का काल 415 ई. में समाप्त होता है. उसके बाद उसका पुत्र रामगुप्त गद्दी पर बैठा जो शकों से पराजित हुआ. गुप्तकाल 467 ई. तक रहा. इसके बाद हूण राजा तोरमान ने राज सम्भाला जो जैन हो गया. नतीजा - यौद्धेय गण का अंत 467 ई. के आसपास हुआ. स्पस्टतः हरयाणा के थानेश्वर जो हर्षवर्धन की राजधानी थी - उस काल में भी गण ही था.

गुप्तकाल के बाद दो घटनाएं एक साथ हुई. ये थी सामंतवाद की शुरुआत व राजपूत शब्द के अंतर्गत एक जाति का उत्थान. सामंतवादी व जागीरदारी सिष्टम मध्य एशिया की तुर्क जाति का सिष्टम था. (देखिये टाड व वर्नियर) स्पस्ट है कि हूण, शककुषाण ही इसके जिम्मेदार हैं. ये लोग संस्कृत जैसी भाषा बोलते थे। इस दौर में कृषि भूमि, बहादुरी, प्रभुसत्ता सामाजिक स्तर के मानक थे. [6]

इस युग के स्मृतिकार पराशर ने ब्राह्मण के लिए कृषि सामान्य व्यवसाय बताया बशर्ते वे स्वयं खेती ना करें। ब्राह्मणों को भूमि, दास, बैल के दान का वर्णन है ह्वेन्सांग ने टक्क (तक्षिला) में ब्राह्मणों को खुद खेती करते देखा।

नतीजा - स्पस्ट रूप से सारे उत्तर पश्चिम भारत में कृषिभूमि, शौर्य का महत्व बढ़ा तो जाटों ने अपने प्रत्यक्ष गणतंत्र के मार्फ़त अपनी प्रभुसत्ता बढ़ाई। लेकिन युद्धप्रिय जातियों विशेषकर राजपूतों में 36 जातियां मशहूर हो गयी और वे सामंत नियुक्त करके वेतन के बदले भूमि पर उनका शासक अधिकार दे देते.

नोट - हरयाणा में जाटों के बड़े-बड़े कबिले थे. ऐसे ही पशचिमी उत्तर प्रदेश में. उनके गनों ने प्रशासनिक स्थिति पर खुद कब्ज़ा बरकरार रखा जो पिछले 1200 साल यानि 700 ई पूर्व से चला आ रहा था और जिसकी ताकत वर यौद्धेय गण संघ था.

अरबी इतिहासकार इब्न खुरदादब अनुसार क्षत्रिय दो ढंग के थे - सबूकुफरीया और कतरिया. अल्टेकर अनुसार सबूकुफरिया मत (?) क्षत्रिय थे. इनके अंतर्गत राजवंश, सामंत वर्ग व यौद्धा क्षत्रिय वर्ग था. अलबरूनी अनुसार राजपूत क्षत्रिय ब्राह्मणों के समान समझे जाते थे परन्तु खेतिहर क्षत्रिय शूद्रों से बहुत ऊँचे नहीं थे. हयुनसांग ने सिंधु देश के राजा को शुद्र ही लिखा है. [7]

नतीजा - जाट भी अपने को बहादुर मानते थे परन्तु ब्राह्मण व राजपूत उनको शुद्र मानते थे. हम मौजूदा पाकिस्तान में जाटों की इस स्थिति को ब्रिटिश हुकूमत काल में भी पाते हैं। जाट जैसी नस्ल को मुश्किल से हिन्दू माना जा सकता है. ना वे मुस्लिम हैं ना वे पारसी न ईसाई. वे पूरी तरह से हिन्दू कानूनों से अनभिज्ञ हैं. उनकी अपनी रस्म व रिवाजे हैं.[8]

मुलतान व उसके आसपास के क्षेत्र सिंधबिलोचिस्तान के जाट, डेरागाजी खांडेरा इस्माईल, मोंटगुमरी के जाटों का पता हमें एस. एस. थोर्नबर्न की किताब से लगता है -

"जाट उसे ही सच मानता है जिसे वो अपनी आँखों से देख ले, वह आजाद रहना चाहता है. अपनी खेती पर संतुष्ट रहता है. वह जल्दी बिगड़ जाता है और बिगड़ने पर कुछ भी कर सकता है."[9]
"जाट एक अच्छा पति, शानदार किसान , ईमानदार व् मेहनती है. इन जाटों में आपस में संगठन है" [10]
मुस्लिम जाट कबीलाई, राजनैतिक प्रशासनिक रूप में उसी हालत में हैं जैसे हिन्दू जाट हैं. उनकी सामाजिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं है अंतर यह आया है कि वे ऊपर के होठ की मूंछ साफ़ करवाते हैं और मस्जिद में जाते हैं. असलियत तो यह है कि वे जाट किसी भी धर्म के नियमों में नहीं बल्कि अपनी सामाजिक व कबीलाई रस्म रिवाजों से बंधे हैं. [11]
"जाट अनाज के ढेर पर बैठकर हाथी पर बैठे राजा से कह सकता है - तुम अपनी गधी बेचोगे? वे विधवा विवाह करते हैं इसलिए बणिये उनको शुद्र बोलते हैं परन्तु वे भी बनिए से नफरत करते हैं. कहावत है मिट्टी, घास, सनी व जाट की पिटाई अच्छी तरह से करनी चाहिए। " [12]
"आम आदमी जाट पर हँसता है. जाट इतना मूर्ख है कि खुदा ही उसे सम्भाल सकता है. बेशक जाट सोने जैसा है परन्तु उसका पिछला भाग तो पीतल जैसा है."[13]
"जेहलम व चिनाब के पश्चिम में जाट कबिले दाहिमा, लंगा, चीना, सुग्गा, डूडी, चादर, भुट्टा, सुमरा हैं. भुटा जाट व भुटा राजपूत का अनुपात है 5:1 तथा सुमरा जाट व सुमरा राजपूत का अनुपात 10:1 है. जिला गुजरात में बराईच जाटों के 170 गाँव हैं. उनके पूर्वज डूडी थे" [14]

नोट - लेखक की पुस्तक 'जाटों के पूर्वजों का इतिहास' में मौजूदा पाकिस्तानी पंजाब के जिलों में जाटों की आबादी के आंकड़े दिए गए हैं.

नतीजा - उपरोक्त कथन जाट के स्वभाव व उसके गणात्मक या Participatory Democracy के गुण बताते हैं. श्री पूनम चंद जोहिया राजस्थानी जाट में गण सिष्टम के प्रमाण अपने लेख सनद परवाना बही जोधपुर में देते हैं. यह रिसर्च लेख सूरजमल संस्थान दिल्ली की पुस्तक 'The Jats Vol-1' में छपा था और पुस्तक Original Delhi ने प्रकाशित किया था.

खाप

प्रश्न था कि 'खाप' शब्द कहाँ से आया. ये तो ठीक है कि खाप शब्द असल में गणात्मक ढंग से किसी ख़ास क्षेत्र की प्रशासनिक प्रणाली के लिए ही इस्तेमाल हुआ है. परन्तु यह शब्द वेद, उपनिषद्, महाभारत, संस्कृत नाटकों में नहीं है. ना ही पुराणों में यह नाम है. विष्णु धर्मोत्तर पुराण तो 4-5 सदी का है. उसमे भी खाप शब्द नहीं है. खाप शब्द राजस्थान, सिंध, बिलोचिस्तान, पाकिस्तान व भारत के मौजूदा जाटों में नहीं है. खाप शब्द केवल हरयाणा - दिल्ली - पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रचलन में है. हरयाणा के मेवात क्षेत्र में खाप और पाल शब्द दोनों प्रचलन में हैं.

इसके लिए हमें पहले उत्तर पश्चिमी भारत में 5-6 सदी में किसानों की सामाजिक स्थिति को भी देखना होगा. अति, देवल व पाराशर ने शुद्र के लिए सेवा के अलावा खेती, पशुपालन, व्यापार को उपयुक्त व्यवसाय बताया है. उशना ने शुद्र के लिए व्यापार व शिल्प को उपयुक्त साधन बताया है. बृहस्पति के अनुसार स्वर्णकार, लौहार, चर्मकार, जुलाहा का व्यवसाय शूद्रों के लिए बताया है. इस युग की विशेषता है खेती के काम को शूद्रों का धंधा बताना. हयूनसांग व इब्न खुरदादाब ने खेती को शूद्रों का धंधा लिखा है. [15]

"सामंतवाद के व्यापक तत्तवों में किसान व छोटे लोगों पर प्रतिबन्ध ---- दमन ----" [16]

इस निष्कर्ष पर पहुँचने के पर्याप्त प्रमाण हैं कि 600 ई. से 1200 ई. के दौर में किसान को शूद्र कहा गया. [17] मेधातिथि ने इन शूद्रों को मोक्ष के अधिकार से परे कर दिया। इसका आधार था उनका गृहस्त जीवन. वे द्विजों की सेवा व बच्चे पैदा कर पुण्य कमा सकते थे.[18]

कृषकों के दमन का वर्णन बृहन्नारदीय पुराण में भी है. यह 9 वीं सदी का है. [19] किसान को 2/3 भाग अन्न मुखिया (सामंत) को देना पड़ता था. अनाज ना देने वाले वाले किसान को एक बार चेतावनी दी जाती. दो बार ऐसा करने पर उसके हिस्से से वंचित कर गाँव से निकाल दिया जाता था. [20]

नोट - यह पंजाब (आज का पाकिस्तानी पंजाब, सिंध व राजस्थान) में ऐसा औमतौर से होता था. मौजूदा हरयाणा, दिल्ली व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजपूत कमजोर थे और जाट जबर्दस्त ढंग से ताकतवर थे. वहाँ उन्होंने अपने गण सिस्टम को कायम रखा. इसके साथ उपरोक्त पाबंदियों को नहीं मानने की कोशिस की. इस खतरनाक संघर्ष का नतीजा निकला अरब, गजनवी, गोरी के हमले. क्योंकि जाट को शूद्र बना दिया था. अब वो लड़ने के हक़ से वंचित हो गया था. हरयाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना सारा जोर आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा पर लगा दिया. इसके लिए अपनी गण प्रणाली को मजबूत करने लगे जो यौद्धेय गणसंघ की 1200 साल की धरोहर थी.

8-10 वीं सदी में उत्तर पश्चिमी भारत में ग्राम प्रशासनिक इकाइयां 6 के गुणक में यानि 6, 12, 24, 36, 84 आदि के रूप में कार्यरत थी. [21]

नोट - जाटों में यह स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था 6, 12, 24, 36, 84 व 360 के रूप में था जिसके अवशेष आज के जाट खापों के रूप में मौजूद हैं.

ये गणात्मक प्रशासनिक इकाइयां लगातार काम करती रही. इसका प्रमाण है प्रसिद्ध अरबी यात्री इब्न बतूता के संस्मरण. इब्न बतूता 1334 ई. में भारत आया था.

"सम्राट की आज्ञानुसार और उच्चाधिकारियों ने मुझे बावली, बसी व बालड़ा गाँव दिए. इनकी वार्षिक आय 5000 दीनार थी. ये गाँव हिंदपत की सदी में थे. सौ गाँवों के समूह को सदी कहते थे. प्रत्येक सदी पर एक चौतरी (चौधरी) होता था. कोई बड़ा हिन्दू इस पद पर नियुक्त किया जाता था. इसके अलावा उसके पास टैक्स संग्रह के लिए मुत-सरीफ नियुक्त किया जाता था." [22]

नतीजा - आज की तारीख में भी हरयाणा में प्रसिद्ध महम चौबीसी का चबूतरा है. जाट इस शब्द को चौंतरा कहते हैं. स्पस्ट है कि ये गण के प्रधान को भी चौधरी कहते थे. इससे साफ है कि आम जाट चौधरी व प्रशासनिक चौधरी में सामाजिक अंतर नहीं था. राजा व रंक वाली बात नहीं थी.

1578 ई. में सम्राट अकबर के वजीर राजा टोडरमल ने सौरम के चौधरी पच्चूमल व सिसौली के चौधरी लाद सिंह के नाम फरमान जरी किया. सन 1580 ई में सम्राट अकबर के आला वजीर अबुल फजल व टोडरमल ने फरमान जारी किया जिसके अनुसार सम्राट अकबर के अनुसार

'मेरे राज्य की प्रत्येक जातीय पंचायत को मेरी अनुमति है और वे स्वतंत्र हैं कि वे अपने परंपरागत कार्य करती रहें. मैं इन पंचायतों को काम की आजादी देता हूँ. ये पंचायत जाजिया कर तथा अन्य शाही करों से मुक्त हैं " [23]

नतीजा - फरमान में परंपरागत शब्द का मतलब है कि ये गणात्मक ढांचा यथावादी रूप से चल रहा था. सम्राट अकबर की हकूमत ने यथा रूप में मंजूर किया था. अकबर काल में केवल जाटों में ही गणसंघ नहीं थे बल्कि अन्य जातियों में भी थे. जैसे - शालकलायन देश (जाट खाप) गठवाला, बालियान, चौगामा, बत्तीसा, दहिया, लाटन, कालखण्ड, कर्णवाल, चवालीसा, राठौड़, शेरपा ख़ास, छपरौली चौबीसी, मेरठ वास आदि सभी सभी जाट खाप या विभिन्न जाट गौत्र खाप हैं तो कलसायन (भाटी गूजर खाप) बारहासादात (मुस्लिम पठान खाप) बारहातगा (त्यागी ब्राह्मण खाप) चौहान (चौहान राजपूत) आदि अन्य जातियों की खाप थी. [24]

जाटों में तो गणसंघ थे ही परन्तु उनकी इस सोच से उनके साथ रहने वाली विभिन्न जातियां भी प्रभावित हुई.

खाप शब्द कहाँ से आया ?

संस्कृत, पाली, व प्राकृत ग्रन्थों में खाप शब्द नहीं है. सन 518 ई पूर्व में पर्शियन सम्राट दारा ने मौजूदा पकिस्तान के उत्तरी भाग तक कब्ज़ा किया। पर्शियन अपने प्रांतों को क्षत्रपी कहते थे. आप सम्राट दारा के राज के भूगोल बाबत ईरानी पुस्तकों में ये शब्द पा सकते हैं. वे प्रांत के गवर्नर को क्षत्रपावान कहते थे. क्षत्रप इसका भारतीयकरण था. [25]

सक, पह्लव काल में राष्ट्र, अहारा, देश शब्द इस्तेमाल हुए. [26] स्पस्ट है कि जाटों में एरिया व उसके प्रशासन के लिए गण की जगह खाप शब्द इस्तेमाल किया गया. कुछ लोग कहते हैं कि खाप शब्द का इस्तेमाल हर्षवर्धन काल में हुआ. मुझे लगता है कि खाप शब्द का इस्तेमाल सम्राट अकबर ने किया है. इसका कारण मेरे पास यह है कि इब्न बतूता ने खाप की जगह 'सदी' शब्द का इस्तेमाल किया है. दूसरा कारण यह है कि 8 वीं सदी की पुस्तक चचनामे में जाटों में खाप शब्द का कोई इस्तेमाल नहीं है. तीसरा कारण है यू. एन. घोषणा अपनी पुस्तक Contribution to the history of Revenue System में यह तो कहता है कि उत्तर-पश्चिमी भारत में ग्राम प्रशासनिक इकाइयां थी और ये 6 के गुणक में थी. परन्तु उसने खाप शब्द इस्तेमाल नहीं किया है.

इन्ही 6 गुणकों की ग्राम इकाइयों को जो 12, 24, 30, 36, (32), 84, 360 में बटी थी शायद पहली बार अकबर हुकूमत ने खाप कहा है. मुग़ल सरकार लगातार इनको खाप ही लिखती रही. एक दूसरे शाही फरमान द्वारा अकबर के शासन काल से मुहम्मद शाह के शासन काल तक बालियान खाप के वजीरों को खाप के मुखिया के रूप में स्वीकार किया गया (आदेश पत्र-3) सन 1707 के फरमान अनुसार बालियान खाप के वजीर को शासन की ओर से खाप क्षेत्र के गाँवों से भू-राजस्व का निर्धारण एवं वसूली रखने का हक़ दिया। [27] ) कभी-कभी खाप के वजीरों तथा चौधरियों को दावत व उपहार दिए जाते थे. [28]

प्रश्न - नई फ़ारसी के खाप शब्द का इस्तेमाल अकबर ने क्यों किया ?

अकबर का जन्म उमरकोट में हुआ था जब उनके अब्बाजान भाग कर ईरान जा रहे थे. अकबर का बचपन ईरानी तहजीब में बीता. दूसरा कारण है मुगलों के अलावा अन्य तुर्कों को पर्शियन भाषा से लगाव नहीं था. 'मुग़ल इलीट' (उच्च शासकीय) वर्ग की भाषा थी - केवल फ़ारसी ! सूर सुलतानों की अर्धशासकीय भाषा हिन्दवी थी. इसकी लिपि देवनागरी थी. इतिहासकार गुलाम हुसैन ताबता बाई बताता है कि अकबर के फरमान से पहले सरकारी भाषा हिंदी थी. दफ्तरों में रोजगार के लिए हिन्दू खत्री व कायस्थों ने मदरसों में फ़ारसी पढ़ी. खान-ए-दौरा समस-उद-दौला हिंदी बोलता था.[29]

नतीजा - स्पष्ट है बिलोचिस्तान, राजस्थान, सिंध, पाकिस्तानी पंजाब, भारतीय पंजाब में गण या जण शब्द था जो प्रत्यक्ष लोकतंत्र के लिए था. अकबर से पहले हरयाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी यही परिपाटी थी. परन्तु अकबर ने अपने फ़ारसी लगाव के कारण आगरा के पास के जाटों में खाप शब्द का इस्तेमाल गण या संघ या जण के स्थान पर शुरू हुआ. राजपूतों द्वारा शासित राजस्थान में जण, भाईचारा चौंतरा (सिल्ला) शब्द ही रहे.

मैंने अपनी पुस्तक 'जाटों के पूर्वजों का इतिहास' में Nostratic Dictionary by Ahavon Dogopalsky Published by University of Cambridge के हवाले से बताया है कि Geia का मतलब है रहने का स्थान. जाट बोली में ये गिया-र= घर है, संस्कृत में गुहा, अंग्रेजी में केव. जाट बोली में यह शब्द कोह-घर = खोगर है और Ini का मतलब था नारी. स्पष्ट है In या En का मतलब था पुरुष. सुमेर सभ्यता में लिखित रूप में पुरुष देवता के लिए En शब्द था. स्पष्ट है Geia +Ini = जाट में जणी व Geia +en = जाट में जण यानि फ़र्टायल क्रिसेंट पर जहाँ दुनिया में सबसे पहले गेहूं व जौ खाये गए. वे लोग पुरुष को जण और नारियों को जणी कहते थे. आज की तारीख में जाटों को जण, जणे, व जणी कहने की आम संस्कृति है. [30]

गुटियन का राज करने का ढंग अलग था. कबीलों की सभा अपना प्रधान बनाती थी. [31] गुटियनों का राजा नहीं होता था बल्कि वे अपना प्रधान चुनते थे. [32] गुटियनों का सामाजिक दर्जा समान था. उनमे राजा नहीं होता था. मेसोपोटामिया में सभी गुटियन प्रधानों को Kan कहते थे. [33]

जाट बोली में 'क' 'ख' 'ग' का अंतर नहीं है इसलिए 'कन' शब्द 'गन' या 'गण' ही था. यही शब्द बाद में कृषि सिस्टम के फैलाव से यूरोप में king कहा गया और मध्य एशिया में 'कान' या 'खान' कहा गया. सिंधु सभ्यता क्षेत्र में पाणिनि ने गण लिखा है. प्रत्यक्ष प्रजातंत्र का यही रिवाज जण या जणी या गण के रूप में आज भी जाटों में है. मैंने अपनी पुस्तक 'प्राचीनतम भारत में जाट की देन.' में बता चुका हूँ कि इंडो-ईरानी-यूरोपियन भाषाओँ में 'g' व 'j' आपस में स्थान बदलते हैं. ऐसा कहाँ व कब हुआ , इसके प्रमाण मेरी पुस्तक 'जाटों के पूर्वजों का इतिहास' में दिए हैं.

पंचायत व सरपंच प्रणाली की शुरुआत

अब बात आती है 'पंचायत' व 'सरपंच' शब्द की. ये दोनों शब्द वेद, उपनिषद्, पुराण, महाभारत, संस्कृत के प्राचीन नाटकों, जैन ग्रंथों, पाली ग्रंथों, इब्न बतूता की भारत यात्रा, अकबर सम्राट आदि के फरमानों में नहीं है. ना ही 1881 की सेंसस रिपोर्ट में. जहाँ तक मुझे याद है 1907-08 में ब्रिटिश शासन में रायल कमीशन ने माना कि गाँव एक इकाई है. और इसके मुखिया को सरपंच कहा जाता है. गाँव के प्रशासनिक ढांचे के लिए पहली बार पंचायत कहा गया जो सिविल, क्रिमिनल, जूरिस्डिक्शन का अधिकार रखेगी.[34]

रोहतक गजेटियर 1910 में बताया गया है कि खाप पंचायतें किसी जाति या कबिले की नहीं थी [35] जाटों के क्षेत्रों में ये गणसंघ (खाप) 1197, 1199, 1287, 1490 में काफी सक्रीय थी. ये 1498 व 1503 में भी सक्रीय थी. इनकी सक्रियता का मूल कारण आर्थिक सामाजिक व सांस्कृतिक के साथ-साथ राजनैतिक भी था.

जाटों के गणसंघ (खाप) का पतन का कारण एकतंत्री राजतंत्रवाद व सामंतवाद यानि जागीरदारी सिस्टम था. अंग्रेजों ने जागीरदारी की जगह अफसरशाही लाद दी. और न्याय को भी महंगा कर दिया. मौजूदा सरकारी ग्राम पंचायतों का आधार अप्रत्यक्ष लोकतंत्र है जिसमे हम सब देखते हैं कि शराब व पैसे की काफी भूमिका है. इससे समाज का नैतिक पतन हुआ है.

खाप पंचायतों में समाज सुधार

खाप पंचायतों में समाज सुधार: खाप पंचायतों में अगर समाज सुधार के आंदोलनों को जारी रखना है तो प्रत्यक्ष लोकतंत्र की प्रणाली को अपनाना होगा। सर्वसम्मत रूप से चुने लोगों के प्रतिनिधियों को आधार बनाना होगा। नारी को भी उचित स्थान देना होगा। हर जाति के प्रतिनिधि सम्मिलित करने होंगे। केवल खुद मेंबर बनकर व अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव जीते लोगों को माला पहनाकर हम जाट तहजीब को जिन्दा नहीं रख पाएंगे. जाटों में दहेज़ प्रथा की बुराई को हटाने का कार्य यही खाप पंचायत कर सकती हैं. इसलिए जवान पीढ़ी को खाप सिस्टम को सुधरने के लिए आगे आना होगा। जाटों की सबसे बड़ी गलती यह है कि वक्त के साथ साझेदारी के प्रजातंत्र को बदल नहीं सके. स्पष्ट है कि सुधार की आवश्यकता है.

मुझे मधु किस्वर ने एक सेमीनार में बुलाया था.यह दिल्ली में लोधी रोड़ पर था. इसमें बहुत सारे विद्वान भी आये थे. भाई योगेन्द्र यादव भी थे. विषय था 'अप्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली' बनाम 'प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली'. श्रीमती मायाराम जो एक समाज विज्ञानी हैं और कई पुस्तकों की लेखिका हैं उन्होंने कहा था कि हरयाणा के मेवात क्षेत्र में प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली है. मैंने उनकी बात का समर्थन करते हुए कहा था कि उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप में प्रत्यक्ष प्रजातंत्र हर जगह है जहाँ जाट हैं. यह जाटों की मूल प्रणाली है और उस समय शुरू हुई जब जाट ने दुनिया में सबसे पहले गेहूं व जौ की खेती शुरू की और घर व गाँव बसाने की शुरुआत की. नदी घाटी सभ्यताओं से भी पहले की इस जाट संस्कृति को जिन्दा रखा जावे. यह हमारी धरोहर है.

यह भी देखें

सन्दर्भ

References

  1. पाणिनि कालीन भारतवर्ष ले. वासुदेव शरण अग्रवाल पृ.426
  2. पाणिनि कालीन भारतवर्ष ले. वासुदेव शरण अग्रवाल पृ. 431
  3. वासुदेव शरण अग्रवाल पृ.432
  4. A.K. Sinha: Provincial Administration in Ancient India
  5. A.K. Sinha: Provincial Administration in Ancient India, Published by Associated Book Agency Patna, Doctoral Thesis in Magadh University
  6. डी. एन. झा व के. एम. माली : प्राचीन भारत का इतिहास, दिल्ली यूनिवर्सिटी पृ.374
  7. ibid p. 375
  8. Rise of British Dominion by Sir Lyll and Murry 1893, The Land Revenue and its Administration in India Part-1, by Sharma Inder Jeet
  9. Musalman and Moneylenders by S.S. Thornburn, Pub:William Black and Sons London, Multan Settlement Report, pp.29
  10. S.S. Thornburn, op cit.Census Report 1881
  11. Census Report 1881, Castes in Punjab by Ibbetson
  12. ibid
  13. Multan Glossary by O' Brien quoted in Census Report 1881
  14. Multan Glossary by O' Brien quoted in Census Report 1881
  15. प्राचीन भारत का इतिहास, संपादक डी. एन. झा व के. एम. श्रीमाली, पेज 377 प्रकाशक हिंदी निदेशालय दिल्ली यूनिवर्सिटी
  16. ibid
  17. ibid
  18. ibid
  19. ibid
  20. ibid
  21. दहिया स्मृति लेखक डॉ सूरजभान दहिया पेज 129, भू पू संपादक गजेटियर संस्था हरयाणा
  22. इब्न बतूता की भारत यात्रा, पेज 140 , नॅशनल बुक ट्रस्ट
  23. जाटों की पंचायती व्यवस्था लेखक डॉ. एम. सी. प्रधान अनुवाद - डॉ. धर्मचंद विद्यालंकार, प्रकाशक- पुस्तक वाटिका दिल्ली
  24. ibid
  25. Provisional Administration in Ancient India by A K Sinha, Doctoral Thesis submitted in Magadh University, Published by Associated Book Agency, Patna
  26. ibid
  27. जाटों की पंचायती व्यवस्था लेखक - एम. सी. प्रधान, अनुवाद- धर्मचंद विद्यालंकार, पेज 78
  28. 1621 के मुग़ल सम्राट जहांगीर के फरमान के हवाले से ibid
  29. The Pursuits of Persian Language in Mughal Period by Muzaffar Alam, Source- Modern Asian Studies Vol-32, No. 2 pp.317-349, Cambridge University Press
  30. देखिये- जाटों के पूर्वजों का इतिहास, लेखक- कृष्ण चंद दहिया
  31. Diakonofs के हवाले से 'जाटों के पूर्वजों का इतिहास, लेखक - कृष्ण चंद दहिया
  32. Gutian by AK Mohamad Doctoral Thesis submitted in Leiden University
  33. Van deer Veen: East Tribal Societies ed. by S. Zuchmann Chicago 2009 के हवाले से कृष्ण चन्द्र दहिया
  34. Leadership behavior of Panchayati Raj by Ravinder Bedi, Doctoral Reasearch Thesis submitted in Dharwad University
  35. दहिया स्मृति लेखक डॉ सूरज भान दहिया

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